वित्त वर्ष 2023-24 में स्थापित भारत की बिजली उत्पादन क्षमता में अक्षय ऊर्जा का योगदान 71 प्रतिशत रहा: सीईईडब्ल्यू-सीईएफ

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एमएस डेस्क

– भारत की कुल स्थापित क्षमता में कोयले/लिग्नाइट की हिस्सेदारी पहली बार 50 प्रतिशत के नीचे आई

– वित्त वर्ष 2023-24 में एमएनआरई का लगभग 95 प्रतिशत वार्षिक बिडिंग ट्रेजेक्टरी टारगेट पूरा हुआ

– लगातार दूसरे वर्ष गैर-पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्र में 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा की एफडीआई आई

नई दिल्ली, वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान भारत में स्थापित लगभग 26 गीगावॉट बिजली उत्पादन क्षमता में अक्षय ऊर्जा (आरई) स्रोतों का योगदान 71 प्रतिशत रहा। यह जानकारी सीईईडब्ल्यू सेंटर फॉर एनर्जी फाइनेंस (सीईईडब्ल्यू-सीईएफ) की आज जारी हुई मार्केट हैंडबुक में दी गई है। अब देश की कुल स्थापित ऊर्जा क्षमता 442 गीगावॉट तक पहुंच गई है, जिसमें अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 144 गीगावॉट (33 प्रतिशत) और हाइड्रो पॉवर की हिस्सेदारी लगभग 47 गीगावॉट (11 प्रतिशत) रही। इसके कारण वित्त वर्ष 2023-24 में भारत की कुल स्थापित क्षमता में कोयला/लिग्नाइट की हिस्सेदारी पहली बार 50 प्रतिशत से नीचे आ गई।

सीईईडब्ल्यू-सीईएफ मार्केट हैंडबुक के अनुसार, भारत की अक्षय ऊर्जा क्षमता में हुई वृद्धि में सोलर-ग्रिड-स्केल और रूफटॉप का हिस्सा लगातार सबसे ज्यादा रहा। इनसे वित्त वर्ष 2023-24 में लगभग 15 गीगावॉट क्षमता बढ़ी, जो कुल जोड़ी गई अक्षय ऊर्जा क्षमता का 81 प्रतिशत है। इसी समयावधि में पवन ऊर्जा क्षमता में वृद्धि लगभग दोगुनी होकर 3.3 गीगावॉट पहुंच गई, जो वित्त वर्ष 2022-23 में 2.3 गीगावॉट थी। उल्लेखनीय है कि वित्त वर्ष 2016-17 के बाद पहली बार वित्त वर्ष 2023-24 में परमाणु क्षमता (1.4 गीगावॉट) में बढ़ोतरी हुई है।

सीईईडब्ल्यू-सीईएफ मार्केट हैंडबुक में पाया गया है कि भारत के महत्वाकांक्षी अक्षय ऊर्जा लक्ष्यों के अनुरूप, वित्त वर्ष 2023-24 में लगभग 41 गीगावॉट नीलामी क्षमता के साथ अक्षय ऊर्जा नीलामी एक रिकॉर्ड पर पहुंच गई। इसके अलावा, इसी वित्तीय वर्ष में ऊर्जा भंडारण घटकों (energy storage components) की आठ नीलामियां पूरी हुईं, जो बिजली खरीद के नए प्रारूपों की दिशा में बदलाव का संकेत देती है।

गगन सिद्धू, डायरेक्टर, सीईईडब्ल्यू-सीईएफ, ने कहा, “सीईईडब्ल्यू-सीईएफ मार्केट हैंडबुक में पाया गया कि वित्त वर्ष 2023-24 में भारत के लक्षित 50 गीगावॉट वार्षिक बिडिंग ट्रेजेक्टरी टारगेट का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा पूरा हो गया था। वित्त वर्ष 2023-24 में 47.5 गीगावॉट की बोलियां जारी हुई, जो हालिया वर्षों में स्थापित वार्षिक आरई क्षमता से लगभग तीन गुना ज्यादा है। इसके अलावा, विशुद्ध अक्षय ऊर्जा की खरीद की जगह पर नए प्रारूपों की दिशा में झुकाव स्पष्ट है। नए प्रारूपों, जैसे विंड-सोलर हाइब्रिड, फर्म एंड डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी (एफडीआरई) और आरई-प्लस-स्टोरेज की नीलाम हुई क्षमता में हिस्सेदारी 37 प्रतिशत रही। हम यह हिस्सेदारी आगे और बढ़ने की उम्मीद कर सकते हैं, क्योंकि जारी हुई बोलियों में नए किस्म के प्रारूपों की हिस्सेदारी 57 प्रतिशत थी। बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बीईएसएस) टैरिफ में आई तेज गिरावट इस बारे में एक अच्छा संकेत देती है। वित्त वर्ष 2023-24 में बीईएसएस टैरिफ में लगभग 59 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, जो प्रति दिन 2 घंटे स्टोरेज देता है (अगस्त 2022 की तुलना में)। अक्षय ऊर्जा के मामले में अब भारत की प्रमुख चुनौती वित्तपोषण का आकार है। विशेष रूप से, कैसे जारी हुई 47.5 गीगावॉट की बोलियों के वित्तपोषण के लिए इसे तीन गुना तक बढ़ाया जा सकता है? इस आकार का वित्त पोषण पाने के लिए कॉरपोरेट ग्रीन बांड को जारी करने के लिए घरेलू बांड बाजार को खोलना एक प्रभावी कदम हो सकता है।”

सीईईडब्ल्यू-सीईएफ रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि वित्त वर्ष 2023-24 में भी पीक पॉवर डिमांड (जिसे पूरा किया गया) में बढ़ोतरी जारी रही और यह 240 गीगावॉट की नई ऊंचाई पर पहुंच गई। ऐसा तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और अगस्त 2023 से अक्टूबर 2023 के उम्मीद से कम बारिश का होना, नवंबर 2023 में सामान्य से अधिक तापमान और उत्तर भारत में सर्दियों के महीनों में भीषण ठंड वाले दिन जैसे कारकों से हुआ था। बिजली की मांग के मामले में, वित्त वर्ष 2023-24 में वित्त वर्ष 2022-23 की तुलना में लगभग 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

रिद्धि मुखर्जी, रिसर्च एनालिस्ट, सीईईडब्ल्यू-सीईएफ, ने कहा, “भारत में बिजली की लगातार बढ़तीजरूरत को पूरा करने के लिए, बिजली मंत्रालय ने इलेक्ट्रिसिटी (लेट पेमेंट सरचार्ज एंड रिलेटेड मैटर्स) रूल्स-2022 में बदलाव किया था, जो बिना मांग वाली अतिरिक्त बिजली (un-requisitioned surplus power) की पॉवर एक्सचेंज में बिक्री को अनिवार्य बनाता है। इस कदम से आपूर्ति पक्ष के स्तर पर अधिक तरलता (liquidity) मिलने और पॉवर एक्सचेंजों में बिजली की ज्यादा प्रतिस्पर्धी दरें मिलने की उम्मीद है। अक्षय ऊर्जा के बारे में बात करें तो वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान यूटिलिटी-स्केल अक्षय ऊर्जा से आगे बढ़ने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए गए। उदाहरण के तौर पर, आवासीय क्षेत्र में रूपटॉप सोलर को बढ़ावा देने के लिए पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना को शुरू किया गया,जो लगभग 30 गीगावॉट अतिरिक्त क्षमता जोड़ सकती है।”

सीईईडब्ल्यू-सीईएफ मार्केट हैंडबुक के अनुसार, हरित वित्तपोषण (green financing) के क्षेत्र में, गैर-पारंपरिक ऊर्जा के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) लगातार दूसरे वर्ष 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा रहा। साथ ही, भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी 20,000 करोड़ रुपये (वित्त वर्ष 2022-23 में 16,000 करोड़ रुपये की तुलना में) के सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स की नीलामी पूरी की, जिन्हें उपयुक्त ग्रीन प्रोजेक्ट्स के वित्तपोषण/पुनर्वित्तपोषण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

आम चुनाव 2024 और बस्तर (आलेख – 2)

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राजीव रंजन प्रसाद
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राजतन्त्र और लोकतंत्र के बीच की रस्साकशी थी। क्या वे लोग जिन्हे लोकतंत्र का ध्वज थामना था वे भी अंग्रेजों की भांति की व्यवहार कर रहे थे? निस्संदेह बस्तर के राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की लोकप्रियता थी लेकिन राजाओं का समय तो चुक गया था। उस समय देश भर के अनेक राजा महाराजा देश के पहले आम चुनाव में अपना भाग्य आजमा रहे थे, तो ऐसा क्यों था कि तत्कालीन मध्यप्रदेश के कॉंग्रेस की स्थानीय इकाई राजा से इस तरह व्यवहार कर रही थी मानो अब भी सिंहासन उनका ही है और सिक्का उनका ही चल रहा है? बदलती हुई व्यवस्था में अधिक संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है अन्यथा परिणाम बहुत घातक होते हैं। हम नेपाल का उदाहरण यहाँ ले सकते है; ऐसा क्यों है कि दशक भर ही बीता है लेकिन एक बड़ी जनसंख्या अब वहाँ राजतन्त्र की वापसी की मांग को ले कर सड़कों पर है? इसका सीधा सा कारण है वहाँ जिस तरह व्यवस्था परिवर्तन हुआ उसमें आंचलिकता को, सामाजिक परिवेश को और लोकमान्यताओं को ध्यान में रखा ही नहीं गया था, परिणाम सामने है। क्या बस्तर में भी इसी तरह से राजनैतिक-प्रशासनिक बदलाव हुआ था?

महाराजा प्रवीरचंद्र भँजदेव ने अपनी पुस्तक ‘लौहड़ीगुड़ातरंगिणी’ में विस्तार से उस समय की राजनैतिक स्थिति का वर्णन किया है जिसमें उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए हैं। यही नहीं तत्कालीन मुख्यमंत्री से अपने मतभेद को स्पष्ट करते हुए वे लिखते है “मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल किसी कर्मचारी या कॉंग्रेस के आदमी की मुंह जबानी बात पर विश्वास करते थे”। वर्ष 1947 तक बस्तर एक रियासत थी, इसकी अपनी भौगोलिक, सांस्कृतक और समाजशास्त्रीय विशेषतायें थी, ऐसे में राज्य निर्माण की खींचातानी में एक ओर ओड़ीशा, दूसरी ओर आंध्र और तीसरी और मराठा भूभाग बस्तर के अलग अलग परिक्षेत्रों को अपना हिस्सा चाहते थे। विविध दावेदारियों के साथ बस्तर के विभाजन की चर्चा भी जोरों पर थी। यह संभव है कि संयुक्त प्रयासों से बस्तर का विभाजन ताल दिया गया जिसका श्रेय सुंदरलाल त्रिपाठी ने लिया जबकि महाराज इसे अपना प्रयास मानते थे। ऐसी खीचातानी बस्तर में राजनैतिक ताकत के दो केंद्र बनाती जा रही थी, जिसमें जोर आजमाईश का सही समय पहला राष्ट्रीय चुनाव था।

महाराजा प्रवीर अपनी पुस्तक ‘लौहड़ीगुड़ातरंगिणी’ में लिखते हैं “जगदलपुर की जनता मेरे पास आई, वे चाहते थे कि एक स्वतंत्र प्रतिनिधि मेरी ओर से खड़ा कर दिया जाये”। इसी पुस्तक में प्रवीर यह भी लिखते है कि वे राजनीति नहीं करना चाहते थे। उन्होंने स्थानीय कॉन्ग्रेसी नेताओं से क्षुब्ध हो कर राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना आरंभ किया। अपने विरोध में लगातार चल रहे दुष्प्रचार से क्षुब्ध महाराजा प्रवीर अब राजनीति में अपने प्रभाव का आकलन कर लेना चाहते थे, यही कारण है कि उन्होंने कॉन्ग्रेस के विरुद्ध वोट की लड़ाई लड़ने का मन बना लिया। अब तलाश थी एक ऐसे उम्मीदवार की जिसे कॉन्ग्रेस के प्रत्याशी सुरती क्रीस्टैय्या के विरुद्ध खड़ा किया जा सके। यहीं से बस्तर के पहले सांसद मुचाकी कोसा की कहानी आरंभ होती है। मुचाकी कोसा वर्तमान सुकमा जिले के ग्राम इड़जेपाल के रहने वाले थे। वे बस्तर राजपरिवार के दरबारियों में सम्मिलित थे।

बस्तर के बड़े बुजुर्ग और विद्वान एक रोचक वृतांत बताते हैं। महाराजा के निर्देश पर राजगुरु एक ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जिसे लोकसभा के चुनाव में उम्मेदवार बनाया जा सके। उन्होंने देखा कि आदिवासियों का एक झुंड दलपत सागर में स्नान करने के उद्देश्य से जा रहा है। भीड़ मे मुचाकी कोसा तगड़ा, कदकाठी में प्रभावशाली दिखाई दिया, बस यही चयन का आधार बना और उसे बुलवाया गया। मुचाकी कोसा न तो चुनाव क्या है, यह जानते थे, न ही वे चुनाव लड़ना चाहते थे। महाराजा के आगे उनकी एक न चली और वे अब देश के पहले लोकसभा चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस के प्रत्याशी सुरती क्रीस्टैय्या के विरुद्ध उम्मेदवार थे। महाराजा समर्थित प्रत्याशी ने ऐसा इतिहास रचा जिसे आज भी बस्तर में तोड़ा नहीं जा सका है। आम चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार मुचाकी कोसा को 83.05 प्रतिशत (कुल 1,77,588 मत) वोट प्राप्त हुए जबकि कॉंग्रेस के प्रत्याशी सुरती क्रिसटैय्या को मात्र 16.95 प्रतिशत (कुल 36,257 मत) वोटों से संतोष करना पड़ा था। क्या इस जीत ने भारतीय राजनीति को आईना दिखाया था? विचारणीय प्रश्न है।

हिंदुत्व के स्टार प्रचारक बने -योगी आदित्यनाथ

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लोकसभा चुनाव के दो चरण का मतदान पूरा हो चुका है और उनकी रिपोर्ट के आधार पर सभी राजनैतिक दलों ने अगले चरण के मतदान के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी है। वर्तमान राजनैतिक परिदृष्य में सभी दलों के स्टार प्रचारक अपनी विचारधारा के प्रचार में जुटे हैं। 2024 लोकसभा चुनावों में सबसे अधिक स्टार प्रचारक भारतीय जनता पार्टी के पास हैं जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं, “अबकी बार 400 पार के नारे” के साथ संपूर्ण भारत में आक्रामक प्रचार में जुटे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बाद जो स्टार प्रचारक सबसे अधिक चर्चा में है वह हैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ न केवल उत्तर प्रदेश में ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे हैं अपितु दूसरे राज्यों में भी उसी तरह प्रचार कर रहे हैं। अब तक 24 दिनों में वो सात राज्यो में 25 रैलियां व दो रोड शो कर चुके हैं । योगी जी की मांग सबसे अधिक उन सीटों व क्षेत्रों में है जहां राजपूत व क्षत्रिय मतदाता अधिक हैं तथा जहां ध्रुवीकरण की संभावना अधिक है वह उन स्थानों पर भी रैलियां कर रहे हे जो हिंसा से प्रभावित रहे हैं। दूसरे राज्यों में योगी जी की लोकप्रियता बुलडोजर बाबा के रूप में भी हो रही है।

योगी जी अब तक पश्चिम बंगाल, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ जम्मू -कश्मीर और बिहार में रैलियां कर चुके हैं। बंगाल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चार रैलियां की हैं जो मुस्लिम बहुल और हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में हुई है। योगी जी ने आसनसोल ल में भी रैली की जहां भाजपा दो बार जीत चुकी है। बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां के कटटरपंथी मौलाना मुख्मयंत्री योगी जी को देख लेने की धमकी तक दे चुके हैं किंतु वह बंगाल जाकर और अधिक आक्रामक होकर हिंदुत्व का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। वह अपनी जनसभा में बंगाल में रामनवमी पर हुई हिंसा की याद दिलाते हुए कहते है कि “अगर कोई यूपी में रामनवमी के अवसर पर दंगा करता है तो उसे उल्टा लटकाकर ठीक कर दिया जाता है”। उन्होंने बंगाल में योगी जी ने साफ सन्देश दिया कि मोदी जी की तीसरी बार सरकार आने पर रामनवमी और वैषाखी के दंगाईयों और सन्देशखाली के जिम्मेदार गुंडो को सजा दिलाने का काम करेंगे।

छत्तीसगढ़ में योगी जी ने तीन रैलियां की हैं जिसमें दो सीटें कांग्रेस व एक भाजपा की रही है। नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र में योगी जी का 21 बुलडोजर से बेहद भव्य स्वागत किया गया था जो बहुत चर्चित रहा था। यहां पर उन्होंने लव जिहाद व नक्सलवाद के साथ कांग्रेस के आंतरिक समझौते का मुद्दा मुखरता के साथ उठाया।

मुख्यमंत्री योगी ने उत्तराखंड की 5 लोकसभा सीटों के लिए 4 रैलियां की और उसमें उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश हो या उत्तराखंड या देश को कोई भी कोना जो कानून नहीं मानेगा उसका राम नाम सत्य ही होगा। कुछ लोगों को लगता था कि अपराध करेंगे तो जेल चले जाएंगे लेकिन जेल जाने से पहले ही हम जहन्नुम में पहुंचा देते हैं। राजस्थान में भी उन्होंने चार रैलियां व 2 रोड शो किये जिनमें भारी भीड़ आयी । राजस्थान में उन्होंने देश की सुरक्षा का मुददा जोर शोर से उठाया और कहा कि कांग्रेस देश की सुरक्षा व आस्था के साथ खिलवाड़ कर रही है। योगी का कहना है कि आज देश में कहीं पर पटाखा भी फटता है तो सबसे पहले पाकिस्तान सफाई देता है कि हमारा उसमें कोई हाथ नहीं है क्योंकि उसे पता है कि उसका क्या परिणाम होगा क्योकि यह बदला हुआ भारत है। राजस्थान में योगी ने राजपूत ,जाट व मीणा समाज के बाहुल्य क्षेत्रों तथा जहां पर हिंदू -मुस्लिम ध्रुवीकरण भी आसानी से हो जाता है वहां पर रैलियां कर समां बांधा है। इसी प्रकार महाराष्ट्र में भी वह 6 रैलियां कर चुके हैं। अभी तक बिहार में केवल दो रैलियां ही हो पाई है किंतु वहां पर अभी उनकी और रैलियां प्रस्तावित हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 400 पार के नारे के साथ अबकी बार यूपी में 80 की 80 सीटों पर कमल खिलाने के संकल्पवान हैं और वह इसके लिए काफी कड़ी महनत भी कर रहे हैं अब उस मेहनत का उन्हें कितना प्रतिफल मिलता है यह तो 4 जून 2024 की मतगणना के दिन ही तय हो सकेगा। यूपी में भी योगी 75 से अधिक रैलियां व रोड षो कर चुके है।

उत्तर प्रदेश की रैलियों में योगी जी आक्रामकता के साथ सपा , बसपा व कांग्रेस पर हमलावर हो रहे है। वह कांग्रेस को उसके घोषणापत्र के छिपे हुए हिंदू विरोधी एजेंडे के आधार पर बेनकाब कर रहे हैं। योगी जी स्पष्ट रूप से हमला करते हुए कह रहे हैं कि अगर कांग्रेस व इंडी गठबंधन के लोग सत्ता में वापस आये तो यह लोग देश में शरिया लागू कर देंगे और हमारे गोवंश को कसाईयो के हाथों में दे देंगे। योगी जी अपनी हर जनसभा में जनता को याद दिला रहे हैं कि कांग्रेस के कारण ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण लटका रहा। कांग्रेस ने ही भगवान राम को कोर्ट में काल्पनिक बताया था। संपत्ति के विभाजन, मंगल सूत्र और विरासत टैक्स का मुद्दा भी वे अपनी रैलियों में उठा रहे हैं। योगी जी बेटियों की सुरक्षा व कानून व्यवस्था पर कोई समझौता नहीं करने वाले हैं और वह बार -बार कहते हैं कि अगर कोई बहिन- बेटियो की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करेगा तो उसका राम नाम सत्य ही होगा। योगी जी कह रहे हैं कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम का काम हो गया अब मथुरा की गलियां भी श्रीकृष्ण की बांसुरी सुनने के लिए बैचेन हो रही हैं । अब वह काम भी जल्द ही पूरा हो जाएगा। योगी जी का कहना है कि कांग्रेस पहले तो केवल दिशाहीन थी किंतु अब तो नेतृत्वविहीन भी हो चुकी है। योगी जी कहते हैं कि कांग्रेस को वोट देने से कोई बड़ा पाप नहीं हो सकता।

दूसरे राज्यों में जाने पर योगी जी का भव्य स्वागत किया जाता है । इसमें कोई दो राय नही कि उत्तर प्रदेश में अयोध्या में दिव्य, भव्य एवं नव्य राम मंदिर बन जाने के बाद उनकी लोकपियता में भारी वृद्धि हुई है तथा उत्तर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन का व्यापक विस्तार व विकास हो रहा है। अभी लखनऊ में आयोजित आईपीएल टूर्नामेट के मुकाबले के लिए पधारे क्रिकेट खिलाड़ी पीटरसन से लखनऊ एयरपोर्ट की तारीफ करते हुए योगी जी की प्रशंसा की और उसे सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा कि उत्तर प्रदेश में अविश्वसनीय विकास व अच्छा काम हो रहा है। योगी जी के नेतृत्व में कानून का राज है, अपराधियों का मनोबल गिरा हुआ है और विकास के लिए निवेश का मार्ग प्रशस्त हो रहा है।

भगवा वस्त्र, वाणी में ओज, ह्रदय में सनातन, आचरण में संत योगी जी इस चुनाव में हिंदुत्व का प्रमुख स्वर हैं ।

अक्षय तृतीया से पूर्व बाल विवाह के खिलाफ राजस्थान हाई कोर्ट का अहम फैसला

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एमएस डेस्क

बाल विवाहों की रोकथाम में नाकामी पर पंच व सरपंच होंगे जवाबदेह
*सभी बाल विवाह निषेध अफसरों से उनके अधिकार क्षेत्र में हुए बाल विवाहों और इनकी रोकथाम के कदमों के बाबत मांगी रिपोर्ट
*मामले की की गंभीरता और तात्कालिकता का संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस की जनहित याचिका पर फौरी सुनवाई करते हुए जारी किया आदेश

जयपुर। प्रदेश में बाल विवाह की मौजूदा स्थिति को ‘चिंताजनक’ बताते हुए राजस्थान हाई कोर्ट ने तत्काल सुनवाई के बाद अंतरिम आदेश जारी कर राज्य सरकार से कहा है कि वह अक्षय तृतीया के मद्देनजर यह सुनिश्चित करे कि कहीं भी बाल विवाह नहीं होने पाए। साथ ही, आदेश में कहा गया है कि बाल विवाह को रोकने में विफलता पर पंचों-सरपंचों को जवाबदेह ठहराया जाएगा। हाई कोर्ट का यह फौरी आदेश ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस’ की जनहित याचिका पर आया है। इन संगठनों ने अपनी याचिका में इस वर्ष 10 मई को अक्षय तृतीया के मौके पर बड़े पैमाने पर होने वाले बाल विवाहों को रोकने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की थी।

न्यायमूर्ति शुभा मेहता और पंकज भंडारी की खंडपीठ ने याचियों द्वारा बंद लिफाफे में सौंपी गई अक्षय तृतीया के मौके पर होने वाले 54 बाल विवाहों की सूची पर गौर करने के बाद राज्य सरकार को इन विवाहों पर रोक लगाने के लिए ‘बेहद कड़ी नजर’ रखने को कहा है। यद्यपि इस सूची में शामिल नामों में कुछ विवाह पहले ही संपन्न हो चुके हैं लेकिन 46 विवाह अभी होने बाकी हैं।

खंडपीठ ने कहा, “सभी बाल विवाह निषेध अफसरों से इस बात की रिपोर्ट मंगाई जानी चाहिए कि उनके अधिकार क्षेत्र में कितने बाल विवाह हुए और इनकी रोकथाम के लिए क्या प्रयास किए गए।” आदेश में यह भी कहा गया कि राज्य सरकार सुनिश्चित करे कि सूची में शामिल जिन 46 बच्चों के विवाह होने हैं, वे नहीं होने पाएं।”

खंडपीठ ने यद्यपि इस बात का संज्ञान लिया कि राज्य सरकार के प्रयासों से बाल विवाहों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है, फिर भी काफी कुछ किया जाना बाकी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (2019-21) के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में 20-24 आयु वर्ग की 25.4 प्रतिशत लड़कियों का विवाह उनके 18 साल की होने से पहले ही हो गया था जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 23.3 प्रतिशत है।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा, “बाल विवाह वह घृणित अपराध है जो सर्वत्र व्याप्त है और जिसकी हमारे समाज में स्वीकार्यता है। बाल विवाह के मामलों की जानकारी देने के लिए पंचों व सरपंचों की जवाबदेही तय करने का राजस्थान हाई कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है। पंच व सरपंच जब बाल विवाह के दुष्परिणामों के बारे में जागरूक होंगे तो इस अपराध के खिलाफ अभियान में उनकी भागीदारी और कार्रवाइयां बच्चों की सुरक्षा के लिए लोगों के नजरिए और बर्ताव में बदलाव का वाहक बनेंगी। बाल विवाह के खात्मे के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम पूरी दुनिया के लिए एक सबक हैं और राजस्थान हाई कोर्ट का यह फैसला इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है।”

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस पांच गैरसरकारी संगठनों का एक गठबंधन है जिसके साथ 120 से भी ज्यादा गैरसरकारी संगठन सहयोगी के तौर पर जुड़े हुए हैं जो पूरे देश में बाल विवाह, बाल यौन शोषण और बाल दुर्व्यापार जैसे बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे हैं।
हाई कोर्ट का यह आदेश ऐसे समय आया है जब अक्षय तृतीया के मौके पर बाल विवाह के मामलों में खासी बढ़ोतरी देखने को मिलती है और जिसे रोकने के लिए सरकार के साथ जमीनी स्तर पर काम कर रहे तमाम गैरसरकारी संगठन हरसंभव प्रयास कर रहे हैं।

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