फेक न्यूज़’ की जगह ‘नेक न्यूज़’ वाले पत्रकार बनें युवा

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लोकेन्द्र सिंह

भोपाल। एमसीयू के नवागत विद्यार्थियों के प्रबोधन के तीन दिवसीय आयोजन ‘अभ्युदय-2026’ का उद्घाटन, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रसिद्ध कलाकार पीयूष मिश्रा हुए शामिल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि युवा ‘फेक न्यूज़’ के जमाने में ‘नेक न्यूज़’ वाले पत्रकार बनें। पत्रकारिता में सत्ता का विरोध ठीक है, लेकिन देश विरोध नहीं होना चाहिए। हमारे लिए न्यूज़ से ऊपर नेशन हो, देश हित को हम सर्वोपरि रखें। मुख्यमंत्री डॉ. यादव माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के नवागत विद्यार्थियों के प्रबोधन के तीन दिवसीय आत्मीय आयोजन ‘अभ्युदय-2026’ में मुख्य अतिथि के नाते शामिल हुए। विशिष्ट अतिथि के तौर पर प्रसिद्ध कलाकार पीयूष मिश्रा उपस्थित रहे। अध्यक्षता कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी ने की।


उद्घाटन सत्र में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने संचार के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में लव-कुश की कथा का वर्णन किया। इसी प्रकार, उन्होंने श्रेष्ठ संचारक के रूप में देवर्षि नारद का उदाहरण भी दिया।  वीर सावरकर का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बताया कि सावरकर जी ने लंदन जाकर अंग्रेजों को चुनौती दी। उन्होंने 1857 का वास्तविक इतिहास लिखकर सिद्ध किया कि यह सिपाही विद्रोह नहीं अपितु स्वाधीनता का आंदोलन था। सावरकर जी ने हिंदी की भी खूब सेवा की। संसदीय परंपरा के अनेक शब्द सावरकर जी ने दिए हैं। गीतकार कवि प्रदीप का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने अपने गीतों से स्वाधीनता की अलख जगाई, जिसके कारण वे अंग्रेजों के निशाने पर आए। हमारे साहित्यकारों ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया।

स्वागत भाषण में कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि युवाओं को नकारात्मकता से दूर रहना चाहिए। अपने इतिहास के किरदारों से सीखना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज भी कोई माता-पिता अपने बच्चों का नाम शकुनी और मंथरा नहीं रखते हैं। यह हमारे लिए संकेत है कि हमें सब प्रकार की नकारात्मकता से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि हम किसी के अच्छे कार्य में कोई सहयोग नहीं कर सकते, तब कम से कम उनके कामों में बाधक न बनें।

विशेषांक विमोचित :
इस अवसर पर हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित कार्यक्रम ‘प्रणाम उदन्त मार्तण्ड’ पर केंद्रित पुस्तक ‘दो सदी साक्षी है’, विकल्प का विशेषांक ‘मैं क्लासरूम’ और मंदिर की अर्थव्यवस्था पर केंद्रित पत्रिका ‘इंडियन कलाईडोस्कोप’ का विमोचन किया गया।

प्रतिभा सम्मान :
इस अवसर पर अपने कोर्स में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों- परिधि पुजारा, तमन्ना लश्कर और शिविका गुप्ता को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।

शीत युद्ध की अंतिम निशानी: स्पैन पत्रिका  हुई  बंद 

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गोविंद सिंह

दिल्ली।  अंततः स्पैन पत्रिका बंद हो गई। शीत युद्ध की अंतिम निशानी ढह गई। मुझे यह श्रद्धांजलि इसलिए लिखनी पड़ रही है क्योंकि शुरुआत में हिंदी स्पैन का दो वर्ष तक संपादन करने का अवसर मुझे भी मिला था। अमेरिकी राजनीति, समाज, संस्कृति, कूटनीति और पत्रकारिता को करीब से जानने समझने का मौका मिला था। मेरे लिए यह समय किसी फेलोशिप की तरह था। जब आराम कुछ ज्यादा होने लगा तो मैं ने यह नौकरी छोड़ दी।


अंग्रेजी स्पैन 1960 में तब शुरू हुई थी जब दुनिया दो ध्रुबों में बंटी हुई थी। सोवियत संघ और अमेरिका की तरफ से एक दूसरे खेमे के खिलाफ सूचना युद्ध छिड़ा रहता था। सोवियत संघ की तरफ से सोवियत संघ, सोवियत नारी और स्पुतनिक जैसे पत्रिकाएं बहुत ही चिकने कागज में छपती थीं। इनमें लेख बहुत अच्छे नहीं होते लेकिन सस्ती और बढ़िया कागज होने से लोग इन्हें सब्सक्राइब करते। इनका सबसे बेहतर उपयोग कॉपी किताब के जिल्द लगाने में होता था। ये पत्रिकाएं कई भाषाओं में छपती थीं। इनकी तुलना में अमेरिका की तरफ से सिर्फ स्पैन ही छपती, वह भी सिर्फ अंग्रेजी में। लेकिन गुणवत्ता में कहीं बेहतर। यह पेशेवर तरीके से निकलती थी और इसकी कीमत भी अपेक्षाकृत अधिक होती। यह अमेरिकी समाज और संस्कृति का बढ़िया गुलदस्ता था।

’90 के दशक में शीत युद्ध खत्म हुआ तो सोवियत पत्रिकाएं बंद हो गई। लगा कि अब अमेरिकी पत्रिका भी बंद हो जाएगी। हो भी जाती, लेकिन इसी बीच 9/11 हो गया। अमेरिकी सरकार को लगा कि मुस्लिम समाज में पहुंच बढ़ाई जाए। हिंदुस्तान एक ऐसा देश था, जहां दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती थी। इसलिए अंग्रेजी के साथ उर्दू स्पैन निकालने का फैसला हुआ। इस तरह 2002 में उर्दू स्पैन निकली लेकिन साथ में हिंदी स्पैन भी निकालनी पड़ी।

अब सुनाई दे रहा है कि तीनों पत्रिकाएं और इंटरनेट संस्करण बंद हो गए हैं।  पब्लिक डिप्लोमैसी में और भी छंटनी कर दी गई है। हालांकि बाहर हुए कर्मचारियों को ठीक-ठाक मुआवजा मिला है, लेकिन नौकरी तो चली ही गई।

लीक से हटकर, किंतु प्रेरणादायी

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प्रोफेसर रमा शर्मा

दिल्ली । गुरुदेव की ढाई घंटे की कक्षा… और स्मृतियों में लौटता हुआ एक विद्यार्थी मन

कुछ अवसर हमें हमारे अपने अतीत से मिला जाते हैं। आज हंसराज कॉलेज में आयोजित ‘लोकवादी तुलसीदास’ विषयक कार्यक्रम मेरे लिए ऐसा ही एक अवसर था। आज पूज्य गुरुदेव आचार्य प्रो. विश्वनाथ त्रिपाठी जी को सुनते हुए न जाने कितनी बार लगा कि मैं हंसराज कॉलेज के मंच पर नहीं अपने एम.ए. के दिनों की किसी कक्षा में बैठी हूँ। वही आत्मीयता, वही सहज भाषा, वही गहराई और सबसे बढ़कर प्रश्नों के प्रति वही अद्भुत धैर्य।

लगभग ढाई घंटे तक गुरुदेव विद्यार्थियों के बीच रहे। समय जैसे अपनी गति भूल गया था। विद्यार्थी लगातार प्रश्न पूछते रहे और गुरुदेव उतनी ही सहजता से उनके भीतर उतरते हुए उत्तर देते रहे। निर्गुण क्या है, सगुण क्या है? ‘लोकवादी तुलसीदास’ की रचना-प्रक्रिया क्या थी? तुलसी के ‘लोक’ को किस अर्थ में समझा जाए? रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी की आलोचना-दृष्टि में क्या अंतर है? और ‘ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी…’ जैसी बहुचर्चित पंक्ति को उसके संदर्भ और अर्थ के साथ कैसे समझा जाए? एक के बाद एक प्रश्न आते रहे और गुरुदेव के उत्तर केवल उत्तर नहीं थे वे साहित्य को देखने की नई खिड़कियाँ खोलते जाते थे।
आज विद्यार्थियों के चेहरों पर जो उत्सुकता थी, उसे देखकर मन भीतर तक प्रसन्न हुआ। प्रश्नों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण यह था कि वे प्रश्न पूछने से संकोच नहीं कर रहे थे। और एक शिक्षक के लिए इससे सुंदर दृश्य शायद ही कोई हो कि उसके विद्यार्थी किसी महान विद्वान के सामने बैठकर अपनी जिज्ञासाओं को शब्द दे रहे हों। आज की इस पूरी कक्षा में मुझे अपने विद्यार्थी जीवन की वह बेचैनी याद आती रही, जब साहित्य पढ़ना केवल परीक्षा की तैयारी नहीं अपने आसपास की दुनिया को समझने का एक रास्ता हुआ करता था।

कार्यक्रम के आरंभ में मैंने कहा था कि आचार्य विश्वनाथ त्रिपाठी जी की उपस्थिति किसी भी साहित्यिक आयोजन के लिए अपने आप में एक उपलब्धि है। आज उन्हें सुनने के बाद लगा कि यह बात कहना जितना सरल था, उसकी अनुभूति करना उससे कहीं अधिक गहरा। आचार्य जी की आलोचना की सबसे बड़ी शक्ति शायद यही है कि वे साहित्य को केवल पाठ की तरह नहीं, जीवन की तरह पढ़ते हैं। उनके यहाँ विद्वत्ता है, लेकिन विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं; गहराई है, लेकिन बोझिलता नहीं; प्रश्न हैं, लेकिन निष्कर्ष थोपने की अधीरता नहीं। वे हमें केवल यह नहीं बताते कि किसी रचना को कैसे पढ़ना चाहिए, बल्कि यह सोचने के लिए विवश करते हैं कि हमने उसे अब तक किस तरह पढ़ा है।

और तुलसी पर उन्हें सुनना तो अपने आप में एक अलग अनुभव था। तुलसी को केवल भक्तिकाल के कवि के रूप में देखना उनके विराट रचनात्मक व्यक्तित्व को सीमित करना है। तुलसी के यहाँ लोक है, मनुष्य है, समाज है, संघर्ष है, आस्था है, करुणा है और लोकमंगल की आकांक्षा है। शायद इसी व्यापक अर्थ में ‘लोकवादी तुलसीदास’ को समझने की आवश्यकता है। आज गुरुदेव की बातों में बार-बार यह अनुभव हुआ कि परंपरा को समझने का अर्थ उसे आँख मूँदकर स्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके साथ गंभीर संवाद करना है। तुलसी हमारे लिए इसलिए जीवित हैं कि वे केवल अतीत के कवि नहीं हैं; वे आज भी हमारे सामाजिक, नैतिक और मानवीय प्रश्नों के सामने खड़े किए जा सकते हैं।

यह पोस्ट लिखते हुए भी गुरुदेव की बातें बार-बार याद आ रही हैं। उनके कहे हुए वाक्य, प्रश्नों के उत्तर देने का उनका ढंग, बीच-बीच में आने वाली सहज मुस्कान और कठिन से कठिन साहित्यिक प्रश्न को इतने आत्मीय ढंग से समझा देना सब कुछ जैसे अभी सामने घट रहा हो। आज की यह ढाई घंटे की कक्षा समाप्त हो गई, लेकिन मन में लगता है कि कक्षा अभी समाप्त नहीं हुई है। कुछ शिक्षक कक्षा लेते हैं, कुछ शिक्षक विषय समझाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो कक्षा समाप्त होने के बाद भी आपके भीतर बोलते रहते हैं। आचार्य विश्वनाथ त्रिपाठी जी उन्हीं विरल गुरुओं में से हैं।

आज उन्हें सुनते हुए अपने विद्यार्थी जीवन की स्मृतियों में लौटना मेरे लिए केवल भावुक अनुभव नहीं था; यह इस बात का एहसास भी था कि एक सच्चा गुरु समय के साथ पुराना नहीं होता, वह आपकी स्मृतियों में और अधिक गहरा होता जाता है। आज हंसराज कॉलेज के विद्यार्थियों को गुरुदेव के सान्निध्य में बैठते देखकर मन में एक संतोष भी था जो अनुभव कभी हमें मिला था, वही आज एक नई पीढ़ी को मिल रहा है। यही तो परंपरा का सबसे सुंदर रूप है ज्ञान का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचना और हर पीढ़ी में उसका नए अर्थों के साथ जीवित हो उठना।

तुलसी जयंती के इस अवसर पर इससे सुंदर क्या होगा कि तुलसी को केवल याद न किया जाए, बल्कि उन पर प्रश्न किए जाएँ उन्हें केवल पढ़ा न जाए, बल्कि समझा जाए और साहित्य को केवल पुस्तकों में न छोड़ा जाए, बल्कि जीवंत संवाद का हिस्सा बनाया जाए। हिंदी साहित्य परिषद और हिंदी विभाग को इस अत्यंत सार्थक आयोजन के लिए हार्दिक बधाई।

और पूज्य गुरुदेव, आपका हंसराज कॉलेज आना हमारे लिए केवल एक साहित्यिक आयोजन की गरिमा नहीं बढ़ाता यह हमारे विद्यार्थियों और हम जैसे आपके शिष्यों की स्मृतियों को भी एक बार फिर रोशन कर देता है। आज की इस कक्षा के लिए, आज की इन स्मृतियों के लिए और उन अनगिनत प्रश्नों के लिए जो आपके जाने के बाद भी हमारे भीतर जीवित हैं।
सादर प्रणाम, गुरुदेव

पारस पत्थर जैसा व्यक्तित्व था आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का – प्रो. अवधेश प्रधान

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नई दिल्ली। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि विभाग द्वारा ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी व्याख्यान’ का आयोजन किया गया। ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी और भारतीय संस्कृति’ विषय पर आयोजित इस व्याख्यान के वक्ता थे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त आचार्य एवं हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अवधेश प्रधान। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने की। कलानिधि विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने स्वागत भाषण एवं अतिथि परिचय प्रस्तुत किया।

अपने व्याख्यान में प्रो. अवधेश प्रधान ने प्रख्यात साहित्यकार एवं चिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य, चिंतन और भारतीय संस्कृति पर उनके विचारों को प्रस्तुत किया। उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न आयामों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी का साहित्य भारतीय संस्कृति को केवल अतीत की विरासत के रूप में देखने के बजाय उसकी निरंतर विकसित होती जीवन-दृष्टि के रूप में समझने का अवसर प्रदान करता है। उनके साहित्य में भारतीय परंपरा, लोकजीवन, इतिहास, दर्शन और आधुनिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

उन्होंने आचार्य द्विवेदी के निबंधों, उपन्यासों और आलोचनात्मक लेखन का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी दृष्टि भारतीय संस्कृति के मूल में निहित बहुलता, सहिष्णुता, संवाद और मानवीयता को रेखांकित करती है। उन्होंने अपने भाषण को इस बात से शुरू किया कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जिस सड़क पर चलते थे, वह उन्हीं से भरी हुई प्रतीत होती थी, ऐसा विराट व्यक्तित्व था उनका। गुरु को पारस पत्थर जैसा होना चाहिए, जो अपने शिष्यों को सोना बना दे। आचार्य द्विवेदी के पास से कोई भी छोटा होकर नहीं लौटता था, ऐसा बड़प्पन था उनमें। पारस पत्थर जैसा व्यक्तित्व था उनका। उन्होंने आगे कहा, आचार्य द्विवेदी मानते थे कि भारत का इतिहास राजाओं का, नवाबों का इतिहास नहीं है। भारत के जो लोग हैं, वही इसका जीता-जागता जीवंत इतिहास हैं।

अपने भाषण के समापन में उन्होंने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की जिह्वा पर सरस्वती का वास था। वे कहते थे, जहां जल धारा और जन धारा मिलती है, वही तीर्थ है। उन्होंने यह भी आग्रह किया कि भारत पर लिखी गई सभी भाषाओं की, सभी कविताओं का संकलन होना चाहिए।

अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री रामबहादुर राय ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अवदान को स्मरण करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक चेतना को आधुनिक संदर्भों में समझने के लिए द्विवेदी जी का लेखन अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि ऐसे व्याख्यान भारतीय साहित्य और संस्कृति के विविध पक्षों पर गंभीर संवाद का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा, आज आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जितने सामयिक हैं, उतना कोई और नहीं है।

कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों एवं कला-संस्कृति प्रेमियों की सहभागिता रही। कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन कलानिधि विभाग की सुश्री श्वेता सिंह ने किया।

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