कांग्रेस के वफादार पत्रकारों को, पब्लिक खूब पहचानती है

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कांग्रेस गठबंधन ने पहले न्यूज चैनल के 14 एंकरों का बहिष्कार किया। उनकी तस्वीर जारी की और उनकी जितनी बदनाम कर सकते थे, उन्होंने की। उन 14 में से सुधीर चौधरी और सुशांत सिन्हा जैसे एंकर भी थे, जिनके शो में गेस्ट बुलाए ही नहीं जाते।

अब कांग्रेस गठबंधन के प्रवक्ता आने लगे। प्रतिबंध खत्म हुआ लेकिन उनकी भाषा और अहंकार सातवें आसमान पर होता है। सुप्रिया श्रीनेत से लेकर रागिनी नायक तक तमाम प्रवक्ता सवाल कुछ पूछा जाएगा। जवाब कुछ और देंगे। कांग्रेस से कोई सवाल पूछना चाहेगा। कांग्रेस का ही इतिहास पार्टी के प्रवक्ताओं को कोई याद दिलाएगा तो वे बोलने नहीं देंगे।

आज दूरदर्शन पर देखा मैने, कांग्रेस का प्रवक्ता लगातार चिल्लाए जा रहा था। वह कोशिश कर रहा था कि शो का एंकर उसे बीच शो से बाहर निकाल दे लेकिन वह सफल नहीं हुआ। बाहर निकाल दिया जाता तो कांग्रेस इसी बात पर तमाशा करती। दूरदर्शन से जुड़ी कुछ पत्रकारों को वैसे भी खबर चाहिए होती है। वहां कुछ नहीं मिलता तो वे ‘कुछ भी’ छाप देते हैंं।

कांग्रेस गंठबंधन दर्जनों यू ट्यूबर को गोदी में बिठाकर दूसरों को दिन भर गोदी मीडिया कहलवाती हैं। दूसरी तरफ यही कांग्रेसी जिन्हें गोदी मीडिया कहते हैं, उनके चैनलों पर जाकर अपने झूठे अहंकार का प्रदर्शन भी करते हैं।

दिलचस्प है कि जिन्हें गठबंधन वाले गोदी मीडिया कहते हैं, उनके मंच पर जाकर अपना पक्ष रखकर भी आते हैं लेकिन गठबंधन ने जिन यू ट्यूबरों को अपनी गोदी में बिठा रखा है। उन्हें पत्रकारिता का सामान्य शिष्टाचार भी नहीं सिखाया कि सुबह शाम कांग्रेस गठबंधन की आरती ना किया करो। पत्रकारिता करने का ढोंग भी कर रहे हो तो दूसरे पक्ष को भी अपने यहां स्थान दो।

लेकिन कांग्रेस का शासन करने का तरीका ही यही है। मारती भी है और झुकाती भी है। सिखों का नरसंहार किया और मनमोहन सिंह जैसे विद्वान व्यक्ति को रिमोट से कंट्रोल भी किया। पंजाब में उसके बाद सरकार भी चलाई। बाबा रामदेव पर जानलेवा हमला भी करवाया और अपने किए के लिए आज तक माफी भी नहीं मांगी।

कांग्रेस सत्ता में थी तब भी अहंकारी थी और आज सत्ता में नहीं है फिर भी उसका अहंकार कम नहीं हुआ है। यह सब देश की जनता देख रही है।

बंद गली का आखिरी मकान, देवेन्द्र राज अंकुर और कहानी के रंगमंच की स्वर्ण जयंती।

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अजित राय

अगामी 4 जून 2024 को देवेन्द्र राज अंकुर जी अपनी उम्र के 77 वें वर्ष में प्रवेश कर रहें हैं। उन्हें अग्रिम बधाई। बधाई इसलिए भी कि इस उम्र में भी वे रंगमंच में सतत सक्रिय हैं। वे हमारे प्रेरणा स्त्रोत है और गुरु भी जिनसे हमने बहुत कुछ सीखा है। वे रंगमंच के चलते फिरते विश्वकोश है। भारतीय रंगमंच में उन्होंने 1 मई 1975 को जिस कहानी के रंगमंच को ईजाद किया था, उसे अब 50 वर्ष होने जा रहे हैं।

देवेंद्र राज अंकुर जी के निर्देशन में 26 अप्रैल 2024 की शाम 6.30 बजे अभिमंच सभागार में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की नई प्रस्तुति धर्मवीर भारती लिखित ‘ बंद गली का आखिरी मकान ‘ अपने संपूर्ण रंग अनुभव और नई रंग भाषा के कारण चमत्कृत करती है। अभिनय, संवाद, दृश्यबंध, देहभाषा , संगीत, प्रकाश और मंच परिकल्पना यानि सबकुछ इतना उम्दा और विलक्षण है कि मन में उतरता चला जाता है। यह हमारे बचपन की स्मृतियों की वापसी जैसा कुछ है।

कई दृश्य बहुत सुंदर बन पड़े हैं, फेड इन और फेड आउट का टाइम सेंस गजब का है जिससे नाटक की गति धीमी नहीं हो पाती। जिस कुशलता से अंकुर शैली में अभिनेता अभिनय करते करते सूत्रधार (कथाकार) में बदलता है और कहानी सुनाते सुनाते चरित्र में बदल जाता है, वह काबिले तारीफ है। अभिनेताओं ने पटकथा से करुणा और हास्य के दृश्यात्मक क्षणों का सुंदर सामंजस्य किया है। जर्जर खपरैल एक मंजिला कच्चे मकान का प्रतीकात्मक सेट है। बीच की जगह कभी आंगन कभी बरामदा और कभी रसोई और कभी कमरा बन जाती है जहां बांस की एक खाट है, बगल की दीवार में एक आला ( दीवार को काटकर बनाई गई चौकोर खाली जगह जहां डिबरी रखी जाती है) है जिसका उपरी हिस्सा मिट्टी के तेल से जलने वाली डिबरी के धुंए से काला पड़ गया है। यहीं वह बंद गली का आखिरी मकान है । उसी दिन दोपहर साढ़े तीन बजे अंकुर जी के निर्देशन में इसी आलेख को रानावि रंगमंडल के दूसरे कलाकारों ने कहानी के रंगमंच की आधुनिक शैली में प्रस्तुत किया।

‘बंद गली का आखिरी मकान’ की कहानी ब्रिटिश कालीन इलाहाबाद की है यानी 1933 और उसके आसपास की जब धर्मवीर भारती मात्र छह सात साल के थे और अक्सर इस मकान में खाना खाने पहुंच जाते थे। इस मकान के ठीक सामने उनका पक्का दोमंजिला मकान था। हालांकि उन्होंने सच्ची घटनाओं पर आधारित यह लंबी कहानी अपने बचपन की स्मृतियों के आधार पर 1969 में लिखी थी। इस मकान में कहानी के मुख्य चरित्र मुंशीजी रहते हैं जो कचहरी में काम करते हैं ( शायद वकील हैं) । जाहिर है कि वे कायस्थ है और उन्होंने बिरजा नामक एक ब्राह्मण औरत और उसके दो बच्चों – राघव (राम मिश्र )और हरिया (हरे राम मिश्र) और बिरजा की मां हरदेई को अपने घर में आश्रय दे रखा है। वरिष्ठ कवि पत्रकार विमल कुमार ने अपने फेसबुक पेज स्त्री दर्पण पर लिखा है कि यह लिव इन रिलेशनशिप की कहानी है जिसके स्त्री पाठ पर विचार किया जाना चाहिए। इस प्रस्तुति में मुंशी जी का चरित्र आलोक रंजन ने निभाया है जबकि शिल्पा भारती बिरजा बनी हैं। और भी छोटे मोटे कई चरित्र है पर फिलहाल मंच पर मुंशीजी और बिरजा के बीच रिश्तों के विविध रूपों की बात करते हैं ।

बिरजा, उसकी मां हरदेई और बड़े बेटे राघव के लिए मुंशीजी भगवान है। बिरजा का छोटा बेटा थोड़ा बिगड़ैल है जो पढ़ाई छोड़कर महफिलों में सारंगी बजाने लगता है। आज से करीब सौ साल पहले भारतीय समाज में मुंशी जी और बिरजा के लिव इन रिलेशनशिप को लेकर बाहर लोग कितनी बातें करते होंगे, ताने मारते होंगे, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। यह भी कहा जाता है कि हरदेई ने मुंशीजी को अपनी बेटी बेच दी है इसलिए लड़कियों को स्कूल से घर पहुंचाने का काम उससे छिन जाता है। मुंशीजी अपनी जिस चार साल की छोटी बहन बिटौनी की परवरिश के लिए आजीवन अविवाहित रह गए, वह भी उनके घर का पानी पीने से इन्कार कर देती है। एक दृश्य में जब बिरजा उसके लिए पानी लाती है तो वह उसे अपमानित करने के लिए पड़ोस की छोटकी बहू से पानी मांगकर पीती है। छोटकी बहू का उसके ससुर से नैन मटक्का चल रहा है और इस बात को वह गर्व और रस के साथ साझा करती रहती है। । एक दृश्य में मुंशीजी बिरजा की चादर उतारते हुए उसे अपने कंधे पर वैसे ही रखकर चलते हैं जैसे विवाह मंडप में सात फेरे लेते हुए दुल्हा चलता है। एक दूसरे दृश्य में बांस की खाट पर लेटे हुए मुंशीजी का पैर दबाते हुए बिरजा कहती भी है कि उसकी यह इच्छा हमेशा से रही कि मुंशीजी उसकी मांग में सिंदूर भर देते। वहीं जब तनातनी हो जाती है तो वह गुस्से में पुराने बक्से को पटकते हुए यह कहने से भी नहीं चूकती कि उसके आने से ही यह घर घर बना, इस घर में दिया बाती होने लगी वरना तो यह खंडहर ही था। प्रेम के सघन क्षणों में मुंशीजी कहते हैं कि 17 साल से एक ही घर में, एक ही कमरे में,एक ही बिस्तर पर रहते सोते हुए उन्होंने आज तक ठीक से बिरजा को देखा तक नहीं। भारतीय समाज में स्त्री -पुरुष के दैहिक और मानसिक रिश्तों पर यह कितनी बड़ी टिप्पणी है। चरित्रों के बीच चाहे प्रेम और रागात्मकता हो या तनातनी या तानेबाजी हो या बाहर की अफवाहें, मंच पर अपनी देह गतियों और भंगिमाओं से अभिनेताओं ने जिस कुशलता से इन दृश्यों को सजीव किया है वह अद्भुत है। एक दृश्य में जब मुंशीजी बिरजा की ओर प्रेम की मांसल नजर से देखते भर है कि बिरजा कहती हैं कि आंगन का दरवाजा खुला है, उसे बंद कर दें। दर्शक के लिए इतना काफी है कि आगे क्या होनेवाला है।

 

मुंशीजी की कोशिश से राघव की कचहरी में नौकरी लग जाती है। उसकी शादी के लिए एक रिश्ता आता है। समस्या यह है कि मुंशीजी तो राघव के असली पिता तो हैं नहीं। उन्हें सब सलाह देते हैं कि कुछ दिनों के लिए वे कहीं चले जाएं और शादी के बाद लौट आएं। हरिया पूछता भी है कि क्या सोनपुर मेले में मोम की नकली औरत मिलती हैं जिसे खरीद कर राघव भैया की शादी करा दी जाएगी। पहले तो मुंशीजी इस प्रस्ताव से आहत हो जाते हैं, बोल चाल बंद कर लेते हैं फिर मान जाते हैं। लेकिन बिरजा कहती हैं कि मुंशीजी कहीं नहीं जाएंगे, अब वहीं राघव के पिता हैं। छोटा बेटा हरिया मुंशीजी से शिक़ायत करता है कि वे उसके बड़े भाई राघव को तो दो दो पायजामा सिल्वा दिए और उसकी सारंगी का कवर नहीं सिलवा रहे। वह पूछता है कि क्या पढ़ना, नौकरी करना ही सबकुछ है, कलाकार होना कुछ नहीं? यह भी हमारे परिवारों पर बड़ी टिप्पणी है। अंकुर जी के अभिनेता मंच पर जैसे पूरे पारिवारिक जीवन को, अड़ोस-पड़ोस को, तनातनी और तानेबाजी को अपने अभिनय से जीवंत करते हैं। मुंशीजी जब बीमार होकर बिस्तर पर पड़ जाते हैं तो उनका एक मुसलमान दोस्त उन्हें देखने आता है। वह कहता है कि बीच में चूल्हा न होता तो वह मुंशीजी तक पहुंच जाता। यानी एक मुसलमान न तो हिंदुओं के आंगन में चूल्हा लांघ सकता है न पर्दे के बिना किसी गैर औरत से बात कर सकता है। बिरजा के भाई बिशन मामा से मुंशीजी को धमकी मिलने की खबर से बेचैन होकर वह उन्हें बेखौफ करने आया है। मुंशीजी की बिगड़ती तबियत से घबराकर उनके प्रति हमेशा कठोर रहनेवाला उनका विरोध करने वाला खुद को कायस्थ का बेटा कहलाने से नफरत करने वाला छोटा बेटा हरिया घबराहट में कहता है कि मुंशीजी आप सारंगी सुनना चाहते थे न। लीजिए सुनिए। वह सारंगी बजाने लगता है तभी बड़े बेटे राघव को पुकारते हुए मुंशीजी इस दुनिया को अलविदा कह देते हैं। हरिया उनके मृत शरीर को झकझोर कर कहता है कि मुंशीजी मुझसे बात करो, मैं भी तो आपका छोटा बेटा हूं। इसी हृदयविदारक दृश्य पर नाटक खत्म होता है और जिस गाने से नाटक शुरू हुआ था वहीं गाना बजता है – आकाश गंगा तक उड़ान भरना/ कुछ बन जाना, महान कभी मत बनना।

मुंशीजी की भूमिका में आलोक रंजन ने बहुत उम्दा काम किया है। उन्होंने कई दृश्यों में अपने मौन से भी बहुत कुछ कहने की कोशिश की है। मंच की दृश्य संरचना में वे जैसे घुल-मिल गए हैं। एक दृश्य में जब वे बिरजा से नाराज़ हैं और ऐसा प्रदर्शित करते हैं कि वे बिरजा से नहीं खुद से नाराज़ हैं। वे खाट पर लेटे हैं, बिरजा पैताने बैठ उनका पैर दबाने लगती है। दोनों के बीच असह्य मौन पसरा हुआ है। वे पैर समेट लेते हैं, पर कब तक? अंततः वे पिघल जाते हैं । इसी तरह शिल्पा भारती ने इसी तनातनी को ऐसे व्यक्त किया है जैसे जल बिन मछली तड़पती हैं। वह सारे घर को सिर पर उठा लेती हैं। मुंशीजी के प्रति प्रेम और समर्पण की अभिव्यक्तियां बहुत ही उम्दा है। साडी के पल्लू के भीतर से झांकती दृढ़ता दृश्यों को और प्रभावशाली बनाती है। छोटे बेटे हरिया की भूमिका में सत्येन्द्र मलिक ने तो अंकुर जी के ही नाटक कृष्ण बलदेव वैद लिखित ‘उसका बचपन’ में अजय कुमार के बेमिसाल अभिनय की याद दिला दी। उनका चुलबुलापन, उनकी सहज शरारतें और मुंह पर ही सबकुछ कह देने की हाजिरजवाबी मन मोह लेती है खासकर अंतिम दृश्य में जब मुंशीजी की मृत देह से वे संवाद करते हैं। मुंशीजी के ममेरे भाई भवनाथ की भूमिका में रानावि रंगमंडल के चर्चित अभिनेता शिव प्रसाद शिब्बू जब भी मंच पर आते हैं, सारा दृश्य उर्जावान हो जाता है। उनकी अदाओं का जवाब नहीं।

 

भारतीय रंगमंच में अंकुर जी ने जिस कहानी के रंगमंच को ईजाद किया था उसे अब पचास वर्ष होने जा रहें हैं। यह प्रस्तुति कहानी के रंगमंच की स्वर्ण जयंती का जश्न है। अब तक वे करीब पांच सौ से भी अधिक कहानियों और बीस उपन्यासों का मंचन कर चुके हैं।सबसे पहले देवेन्द्र राज अंकुर ने आज से करीब पचास साल पहले राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के तीन कलाकारों के साथ निर्मल वर्मा की तीन कहानियों का मंचन एक मई 1975 को लखनऊ में ‘ महानगर – तीन एकांत ‘ नाम से किया था। पहली कहानी ‘ धूप का एक टुकड़ा ‘ सबा ज़ैदी, दूसरी कहानी ‘ डेढ़ इंच ऊपर ‘ राजेश विवेक और तीसरी कहानी ‘ वीकेंड ‘ सुरेखा सीकरी करती थी। इस प्रस्तुति में एक छोटी भूमिका रतन थियम भी करते थे।
यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि हमारे समय में दो वरिष्ठतम निर्देशक इस उम्र में भी मंच पर नौजवानों से ज्यादा सक्रिय, सचेत, संवेदनशील और सफल हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के साथ 83 वर्षीय प्रो राम गोपाल बजाज ने लंदन के इस्माइल चुनारा लिखित ‘ लैला-मजनूं ‘ और धर्मवीर भारती के ‘ अंधा युग ‘ की शानदार प्रस्तुति की है। 76 वर्ष के देवेन्द्र राज अंकुर जी ने अब ‘ बंद गली का आखिरी मकान ‘ की प्रस्तुति से हमारा दिल जीत लिया है।

नाराजगी या उदासीनता: आम जनता क्यों नहीं वोट कर रही है

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लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण का मतदान शुक्रवार को खत्म हो गया। पहले चरण की तरह दूसरे चरण में मतदान का प्रतिशत कम रहा। लगातार दूसरे चरण में मतदान प्रतिशत कम रहने से तमाम पार्टियां अपने-अपने दावे कर रहीं हैं। मतदान के कम प्रतिशत के क्या मायने हैं? चुनाव को लेकर मतदाताओं में उदासीनता क्यों है?

दूसरे चरण में शुक्रवार को 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 88 सीटों पर मतदान हुए. हालांकि चुनाव को लेकर उत्साह शाम को आए वोटिंग प्रतिशत ने कम कर दिया। इस बार का वोटिंग ट्रेंड पहले चरण के चुनाव से भी खराब रहा। दूसरे चरण में महज 63.00 प्रतिशत मतदाताओं ने ही अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जबकि 2019 में इन्हीं सीटों पर 70 फीसदी से ज्यादा लोगों ने बढ़-चढ़कर वोट किया था। कम होते इस वोटिंग प्रतिशत ने सभी राजनीतिक दलों का गणित बिगाड़ दिया है।

पहले चरण में 21 राज्यों की 102 लोकसभा सीटों पर 64 प्रतिशत वोट डाले गए थे। पिछले चुनाव में उन सीटों पर भी 70 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुए थे। यही हाल दूसरे चरण में भी रहा। किसी भी राज्य में मतदान का आंकड़ा 80 फीसदी को पार नहीं कर सका। वोटिंग कम होने से बढ़ी राजनीतिक दलों के साथ चुनाव आयोग की भी चिंता वोट करने के लिए लोगों के घरों से बाहर नहीं निकलने को लेकर राजनीतिक दलों को साथ-साथ चुनाव आयोग की भी चिंता बढ़ा दी है। खासकर हिंदी भाषी राज्यों में तो मतदाता वोटिंग को लेकर जैसे नीरस हो गए हैं। इससे पहले 2014 और 2019 में अच्छी-खासी तादाद में लोगों ने वोट किया था, लेकिन इस बार मतदाताओं में वो जोश देखने को नहीं मिल रहा है।

कहां कितने प्रतिशत मतदान?

छह निर्वाचन क्षेत्रों – मध्य प्रदेश में रीवा, बिहार में भागलपुर, उत्तर प्रदेश में मथुरा और गाजियाबाद, और कर्नाटक में बेंगलुरु दक्षिण और सेंट्रल में वोट डालने के लिए 50 प्रतिशत से कम मतदाता मतदान केंद्रों पर आए।

राज्य-वार, असम में सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत में आठ प्रतिशत से लेकर 13.9 प्रतिशत तक की कमी देखी गई। बिहार के निर्वाचन क्षेत्रों में 8.23 प्रतिशत से 12 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।

राजस्थान के पहले चरण के चुनावों में कम वोटिंग को लेकर बीजेपी पहले ही चिंता में है। अब राजपूतों की नाराजगी के फैक्टर ने पार्टी की परेशानी और बढ़ा दी है।

राजपूतों की नाराजगी की बात कोई और नहीं कर रहा,भागीदारी और जनसंख्या के हिसाब से टिकट मांग रहे हैं ।

राजपूत, त्यागी और सैनी वोट बैंक नाराज!

पश्चिमी यूपी में BJP के लिए तगड़ी है चुनौती लेकिन प्रधानमंत्री और मुख्य मंत्री का चेहरा,विकास और सुरक्षा प्रदान करना, ये बीजेपी के लिए कही ना कही बढ़त है। विपक्ष ने भी कमर कस ली है लेकिन वो भी वोट प्रतिशत नही बढ़ा पा रहे, मुहिम ,विज्ञापन, छुट्टी भी असर नहीं डाल पा रही है, चिंता का विषय है इलेक्शन कमिशन के लिए। लोकतंत्र में वोट सबसे बड़ा हथियार है, लेकिन अगर उदासीनता हो तो क्या कह सकते हैं।

बढ़ती गर्मी और खेती का मौसम भी है वजह

पूरे उत्तर भारत में इन दिनों मौसम का तापमान काफी बढ़ गया है. लू और गर्म हवाओं ने लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त किया हुआ है। लोगों के वोट करने को लेकर घर से बाहर नहीं निकलने की ये भी एक वजह बताई जा रही है। वहीं चुनाव में विपक्षी पार्टियों की कम सक्रियता से भी कम वोटिंग प्रतिशत को जोड़कर देखा जा रहा है। वहीं आजकल के चुनाव में फिजिकल प्रचार की बजाय सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल भी वोटिंग ट्रेंड को कम कर रहा है।

कम मतदान से कम मार्जिन वाली सीटों पर असर

मतदान प्रतिशत कम होने से कम मार्जिन वाली सीटों पर इसका सीधा असर पड़ता है।  2019 में 75 सीटों पर नजदीकी मुकाबला था। ऐसे में परिणाम किसी भी तरफ झुक सकता है। कुछ जानकारों का कहना है कि कम मतदान से सत्ताधारी दलों को फायदा हो सकता है, क्योंकि लोगों की सोच होती है कि सरकार अच्छा काम कर रही है और वो बदलाव नहीं चाहते। इसीलिए वो वोट के लिए घर से बाहर नहीं निकलते।

गुजरात, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान में राजपूत बिरादरी को कम टिकट देने के कारण क्षत्रिय समाज में आक्रोश और उदासीनता, क्षत्रिय समाज बीजेपी का एक मात्र कोर वोटर रहा है लेकिन कम भागीदारी की वजह से क्षत्रिय समाज में रोष है।

गर्मी की वजह और आम जनता में इस बार वोट देने जाने की उदासीनता ज्यादा है, कई लोग सोच रहे हैं कि बीजेपी जीत रही है तो मेरे एक वोट ना देने से कोई फर्क नहीं पड़ता। कुछ जातियों का आक्रोश है। कुछ सोच रहे हैं कि कुछ फायदा तो होता नहीं वोट देने से। यह समय इन सारी बातों को सोचने का नहीं है। वोट दीजिए क्योंकि हमें अपनी सरकार चुननी है। वोट दीजिए क्योंकि ये आपका अधिकार हैं।

मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए किसी भी सीमा तक जाएंगे राजनैतिक दल

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भोपाल। लोकसभा चुनावों के मतदान के दो चरण समाप्त हो जाने के बाद सभी राजनैतिक दलों को जनता के मध्य अपनी स्थिति की वास्तविकता का कुछ सीमा तक पता चल गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की सम्भावना वाली भारतीय जनता पार्टी को रोकने के लिए विपक्ष ने एक बार फिर मुस्लिम तुष्टीकरण का विकृत खेल खेलना प्रारम्भ कर दिया है। तथाकथित इंडी गठबंधन में शामिल दलों के नेता लगातार भड़काऊ और नफरत भरी बयानबाजी कर रहे हैं जिसमें अब वोट जिहाद और तालिबान भी आ गया है। दिल्ली के मंडी हाउस इलाके में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ आतंकी फंडिंग मामले में सजा काट रहे यासिन मलिक का फोटो लगाया गया है। पोस्टर में यासिन मलिक की रिहाई के साथ कांग्रेस को वोट देने की अपील की गई है। हालांकि जानकारी मिलते ही दिल्ली पुलिस ने यह पोस्टर हटा दिया है। आतंकी यासीन मलिक कुख्यात अलगवावादी है जिससे 2006 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुलाकात की थी। अब मलिक आजीवन कारावास की सजा काट रहा है और अभी उस पर कई और मुकदमे चल रहे हैं। कांग्रेस केरल में प्रतिबंधित पीएफआई जैसे संगठनों का सहयोग ले रही रही है और सनातन विरोधी बयानों पर चुप्पी साधे हुए है।

मुस्लिम तुष्टीकरण का यह खुला खेल कांग्रेस ही नहीं अपितु भारत की सभी वामपंथी और अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियाँ जमकर खेल रही हैं फिर चाहे वो उत्तर प्रदेश हो बिहार हो या पश्चिम बंगाल। विगत 10 वर्षों और अटल जी के कार्यकाल को छोड़ दें तो केंद्र तथा राज्यों में कांग्रेस व उसके गर्भ से निकले दलों व नेताओं ने ही सत्ता पर एकछत्र राज किया। ये सभी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भाजपा को हराने की बात करने वालों तथा कट्टरपंथियों का समर्थन कर मतदान को मजहब के आधार पर प्रभावित किया करते थे। भाजपा द्वारा धर्मनिरपेक्षता की सच्ची रेखा खींचने के बाद इन दलों के नेताओं के सामने अपना राजनैतिक अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हो गया है और ये वोट जिहाद की अपील कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अभी तक सपा, बसपा, कांग्रेस सहित विभिन्न दल अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी जैसे माफियाओ को अपने राजनैतिक लाभ के लिए पाला पोसा करते थे अब उनके लिए फातिहा पढ़ रहे हैं और धूर्तता के साथ उन्हें गरीबों का मसीहा बताकर मुसलमानों का वोट मांग रहे हैं । पहले ये माफिया बूथ लूटकर व मतदान के समय बम, गोलियां दागकर वोट जिहाद किया करते थे अब उनके नेता व गुर्गे इनको शहीद बताकर मुस्लिम समाज को भड़का रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में कायमगंज के अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र में इंडी गठबंधन के प्रत्याशी के समर्थन में पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की भतीजी सपा नेता मारिया आलम खां ने वोट जिहाद का नारा देकर समाजवादियों की मुश्किल बढ़ा दी है। मारिया आलम खां ने कहा कि हर महिला और हर पुरुष वोट जिहाद करके संविधान बचाने की इस जंग को लड़ेगा। प्रदेश में वोट जिहाद शब्द को लेकर राजनैतिक बयानबाजी अब काफी तल्ख़ हो गयी है। सपा कांग्रेस गठबंधन हो जाने के कारण इस बार सलमान खुर्शीद का परिवार चुनावी मैदान से भले ही दूर हो गया हो किंतु अपने सहयेगी दलों के उम्मीदवारो के लिए चुनाव प्रचार कर रहा है। सलमान खुर्शीद का परिवार कई बार विवादो के घेरे में रहा है। खुर्शीद की पत्नी लुईस खुर्शीद पर दिव्यांगों की सहायता करने के नाम पर घोटाला करने का मुकदमा चल रहा है।सलमान खुर्शीद बाटला हाउस एनकाउंटर व प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी विवादित बयानाबाजी कर चुके हैं।जब लुईस खुर्शीद को इस बात का आभास हो गया था कि इस बार उनके परिवार को टिकट नहीं मिलने जा रहा तब उन्होंने मीडिया के सामने अपने कार्यकर्ता से कहा था कि अगर कांग्रेस का कोई पदाधिकारी उनसे मिलने आए तो उसे चप्प्पल से मारें। अब उसी परिवार की भतीजी मारिया एक बार फिर वोट जिहाद की अपील कर रही हैं।

इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के संभल से पूर्व सांसद डॉ शफीकुर्रहमान वर्क के पोते एवं सपा प्रत्याशी जियाउर्रहमान वर्क अपनी नुक्कड़ सभा के वायरल वीडियो में मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद और शहाबुद्दीन की मौत को कुर्बानी बता रहा है।वीडियो वायरल हो जाने के बाद वर्क पर मुकदमा दर्ज हो गया है।उसके बाद भी वह नहीं रुका और उसने चुनाव आयोग के अधिकारियों को धमकी देते हुए बयान दिया कि जब वक्त बदलेगा तब बदला लिया जायेगा।
बहुजन समाजवादी पार्टी अपनी नैया पार लगाने व जनता के मध्य अपनी उपस्थिति को दर्ज कराने के लिए चुनावी मैदान में अपने युवा कोआर्डिनेटर, पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के भतीजे आकाश आनंद के नेतृत्व में रण मे उतरी है और कुछ- कुछ बदली बदली सी नजर आ रही है। पार्टी ने 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में अपनी जमीन को फिर से प्राप्त करने के लिए, सवर्णो को खुश करने के लिए रामनाम का विरोध नहीं किया था किंतु वह अब काफी पीछे छूट चुका है। बसपा ने इस बार नया नारा दिया है,“ बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का“ किंतु पार्टी का एक मुश्त मुस्लिम मतों का लालच छूटा नहीं है इसलिए बसपा ने सबसे अधिक मुसलमानों को अपना उम्मीदवार बनाया है। बसपा के युवा नेता आकाश आनंद मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए आक्रामक बयानबाजी कर रहे हैं जिसके कारण उनके खिलाफ सीतापुर जिले में केस भी दर्ज हो गया है। सीतापुर की एक जनसभा में आकाश ने अपनी सभी सीमाओं को लांघते हुए उत्तर प्रदेश सरकार की तुलना तालिबान से कर डाली। अतीक, मुख्तार अंसारी व शहाबुद्दीन जैसे माफियाओं का राजनैतिक लाभ के लिए उपयोग बसपा ने भी समय -समय पर किया है।

यह साबित हो जाने के बाद भी कि कुख्यात माफिया मुख्तार अंसारी की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई है इन सभी दलों के नेताओं ने न केवल फातिहा पढ़ना जारी रखा है बल्कि उसकी मौत के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण के भी सभी हथकंडे अपना रहे हैं। सपा, बसपा, कांग्रेस सहित इंडी गठबंधन में शामिल दलों के लोग जिस प्रकार भाषणबाजी कर रहे हैं उससे इनकी घबराहट साफ़ है।

मुस्लिम तुष्टीकरण के दम पर सरकार बनाने और चलाने वालों को एक ही आस है कि मोदी सरकार से बिजली, पानी, गैस, शौचालय, घर, दवाई, राशन सब कुछ लेने के बाद भी मुसलमान वोट मजहब के नाम पर ही करेगा ।

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