आम चुनाव 2024 और बस्तर [ आलेख – 4 ]

6-1-3.jpeg

राजीव रंजन प्रसाद

एक शब्द है, सेल्फ गोल; क्या कॉंग्रेस के लिए यही सिद्ध होने जा रहा था? वर्ष 1957 के लोकसभा चुनावों में और विधान सभा के चुनावों में यह स्पष्टता हो गई थी कि बस्तर अब राजतंत्र के प्रभाव से निकल रहा है और मुख्यधारा की राजनीति के साथ कदमताल करने के लिए प्रस्तुत है

वर्ष 1957 में प्रवीर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विजित हो कर विधानसभा पहुँचे। अनेक मतभेदों और कॉंग्रेस के स्थानी नेतृत्व से खीचातानी के फलस्वरूप वर्ष 1959 को उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। 11 फरवरी 1961 को राज्य विरोधी गतिविधियों के आरोप में महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव धनपूँजी गाँव में गिरफ्तार कर लिये गये। इसके तुरंत बाद फरवरी-1961 में प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट के तहत उन्हें नरसिंहपुर जेल ले जाया गया। राष्ट्रपति के आज्ञापत्र के माध्यम से 12.02.1961 को प्रवीर के बस्तर के भूतपूर्व शासक होने की मान्यता समाप्त कर दी गयी। प्रवीर के छोटे भाई विजयचन्द्र भंजदेव को भूतपूर्व शासक होने के अधिकार दिये गये। प्रवीर की गिरफ्तारी से बस्तर में शोक और आक्रोश का माहौल हो गया। बस्तर की जनता को विजय चंद्र भंजदेव के लिये “महाराजा” की पदवी मान्य नहीं थी। आदिवासियों से उन्हें “सरकारी राजा” का व्यंग्य विशेषण अवश्य प्राप्त हुआ। इसके विरोध में लौहण्डीगुड़ा तथा सिरिसगुड़ा में आदिवासियों द्वारा व्यापक प्रदर्शन किया गया था। 31 मार्च 1961 को प्रवीर की गिरफ्तारी के विरोध में लौहण्डीगुड़ा के बेनियापाल मैदान में बीस हजार से अधिक ग्रामीणों की भीड़ एकत्रित हुई। ग्रामीणों ने थाने का घेराव कर दिया। थाना-भवन से सौ मीटर की दूरी पर पुलिस जीप खड़ी थी जिसपर लाउडस्पीकर लगाया गया था। रह रह कर घोषणा की जा रही थी – भारत सरकार द्वारा विजय चंद्र भंजदेव को बस्तर का महाराजा घोषित किया गया है, अब वे ही आप सब के महाराजा है।

भीड़ का अपना व्यवहार शास्त्र होता है। यह भीड़ आंदोलित नहीं उद्वेलित थी। इस भीड़ का कहीं आग लगाने या तोड़ फोड़ करने का इरादा नहीं था। यह भीड़ केवल अपने महाराजा प्रवीर चंद भंजदेव के लिये इकट्ठी हुई थी, विशेष कर उनका कुशलक्षेम जानने। कई युवक तीर-कमान लादे थे तो कई फरसे और कुल्हाडी के साथ थे, पर ये सारे अस्त्र-शस्त्र केवल आभूषण भर ही रहे। यह भीड़ यदि असंयमित हो जाती तो मुट्ठी भर सिपाही उनका मुकाबला नहीं कर सकते थे। लेकिन ‘हमारे महाराज को उपस्थित करो’ की एक सूत्रीय माँग के साथ खड़ी यह भीड़ किसी भी समय अराजक नहीं थी तथापि आश्चर्य कि सिपाहियों को गोली चलाने के आदेश मिल गये। बीस हजार की भीड़ को छटने में भी समय लगता। गोलियाँ चलायी जाती रहीं, लाशें बिछती रहीं। सोनधर, टांगरू, हडमा, अंतू, ठुरलू, रयतु, सुकदेव; हर मौत के साथ लौहण्डीगुड़ा का बेनियापाल मैदान खाली होता गया।

एक शब्द है, सेल्फ गोल; क्या कॉंग्रेस के लिए यही सिद्ध होने जा रहा था? वर्ष 1957 के लोकसभा चुनावों में और विधान सभा के चुनावों में यह स्पष्टता हो गई थी कि बस्तर अब राजतंत्र के प्रभाव से निकल रहा है और मुख्यधारा की राजनीति के साथ कदमताल करने के लिए प्रस्तुत है। वर्ष 1957 के चुनावों में कॉंग्रेस को बड़ी जीत इस परिक्षेत्र से प्राप्त हुई थी। महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के साथ जैसे जैसे दुर्व्यवहार होने लगे, सहानुभूति की लहर उनके पक्ष में होने लगी थी। भले ही व्यवस्था बदल गई हो लेकिन महाराजा प्रवीर की लोकप्रियता असाधारण थी इसे समझने में वे स्थानीय छुटभैये नेता भू कर रहे थे जिन्हे सत्ता-शासन का नया नया नशा हुआ था। तत्कालीन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और महाराजा प्रवीर के बीच की संबंध तल्खियों से भरे हुए थे जिसका उल्लेख प्रवीर अपनी पुस्तकों ‘लौहण्डीगुड़ा तरंगिणी’ और ‘आई प्रवीर द आदिवासी गॉड’ में स्पष्टत: करते हैं। लौहण्डीगुड़ा गोलीकाण्ड ने पूर्ण रूप से जाना समर्थन महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के पक्ष में कर दिया था।

वही कॉंग्रेस जिसके सुरती क्रिस्टैया ने वर्ष 1957 के चुनाव में 77.28% मत हासिल कर जीत प्राप्त की थी, वर्ष 1962 का चुनाव बुरी तरह हारे, उन्हें केवल 12.82% मत ही मिल सके और वे चुनावी समर में तीसरे स्थान पर रहे। इन चुनावों में कॉंग्रेस का मुकाबला तीन अन्य निर्दलीय प्रत्याशी कर रहे थे। निर्दलीय लखमू भवानी को 87557 (46.66%) मत प्राप्त हुए, निर्दलीय बोध दादा को 61348 (32.69%) मत प्राप्त हुए, कॉंग्रेस के सुरती क्रिस्टैया को 24057 (12.82%) मत प्राप्त हुए तथा निर्दलीय सुधू लखन को 14694 (7.83%) मत प्राप्त हुए। इस तरह एक बड़ी जीत निर्दलीय प्रत्याशी लखमू भवानी ने हासिल की। यहाँ स्मरण करना होगा कि बोध दादा ने वर्ष 1957 का चुनाव भी लड़ा था और वे सुरती क्रिस्टैया से भारी मतों से पराजित हुए थे, इस बार न केवल उन्हे दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था बल्कि उन्हें कॉंग्रेस प्रत्याशी की तुलना में 19.87% अधिक मत भी प्राप्त हुए थे। यदि कॉंग्रेस के प्रतिपक्ष में केवल एक ही निर्दलीय प्रत्याशी होता तो सुरती क्रिस्टैया को रिकॉर्ड हार का सामना करना पड सकता था। इस पराजय के पीछे निस्संदेह महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की लोकप्रियता थी। ये चुनाव एक तरह से उनका शक्तिपरीक्षण थे। यहाँ जोड़ना होगा कि कॉंग्रेस की विधानसभा चुनावों में भी भारी दुर्गति हुई थी। वर्ष 1962 के विधानसभा चुनावों मे बीजापुर को छोड सर्वत्र महाराजा पार्टी के निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे तथा यह तत्कालीन सरकार को प्रवीर का लोकतांत्रिक उत्तर था। इस विधानसभा चुनाव का एक और रोचक पक्ष है। कहते हैं कि राजनैतिक साजिश के तहत तत्कालीन जगदलपुर सीट को भी आरक्षित घोषित कर दिया गया जिससे कि प्रवीर बस्तर में स्वयं कहीं से भी चुनाव न लड़ सकें। उन्होंने कांकेर से पर्चा भरा और हार गये। कांकेर से वहाँ की रियासतकाल के भूतपूर्व महाराजा भानुप्रताप देव विजयी रहे थे।

प्रख्यात कथाकार मालती जोशी का निधन

6-10.jpeg

भोपाल। पद्मश्री से अलंकृत लोकप्रिय कथाकार श्रीमति मालती जोशी का दिल्ली में निधन हो गया। वे 90 वर्ष की थी । उनके अंतिम समय में उनके दोनों पुत्र ऋषिकेश और सच्चिदानंद जोशी(सदस्य सचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र) तथा पुत्र वधूए अर्चना और मालविका उनके पास थे। वे पिछले कुछ समय से आइसोफ़ेगस के कैंसर से पीड़ित थी।

भारतीय जन संचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि पचास से अधिक हिन्दी और मराठी कथा संग्रहों की लेखिका मालती जोशी, शिवानी के बाद हिन्दी की सबसे लोकप्रिय कथाकार मानी जाती हैं। वे अपने कथा कथन की विशिष्ट शैली के लिए जानी जाती थी। उनके साहित्य पर देश के कई विश्वविद्यालयों में शोध कार्य हुए हैं। प्रो.द्विवेदी ने कहा कि उनके कथा संसार से भारतीय परिवारों,रिश्तों और मूल्यबोध की गहरी समझ पैदा होती है।

ईवीएम के जानकारों से विनम्र अनुरोध

evm_14f6b4.jpg

रंगनाथ

मुझे अपने विद्वान मित्रों से शिकायत है कि वे ईवीएम का इस्तेमाल ट्रम्प कार्ड की तरह करते हैं। वो चुनाव से पहले कुछ भी दावा करते रहते हैं, सही निकले तो जय लोकतंत्र जय संविधान और हार गये तो ईवीएम ईवीएम करने लगते हैं। ये चीटिंग है

मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि फिलहाल ईवीएम का क्या स्टेटस है? तीन चरण हो चुके हैं। सभी ईवीएम-वादी मित्रों से अनुरोध है कि अभी से स्पष्ट कर दें कि ईवीएम हैक हुई या नहीं! मैं मानता हूँ कि ईवीएम से चुनाव बैलट से काफी बेहतर हैं। पिछले 10 साल में ईवीएम को पहले से बेहतर बनाया जाता रहा है। अदालत ने भी उसमें कुछ सेफ्टी फीचर एड करवाए हैं। याद रखें कि ईवीएम कैलकुलेटर की तरह है न कि लोकल एरिया नेटवर्क या इंटरनेट से जुड़े कम्प्यूटर की तरह जिसे हैक किया जा सके।

पिछले 20 साल में मैंने किसी भी दल की विजय के बाद ईवीएम को उसका श्रेय नहीं दिया लेकिन मुझे अपने विद्वान मित्रों से शिकायत है कि वे ईवीएम का इस्तेमाल ट्रम्प कार्ड की तरह करते हैं। वो चुनाव से पहले कुछ भी दावा करते रहते हैं, सही निकले तो जय लोकतंत्र जय संविधान और हार गये तो ईवीएम ईवीएम करने लगते हैं। ये चीटिंग है।

यह तो वही मध्ययुगीन बात हो गयी कि युद्ध जीत गये तो बोले यह गॉड कृपा की वजह से हुआ है, और हार गये तो बोले कि गॉड हमको सबक देना चाहते थे! जिस तरह युद्ध में गॉड की कोई भूमिका नहीं होती, बल्कि वह रणनीतिक कुशलता, अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र, सैन्य बल की संख्या इत्यादि के आधार पर जीता जाता है, उसी तरह चुनाव में भी ईवीएम निमित्त मात्र है।

बैलट पेपर छीनकर मुहर मारना आसान है, बैलट बॉक्स में पानी भर देना उससे भी आसान है और महान सामाजिक न्यायवादी नेता ने इस कुकृत्य को कला के स्तर पर ले जाकर दिखाया था और आज भी जिन इलाकों में भारत जैसी ‘तानाशाही’ नहीं आयी है, वहाँ बैलेट से हुए चुनाव (जैसे हमारा पड़ोसी देश) का हाल पूरी दुनिया ने वायरल वीडियो के माध्यम से देखा। यह भी याद रखें कि दुनिया के किसी अन्य देश में करीब 100 करोड़ मतदाता नहीं हैं।

नेता हमेशा अपने और अपने पार्टी के हित के हिसाब से बोलते हैं। वे चुनाव नहीं जीतेंगे तो अच्छा या बुरा कुछ भी करने के लिए नहीं बचेंगे। इसलिए उनकी अतिरेकी बयानबाजियों की अनदेखी की जा सकती है लेकिन पत्रकार, अध्यापक, वकील इत्यादि बुद्धिजीवी ईवीएम विरोधी प्रोपगैंडा क्यों फैलाते रहते हैं!

हमारे देश के एकमात्र कट्टर ईमानदार वकील अपनी सनक को लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गये और उनकी शंकालु प्रवृत्ति को लेकर कुछ राहत दी गयी लेकिन उन्हें यह भी साफ कर दिया गया कि शक की दवा हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी, तो आप कृपया अदालत पर रहम करें।

दुनिया का हर तरह का धोखा भरोसे हासिल करने के बाद ही दिया जाता है। कुछ महान समाजसेवियों का यही हाल हो चुका है। वह किसी वाजिब मामल में अर्जित प्रतिष्ठा का इस्तेमाल अपनी अन्य तरह की सनक पूरी करने में लगाते हैं।

इस वर्ग ने ईवीएम को लेकर इतना दुष्प्रचार कर दिया है कि इस पोस्ट के नीचे भी कुछ लोग यह जरूर लिखेंगे कि तुम तो चाहते ही हो कि ईवीएम से चुनाव होता रहे! खैर, सामान्य मतदाताओं की ऐसी बातों का मैं बुरा नहीं मानता लेकिन जो लोग जिम्मेदार पेशों में हैं, उन्हें गैर-जिम्मेदार लोगों की तरह बात करने से बचना चाहिए।

ईवीएम से धांधली तभी हो सकती है, जब पोलिंग कराने वाली सरकारी टीम धांधली पर उतर आये। इंसान के चरित्र की गारंटी नहीं ली जा सकती, मशीन की ली जा सकती है। अच्छी बात यह है कि बाहरी धांधली रोकने के मामले में ईवीएम बैलट से बेहतर है। याद रखें कि मनुष्य जनित धांधली की कोई सीमा नहीं है। कल-परसों ही पश्चिमी यूपी के एक बूथ का वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक 15-16 की बच्ची किसी 50 साल की महिला के नाम पर वोट देने पहुंची थी। पोलिंग एजेंट के पूछने पर बच्ची ने कहा कि वह 12 में पढ़ती है!

ऐसा नहीं है कि कोई ईवीएम मशीन मैलफंक्शन नहीं करती या खराब नहीं होती। मुझे ऐसी कोई मशीन पता नहीं है, जो खराब नहीं होती। सबसे इलीट प्रोडक्ट बनाने वाले एप्पल जी के कुछ प्रोडक्ट का मेरा निजी अनुभव काफी खराब रहा है। भारत में इस समय अपवाद को सामान्य नियम बताने वालों की फौज खड़ी हो चुकी है। दो-चार मशीन खराब हैं तो सारी की सारी खराब हैं! एक व्यक्ति मर्द को किसी औरत ने पीट दिया तो भारत के सारे मर्द औरतों द्वारा पीटे जा रहे हैं!

औसतन 100 में 10 मशीन खराब निकले तो समझ में आता है कि यह चिन्ता की बात है कि 10 प्रतिशत मशीनें खराब निकल रही हैं, तो उनके प्रोडक्शन में सुधार की जरूरत है। मशीन का खराब निकलना प्रोडक्शन की समस्या है न कि टेक्नोलॉजी की। एप्पल का आईपैड या लैपटॉप इसलिए खराब नहीं निकलते कि उनकी टेक्निक में कोई समस्या है, बल्कि कुछ प्रोडक्ट का प्रोडक्शन मानकों के अनुरूप नहीं हो पाता।

यह भी याद रखें कि गॉड आलमाइटी के बनाए इंसान में इतनी खामियाँ हैं तो फिर उस इंसान की बनायी कोई चीज 100% परफेक्ट कैसे हो सकती है। ऐसे में सवाल ये है कि किसकी गुणवत्ता बेहतर है। मेरी राय में ईवीएम बेहतर है। सबकुछ सही रहा तो भारत ईवीएम निर्यातक देश बनेगा। कागज बचाकर पर्यावरण बचाना है या नहीं!

राधिका खेड़ा का अपमान और कांग्रेस की राम विरोधी राजनीति

1715057191464.jpg

आचार्य विष्णु हरि

राधिका खेडा कांग्रेस की कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं थी, वह तो कांग्रेस की शीर्ष नेता रही है, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की रणनीतिक टीम में शामिल थी, साथ ही साथ कांग्रेस की राष्टीय प्रवक्ता थी, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उसने अपने जीवन का कोई एक-दो साल नहीं बल्कि पूरे 22 साल कांग्रेस को दिया था

सनातन विरोध की परिधि में कांग्रेस के अंदर अपमानित होने वाली राधिका खेडा अकेली नहीं है, शाब्दिक छेड़खानी की शिकार होकर कांग्रेस से इस्तीफा देने वाली भी राधिका अकेली नहीं है। याद कीजिये प्रियंका दूबे को। राधिका की तरह प्रियंका दूबे भी कांग्रेस की राष्टीय प्रवक्ता थी। उत्तर प्रदेश के मथुरा में कांग्रेसियों ने प्रियंका दूबे के साथ शारीरिक छेड़खानी हुई थी, शिकायत के बावजूद भी छेडखानी करने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को सजा नहीं मिली। प्रियंका दूबे ने कांग्रेस छोडी थी। अभी प्रियंका दूबे शिवसेना की नेता हैं। आचार्य प्रमोद कृष्णन ने सनातन विरोधी राजनीति की बढती करतूत के विरोध में बयानबाजी कर कांग्रेस छोडी थी। इसी कडी में तत्कालीन कांग्रेस प्रवक्ता रोहन गुप्ता और अन्यों का नाम भी शामिल है।

राधिका खेडा कांग्रेस की कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं थी, वह तो कांग्रेस की शीर्ष नेता रही है, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की रणनीतिक टीम में शामिल थी, साथ ही साथ कांग्रेस की राष्टीय प्रवक्ता थी, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उसने अपने जीवन का कोई एक-दो साल नहीं बल्कि पूरे 22 साल कांग्रेस को दिया था, यानी की अपने जीवन की एक चैथाई हिस्सा कांग्रेस के लिए बलिदान कर दिया था। इतने बडे, समर्पित और अनुभवी नेता के साथ धर्म पर आधारित अपमान और पीडा के साथ ही साथ लगातार फब्तियां और शाब्दिक छेड़खानियों का शिकार बना कर रखना बहुत ही पीडा दायक, निंदनीय और अमानवीय है। कई प्रश्न खडे हो जाते हैं। सबसे बडा प्रश्न धार्मिक आजादी का है। किसी महिला या अन्य लैंगिक व्यक्ति की धार्मिक आजादी कोई पार्टी तय नहीं कर सकती है, धार्मिक आजादी को कोई पार्टी अपनी नीति और कार्यक्रम की परिधि में कैद नहीं कर सकती है। फिर राधिका खेडा की धार्मिक आजादी को कैद करने का अधिकार कांग्रेस के नेताओं को कैसे हो सकता है? राधिका खेडा ही क्यों बल्कि हर संवेदनशील व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार किसी धर्म को मान सकता है, उस धर्म के प्रतीकों के प्रति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्मान दर्शा सकता है। यही काम राधिका खेडा ने किया था। पर कांग्र्रेस के भगवान राम विरोधी और सनातन विरोधी नेताओं को यह स्वीकार नहीं हुआ और वे राधिका खेडा का मजाक उड़ाते रहे और पार्टी कार्यालयों से गेट आउट कह कर भगाया जाने लगा। यह प्रक्रिया लगातार जारी रही। आखिर धीरज का बांध तो टूटना ही था। जब राधिका खेडा के धीरज का बांध टूटा तब कांग्रेस न केवल बेपर्द हो गयी बल्कि यह भी प्रमाणित हो गया कि कांग्रेस अभी भी नहीं चैती है और उसकी घृणा वैसी ही जारी है जैसी कि यूपीए वन और यूपीए टू के दौर में हुआ करती थी। पर ऐसी घटनाओं को लेकर कांग्रेस पार्टी के अंदर न्याय की उम्मीद थी। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की चुप्पी तक नहीं टूटी है। लडकी हूं, लड सकती हूं, कहने वाली प्रियंका गांधी की भी खामोशी बहुत कुछ कहती है।

अब हम यहां विचार करते हैं कि राधिका खेडा का अपराध क्या था? उसका अपराध सिर्फ इतना भर ही था कि उसनें भगवान राम के प्रति आस्था दिखायी थी, सम्मान दिखाया था और दर्शन की थी। राधिका भगवान राम के दर्शन के लिए अयोध्या गयी थी। भगवान राम के दर्शन के बाद राधिका ने गर्व की अनुभूति की थी और कहा था कि दर्शन मात्र से उनकी जिंदगी धन्य हो गयी है, मानवीय संवेदनाएं उनके अंदर समृद्ध हुई हैं, क्योंकि भगवान राम मानवीय संवेदना के प्रतीक है, अनुकरणीय है। भगवान राम के प्रति राधिका की यह अनुभूति सोशल मीडिया पर खूब चर्चित हुई थी और सनातन विरोधियों ने इसकी खूब आलोचना की थी। खासकर जिहादियों ने सोशल मीडिया पर राधिका के प्रति खूब शाब्दिक अपमान किये थे और उन्हें दंगाई की पदवि भी दिया गया था। इतना ही नहीं बल्कि राधिका को मुस्लिम विरोधी भी साबित करने की कोशिश की गयी थी। लेकिन राधिका ने स्वयं को सिर्फ भगवान राम के दर्शन की परिधि में ही रखा था। राधिका का एक भी ऐसा बयान नहीं है, राधिका का एक भी ऐसा काम नहीं है, राधिका की एक भी ऐसी सक्रियता नहीं है जिससे यह लगे कि वह मुस्लिम विरोधी हैं या फिर दंगाई है। कांग्रेस में रहते हुए राधिका ने हमेशा कांग्रेस की कथित धर्मनिरपेक्षता का पालन किया था और भाजपा की तथ्यपरख आलोचना करने से भी कभी भी पीछे नहीं रही थी। सबसे बडी बात यह भी है कि कांग्रेस ने ऐसी कोई लक्ष्मण रेखा भी नहीं खींची थी कि राधिका खेडी जैसी कोई कांग्रेसी हस्तियां अयोध्या में भगवान राम का दर्शन करने न जायें?

वास्तव में कांग्रेस की हिडेन एजेंडा दोषी है। कांग्रेस का हिडेन एजेंडा क्या है? कांग्रेस का हिडेन एजेंडा हिन्दुत्व विरोध है, भगवान राम के प्रति अपमान और घृणा प्रदर्शित करना है। विश्व हिन्दू परिषद ने कांग्रेस के इतिहास को देखते हुए भी भगवान राम की मूर्ति स्थापना के समय कांग्रेस को आमंत्रित किया था, सोनिया गांधी और राहुल गांधी, प्रियंका गांधी ही नहीं बल्कि कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे को भी आमंत्रण भेजा था। लेकिन कांग्रेस ने राममंदिर मूर्ति स्थापना समारोह में जाने से इनकार कर दिया था। एक तरह से कांग्रेस का यह बहिष्कार ही था। कांग्रेस का कहना था कि इसका श्रेय नरेन्द्र मोदी और संघ के लोग क्यों ले रहे हैं, संघ और मोदी ने भगवान राम का चुनावी हथकंडा बना दिया। कांग्रेस की यह अवधारणा काफी झृणित थी और भगवान राम के प्रति अनादर भी था। संघ और मोदी को श्रेय तो जाता ही है। मोदी और संघ का राममंदिर आंदोलन कौन नहीं जानता है? कांग्रेस तो राममंदिर के विरोध में खडी थी। राममंदिर पर फैसला नहीं आये इसके लिए कांग्रेस ने कपिल सिब्बल सहित दर्जनों वकीलों को अप्रत्यक्ष तौर खडी कर रखी थी। कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद श्रीराम मंदिर की मूर्ति स्थापना शानदार और जींवत रूप से साकार हुआ, भगवान राम की मूर्ति स्थापना की परिधि में भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का डंका पूरे विश्व में बजा। दुनिया से करोडों लोग भगवान राम के दर्शन के लिए अयोध्या पहुंच रहे हैं। राधिका खेडा भी इसी परिधि में भगवान राम के दर्शन के लिए अयोध्या गयी थी।

राधिका के अपमान में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व दोषी है क्या? यह कहना मुश्किल है कि राधिका के अपमान में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व दोषी है। सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, राहुल गांधी या फिर मल्लिकार्जुन खडगे की कोई प्रत्यक्ष भूमिका शायद न हों। पर इस बात को हम इनकार नहीं कर सकते हैं कि केन्दी्रय नेतृत्व की उदासीनता और अप्रत्यक्ष समर्थन के बिना कांग्रेस के नेता इतने घृणित कार्य कैसे कर सकते हैं, इतने अमानवीय कार्य कैसे कर सकते हैं, एक संवेदनशील महिला को इस तरह से लगातार कैसे अपमानित कर सकते हैं? कांग्रेस के अंदर में सनातन विरोधी धाराएं बहती ही रहती है, कांग्रेस के उपर अभी कांग्रेस विरोधी शक्तियों का कब्जा हो गया है। ये शक्तियां मजहबी हैं और वामपंथी हैं। मजहबी और वामपंथी शक्तियां कांग्रेस की जडों में मठ्ठा डाल रही हैं, कांग्रेस को बेमौत मरने के लिए गढ्ढे खोद रही है। यही कारण है कि सनातन के पक्ष में बोलने से रोका जाता है, सनातन का पक्ष लेने पर दंगाई कह कर अपमानित किया जाता है। कभी कांग्रेस के लिए फायर ब्राॅड और हाई ब्रिड धार्मिक नेता आचार्य प्रमोद कृष्णन ने साफतौर पर कहा था कि कांग्रेस पर मुस्लिम समर्थकों और कम्युनिस्टों का कब्जा हो गया है ये कांग्रेस को सनातन से दूर ले जा रहे हैं। उन्हें भी कांग्रेस से बाहर जाने के लिए बाध्य किया गया। रोहन गुप्ता को भी इतना प्रताडित किया गया वह लोकसभा चुनाव का टिकट मिलने के बाद भी चुनाव लडने से इनकार कर दिया और साफतौर पर बयान दिया कि वे सनातन विरोधी राजनीति के लिए कांग्रेस का हथकंडा नहीं बन सकते है। किसी भी परिस्थिति में राधिका को अपमान का शिकार बनाने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और नेताओं को संरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए, ऐसे वर्ग के घृणित नेताओं को कांग्रेस अगर बाहर करती तो अच्छा था।

scroll to top