योगी जी को यूपी में लागू करनी चाहिए शक्ति स्कीम

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लखनऊ: हर सुबह साढ़े छह बजे, लक्ष्मी अपने छोटे से घर का दरवाज़ा खोलती है। मैसूरु के पास एक शांत से उपनगरीय गाँव में रहने वाली लक्ष्मी एक निजी स्कूल में सहायक के रूप में काम करती है। एक हाथ में टिफ़िन, दूसरे में पुराना सा बैग। दो साल पहले तक उसकी सबसे बड़ी परेशानी काम नहीं थी, बल्कि बस का किराया था।

कभी पैदल चल लेती, कभी किसी से उधार मांगती, और कई बार किराया न होने पर काम पर जाना ही छोड़ देती।

फिर शक्ति योजना आई, और लक्ष्मी की ज़िंदगी धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ने लगी।

11 जून 2023 को शुरू हुई कर्नाटक सरकार की शक्ति योजना ने एक बहुत सादा, मगर असरदार कदम उठाया, महिलाओं और ट्रांसजेंडर लोगों के लिए सरकारी बसों में मुफ़्त सफ़र। न लंबी लाइन, न फ़ॉर्म, न झंझट। बस आधार या कोई पहचान पत्र दिखाइए, ज़ीरो टिकट लीजिए और चल पड़िए।
लक्ष्मी के लिए वह टिकट सिर्फ़ काग़ज़ नहीं था, वह सुकून और आज़ादी का परमिशन था।

गाँव से शहर तक, फ़ैक्ट्री से कॉलेज तक, शक्ति योजना ने कर्नाटक की आवाजाही की तस्वीर बदल दी। दो साल में ही 500 करोड़ से ज़्यादा मुफ़्त टिकट जारी हो चुके हैं। ये महज़ आंकड़े नहीं हैं, ये करोड़ों औरतों की चलती-फिरती दास्तानें हैं।

पहले छह महीनों में ही 62 लाख से ज़्यादा महिलाओं ने इस योजना का फ़ायदा उठाया। 2025 तक बेंगलुरु की कई मुख्य बस लाइनों पर 60 प्रतिशत यात्री महिलाएँ हो गईं। बसें, जो कभी मर्दों की दुनिया मानी जाती थीं, अब बातों, हँसी, साड़ियों, बैग और ख़्वाबों से भर गईं।

लक्ष्मी जैसी दिहाड़ी और कम आमदनी वाली महिलाओं के लिए हिसाब सीधा है। वह हर हफ़्ते लगभग 700 रुपये बचा लेती है। पहले यही पैसे किराए में उड़ जाते थे। अब उसी से बेटी की कॉपियाँ, डॉक्टर की फ़ीस या सब्ज़ी में थोड़ा ज़्यादा साग आ जाता है।

सर्वे बताते हैं कि 80 प्रतिशत महिलाएँ हफ़्ते के 500 से 1000 रुपये तक बचा रही हैं। ग़रीब घरों में यह “बचत” नहीं, इज़्ज़त की ज़िंदगी है।
रिसर्च भी वही कहती है जो महिलाएँ महसूस कर रही हैं। 15 ज़िलों में हुए एक सर्वे में शक्ति योजना की 96 प्रतिशत पहुँच पाई गई, कर्नाटक की तमाम योजनाओं में सबसे ज़्यादा।

91 प्रतिशत महिलाओं की माली हालत बेहतर हुई, और लगभग हर पाँचवीं महिला को नई या बेहतर नौकरी मिली। चिकमगलूरु और बेंगलुरु अर्बन जैसे इलाक़ों में इसका असर ख़ास तौर पर दिखा।

एक और अध्ययन में करोड़ों बस यात्राओं का विश्लेषण किया गया। नतीजा साफ़ था, महिलाओं की पहुँच बढ़ी। नौकरी, कॉलेज, अस्पताल, बाज़ार, सब आसान हो गया।

80 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाओं को इलाज तक पहुँच में सहूलियत मिली। बहुत सी महिलाओं ने पहली बार बिना किसी मर्द पर निर्भर हुए अकेले सफ़र किया।
छोटे शहरों और कस्बों में इसका असर और गहरा है। देवगौड़ा के हसन जिले की महिला किसान रोज़ 200 रुपये बचा रही हैं। मांड्या की सब्ज़ी बेचने वाली महिलाएँ अब मैसूरु के बड़े बाज़ार तक जा पा रही हैं।

तुमकुरु के एक कंडक्टर ने कहा, “अब बसों में सबसे ज़्यादा महिलाएँ, गारमेंट मज़दूर, छात्राएँ और बुज़ुर्ग माँएँ दिखती हैं।”
शक्ति योजना ने समाज के नियम भी चुपचाप बदल दिए हैं। जब महिलाएँ समूह में सफ़र करती हैं, तो सुरक्षा बढ़ती है। जब बसों में महिलाएँ ज़्यादा दिखती हैं, तो सड़कों का माहौल बदलता है।

माता-पिता बेटियों को दूर के कॉलेज भेजने से कम डरते हैं। रिश्तेदारों से मुलाक़ात बढ़ी है।

80 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएँ अब ज़्यादा बार मायके और रिश्तों में आ-जा रही हैं।

हाँ, मुश्किलें अब भी हैं। बसों में भीड़ है, बस स्टॉप दूर हैं। लगभग 85 प्रतिशत महिलाएँ इन समस्याओं की शिकायत करती हैं। मगर ये नाकामी की नहीं, कामयाबी की दिक़्क़तें हैं। इसका हल और बसें, बेहतर योजना और लगातार निवेश है।

लक्ष्मी के लिए ये सब नीति और राजनीति की बातें हैं। वह बस इतना जानती है कि अब वह अपनी ज़िंदगी को “किराए के हिसाब” से नहीं मापती।
अब वह सपने सोचती है, शायद बेहतर नौकरी, शायद शाम की पढ़ाई, या बस इतना कि किसी मौक़े को हाँ कह सके।

शक्ति योजना यह साबित करती है कि जब महिलाएँ आज़ादी से चलती हैं, तो समाज आगे बढ़ता है।

कभी-कभी बदलाव के लिए बड़े नारे नहीं चाहिए होते, बस एक मुफ़्त टिकट और आगे बढ़ने की हिम्मत काफ़ी होती है।

कोई भी व्यक्ति कभी शून्य नहीं होता

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एक भारतीय छात्र

दिल्ली। रूस की शिक्षा प्रणाली में किसी परीक्षा में अधिकतम अंक 5 होते हैं। परन्तु एक चौंकाने वाली बात यह है कि—अगर कोई छात्र पूरी तरह खाली उत्तर पुस्तिका भी जमा कर दे, तब भी उसे 2 अंक दिए जाते हैं।

मॉस्को विश्वविद्यालय में जब मुझे यह बात पहले दिन पता चली, तो मैं सचमुच हैरान रह गया। मुझे यह बिल्कुल तर्कसंगत नहीं लगा। मेरे मन में सवाल उठा — अगर किसी ने कुछ भी नहीं लिखा, तो उसे शून्य अंक क्यों नहीं मिलते?

जिज्ञासा के कारण मैंने डॉ. थियोडोर मेद्रायेव से पूछा, “सर, यह कैसे सही है कि जिसने कुछ भी नहीं लिखा, उसे भी 2 अंक दिए जाएँ?”

डॉ. मेद्रायेव मुस्कराए। फिर शांत और विचारशील स्वर में बोले : “शून्य का अर्थ है—अस्तित्वहीन। जब तक कोई व्यक्ति प्रयास कर रहा है, वह शून्य कैसे हो सकता है ? ज़रा सोचिए—कक्षा तक पहुँचने के लिए एक छात्र कितना प्रयास करता है। हो सकता है वह ठिठुरती ठंड में सुबह-सुबह उठा हो, दूर से बस, ट्राम या ट्रेन में खड़े-खड़े आया हो। भले ही उसने खाली काग़ज़ जमा किया हो, लेकिन उसका आना ही यह बताता है कि उसने कोशिश की। फिर मैं उसे शून्य कैसे दे सकता हूँ ?”

उन्होंने आगे कहा : “हो सकता है छात्र उत्तर न लिख पाया हो। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उसका पूरा प्रयास मिटा दिया जाए ? जिन रातों में वह जागा, जिन कॉपियों को उसने खरीदा, जिन किताबों को खोला, जिन संघर्षों से वह गुज़रा—क्या हम सब कुछ नज़रअंदाज़ कर दें ? नहीं, मेरे प्रिय ! इंसान कभी शून्य नहीं होता। जब हम शून्य देते हैं, तो हम उसका आत्मविश्वास छीन लेते हैं, उसके भीतर की आग बुझा देते हैं। एक शिक्षक के रूप में हमारा उद्देश्य छात्रों को बार-बार खड़ा होने में मदद करना है—उन्हें हार मानने पर मजबूर करना नहीं।”

मैं चुपचाप सुनता रहा। उस क्षण मेरे भीतर कुछ हिल गया। तब मुझे समझ आया—शिक्षा केवल अंकों या लिखे गए उत्तरों का नाम नहीं है। शिक्षा लोगों को जीवित रखने की प्रक्रिया है, प्रयास को पहचानने की कला है, आशा की रक्षा करने का माध्यम है।

उस दिन डॉ. मेद्रायेव ने मुझे एक गहरी सच्चाई सिखाई : शिक्षा केवल ज्ञान का वितरण नहीं है, बल्कि मानवता का अभ्यास है। काग़ज़ पर लगा शून्य अक्सर छात्रों के लिए मृत्यु-घंटी बन जाता है। वह शून्य उन्हें भय से भर देता है, रुचि छीन लेता है और धीरे-धीरे सीखने से घृणा पैदा कर देता है। लेकिन एक शिक्षक का दायित्व है प्रोत्साहित करना, आश्वस्त करना और कहना—
“तुम कर सकते हो। फिर से कोशिश करो।”

जब हम खाली उत्तर पुस्तिका पर भी न्यूनतम अंक देते हैं, तो हम वास्तव में यह कहते हैं—
“तुम शून्य नहीं हो। तुम अब भी महत्वपूर्ण हो। तुम सक्षम हो। तुम असफल नहीं हुए—बस इस बार सफल नहीं हो पाए। फिर से प्रयास करो।”

यही सच्ची शिक्षा है। एक छात्र का भविष्य शिक्षक के हाथों में आकार लेता है। अगर शिक्षक थोड़ा और मानवीय बन जाएँ, अगर वे अंकों से परे प्रयास को देखना सीख लें, तो कितने ही हतोत्साहित छात्र फिर से सपने देखने का साहस कर सकते हैं।

मुझे लगता है यह कहानी केवल रूस तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसे दुनिया भर के शिक्षकों तक पहुँचना चाहिए। क्योंकि शून्य अंक कभी शिक्षा नहीं होते। शून्य अंक अक्सर किसी की यात्रा का अंत होते हैं। जब तक कोई व्यक्ति प्रयास कर रहा है, वह कम से कम आश्वासन और पहचान का अधिकारी है।

(रूस में अध्ययनरत एक भारतीय छात्र द्वारा लिखित)

श्रम-सेतु @2047: भारत की श्रम-सुधार प्रक्रिया का भारतीय सभ्यतागत चेतना से पुनःसंयोजन

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अमन डी. वशिष्ठ, कार्यकारी निदेशक, भारतीय नीति संवाद केंद्र

नोएडा । भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘श्रम’ शारीरिक परिश्रम की सीमा को लांघते हुए मानवीय गरिमा, आत्मसम्मान और सामाजिक समन्वय की प्रतिष्ठा स्थापित करने वाला शब्द है। भारतीय सभ्यतागत चेतना में श्रम को आर्थिक क्रिया मात्र से परे जाकर यज्ञ के रूप में स्वीकार किया गया है । श्रम यज्ञ में रत मनुष्य अपने सचेत कर्म करते हुए स्वयं को पोषित करता है। ऋग्वेद में मानव श्रम को सृष्टि को एक सुव्यवस्थित ढाँचे में संयोजित- संवर्धित करने वाली शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, दूसरी ओर भगवद्गीता में कर्म श्रम को मानवीय उद्देश्य एवं कर्तव्य-बोध के रूप में जीवन के केंद्र में स्थापित करती है। श्रम से जुड़े विविध कौशल, शिल्प और सृजन को भारतीय शास्त्रीय और लोकमानस में विश्वकर्मा के रुप में देवता का दर्जा प्राप्त है। स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन पंरपरा और दृष्टिकोण में श्रम को नैतिकता, समुदाय और सामाजिक समरसता से पृथक नहीं किया जा सकता। किन्तु आधुनिक काल में नीति-भाषा ने इस सभ्यतागत विरासत से धीरे-धीरे दूरी बना ली है। आज श्रम पर विमर्श प्रायः अनुपालन, पंजीकरण, आँकड़ा-पटल और सांख्यिकीय सूचकों तक सीमित हो गया है। श्रमिक, अपने अनुभव और सामाजिक अस्तित्व सहित मानव न रहकर, आँकड़ों की एक सूचनागत इकाई बनता जा रहा है। सभ्यता और प्रशासन के मध्य बढ़ती इसी खाई की गहराई कम करने में श्रम संवाद संगम–2026 की सार्थकता निहित है। वी. वी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान, नोएडा में भारतीय नीति संवाद केंद्र के सहयोग से आयोजित यह संगम केवल श्रम संहिताओं पर केंद्रित एक तकनीकी चर्चा मात्र नहीं था। यह शासन प्रशासन को “श्रम” को उसके भारतीय जड़ों से पुनः जोड़ने का प्रयास के साथ ही एक डिजिटल और आकांक्षी भारत की यथार्थ आवश्यकताओं से ईमानदार संवाद के रूप में भी देखें जाने का प्रस्ताव स्वीकार किया जा सकता है। भारतीय मजदूर संघ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, सी. के. साजी नारायणन; डॉ. अरविंद, महानिदेशक, वी. वी. गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान; प्रो. के. जी. सुरेश, निदेशक, इंडिया हैबिटैट सेंटर, नई दिल्ली के मार्गदर्शन में यह संवाद भारत के सबसे व्यापक श्रमिक आंदोलन की नैतिक परंपरा से अनुप्राणित रहा ।इस आयोजन में संघर्ष और टकराव की औद्योगिक संस्कृति के स्थान पर गरिमा, संवाद और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की परंपरा को प्राथमिकता दिया है। संगम में उपस्थित प्रो. संजीव कुमार, देबाशीष सत्पथी, प्रो. मोनिका सूरी, डॉ. बी. भावना राव, अरुण चौहान तथा डॉ. दीपेंदर चहर जैसे सार्वजनिक बुद्धिजीवियों की उपस्थिति ने इस साझा समझ को सुदृढ़ किया ।

भारत सरकार द्वारा 29 श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेकित करना निस्संदेह कानून से लोक तक: सुधार का वास्तविक मापदंड स्थापित करने वाला एक महत्त्वाकांक्षी और दूरदर्शी कदम है। पंजीकरण, सामाजिक सुरक्षा और अनुपालन के लिए विकसित यह डिजिटल मंच संकेत देता हैं कि नीति के स्तर पर गंभीर इच्छाशक्ति मौजूद है। परंतु ज़मीनी सच्चाई यह भी है कि सुधार काग़ज़ों पर नहीं, जीवन में परखे जाते हैं। बार-बार यह बात सामने आई कि श्रम सुधार तभी सार्थक होते हैं, जब उनका असर श्रमिक के कार्यस्थल, बस्ती, परिवार और भविष्य की चिंता से जुड़ कर उनके जीवन में वास्तविक बदलाव लाते हैं। भारतीय राजनीतिक सोच में शासन वैधता अंत्योदय, यानी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच कर अपनी वैधता ग्रहण करता है। यह कोई दार्शनिक आदर्श भर नहीं, बल्कि व्यवहारिक शासन का मापदंड है। श्रम का समवर्ती सूची में होना यह स्पष्ट करता है कि केंद्र और राज्य – दोनों – जमीनी परिणामों के लिए बराबर जिम्मेदार हैं। फिर भी वर्तमान परिदृश्य में श्रम संबंधी अधिकांश प्रयास बिखरे हुए दिखाई देते हैं। कहीं अनुसंधान हो रहा है, कहीं नियम बन रहे हैं, कहीं उद्योग उन्हें लागू कर रहे हैं। श्रमिक इन बिखरे हुए प्रयासों के दुष्प्रभाव झेलते हुए अपना जीवन बिता रहा है और नागरिक समाज टूटे तंत्र को जोड़ने की कोशिश कर रहा है। इन सबके बीच आपसी तालमेल और संवाद की सबसे अधिक कमी है। श्रम-संगम से मूल भाव यह निकला कि भारत को किसी और केंद्रीयकृत योजना की नहीं, बल्कि एक साथ काम करने की संस्कृति की आवश्यकता है। ऐसे सहयोग की, जहाँ पदानुक्रम से अधिक साझेदारी हो, नियंत्रण से अधिक विश्वास हो, और नीति से अधिक मानवीय समझ हो। जब संस्थाएँ एक-दूसरे के साथ नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए काम करेंगी, तभी श्रम सुधार वास्तव में श्रमिकों के जीवन को बेहतर बना पाएँगे।

श्रम संवाद संगम–2026 से निकला सबसे महत्त्वपूर्ण विचार

BNSK-भारत द्वारा प्रतिपादित श्रम-सेतु @2047 रहा। यह कोई सरकारी अधिसूचना या योजनाओं का नया पैकेज नहीं है। यह शासन को काग़ज़ से निकालकर मानव जीवन के अनुभव से जोड़ने वाली सोच का नाम है। एक गहरे भारतीय बोध से इसकी आत्मा जन्म लेती और अपना रुप पाती है । समुदायों का वास्तविक और स्थायी रूपांतरण, बदलाव बाहर से थोपे जाने के बजाय अंदर से उगने पर ही होता है। संगम में साझा किए गए अनुभवों ने इस विश्वास को जीवंत किया। विशेषकर विश्व-भारती विश्वविद्यालय के शोध विशेषज्ञ प्रोफेसर बिप्लब लोहाचौधरी द्वारा क्रियान्वित किए गए असम के सिलचर मॉडल में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस माडल से जुड़े लोगों ने प्रशासनिक प्रतीक्षा किए बिना नहरों को पुनर्जीवित किया, पुलों का निर्माण किया, कृषि को सँभाला और बच्चों के लिए विद्यालय स्थापित किए। यह सहायता या अनुदान का उदाहरण नहीं है, बल्कि जन-शक्ति के आत्मविश्वास का प्रकटीकरण है। इस मानवीय ऊर्जा को श्रम-सेतु @2047 पहचान देता है। उसे ऐसा ढाँचा प्रदान करता है, जो विकेन्द्रीकृत होने के बाद भी आपस में जुड़ा हुआ है। इस ढांचे में जिले , ब्लॉक और पंचायत स्तर पर ऐसे श्रम शक्ति केंद्र को वास्तविक धरातल पर विकसित करने का प्रयास है, जहां श्रमिक और उसके जीवन को सांख्यिकी की गणनाओं से बाहर निकाल कर व्यक्ति के रूप में देखा जाएगा।इन केंद्रों में शहरी बस्तियों में बस्ती सभाओं में असंगठित श्रम, प्रवासन, आवास और गिग श्रमिकों की रोज़मर्रा की चिंताओं पर सीधी बात हो सकेगी। ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम सभा और पल्लि सभा में श्रम अधिकार काग़ज़ी न रहकर पंचायती परंपरा का हिस्सा बनाने का स्थायी प्यास धरातल पर उतारा जाएगा । श्रमिक, प्रशासन और नीति-निर्माता एक-दूसरे को सुनने सकेंगे ।इन केंद्रों में संवाद केवल ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि दोनों दिशाओं में; सामुदायिक नेतृत्व पर आधारित कल्याण और शिकायत निवारण, जहाँ विधिक और डिजिटल सहायता भरोसे के साथ उपलब्ध होगा। केंद्र, राज्य व स्थानीय स्तरों का ऐसा संगम, जिससे सुधार सचमुच अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। दरअसल यह राष्ट्र और समाज के बीच विश्वास का मॉडल है—जहाँ राष्ट्र रास्ता बनाता है, समाज साथ चलता है और समुदाय नेतृत्व करता है। श्रम-सेतु @2047 किसी लक्ष्य-तिथि का नहीं, बल्कि उस मानवीय यात्रा का नाम है। इस यात्रा में श्रम को गरिमा मिलती है और शासन जीवन के निकट आता है।

नैतिक दिशा के अधीन तकनीक

श्रम संवाद संगम–2026 ने तकनीक बनाम मानवता के बीच आधुनिक विमर्श में अनावश्यक रूप से खड़ा किए गए कृत्रिम द्वंद्व को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया गया है। भारतीय सभ्यतागत दृष्टि में तकनीक कभी भय का विषय नहीं रही; उसका मूल आग्रह सदैव उपकरण विवेक, नैतिकता और मानवीय उद्देश्य के अधीन संचालित करना रहा है । इसी निरंतरता में संगम के विमर्श ने यह रेखांकित किया कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल श्रम-शासन सही दिशा में आगे बढ़ कर तेज़ और पारदर्शी शिकायत निवारण, सामाजिक सुरक्षा के व्यापक विस्तार तथा लाभों के अधिक सटीक और न्यायपूर्ण वितरण जैसे ठोस अवसर प्रदान कर सकते हैं। साथ ही संगम ने स्पष्ट चेतावनी भी दी कि नैतिक दिशा से रहित तकनीक,सशक्तिकरण का साधन नहीं बल्कि शोषण के नए रूपों को जन्म देने वाली होती है। इसी संदर्भ में एक “ह्यूमेनोटिक मॉडल” (Human-Centric Robotics & AI Model) की आवश्यकता रेखांकित की गई , जिसमें स्वचालन और एल्गोरिदम, मानव विवेक के सहायक बनकर निर्णय करने का कार्य करते हैं। इस दृष्टिकोण में तकनीक का उद्देश्य श्रमिक को प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा, गरिमा और क्षमताओं को सुदृढ़ करना होता है। भारतीय बोध में यंत्र को सदैव मंत्र के अधीन रहना चाहिए – अर्थात् तकनीक का संचालन नैतिक संकल्प और मानवीय उत्तरदायित्व द्वारा निर्देशित हो। शासन-व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य दक्षता और कुशलता के साथ मानव गरिमा की रक्षा और विस्तार होना चाहिए। जब तकनीक इस मानवीय ढाँचे में कार्य करते हुए प्रगति का साधन बनती है। ऐसा न होने पर समाज को क्षति पहुँचाने लगती है।

नेतृत्व, दृष्टि और निरंतरता

श्रम-सेतु @2047 स्वाभाविक रूप से माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के उस व्यापक दृष्टिकोण से जुड़ता है, जिसमें श्रम-सुधार केवल विधायी या प्रशासनिक अभ्यास सहित गरिमा, कौशल और आत्मनिर्भरता के माध्यम से विकसित भारत के निर्माण का आधार माना गया हैं। इस व्यापक विमर्श में श्री मुकुल कानिटकर, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, RSS; श्री विवेक दाधकर, राष्ट्रीय संघटक, भारतीय जनता पार्टी (BJP) जैसे प्रख्यात विचारकों और सर्वश्रुत बुद्धिजीवियों के मार्गदर्शन ने इस साझा समझ को सुदृढ़ किया । किसी भी तरह के श्रम-सुधार सांस्कृतिक रूप से जड़ित, सामाजिक रूप से स्वीकृत और संस्थागत रूप से जुड़ कर ही सतत और प्रभावी होंगे।

जो सभ्यता विश्वकर्मा को पूजती है, वह अपने श्रमिकों को अदृश्य नहीं रहने दे सकती। विश्वकर्मा की गरिमा का पुनर्स्मरण और सम्मान है ।निर्माण श्रमिक, स्वच्छता कर्मी, गिग श्रमिक, कारखाना श्रमिक और कारीगर—ये किसी योजना के मात्र लाभार्थी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की सक्रिय इकाइयाँ हैं।

अपने मूल में, श्रम संवाद संगम–2026 श्रम की गरिमा—उसके नैतिक सम्मान—को पुनः सार्वजनिक चेतना के केंद्र में लाने का आह्वान था। आज हम हर क्षेत्र में ‘भारत 2047’ की ओर अग्रसर है। यहां मूल प्रश्न यह नहीं है कि हम कितनी तीव्र गति से आगे बढ़ते हैं, बल्कि यह है कि हम किस दिशा में और किन मूल्यों के साथ आगे बढ़ते हैं। श्रम-सेतु @2047 नीति और जन, परंपरा और तकनीक, राष्ट्र और समाज के बीच एक जीवंत सेतु का निर्माण करता है। यह कोई तात्कालिक नवाचार नहीं, बल्कि सहानुभूति, उत्तरदायित्व और साझा उद्देश्य के साथ शासन करने की भारत की ऐतिहासिक स्मृति का एक गहन स्मरण है। यह स्मरण उस गौरवशाली मानवीय परंपरा को पुनः स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास है।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी को हम संत रहने दें!

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

प्रयाग : वैसे इस विषय पर सार्वजनिक तौर पर बोलने को लेकर मैं कई सालों से धैर्य बनाए हुए था, किंतु अब मैं अधैर्य हो गया हूं, कारण; कभी-कभी आलोचना की धारा इतनी उफान मार जाती है कि सत्य की नींव हिलने लगती है। सोशल मीडिया की दुनिया में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज पर तीखे प्रहार हो रहे हैं। कोई उनकी राजनीतिक टिप्पणियों को धार्मिक मंच का दुरुपयोग बता रहा है, तो कोई उनके अयोध्या राम मंदिर विवाद पर रुख को ही उनके ‘शंकराचार्य’ पद के लिए अयोग्य ठहरा रहा है। किंतु हम क्‍यों भूल जाते हैं कि ये वही संत हैं, जो उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) के शंकराचार्य हैं। आदि शंकराचार्य की परंपरा के वारिस। जैसा कि ज्ञात है कि अन्‍य शंकराचार्यों के आशीर्वाद में उनका अभिषेक हुआ है।

आदि शंकराचार्य की चार धाम: एक अनंत विरासत

यह एक सत्‍य तथ्‍य है कि आदि शंकर ने अद्वैत वेदांत की नींव रखी और बौद्ध-जैन प्रभाव के बीच सनातन हिंदू धर्म की ध्‍वजा को चहुंदिशाओं में फहराया और उसे पुनरुज्जीवित किया। उनका एक योगदान भारत के चार कोनों में चार पीठों की स्थापना भी है! उत्तर में ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ, उत्तराखंड), पूर्व में गोवर्धन मठ (पुरी, ओडिशा), दक्षिण में शृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक), पश्चिम में शारदा मणि द्वारका पीठ (गुजरात)। आाखिर आदि शंकर ने क्‍यों इन पीठों की स्‍थापना की होगी? इसका उत्‍तर साफ है; हिमालय से कन्याकुमारी तक वेदों की ज्योति जलाए रखने के लिए। प्रत्येक पीठ एक वेद का प्रतीक है- ज्योतिर्मठ ऋग्वेद, पुरी यजुर्वेद, द्वारका सामवेद, शृंगेरी अथर्ववेद। ये पीठ राजनीति से ऊपर हैं; भारत की सनातन हिन्‍दू धार्मिक एकता के स्तंभ हैं ये ।

चारों पीठों के शंकराचार्य एक-दूसरे को मानते हैं। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के मुद्दे पर अधिकांश संत समाज एक मत है। इस मुद्दे पर द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती की भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। स्वामी सदानंद सरस्वती ने स्पष्ट कहा कि किसी भी प्रशासनिक तंत्र को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं। शंकराचार्य परंपरा सदियों पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित है, न कि किसी सरकारी आदेश या प्रमाणपत्र पर।

उन्होंने बताया कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का शृंगेरी पीठ में विधिवत अभिषेक हुआ है, जिसके वे स्वयं साक्षी रहे हैं। उनके अनुसार, यह धार्मिक प्रक्रिया पूरी तरह परंपरानुसार संपन्न हुई थी, इसलिए उनकी वैधता पर प्रश्न उठाना अनुचित है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) के शंकराचार्य हैं। इसके साथ ही स्वामी सदानंद सरस्वती का कहना यह भी है कि उनके गुरु (स्‍वामी स्‍वरूपानन्‍द जी महाराज) ने केवल दो ब्रह्मचारियों को संन्यास प्रदान किया था। एक वे स्वयं और दूसरे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती। ऐसे में उनकी परंपरागत स्थिति स्वतः स्पष्ट है। तब प्रशासन द्वारा संतों की पहचान पर सवाल खड़े करना धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप के समान है, जो स्वीकार्य नहीं हो सकता।

सम्मान क्यों? क्योंकि वे हमारी जड़ें हैं

हमें उनका सम्मान क्यों करना चाहिए? पहला, परंपरा का सम्मान। आदि शंकराचार्य ने चार पीठ बनाए ताकि धर्म की ज्योति चारों ओर फैले। शास्त्र कहते हैं ‘नास्ति भूमिर्विवादेन’। लेकिन यह संत का विवेक था। ज्योतिर्मठ हिमालयी वेदों का केंद्र है, जहां शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र भाष्य लिखा। स्वामी जी ने इसे जीवंत रखा, ऑनलाइन प्रवचन, युवा संन्यासी प्रशिक्षण। गो सेवा, चारो वेदों की देश भर में अनेक पाठ शालाएं, अथर्ववेद की सभी शाखाओं का संरक्षण, प्रकृति संरक्षण जैसे अनेक समाज व हिन्‍दू हित के कार्य उनके द्वारा आज किए जा रहे हैं, आलोचक भूलते हैं, कि अविमुक्‍तेश्‍वरानन्‍द जी ज्योतिर्मठ उत्तर के लिए ध्रुवतारा हैं।

सम्मान अनिवार्य क्यों? जड़ों की रक्षा

सम्मान न करने का अर्थ परंपरा तोड़ना। पहला कारण: आदि शंकराचार्य का आदेश। चार पीठ एक हैं। दूसरा: उनका कार्यक्षेत्र। कुमाऊं-गढ़वाल की धार्मिक रक्षा, पर्यावरण संरक्षण। तीसरा: अन्य शंकराचार्यों का दृष्टिकोण। शृंगेरी ने 2023 में उनका आशीर्वाद लिया, पुरी ने संयुक्त बयान दिए। चौथा: संत जीवन। पदयात्राओं में वे पैदल चलते हैं, समाज जागृत करते हैं। गीता कहती है, ‘आचार्याणां अग्रणीर्भव’ आचार्यों का नेतृत्व स्‍वीकार्य करो।

आलोचना स्वागत है, लेकिन अपमान नहीं। कल्पना कीजिए, हिमालय में तपते संत को ट्रोलिंग। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी को संत रहने दें। ज्योतिर्मठ की ज्योति बुझने न दें। यह हमारा धार्मिक कर्तव्य है।स्वामी जी इसकी आवाज हैं। अंत में यही कि बहस करें, परस्‍पर संवाद करें, किंतु सम्मान बनाए रखें। यह हिंदू धर्म की गरिमा है। आदि शंकराचार्य की भावना यही कहती है– विविधता में एकता। कोई राजनीतिक बयानबाजी नहीं, पूर्ण संतत्‍व का सम्‍मान। वास्‍तव में यही तो आज की आवश्‍यकता है।

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