आंदोलनों में लगे दीमक हैं आंदोलनजीवी

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 डॉ. सुजाता मिश्र

आज़ादी का संघर्ष भारतीय समाज में पुनर्जागरण का एक ऐसा दौर था जिसमें  नये भारत का भविष्य लिखा जा रहा था। तमाम तरह की समाजिक विसंगतियों से मुक्ति, रुढिवाद से मुक्ति और नये – बेहतर कल के इस राष्ट्रीय कायाकल्प का आधार ही “राष्ट्रवाद” था। समाज का बुद्धिजीवी  वर्ग इस बदलाव का पथ प्रदर्शक था, जिसमें स्वामी दयानंद सरस्वती, राजाराम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर , स्वामी विवेकानंद जैसे राष्ट्रभक्त शामिल थे। इसके साथ ही साहित्यकारों , पत्रकारों का देशभक्त वर्ग भी नवजागरण के इस प्रकाश को गांव – कस्बों सहित समस्त देश में फैला रहा था। मकसद था विदेशी शासन से मुक्ति…. स्वराज्य की स्थापना, इसीलिये आत्मगौरव , राष्ट्र्गौरव के भाव को जन – जन में जगाने का प्रयास शुरु हुआ। ये सभी राष्ट्र्भक्त बुद्धिजीवी , सजग समाजिक समूह ही समाज सेवक कहलाये। जनता के मार्गदर्शक के रूप में इनका स्थान सत्ता से , पुलिस प्रशासन से यहां तक की अंग्रेजी कानूनों से भी ऊपर था।

वर्ष 1947 में देश आज़ाद हो गया, लेकिन तब तक पत्रकारों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग पुन: रीतिकालीन दरबारी परिवेश में लौट गया था। ब्रिटिश हुकूमत के रहते यह वर्ग अंग्रेजों को खुश करने हेतु, उनका दिल जीतने हेतु साहित्य सृजन करता था, बदले में बडे – बडे सम्मान, पुरस्कार और पद प्राप्त करता था। इसी कथित बुद्धिजीवी अवसरवादी वर्ग ने अंग्रेजी शासन से विरुद्ध संघर्ष की दिशा बदलकर धर्म, जाति , गरीबी, अमीरी पर केंद्रित कर दी। परिणामत: देश आज़ाद तो हुआ किंतु मज़हबी आधार पर बंटवारे के साथ। समाज को धर्म- मज़हब , अमीर – गरीब और जातिगत वर्गो में बांटने वाले झंडाबरदार अब समाज सुधारक कहलाये जाने लगे। साहित्य, सिनेमा,  गीतों के माध्यम से बडे जतन और चालाकी के साथ आमजन के मन से पत्रकारों और एनजीओ धारी व्यावसायिक समाज सेवकों को समाज के सच्चे हितैषी के रूप में स्थापित किया गया। ये जो कहे वही सौ आना सच। ये जब चाहे, जिसके खिलाफ मोर्चा खोल दें। गांधी जी को अपना “ब्रांड अम्बेसडर” बनाकर इन लोगों ने इस देश में अहिंसा पूर्वक विरोध के नाम पर धरना, प्रदर्शन , अनशन को एक राजनीतिक तमाशा बनाकर रख दिया। बात – बात पर लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देना किंतु स्वयं को जनता द्वारा चुनी गयी सरकार से भी ऊपर मानना! व्यक्तिवाद, क्षेत्रवाद,जातिवाद के पहिये पर सवार होकर खुद को समाज सुधारक कहने वाले इस वर्ग का सीधा विरोध  राष्ट्र के हर उस तत्व  से है जिनपर आज़ादी से पूर्व के समाज सुधारकों को गर्व था। राष्ट्रभाषा, राष्ट्र सेना, राष्ट्र की प्रशासनिक व्यवस्था, राष्ट्र की कानून व्यवस्था , राष्ट्र के वो व्यवसायी जिनके उद्योगो के दम पर करोडों लोगों को रोजगार मिला हुआ है…. जिनके दम पर राष्ट्र की अर्थव्यवस्था चलती है। राष्ट्र की अवधारणा के विरुद्ध चलने वाले ये कैसे समाज सुधारक हैं? यह विमर्श का मुद्दा है!

  आज़ादी के बाद इस देश में एक लम्बे समय तक लोकतंत्र के नाम पर एक ही परिवार का राजतंत्र चलता रहा। यह इन कथित समाज सुधारकों के लिये स्वर्ण काल था। धडल्ले से लाखों प्रकार के एनजीओ इस देश में बने….लेकिन समाज की स्थिति वही की वही रही …. एक वक्त ऐसा था कि चार बेरोजगार दोस्त मिलकर यह सोचकर ही एनजीओ बना लेते थे कि “यार बहुत कमाई है इसमें” …. एनजीओ की आड में कितनी समाज सेवा हुई यह तो समाज की स्थिति ही देखकर समझ आ जाता है। पर जब सईयां भये कोतवाल तो डर काहे का? कांग्रेसी शासन में इन कथित समाज सेवियों को राष्ट्रीय – अंतराष्ट्रीय सम्मानों से नवाज़ा गया…. बडे – बडे पद दिये गये। रणनीतिकार के रूप में ये समाज से सहयोगी बने रहे और बढियां मलाई खाते रहे। गरीबी भुखमरी में उलझी जनता इन्हें “मसीहा” के रूप में देखती रही। गरीबों के जीवन से जुडे जो सुधार कार्य जो सरकार को करने थे वो सरकार की छ्त्रछाया में पलने वालें पत्रकार और एनजिओं कर रहे थे…. यहीं से इनकी जडे फैलती चली गयी, और अब सिनेमा जगत के लोग भी इनके झंडे थाम कर खडे हो गये।

2014 में इस देश में दो बडे बदलाव हुए, एक तरफ जहां एक कर्मठ प्रधानमंत्री  देश को मिला, तो वहीं एनजिओ से जन्मा एक मुख्यमंत्री देश की राजधानी दिल्ली को मिला। कर्मठ प्रधानमंत्री ने अपनी इच्छाशक्ति , संकल्पशक्ति और रणनीति के दम पर देश में अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन किये। जम्मू कशमीर से अनुच्छेद 370 को हटाना, मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के खौफ से मुक्ति, घर – घर बिजली,गरिबों को आवास,गैस चूल्हा  वितरण …. सब ऐसे कार्य जिनके दम पर बरसों से सामाज सेवकों की दुकानें चलती थी।

दूसरी ओर एनजीओ और आंदोलन  से जन्मी दिल्ली की सरकार है, जिसने दिल्ली को आंदोलनकारियों  की नयी प्रयोगशाला बना दिया है। देश के तमाम मुद्दे अब दिल्ली की सडकों पर ही उठाये जाते हैं….विद्यार्थियोंकी समस्या हो या किसानों की, बेरोजगारों की समस्या हो या पेंशनधारियों की, स्त्रीयों की सुरक्षा का मुद्दा हो या समलैगिकों के अधिकारों की लडाई हो…. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक देश के हर मुद्दे को आवाज़ देने वाले वही गिने – चुने चेहरे …. ये प्रोफेशनल समाज सेवी हैं! हर वक्त नये मुद्दों की तलाश में रहते हैं! आंदोलन ही इनका व्यवसाय है…. प्रोपोगैंडा इनका हथियार …. भय का व्यापार करते हैं और दिल्ली के आस – पास मौजूद तमाम मीडिया हॉउस 24 घंटे इनके प्रोपोगैंडा को ही राष्ट्रीय विमर्श का मुद्दा बनाकर दिखाते हैं! आंदोलनजीवियों का यह खेल तब तक चलता रहेगा , जब तक जनता स्वयं जिम्मेदार बनकर इनके दावों और हकीकत का मेल करना नहीं सीखेगी। मोदी जी ने शुरुआत की है, अब जनता को पहचानना होगा …. इन परजीवी आन्दोलनजीवी व्यावसायिक समाज सेवियों को।

(लेखिका भोपाल रहती हैं। पेशे से प्राध्यापक हैं। अध्ययन और लेखन उनके रुचि का क्षेत्र है।)

एडिटर्स गिल्ड ने कश्मीरी पत्रकारों की हिरासत पर जताई हैरानी

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जम्मू-कश्मीर स्थित अखबारों के एडिटर्स को उनकी रिपोर्टिंग या एडिटोरियल के लिए ‘अनौपचारिक तरीके’ से हिरासत में लिए जाने पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने हैरानी जताई है। एडिटर्स गिल्ड ने अपने बयान में ‘द कश्मीर वाला’ के एडिटर-इन-चीफ फहाद शाह की हाल में हुई हिरासत का जिक्र किया।

EGI ने अपने बयान में कहा कि शाह को कुछ ही घंटे हिरासत में रखने के बाद छोड़ दिया गया था, हालांकि ये तीसरी बार है जब अपनी लेखनी के लिए फहाद शाह को हिरासत में लिया गया है। एडिटर्स गिल्ड ने कहा कि उनका यह मामला अकेला नहीं है। कई ऐसे पत्रकार हैं जो इस न्यू नॉर्मल का सामना कर रहे हैं कि सरकार के घाटी में शांति लौटने के नैरेटिव से कुछ भी अलग लिखने वालों को सुरक्षा बल हिरासत में ले सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन से एडिटर्स गिल्ड ने ऐसी परिस्थिति बनाने की मांग की है, जहां प्रेस ‘बिना किसी डर और तरफदारी’ के अपना नजरिया जाहिर कर सके और खबरों की रिपोर्ट कर सके।

मालूम हो कि भारतीय सेना ने 30 जनवरी को ‘द कश्मीर वाला’ के एडिटर-इन-चीफ फहाद शाह और असिस्टेंट एडिटर यशराज शर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। ये एफआईआर 27 जनवरी की एक न्यूज रिपोर्ट के लिए हुई थी, जिसमें कहा गया था कि सेना के लोगों ने शोपियां जिले में कथित तौर से एक स्कूल को गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम करने के लिए मजबूर किया था।

इसके अलावा भी कई ऐसे पत्रकार हैं, जिन पर कार्रवाई की गई है। 5 मई को दो फोटोजर्नलिस्ट को श्रीनगर के नौहट्टा इलाके में प्रदर्शन शुरू होने के बाद पुलिस ने कथित तौर से पीटा था। पिछले साल 18 अप्रैल को फ्रीलांस फोटोजर्नलिस्ट मसरत जहरा पर उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर UAPA लगाया गया था।

पत्रकार के घर हुई चोरी

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एक वरिष्ठ पत्रकार के घर चोरी की वारदात बिहार के लखीसराय के बड़हिया थाना क्षेत्र में सामने आई है। चोरों ने तकरीबन 60 लाख की संपत्ति पर अपना हाथ साफ किया है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, यह चोरी पत्रकार कल्याण सिंह के बड़हिया स्थित घर में हुई है। वे नोएडा स्थित सहारा समय में कार्यकारी संपादक के पद पर कार्यरत हैं।

घटना दो दिन पहले की बताई जा रही है। सोमवार को पहुंचे पीड़ित परिवार ने चोरी की गई संपत्ति का आंकलन किया और पुलिस को बताया कि चोरो ने करीब 60 लाख से ज्यादा के जेवरात, कैश और चांदी के बर्तन उड़ा लिए। इस बीच पुलिस ने खोजी कुत्ते की मदद से तफ्तीश शुरू कर दी है।

जानकारी के अनुसार, वारदात के वक्त घर में कोई भी नहीं था, क्योंकि घर के सभी सदस्य दिल्ली और बेगूसराय में थे। घर पर रहने वाली मां बहू के साथ तीन माह से बेगूसराय में बेटी के घर रह रही थी। घर के साथ ही कृषि कार्यों की देखरेख के लिए पास के ही ललित साव को जिम्मेदारी दी गई थी। शनिवार की दोपहर ललित भी किसी काम से बाहर चला गया था और जब अगले दिन रविवार की शाम वापस लौटा तो मुख्य दरवाजे पर लगा ताला टूटा पाया। अंदर जाकर देखा तो पाया कि मकान के अंदर स्थित सभी कमरों के ताले टूटे पड़े थे। संदूक और अलमीरा का सारा सामान कमरे में फैला हुआ था। घटना की सूचना तत्काल गृहस्वामी को दी गई, इसके बाद थाने में शिकायत दर्ज कराई गई।

गृहस्वामी की मां और पत्नी रविवार की सुबह बेगूसराय से वापस बड़हिया पहुंची। उन्होंने बताया कि मां के पुश्तैनी समेत दोनों बहू के सारे जेवरात संदूक के ही अंदर थे, जिसमें 80 तोले सोने के जेवरात, 10 किलो चांदी के बर्तन और 2 लाख रुपए नकद पड़े थे, जोकि गायब थे। इसके अलावा कुछ जरूरी दस्तावेज भी चोर ले गए।

पुलिस ने डॉग स्क्वायड की टीम के साथ ही घटना के बाद अपनी जांच शुरू कर दी। एक ही नहीं बल्कि आसपास के कुल तीन घरों में चोरी हुई है। इन एक घर में हुई चोरी का आकलन पूर्व में ही कर लिया गया था, लेकिन दो घरों में हुई चोरी के मामले में गृहस्वामी की अनुपस्थिति में आकलन नहीं हो सका था, जिस जगह पीड़ित कल्याण सिंह का घर है, वह एनएच 80 से महज 10 फीट की दूरी पर है। एक-दो नहीं बल्कि दस-दस कमरों के दरवाजे का ताला तोड़कर चोरों ने आसानी से पूरी घटना को अंजाम दे डाला और किसी को कुछ भनक तक नहीं लग सकी।

ज्यादातर बाल यौन शोषण के मामले की फाइल थाने में ही बंद हो जाती है – कैलाश सत्या्र्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन

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कैलाश सत्‍यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन (केएससीएफ) ने अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। फाउंडेशन द्वारा जारी एक अध्ययन रिपोर्ट बताती हैं कि हर साल बच्चों के यौन शोषण के तकरीबन तीन हजार मामले निष्पक्ष सुनवाई के लिए अदालत तक पहुंच ही नहीं पाते। हर दिन यौन शोषण के शिकार चार बच्‍चों को न्याय से इसलिए वंचित कर दिया जाता है कि क्योंकि पुलिस पर्याप्‍त सबूत और सुराग नहीं मिलने के कारण इन मामलों की जांच को अदालत में आरोपपत्र दायर करने से पहले ही बंद कर देती है। बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ प्रिवेन्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेन्सेस एक्ट (पॉक्सो) के तहत मामला दर्ज किया जाता है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की साल 2019 की रिपोर्ट बताती है कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में उनके यौन शोषण के खिलाफ मामलों की हिस्सेदारी 32 फीसदी है। इसमें भी 99 फीसदी मामले लड़कियों के यौन शोषण के मामले होते हैं।   

अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर कैलाश सत्‍यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन ने “पुलिस केस डिस्‍पोजल पैटर्न: एन इन्‍क्‍वायरी इनटू द केसेस फाइल्‍ड अंडर पॉक्‍सो एक्‍ट 2012’’ और “स्टेट्स ऑफ पॉक्सों केस इन इंडिया” नामक दो अध्ययन रिपोर्ट तैयार किया है। यह अध्‍ययन रिपोर्ट साल 2017-2019 के बीच पॉक्‍सो मामलों के पुलिस निपटान के पैटर्न का विश्लेषण है। यह तथ्‍य नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर आधारित है जो हर साल क्राइम ऑफ इंडिया रिपोर्ट नाम से जारी जाती है। रिपोर्ट में पिछले कुछ सालों के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि आरोपपत्र दाखिल किए बिना जांच के बाद पुलिस द्वारा बंद किए गए मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है। पॉक्सो कानून के मुताबिक बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामले की जांच से लेकर अदालती प्रकिया एक साल में खत्म हो जानी चाहिए। यानी एक साल के भीतर ही पीड़ित को न्याय मिल जाना चाहिए। जबकि रिपोर्ट बताती है कि सजा की यह दर केवल 34 फीसदी है। इसकी वजह से अदालतों पर पॉक्सों के मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

बच्‍चों का यौन शोषण सबसे जघन्य अपराधों में से एक है। यह अपराध समाज के लिए एक धब्बा है, क्योंकि यह मासूमों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने में विफल रहा है। आंकड़ों से पता चलता है कि देश में पिछले कुछ वर्षों में यौन अपराधों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। जबकि सरकार ने एक विशेष कानून की जरूरत को महसूस करते हुए ही पॉक्‍सो कानून बनाया था। लेकिन जमीन पर इसका प्रभाव और परिणाम अत्‍यंत निराशाजनक रहा है। सरकार ने बच्चों के यौन शोषण के मामले में अतिशीघ्र सुनवाई कर त्वरित गति से न्याय दिलाने के लिए 2018 में फास्टट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा की थी। लेकिन अभी तक इसे अमलीजामा नहीं पहनाया गया। आकड़े बताते हैं कि साल 2017 में पॉक्‍सो के तहत 32,608 मामले दर्ज किए गए जो 2018 में बढ़कर 39,827 हो गए। यह वृद्धि करीब 22 फीसदी थी। जबकि 2019 में यह संख्या बढ़कर 47,335 हो गई। साल 2018 के मुकाबले इसकी तुलना की जाए तो साल 2019 में पिछले के मुकाबले बच्चों के यौन शोषण के मामलों में 19 फीसदी की बढोत्तरी देखने को मिली।

पीडि़तों के न्‍याय को सुनिश्चित करने में आरोपपत्र दाखिल करना एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह निष्पक्ष सुनवाई और न्याय का मार्ग प्रशस्त करता है। नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यरो के आंकड़ों में यह देखा गया है कि पॉक्‍सो के तहत दर्ज कुल मामलों में से 6 फीसदी मामले सबूत का अभाव बताकर थाने की फाइलों में ही बंद कर दिए जाते हैं। जो मामले बिना आरोपपत्र दाखिल किए ही पुलिस द्वारा बंद किए गए थे, उनमें 40 फीसदी मामले सही थे। लेकिन, जांच में उसके पक्ष में पर्याप्‍त साक्ष्‍य या सुराग नहीं मिल पाए थे। चूंकि मामलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, जिन्हें चार्जशीट दाखिल किए बिना बंद कर दिया गया। इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जांच ठीक से नहीं की गई थी। यह एक ऐसा संवेदनशील मसला है, जिसे पीड़ितों को न्याय दिलाने और बच्चों के प्रति यौन अपराधों की संख्या पर रोक लगाने के लिए तुरंत कार्रवाई करने की जरूरत है।

इसके अलावा केएससीएफ ने (2017 से 2019) पॉक्‍सो मामले में एक अन्य विश्लेषण का भी खुलासा किया है। जिसमें कहा गया है कि बाल यौन दुर्व्‍यवहार के पीड़ितों के न्‍याय को सुनिश्चित करने के लिए अदालतों को अपने न्याय वितरण तंत्र को तत्‍काल तेज करने की आवश्यकता है। पिछले मामले (बैकलॉग) भी अगले वर्ष में जांच के लिए मामलों की संख्या में वृद्धि कर रहे हैं। यह ऐसे गंभीर मामलों से निपटने के लिए पुलिस की प्रभावी भूमिका पर भी सवाल उठता है। इस प्रकार 2017 के बाद से जांच के लंबित मामलों में 2019 तक 44 फीसदी की वृद्धि हुई है। यह सालाना औसतन 15 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि के साथ यह जारी है। यदि लंबित मामलों में यह वृद्धि जारी रहती है तो लंबित मामलों की संख्या सात वर्षों में दोगुनी हो जाएगी।

स्टेट्स ऑफ पॉकसों केस इन इंडिया रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्‍तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली ऐसे राज्‍य हैं, जहां बच्चों के यौन शोषण यानी पॉक्सो के कुल मामलों में भागीदारी 51 फीसदी है। जबकि इन राज्यों में पॉक्सो मामले में सजा की दर 30 फीसदी से 64 फीसदी के बीच है, जो काफी कम है। एक हकीकत यह भी है कि जिन मामलों में पीड़ित वंचित और हाशिए के समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, उन मामलों में पीड़ित एफआईआर में वर्णित तथ्यों से किसी प्रभाव में आकर या किसी मजबूरी में समय आने पर अपने बयान को बदल देते हैं या सच से खुद मुकर जाते हैं।   

रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कैलाश सत्‍यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन की निदेशक ज्योति माथुर ने कहा, “पीडि़तों के न्‍याय को सुनिश्चित करने और प्रभावी ढंग से चुनौतियों का समाधान करने के लिए पॉक्‍सो के तहत पंजीकृत सभी मामलों को अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक या पुलिस उपायुक्त स्तर के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा बारीकी से देखा जाना चाहिए। दूसरी ओर बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से संबंधित मामलों के बढ़ते हुए खतरों को देखते हुए इसकी जांच के लिए जिला स्तर पर एक समर्पित यूनिट की की भी आवश्यकता है। साथ ही पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए फास्टट्रैक और स्पेशल कोर्ट की जरूरत है। इसके अलावा यौन अपराध के शिकार बच्‍चों और महिलाओं को ऐसे प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों को भी मुहैया कराने की आवश्‍यकता है, जो उन्‍हें ऐसे आघातों से पार पाने में सहायता कर सकें। फाउंडेशन देश से बाल यौन शोषण के किसी भी खतरे को दूर करने के लिए सभी संबंधित हितधारकों को अपना पूर्ण समर्थन और सहयोग देगा।’’

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