ईवीएम के जानकारों से विनम्र अनुरोध

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रंगनाथ

मुझे अपने विद्वान मित्रों से शिकायत है कि वे ईवीएम का इस्तेमाल ट्रम्प कार्ड की तरह करते हैं। वो चुनाव से पहले कुछ भी दावा करते रहते हैं, सही निकले तो जय लोकतंत्र जय संविधान और हार गये तो ईवीएम ईवीएम करने लगते हैं। ये चीटिंग है

मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि फिलहाल ईवीएम का क्या स्टेटस है? तीन चरण हो चुके हैं। सभी ईवीएम-वादी मित्रों से अनुरोध है कि अभी से स्पष्ट कर दें कि ईवीएम हैक हुई या नहीं! मैं मानता हूँ कि ईवीएम से चुनाव बैलट से काफी बेहतर हैं। पिछले 10 साल में ईवीएम को पहले से बेहतर बनाया जाता रहा है। अदालत ने भी उसमें कुछ सेफ्टी फीचर एड करवाए हैं। याद रखें कि ईवीएम कैलकुलेटर की तरह है न कि लोकल एरिया नेटवर्क या इंटरनेट से जुड़े कम्प्यूटर की तरह जिसे हैक किया जा सके।

पिछले 20 साल में मैंने किसी भी दल की विजय के बाद ईवीएम को उसका श्रेय नहीं दिया लेकिन मुझे अपने विद्वान मित्रों से शिकायत है कि वे ईवीएम का इस्तेमाल ट्रम्प कार्ड की तरह करते हैं। वो चुनाव से पहले कुछ भी दावा करते रहते हैं, सही निकले तो जय लोकतंत्र जय संविधान और हार गये तो ईवीएम ईवीएम करने लगते हैं। ये चीटिंग है।

यह तो वही मध्ययुगीन बात हो गयी कि युद्ध जीत गये तो बोले यह गॉड कृपा की वजह से हुआ है, और हार गये तो बोले कि गॉड हमको सबक देना चाहते थे! जिस तरह युद्ध में गॉड की कोई भूमिका नहीं होती, बल्कि वह रणनीतिक कुशलता, अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र, सैन्य बल की संख्या इत्यादि के आधार पर जीता जाता है, उसी तरह चुनाव में भी ईवीएम निमित्त मात्र है।

बैलट पेपर छीनकर मुहर मारना आसान है, बैलट बॉक्स में पानी भर देना उससे भी आसान है और महान सामाजिक न्यायवादी नेता ने इस कुकृत्य को कला के स्तर पर ले जाकर दिखाया था और आज भी जिन इलाकों में भारत जैसी ‘तानाशाही’ नहीं आयी है, वहाँ बैलेट से हुए चुनाव (जैसे हमारा पड़ोसी देश) का हाल पूरी दुनिया ने वायरल वीडियो के माध्यम से देखा। यह भी याद रखें कि दुनिया के किसी अन्य देश में करीब 100 करोड़ मतदाता नहीं हैं।

नेता हमेशा अपने और अपने पार्टी के हित के हिसाब से बोलते हैं। वे चुनाव नहीं जीतेंगे तो अच्छा या बुरा कुछ भी करने के लिए नहीं बचेंगे। इसलिए उनकी अतिरेकी बयानबाजियों की अनदेखी की जा सकती है लेकिन पत्रकार, अध्यापक, वकील इत्यादि बुद्धिजीवी ईवीएम विरोधी प्रोपगैंडा क्यों फैलाते रहते हैं!

हमारे देश के एकमात्र कट्टर ईमानदार वकील अपनी सनक को लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गये और उनकी शंकालु प्रवृत्ति को लेकर कुछ राहत दी गयी लेकिन उन्हें यह भी साफ कर दिया गया कि शक की दवा हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी, तो आप कृपया अदालत पर रहम करें।

दुनिया का हर तरह का धोखा भरोसे हासिल करने के बाद ही दिया जाता है। कुछ महान समाजसेवियों का यही हाल हो चुका है। वह किसी वाजिब मामल में अर्जित प्रतिष्ठा का इस्तेमाल अपनी अन्य तरह की सनक पूरी करने में लगाते हैं।

इस वर्ग ने ईवीएम को लेकर इतना दुष्प्रचार कर दिया है कि इस पोस्ट के नीचे भी कुछ लोग यह जरूर लिखेंगे कि तुम तो चाहते ही हो कि ईवीएम से चुनाव होता रहे! खैर, सामान्य मतदाताओं की ऐसी बातों का मैं बुरा नहीं मानता लेकिन जो लोग जिम्मेदार पेशों में हैं, उन्हें गैर-जिम्मेदार लोगों की तरह बात करने से बचना चाहिए।

ईवीएम से धांधली तभी हो सकती है, जब पोलिंग कराने वाली सरकारी टीम धांधली पर उतर आये। इंसान के चरित्र की गारंटी नहीं ली जा सकती, मशीन की ली जा सकती है। अच्छी बात यह है कि बाहरी धांधली रोकने के मामले में ईवीएम बैलट से बेहतर है। याद रखें कि मनुष्य जनित धांधली की कोई सीमा नहीं है। कल-परसों ही पश्चिमी यूपी के एक बूथ का वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक 15-16 की बच्ची किसी 50 साल की महिला के नाम पर वोट देने पहुंची थी। पोलिंग एजेंट के पूछने पर बच्ची ने कहा कि वह 12 में पढ़ती है!

ऐसा नहीं है कि कोई ईवीएम मशीन मैलफंक्शन नहीं करती या खराब नहीं होती। मुझे ऐसी कोई मशीन पता नहीं है, जो खराब नहीं होती। सबसे इलीट प्रोडक्ट बनाने वाले एप्पल जी के कुछ प्रोडक्ट का मेरा निजी अनुभव काफी खराब रहा है। भारत में इस समय अपवाद को सामान्य नियम बताने वालों की फौज खड़ी हो चुकी है। दो-चार मशीन खराब हैं तो सारी की सारी खराब हैं! एक व्यक्ति मर्द को किसी औरत ने पीट दिया तो भारत के सारे मर्द औरतों द्वारा पीटे जा रहे हैं!

औसतन 100 में 10 मशीन खराब निकले तो समझ में आता है कि यह चिन्ता की बात है कि 10 प्रतिशत मशीनें खराब निकल रही हैं, तो उनके प्रोडक्शन में सुधार की जरूरत है। मशीन का खराब निकलना प्रोडक्शन की समस्या है न कि टेक्नोलॉजी की। एप्पल का आईपैड या लैपटॉप इसलिए खराब नहीं निकलते कि उनकी टेक्निक में कोई समस्या है, बल्कि कुछ प्रोडक्ट का प्रोडक्शन मानकों के अनुरूप नहीं हो पाता।

यह भी याद रखें कि गॉड आलमाइटी के बनाए इंसान में इतनी खामियाँ हैं तो फिर उस इंसान की बनायी कोई चीज 100% परफेक्ट कैसे हो सकती है। ऐसे में सवाल ये है कि किसकी गुणवत्ता बेहतर है। मेरी राय में ईवीएम बेहतर है। सबकुछ सही रहा तो भारत ईवीएम निर्यातक देश बनेगा। कागज बचाकर पर्यावरण बचाना है या नहीं!

राधिका खेड़ा का अपमान और कांग्रेस की राम विरोधी राजनीति

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आचार्य विष्णु हरि

राधिका खेडा कांग्रेस की कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं थी, वह तो कांग्रेस की शीर्ष नेता रही है, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की रणनीतिक टीम में शामिल थी, साथ ही साथ कांग्रेस की राष्टीय प्रवक्ता थी, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उसने अपने जीवन का कोई एक-दो साल नहीं बल्कि पूरे 22 साल कांग्रेस को दिया था

सनातन विरोध की परिधि में कांग्रेस के अंदर अपमानित होने वाली राधिका खेडा अकेली नहीं है, शाब्दिक छेड़खानी की शिकार होकर कांग्रेस से इस्तीफा देने वाली भी राधिका अकेली नहीं है। याद कीजिये प्रियंका दूबे को। राधिका की तरह प्रियंका दूबे भी कांग्रेस की राष्टीय प्रवक्ता थी। उत्तर प्रदेश के मथुरा में कांग्रेसियों ने प्रियंका दूबे के साथ शारीरिक छेड़खानी हुई थी, शिकायत के बावजूद भी छेडखानी करने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को सजा नहीं मिली। प्रियंका दूबे ने कांग्रेस छोडी थी। अभी प्रियंका दूबे शिवसेना की नेता हैं। आचार्य प्रमोद कृष्णन ने सनातन विरोधी राजनीति की बढती करतूत के विरोध में बयानबाजी कर कांग्रेस छोडी थी। इसी कडी में तत्कालीन कांग्रेस प्रवक्ता रोहन गुप्ता और अन्यों का नाम भी शामिल है।

राधिका खेडा कांग्रेस की कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं थी, वह तो कांग्रेस की शीर्ष नेता रही है, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की रणनीतिक टीम में शामिल थी, साथ ही साथ कांग्रेस की राष्टीय प्रवक्ता थी, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उसने अपने जीवन का कोई एक-दो साल नहीं बल्कि पूरे 22 साल कांग्रेस को दिया था, यानी की अपने जीवन की एक चैथाई हिस्सा कांग्रेस के लिए बलिदान कर दिया था। इतने बडे, समर्पित और अनुभवी नेता के साथ धर्म पर आधारित अपमान और पीडा के साथ ही साथ लगातार फब्तियां और शाब्दिक छेड़खानियों का शिकार बना कर रखना बहुत ही पीडा दायक, निंदनीय और अमानवीय है। कई प्रश्न खडे हो जाते हैं। सबसे बडा प्रश्न धार्मिक आजादी का है। किसी महिला या अन्य लैंगिक व्यक्ति की धार्मिक आजादी कोई पार्टी तय नहीं कर सकती है, धार्मिक आजादी को कोई पार्टी अपनी नीति और कार्यक्रम की परिधि में कैद नहीं कर सकती है। फिर राधिका खेडा की धार्मिक आजादी को कैद करने का अधिकार कांग्रेस के नेताओं को कैसे हो सकता है? राधिका खेडा ही क्यों बल्कि हर संवेदनशील व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार किसी धर्म को मान सकता है, उस धर्म के प्रतीकों के प्रति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्मान दर्शा सकता है। यही काम राधिका खेडा ने किया था। पर कांग्र्रेस के भगवान राम विरोधी और सनातन विरोधी नेताओं को यह स्वीकार नहीं हुआ और वे राधिका खेडा का मजाक उड़ाते रहे और पार्टी कार्यालयों से गेट आउट कह कर भगाया जाने लगा। यह प्रक्रिया लगातार जारी रही। आखिर धीरज का बांध तो टूटना ही था। जब राधिका खेडा के धीरज का बांध टूटा तब कांग्रेस न केवल बेपर्द हो गयी बल्कि यह भी प्रमाणित हो गया कि कांग्रेस अभी भी नहीं चैती है और उसकी घृणा वैसी ही जारी है जैसी कि यूपीए वन और यूपीए टू के दौर में हुआ करती थी। पर ऐसी घटनाओं को लेकर कांग्रेस पार्टी के अंदर न्याय की उम्मीद थी। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की चुप्पी तक नहीं टूटी है। लडकी हूं, लड सकती हूं, कहने वाली प्रियंका गांधी की भी खामोशी बहुत कुछ कहती है।

अब हम यहां विचार करते हैं कि राधिका खेडा का अपराध क्या था? उसका अपराध सिर्फ इतना भर ही था कि उसनें भगवान राम के प्रति आस्था दिखायी थी, सम्मान दिखाया था और दर्शन की थी। राधिका भगवान राम के दर्शन के लिए अयोध्या गयी थी। भगवान राम के दर्शन के बाद राधिका ने गर्व की अनुभूति की थी और कहा था कि दर्शन मात्र से उनकी जिंदगी धन्य हो गयी है, मानवीय संवेदनाएं उनके अंदर समृद्ध हुई हैं, क्योंकि भगवान राम मानवीय संवेदना के प्रतीक है, अनुकरणीय है। भगवान राम के प्रति राधिका की यह अनुभूति सोशल मीडिया पर खूब चर्चित हुई थी और सनातन विरोधियों ने इसकी खूब आलोचना की थी। खासकर जिहादियों ने सोशल मीडिया पर राधिका के प्रति खूब शाब्दिक अपमान किये थे और उन्हें दंगाई की पदवि भी दिया गया था। इतना ही नहीं बल्कि राधिका को मुस्लिम विरोधी भी साबित करने की कोशिश की गयी थी। लेकिन राधिका ने स्वयं को सिर्फ भगवान राम के दर्शन की परिधि में ही रखा था। राधिका का एक भी ऐसा बयान नहीं है, राधिका का एक भी ऐसा काम नहीं है, राधिका की एक भी ऐसी सक्रियता नहीं है जिससे यह लगे कि वह मुस्लिम विरोधी हैं या फिर दंगाई है। कांग्रेस में रहते हुए राधिका ने हमेशा कांग्रेस की कथित धर्मनिरपेक्षता का पालन किया था और भाजपा की तथ्यपरख आलोचना करने से भी कभी भी पीछे नहीं रही थी। सबसे बडी बात यह भी है कि कांग्रेस ने ऐसी कोई लक्ष्मण रेखा भी नहीं खींची थी कि राधिका खेडी जैसी कोई कांग्रेसी हस्तियां अयोध्या में भगवान राम का दर्शन करने न जायें?

वास्तव में कांग्रेस की हिडेन एजेंडा दोषी है। कांग्रेस का हिडेन एजेंडा क्या है? कांग्रेस का हिडेन एजेंडा हिन्दुत्व विरोध है, भगवान राम के प्रति अपमान और घृणा प्रदर्शित करना है। विश्व हिन्दू परिषद ने कांग्रेस के इतिहास को देखते हुए भी भगवान राम की मूर्ति स्थापना के समय कांग्रेस को आमंत्रित किया था, सोनिया गांधी और राहुल गांधी, प्रियंका गांधी ही नहीं बल्कि कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे को भी आमंत्रण भेजा था। लेकिन कांग्रेस ने राममंदिर मूर्ति स्थापना समारोह में जाने से इनकार कर दिया था। एक तरह से कांग्रेस का यह बहिष्कार ही था। कांग्रेस का कहना था कि इसका श्रेय नरेन्द्र मोदी और संघ के लोग क्यों ले रहे हैं, संघ और मोदी ने भगवान राम का चुनावी हथकंडा बना दिया। कांग्रेस की यह अवधारणा काफी झृणित थी और भगवान राम के प्रति अनादर भी था। संघ और मोदी को श्रेय तो जाता ही है। मोदी और संघ का राममंदिर आंदोलन कौन नहीं जानता है? कांग्रेस तो राममंदिर के विरोध में खडी थी। राममंदिर पर फैसला नहीं आये इसके लिए कांग्रेस ने कपिल सिब्बल सहित दर्जनों वकीलों को अप्रत्यक्ष तौर खडी कर रखी थी। कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद श्रीराम मंदिर की मूर्ति स्थापना शानदार और जींवत रूप से साकार हुआ, भगवान राम की मूर्ति स्थापना की परिधि में भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का डंका पूरे विश्व में बजा। दुनिया से करोडों लोग भगवान राम के दर्शन के लिए अयोध्या पहुंच रहे हैं। राधिका खेडा भी इसी परिधि में भगवान राम के दर्शन के लिए अयोध्या गयी थी।

राधिका के अपमान में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व दोषी है क्या? यह कहना मुश्किल है कि राधिका के अपमान में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व दोषी है। सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, राहुल गांधी या फिर मल्लिकार्जुन खडगे की कोई प्रत्यक्ष भूमिका शायद न हों। पर इस बात को हम इनकार नहीं कर सकते हैं कि केन्दी्रय नेतृत्व की उदासीनता और अप्रत्यक्ष समर्थन के बिना कांग्रेस के नेता इतने घृणित कार्य कैसे कर सकते हैं, इतने अमानवीय कार्य कैसे कर सकते हैं, एक संवेदनशील महिला को इस तरह से लगातार कैसे अपमानित कर सकते हैं? कांग्रेस के अंदर में सनातन विरोधी धाराएं बहती ही रहती है, कांग्रेस के उपर अभी कांग्रेस विरोधी शक्तियों का कब्जा हो गया है। ये शक्तियां मजहबी हैं और वामपंथी हैं। मजहबी और वामपंथी शक्तियां कांग्रेस की जडों में मठ्ठा डाल रही हैं, कांग्रेस को बेमौत मरने के लिए गढ्ढे खोद रही है। यही कारण है कि सनातन के पक्ष में बोलने से रोका जाता है, सनातन का पक्ष लेने पर दंगाई कह कर अपमानित किया जाता है। कभी कांग्रेस के लिए फायर ब्राॅड और हाई ब्रिड धार्मिक नेता आचार्य प्रमोद कृष्णन ने साफतौर पर कहा था कि कांग्रेस पर मुस्लिम समर्थकों और कम्युनिस्टों का कब्जा हो गया है ये कांग्रेस को सनातन से दूर ले जा रहे हैं। उन्हें भी कांग्रेस से बाहर जाने के लिए बाध्य किया गया। रोहन गुप्ता को भी इतना प्रताडित किया गया वह लोकसभा चुनाव का टिकट मिलने के बाद भी चुनाव लडने से इनकार कर दिया और साफतौर पर बयान दिया कि वे सनातन विरोधी राजनीति के लिए कांग्रेस का हथकंडा नहीं बन सकते है। किसी भी परिस्थिति में राधिका को अपमान का शिकार बनाने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और नेताओं को संरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए, ऐसे वर्ग के घृणित नेताओं को कांग्रेस अगर बाहर करती तो अच्छा था।

लख-लख बधाइयां प्रोफेसर संजय द्विवेदी !!

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अपनी पत्रकारीय मेधा और वैचारिक-दृष्टि के कारण  वर्षों तक सक्रिय पत्रकारिता में चमकने वाले मीडिया गुरु डॉ. संजय द्विवेदी को अब एक और महत्वपूर्ण दायित्व मिला है, जिसने मेरे जैसे अनेक लोगों को प्रसन्नता से भर दिया है । वेब पत्रकारों की सबसे बड़ी संस्था वेब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की स्वनियामक इकाई WJSA का अभी पुनर्गठन हुआ और प्रोफेसर (डा.) संजय द्विवेदी को इसका चेयरमैन बनाया गया है।
 प्रोफेसर द्विवेदी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के पूर्व कुलपति हैं। इसके अलावा वे सूचना प्रसारण मंत्रालय,भारत सरकार के अधीन संचालित भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC), नयी दिल्ली के महानिदेशक (डायरेक्टर जनरल) भी रहे हैं। आप दैनिक भास्कर, स्वदेश, नवभारत और हरिभूमि के संपादक भी रहे। आपने मीडिया और सामाजिक संदर्भों पर 32 पुस्तकें लिखी हैं। डॉ. संजय द्विवेदी के जीवन में संघर्ष भी काफी रहा। लेकिन  संघर्षों को हँसते हुए, पूरी हिम्मत के साथ पार करने की कला में माहिर होने के कारण सफलता इनके निरंतर कदम चूमती रही।  इनकी पत्रिका ‘मीडिया विमर्श ‘ ने मीडिया-जगत में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया है।  इस पत्रिका के माध्यम से वे देश की किसी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका को अपने दादाजी पंडित बृजलाल द्विवेदी के नाम से सम्मान भी प्रदान करते हैं । समसामयिक विषयों पर चिंतनपरक लेखन करना डॉक्टर द्विवेदी की पहचान है।
मुझे विश्वास है अपने नए दायित्व को भी ये कुशलता पूर्वक निभाएंगे और इस संस्था को भी चमका देंगे।  बधाई और अनन्त शुभकामनाएं!

उदारवादियों की चुनिंदा संवेदनशीलता

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लोकतंत्र बचाने की बात हो या फिर संविधान बदलने की। यह सारी बातें पिछले चुनाव में भी की जा रही थी। मोदी आएगा तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। संविधान बदल देंगे। चुनाव खत्म कर देंगे। पांच साल निकल गए। अब फिर वही अभियान फिर एक बार। लिंचिंग को बड़ा मुद्दा बनाया गया था उन दिनों। कांग्रेस पोषित पत्रकारों, उदारवादियों, प्रगतिशीलों और निष्पक्षों की चुनिंदा संवेदनशीलता को आइए समझते हैं। पांच साल पहले 2019 में मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं का हवाला देकर  कला, चिकित्सा, शिक्षा जगत की 49 हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है।  पत्र में देश में भीड़ द्वारा लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। पीएम मोदी को लिखे लेटर में मणिरत्नम, अदूर गोपालकृष्णन, रामचंद्र गुहा, अनुराग कश्यप जैसी हस्तियों के हस्ताक्षर हैं. उन्होंने पीएम मोदी से एक ऐसा भारत बनाने की मांग की है, जहां असहमति को कुचला नहीं जाए।

फिर जागे लिबरल : ऐसा  क्यों कर रहें है तथाकथित लिबरल ?

  • कांग्रेस समर्थक वुद्धजीवीयों का एक वर्ग बीजेपी पर हिंदू बहुसंख्यकों की पार्टी का तमगा चस्पा  पहले से ही किये हैं
  • ये लोग  बीजेपी की बढ़ती ताकत को अपने विचारधारार और राजनैतिक सोच के खिलाफ मानते है ।
  • बीजेपी को देश के सेक्यलर ताने बाने के खिलाफ  दिखाने के लिए ये वर्ग भी  भी चुन- चुन कर उन्ही घटनाओं को देश- विदेश में उठाता है जिससे बीजेपी और पीएम मोदी कटघरे में खड़ा किये जा सकें

मॉबलिंचिंग ऐसी ही घटनाओं के एक सुनियोजित कैंपेन का नाम है ।

  • ये लिबरल लोग ,   मॉबलिंचिंग नैरेटिव से देश के युवा, आकांक्षी वर्ग को भी बीजेपी से दूर करने की कोशिश करने में लगातार लगे  है
  • और इससे  बीजेपी की विचारधार को देश की धार्मिक  एकता के खिलाफ  और देश विरोधी  करार दे सकें ।
  • विपक्ष दुनिया में बीजेपी को बदनाम करने के लिए अब फिर से  ऐसे तथा कथित लिबरल लोंगों को  हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है ।
  • 2002 के बाद से मोदी के सीएम रहते भी विपक्ष ने इसी  फेक नैरेटिव को खड़ा किया लेकिन मोदी करीब 13 साल तक सीएम रहे और 2014 में देश की जनता ने पीएम बनाया
  • 2013 -14 के  लोक सभा चुनाव प्रचार में  विपक्ष ने ये खतरा खड़ा किया था कि मोदी के आने के बाद मुसलमानों पर अत्याचार बढ़ जाएगा , संवैधानिक संस्थाएं बिखर जाएंगी , लोकतंत्र देश में नहीं बचेगा । पर जनता ने इसे बुरी तरह खारिज किया
  • बीते पांच साल तक  विपक्ष ने मॉब लिंचिंग, का  फेक कैंपेन चलाया  एवार्ड वापसी कैंपेन चलाया लेकिन 2019 में जनता ने प्रचंड जनादेश दिया

इसके पहले भी लिबरल लोगों का खास वर्ग ने कैंपेन चलाया है

150 से अधिक वैज्ञानिकों ने मतदाताओं से मॉब लिंचिंग के खिलाफ वोट देने की अपील की
(April 2019)

  • देश के 150 से अधिक वैज्ञानिकों ने मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) से जुड़े लोगों को वोट न देने की अपील की है। इसके साथ ही असमानता, भेदभाव और डर के माहौल के खिलाफ वोट देने का निवेदन किया है।

थियेटर जगत के 600 कलाकारों ने की बीजेपी को वोट ना देने की अपील

(April 2019)

  • थियेटर जगत के 600 से ज्यादा कलाकारों ने 12 भाषाओं में बयान जारी करते हुए देश की जनता से अपील की है कि वे लोक सभा चुनाव 2019 में बीजेपी को वोट
    ना दें।

200 से अधिक लेखकों और 100 से अधिक फिल्म निर्देशक ने बीजेपी को वोट ना देने की अपील

  • देशभर के 200 से अधिक लेखकों ने भी नफरत की राजनीति के खिलाफ वोट करने की अपील की थी। अपील पर हस्ताक्षर करने वाले 210 लेखकों ने कहा था, ‘आगामी लोकसभा चुनाव में देश चौराहे पर खड़ा है।

तब कहां थे ये खास लिबरल लोग ?

  • यूपी के मुजफ्फर नगर का दंगा तब हुआ जब मोदी पीएम नहीं थे यानी यूपीए के समय हुआ तब ये कहां थे जबकि इनके  आरोप के उलट मोदी के पीएम रहते बीते  पांच साल में देश में एक भी दंगा नहीं हुआ
  • 23 मई के चुनाव नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल में हुए  राजनीतिक हत्‍याओं पर इन लोगों ने क्यों नही कोई  खुला खत लिखा
  • मथुरा में 18 मई को कुछ मुसलमान  युवकों ने दुकानदार भारत और पंकज यादव से लस्सी के पैसे मांगने पर हमला कर दिया,बाद में एक युवक की मृत्यु हो गई।
    26 मई 2019

 त्रिपुरा में भाजपा कार्यकर्ता की हत्या

त्रिपुरा में चुनाव नतीजों के बाद से जारी हिंसा, BJP कार्यकर्ता की हत्या, अब तक 100 से ज्यादा घायल

  • 25 मई को त्रिपुरा में सत्तारूढ़ बीजेपी के समर्थक शिबू दास की पश्चिम त्रिपुरा जिले में हत्या कर दी गयी।
  • 24 मई को बीजेपी कार्यकर्ता बीजू भौमिक की त्रिपुरा के फतीकचेरा में  हत्या कर दी गई।

कुछ मामले और…

  • बिहार के औरंगाबाद में 25 जुलाई 2019 को रजिया, मदीना, कासिम, साहनी खातून ने पीट—पीटकर अशोक की हत्या कर दी लेकिन इस खबर का सज्ञान लेने की लिंचिंग के नाम पर सक्रिय अहिष्णुता-गिरोह ने जरूरत भी नहीं समझी।
  • हरियाणा के नूह जिले में 19 जुलाई 2019 को पेशे से अधिवक्ता नवीन यादव को घर जाते समय अख्तर, जैकम, साजिद,मकसूदन, रूकसाना, सरजीना शेकुल ने पीट-पीट कर मार डाला। इस पर जाति की राजनीति करने वाले तमाम सेकुलर गिरोह खामोश रहे क्योंकि मारने वाले मुसलमान थे और जिसकी लिंचिंग हुई वह यादव समाज से आता था।
  • महाराष्ट के पुणे में जुलाई 2019 में हितेश मूलचंदानी नाम के युवक को अगवा किया गया और बाद में उसका जला हुआ शरीर बरामद हुआ। हितेश की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि बार के बाहर उसने फिरोज खान को पेशाब करने से रोका था।

 अपराध में भी सांप्रदायिक चश्मा

  • यूपीए सरकार के दौरान भी पशु-चोरी और चोरी के मामलों में  भीड़ ने ऐसे वारदात के कई मामले किए। पर तब इन मामलों को सामान्य अपराध मान कर नजरअंदाज करने  वाली मीडिया का एक खास तबका  अब इसे  सांप्रदायिक मोड़ देने में क्यों जुट जाती है ?

मध्य प्रदेश  में गौ- रक्षकों के वारदात के लिए सीएम कमलनाथ की जगह पीएम मोदी जिम्मेदार कैसे ?

  • मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में लोकसभा चुनाव के वोटों की गिनती से ठीक एक दिन पहले गोमांस के शक में मुस्लिम युवक को पेड़ से बांधकर बुरी तरह से पीटने का मामला सामने आया है।– 22 मई 2019

फर्जी आरोप पर भी  हाय तौबा

गरुग्राम में मुस्लिम युवक से मारपीट का आरोप बेबुनियाद  निकले

  • हरियाणा के गुरुग्राम में जामा मस्जिद के पास 25 मई को कथित तौर पर मुस्लिम युवक की टोपी फेंकने और उससे जबरन ‘जय श्रीराम’ बुलवाने वाले आरोप फर्जी निकले । इस मामले की जांच के लिए पुलिस ने इलाके में लगे करीब 50 सीसीटीवी की फुटेज खंगाली, जिसमें सामने आया है कि मुस्लिम युवक से सिर्फ मारपीट हुई थी। न तो किसी ने उसकी टोपी फेंकी और न ही उसकी शर्ट फाड़ी गई। सीसीटीवी फुटेज के मुताबिक, मुस्लिम युवक को आरोपी ने नहीं, बल्कि एक दूसरे युवक ने रोका था। हालांकि, आरोपी के साथ उसकी कहासुनी जरूर हुई थी, जिसके बाद दोनों में हाथापाई भी हुई। उस वक्त मुस्लिम युवक की टोपी गिर गई थी, जिसे उसने खुद ही उठाकर जेब में रख लिया था। किसी अन्य युवक ने टोपी को हाथ तक नहीं लगाया था।

जय श्री रामन बोलने पर आतिब की पिटाई की खबर थी झूठी

  • मामला यूपी के कानपुर का है, नवजीवन ने 4 जुलाई को वेबसाइट पर खबर प्रकाशित की — तीनों युवक आतिब को जय श्री राम का नारा लगाने के लिए मजबूर करने लगे। आतिब ने जब इसका विरोध किया तो आरोपियों ने उसे पास के ही शुलभ शौचालय में बंधक बना लिया और ईंट पत्थरों से पीट—पीट कर उसे जख्मी कर दिया।  न्यूज़ रिपोर्ट में आरोपियों का नाम सुमित सिंह ,राजेश सिंह और शिवा कुमार बताया गया है. कुछ अन्य मीडिया हाउस ने भी इस मामले में कुछ इसी तरह की खबर चलाई थी।

अब खबर की सच्चाई पर बात करते हैं, इस मामले में सच यह है कि मोहम्मद आतिब को ‘जय श्री राम’ ना बोलने पर पीटने वाली खबर गलत थी. मोहम्मद आतिब को तीन लोगों ने पीटा जरुर था लेकिन उसका ‘जय श्री राम का नारा लगाने या न लगाने से कोई लेना—देना नहीं था. आतिब ने खुद इस बात से एक टीवी चैनल के पत्रकारों से बात करते हुए इंकार किया और कहा है कि उसे जिन लोगों ने मारा उन्होंने उसे कोई नारे लगाने को नहीं कहा था. मोहम्मद आतिब के अनुसार उनको इसलिए पीटा गया क्योंकि उन्होंने आरोपियों को अपने ऑटो में बिठाने से मना कर दिया था. आतिब के अनुसार— तीनों लोग नशे में थे और ऑटो पर न बिठाने के सवाल पर तीनों आरोपियों से उसकी कहा सुनी हो गई। जिसके बाद उसे को ईंट पत्थर से बुरी तरह पीटा गया. आतिब ने ये बात साफ़ कर दी की ‘जय श्री राम’ ना बोलने पर पीटने वाली बात झूठी है।

प्रिंसपल मिस्बाही ने फैलाया जय श्रीराम का झूठ

  • उन्नाव जिले में एक मदरसे के छात्रों से जबरदस्ती ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाए जाने की खबर जुलाई के दूसरे सप्ताह में सामने आई। इस मामले में जब पुलिस ने पड़ताल की तो पाया कि मदरसे के छात्रों से मारपीट व जबरन जय श्री राम के नारे लगवाने की बात झूठी निकली। उन्नाव पुलिस के मुताबिक जिन्हें आरोपी बता कर रिपोर्ट दर्ज कराई गई वह घटनास्थल के आस—पास भी नहीं थे। नामित आरोपियों के मोबाइल के लोकेशन व दूसरे स्थान पर मौजूदगी की फुटेज की जांच करने के बाद पुलिस ने उन्हें क्लीनचिट दे दी। दोनों को कोतवाली से छोड़ दिया गया। वास्तव में मदरसा दारुल उलूम फैजेआम के प्रिंसिपल मौलाना निसार अहमद मिस्बाही ने 11 जुलाई को छात्रों के मजहबी नारे न लगाने पर मारपीट की रिपोर्ट झूठी रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

ना बागपत में दाढ़ी नोची गई और ना जय श्रीराम कहलवाया गया

  • बागपत में मौलाना की जय श्री राम का नारा ना लगाने पर पिटाई के मामले में नया मोड़ आ गया है. पुलिस की जांच में सामने आया है कि मौलाना ने झूठा आरोप लगाया है. मौलाना की ना तो दाढ़ी नोची गई और ना ही जय श्री राम का नारा लगाने के लिए उन्हें कहा गया। मौलाना ने बाद में अपना बयान बदल लिया, जब मौलाना की पिटाई हुई तो इसकी सूचना मौलाना द्वारा जिसमें मौलाना ने कहा था कि 10 से ज्यादा लोगों ने ये उस पर छेड़छाड़ का आरोप लगाकर उसकी पिटाई की है. जिसके बाद सीओ बुढ़ाना ने मामला बागपत का बताकर उन्हें बागपत भेज दिया. बागपत में थाना दौघट पुलिस के सामने मौलाना ने बयान बदल दिए और कहा कि जय श्री राम का नारा न लगाने पर पिटाई की गई है. जिसका मुकदमा दर्ज किया गया है. सीओ के मुताबिक पहले मौलाना ने छेड़छाड़ की बात कहकर पिटाई की बात कही थी. हालांकि पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया था और जाँच में मुजफ्फरनगर जिले के बुढ़ाना कोतवाली क्षेत्र नगवा गाँव के युवको के पिटाई में शामिल होने बात सामने आई थी.

 

कुछ मामले और…

  • तेलंगाना के करीमनगर के एक मामले में 2 जून 2019, प्रेम प्रसंग के एक मामले में हुई मारपीट को जय श्री राम के नाम से जोड़ा गया।
  • यूपी के बरेली में 01 जून 2019 को चार युवकों को मंदिर में मांस खाने के आरोप में लोगों ने पीटा था। जिसके बाद सोशल मीडिया पर अभियान चलाया गया कि मुसलमानों को पीटा गया। जिसमें यह नहीं बताया गया कि मंदिर में वे मांस खा रहे थे। ना यह बताया गया कि जिन युवकों की पीटाई हुई उनमें दो हिन्दू युवक
    शामिल थे।
  • महाराष्ट्र औरंगाबाद में 20 जुलाई 2019 को इमरान नाम के युवक ने कहा कि उससे मारपीट करने के बाद उसे जय श्रीराम बोलने के लिए कहा गया। उस लड़ाई में इमरान को बचाने वाले व्यक्ति ने ही उसकी पोल खोल दी।
  • महाराष्ट्र के औरंगाबाद में ही 23 जुलाई 2019 को दूसरा मामला, जिसमें मारपीट की एक खबर सामने आई। जिसमें जय श्री राम बाद में जोड़ दिया गया। जिस शेख आमेर को कथित तौर पर जय श्रीराम ना बोलने के नाम पर पीटा गया, उस बयान से वह खुद पलट गया। बकौल शेख आमेर— यह झूठ उसने समाज में अपना कद बढ़ाने के लिए बोला था।
  • 20 जून 2019 को रोहिणी में मोहम्मद मोमिन ने आरोप लगाया कि जय श्री राम ना बोलने की वजह से उनकी पीटाई कर दी गई जबकि पुलिस तहकीकात में उनके आरोप में सच्चाई नहीं पाई गई।
  • पश्चिम बंगाल के कूच बिहार के एक मामला है, 29 जून 2019 को सोशल मीडिया पर एक शख्स से जबरन जय श्रीराम बुलवाने का वीडियो वायरल हुआ। लेकिन तहकीकात में पाया गया कि दोनों ही शख्स मुसलमान थे।
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