वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय संघी नहीं हैं

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पिछले दिनों एक कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने यह कह कर कई लोगों को चौंकाया कि मैं संघी नहीं हूं। अशोक वाजपेयी से लेकर पुरुषोत्तम अग्रवाल जैसे वामोन्मुख रुझान वाले लेखक, प्राध्यापक, पत्रकारों के लिए तो वे अब तक संघी ही है। संघी परिचय के साथ कॉमरेड जन के लिए किसी पर हमला करना आसान हो जाता है। वे तो उन मुसलमानों को भी इन दिनों संघी कह देते हैं, जो उनका कहा नहीं मानते। उनके बताए रास्ते पर चलने को तैयार नहीं होते। ऐसे में राम बहादुर राय का यह कहना कि मैं संघी नहीं हूं। खुद को संघी विचारक कहकर समाचार पत्रों और चैनलों में प्रचारक बने कई बुद्धीजीवियों के लिए मुश्किल खड़ी करने वाला था।

श्री राय ने कहा कि संघी होना मेरे लिए थोड़े ऊंचे दर्जे की बात है। मैं विद्यार्थी परिषद से जुड़ा रहा। अब जहां प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में सोशल मीडिया पर दो शब्द लिखकर कोई व्यक्ति संघी होने का तमगा हासिल कर सकता है, वहीं राय साहब ने अपने इतने लंबे सामाजिक जीवन के बाद जब कहा कि वे संघी नहीं है, यह सवाल जरूर सभा में मौजूद लोगों के अंदर उठा होगा कि फिर संघी कौन है? किसे संघी कहा और माना जाए?

आईजीएनसीए के तत्वावधान में वाणी प्रकाशन की उस सभा में प्रश्नोत्तर के लिए समय नहीं रखा गया था, इसलिए यह प्रश्न सभा में अनुत्तरित रहा। अनुत्तरित तो यह प्रश्न भी रहा कि वाणी ने जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी किताबों के प्रकाशन के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं तो इसका अर्थ है कि उसने थोड़ी वैचारिक नजदीकी महसूस की होगी। गाधी परिवार के शासन के दौरान प्रकाशन क्षेत्र में एक अघोषित आपातकाल था। जहां आरएसएस और उससे वैचारिक नजदीकी रखने वाले लेखकों से बड़े प्रकाशकों का रिश्ता ‘अस्पृश्यता’ का ही था। 2014 के बाद यह छूआछूत मिटा है।

ऐसे में वाणी की तरफ से राष्ट्रवादी किताबों के प्रकाशन के सिलसिले को बढ़ाने की कोशिश के भावार्थ को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। संघ से जुड़ाव की पहल के बीच अब भी मकबूल फिदा हुसैन द्वारा तैयार तस्वीर वाला लोगो वाणी प्रकाशन इस्तेमाल कर रहा है। यह संघ की उदारता है कि माहेश्वरीजी को इस संबंध में किसी ने कभी कोई शिकायत नहीं की।

संघ परिवार और गांधी परिवार की कार्यशैली में यह अंतर साफ दिखाई पड़ता है। बहरहाल यह पोस्ट लिखे जाने तक प्रश्न अनुत्तरित है कि ‘संघी कौन है?’, ‘संघी किसे कह सकते हैं?’

विकसित देश भारत के आर्थिक दर्शन को लागू कर अपनी आर्थिक समस्याओं का हल निकाल सकते हैं

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विश्व के कुछ विकसित देश, विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन, भारत को समय समय पर आर्थिक क्षेत्र में अपना ज्ञान प्रदान करते रहे हैं। परंतु, अब विश्व के आर्थिक धरातल पर परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और भारत की स्थिति इस संदर्भ में बहुत सुदृढ़ होती जा रही है वहीं विकसित देशों की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। अमरीका स्थित निवेश बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थान भारत के कुल कर्ज की स्थिति पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहते रहे हैं कि भारत का कर्ज, सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में, तेजी से बढ़ता जा रहा है। जबकि, इसी मापदंड के आधार पर अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों की स्थिति देखी जाय तो भारत की तुलना में इन देशों की स्थिति बहुत अधिक दयनीय स्थिति में पहुंच गई है, परंतु यह देश भारत को आज भी ज्ञान देते नहीं चूकते हैं कि भारत अपनी स्थिति में किस प्रकार सुधार करे।
अमेरिका के कुल कर्ज की स्थिति यह है कि आज अमेरिका का कुल कर्ज 34 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करते हुए यह अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद (28 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर) का 123 प्रतिशत हो गया है, जो पूरे विश्व में समस्त देशों के बीच सबसे अधिक प्रतिशत है। अमेरिका आज प्रतिवर्ष अपने आय के कुल स्त्रोतों से अधिक ऋण ले रहा है। जब भी अमेरिकी सरकार को खर्च करने हेतु धन की आवश्यकता पड़ती है, वह बाजार में अमेरिकी बांड्ज जारी कर ऋण लेकर अपना काम चलाता है। यह बहुत ही गलत तरीका है परंतु अमेरिकी सरकार को आज भी इस बात की चिंता नहीं है। हालत यहां तक बिगड़ गए हैं कि अमेरिकी कानून द्वारा अमेरिकी सरकार के बाजार के ऋण लेने के लिए निर्धारित की गई अधिकतम सीमा भी पार हो जाती है एवं लगभग प्रत्येक तिमाही के अंतराल पर अमेरिकी संसद द्वारा ऋण लेने की इस अधिकतम सीमा को बढ़ाया जाता है, इसके बाद अमेरिकी सरकार बाजार से ऋण लेती है और अपने खर्चे चलाती है। यदि बाजार से ऋण लेने की सीमा को प्रत्येक तिमाही पश्चात अमेरिकी संसद द्वारा नहीं बढ़ाया जाय तो शायद अमेरिकी सरकार द्वारा अपने सामान्य खर्चों को चलाना ही असम्भव हो जाएगा। अमेरिका में आर्थिक क्षेत्र में हालत इस स्थिति में पहुंच गए हैं कि अमेरिकी सरकार को ऋण पर ब्याज का भुगतान करने के लिए भी बाजार से ऋण लेना पड़ रहा है। अमेरिकी सरकार द्वारा लगभग प्रत्येक 100 दिनों के अंतराल में 1 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का ऋण बाजार से लिया जा रहा है। ऋण पर अदा किए जाने वाले ब्याज की राशि आज अमेरिका के सुरक्षा बजट से भी अधिक हो गई है। आज प्रत्येक वर्ष अमेरिकी सरकार को 87,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि ऋण पर ब्याज के रूप में अदा करनी होती है जबकि अमेरिका का वार्षिक सुरक्षा बजट 82,200 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है। उक्त परिस्थितियों के बीच अभी हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, जेपी मोर्गन चेज, बैंक आफ अमेरिका, ब्लैक रॉक, आदि वित्तीय संस्थानों के उच्च अधिकारियों  ने अमेरिकी सरकार को चेतावनी दी है कि वह इस प्रकार के तरीकों को अपनाने से बाज आए अन्यथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था को डूबने से कोई बचा नहीं सकेगा और इसका प्रभाव पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर पड़े बिना नहीं रहेगा। अमेरिका का बढ़ता ऋण पूरे विश्व में ब्याज दरों को प्रभावित कर रहा है, इससे विश्व में कई देशों को ब्याज दरों को बढ़ाना पड़ रहा है और ऋण की लागत के साथ ही विनिर्माण इकाईयों की उत्पादन लागत भी बढ़ रही है। आज विश्व के कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं,  वैश्वीकरण के इस युग में, आपस में जुड़ी हुई हैं एवं एक दूसरे को प्रभावित कर रही हैं।
आज अमेरिका द्वारा अन्य देशों को ज्ञान देने के बजाय अपनी लगातार गर्त में जा रही अर्थव्यवस्था को सम्हालने के प्रयास करने चाहिए। अमेरिकी सरकार को अपने खर्चों पर नियंत्रण करते हुए अपने आय के साधनों को बढ़ाना चाहिए। न कि, भारत एवं अन्य विकासशील देशों को सीख दे कि ये देश अपने देश में किसानों को दी जा रही सब्सिडी/सुविधाओं में कटौती करें और अंतरराष्ट्रीय व्यापार करते समय अमेरिका द्वारा दी गई सलाह को ध्यान में रखें। आज अमेरिकी अर्थव्यवस्था की जो स्थिति है और विश्व के अन्य देश यदि अमेरिकी सलाह के अनुसार अपनी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक सुधार कार्यक्रम लागू करते हैं तो सम्भव है कि इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी संकट के बादल मंडराने लगें। अमेरिका में पूंजीवाद पर आधारित अर्थव्यवस्था अब अंतिम सांसे लेती दिखाई दे रही है। यदि शीघ्र ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नहीं सम्हाला गया तो कई अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा।
भारत में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या को लेकर भी पश्चिमी जगत अपनी चिंता व्यक्त करता रहता है। हाल ही में ब्रिटेन के एक सांसद ने इस सम्बंध में अपनी राय प्रकट करते हुए कहा है कि भारत को गरीबों की संख्या को कम करने हेतु कुछ विशेष उपाय करने चाहिए। इस प्रकार की सलाह देने वाले विदेशी नागरिक यह भूल जाते हैं कि पिछले 10 वर्षों के दौरान भारत में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले नागरिकों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है और अब यह लगभग 10 प्रतिशत तक रह गई है। जब ब्रिटेन ने वर्ष 1947 में भारत छोड़ा था तब भारत को अति गरीब देश बनाकर छोड़ा था और भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही थी। और, आज ब्रिटेन में ही लगभग 18 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। फिर, किस आधार पर ब्रिटेन एवं अन्य विकसित देशों के नागरिक, आर्थिक क्षेत्र में, भारत को सलाह देने लगते हैं। जबकि, भारतीय अर्थव्यवस्था चूंकि सनातन चिंतन पर आधारित आर्थिक नियमों का अनुपालन करते हुए आगे बढ़ रही है इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था आज इन देशों की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई दे रही हैं। विकसित देशों को यदि अपनी आर्थिक समस्याओं को हल करना है तो साम्यवाद एवं पूंजीवाद पर आधारित आर्थिक नीतियों का परित्याग कर भारतीय आर्थिक दर्शन को अपनाकर अपनी आर्थिक समस्याओं का हल निकालने का प्रयास करना चाहिए, न कि समय समय अन्य देशों को इस सम्बंध में अपना ज्ञान बांटना चाहिए।

अजीत अंजुम का ‘खालिस बयान’, कहां है प्रमाण

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इसे चालाकी नहीं तो और क्या कहा जाए? एक बड़बोले यू ट्यूबर के बयानों को पकड़ लिया और फिर उसके बाद एक के बाद एक तीन वीडियो बना लिए। इस तरह चार बातें जो उसने गलत कहीं, उसपर पूरी वीडियो को केन्द्रित करके, उन बातों पर भी अपने दर्शकों की सहानुभूति इकट्ठी कर ली, जो संभवत: वीडियो में सही कही गई है।
यदि अजीत अंजुम किसी बात को गलत ठहरा रहे हैं। यह जानकारी गलत है तो उनकी जिम्मेवारी नहीं बनती कि वे सही जानकारी अपने दर्शकों के सामने प्रमाण के साथ रखें। सिर्फ इतना कह देने से जानकारी गलत है, बात कैसे बनेगी? प्रमाण भी तो देना चाहिए। सही जानकारी भी तो देनी चाहिए।
वे मैथिल ब्राम्हण नहीं है। यह बताया उन्होंने, फिर कौन जात हैं? जब चुनावी कवरेज के दौरान गांव गांव जाकर वे मतदाताओं से उनकी जात पूछ सकते हैं तो अपनी जाति क्यों नहीं बता रहे? ऐसी कौन सी जाति है उनकी, जो बताने में वे शर्मिन्दा हो रहे हैं। यदि वे दूसरों से जाति नहीं पूछ रहे होते तो यह प्रश्न उनके लिए भी नहीं होता।
अजीत अंजुम ने ही बताया कि उनपर केन्द्रित वीडियो डिलीट हो चुका है। उन्होंने माफीनामे  का जिक्र नहीं किया। क्या अब उस पर एक और वीडियो बनाएंगे?
उन्होंने बताया कि उनकी गाड़ी पर यू ट्यूबर ने चर्चा की। अजीत ने जवाब दिया कि वह वाली गाड़ी उनके पास नहीं है, जिसका जिक्र यू ट्यूबर ने किया था तो ऐसे में बताना चाहिए कि उनके पास कौन सी गाड़ी है? पत्रकारिता करते हुए  पारदर्शिता सबसे चाहिए फिर इतनी छोटी सी डिटेल को वे ‘छुपा’ क्यों रहे हैं?
अजीत अंजुम ने अपनी ड्राइंग रूम रिसर्च में पाया कि जिसने उनकी कथित सच्चाई को उजागर करते हुए एक वीडियो बनाया है, वह भाजपा समर्थक था। उन्हें भी तो बताना चाहिए कि वे किसके समर्थक हैं? पूरे कॅरियर में अब तक सोनिया गांधी की आलोचना में उनका एक वीडियो नहीं मिलता। उन्होंने अपने कॅरियर का लंबा हिस्सा राजीव शुक्ला के साथ बिताया है।
राजीव शुक्ला के साथ काम करने को लेकर कोई शर्मिन्दगी है मन में या उनसे उन्होंने बहुत कुछ सीखा, यह अजीत अंजुम को बताना चाहिए। बीजेपी और मोदी पर अनगिनत वीडियो बनाए हैं उन्होंने। उनका राजनीतिक झुकाव किस ओर है, यह बताने में इतनी ‘शर्म’ क्यों?
पिछली पोस्ट में अजीत अंजुम के आईटीआर की चर्चा की थी मैने। सबसे नए वाले वीडियो में ITR छोड़िए, अपनी कमाई का जिक्र तक नहीं किया उन्होंने। उनकी आमदनी कितनी है, उस संबंध में सही-सही जानकारी सार्वजनिक करने में इतना संकोच क्यों है? उत्तर प्रदेश विधान सभा में सभी होटलों के बिल जब उन्होंने अपने मोबाइल से पेय किए हैं फिर उन बिलों को सार्वजनिक करने में इतनी देरी क्यों हो रही है उन्हें? अपनी आमदनी को लेकर क्या वे कुछ छुपाना चाह रहे हैं?
उनके वीडियो को देखकर लग रहा है कि एक यू ट्यूबर की वर्चुअल बलि लेकर खुद को इस वर्चअल दुनिया में वे पाक साफ साबित करने की मुहिम में लगे हुए हैं। क्या वे कामयाब होंगे? मुझे संदेह है कि जब तक वे सिर्फ खुद की सफाई में बयान देंगे और जो सच है, उसे पब्लिक के सामने प्रमाण के साथ नहीं रखेंगे, उनकी सफाई संदिग्ध ही मानी जाएगी।
नोएडा में उनका घर नहीं है, यह बताया उन्होंने। उन्हें बताना चाहिए कि कहां है उनका घर और किस बिल्डर से यह घर खरीदा उन्होंने। बातें तो बिल्डर को लेकर भी हो रही है। जिस बिल्डर से घर लिया था, उसे पूरी कीमत दी थी या न्यूज 24 में होने की घुड़की देकर, घर के वास्तविक कीमत से कम पर उसे खरीदा? यह सब सवाल तो है। लेकिन वे इन सवालों के जवाब नहीं दे रहे। क्या उन्हें खुद को ‘ईमानदार’ भी साबित करना है और ईमानदारी ‘केजरीवाल’ जैसी रखनी है? अजीतजी अपने घर के अंदर बाहर का एक वीडियो ही एक दिन शेयर कर दें, उसी घर का जहां रवीश का इंटरव्यू किया था। शेष आपके कांग्रेस और आम आदमी पार्टी वाले दर्शक ही तय करें कि वह पेंटहाउस है या नहीं? भाजपा वालों के बयान को तो आप मिनटों में ‘षडयंत्र’ साबित कर देंगे, इसलिए उनके नाम का उल्लेख नहीं किया।
इतना बच-बच के सफाई क्यों दे रहे हैं अजीत अंजुम, सफाई भी देनी है और जिसे वे सच कह रहे हैं उसका प्रमाण भी नहीं दे रहे फिर बात कैसे बनेगी? यदि सारा सच उन्हें कोर्ट में ही बताना है फिर तीन तीन वीडियो बनाकर वे क्या ‘पीएम मोदी से नफरत’ करने वाले अपने दर्शकों की सहानुभूति इकट्ठी कर रहे हैं?

दो अनाथ नाबालिग बहनों को मिली बाल विवाह से आजादी और मुआवजा

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जितेंद्र परमार
जिला विधिक सेवाएं प्राधिकरण, उदयपुर ने बाल विवाह की पीड़ित दोनों बच्चियों को दिया 2.5 लाख का मुआवजा
12 एवं 14 साल की आयु में ब्याही गई दोनों बच्चियों की बाल विवाह मुक्त भारत की मदद से मिली कानूनी लड़ाई में जीत
जिला विधिक सेवाएं प्राधिकरण (डीएलएसए), उदयपुर ने 12 व 14 वर्ष की उम्र में ब्याही गई बाल विवाह की पीड़ित दो नाबालिग बच्चियों को ढाई लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश जारी किया है। बाल विवाह से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष कर रही इन दोनों अनाथ बहनों राधा और मीना (बदला हुआ नाम) के लिए मुआवजे की यह राशि बहुत बड़ी राहत है। दोनों बहनों ने अपने बाल विवाह को रद्द करने के लिए सितंबर 2023 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। यह ऐतिहासिक फैसला 10 मई को पड़ने वाली अक्षय तृतीया के समय आया है जब देश में और खास तौर से राजस्थान में बड़े पैमाने पर बाल विवाह की प्रथा है। यह बाल विवाह करवाने वालों को एक चेतावनी की तरह है।
डीएलएसए का यह आदेश इन बहनों के लिए किसी पुनर्जीवन से कम नहीं है जिनका जीवन अब तक दर्द और यंत्रणा के साये में बीता था। यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब कम उम्र में ही परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य पिता का साया सिर से उठ गया। इसके बाद परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गया। ऐसे में मां ने 12 व 14 साल की उम्र की इन दोनों बहनों का बाल विवाह कर दिया। लेकिन खेलने-कूदने की उम्र में बच्चियों को ससुराल के बंधन रास नहीं आए और उत्पीड़न से परेशान होकर एक दिन वे चुपके से अपनी मां के पास आ गईं। लेकिन एक बहन के पति को यह इतना नागवार गुजरा कि उसने ससुराल पहुंच कर इन दोनों बहनों की मां की हत्या कर दी। पिता की मौत और मां की हत्या के बाद दोनों बहनों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। वे मां के हत्यारे को सजा दिलाना चाहती थीं और बाल विवाह के बोझ से मुक्ति चाहती थीं लेकिन उन्हें पता नहीं था कि वे कहां जाएं और किससे मिलें?
इस घटना की जानकारी उदयपुर में बाल अधिकारों के लिए काम कर रहे गैरसरकारी संगठन गायत्री सेवा संस्थान (जीएसएस) को मिली जो देश में बाल विवाह के खात्मे के लिए काम कर रहे 161 गैरसरकारी संगठनों के गठबंधन ‘बाल विवाह मुक्त भारत अभियान’ का सहयोगी संगठन है। भारत से 2030 तक बाल विवाह के खात्मे के लिए बाल विवाह मुक्त भारत अभियान बाल विवाह की उच्च दर वाले देश के 300 जिलों में जमीनी अभियान चला रहा है।
जीएसएस को जब इस घटना की जानकारी मिली तो उनकी पहली चुनौती थी इन बच्चियों के पुनर्वास की और फिर उन्हें न्याय दिलाने की। जीएसएस के निदेशक शैलेंद्र पंड्या ने बताया, “जब उन्होंने दोनों बहनों से मुलाकात की तो वे गहन शोक और पीड़ा से गुजर रही थीं। ऐसे में हमारी पहली प्राथमिकता बच्चियों का मानसिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करने की थी। उनके पास ऐसा कुछ नहीं था जिसे वे घर कह सकें। इसलिए पहला काम उन्हें सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराने का था और इसका बीड़ा कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय ने उठाया। दोनों बहनें अब छात्रावास में रहते हुए पढ़ाई कर रही हैं। भयानक यंत्रणा से गुजरने के बावजूद दोनों बहनें अपने शोषकों को माफ करने के लिए तैयार नहीं थीं। वे अपना विवाह रद्द कराना चाहती थीं और इसके लिए जीएसएस की मदद से पिछले वर्ष सितंबर में अदालत में मामला दायर किया गया। कानूनी लड़ाई के बाद अब जाकर इन दोनों बहनों को न्याय मिला जब डीएलएसए ने उन्हें सवा लाख-सवा लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया।”
पंड्या ने आगे कहा, “राजस्थान के कुछ हिस्सों में बाल विवाह की दर राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है और खास तौर से अक्षय तृतीया के मौके पर यहां बड़ी संख्या में बच्चों के विवाह की प्रथा है। हालांकि इस वर्ष सरकार और नागरिक संगठन पूरी तरह चौकस हैं ताकि अब कोई राधा और मीना जैसी बच्चियों से उनका बचपन छीनने का अपराध नहीं कर सके।”
दोनों बच्चियों को अदालत में न्याय मिलने को बड़ी जीत बताते हुए बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के संयोजक रवि कांत ने कहा, “दुख की बात है कि हमारे देश में बाल विवाह की अभी भी एक तरह से सामाजिक स्वीकार्यता है। लेकिन हमारे गठबंधन के अभियान की वजह से लोग जागरूक हो रहे हैं और यह स्वीकार्यता धीरे-धीरे खत्म हो रही है। हमारे सभी 161 सहयोगी संगठन एक अभूतपूर्व, एकता, निश्चय और ऊर्जा के साथ बाल विवाह की सामाजिक बुराई के खिलाफ लड़ रहे हैं। मुआवजे का आदेश इन पीड़ित बच्चियों के लिए बहुत बड़ी जीत है और इसके लिए डीएलएसए प्रशंसा का हकदार है। बाल विवाह की पीड़ित बच्चियां अमूमन वेदना, यंत्रणा और अभावों में जीवन गुजारती हैं। इसलिए उनको राहत और पुनर्वास पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इस तरह के फैसले सुनिश्चित करते हैं कि बाल विवाह के नर्क में झोंक दी गई बच्चियों से जो कुछ भी छीना गया है, वह उन्हें न्याय, मुआवजे और पुनर्वास के रूप में वापस मिले। लेकिन लड़ाई यहीं खत्म नहीं होती। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इन बच्चियों को सभी सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाएं और उन्हें वह हर तरह की सहायता और लाभ मिलें जिसकी वे हकदार हैं।”
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