असम के आठ अखबारों को चुनाव आयोग ने भेजा नोटिस

113-18.jpg

कांग्रेस ने असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास तथा आठ अखबारों के खिलाफ कथित रूप से खबर के रूप में विज्ञापन छपवाने के लिए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है।

चुनाव आयोग ने इस आठों अखबारों को कांग्रेस की शिकायत के बाद नोटिस जारी किया है। बताया जाता है कि इन अखबारों ने अधिकारियों के समक्ष अपनी रिपोर्ट जमा कर दी हैं, जिन्हें अब चुनाव आयोग को भेजा गया है।

मीडिया खबर के अनुसार, अपनी शिकायत में कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि न्यूज के रूप में छपे इस विज्ञापन के जरिये भाजपा ने ऊपरी असम की उन सभी सीटों पर अपनी जीत का दावा किया है, जहां 27 मार्च को पहले चरण में मतदान हुआ था।

असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एपीसीसी) के विधि विभाग के अध्यक्ष निरन बोरा का कहना है कि आदर्श आचार संहिता, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126ए के प्रावधानों और 26 मार्च को जारी चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के कथित उल्लंघन के लिए रविवार की रात शिकायत दर्ज कराई गई।

बोरा का कहना है कि मुख्यमंत्री, भाजपा अध्यक्ष, प्रदेश इकाई के प्रमुख तथा पार्टी के अन्य सदस्यों ने दूसरे और तीसरे चरण में मतदाताओं के प्रभावित करने की पूर्व नियोजति साजिश के तहत जानबूझकर विभिन्न अखबारों के पहले पन्नों पर न्यूज के रूप में विज्ञापन दिया है। इसमें दावा किया गया है कि भाजपा ऊपरी असम की सभी सीटों पर जीत हासिल करेगी।

विज्ञापन प्रकाशन के खिलाफ रविवार को प्रदेश कांग्रेस ने असम के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नितिन खाड़े जबकि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) ने चुनाव आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज कराते हुए बीजेपी और अखबारों के खिलाफ कार्रवाई का अनुरोध किया है।

लखनऊ में कोविड जांच में पॉज़िटिव पाए गए कई पत्रकार

113-17.jpg

कोरोना पहले से भी खतरनाक सूरत में रिटर्न हो चुका है। करीब आठ सौ लोगों की सहभागिता वाला उ.प्र.राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति का चुनाव करवाकर पत्रकार झेल रहे हैं। पछता रहे हैं कि जब कोरोना ने दुबारा दस्तक दे दी थी तो क्यों चुनाव करवाया। इस चुनाव को थोड़ी समय अवधि के लिए और आगे बढ़ा दिया जाता तो साथी पत्रकार की जिन्दगी नहीं जाती। ये चुनाव देर से होता तो कौन सा काम रुक जाता ! देश की रफ्तार और पत्रकारिता का सिलसिला भी नहीं रुक जाता। 

एक दर्जन से अधिक जर्नलिस्ट और उनके परिजन पत्रकारों के चुनाव के तुरंत बाद कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं और एक पत्रकार की मौत हो चुकी है। अंदाजा लगाइए कि जब आठ सौ पत्रकारों की सहभागिता वाले चुनाव ने पत्रकारों पर क़हर बरपा कर दिया तो लगभग बारह करोड़ अट्ठाइस लाख से अधिक लोगों की सहभागिता वाले यूपी के पंचायती चुनाव पर कोरोना संक्रमण के कितने खतरे मंडरा रहे होंगे।

कोविड के खतरों में जब संवाददाता समिति के चुनाव में इतने पत्रकार संक्रमित हो सकते हैं और एक पत्रकार की मौत हो सकती है तो इतने बड़े पंचायत चुनाव में बेहद एहतियात बरतने की आवश्यकता होगी। हर पत्रकार शासन द्वारा राज्य मुख्यालय की प्रेस मान्यता नहीं हासिल करता है। सौ में पांच पत्रकार ही स्टेट एक्रीडेटेड होते हैं। जो राजधानी में शासन की राज्य स्तरीय खबरें कवर करते हैं उन्हें ये प्रेस मान्यता मिलती है।

स्वाभाविक है कि ये पत्रकार काफी वरिष्ठ, तजुर्बेकार, जिम्मेदार, जागरूक और नियम कानूनू का पालन करने वाले होते होंगे। इनकी संवाददाता समिति का चुनाव भी सरकार की परमीशन और निगरानी मे होता है। ये चुनाव किसी आम जगह नहीं बल्कि प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण स्थान विधान भवन में होता है। इनके उम्मीदवार, वोटर और चुनाव अधिकारी भी जिम्मेदार वरिष्ठ पत्रकार होते है। फिर भी इस चुनाव पर कोरोना ने हमला कर दिया।

दूसरे दिन चुनाव के नतीजे आए जिसमें तमाम विजेताओं में प्रमोद श्रीवास्तव नाम के एक विजेता पत्रकार शामिल थे। नतीजे के दूसरे दिन इनकी तबियत बिगड़ी तो पता चला कि कोरोना संक्रमित हैं। केजीएमयू में एडमिट हुए, वेंटीलेटर पर रखा गया और दूसरे ही दिन इनकी मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद तमाम और पत्रकार संक्रांति थे। कुछ को बुखार जैसे लक्ष्ण महसूस हुए।

पत्रकारों की मांग पर दूसरे ही दिन एनेक्सी मीडिया सेंटर में जांच के लिए विशेष इंतेजाम किए गए। करीब साठ पत्रकारों ने जांच कराए जिसमें कई पत्रकार संक्रमित पाए गए। कुल लगभग एक दर्जन पत्रकार कोरोना का शिकार जाहिरी तौर पर है। साठ लोगों की जांच में जितने जर्नलिस्ट के संक्रमित होने की पुष्टि हुई है अंदाजा लगाइए कि चुनाव में सहभागी करीब आठ सौ पत्रकारों की जांच हो तो उसमें कितने संक्रमित होंगे !

कोविड जांच में पॉज़िटिव पत्रकारों की सूची-

1-आलोक त्रिपाठी
2- विजय त्रिपाठी
3- ज़फ़र इरशाद
4- श्रीमती मुकुल मिश्रा
5- उन्मुक्त मिश्रा
6- विशाल प्रताप सिंह
7- अरविंद चतुर्वेदी
8- मनीष पांडेय
9- ( मनीष पांडेय की बेटी)
10- अभिनव पांडेय
11- ख़ुर्रम निज़ामी
12- आशुतोष गुप्ता
13- अभिषेक रंजन

महसूस करने वाली और जागरुक करने वाला पहलू है कि जब तमाम एहतियातों और सरकार की निगरानी में विधानभवन में हुए बुद्धिजीवी वर्ग के चुनाव में पत्रकारों पर कोरोना बम फट सकता है तो पंद्रह करोड़ से अधिक लोगों की सहभागिता वाले गांव-देहातों में होने जा रहे पंचायत चुनावों में कितनी एहतियात बरतने की जरुरत है।

होली अर्थात विस्मृत वैदिक नव वर्ष

ललित मिश्र

ललित मिश्र

भाषाविज्ञान के अनुसार “होली” शब्द “होला” शब्द से व्युत्पन्न है, जो कि पूर्णिमा के पश्चात भोर के ४ बजे की प्रथम होरा का समय है

स्प्ष्ट है कि “होला” से भी आशय पूर्णता के बाद प्रगति की ओर बढते हुए प्रथम उल्लास से होता है

ऋग्वेद से संबंधित ऐतरेय ब्राह्मण मे उदीच्योँ का उल्लेख है, ये उदीच्य लोग अपने स्थान को “होला” कहते रहे है, वर्तमान के गुजरात प्रदेश के पाटन क्षेत्र मे उदीच्य बहुतायत से प्राप्त होते है, शब्दिक साम्य के आधार पर यदि कहे तो हो सकता है कि पाटन क्षेत्र मे होली की शुरुआत होई होगी, किन्तु अलग से कोई साक्ष्य प्राप्त नही होता है.

शतपथ ब्राह्मण ( ६.२.२.१८ ) मे कहा गया है कि, संवत्सर की प्रथम रात्रि फ़ाल्गुन मास की पूर्णिमा होती है, तात्पर्य यह कि, वैदिक संवत्सर होली से शुरु होता रहा है और होली नये वर्ष को मनाने का त्योहार हौ, इतना विशाल और रंगीन नया वर्ष शायद ही कही और, किसी और सभ्यता मे मनाया जाता रहा हो

!! एषा ह संवत्सरस्य प्रथमरात्रिर्फ़ाल्गुनपूर्णमासी !! 

शतपथ ब्राह्मण ( ६.२.२.१८ )

ऐसे ही कथन हमे तांड्य महाब्राह्मण, गोपथ ब्राह्मण एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण मे प्राप्त होते है

 होलीकोत्सव का प्राचीनतम मौर्यकालीन (२५० – ३०० वर्ष ईसा पूर्व ) पुरातात्विक अभिलेख, विन्ध्य पर्वत माला के अन्तर्गत कैमूर की छोटी – छोटी पहाडियों के मध्य बसे हुये रामगढ जो कि छ्त्तीसगढ के अम्बिकापुर जिलॆ मे आता है, से प्राप्त हो गया है, कहने का अर्थ यह कि होली त्योहार मनाने का सिल्सिला अनवरत चालू है

ऐतिहासिक साक्ष्यों मे राजा हर्ष की रत्नावली (लगभग ६०० ईसवी) मे एवं दन्डिन की दश कुमार चरित (लगभग ८०० ईसवी) मे प्राप्त होता है

किन्तु आजादी के बाद होली के अवसर पर शुरू होने वाले वैदिक संवत्सर के स्थान पर शक संवत्सर को प्रधान बना दिया गया, हिंदू संगठन भी इसी शक संवत्सर को अपनाकर चल रहे है।

(लेखक इंडोलाजी फाउंडेशन के संस्थापक हैं)

बांग्लादेश की आजादी और जनसंघ

113-15.jpg

26 मार्च 1971 को शेख़ मुजीबुर रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान को अलग स्वतंत्र देश “बांग्लादेश” घोषित कर दिया था.  पूर्वी पाकिस्तान की बगावत को रोकने के लिए    पश्चिमी पापिस्तान (वर्तमान पापिस्तान) की सेना, पूर्वी पापिस्तान ( वर्तमान बांग्लादेश) की जनता पर अमानवीय अत्याचार कर रही थी. 

पूर्वी पापिस्तान से लाखों की संख्या में शरणाथी भारत में आ रहे थे, जिनमे प्रताड़ित हिन्दुओ की संख्या बहुत ज्यादा थी. ऐसे में भारत्तीय जनसंघ ने सरकार से आग्रह किया कि- बांग्लादेश को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी जाए, मगर इंदिरा गांधी ने इसे पापिस्तान का आंतरिक मामला कह दिया था.

भारत द्वारा बांग्लादेश को मान्यता देने की मांग को लेकर तब जनसंघ ने आंदोलन किया था. मगर इंदिरा गांधी का मानना था कि यह पाकिस्तान का अंदरूनी मामला है. सरकार पर दबाब बनाने के लिए जनसंघ ने जेल भरो आंदोलन भी चलाया था. जनसंघ के अनेकों कार्यकर्ता तब जेल गए थे.

बांग्लादेश में पाकिस्तान सेना द्वारा चुन चुन कर हिन्दू जनता पर अत्याचार किया जा रहा था लेकिन इसे भारत सरकार मुसलमानो का हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं मान रही थी बल्कि इसे उर्दू भाषियों का बांग्लाभाषियों पर अत्याचार कह रही थी. इस बात को लेकर जनसंघ नाराज था.  

प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में राजनीति और अंतरराष्‍ट्रीय संबंध के प्रोफेसर जे. बास की किताब  ‘The Blood Telegram: Nixon, Kissinger and a Forgotten Genocide” के मुताबिक भी  वह युद्ध मूल रूप से पूर्वी पाकिस्‍तान में रह रहे हिंदुओं के खिलाफ हो रहा था.  

कांग्रेसी बखान करते हैं कि- इंदिरा ने पाकिस्तान के दो टुकड़े किये थे जबकि हकीकत यह है कि- बांग्लादेश द्वारा 26 मार्च 1971 को अपने आपको पाकिस्तान से अलग घोषित किये जाने के बाद तब से लेकर 3 दिसंबर 1971 तक इंदिरा गांधी इसे पाकिस्तान का आंतरिक मामला ही मानती थी.

3 दिसंबर 1971 को भी इंदिरा गांधी कलकत्ता में लोगों को यही समझा रहीं थी. वो तो अति उत्साह में आकर पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 को भारत के कई शहरों पर एक साथ हवाई हमला (आपरेशन चंगेजखान) कर दिया और इसके कारण की भारत को पाकितान के साथ युद्ध का ऐलान करना पड़ा.

इंदिरा गांधी की सहेली पुपुल जयकर ने तो अपनी किताब में यहाँ तक लिखा है कि – आपरेशन चंगेज खान के बाद भी इंदिरागांधी युद्ध का ऐलान करने में संकोच कर रहीं थी. तब जनरल मानेकशा ने धमकी भरे स्वर में कहा था कि – युद्ध की घोषणा आप करती हैं या फिर मैं करूँ.   

अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि हम न केवल मुक्ति संग्राम में जीवन की आहुति देने वालों के साथ हैं बल्कि हम इतिहास को भी एक नई दिशा देने का प्रयत्न कर रहे हैं. नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘बांग्लादेश की आजादी के लिए संघर्ष में शामिल होना, मेरे जीवन के भी पहले आंदोलनों में से एक था 

मोदी जी उस आंदोलन के समय में कब से कब तक जेल में रहे थे ये तो वे या उनका PRO बता सकता है लेकिन यह सत्य है कि – बांग्लादेश को स्वतंत्र देश की मान्यता दिलाने के लिए जनसंघ ने जेल भरो आंदोलन चलाया और उसके अनेकों कार्यकर्ता जेल गए थे.

बांग्लादेश अपना स्वाधीनता दिवस 26 मार्च 1971 को मनाता है. बांग्लादेश को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला पहला देश भूटान था जबकि भारत ने 6 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश को मान्यता दी थी.  पाकिस्तान ने 1974 में स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी थी।

(जीवाभाई अहीर की कलम से।)

scroll to top