नोएडा में कृषि रिपोर्टिंग पर संवाद: आजादी के 79 साल में भारतीय खेती और मीडिया कवरेज का सवाल

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नोएडा। मीडिया स्कैन और नोएडा मीडिया क्लब के संयुक्त तत्वावधान में 14 अगस्त को नोएडा सेक्टर-29 स्थित नोएडा मीडिया क्लब के सभागार में एक महत्वपूर्ण संवाद कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम का विषय है—‘आजादी के 79 साल में भारतीय खेती। सवाल मीडिया कवरेज का।’ इस आयोजन का उद्देश्य पत्रकारों, विशेषकर युवा एवं मध्यवर्ती पत्रकारों में आधुनिक कृषि, फसल प्रबंधन, किसानों की चुनौतियाँ, कृषि नीतियाँ, सहकारिता, उर्वरक प्रबंधन और कृषि तकनीक जैसे विषयों पर गहन समझ विकसित करना है।

मीडिया स्कैन पत्रकारिता एवं जनसंचार क्षेत्र में सुधार के लिए कार्यरत एक लाभरहित संस्था है। यह संस्था मीडिया एवं जनसंचार के छात्रों तथा पत्रकारों के हितों के लिए निरंतर प्रयासरत रहती है। दिल्ली-एनसीआर में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के पत्रकार भाग लेंगे। आयोजकों का मानना है कि कृषि रिपोर्टिंग को अधिक सटीक, जिम्मेदार और प्रभावी बनाने के लिए पत्रकारों को इन विषयों पर संवाद के माध्यम से जागरूक करना आवश्यक है, ताकि वे पाठकों और दर्शकों तक सही जानकारी पहुँचा सकें।

आजादी के 79 वर्ष पूरे होने के इस अवसर पर यह चर्चा विशेष प्रासंगिक है। भारतीय खेती ने हरित क्रांति से लेकर आज की डिजिटल और तकनीक-आधारित कृषि तक लंबा सफर तय किया है। फसल उत्पादन बढ़ा है, लेकिन किसानों की आय, जलवायु परिवर्तन, बाजार की अनिश्चितता, उर्वरक और बीज की उपलब्धता, सिंचाई की समस्याएँ तथा नीतिगत चुनौतियाँ आज भी गंभीर बनी हुई हैं। सहकारिता आंदोलन और नई कृषि तकनीकों ने कुछ क्षेत्रों में राहत दी है, फिर भी मीडिया कवरेज अक्सर सतही या घटना-केंद्रित ही रह जाता है। गहराई से विश्लेषण, किसानों की आवाज और नीतिगत मुद्दों पर निरंतर रिपोर्टिंग की कमी महसूस की जाती रही है।

कार्यक्रम के माध्यम से पत्रकारों को आधुनिक कृषि पद्धतियों, फसल प्रबंधन की वैज्ञानिक तरीकों, किसानों की वास्तविक चुनौतियों और सरकारी नीतियों की बारीकियों से अवगत कराया जाएगा। संवाद सत्र में विशेषज्ञ और अनुभवी पत्रकार अनुभव साझा करेंगे। उद्देश्य यह है कि कृषि रिपोर्टिंग केवल मौसमी या संकट के समय तक सीमित न रहे, बल्कि नियमित, संतुलित और तथ्यात्मक बने। इससे पाठकों को किसानों की स्थिति, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और कृषि क्षेत्र की संभावनाओं की सही तस्वीर मिल सकेगी।

नोएडा मीडिया क्लब के ऑडिटोरियम में होने वाले इस कार्यक्रम में दिल्ली-एनसीआर के युवा और अनुभवी पत्रकारों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। आयोजक संस्था मीडिया स्कैन का जोर है कि पत्रकारिता की जिम्मेदारी केवल समाचार देने तक नहीं, बल्कि समाज के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने तक है। कृषि देश की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। इसलिए इसकी रिपोर्टिंग में गहराई और संवेदनशीलता आवश्यक है।

14 अगस्त को आयोजित यह संवाद आजादी के 79 साल की कृषि यात्रा पर मीडिया की भूमिका का आकलन करने का अवसर प्रदान करेगा। इससे पत्रकारों में जागरूकता बढ़ेगी और वे भविष्य में अधिक प्रभावी कृषि रिपोर्टिंग कर सकेंगे। कार्यक्रम सभी इच्छुक पत्रकारों के लिए खुला है।

सेहत के नए हकीमों ने छेड़ी वेलनेस की जंग

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दिल्ली । आजकल बड़े शहरों में चमचमाती ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों की जिंदगी बदल गई है। ग्रेनाइट, शीशे और एयर-कंडीशनर से सजे इन आलीशान घरों में अब सूरज निकलने के बाद आराम से सोना लगभग गुनाह समझा जाता है।
अपने शर्माजी, भोर सुबह, सज संवर के जिम के लिए ड्राइव करते हैं, जहां हूरों से मिलकर उनका रक्तचाप नॉर्मल हो जाता है। उधर चौधरी साहब अपने फ्लैट की खिड़की से नजारा ताक रहे होते हैं। वो बताते हैं, “सुबह साढ़े छह बजे से ही फिटनेस का युद्ध शुरू हो जाता है। कोई जिम की तरफ भाग रहा है, कोई तैराकी कर रहा है। योगा मैट अलग-अलग “माइंडफुलनेस ज़ोन” में ऐसे बिछाए जाते हैं, जैसे कोई धार्मिक अनुष्ठान होने वाला हो। कुछ लोग तेज़-तेज़ चलते हैं, कुछ जॉगिंग करते हैं। सबके चेहरों पर ऐसा भाव होता है, जैसे सुबह पसीना बहाना ही इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा हो।”
जिम इतना भरा रहता है कि सांस लेना मुश्किल हो जाए। स्विमिंग पूल में इतनी हलचल होती है कि पानी भी शायद आराम मांगने लगे। ध्यान लगाने वाले लोग इतनी गंभीरता से आंखें बंद करते हैं कि लगता है, अभी संतोष और आत्ममुग्धता के सहारे हवा में उड़ने लगेंगे।
हर सुबह ग्रेटर नोएडा की एक पूरी सोसाइटी स्वास्थ्य सुधारने के एक बड़े अभियान में बदल जाती है। सवाल बस इतना है कि क्या इससे सचमुच स्वास्थ्य सुधर रहा है? कभी-कभी यह फिटनेस से ज्यादा एक महंगा जुनून लगता है।
मेरा एक दोस्त, जो खुद जिम भक्त है, कहता है कि इतनी योगा, प्राणायाम और माइंडफुलनेस के बावजूद दुनिया पहले से ज्यादा स्वस्थ नजर नहीं आती। अस्पताल बढ़ रहे हैं, निजी क्लीनिक बढ़ रहे हैं और वेलनेस सेंटर भी हर गली में खुल रहे हैं।
अगर योगा के दावे आधे भी सच होते, तो शहर के आधे हृदय रोग विशेषज्ञ बेरोजगार हो जाते और बाकी आधे प्राणायाम सिखा रहे होते।
उधर, पुराने विचारों वाले एक पंडित जी, इस मामले को बहुत सीधे शब्दों में समझाते हैं। उनका कहना है कि अपनी ताकत बचाने का फायदा, सुबह-सुबह उसे बेकार में खर्च करने से कहीं ज्यादा है। ट्रैफिक झेलना, दफ्तर की राजनीति सहना, बढ़ती महंगाई और कभी-कभी जीवन के अर्थ पर चिंता करना: ये सब अपने आप में काफी बड़ी एक्सरसाइज हैं।
वह कहते हैं, “सुबह-सुबह तंग छोटे गारमेंट्स पहनकर खुद को क्यों सताते हो? जिंदगी खुद ही कम कसरत नहीं कराती क्या ?”
बात में दम है। अमीर लोग सुबह अंधेरे में अपने शरीर को सज़ा देते हैं, ताकि बाद में गर्व से एवोकाडो टोस्ट खा सकें। शायद लंबी उम्र का असली राज जिम में नहीं, बल्कि आराम से सोने में हो। हाइ सोसाइटी के तमाम लोग सुबह वर्क आउट इसलिए करते हैं ताकि देर रात तक चलने वाली पार्टियों में मजे लें।
हो सकता है असली फिटनेस यह हो कि इंसान एक सभ्य समय तक बिस्तर में पड़ा रहे, अपनी ऊर्जा बचाए और उसे दुनिया की सबसे कठिन एक्सरसाइज के लिए इस्तेमाल करे, इस पागल होती दुनिया में थोड़ा-बहुत सामान्य बने रहने के लिए।
आज फिटनेस एक नया धर्म बन चुकी है। फर्क बस इतना है कि पहले लोग मोक्ष के लिए तपस्या करते थे, अब लोग सिक्स-पैक के लिए।
एक तरफ जॉगर्स हैं। दूसरी तरफ योगा योद्धा। तीसरी तरफ जिम के पहलवान। चौथी तरफ वे लोग हैं, जो हाथ में महंगी पानी की बोतल लेकर सिर्फ इसलिए घूम रहे हैं ताकि सबको पता चले: भाई साहब, ये आज भी “हाइड्रेटेड” हैं। अब सुबह सोना पुराने जमाने की आदत हो गई है। जो आठ बजे उठता है, उसे शक की निगाह से देखा जाता है। लोग सोचते हैं, “बेचारा जिंदगी में कितना पीछे रह गया!” जबकि आदमी बेचारा बस नींद पूरी कर रहा होता है। और उधर गेट पर कंपटीशन के नतीजे आने लगे हैं:
“आज कितने कदम चले?”
“दस हजार।”
“बस? मैंने पंद्रह हजार किए।”
“मैंने बीस हजार।”
तभी एक सज्जन मोबाइल निकालकर कहते हैं, “मेरी स्मार्टवॉच कह रही है कि मैं आज बहुत स्ट्रेस में हूं।”
बाकी लोग गंभीर हो जाते हैं। इतनी दौड़-भाग, इतनी योगा, इतना ध्यान और इतना प्राणायाम करने के बाद भी घड़ी बता रही है कि आदमी तनाव में है। अब घड़ी से बहस कौन करे?
जिम में भी हालत कम मजेदार नहीं है। ट्रेडमिल पर लोग ऐसे दौड़ते हैं जैसे पीछे ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग तीनों लगे हों। मजे की बात यह है कि आधे घंटे बाद वही सज्जन लिफ्ट से ऊपर अपने फ्लैट में जाते हैं। सेकंड फ्लोर तक सीढ़ियों से जाने में कष्ट होता है।
स्विमिंग पूल में लोग पानी को इतना मथते हैं कि लगता है समुद्र मंथन का ट्रायल चल रहा है। योगा क्लास में सब आंखें बंद करके “मन की शांति” खोज रहे हैं। क्लास खत्म होते ही पार्किंग में कार खड़ी करने को लेकर दो लोगों में युद्ध शुरू हो जाता है।
एक सज्जन रोज सुबह ध्यान करते हैं।
दूसरे सज्जन पूछते हैं, “कितनी देर?”
“एक घंटा।”
“फायदा?”
“बहुत शांति मिलती है।”
इतने में उनकी मेड छुट्टी मांग लेती है। सज्जन की आध्यात्मिक शांति तुरंत व्हाट्सऐप कॉल पर चली जाती है।
आधुनिक जीवनशैली का सबसे बड़ा चमत्कार यही है। आदमी स्वास्थ्य पाने के लिए पहले खुद को बीमार करता है। सुबह अलार्म से नींद खराब करो। ठंडे पानी से नहाओ। जिम में शरीर तोड़ो। फिर प्रोटीन शेक पियो। उसके बाद ऑफिस जाकर आठ घंटे कुर्सी पर बैठो और शाम को डॉक्टर से पूछो, “डॉक्टर साहब, कमर दर्द क्यों रहता है?”
पहले इंसान खेत में काम करता था, पैदल चलता था, कुएं से पानी खींचता था। उसे फिटनेस ऐप की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज आदमी एयर-कंडीशनर में बैठता है, कार से जिम जाता है, ट्रेडमिल पर पांच किलोमीटर दौड़ता है और फिर कार से घर लौट आता है।
इसे आधुनिक प्रगति कहते हैं।
अब खाना भी पेट भरने के लिए नहीं खाया जाता। पहले उसकी फोटो खींची जाती है। एवोकाडो टोस्ट, क्विनोआ सलाद और ग्रीन जूस के साथ सेल्फी जरूरी है। आखिर दुनिया को कैसे पता चलेगा कि आप स्वस्थ हैं?
स्वास्थ्य से ज्यादा जरूरी है: स्वस्थ दिखना।
सोशल मीडिया ने तो फिटनेस को पूरा तमाशा बना दिया है। कोई आसन कर रहा है, कोई प्रोटीन पी रहा है, कोई “नो शुगर चैलेंज” चला रहा है। अगले दिन वही आदमी आधी रात को फ्रिज खोलकर रसगुल्ले ढूंढ रहा होता है।
सच तो यह है कि आधुनिक इंसान ने हर चीज को प्रतियोगिता बना दिया है। पहले नौकरी की दौड़ थी। फिर पैसे की दौड़ हुई। अब नींद छोड़कर स्वस्थ होने की भी दौड़ शुरू हो गई है।
शायद असली वेलनेस का राज इतना ही है; थोड़ा कम भागिए, थोड़ा कम दिखाइए और कभी-कभी बिना अपराधबोध के देर तक सो जाइए।
क्योंकि इस दुनिया में जहां हर कोई फिटनेस का महर्षि बनने पर तुला है, सबसे बड़ा योगासन शायद यही है:
आराम से करवट बदलो, चादर ओढ़ो और कहो; आज नहीं, कल से जिम पक्का।

सार्वजनिक जीवन में यौन आरोपों और जवाबदेही की लंबी कहानी

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मुंबई। कितनी बार एक औरत को बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सुनेगी? कितनी सुर्खियाँ चीखेंगी, तब किसी ताकतवर आदमी से कथित यौन अपराध का हिसाब माँगा जाएगा?
भारत में यह दृश्य अब अनजाना नहीं रहा। किसी नेताजी पर आरोप लगता है। मीडिया में तूफान आता है। कार्यकर्ता सड़क पर उतरते हैं। हैशटैग ट्रेंड करते हैं। पीड़िता से कहा जाता है: बोलो, साबित करो, फिर बोलो और उस दर्द को बार-बार जीओ।
फिर कानून की गाड़ी चलती है। धीरे-धीरे, बेहद धीरे। इतनी धीमी कि हिम्मत चुकने लगती है, पैसा खत्म होने लगता है, गवाह थक जाते हैं और सबूत कमजोर पड़ने लगते हैं। उधर जनता का गुस्सा भी नई खबर की तलाश में निकल जाता है।
कल का आक्रोश आज की पुरानी खबर बन जाता है।
सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर सवाल उठाती हैं, “इंसाफ के लिए पीड़िता को ही हर बार इतना सब्र क्यों करना पड़ता है, जबकि सत्ता के पास वक्त भी है, रसूख भी और बच निकलने के रास्ते भी?”
जन टिप्पणीकार पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि पिछले दो दशकों में भारत ने राजनीति, फिल्म, मीडिया और धार्मिक संस्थाओं में एक ही तरह का तमाशा बार-बार देखा है,: एक ताकतवर आदमी, कुछ गंभीर आरोप, मीडिया का शोर और कभी-कभी वर्षों बाद अदालत का फैसला। किसी को उम्रकैद मिली। कोई बरी हो गया। किसी ने चुपचाप इस्तीफा दिया। किसी ने खुलेआम आरोप नकार दिए। लेकिन इन तमाम मामलों ने एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ा है: क्या ताकतवर लोगों के लिए कानून की चाल अलग होती है?

पूर्व सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना का मामला हाल के सबसे सनसनीखेज मामलों में रहा।

अप्रैल 2024 में कर्नाटक के हासन में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सैकड़ों कथित यौन वीडियो वाले पेन ड्राइव सामने आए। आरोप कई महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े थे। रेवन्ना देश छोड़कर चले गए और मई 2024 में लौटने पर गिरफ्तार हुए।
चार मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई। अगस्त 2025 में विशेष अदालत ने एक घरेलू कामगार से बार-बार बलात्कार के मामले में उन्हें दोषी ठहराया। वीडियो, डीएनए और फॉरेंसिक सबूतों पर भरोसा करते हुए अदालत ने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल की सजा सुनाई। रेवन्ना ने अपील की है और मामला अभी आगे की कानूनी प्रक्रिया में है।

उत्तर प्रदेश के उन्नाव के पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को नाबालिग लड़की से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया गया।

मामले ने देश को झकझोर दिया। आरोप लगे कि पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत और बाद में हुए सड़क हादसे में परिवार के सदस्यों तथा वकील की मौत के पीछे सेंगर के सहयोगियों का हाथ था।
सेंगर को उम्रकैद हुई। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2025 के आखिर में सजा निलंबित की। लेकिन मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया और मुख्य अपील पर जल्द फैसला करने को कहा। एक दूसरे मामले में मिली सजा के कारण सेंगर जेल में बने हुए हैं।

भाजपा सांसद और 2023 तक भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष रहे बृज भूषण शरण सिंह पर कई महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। इनमें ओलंपिक पदक विजेता भी शामिल थीं।

जंतर-मंतर पर पहलवानों का आंदोलन देशभर में चर्चा का विषय बना। एफआईआर दर्ज हुई। बृज भूषण ने आरोपों से इनकार किया।
अगस्त 2026 में दिल्ली की अदालत ने उन्हें और एक सह-आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए। आदेश के कुछ हिस्सों में आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित दिखाई देने की बात भी कही गई। शिकायतकर्ताओं ने फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है।
यहाँ कानून ने अपना फैसला सुना दिया है। लेकिन बहस अभी खत्म नहीं हुई।

राजस्थान के पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा का नाम 2011 में एएनएम भंवरी देवी के लापता होने और कथित हत्या के मामले में सामने आया।
उन्होंने संबंध होने की बात स्वीकार की, लेकिन हत्या में शामिल होने से इनकार किया। इस कांड ने उनका राजनीतिक करियर खत्म कर दिया। मुकदमा वर्षों तक चलता रहा। देरी के आधार पर कई आरोपियों को जमानत मिली। 2021 में मदेरणा की मौत हो गई, जबकि मामला अभी लंबित था।
कानून की किताब में तारीखें होती हैं। पीड़ित की जिंदगी में इंतजार होता है।

आसाराम बापू और गुरमीत राम रहीम सिंह जैसे स्वयंभू धर्मगुरुओं के मामले भी इसी बहस का हिस्सा हैं।
आसाराम को आश्रम में नाबालिग से बलात्कार के मामले में उम्रकैद हुई। मई 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट ने बलात्कार की सजा बरकरार रखी, हालांकि कुछ अन्य आरोपों में राहत दी। मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 2017 में दो बलात्कार मामलों में दोषी ठहराया गया था। उन्हें 20 साल की सजा मिली। उन्हें कई बार पैरोल भी मिली। हाल में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्रकार की हत्या के मामले में उन्हें बरी किया, लेकिन उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
यहीं एक और सवाल पैदा होता है; क्या जेल की सलाखें सबके लिए बराबर होती हैं?

भारत में #MeToo आंदोलन ने 2018 में जोर पकड़ा। अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2009 की फिल्म शूटिंग के दौरान अभिनेता नाना पाटेकर पर उत्पीड़न का आरोप लगाया। पाटेकर ने आरोपों से इनकार किया।

टीवी निर्माता विंटा नंदा ने अभिनेता आलोक नाथ पर 1990 के दशक में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। एफआईआर दर्ज हुई और नाथ ने आरोपों से इनकार किया।
आंदोलन धीरे-धीरे राजनीति और मीडिया तक भी पहुँचा।
तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एम.जे. अकबर पर कई महिला पत्रकारों ने उत्पीड़न के आरोप लगाए। उन्होंने इस्तीफा दिया और पत्रकार प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा किया। 2021 में दिल्ली की अदालत ने रमानी के पक्ष में फैसला दिया।

#MeToo दौर का शायद सबसे लंबा कानूनी सफर तरुण तेजपाल का रहा।
तहलका के संस्थापक और पूर्व प्रधान संपादक पर 2013 में गोवा के एक होटल की लिफ्ट में एक युवा सहकर्मी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा।
2021 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। फैसले में पीड़िता के घटना के बाद के व्यवहार पर की गई टिप्पणियों की काफी आलोचना हुई। गोवा सरकार ने फैसले को चुनौती दी।
और फिर आया 6 अगस्त 2026,

करीब तेरह साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया। तेजपाल को बलात्कार और संबंधित अपराधों में दोषी ठहराया गया। उन्हें दस साल की कठोर कैद और पीड़िता को देने के लिए भारी जुर्माने की सजा सुनाई गई। तेजपाल ने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।
तेरह साल।
एक मुकदमे के लिए शायद सिर्फ एक संख्या। एक पीड़िता के लिए जिंदगी का बड़ा हिस्सा।

सभी मामले बलात्कार या यौन उत्पीड़न के नहीं थे। कुछ मामलों में निजी वीडियो सामने आए और आरोपों से इनकार हुआ।
एन.डी. तिवारी का 2009 का सेक्स-वीडियो विवाद और बाद में डीएनए जांच से विवाहेतर बेटे की पुष्टि हुई। अभिषेक मनु सिंघवी का 2012 का वीडियो विवाद भी खूब उछला। अदालतों ने उसके प्रसार पर रोक लगाने की कोशिश की।

स्वामी नित्यानंद का वीडियो विवाद, अभिनेता शाइनी आहूजा की बलात्कार में सजा और 1970 के दशक का सुरेश राम से जुड़ा राजनीतिक सेक्स-फोटो विवाद बताते हैं कि यह बीमारी नई नहीं है।
नई सिर्फ कैमरे की ताकत है। सोशल मीडिया की रफ्तार है। और शायद समाज की याददाश्त भी थोड़ी तेज हुई है।
पैटर्न साफ दिखाई देता है
इन मामलों को साथ रखिए तो कुछ बातें साफ दिखती हैं।
आरोप और अंतिम कानूनी फैसले के बीच अक्सर बहुत लंबा फासला होता है। तेजपाल का मामला तेरह साल चला। कई मामलों में अपीलें वर्षों तक चलती रहती हैं।
नतीजे भी अलग-अलग रहे। कहीं दोषसिद्धि हुई। कहीं बरी किया गया। कहीं मामला अभी अदालतों में है। इसलिए आरोप को फैसला मानना भी गलत है और बरी होने को हर सवाल का अंत मान लेना भी।
कई मामलों में पीड़ित महिलाएँ उस व्यक्ति पर संस्थागत रूप से निर्भर थीं। घरेलू कामगार, नाबालिग लड़कियाँ और खेल संघों के अधीन रहने वाली महिला खिलाड़ी इसका उदाहरण हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “सूची में आरोपी और दोषी सभी पुरुष हैं। महिलाएँ आरोप लगाने वाली, पीड़ित या सर्वाइवर के रूप में दिखाई देती हैं।”
उनका कहना है कि यह केवल भारत की कहानी नहीं है। दुनिया भर में सार्वजनिक जीवन के ताकतवर पुरुषों पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप सामने आते रहे हैं। सत्ता, राजनीतिक पद, फिल्मी हैसियत और धार्मिक प्रभाव जैसे पद अक्सर एक असमान शक्ति-संबंध स्थापित करते हैं।
महिला सार्वजनिक हस्तियों पर भी विवाद होते हैं। लेकिन भारत में उनके खिलाफ मामले अधिकतर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद या निजी जीवन से जुड़े विवादों के रूप में सामने आते हैं।
असली सवाल अभी बाकी है
मामले आते रहते हैं। अदालतें अपनी रफ्तार से चलती रहती हैं। वकील तारीखें लेते रहते हैं। गवाह थकते रहते हैं। पीड़ित इंतजार करते रहते हैं।
और जनता?
जनता कुछ दिन गुस्सा करती है। फिर अगली खबर पर चली जाती है।
यही शायद इस पूरी कहानी का सबसे कड़वा सच है।
कानून अंधा हो सकता है, लेकिन सत्ता कभी-कभी बहुत अच्छी तरह देखती है कि रास्ता कहाँ से निकलेगा।
तो सवाल फिर वही है:
एक औरत को कितनी बार बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सचमुच सुनेगी?

जब आहत हुई अनेक लोगों की भावनाएं

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मेघा राठी

भोपाल। हाल में सोशल मीडिया पर एक वीडियो बार-बार सामने आ रहा है, जिसमें दुर्गा माँ के वेश में एक नृतकी के रूप में नृतक अशोभनीय ढंग से नृत्य करती दिखाई दे रहा है। शरीर का अग्र भाग मालाओं से और पीछे का भाग लंबे बालों से ढका हुआ है लेकिन एक क्षण में वह अपने बाल उठाकर दर्शकों की ओर अपनी देह का वह हिस्सा भी प्रदर्शित करता है।

स्वाभाविक है कि इसे देखकर अनेक लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। माना कि संभव है नृतक ने अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सस्ती प्रसिद्धि के लिए इस तरह नग्न होकर नृत्य करने का साहस किया।सोशल मीडिया पर प्रश्न उठ रहा है कि क्या यह हिंदू धर्म की आस्था पर प्रहार है?
लेकिन मेरे मन में इस वीडियो को देखकर सबसे पहला प्रश्न कुछ और उठता है।
“वहाँ बैठे लोग उस समय बैठे क्यों रहे?”
क्या उनमें से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो उठकर कहता, “बस, यह नहीं चलेगा?” क्या एक भी व्यक्ति मंच की ओर बढ़कर कार्यक्रम रुकवा नहीं सकता था?
क्या हम इतने असहाय हो गए हैं कि अपने सामने होने वाली किसी भी बात पर प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले कैमरा निकालते हैं, वीडियो बनाते हैं और फिर सोशल मीडिया पर आक्रोश व्यक्त करते हैं?
हिंदू धर्म इतना कमजोर नहीं है कि किसी नृतकी के अशोभनीय नृत्य से उसकी आस्था टूट जाए।
हिंदू धर्म हजारों वर्षों की परंपरा है। उसमें प्रश्न पूछने की जगह है, असहमति की जगह है, तर्क की जगह है, दर्शन है, विविधता है और सबसे बड़ी बात—वह स्वयं को किसी एक व्यक्ति की हरकत से समाप्त हो जाने वाला धर्म नहीं मानता।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि आस्था के प्रतीकों के साथ कुछ भी करने की अनुमति होनी चाहिए और यहीं से असली प्रश्न शुरू होता है।
हम स्वयं अपने धर्म के प्रतीकों को किस तरह इस्तेमाल करते हैं, कभी उस पर भी विचार कीजिए।बीड़ी और पटाखों के बंडलों पर देवी-देवताओं के चित्र छपते हैं। पूजा के बाद वही पैकेट कूड़े में फेंक दिए जाते हैं। सड़कों पर धार्मिक पात्रों का स्वांग करके लोग कभी-कभी ऐसी हरकतें करते हैं जिनका धर्म से दूर-दूर तक संबंध नहीं होता।
विवाह समारोहों में दूल्हा-दुल्हन के स्वागत के लिए कृष्ण-राधा के रूप में कलाकारों को बुलाया जाता है। कई बार यह प्रस्तुति श्रद्धा से अधिक मनोरंजन बन जाती है।
सड़कों पर नाचते भगवान के स्वरूप, शिव का रूप धारण किए बहरूपिए सार्वजनिक स्थानों पर बैठे दिखाई देते हैं और कभी वे किसी जगह बैठे शराब पी रहे दिखते हैं। कांवड़ यात्रा ,दुर्गा पूजा आदि में तेज आवाज में बजते डीजे, नाचते थिरकते उन्मुक्त युवा…क्या विरोध यहां नहीं होना चाहिए?
उस समय कितने लोग कहते हैं कि भगवान का रूप मनोरंजन का सामान नहीं है? कितने लोग अपने ही धार्मिक आयोजनों में यह प्रश्न उठाते हैं कि आस्था और तमाशे के बीच की रेखा कहाँ है?
फिर इस नृत्य पर आपत्ति क्यों?क्योंकि हर चीज समान नहीं होती।
किसी देवी-देवता की कलात्मक प्रस्तुति और जानबूझकर धार्मिक प्रतीक को अश्लीलता के साथ जोड़ना एक ही बात नहीं है।
कृष्ण की रासलीला का नृत्य अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि में एक बात है; किसी देवी के रूप को केवल उत्तेजक प्रदर्शन का माध्यम बना देना दूसरी बात।
धर्म के प्रतीकों का इस्तेमाल कला में हो सकता है, व्यंग्य में हो सकता है, रंगमंच पर हो सकता है लेकिन संदर्भ, उद्देश्य, प्रस्तुति और मर्यादा का प्रश्न हमेशा रहेगा।
यही अंतर हमें समझना होगा।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि जो मन में आए, जैसे मन में आए, वैसा करने का असीम अधिकार मिल गया।
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है, लेकिन संविधान स्वयं इसके ऊपर कुछ युक्तिसंगत प्रतिबंधों की व्यवस्था करता है। इसी तरह वर्तमान कानून में भी धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्वक आहत करने वाले कृत्यों के लिए प्रावधान हैं। भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 ऐसे कृत्यों को दंडनीय बनाती है, जब धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के पीछे जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य हो।
इसलिए केवल यह कह देना कि “यह मेरी कला है, मेरी अभिव्यक्ति है, हर परिस्थिति में अंतिम उत्तर नहीं हो सकता।
लेकिन दूसरी ओर, केवल यह कह देना भी ठीक नहीं कि “मेरी धार्मिक भावना आहत हुई, इसलिए हर ऐसी अभिव्यक्ति अपराध है।”क्योंकि धर्म की रक्षा और धर्म के नाम पर असहमति को दबाना,दो अलग बातें हैं।
हमें यह अंतर समझना ही होगा और शायद इस पूरे प्रसंग में सबसे बड़ी कमी उस नृतकी की नहीं, हमारी सामूहिक मानसिकता की है कि हम विरोध करने के समय चुप रहते हैं और वायरल होने के बाद जागते हैं।
हम अपने सामने गलत होते देखकर कहते हैं, “मुझे क्या करना?”
लेकिन वही घटना मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देती है तो हमारा धर्म, हमारी संस्कृति और हमारी भावनाएँ अचानक जाग उठती हैं।
सोचिए, क्या यह विरोध है या केवल सोशल मीडिया का आक्रोश?
अगर किसी कार्यक्रम में हमारी आस्था का खुलेआम उपहास हो रहा है और हम वहाँ बैठे रहकर देखते हैं, तो उस समय हमारी चुप्पी भी एक तरह की स्वीकृति बन जाती है।
विरोध का अर्थ हिंसा नहीं है।विरोध का अर्थ गाली देना नहीं है।विरोध का अर्थ भीड़ इकट्ठी करके किसी को पीटना नहीं है।
विरोध का अर्थ है…शांतिपूर्वक कहना कि यह स्वीकार्य नहीं है, आयोजक से कार्यक्रम रोकने को कहना, आवश्यकता हो तो शिकायत करना और कानून के रास्ते पर जाना और यदि कोई कानून नहीं टूटा केवल हमारी भावनाएँ आहत हुई हैं, तब भी हम उस कला या प्रस्तुति का शांतिपूर्ण बहिष्कार कर सकते हैं।
यही एक सभ्य समाज की पहचान है।
हमें यह भी तय करना होगा कि हम वास्तव में धर्म की रक्षा करना चाहते हैं या केवल धर्म के नाम पर अपना आक्रोश प्रदर्शित करना चाहते हैं क्योंकि धर्म किसी वीडियो से नहीं टूटता।
धर्म तब कमजोर होता है जब उसके अनुयायी उसकी मर्यादा को स्वयं अपने व्यवहार में छोड़ देते हैं।
भगवान की तस्वीर बीड़ी के पैकेट पर छपने से यदि हमें आपत्ति नहीं होती, धार्मिक पात्रों का बाजार में प्रदर्शन देखकर हम हँसकर आगे निकल जाते हैं, मंदिरों और धार्मिक प्रतीकों के आसपास गंदगी देखकर हमें फर्क नहीं पड़ता लेकिन सोशल मीडिया पर कोई विवादित वीडियो आते ही हम धर्मरक्षक बन जाते हैं तो समस्या केवल सामने वाले की नहीं है।
हमारी आस्था चयनात्मक हो गई है।
हमें तय करना होगा कि हमें अपने धर्म के प्रतीकों का सम्मान चाहिए या केवल उनके अपमान पर वायरल होने का अवसर और शायद आज इस पूरे विवाद से हमें यही सीखने की जरूरत है—
हिंदू धर्म को किसी से बचाने की जरूरत नहीं है।
जरूरत है तो अपने भीतर की उस संवेदना को बचाने की, जो भगवान के प्रतीक को देखकर केवल भावुक नहीं होती बल्कि उसके सम्मान की जिम्मेदारी भी समझती है।
आस्था इतनी कमजोर नहीं कि कोई उसे तोड़ दे लेकिन आस्था इतनी सस्ती भी नहीं होनी चाहिए कि हम उसे अपने ही हाथों तमाशा बना दें।

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