26 अगस्त 1303 : सोलह हजार क्षत्राणियों और बच्चों के साथ चित्तौड़ में रानी पद्मावती का जौहर

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अलाउद्दीन खिलजी की कुटिलता और गोरा बादल के अद्भुत शौर्य की गाथा

— रमेश शर्मा

अपने स्वत्व और स्वाभिमान रक्षा के लिये क्षत्राणियों की अगुवाई में स्त्री बच्चों द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर देने का इतिहास केवल भारत में मिलता है । इनमें सबसे अधिक शौर्य और मार्मिक प्रसंग है चित्तौड़ की रानी पद्मावती के जौहर का । जिसका उल्लेख प्रत्येक इतिहासकार ने किया है । इस इतिहास प्रसिद्ध जौहर पर सीरियल भी बने और फिल्में भी बनीं। राजस्थान की लोक गाथाओं में सर्वाधिक उल्लेख इसी जौहर का है ।

जौहर के विवरण भारत की अधिकांश रियासतों के इतिहास में मिलता है । जौहर की स्थिति तब बनती थी जब पराजय और समर्पण के अतिरिक्त सारे मार्ग बंद हो जाते थे । जौहर के सर्वाधिक प्रसंग राजस्थान के हैं । वहाँ कोई भी ऐसी रियासत नहीं जहाँ जौहर न हुआ हो । चित्तौड़ में सबसे पहला और सबसे बड़ा जौहर रानी पद्मावती का ही माना जाता है ।

रानी पद्मावती सिंहल द्वीप की राजकुमारी थीं। उनका मूल नाम पद्मिनी था जो विवाह के बाद पद्मावती हुआ । सिंहलद्वीप का नाम अब श्रीलंका है । उनके पिता राजा चन्द्रसेन सिंहलद्वीप के शासक थे । उन्होंने अपनी बेटी पद्मिनी के विवाह के लिये स्वयंवर का आयोजन किया । यह समाचार पूरे भारत में आया । चित्तौड़ के राजा रतन सिंह भी स्वयंवर में भाग लेने सिंहलद्वीप पहुँचे। वहाँ पद्मिनी से विवाह के इच्छुक राजाओं की बल बुद्धि और कौशल की परीक्षा के लिये वन में आखेट की एक स्पर्धा आयोजित की गई थी । जो राजा रतन सिंह ने जीती और राजकुमारी पद्मिनी से उनका विवाह हुआ । राजकुमारी पद्मिनी महारानी पद्मावती बनकर चितौड़ आ गईं।

उनके रूप गुण और राजा रतनसिंह के कौशल की चर्चा दूर दूर तक हुई यह दिल्ली के शासक अलाउद्दीन खिलजी तक भी पहुँची। दिल्ली सल्तनत के दो हमले चित्तौड़ पर हो चुके थे । पर सफलता नहीं मिली थी । बल्कि गुजरात जाती दिल्ली सल्तनत की फौज से अपने क्षेत्र से होकर निकलने के लिये कर भी वसूला था । किन्तु गागरौन की सहायता के लिये चित्तौड़ की सेना गई थी जिससे शक्ति में कुछ गिरावट आई और दिल्ली ने तोपखाने की वृद्धि कर अपनी शक्ति बढ़ा ली थी । स्थिति का आकलन करके दिल्ली की फौजों ने चित्तौड़ पर हमला बोला । लगभग एक माह तक घेरा पड़ा रहा । किन्तु सफलता नहीं मिली । अंततः अलाउद्दीन खिलजी ने एक कुटिल चाल चली । कुछ भेंट के साथ समझौता प्रस्ताव भेजा और आग्रह किया कि रानी पद्मावती का चेहरा एक बार देखकर लौट जायेगा । राजा ने प्रस्ताव मान लिया । सुल्तान अपने कुछ विश्वस्त सहयोगियों के साथ भोजन पर आया । उसने आइने में रानी को देखा और चलने लगा । राजा शिष्टाचार वस किले के द्वार तक छोड़ने आये । सुल्तान अलाउद्दीन बहुत कुटिल था । वह किले में भीतर जाते समय द्वार पर कुछ सुरक्षा सैनिक छोड़ गया था । उसके इरादों की किसी को भनक तक न थी । जैसे ही राजा द्वार पर आये उनपर हमला हुआ और बंदी बना लिये गये । बंदी बनाकर सुल्तान अपने शिविर में ले आया । और रानी को समर्पण करने का प्रस्ताव भेजा । रानी ने सभासदों से परामर्श किया । गोरा और बादल जो रिश्ते में राजा भतीजे थे ने संघर्ष का बीड़ा उठाया । राजा को मुक्त कराने की योजना बनी । योजनानुसार सुल्तान को समाचार भेजा कि रानी अपनी सखी सहेलियों और सेविकाओं के साथ समर्पण करने आना चाहतीं हैं। रानी पद्मावती को प्राप्त करने को आतुर अलाउद्दीन ने सहमति दे दी । तैयारी की सूचना भी सुल्तान को मिली । और रानी की ओर से यह आग्रह भी किया गया कि वह अंतिम बार राजा से मिलना चाहतीं है अतएव राजा के बंदी शिविर से होकर सुल्तान के दरबार में हाजिर होंगी। यह सहमति भी मिल गई। चित्तौड़ में दो सौ डोले तैयार हुये ।

कहीं कहीं डोलों की यह संख्या 800 भी लिखी है । कुछ में तो दिखावे के विये महालाएँ थीं पर अधिकांश में लड़ाके नौजवान थे जो अपने राजा को कैद से छुड़ाने का संकल्प लेकर जा रहे थे । अंततः शिविर के कैदखाने के समीप जैसे ही ये डोले पहुँचे सभी सैनिक डोले पालकी से बाहर आये । यह छापामार लड़ाई थी जो गोरा बादल के नेतृत्व में लड़ी गई । किसी को अपने प्राणों का मोह न था वस राजा को मुक्त कराने का संकल्प था । इन सभी का बलिदान हो गया पर राजा मुक्त होकर सुरक्षित किले में पहुँच गये । यह 22 अगस्त 1303 का दिन था । राजा मुक्त होकर किले में आ तो गये थे । पर किले में राशन और सैन्य शक्ति दोनों का संकट था । सेना के अधिकांश प्रमुख सरदार राजा को मुक्त कराने की छापामार लड़ाई में बलिदान हो गये थे । इस घटना से बौखलाए अलाउद्दीन खिलजी का तोपखाना गरजने लगा । अंततः रानी द्वारा जौहरषऔर राजा रतनसिंह द्वारा शाका करने का निर्णय हुआ । 25 अगस्त 1303 से जौहर की तैयारी आरंभ हुई और रात को ज्वाला धधक उठी ।

पूरी रात किले के भीतर की सभी स्त्रियों ने अपने छोटे बच्चों को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश कर लिया । 26 अगस्त के सूर्योदय तक किले के भीतर सभी नारियाँ अपने छोटे बच्चों को लेकर अग्नि में समा गईं इनकी संख्या सोलह हजार बताई जाती है । 26 अगस्त को ही किले के द्वार खोल दिये गये । जितने सैनिक किले में थे वे सब राजा रतनसिंह के नेतृत्व में केशरिया पगड़ी बाँधकर निकल पड़े। भीषण युद्ध हुआ पर यह युद्ध दिन के तीसरे तक ही चल पाया । राजा रतनसिंह का बलिदान हो गया । इस प्रकार 26 अगस्त को राजा ने अपने स्वत्व और स्वाभिमान रक्षा केलिये अंतिम श्वाँस तक युद्ध किया वहीं रानी पद्मावती ने सोलह हजार स्त्री और बच्चों के साथ स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया । इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी किले में घुसा उसे चारों ओर जल्ती अग्नि और राख के ढेर मिले । उसने किले में कत्लेआम का आदेश दिया । अलाउद्दीन खिलजी के इस अभियान का वर्णन अमीर खुसरो की रचना ‘खजाईन-उल-फुतूह’ (तारीखे अलाई) में मिलता है । इस विवरण के अनुसार खिलजी की फौज ने एक ही दिन में लगभग 30,000 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था । अलाउद्दीन खिलजी ने अपने बेटे खिज्र खाँ को चित्तौड़ का शासक नियुक्त किया और चित्तौड़ नाम ‘खिज्राबाद’ कर दिया था ।

रानी पद्मावती का जौहर स्थल आज भी चित्तौड़ में स्थित है । वहाँ लोग जाते हैं। श्रृद्धा सै शीश झुकाते हैं तथा रानी को सती देवी मानकर अपनी इच्छा पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।

भारत-यूएई व्यापार सम्मेलन और पुरस्कार समारोह

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MPIIF एवम् Dawn Media के सहयोग से इन्दौर में आयोजित भारत-यूएई व्यापार सम्मेलन और पुरस्कार समारोह की सफल समाप्ति की घोषणा करते हुए खुशी हो रही है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को मजबूत करना था और दोनों देशों से व्यापारों द्वारा किए गए उत्कृष्ट योगदानों को मान्यता देना था।

भारत-यूएई व्यापार सम्मेलन और पुरस्कार समारोह ने भारत और यूएई से प्रमुख सरकारी अधिकारियों, व्यापार नेताओं और उद्योग के विशेषज्ञों को एकत्रित किया। यह कार्यक्रम नेटवर्किंग, ज्ञान साझा करने और विभिन्न क्षेत्रों में नए व्यापार अवसरों की खोज करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।

सम्मेलन के दौरान, महत्वपूर्ण पैनल चर्चाएं और सक्रिय सत्र आयोजित किए गए, जिनमें व्यापार नीतियों, निवेश अवसरों, नवाचार और सतत व्यापार प्रथाओं जैसे मुख्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया। प्रसिद्ध वक्ताओं ने अपनी विशेषज्ञता और अनुभव साझा करते हुए, भारत और यूएई के बीच सहयोग और विकास की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ताओं का विवरण :-

1. हिज़ हाइनेस इन शेख़ मज़ीद अल मुअल्ला
2. डा. कबीरक के वी सी ओ ओ शेख़ मज़ीद अल मुअल्ला ग्रुप ऑफ़ कंपनीज़
3. माननीय कैलाश विजय वर्गीय जी नेशनल जनरल सेक्रेटरी भा. ज. प.
4. माननीय सांसद शंकर लालवानी जी
5. माननीय कैबिनेट मंत्री एम एस एमी श्री ओम प्रकाश सक्लेचा जी

सम्मेलन के तहत, भारत-यूएई व्यापार पुरस्कार प्रदान किए गए गए, जो दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने में उत्कृष्ट संगठनों और व्यक्तियों की मान्यता और सम्मान करने के लिए थे। पुरस्कार विभिन्न श्रेणियों में दिए गए थे, जिनमें शामिल थे:

1. व्यापार प्रशंसा में उत्कृष्टता – हिज़ हाइनेस इन शेख़ मज़ीद अल मुअल्ला
2. मध्यप्रदेश विशिष्ट सम्मान – क्रिकेटर आवेश ख़ान
3. महिला सशक्तिकरण एवम् जागरूकता सम्मान – श्रीमति जिया मंजरी जी
4. समाज सेवी सम्मान – एस्ट्रोलोजर श्री मीना सिंह चौहान जी
5. वरिष्ठ पत्रकार – महावीर जी

भारत-यूएई व्यापार पुरस्कारों के विजेता एक कठिन मूल्यांकन प्रक्रिया के माध्यम से चुने गए थे, जिसमें व्यापार की वृद्धि, बाजार प्रभाव, सततता प्रथाएं और सामाजिक योगदान जैसे कारकों को ध्यान में रखा गया था।
MPIIF भारत-यूएई व्यापार पुरस्कारों के सभी पुरस्कार विजेताओं को उनकी अद्भुत उपलब्धियों और भारत-यूएई आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के लिए उनकी समर्पणशीलता और प्रयासों के लिए ह्रदय से बधाई देता है। उनका समर्पण और प्रयास अन्य व्यापार और व्यक्तियों के लिए प्रेरणा के रूप में सेवा करते हैं, जो दोनों देशों के विकास और समृद्धि में योगदान देना चाहते हैं।

हम भारत-यूएई व्यापार सम्मेलन और पुरस्कार समारोह को सफलतापूर्वक बनाने में सहयोग करने वाले सभी प्रतिभागियों, प्रायोजकों और साथियों का आभार व्यक्त करना चाहेंगे। उनका समर्थन और सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण चर्चाओं को सुविधाजनक बनाने और मूल्यवान संपर्क बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अमृतकाल की प्रथम प्रभा में चन्द्रमा पर भारत

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23 अगस्त की शाम 6 बजकर 4 मिनट पर चन्द्रयान 3 ने जैसे ही चन्द्रमा पर सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग की। सम्पूर्ण देश अपने वैज्ञानिकों एवं राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रति कृतज्ञता से भर गया। भारत विश्व का पहला देश है जिसने चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर कदम रखे हैं। और चन्द्रयान 3 अभियान की शुरुआत से लेकर ही जो बहुप्रतीक्षित घड़ी थी, वह जब साकार हुई तो भारतमाता का ललाट प्रखर प्रकाश पुञ्ज से चमकने लगा। चन्द्रयान ने इसरो को जैसे ही सन्देश भेजा – “भारत, मैं अपने गन्तव्य पर पहुंच गया हूँ और आप भी ’ , चंद्रयान-3 ने चांद पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की। बधाई हो, भारत ।”

यह सुनते ही राष्ट्र एवं भारतवंशियों की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं रहा। और चन्द्रमा पर भारत का विश्वविजयी प्रतीक तिरंगा लहराने लगा। इसी के साथ अमेरिका, रुस ,चीन के बाद चन्द्रमा पर पहुंचने वाला चौथा देश भारत बन गया है। लेकिन इन सबसे महत्वपूर्ण जो बात है वह यह कि चन्द्रयान 3 की कुल लागत मात्र 615 करोड़ रुपये के लगभग है, जो किसी भी देश के अभियान से बहुत कम है। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन ( इसरो) के भारतीय ऋषि परम्परा के संवाहक वैज्ञानिकों ने जिस प्रकार से राष्ट्र के गौरव को बढ़ाया है, वह कोटिश: अभिनंदनीय है। वहीं 14 जुलाई 2023 को चन्द्रयान अभियान की शुरुआत के साथ ही भारतवर्ष में श्रीरामजन्मभूमि निर्माण के निर्णय के समान ही उत्साह एवं मङ्गल की भावना दृष्टव्य होती दिखाई दे रही थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसरो के सजीव प्रसारण के साथ जोहानिसबर्ग से जुड़े और उन्होंने इसरो को बधाई देते हुए सम्पूर्ण राष्ट्र को सम्बोधित किया। उन्होंने भारत की जी – 20 की की अध्यक्षता के ध्येय वाक्य ‘ एक पृथ्वी- एक परिवार – एक भविष्य’ से भी इस अभियान को जोड़ते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा पर पुनश्च बल दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता सम्हालते ही भारत के ज्ञान – विज्ञान – अनुसंधान एवं‌ नवाचारों को लेकर जिस प्रकार से प्रतिबध्दता व्यक्त की है। वह सशक्त नेतृत्व का परिचायक है। वे जिस प्रकार से चन्द्रयान 2 अभियान के समय इसरो के पूर्व प्रमुख के.सिवन के गले लगकर रोये थे, और सभी वैज्ञानिकों का साहस बढ़ाया था। यह उनकी उसी दृष्टि और वैज्ञानिकों की राष्ट्रनिष्ठा – ध्येयनिष्ठा का ही परिचायक है कि अब चन्द्रयान 3 ने विश्व इतिहास रच दिया है। उन्होंने इसरो प्रमुख डॉ. एस .सोमनाथ से फोन पर कहा- “सोमनाथ जी! आपका तो नाम सोमनाथ, और ये नाम चंद्र से जुड़ा हुआ है। इसीलिए आज आपके परिवार जन भी बहुत खुश होंगे। मेरी तरफ से आपको, आपकी टीम को बहुत-बहुत बधाई। ”

और जब देश का नेतृत्व इस प्रकार से अपने वैज्ञानिकों के साथ खड़ा होता है, तो उसके सकारात्मक परिणामों से सृजन का अमृतकुम्भ ही प्रकट होता है। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स समिट के दौरान भारत की वैश्विक दृष्टि को प्रस्तुत करते हुए कहा — “भारत के लिए बहुत गर्व की बात है कि उसकी उपलब्धि को पूरी मानवता की उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।ऐतिहासिक मौके पर भारत के लोगों और वैज्ञानिकों की तरफ से दुनिया के अन्य वैज्ञानिकों और विश्व के वैज्ञानिक समुदाय को उनकी शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद देता हूं।”

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी अपने शुभकामना संदेश में बधाई देते हुए कहा – “चंद्रयान-3 की लैंडिंग एक महत्वपूर्ण अवसर, एक ऐसी घटना जो जीवनकाल में एक बार होती है। इस उपलब्धि ने भारत को गौरवान्वित किया। उन्होंने कहा कि चंद्रयान-3 की चंद्रमा की सतह पर लैंडिंग के साथ वैज्ञानिकों ने इतिहास रच दिया है। मैं इसरो, चंद्रयान-3 मिशन में शामिल सभी लोगों को बधाई देती हूं और उन्हें आगे और बड़ी उपलब्धियां हासिल करने की शुभकामनाएं देती हूं।”

वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बधाई देते हुए कहा कि –
“अभी तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर कोई नहीं उतरा था, हमारे वैज्ञानिकों ने लंबे परिश्रम के पश्चात वहां उतरने का पहला मान प्राप्त किया है। संपूर्ण देश के लिए ही नहीं, सारे विश्व की मानवता के लिए।सारे विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम् की अपने स्नेह से आलोड़ित करने वाली दृष्टि को लेकर भारत अब शांति और समृद्धि विश्व को प्रदान करने वाला भारत बनने की दिशा में अग्रसर हुआ है। इसका प्रतीक आज का हम सबके आनंद का यह क्षण है। हमारे वैज्ञानिक कठोर परिश्रम से यह जो धन्यता का क्षण हमारे लिए खींच कर लाए हैं, उसके लिए हम उनके कृतज्ञ हैं और सारे वैज्ञानिकों का, उनको प्रोत्साहन देने वाले शासन-प्रशासन, सबका हम धन्यवाद करते हैं, हम उन सबका अभिनंदन करते हैं। भारत उठेगा और सारी दुनिया के लिए उठेगा। भारत विश्व को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की प्रगति की राह पर अग्रसर करेगा, यह बात अब सत्य होने जा रही है। ”

और इसरो प्रमुख डॉ.सोमनाथ ने कहा कि चंद्रयान-3 की सफलता इसरो नेतृत्व और वैज्ञानिकों की कई पीढ़ियों की मेहनत का परिणाम है। यह सफलता ‘बहुत बड़ी’ और ‘प्रोत्साहित करने वाली’ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी दक्षिण अफ्रीका से ऑनलाइन माध्यम से इस अभियान के साक्षी बने। और उन्होंने वैज्ञानिकों के प्रयासों की प्रशंसा की। यह वह यात्रा है जो चंद्रयान-1 से शुरू हुई थी, जो चंद्रयान-2 में भी जारी रही और चंद्रयान-2 अब भी काम कर रहा है और तीव्र गति से संदेश भेज रहा है‌ ‌‌।”

प्रधानमंत्री मोदी जब चन्द्रयान 3 की सफलता के के साथ ही इसरो के सजीव प्रसारण के माध्यम से सम्बोधित कर रहे थे‌ । उस समय भारत सहित समूचा विश्व भारत की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहा था। क्योंकि विश्वजगत यह जानता है कि भारत की प्रगति विश्व कल्याण का पथ प्रशस्त करने वाली है और भारत यानि विश्वमानवता का संवाहक है। भारत यानि प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु और सर्वे भवन्तु सुखिनः को चरितार्थ करने वाला है। प्रधानमंत्री मोदी का यह वक्तव्य उसी भावभूमि को निरुपित करता है —
“जब हम अपनी आंखों के सामने ऐसा इतिहास बनते हुए देखते हैं, तो जीवन धन्य हो जाता है। ऐसी ऐतिहासिक घटनाएं, राष्ट्र जीवन की चिरंजीव चेतना बन जाती है। ये क्षण अभूतपूर्व है. ये क्षण विकसित भारत के शंखनाद का है। ये क्षण नए भारत के जयघोष का है। ये क्षण मुश्किलों के महासागर को पार करने का है।ये क्षण जीत के चंद्रपट पर चलने का है। ये क्षण 140 करोड़ धड़कनों के सामर्थ्य का है
ये क्षण भारत में नई ऊर्जा, नया विश्वास, नई चेतना का है।ये क्षण भारत के उदयमान भाग्य के आह्वान का है। अमृतकाल के प्रथम प्रभा में सफलता की ये अमृतवर्षा हुई है।हमने धरती पर संकल्प लिया, और उसे चांद पर साकार किया
हमारे वैज्ञानिक साथियों ने भी कहा, भारत अब चांद पर पहुंच गया है।आज हम अंतरिक्ष में नए भारत की नई उड़ान के साक्षी बने हैं।”

वहीं प्रधानमंत्री मोदी विदेश यात्रा के बाद भारत आने पर सीधे बेंगलुरु में इसरो के वैज्ञानिकों के बीच पहुंचे। उन्होंने वैज्ञानिकों को सम्बोधित करते हुए कहा — “मैं आपसे जल्द से जल्द मिलना चाहता था और आपको सलाम करना चाहता था… आपके प्रयासों को सलाम।”

और प्रधानमंत्री चन्द्रयान – 3 की सफलता के दिवस यानि 23 अगस्त को राष्ट्रीय अन्तरिक्ष दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। साथ ही उन्होंने भारत की सांस्कृतिक पहचान की कीर्ति पताका को फहराने की दृष्टि से जिस प्रकार से घोषणा की वह सभी को गौरवबोध से भरने वाली है। उन्होंने वैज्ञानिकों के मध्य कहा –
“ हम वहां पहुंचे जहां कोई नहीं पहुँचा था। हमने वो किया जो पहले कभी किसी ने नहीं किया।मेरी आँखों के सामने 23 अगस्त का वह दिन, वह एक-एक सेकंड , बार-बार घूम रहा है। जब टच डाउन कन्फर्म हुआ तो जिस तरह यहां इसरो सेंटर में, पूरे देश में लोग उछल पड़े, वह दृश्य कौन भूल सकता है। कुछ स्मृतियाँ अमर हो जाती हैं। वह पल अमर हो गया। चन्द्रमा के जिस हिस्से पर हमारा चन्द्रयान उतरा है, भारत ने उस स्थान के भी नामकरण का फैसला लिया है। जिस स्थान पर चंद्रयान-3 का मून लैंडर उतरा है, अब उस प्वाइंट को ‘शिवशक्ति’ के नाम से जाना जाएगा। और चंद्रमा के जिस स्थान पर चंद्रयान-2 अपने पदचिन्ह छोड़े हैं, वह प्वाइंट अब ‘तिरंगा’ कहलाएगा। ये तिरंगा प्वाइंट भारत के हर प्रयास की प्रेरणा बनेगा, ये तिरंगा प्वाइंट हमें सीख देगा कि कोई भी विफलता आखिरी नहीं होती है। साथ भी प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात को भी विशेष रूप से उल्लेखित किया — ‘एक समय था जब हमारी गिनती थर्ड रो में होती थी। आज ट्रेड से लेकर टेक्नोलॉजी तक, भारत की गिनती पहली पँक्ति यानी ‘फर्स्ट रो’ में खड़े देशों में हो रही है। ‘थर्ड रो’ से ‘फर्स्ट रो तक की इस यात्रा में हमारे ‘इसरो’ जैसे संस्थानों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।”

और इस प्रकार से चन्द्रयान 3 की सफलता के साथ ही भारत ने विश्व के समक्ष एक अमिट लकीर खींच दी है। बस चारो ओर वन्दे मातरम् , भारतमाता की जयका उद्-घोष सुनाई दे रहा है। साथ ही आगामी समय में चन्द्रयान से आने वाले वैज्ञानिक निष्कर्षों ने नए भारत का भवितव्य प्रकट होगा और विश्वगुरु भारत के संदेश से समूची दुनिया लाभान्वित होगी‌ । भारत की प्रगति विश्वमानवता और कृण्वन्तो विश्वमार्यम को चरितार्थ करेगी।

~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
(कवि, लेखक, स्तम्भकार पत्रकार)

आर्थिक व जातिगत विषमता सामाजिक एकता में बाधक : कौशल किशोर

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सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए समरसता विभाग कटिबंध : श्याम प्रसाद

केन्द्रीय आवासन एवं शहरी कार्य राज्यमंत्री माननीय कौशल किशोर ने शनिवार को गोमतीनगर स्थित उत्तर प्रदेश पर्यटन भवन के सभागार में ”समानता के प्रतीक बुद्ध और विवेकानन्द” पुस्तक का लोकार्पण किया। इस पुस्तक को सामाजिक समरसता गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक श्री के.श्याम प्रसाद जी ने लिखी । कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के सह क्षेत्र संघचालक माननीय राम कुमार वर्मा ने की। अतिथियों द्वारा भारत माता, महात्मा बुद्ध और स्वामी विवेकानन्द के चित्रों पर पुष्पांजलि के बाद कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ।

पुस्तक के लेखक और सामाजिक समरसता गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक श्री के. श्याम प्रसाद ने इस अवसर पर कहा कि सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए सामाजिक समरसता विभाग कटिबंध है। उन्होंने कहा कि

स्वामी विवेकानन्द पर बुद्ध का गहरा प्रभाव था। बुद्ध और विवेकानन्द ने हर तरह के भेदभाव के खिलाफ प्रचार किया।
अलग—अलग कालखण्ड व विभिन्न परम्पराओं से संबंधित होते हुए भी दोनों महापुरूषों के बीच कई समानताएं हैं।
श्याम प्रसाद ने कहा कि बुद्ध और विवेकानन्द दोनों समता के श्रेष्ठ प्रतीक हैं। दोनों श्रेष्ठ धर्म प्रचारक हैं। भारत के उत्थान और विश्व शांति के लिए दोनों महापुरूषों ने काम किया। आज भारत में सामाजिक समता की बहुत आवश्यकता है। सबके बीच में समता खड़ा करने के बाद ही राष्ट्र का विकास होगा।

श्री श्याम प्रसाद ने कहा कि भारत के विकास के लिए,भारत में समता के लिए,धर्म की रक्षा के लिए तथा विश्वशांति के लिए बुद्ध के अनुयाई व विवेकानंद के अनुयाई मिलकर काम करना आज की आवश्यकता है।

केंद्रीय राज्य मंत्री कौशल किशोर ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि समाज से आर्थिक व जातिगत विषमता हटेगी तभी सामाजिक समरसता आएगी। आर्थिक व सामाजिक विषमता ही एकता में बाधक है।

उन्होंने कहा कि बुद्ध और विवेकानंद की शिक्षाओं को जीवन में उतारने की आवश्यकता है। हमें सनातनी एकता को लाने के लिए जाति सूचक शब्द हटाने होंगे ।  महात्मा बुद्ध और विवेकानंद ने अपने नाम के आगे जात नहीं लिखी।

कौशल किशोर ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सनातन की परंपरा के अनुसार काम कर रहा है। संघ के स्वयंसेवक अपने नाम के आगे जात नहीं लिखते हैं। उन्होंने कहा कि समरसता के लिए बुद्धि आवश्यक है। नशा बुद्धि का नाश कर देती है इसलिए नशा से बचिए और बच्चों को नशा से दूर रखिए। नशा मुक्त रक्षाबंधन मनाएं। उन्होंने कहा कि विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत के साथ-साथ नशा मुक्त भारत और नशा मुक्ति परिवार बनाए। उन्होंने कहा कि समाज को बराबरी देने का काम मोदी सरकार कर रही है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  सह क्षेत्र संघचालक रामकुमार वर्मा ने कहा कि महात्मा बुद्ध और स्वामी विवेकानंद ने समाज में समानता लाने व ऊंच नीच को दूर करने का काम किया। दोनों महापुरुषों का लक्ष्य एक था। सह क्षेत्र संघचालक  ने कहा कि हिंदुओं में हिंदुत्व का भाव समानता का भाव और समरसता का भाव आवश्यक है। हिंदू समाज में एकता निर्माण करने के लिए हमें प्रयास करना चाहिए।

रामकुमार वर्मा ने कहा कि जब तक हिंदू समाज संगठित नहीं होता समरस नहीं होता तब तक हिंदू समाज की शक्ति दिखाई नहीं देती। अगर हम सशक्त हिंदू समाज का संगठन करना चाहते हैं तो सामाजिक समरसता लानी होगी।

कार्यक्रम का संचालन आत्म प्रकाश ने किया।

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