नीलेश देसाई को ‘जलमित्र पुरस्कार’ से सम्मानित: जल संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान

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29 दिसंबर 2024 को महाराष्ट्र विकास केंद्र द्वारा पुणे में आयोजित एक भव्य समारोह में जल संरक्षण और सामुदायिक जागरूकता के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए नीलेश देसाई को प्रतिष्ठित ‘जलमित्र पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। इस समारोह में राज्य के वरिष्ठ अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे।

नीलेश देसाई ने पिछले कई वर्षों से जल संकट से जूझ रहे समाज को समाधान देने के लिए अथक प्रयास किए हैं। उनकी संस्था ‘संपर्क’ ने सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से हजारों गांवों में जल संरक्षण के विभिन्न कार्यों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। उनके प्रयासों के केंद्र में सामूहिक जागरूकता और स्थायी समाधान का सिद्धांत रहा है।

जल संरक्षण के लिए सराहनीय कार्य

नीलेश देसाई ने अपने प्रयासों से झाबुआ जैसे बंजर और सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में जल प्रबंधन की नई मिसाल कायम की है। उनके नेतृत्व में तालाबों के पुनर्निर्माण, वर्षा जल संग्रहण और आधुनिक सिंचाई तकनीकों का उपयोग बढ़ाने जैसे कई महत्वपूर्ण कार्य किए गए। इन परियोजनाओं के माध्यम से न केवल पानी की समस्या को हल किया गया, बल्कि क्षेत्र में कृषि उत्पादन और लोगों की आजीविका में भी सुधार हुआ।
इस दौरान उन्होंने 2000 से अधिक गांवों में जल प्रबंधन की योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू किया। उनके प्रयासों ने समाज के हर वर्ग को प्रेरित किया है। ग्रामीणों, किसानों और महिलाओं को साथ लेकर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सामूहिक प्रयासों से जल संकट जैसी गंभीर समस्याओं का समाधान संभव है।

पुरस्कार वितरण समारोह

पुणे में आयोजित इस समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने शिरकत की। सभी ने नीलेश देसाई के प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इस मौके पर जल संरक्षण और पानी की अहमियत पर विशेष चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि जल संरक्षण केवल एक मुद्दा नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।
समारोह में नीलेश देसाई ने अपनी यात्रा और अपने कार्यों का श्रेय सामुदायिक सहयोग और टीम वर्क को दिया। उन्होंने कहा, “जल संरक्षण एक सामूहिक जिम्मेदारी है। जब समाज मिलकर काम करता है, तो किसी भी बड़ी चुनौती को पार किया जा सकता है।” उन्होंने युवा पीढ़ी को भी जल संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित किया।

सरकारी नीतियों में योगदान

संपर्क संस्था के काम की सफलता और नीलेश देसाई की लगन को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 2008 में “कृत्रिम भूजल संरक्षण सलाहकार समिति” का सदस्य नियुक्त किया। इस भूमिका में उन्होंने जल संरक्षण के लिए नीतिगत उपाय सुझाए और सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया। मध्य प्रदेश राज्य सरकार की जल नीति को प्रभावी बनाने में भी उनका योगदान अमूल्य रहा, जिससे जल संरक्षण योजनाओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित हुई
प्रेरणा और आंदोलन

नीलेश देसाई का योगदान जल संरक्षण के क्षेत्र में एक प्रेरणा है। उनके प्रयासों ने जल संकट से जूझ रहे समाज को न केवल राहत दी, बल्कि एक आंदोलन का रूप भी दिया। उनकी यह उपलब्धि उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो समाज और पर्यावरण के लिए सकारात्मक बदलाव लाने के इच्छुक हैं।

यह पुरस्कार नीलेश देसाई की प्रतिबद्धता, परिश्रम और समाज के प्रति समर्पण को मान्यता देता है। उनके प्रयासों ने यह साबित किया है कि जल संरक्षण एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। उनके जैसे व्यक्तित्व से समाज को यह सीख मिलती है कि बड़े बदलाव सामूहिक प्रयासों से ही संभव हैं।

जलमित्र पुरस्कार मिलने के बाद, नीलेश देसाई ने इसे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी और अधिक बढ़ाने का अवसर बताया। उनके कार्यों से प्रेरित होकर आने वाले समय में और अधिक लोग जल संरक्षण की दिशा में योगदान देंगे।

डॉ. आंबेडकर के नाम पर स्टंट कर रहे विरोधी दल

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संसद का शीतकालीन सत्र हंगामे के साथ समाप्त हो चुका है।अपनी आदत के अनुसार विपक्ष  विरोध के नाम पर सदन से भी  सियासी  चिंगारी निकालने का प्रयास कर रहा है। संसद के शीतकालीन सत्र में संविधान के 75 वर्ष पूर्ण  होने के अवसर पर  संविधान पर चर्चा का आयोजन किया  गया था जिसमें सत्तापक्ष और विपक्ष के नेताओं ने संविधान पर अपने- अपने विचार व्यक्त किये।
लोकसभा में  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने अपने संबोधन में संविधान, आरक्षण और डॉ. आंबेडकर पर कांग्रेस के विचारों को सप्रमाण सदन में रखा जिससे निरुत्तर हुई कांग्रेस ने राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह के संबोधन से 12 सेकेंड का एक टुकड़ा उठाकर उसे बाबा साहेब का अपमान बताते हुए गृहमंत्री के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। इस झूठे विमर्श को सच सिद्ध करने के प्रयास में पूरा विपक्ष कांग्रेस के नेतृत्व में एक बार फिर एकजुट हो रहा है।
यद्यपि दिल्ली विधानसभा चुनावों में आप और कांग्रेस आमने सामने हैं किन्तु आप के नेता भी गृहमंत्री की कथित टिप्पणी का वीडियो बनाकर गली- गली में घुमा रहे हैं कि शायद इसका लाभ विधान सभा चुनाव में मिल जाए । गृहमंत्री के विरुद्ध उसी प्रकार का वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा जैसा 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को आरक्षण विरोधी व संविधान विरोधी साबित करने के लिए किया गया था। अब हर एक दल व नेता डॉ. आंबेडकर को भगवान बनाकर अपनी डूबती हुई राजनीतिक नैया को पार लगाने का स्वप्न देखने लगा है। गृहमंत्री अमित शाह के भाषण के अगले दिन राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा दलितों के प्रति अपना प्रेम दिखाने के लिए संसद परिसर में नीली टी शर्ट और नीली साड़ी पहनकर नमूदार हुए। उप्र में समाजवादी पार्टी भी भला पीछे क्यों रहती उसने भी डॉ.आंबेडकर की तस्वीरों के साथ यूपी विधानसभा में जमकर हंगामा किया ओर सदन की कार्यवाही ठप करने का प्रयास किया।
गृहमंत्री के बयान के खिलाफ विपक्ष देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करने का प्रयास कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में बसपा नेत्री मायावती ने भी आक्रामक तेवर अपनाए हैं किन्तु वह सधे हुए बयान देकर  कांग्रेस, भाजपा और सपा तीनों ही दलों को नसीहत दे रही हैं। बसपा नेत्री मायावती कांग्रेस पर हमलावर हैं, उनका कहना है कि बाबा साहेब की उपेक्षा करने वाली और देशहित में उनके द्वारा किये गये संघर्ष को हमेशा आघात पहुंचाने वाली कांग्रेस पार्टी का बाबा साहेब के अपमान को लेकर उतावालापन विशुद्ध छलावा है। बहिन मायावती ने डॉ. आंबेडकर के प्रति प्रेम दर्शा रहे समाजवादियों की पोल भी खोलकर रख दी है, मायावती का मानना है कि आज सपाई बाबासाहेब के नाम पर पीडीए का पर्चा निकाल रहे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि सपा ने भी कभी भी डॉ. आंबेडकर का सम्मान नहीं किया था। समाजवादियों ने वास्तव में बाबा साहब सहित बहुजन समाज में जन्मे सभी महान संतों, गुरुओं, महापुरुषों के प्रति द्वेष के तहत नए जिले, नई संस्थाओं व जनहित योजनाओं तक के नाम बदल डाले थे। सपा सरकार में तो डॉ. आंबेडकर का नाम तक सही नहीं लिखा जाता था।
कांग्रेस पार्टी आज नीली टी शर्ट  व नीली साड़ी पहनकर इतराती हुई  घूम रही है और उसे लग रहा है कि उसे वह मुद्दा मिल गया है  जिससे उसकी वापसी की राह आसान हो जायेगी लेकिन कांग्रेस बहुत बड़े भ्रम में है। सभी जानते हैं यह वहीं कांग्रेस पार्टी है जिसने कभी भी डॉ. आंबेडकर का सम्मान नहीं किया और न ही  संविधान का कभी मान रखा ।आज कांग्रेस नीले कपड़े पहनकर दलित समाज को छलने के लिए निकल पड़ी है। अगर कांग्रेस पार्टी ने कभी भी डॉ. आंबेडकर का सम्मान किया होता तो आज उसकी यह दुर्गति न होती।
स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही कांग्रेस और डॉ. आंबेडकर के मध्य गहरे मतभेद उत्पन्न हो गये थे। कांग्रेस के साथ बाबासाहेब का प्रथम विवाद 1930 में गोलमेज कांफ्रेस के समय हुआ था। आंबेडकर अनुसूचित जाति के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र चाहते थे जबकि गांधी जी इसके विरोधी थे। गांधी जी ने आंबेडकर जी के खिलाफ आमरण अनशन तक किया था। 29 जनवरी 1932 को दूसरी गोलमेज सम्मेलन के बाद मुंबई में बाबा साहब ने कहा कि मुझे कांग्रेसी देशद्रोही कहते हैं, यानी आज जो बाबासाहब की  फोटो लेकर राजनीति कर रहे हैं,उस समय उन्हें गद्दार कहते थे। संविधान सभा में आंबेडकर जी के चयन का रास्ता भी नेहरू जी ने ही रोका था। हिंदू कोड बिल और सरकार की दलित विरोधी मानकिता के चलते आंबेडकर ने 1951 में नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा देते हुए लिखा, “संरक्षण की सबसे अधिक जरूरत अनुसूचित जाति को है पर नेहरू का सारा ध्यान सिर्फ मुसलमानों पर है। ध्यान देने योग्य बात  है कि आज भी  कांग्रेस पार्टी पूरी तरह मुस्लिम परस्त  है।
कांग्रेस स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी आंबेडकर जी का लगातार अपमान करती रही । बाबा साहब को 40 साल तक भारत रत्न के लिए इंतजार करना पड़ा जबकि कांग्रेस अपने ही परिवार को भारत रत्न देती रही। नई दिल्ली में गांधी नेहरू परिवार की पीढ़ियों के स्मारक बने हैं जबकि गांधी परिवार ने आंबेडकर जी का अंतिम संस्कार तक दिल्ली में नही होने दिया। कांग्रेस ने पग -पग पर डॉ. आंबेडकर के विचारों का धुर  विरोध किया और आज राहुल गांधी नीली टी शर्ट पहनकर उनके अपमान पर घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। वस्तुतः  कांग्रेस का आंबेडकर के प्रति प्रेम 2019 लोकसभा चुनाव में हारने के बाद से उमड़ा है।
गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस व विरोधी दलों के सभी आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वह सपने में भी डॉ.आंबेडकर का अपमान  नहीं कर सकते। संसद में चर्चा के दौरान यह तो सिद्ध हो गया है कि कांग्रेस ने न केवल जीते जी बाबा साहेब का लगातार अपमान किया वरन उनकी मृत्यु के बाद भी उनका मजाक उड़ाने का प्रयास किया। जब तक कांग्रेस सत्ता में रही बाबा साहेब का एक भी स्मारक नहीं बना जबकि जहां -जहां अन्य दलों की सरकारें आती गई वहां -वहां उनका स्मारक बनता चला गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने बाबासाहेब के जीवन से संबंधित पंचतीर्थ विकसित किये। जिसमें मध्य प्रदेश में महू, लंदन में डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मारक, नागपुर में दीक्षा भूमि, दिल्ली में राष्ट्रीय स्मारक और महाराष्ट्र के मुंबई में चैत्य भूमि का विकास किया। 19 नवंबर 2015 को पीएम मोदी ने डॉ. आंबेडकर के सम्मान में 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाने की घोषणा की। आज जो लोग संविधान की किताब हाथ में लेकर घूम रहे हैं यही लोग संविधान दिवस का विरोध व बहिष्कार करते रहे हैं।
कांग्रेस के नेतृत्व में आज संपूर्ण विपक्ष केवल वोटबैंक की राजनीति के कारण ही सदन में डॉ. आंबेडकर के अपमान का मुद्दा उछाल रहा है, क्योंकि देश में 20 करोड़ 13 लाख78 हजार 86 दलित हैं जो आबादी का 16.63 फीसदी है। दलितो की आबादी का ग्रामीण क्षेत्रों में 68.8 फीसदी और शहरी क्षेत्रों में 23.6 फीसदी है । इस आबादी को अपना वोट बैंक बनाने के लिए आतुर कांग्रेस अपने साथियों के साथ मिलकर रोज नए नए स्टंट कर रही है क्योंकिउसको लगता है कि अकेले मुस्लिम वोट बैंक से उसे सत्ता नहीं मिल सकती।

भारत में इंजीनियरिंग कॉलेजेस की संख्या अमेरिका से बहुत ज्यादा है, फिर नवाचार में हम पीछे क्यों?

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दिल्ली में एक आईआईटीयन राजनीतिज्ञ बन गया, दूसरा दिल्ली आईआईटीयन लेखक बन गया, जबकि कई अन्य प्रशिक्षित इंजीनियर नौकरशाही (ias) में शामिल हो गए हैं।
भारत के सिविल इंजीनियर एक ढंग का संरेखित फ्लाईओवर ट्रैक का निर्माण भी नहीं कर सकते, और मैकेनिकल इंजीनियर ऐसे पुलों को जोड़ते हैं जो उद्घाटन से पहले ही ढह जाते हैं। बहुत से प्रशिक्षित इंजीनियर राजनीति में शामिल होते हैं क्योंकि वे दबाव वाली इंजीनियरिंग परियोजनाओं या परिसरों में काम करने के लिए अयोग्य होते हैं।
निश्चित रूप से भारत की इंजीनियरिंग दुनिया में कुछ गड़बड़ है। वैश्विक मानकों के संबंध में इंजीनियरिंग शिक्षा, विनिर्माण, नवाचार, कौशल विकास और गुणवत्ता सामग्री की वर्तमान स्थिति न तो संतोषजनक है और न ही भविष्योन्मुखी।
एक एक्सपोर्टिंग कंपनी के मालिक के अनुसार, “इंजीनियरिंग शिक्षा के संदर्भ में, भारत ने हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति तो की है, लेकिन गुणवत्ता और रोजगार के मामले में वैश्विक मानकों को प्राप्त करने की दिशा में अभी भी काम करने की जरूरत है।  भारत को अपने इंजीनियरिंग विद्या को मजबूत करने और वैश्विक मानकों को पूरा करने वाले प्रोडक्ट्स और प्रक्रियाओं के विकास के लिए नवाचार और कौशल निखार पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।”
एक वरिष्ठ इंजीनियर जगन बेंजामिन कहते हैं “हमें अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए डिवाइसेज और उपकरणों का उत्पादन करने के लिए अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप सभी नई भर्तियों को प्रशिक्षित और तैयार करना पड़ता है क्योंकि जो इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स पढ़ाई के बाद रोजगार के लिए आते हैं, उनका व्यावहारिक ज्ञान सीमित होता है।”
हर साल लाखों इंजीनियरिंग स्नातक नौकरी के बाजार में प्रवेश करते हैं – 1.5 मिलियन से अधिक – कई को अपनी क्षमता को पहचानने वाले पदों को सुरक्षित करने के लिए कठिन संघर्ष  करना पड़ता है। दुर्भाग्य से, इनमें से ज़्यादातर स्नातक (IIT) से बाहर के संस्थानों से आते हैं, जिनमें अक्सर आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपेक्षित कठोर प्रशिक्षण और अभिनव मानसिकता का अभाव होता है।
देश भर में कुकुरमुत्तों से खुले निजी इंजीनियरिंग संस्थानों द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता में इस अंतर के परिणामस्वरूप एक ऐसा वर्क फोर्स बनता है जो अपनी भूमिकाओं की माँगों के लिए तैयार नहीं होता है, जिससे अक्सर यह धारणा बनती है कि भारतीय इंजीनियर मुख्य रूप से बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए “साइबर कुली” के रूप में काम करते हैं।
ये दयनीय स्तर प्रतिभा पूल को केवल सर्विस प्रोवाइडर, यानी सेवा प्रदाताओं तक सीमित कर देता है, जो कि उन अभिनव क्षमताओं को कमज़ोर कर देता है जिनका उपयोग इंजीनियरों को बेहतर प्रशिक्षण और शिक्षा मिलने पर किया जा सकता है। अवधारणाओं और व्यावहारिक अनुप्रयोगों के बीच की खाई को पाटने की अयोग्यता, विचारों को मूर्त उत्पादों (प्रोडक्ट्स) में बदलने में नाकाबिल बना देती है। देखा गया है कि जिन प्रोजेक्ट्स में रचनात्मकता और समस्या-समाधान की आवश्यकता होती है, वे हमारे इंजीनियरों के लिए पेचीदा और मुश्किल  कार्य बन जाते हैं।
भारत में इंजीनियरिंग का बुनियादी ढांचा भी इस कहानी में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अनुसंधान एवं विकास संस्थान अक्सर अपर्याप्त रूप से विकसित और कम वित्तपोषित होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सिद्धांत और व्यवहार के बीच एक भारी अंतर होता है। भारतीय इंजीनियरिंग कंपनियों द्वारा अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) पर अपेक्षाकृत कम खर्च करने के कई कारण हैं। बहुत सी फर्में अक्सर नवाचार की तुलना में लागत में कटौती और मूल्य प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता देती हैं। इन-हाउस नवाचारों को विकसित करने के बजाय, कंपनियां अक्सर तैयार प्रौद्योगिकियों का आयात करने पर निर्भर रहती हैं, जो आरएंडडी में निवेश करने की तुलना में तेज़ और अधिक लागत प्रभावी माना जाता है। भारतीय कंपनियां, विशेष रूप से परिवार के स्वामित्व वाली कंपनियां, अधिक जोखिम वाले उपक्रमों से बचती हैं, और सुरक्षित निवेश को प्राथमिकता देती हैं।
एक सलाहकार बताते हैं, “शेयरधारकों की अपेक्षाएँ और बाज़ार का दबाव अक्सर कंपनियों को तत्काल प्रॉफिट कमाने  के लिए प्रेरित करता है, जिससे दीर्घकालिक आरएंडडी व्यय के लिए बहुत कम जगह बचती है।”
इसके अलावा, भारत में अक्सर उद्योग और शिक्षा के बीच एक अलगाव भी देखा गया है, जो अत्याधुनिक, उद्योग-प्रासंगिक नवाचारों के विकास को सीमित करता है। महिला उद्यमी मुक्ता गुप्ता का कहना है कि वैश्विक समकक्षों के विपरीत, भारतीय कंपनियों ने ऐतिहासिक रूप से नए जोखिम भरे नवाचारों की जगह कम लागत और खर्च बचाउ तकनीकों को अपनाया है। आरोप ये भी है कि प्रॉफिट फटाफट कमाने की जुगाड में नकली, डुप्लीकेट प्रोडक्ट्स के निर्माण में इंजीनियरिंग कौशल खपाया जा रहा है। इसके विपरीत, जब भारतीय इंजीनियरों की तुलना उनके वैश्विक समकक्षों से की जाती है, जिन्हें पाठ्यपुस्तकों की सीमाओं से परे सोचने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, तो यह  अंतर  स्वत ही स्पष्ट हो जाता है।

ऐतिहासिक तीसरा कार्यकाल: प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की एक बार फिर जीत

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वर्ष 2024 के चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ऐतिहासिक तीसरी जीत ने न केवल उनकी व्यक्तिगत विरासत को मजबूत किया है, बल्कि भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रभुत्व को भी दर्शाया है।इससे यह पता चलता है किआज जहां प्रधानमंत्री मोदी भारत के लिए स्थिरता के प्रतीक बन गए हैं,वहीं भाजपा सुशासन का पर्याय बन कर उभरी है।

वर्ष 2024 के दौरान, वैश्विक स्तर पर प्रमुख लोकतंत्रों में एक ऐसी सत्ता विरोधी लहर चली, जिसमें सत्तारूढ़ दलों को जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा।संयुक्त राज्य अमेरिका में, डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस के दोनों सदनों की अध्यक्षता और नियंत्रण गवांदिया। यूनाइटेड किंगडम ने कंजरवेटिव पार्टी (टोरीज) को निर्णायक रूप से सत्ता से बाहर होते देखा।इसी तरह, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और पोलैंड में भी सत्तारूढ़ दल सत्ता से बेदखल हो गए। इस वैश्विक रूझान के उलट, भारत में नरेन्द्र मोदी ने न केवलसत्ताबनाए रखी बल्कि ऐतिहासिक तीसरा कार्यकाल भी हासिल किया। वर्ष 2014 और 2019 में उनकी स्पष्ट जीत के बाद, भारतीय मतदाताओं ने एक बार फिर मोदी के पक्ष में एक मजबूत जनादेश दियाजो अंतरराष्ट्रीय सत्ता विरोधी लहर की दृष्टि सेएक उल्लेखनीय अपवाद था।

वर्ष 2024 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की कुछ सबसे बड़ी जीतों का साक्षी बना। प्रधानमंत्री मोदी ने ऐतिहासिक तीसरा कार्यकाल हासिल किया।भारत के राजनैतिक इतिहास में यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है, क्योंकि 1962 के बादसे किसी अन्य नेता ने लगातार तीसरी बार जीत हासिल नहीं की है।

एक अस्थिर दुनिया में स्थिर नेतृत्व

वर्ष 2014 के बाद से, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत राजनीतिक स्थिरता का प्रतीक बन गया है। मोदी एक दशक से अधिक समय से सत्ता में बने हुए हैं।यह निरंतरता उल्लेखनीय है, खासकर उस अवधि के दौरान जब दुनिया के अन्य लोकतंत्रराजनीतिक उथल–पुथल से जूझ रहे हैं।

मोदी के कार्यकाल की विशेषता एक ऐसी सामंजस्यपूर्ण सरकार रही है जिसने आर्थिक, सामाजिक और विदेश नीति से जुड़ीउन दूरगामी पहलों को लागू किया है, जिससे भारत को एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने में मदद मिली है।

इसके उलट, संयुक्त राज्य अमेरिका कई नाटकीय राजनीतिक बदलावों का साक्षी बना है। वर्ष 2017 तक बराक ओबामा के राष्ट्रपति रहने के बाद, सत्ता की कमान डोनाल्ड ट्रम्प के हाथों में आई। ट्रम्प ने बिल्कुल अलग प्रकार की नीतियां औरअपेक्षाकृत अधिक अलगाववादी रुख  अपनाया। वर्ष 2021 में, जो बाइडेन ने बहुपक्षवाद और घरेलू निवेश पर जोर देते हुए ट्रम्प की कई प्रमुख नीतियों को उलट दिया।डोनाल्ड ट्रम्प की सत्ता में वापसी ने शासन में एक और बदलाव ला दिया है, जोगहरे पक्षपातपूर्ण विभाजन एवं नीतिगत अस्थिरता का परिचायक है।

यूनाइटेड किंगडम ने 2014 से उल्लेखनीय रूप से राजनीतिक अस्थिरता का सामना किया है।कंजरवेटिव पार्टी पार्टी के अधीन, नेतृत्व बार–बार बदलता रहा।ब्रेक्सिट के मुद्दे पर जनमत संग्रह के बाद डेविड कैमरन ने इस्तीफा दे दिया और उनकी जगहआईंथेरेसा मे ने भी इस्तीफा दे दिया।थेरेसा मे ब्रेक्सिट वार्ता से संबंधित परेशानियों से जूझ रही थीं।इसके बाद बोरिस जॉनसन ने सत्ता संभाली।उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान नेतृत्व किया, लेकिन अंततः घोटालों के बीच इस्तीफा दे दिया।लिजट्रस के संक्षिप्त एवं उथल–पुथल भरे कार्यकाल के बाद ऋषि सुनक आए।उन्होंने अर्थव्यवस्था और पार्टी में स्थिरतालाने का प्रयास किया।हाल ही में, लेबर पार्टी के कीर स्टार्मर प्रधानमंत्री बने हैंजिससे शासन में बदलाव आया है।हालांकि चुनौतियांअभी भी बनी हुई हैं, जिनमें पार्टी के भीतर आंतरिक असहमति और राजनीतिक संघर्ष से आशंकित मतदाता शामिल हैं।

ऑस्ट्रेलिया ने भी नेतृत्व में तेजी से बदलाव होते देखा है, जो इसकी ऐतिहासिक रूप से अस्थिर राजनीतिक संस्कृति को दर्शाता है। वर्ष 2014 में टोनी एबॉट से शुरू करके, प्रधानमंत्री का पद मैल्कम टर्नबुल औरफिर स्कॉट मॉरिसन से होते हुए अबएंथोनी अल्बानीज के जिम्मेआया है। प्रत्येक बदलावके साथ प्राथमिकताएंभी बदलीहैं।अपने पूर्ववर्तियों के  अधिक रूढ़िवादी दृष्टिकोण के बाद, अल्बानीज़ ने जलवायु कार्रवाई और सामाजिक नीतियों पर ध्यान केन्द्रित किया है।

इटली का राजनीतिक परिदृश्य भी उतना ही हलचल भर रहा है। वहां एक के बाद एक सरकारें अक्सर अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही गिर गईं। माटेओ रेन्ज़ी के सुधार–प्रेरित कार्यकाल के बाद पाओलो जेंटिलोनी आए।उसके बाद ग्यूसेप कोंटेकी गठबंधन सरकार आई और फिर तकनीक की ओर झुकाव रखनेवाला मारियो ड्रैगी का नेतृत्व आया। और अब जियोर्जिया मेलोनी, इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी हैं। मेलोनी की ऐतिहासिक जीत के बावजूद, इटली राजनीतिक विखंडनऔर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है।

पाकिस्तान, विशेष रूप से, राजनीतिक अस्थिरता का एक स्पष्ट उदाहरण है। वहां अक्सर भ्रष्टाचार और चुनावी धोखाधड़ी के आरोपोंके बीच बार–बार नेतृत्व परिवर्तन होतेरहेहैं। वर्ष 2014 के बाद से, देश ने नवाज शरीफ से लेकर शाहिद खाकनअब्बासी, उसके बाद इमरान खान और अब शहबाज शरीफ तक का बदलाव देखा है। प्रत्येक नेता का कार्यकाल अपने पूर्ववर्तियों के साथ विवादास्पद संबंधों के कारण चर्चित रहा है, जिसकी परिणति अक्सर कानूनी लड़ाई और कारावास में हुई है।इस अस्थिर राजनीतिक माहौल ने टिकाऊ शासन एवं आर्थिक प्रगति हासिल करने कीपाकिस्तान की क्षमता को कुंद कर दिया है।

इज़राइल ने विशेष रूप से अपनी खंडित गठबंधन प्रणाली के कारण व्यापक राजनीतिक उथल–पुथल का अनुभव किया है। वर्ष 2014 के बाद से, देश ने बेंजामिन नेतन्याहू को नेफ्ताली बेनेट के हाथों सत्ता गंवाते देखा है। इसके बाद येर लापिड कासंक्षिप्त कार्यकाल रहा।लापिड के बाद नेतन्याहू प्रधानमंत्री के रूप में एक फिर वापस लौटे।

वर्ष 2014 के बाद से, इज़राइल में देश की संसद, नेसेट के लिए छह राष्ट्रीय चुनाव कराए गए हैं। ये चुनाव 2015, अप्रैल 2019, सितंबर 2019, 2020, 2021 और 2022 में हुए।

जापान जहां अपेक्षाकृत अधिक राजनीतिक स्थिरता के लिए जाना जाता है,  लेकिन हाल के वर्षों में हुए नेतृत्व परिवर्तनों ने लोगों को हैरान किया है। शिंजो आबे, जिन्होंने 2020 तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया, ने स्वास्थ्य कारणों से अप्रत्याशितरूप से इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह योशीहिदे सुगा ने ली, जिन्होंने केवल एक साल के बाद ही पद छोड़ दियाऔर फुमियो किशिदा घनघोर अनिश्चितता के बीच केवल तीन वर्षोंतक प्रधानमंत्री रहे और अब शिगेरु इशिबा ने उनकी जगह ली है।

वर्ष 2014 के बाद से, ब्राज़ील को आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार घोटालों और ध्रुवीकृत चुनावों से प्रेरित राजनीतिक उथल–पुथल का सामना करना पड़ा है। वर्ष 2016 में डिल्मा रूसेफ पर महाभियोग लगाया गया, जिससे मिशेल टेमर के लिए रास्ता साफहुआ।मिशेल टेमर का कार्यकालकाफी विवादास्पद रहा। इसके बाद जेयर बोल्सोनारो धुर दक्षिणपंथी लोकलुभावन रुख अपनाते हुए सत्ता में आए। हाल ही में, लुइजइनासियो लूला दा सिल्वा ध्रुवीकरण वाले चुनाव के बाद सत्ता में लौटे हैं।

दक्षिण कोरिया में, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच पार्क ग्यून–हे के विरूद्ध 2017 में महाभियोगलगाया गया। उनके उत्तराधिकारी, मून जे–इन, आर्थिक चुनौतियों और राजनयिक तनावों से जूझते रहे। यून सुक–योल वर्तमान राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने हाल ही में मार्शल लॉ लागू करने का असफल प्रयास किया और दक्षिण कोरिया की संसद द्वारा उनके विरुद्ध महाभियोग चलाने की प्रक्रिया चल रही है।

वर्ष 2014 के बाद से अर्जेंटीना में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिले हैं, जिसमें नेतृत्व क्रिस्टीना फर्नांडीज डी किरचनर से मौरिसियो मैक्री और उसके बाद अल्बर्टो फर्नांडीज तथा अब जेवियर माइली के हाथों में पहुंचा है। प्रत्येक नेता ने स्पष्ट रूप सेअलग–अलग आर्थिक और सामाजिक नीतियों को अपनाया है, जो अनिश्चितता भरे माहौल और राजनीतिक समीकरणों में बार–बार बदलाव को जन्म दे रहा है।

भारतीय आम चुनाव 2024 को क्यों ऐतिहासिक है?

● वर्ष 2024 के चुनाव ने भारत को एक ऐसे सुदृढ़ लोकतंत्र के रूप में प्रदर्शित किया है, जिसमें मतदाताओं की मजबूत सहभागिता और नागरिकों केउत्कृष्ट आचरण का समावेश रहाहै। 

● ईवीएम पर लगाये गए स्वार्थ–प्रेरित लांछनों और भीषण गर्मी के बावजूद, लोगों ने बड़ी संख्या में मतदान करके काफी उत्साह दिखाया। पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक, सभी उम्र के लोगों और जीवन के सभीक्षेत्रों से जुड़े लोगों ने बड़े उत्साह के साथ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लिया है।

● कश्मीर में 1996 के बाद से पिछले तीनदशकों में पहली बार सबसे अधिक 38 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान में भागीदारी दर्ज कराई।

● भारतीय राजनीति में अधिक समावेशिता देखी गई क्योंकि अधिक संख्या में महिलाओं ने चुनाव लड़ा और जीता, जिससे लैंगिक प्रतिनिधित्व बेहतर हुआ। युवाओं की भागीदारी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे देश के राजनीतिक परिदृश्य में नएदृष्टिकोण का समावेश हुआ।

 

● 2024 के चुनावों ने भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता को प्रदर्शित किया और इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे नागरिक अपनी प्राथमिकताओं एवं अपने नेताओं से अपेक्षाओं को लेकर तेजी से जागरूक हो रहे हैं। लोग 2047 तक विकसित भारतबनाने के सपने के पीछे मजबूती से खड़े रहे।

● पहली बार अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सबसे बड़े समूह ने इस वर्ष भारत के आम चुनावों का प्रत्यक्ष अनुभव किया। उन्होंने जो देखा उससे वे प्रभावित हुए। कुछ लोगों ने प्रक्रिया की पारदर्शिता की प्रशंसा की, जबकि अन्य ने चुनाव आयोग की हरितमतदान केन्द्रों जैसी पहल को वास्तव में प्रेरणादायक पाया। ईवीएम–वीवीपीएटी के प्रतिचयन (रैंडमाईजेशन) जैसी प्रौद्योगिकी के उपयोग को भी काफी सराहना मिली।

● यह जनादेश विकास, विविधता और निर्णयशीलता के पक्ष में था। जनता ने छल, कपट और विभाजन की राजनीति को सिरे से नकार दिया।

● भारत ने दर्शाया कि वह एक परिपक्व लोकतंत्र है और प्रधानमंत्री मोदी को उन चुनिंदा वैश्विक नेताओं के समूह में रखा जिन्होंने सफलतापूर्वक लगातार तीन कार्यकाल हासिल किए हैं।

इसके अलावा, 2024 में राज्य–स्तरीय सफलताओं से यह भी पता चलता है कि वे 2014 में शुरू हुए भारत के राजनीतिक परिदृश्य में व्यापक बदलाव का हिस्सा हैं। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, भाजपा ने अपने प्रभाव का विस्तार किया है। इससेओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्रजैसे क्षेत्रों में सामंजस्यपूर्ण शासन आया है। ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जहां अतीत में भाजपा को अपनी पकड़ बनाने के लिए जूझना पड़ा था।

आइए, वर्ष 2024 में भाजपा की कुछ निर्णायक जीतों और इन्हें असाधारण बनाने वाले पहलुओं पर एक नजर डालें:

भगवान जगन्नाथ के ओडिशा में भगवा

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, भाजपा ने ओडिशा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल (बीजेडी) को हराकर ऐतिहासिक जीत हासिल की। ओडिशा के इतिहास में पहली बार, बीजेडी ने लोकसभा चुनावों में अपना प्रभुत्व खो दिया है, भाजपा की सीटें केवलएकसे बढ़कर छह हो गई हैं। यह 2019 की तुलना में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, जहां बीजेडी ने 12 सीटें और भाजपा ने 8 सीटें जीती थीं। लोकसभा चुनावों में अपनी सफलता के अलावा, भाजपा ने ओडिशा विधानसभा चुनावों में भी महत्वपूर्णप्रगति की। पार्टी ने 14 सीटें जीतीं और 66 अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में आगे रही।

आंध्र प्रदेश ने निर्णायक रूप से एनडीए को चुना

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में, आंध्र प्रदेश की मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक पहचान के बावजूद, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने महत्वपूर्ण प्रगति की और 25 संसदीय क्षेत्रों में से 20 पर बढ़त हासिल की। यह उल्लेखनीय उपलब्धि एनडीए केदृष्टिकोण एवं नीतियों के प्रति बढ़ते समर्थन को दर्शाती है। इस सफलता में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिकारही। बुनियादी ढांचे के विकास, आर्थिक सुधार और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर उनका ध्यान राज्य के मतदाताओं कोपसंद आया।

हरियाणा भाजपा के लिए सुखद आश्चर्य

वर्ष 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे भारतीय जनता पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हुए। पार्टी ने ऐतिहासिक रूप से लगातार तीसरी कार्यकाल हासिल किया। भाजपा यह हैट्रिक हासिल करने वाली हरियाणा की पहलीराजनीतिक पार्टी बन गई है, जो राज्य में उसके बढ़ते प्रभाव और पकड़ का प्रमाण है।

कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के कड़े विरोध के बावजूद, भाजपा 48 सीटें हासिल करके सीधे मुकाबले में कांग्रेस को प्रभावी ढंग से हराने में कामयाब रही।अपने सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद, विपक्ष पैमाने और गति के मामले में भाजपा की बराबरीनहीं कर सका।

महाराष्ट्र की प्रचंड जीत ने विपक्षी एजेंडे को समाप्त कर दिया

एक ऐतिहासिक जीत के रूप में, भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र में अपना लगातार तीसरा कार्यकाल हासिल किया।यह पहली बार है कि किसी नेता ने राज्य में इस तरह की जीत दिलाई है। भाजपा ने राकांपा सहित अपने सहयोगियों के साथ 131 सेअधिक सीटें जीतीं, जबकि विपक्षी महाविकास अघाड़ी (एमवीए) सिर्फ 51 सीटों पर सिमटकर रह गई।  सत्तारूढ़ गठबंधन ने 230 से अधिक सीटों पर बढ़त हासिल की, जो प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में लोगों के मजबूत भरोसे को दर्शाता है। कुल 288 में से 132 सीटों के साथ, भाजपा ने 45 प्रतिशतसीटें हासिल करते हुए राज्य में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। यह जीत महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में किसी भी पार्टी द्वारासीटों के मामले में सबसे बड़ी उपलब्धि का प्रतीक है। इसनेभाजपा के प्रभुत्व को मजबूत किया और राज्य में विपक्ष के एजेंडे को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया।

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