बालश्रम खत्म करने के लिए वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कोष की हुई मांग

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नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित श्री कैलाश सत्यार्थी द्वारा संस्थापित संगठन ‘लॉरियेट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्‍ड्रेन’ द्वारा आयोजित अंतरराष्‍ट्रीय परिसंवाद “फेयर शेयर टू इंड चाइल्ड लेबर- सरवाइवर्स एंड लीडर्स ऑन सोशल प्रोटेक्शन” में वैश्विक नेताओं ने कोविड-19 महामारी के दौरान पूरी दुनिया में बाल मजदूरी और बच्चों के शोषण बढ़ने पर गंभीर चिंता जाहिर की। इस अतंरराष्ट्रीय परिसंवाद में गरीब देशों के वंचित और हाशिए के बच्चों को संसाधनों का उचित हिस्सा (फेयर शेयर) देने और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक ‘वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कोष’ स्थापित करने की भी मांग की गई

अमरनाथ कुमार

नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित श्री कैलाश सत्यार्थी द्वारा संस्थापित संगठन ‘लॉरियेट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्‍ड्रेन’ द्वारा आयोजित अंतरराष्‍ट्रीय परिसंवाद “फेयर शेयर टू इंड चाइल्ड लेबर-

सरवाइवर्स एंड लीडर्स ऑन सोशल प्रोटेक्शन” में वैश्विक नेताओं ने कोविड-19 महामारी के दौरान पूरी दुनिया में बाल मजदूरी और बच्चों के शोषण बढ़ने पर गंभीर चिंता जाहिर की। वैश्विक नेताओं ने एक सुर में कहा कि हमें दुनियाभर के वंचित और हाशिए के बच्चों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी और विश्व समुदाय को गरीबी दूर करने के लिए तत्काल कारगर कदम उठाने होंगे। इस अतंरराष्ट्रीय परिसंवाद में गरीब देशों के वंचित और हाशिए के बच्चों को संसाधनों का उचित हिस्सा (फेयर शेयर) देने और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक ‘वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कोष’ स्थापित करने की भी मांग की गई।

परिसंवाद में आए महत्‍वपूर्ण सुझावों को कैलाश सत्यार्थी 28 सितम्‍बर 2021 को गरीबी उन्मूलन के लिए नौकरियों और सामाजिक सुरक्षा पर दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार के प्रमुखों की जो बैठक होने जा रही है, उसमें रखेंगे। यह बैठक संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस द्वारा अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन के साथ मिलकर आयोजित की जा रही है। जिसमें कोविड-19 के दौरान और उसके बाद दुनिया के विकास के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता के लिए की जाने वाली पहल पर बातचीत होगी।

‘लॉरियेट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्‍ड्रेन’ द्वारा “फेयर शेयर टू इंड चाइल्ड लेबर- सरवाइवर्स एंड लीडर्स ऑन सोशल प्रोटेक्शन” नामक इस ऑनलाइन अंतरराष्‍ट्रीय परिसंवाद का आयोजन अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) एवं स्‍वीडन सरकार और नार्वे के विदेश मंत्रालय ने संयुक्‍त रूप से किया। इस परिसंवाद में आईएलओ के महानिदेशक गाई राइडर, स्वीडन के प्रधानमंत्री स्टीफन लोफवेन, नार्वे के अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्री डाग इंगे उलस्टीन, नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्‍यार्थी, तिमोर लेस्ते के पूर्व राष्ट्रपति और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता जोस रामोस होर्ता, जर्मनी के फेडरल मिनिस्ट्री ऑफ लेबर एंड सोशल अफेयर के परमानेंट स्टेट सेकेट्री बीजॉन बोहनिंग, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और संयुक्त राष्ट्र संघ के सस्टेनेबल डेवलपमेंट सल्युसन्स नेटवर्क के अध्यक्ष जैफरी सैक्स, यूनेस्को की असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल (शिक्षा) स्टेफेनिया जियाननी, प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता और राबर्ट एफ कैनेडी ह्यूमन राइट्स की अध्यक्ष कैरी कैनेडी, वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की डिप्टी डायरेक्टर जनरल डॉ सुसाना जकब और इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन के महासचिव मार्टिन चुंगोंग सहित दुनिया के करीब दो दर्जन वैश्विक नेताओं ने हिस्सा लिया। परिसंवाद को तमाम देशों के युवा और छात्र नेताओं सहित पूर्व बाल मजदूरों ने भी संबोधित किया। यह अतंरराष्ट्रीय परिसंवाद ऐसे समय पर आयोजित किया गया, जब न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेंबली चल रही है। इस मौके पर इस अंतरराष्ट्रीय मंच से संयुक्त राष्ट्र संघ के जनरल असेंबली में शामिल होने वाले तमाम देशों के नेताओं से अपील की गई की वे बच्चों की सामाजिक सुरक्षा के लिए फौरन नीतियां और कार्यक्रम बनाएं।

इस अवसर पर दो दशकों में पहली बार बाल श्रमिकों की संख्‍या में अभूतपूर्व वृद्धि पर विचार किया गया। मौजूदा हालात और प्रगति को देखते हुए सन 2025 तक बाल श्रम के सभी रूपों को खत्‍म करने की विश्व समुदाय की प्रतिबद्धता पर जो एक बड़ा़ सवाल खड़ा हुआ है, उस पर भी गंभीर चिंता व्‍यक्‍त की गई। उल्‍लेखनीय है कि इन संकटों ने संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्‍यों (एसडीजी) को 2030 तक प्राप्‍त करने में भी एक चुनौती पैदा कर दी है। इन संकटों से निपटने के लिए लॉरियेट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्‍ड्रेन की ओर से अंतरराष्‍ट्रीय नेताओं और मुक्‍त बाल श्रमिकों द्वारा बच्चों की सामाजिक सुरक्षा की तत्काल आवश्यकता को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर पुरजोर दबाव डाला गया। इस अवसर पर वैश्विक वक्‍ताओं ने एक ओर जहां समाज के सबसे हाशिए पर रहने वाले बच्‍चों के लिए सामाजिक सुरक्षा निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि की मांग की, वहीं दूसरी ओर उन्‍होंने कम आय वाले देशों के लिए एक वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कोष की स्थापना पर भी बल दिया।

स्‍वीडन के प्रधानमंत्री स्‍टीफन लोफवेन

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए स्‍वीडन के प्रधानमंत्री स्‍टीफन लोफवेन ने शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर जोर दिया। स्‍टीफन लोफवेन ने कहा, ‘‘स्‍कूल के खाली डेस्‍क का मतलब है कि बच्‍चे बाल मजदूरी कर रहे होंगे। बाल श्रम को समाप्‍त करने के लिए जरूरी है कि बच्‍चे स्‍कूल में हों और वयस्‍कों को हम ऐसी सामाजिक सुरक्षा प्रदान करें जो उन्‍हें अच्‍छे वातावरण में काम करने के लिए प्रेरित करें। हमें गरीबों को फोकस करना चाहिए। स्‍वीडन अंतरराष्‍ट्रीय सहायता के लिए आगे भी महत्‍वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता रहेगा। हमें सप्‍लाई चेन से बाल श्रम को समाप्‍त करने के लिए काम करना होगा।’’ वहीं अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक गाई राइडर ने भी सामाजिक सुरक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “हम बच्चों और उनके परिवारों के लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान करके ही आगे बढ़ सकते हैं। जिसका हम अतीत में प्रावधान करने में अक्षम रहे।’’

दुनिया में बढ़ती समानता और बाल श्रम की समस्या पर ध्यान आकर्षित करते हुए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्‍मानित जाने-माने बाल अधिकार कार्यकर्ता श्री कैलाश सत्‍यार्थी ने कहा, “वैश्विक नेताओं में यह कहने का नैतिक साहस होना चाहिए कि हां, हम अपने बच्‍चों के लिए कुछ भी करने में असमर्थ रहे हैं और हम उसके लिए जिम्‍मेदार हैं। कोई तो इसकी जिममेदारी ले कि एक ओर जहां दुनिया की संपत्ति में 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का इजाफा हो गया हो, वहीं दूसरी ओर 10 हजार बच्‍चे प्रति दिन बाल मजदूरी और गुलामी के दलदल में धकेले जा रहे हैं। हम मुक्‍त बाल मजदूर, छात्र, नोबेल पुरस्‍कार विजेता, ट्रेड यूनियन बच्‍चों के लिए दरवाजे खटखटाते रहेंगे। यह हमारे बच्चों के लिए ‘सामाजिक सुरक्षा का वैश्‍वीकरण’ करने का समय है।”

वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की डिप्टी डायरेक्टर जनरल डॉ सुसाना जकब

गौरतलब है कि दुनियाभर में लगभग तीन चौथाई बच्चे और कम आय वाले देशों में नब्बे प्रतिशत बच्चे बगैर किसी सामाजिक सुरक्षा के जीने को अभिशप्‍त हैं। अंतरराष्ट्रीय सहायता में सामाजिक सुरक्षा के लिए दी जाने वाली राशि में अत्यधिक कमी है। परिसंवाद में इस ओर ध्यान आकर्षित करते हुए संयुक्त राष्ट्र सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क के अध्यक्ष और प्रसिद्ध अर्थशात्री जेफरी सैक्‍स ने कहा, “बच्चों की वर्तमान स्थिति दिल दहला देने वाली और घृणित है। बच्चों की शिक्षा के लिए हमें अब वित्तीय संसाधन जुटाने होंगे। अगर वे स्कूल में होंगे, तो बाल श्रम नहीं कर रहे होंगे।’’

परिसंवाद में यह बात जोर-शोर से उठी कि बाल श्रम खत्म करने में भी सामाजिक सुरक्षा एक कारगर हथियार है। लेकिन इस पर बहुत कम पैसा खर्च किया जा रहा है। सामाजिक सुरक्षा के लिए विदेशी विकास सहायता के मद में साल 2017 में अमीर देशों की सकल राष्ट्रीय आय का महज 0.0047 प्रतिशत ही दिया गया। जो मामूली है। नार्वे के अंतर्राष्ट्रीय विकास मंत्री डाग-इंगे उलस्टीन ने कहा, ‘‘हमें 2025 तक बाल श्रम को समाप्‍त कर देना है। लेकिन प्रत्‍येक दिन 10 हजार बच्‍चे बाल श्रम करने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं और उन्‍हें इससे मुक्‍त करने की कोशिश भी नहीं हो रही है। यह समय है उन्‍हें ‘फेयर शेयर’ उपलब्‍ध कराने के लिए कदम उठाने का। इसमें सामाजिक सुरक्षा महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।’’

आईएलओ के महानिदेशक गाई राइडर

इस अवसर पर कम आय वाले देशों में सामाजिक सुरक्षा के कार्यों और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कोष बनाने की मांग की गई। बचपन बचाओं आंदोलन द्वारा मुक्‍त बाल श्रमिक मनन अंसारी कभी झारखंड के अभ्रक खदानों में काम करता था। फिलहाल वह माइक्रो बाइलोजी में एमएससी कर रहा है। परिसंवाद में शामिल वैश्विक नेताओं को संबोधित करते हुए मनन ने भावुक होकर कहा, ‘‘मैं जीवन की आखिरी सांस तक संघर्ष करता रहूंगा कि किसी भी बच्‍चे का बचपन किसी भी हाल में खदानों में दम न तोड़ दे। हम सभी को मिलकर बाल दासता को खत्‍म करने के लिए ‘फेयर शेयर फॉर चिल्ड्रेन’ की मांग करनी चाहिए। हर बच्चे के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।’’ वहीं झारखंड बाल पंचायत की राज्‍य सचिव और बाल नेता खुशबू शर्मा ने अमीर देशों से अपील की कि उनके पास पर्याप्त धन और संसाधन हैं और वे बच्‍चों के सपनों को पूरा करने में मदद कर सकते हैं।

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वायु गुणवत्ता के नए मानक खतरे की तरफ कर रहे इशारा

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अगर पूरी दुनिया पीएम 2.5 के नए मानकों को लागू करती है तो इसके द्वारा पीएम 2.5 के कारण होने वाले मृत्यु की संख्या में 80% तक की कमी की जा सकती है

धीप्रज्ञ द्विवेदी

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2005 के बाद पहली बार अपने वायु गुणवत्ता मानकों में बदलाव किया है। इसका प्रमुख कारण है वायु प्रदूषण से हो रही मृत्यु की संख्या में बढ़ोतरी। पिछले कुछ वर्षों में वायु प्रदूषण के कारण पूरे विश्व में मृत्यु की संख्या अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है। प्रतिवर्ष लगभग 7000000 (70 लाख) लोगों की मृत्यु वायु प्रदूषण के कारण होती है। अगर हम इस संख्या को मृत्यु के अन्य कारणों से तुलना करें तो पाते हैं कि यह संख्या तंबाकू के कारण होने वाली या पर्याप्त पोषण ना मिलने के कारण होने वाले मृत्यु के संख्या के लगभग बराबर है। यहां तक की वर्ष 2019 के अंत से कोरोनावायरस महामारी के आने के बाद भी 2020-21 में वायु प्रदूषण के कारण होने वाले मृत्यु की संख्या में बहुत कमी नहीं देखी गई। वायु प्रदूषण के कारण होने वाले स्वास्थ्य समस्याओं को कम करने के लिए तथा इसके कारण से होने वाले मृत्यु की संख्या को नियंत्रित करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी नई वायु गुणवत्ता मानकों को जारी किया है। यह मानक विश्व स्वास्थ संगठन के 191 सदस्य देशों के लिए हैं। इन मानकों को ध्यान से देखें तो हम पाते हैं कि इसमें सभी 6 महत्वपूर्ण क्लासिकल प्रदूषकों को शामिल किया गया है। यह प्रदूषक हैं, पीएम 2.5, पीएम 10, ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड एवं कार्बन मोनोऑक्साइड।

पिछली बार लगभग 16 वर्ष पहले वर्ष 2005 में विश्व स्वास्थ संगठन ने वायु गुणवत्ता मानकों को जारी किया था तब से लेकर अब तक वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर बहुत अध्ययन किए गए हैं पिछले 16 वर्षों में 500 से अधिक शोध पत्र इन विषयों पर प्रकाशित हुए हैं जिसके द्वारा इन प्रदूषकों के मानव शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को और अच्छे तरीके से समझा जा सका है। इसके साथ ही विकासशील एवं अविकसित देशों में वायु प्रदूषण के कारण हो रही स्वास्थ्य समस्याओं तथा मृत्यु में भी लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। इन सभी कारणों को ध्यान में रखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने नए मानकों को जारी किया इन मांगों को जारी करते हुए संगठन ने कहा है कि यह गुणवत्ता मानक वायु के उस गुणवत्ता को बताते हैं जो हमारे स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए न्यूनतम स्तर है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अगर पूरी दुनिया पीएम 2.5 के नए मानकों को लागू करती है तो इसके द्वारा पीएम 2.5 के कारण होने वाले मृत्यु की संख्या में 80% तक की कमी की जा सकती है। वर्तमान में पीएम 2.5 एक बहुत महत्वपूर्ण वायु प्रदूषण है क्योंकि यह अपने बहुत छोटे आकार के कारण आसानी से ना केवल हमारे से हो तक पहुंच जाता है और हमारे स्वसन तंत्र को प्रभावित करता है बल्कि वहां से आगे बढ़ते हुए या हमारे रक्त संचालन तंत्र के द्वारा शरीर के अन्य अंगों तक पहुंच कर उन्हें भी प्रभावित करता है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड हमारे स्वसन तंत्र को प्रभावित करता है और इसका ज्यादा कंसंट्रेशन मनुष्य में अस्थमा का कारण बन सकता है साथ ही साथ यह सतही ओजोन का निर्माण भी करता है जो स्वास्थ समस्याओं के साथ-साथ अन्य पर्यावरण समस्याओं के लिए भी जिम्मेदार है। सल्फर डाइऑक्साइड हमारे श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है और साथ ही एंफिसेमा का कारक बनता है एवं हमारे फेफड़ों की क्षमता को प्रभावित करता है। कार्बन मोनोऑक्साइड की अधिक मात्रा हमारे लिए जहर की तरह होती है जिसे कारण हमारी मृत्यु भी हो सकती है क्योंकि कार्बन मोनोऑक्साइड की एफिनिटी हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन की तुलना में कहीं ज्यादा है अतः जब या हमारे शरीर तक पहुंचता है तो धीरे-धीरे पूरे शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई को प्रभावित करता है जिसके कारण मृत्यु तक हो सकती है। ऐसी स्थिति में इन सभी प्रदूषकों के वातावरण में कंसंट्रेशन को कम करना ही अच्छे स्वास्थ्य को पाने का पहला कदम है।

दिल्ली की हवा खराब

इन्हीं सब कारणों को ध्यान में रखते हुए संगठन ने नए वायु गुणवत्ता मानकों का निर्धारण किया है। इन मानकों के आधार पर अगर हम वर्तमान में वायु प्रदूषण की स्थिति की तुलना करें तो हम समझ पाएंगे के प्रदूषण की स्थिति कितनी भयावह है। यह स्थिति विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य समस्याओं के जन्मदाता है भारत जैसे देशों के लिए और बड़ी समस्या है क्योंकि एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 3% लोग स्वास्थ्य समस्याओं के कारण गरीबी रेखा से ऊपर नहीं उठ पाते। ऐसी स्थिति में बढ़ता वायु प्रदूषण भारत की जनता के लिए स्वास्थ्य समस्याओं के साथ आर्थिक विषमता एवं समस्याओं को भी बढ़ाता है।

अगर हम वर्तमान भारतीय वायु गुणवत्ता मानकों की तुलना डब्लू एच ओ के नए मानकों से करें तो हम पाते हैं कि हमारे मानक कहीं से भी स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी नहीं है। उदाहरण स्वरूप पीएम 2.5 का नया वार्षिक मानक औसत 5 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब है जबकि भारत में 40 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब है। ऐसे ही पीएम 10 के लिए डब्लू एच ओ का नया मानक औसत 15 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब वार्षिक है जबकि भारतीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब है। इसी प्रकार नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का नया वार्षिक औसत मानक 10 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब है जबकि वर्तमान भारतीय मानक 40 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब है, (वास्तव में यहां नाइट्रोजन डाइऑक्साइड भारतीय मानक विश्व स्वास्थ संगठन के 2005 के मानक के अनुरूप है) इसी प्रकार यदि हम सल्फर डाइऑक्साइड के नए और भारतीय मानकों की तुलना करें तो हम पाते हैं कि नए मानक एक बिल्कुल ही नए स्तर को निरूपित करते हैं अर्थात विश्व स्वास्थ संगठन के नए मानकों की तुलना में भारतीय मानक कहीं नहीं ठहरते।
इन मानकों के आधार पर भारत के भी वायु गुणवत्ता मानकों में परिवर्तन करने की आवश्यकता है अन्यथा हम अपने देश में वायु प्रदूषण कारण हो रही स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने में समय के अनुसार सक्षम नहीं हो पाएंगे।
डब्ल्यूएचओ के नए मानक हमें यह बताते हैं के अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए हमें अपने वायु की गुणवत्ता को और बेहतर बनाना होगा और इसके लिए अगर समय रहते उचित कदम नहीं उठाएगा तो हमारा भविष्य अंधकार में हो सकता है।

( लेखक पर्यावरण विषय में स्नातकोत्तर एवं यूजीसी नेट क्वालिफाइड हैं, पर्यावरण विषय पर लगातार विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं, प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए पर्यावरण विज्ञान पढ़ाते हैं। साथही स्वास्थ्य विषय पर काम करने वाली संस्था स्वस्थ भारत न्यास के संस्थापक न्यासी हैं एवं सभ्यता अध्ययन केंद्र से एक अध्ययन के रूप में जुड़े हुए हैं)

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संघ कार्य से जुड़कर ही संघ को समझा जा सकता है: डा. भागवत

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प्रचार के क्षेत्र में इसलिए संघ का देरी से आना हुआ। अपने कार्य का ढिंढोरा संघ नहीं पीटता। कार्य होगा तो बिना कहे भी प्रचार हो जाएगा। संघ अनावश्यक प्रचार की स्पर्धा में शामिल नहीं है। फिर भी प्रचार विभाग आगे बढ़ रहा है और धीरे-धीरे गति प्राप्त कर रहा है।

पंकज

उदयपुर में आयोजित प्रबुद्धजन गोष्ठी में उदबोधन के पश्चात जिज्ञासा सत्र में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कई प्रश्नों के उत्तर दिए। मीडिया में संघ की छवि के बारे में प्रश्न पर उन्होंने कहा कि प्रचार हमारा उद्देश्य नहीं है, प्रसिद्धि उद्देश्य नहीं है, अहंकार रहित, स्वार्थ रहित, संस्कारित स्वयंसेवक और कार्य हमारा प्राथमिक उद्देश्य रहा है। प्रचार के क्षेत्र में इसलिए संघ का देरी से आना हुआ। अपने कार्य का ढिंढोरा संघ नहीं पीटता। कार्य होगा तो बिना कहे भी प्रचार हो जाएगा। संघ अनावश्यक प्रचार की स्पर्धा में शामिल नहीं है। फिर भी प्रचार विभाग आगे बढ़ रहा है और धीरे-धीरे गति प्राप्त कर रहा है।
समाज में कार्यों के कारण ही संघ का अपने आप स्थान बन गया है। उन्होंने ‘अ संघी हू नेवर वेंट टू शाखा’ पुस्तक का उल्लेख करते हुए कहा कि संघ के कार्य को देखकर कई लेखक-विचारक स्वतःस्फूर्त लिख भी रहे हैं। महिला सशक्तिकरण के बारे में संघ के विचार पर उन्होंने समाज निर्माण के कार्य में राष्ट्र सेविका समिति के रचनात्मक कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि संघ और सेविका समिति समानांतर कार्य करते हैं। संघ के कुटुम्ब प्रबोधन का कार्य मातृशक्ति के बिना संभव ही नहीं है। महिला सशक्तिकरण और प्रबोधन का कार्य महिला समन्वय के माध्यम से चल रहा है।
जनजाति समाज में संघ की भूमिका के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि संपूर्ण समाज का संगठन करना संघ का उद्देश्य है। वनवासी कल्याण आश्रम, परिषद, एकल विद्यालय तथा स्वयंसेवकों की सकारात्मक पहल से इन वर्गों के कल्याण और संगठन का कार्य चल रहा है। वनवासी समाज पूर्णतः मिशनरी के कब्जे में है, ऐसा नहीं है। फूलबनी, ओडिशा का उदाहरण देकर उन्होंने कहा कि वनवासी समाज स्वार्थ, लालच या मजबूरी में हिन्दू नही है, बल्कि वह मूल रूप से हिन्दू ही है।

संघ के सामाजिक सरोकारों पर प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि संघ तो आम आदमी का ही संगठन है। नारायण गमेती के घर जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वे भी एक सामान्य कार्यकर्ता ही हैं. सामान्य मनुष्य को देश के लिए तैयार करना ही संघ का उद्देश्य है. संघ को बस्ती, ग्राम, सभी तक पहुंचना है, चाहे समय कितना भी लगे.
केरल और बंगाल को लेकर एक प्रश्न में कहा कि जो समाज झेलता है, वह स्वयंसेवक भी झेलता है. स्वयंसेवक घबराकर भागने वाला नहीं है. स्वयंसेवक समाज के साथ रहकर कार्य करता है. भेदभाव मुक्त समाज और आरक्षण के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि संघ की शाखा में भेदभाव रहित रहने की शिक्षा दी जाती है. हम सिर्फ हिन्दू हैं, यही सिखाया जाता है. इसलिए संघ में ऐसे भेदभाव का वातावरण नहीं दिखता. स्वयंसेवक व्यक्तिगत जीवन में भी इसी आदर्श को उतारने का प्रयास करता है. भेदभाव की बीमारी पुरानी है, सामाजिक कार्यों से संघ इसे दूर करने का प्रयास कर रहा है. विषमता को समर्थन देने वाला कोई विचार संघ स्वीकार नहीं करता.संघ और सत्ता के बारे में प्रश्न पर कहा कि सत्ता में संघ की भागीदारी भ्रामक और मीडिया की उत्पत्ति है. संघ के स्वयंसेवकों का राजनीतिक लोगों से चर्चा करना या मिलना, सत्ता में भागीदारी नहीं है. कम्युनिस्ट सहित अन्य सरकारें भी संघ के स्वयंसेवकों का सहयोग कई कार्यों में लेती रही हैं.
गौ पालन और गौ संरक्षण के बारे में प्रश्न पर उन्होंने गौ संवर्धन गतिविधि का उल्लेख करते हुए भीलवाड़ा की पथमेड़ा गौशाला का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक तथा अन्य लोग इस दिशा में कार्य कर ही रहे हैं.
समाज के सभी वर्गों को जोड़ने के संदर्भ में पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करना है, इसलिए संघ कार्य का विस्तार होना चाहिए. भारत विश्व गुरु बने, यह सबका उद्देश्य है, इसलिए संघ समाज के सभी वर्गों को जोड़ने का कार्य कर रहा है. कोई अन्य निहित उद्देश्य नहीं है.उन्होंने कहा कि संघ को दूर से नहीं अंदर से समझना चाहिए. संघ देश, समाज, धर्महित में अच्छे काम कर रहा है, इसलिए इस कार्य से जुड़कर ही संघ को समझा जा सकता है. आचार्य विनोबा भावे कभी भी शाखा नहीं गए. पर, स्वयंसेवक की भांति देश, समाज हित में कार्य किया. उन्होंने कहा कि संघ के काम को देख कर सहयोगी बनें.

द बिहार टीचर्स हिस्ट्री मेकर्स के द्वारा पश्चिम चंपारण के गणित शिक्षक नवीन कुमार मनीष को किया गया सम्मानित

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नवीन कुमार मनीष वर्तमान में राजकीयकृत गणेश प्रसाद उच्च विद्यालय, चनपटिया में गणित शिक्षक के रुप में कार्यरत हैं। इसके पूर्व गणित शिक्षक के रुप में नवोदय विद्यालय, जामतारा (झारखंड), केन्द्रीय विद्यालय, मोतिहारी और केन्द्रीय विद्यालय, बेतिया  में अपनी सेवाएं दे चुके हैं

अन्नपूर्णा चौधरी

द बिहार टीचर्स हिस्ट्री मेकर्स के द्वारा पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया के बानुछपरा के गणित शिक्षक नवीन कुमार मनीष को सम्मानित किया गया है। यह सम्मान नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो केसी सिन्हा, राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षक परिषद, बिहार के श्री विनोदानंद झा एवं प्राचार्य  मैत्रेय कॉलेज ऑफ एजुकेशन एंड मैनेजमेंट, हाजीपुर, बिहार के डॉ ज्ञानदेव मणि त्रिपाठी ने संयुक्त रुप से सम्मानित किया।

नवीन कुमार मनीष वर्तमान में राजकीयकृत गणेश प्रसाद उच्च विद्यालय, चनपटिया में गणित शिक्षक के रुप में कार्यरत हैं। इसके पूर्व गणित शिक्षक के रुप में नवोदय विद्यालय, जामतारा (झारखंड), केन्द्रीय विद्यालय, मोतिहारी और केन्द्रीय विद्यालय, बेतिया  में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

नवीन कुमार मनीष के अनुसार— द बिहार टीचर्स हिस्ट्री मेकर्स, मेरा मोबाइल—मेरी शिक्षा एप के माध्यम से शिक्षक गण कोविड वैश्विक महामारी के पूर्व से ही पहली कक्षा से बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों को आनलाइन शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। साथ ही शिक्षा से जुड़े ‘बीस ब्लॉगों’ के माध्यम से शिक्षक गण बच्चों की प्रतिभा को निखार रहे हैं। द बिहार टीचर्स हिस्ट्री मेकर्स मंच से राज्य के लगभग 38 जिले के शिक्षक शिक्षिका आनलाइन शिक्षा का संचालन कर बच्चों को लाभान्वित कर रहे हैं। बच्चों के बीच शिक्षा में बेहतर कार्य और उत्कृष्ट प्रदर्शन हेतु राज्य के अलग-अलग जिलों से चयनित 110 शिक्षक शिक्षिकाओं को प्रशस्ति पत्र और मोमेन्टो देकर सम्मानित किया गया।

पश्चिम चंपारण जिले से नवीन कुमार मनीष समेत निम्नलिखित शिक्षकों को भी प्रशस्ति पत्र एवं मोमेन्टो देकर सम्मानित किया गया। मैरी एडलिक (राजकीय विद्यालय, कुमारबाग), असलम चिश्ती (सहकारी प्रोजेक्ट बालिका विद्यालय, बगहा दो) कुमारी सीमा (उ मा विद्यालय, लौकरिया, चनपटिया), शमीम आरा (बेतिया),   परमेन्द्र कुमार (मैनाटांड), उषा कुमारी (मझौलिया), जया कुूमारी (चमुआ) को भी सम्मानित किया गया।

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