राष्ट्र, समाज और भविष्य की चुनौतियों पर अखिल भारतीय समन्वयक बैठक में तीन दिनों तक व्यापक चिंतन-मंथन

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विशाखापट्टणम : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित विभिन्न संगठनों की तीन दिवसीय अखिल भारतीय समन्वय बैठक आज विशाखापट्टणम के समीप विज्ञान विहार आवासीय विद्यालय परिसर, गुडिलोवा में सम्पन्न हुई।

समाज और राष्ट्र के लिए विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत संघ प्रेरित संगठनों के प्रमुख पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने बैठक में भाग लिया। बैठक के लिए कुल 326 प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था, जिनमें विभिन्न संगठनों का महिला नेतृत्व भी शामिल रहा। 49 महिला प्रतिनिधियों ने तीन दिवसीय बैठक में सहभागिता की।

बैठक में परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत तथा माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी की विशेष उपस्थिति रही। इसके साथ ही संघ प्रेरित विभिन्न संगठनों के राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख कार्यकर्ताओं एवं नेतृत्व ने बैठक में भाग लिया।

तीन दिनों के दौरान देश और समाज की वर्तमान परिस्थितियों, विभिन्न संगठनों द्वारा किए जा रहे कार्यों, उनके अनुभवों, भविष्य की चुनौतियों तथा आगामी कार्ययोजना पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ।

प्रमुख विषयों पर हुआ चिंतन-मंथन

बैठक के सम्बंध में पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री मुकुंदा सी. आर. ने बताया कि प्राकृतिक आपदाओं के समय समाज आधारित सेवा और पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की गई। असम में आई भीषण बाढ़ के दौरान राष्ट्रीय सेवा भारती, भारतीय किसान संघ, नेशनल मेडिकोज ऑर्गेनाइजेशन (NMO), आरोग्य भारती सहित विभिन्न संगठनों और कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए राहत एवं पुनर्वास कार्यों की जानकारी साझा की गई।

संत रविदास जी के 650 जयंती के संदर्भ में उनका संदेश के आधार पर सामाजिक समरसता एवं सामाजिक सौहार्द के लिए देशभर में किए गए कार्यक्रमों और समाज से मिले सकारात्मक प्रतिसाद की समीक्षा की गई। इस दिशा में आगे भी कार्य को निरंतर बढ़ाने पर विचार हुआ।

उन्होंने कहा कि बैठक में जनसांख्यिकीय परिवर्तन एवं असंतुलन पर भी गंभीर चर्चा हुई। विश्व के अनेक देशों में वृद्ध होती जनसंख्या तथा घटती प्रजनन दर से उत्पन्न चुनौतियों के संदर्भ में भारत की परिस्थितियों पर विचार किया गया। विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में जनसंख्या के अनुपात में हो रहे परिवर्तनों तथा उनके सामाजिक प्रभावों पर चर्चा करते हुए समाज में संतुलन और सौहार्द बनाए रखने के उपायों पर विचार हुआ।

*नशामुक्त समाज के लिए व्यापक सामाजिक प्रयास*

देश में युवाओं और विद्यार्थियों तक मादक पदार्थों की बढ़ती पहुँच पर बैठक में गंभीर चिंता व्यक्त की गई। इस समस्या को केवल सरकार या पुलिस के स्तर पर नहीं, बल्कि पूरे समाज की सहभागिता से हल करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

शिक्षण संस्थानों, अभिभावकों, सामाजिक संगठनों, प्रशासन, पुलिस तथा अन्य संबंधित पक्षों को साथ लेकर नशामुक्त समाज के लिए समन्वित प्रयास करने की आवश्यकता पर चर्चा हुई।

युवाओं की आकांक्षाओं और चिंताओं पर विशेष चर्चा

युवा पीढ़ी की सोच, आकांक्षाओं, सृजनात्मक क्षमता, भविष्य संबंधी चिंताओं तथा राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका पर विस्तृत विचार हुआ।

संघ का कार्य बड़ी संख्या में युवाओं के बीच चल रहा है। इस वर्ष संघ के 21 दिवसीय प्रशिक्षण वर्गों में लगभग 21,000 युवा स्वयंसेवकों ने भाग लिया। देशभर की दैनिक शाखाओं में उपस्थित स्वयंसेवकों में 60 प्रतिशत से अधिक युवा हैं।

युवाओं के साथ केवल उपदेशात्मक संवाद के बजाय उनके साथ प्रत्यक्ष जुड़ाव, उनकी भावनाओं और चिंताओं को समझना तथा संवाद के माध्यम से देश, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के प्रति आत्मीयता विकसित करना आवश्यक बताया गया।

आत्मनिर्भर, पर्यावरण हितैषी और समावेशी विकास

बैठक में भारतीय दृष्टि पर आधारित विकास मॉडल पर भी चर्चा हुई। विकास आत्मनिर्भर, पर्यावरण हितैषी और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाला होना चाहिए—इस दिशा में आर्थिक क्षेत्र में कार्यरत संगठनों के अनुभवों पर विचार हुआ।

कई संगठनों द्वारा विभिन्न प्रकार के समाज उपयोगी कार्य किए जा रहे हैं, जैसे लघु उद्योग भारती द्वारा सूक्ष्म उद्योगों के क्षेत्र में संचालित कौशल विकास केंद्रों के माध्यम से इस वर्ष 41,000 से अधिक लोगों को कौशल प्रशिक्षण दिए जाने की जानकारी भी साझा की गई।

पंच परिवर्तन और कुटुंब प्रबोधन

संघ शताब्दी वर्ष के संदर्भ में समाज परिवर्तन के लिए निर्धारित ‘पंच परिवर्तन’ के विभिन्न आयामों पर बैठक में विशेष चर्चा हुई।

विशेष रूप से कुटुंब प्रबोधन के अंतर्गत भारतीय परिवार व्यवस्था, पारिवारिक मूल्यों तथा पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर विचार हुआ।

पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में केवल प्रस्ताव पारित करने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति और परिवार के दैनिक जीवन में परिवर्तन लाने पर बल दिया गया। जल का विवेकपूर्ण उपयोग, प्लास्टिक का न्यूनतम उपयोग और हरित क्षेत्र बढ़ाना जैसे विषय प्रत्येक परिवार के व्यवहार का हिस्सा बनने चाहिए।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर विस्तृत चर्चा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के समाज पर बढ़ते प्रभाव को लेकर बैठक में विस्तृत प्रस्तुति और चर्चा हुई।

AI की सकारात्मक संभावनाओं के साथ उससे जुड़ी सावधानियों और चुनौतियों पर विचार करते हुए इसे भारतीय दृष्टिकोण और भारतीय सामाजिक संदर्भ में देखने की आवश्यकता पर बल दिया गया। तकनीक का उपयोग समाज हित में कैसे हो और उसके संभावित दुष्प्रभावों के प्रति समाज को कैसे जागरूक किया जाए, इस विषय पर आगे भी चिंतन जारी रहेगा।

कार्य विस्तार

संघ प्रेरित 32 संगठनों द्वारा समाज के विविध क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों के विस्तार पर भी चर्चा हुई। राष्ट्रीय दृष्टि और समाज केंद्रित चिंतन को समाज के अधिकाधिक क्षेत्रों तक पहुँचाने तथा संगठनात्मक कार्य का विस्तार करने के लिए आगामी वर्ष की योजनाओं पर विचार किया गया।

पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए सह सरकार्यवाह श्री मुकुंदा जी ने कहा –

प्रश्न: व्यवस्था में भ्रष्टाचार और विभिन्न सिस्टम की कमियों को लेकर बैठक में क्या चर्चा हुई?

उत्तर:
इस विषय को केवल भ्रष्टाचार तक सीमित करके नहीं देखा गया। व्यवस्था में जहाँ-जहाँ कमियाँ हैं, उन्हें ठीक करने के लिए सरकार के साथ-साथ समाज की जागरूकता भी आवश्यक है। NEET जैसे विषय हों अथवा अन्य व्यवस्थागत समस्याएँ, इनके कारण युवाओं में अपने भविष्य को लेकर चिंता उत्पन्न होती है। इस चिंता को समझना और उसका समाधान करना आवश्यक है।

केवल विरोध या व्यवधान से समाधान नहीं होगा। सकारात्मक और रचनात्मक दृष्टि से व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार और समाज—दोनों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न: युवा पीढ़ी में संस्कृति और परंपराओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए संघ क्या करेगा?

उत्तर:
संघ का कार्य मुख्य रूप से युवाओं के बीच व्यापक रूप से चल रहा है। इस वर्ष लगभग 21,000 युवा स्वयंसेवकों ने 21 दिवसीय प्रशिक्षण वर्गों में भाग लिया और दैनिक शाखाओं की उपस्थिति में 60 प्रतिशत से अधिक युवा हैं।

युवाओं में संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों का निर्माण केवल भाषणों या पोस्टरों से नहीं हो सकता। उनके साथ निरंतर जुड़ना, उनकी भावनाओं को समझना, संवाद करना तथा भारत की महानता और सांस्कृतिक विरासत को अनुभव के स्तर पर उनके सामने रखना आवश्यक है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बजरंग दल, हिंदू जागरण मंच सहित अनेक संगठनों के माध्यम से युवकों और युवतियों के बीच कार्य किया जा रहा है। आज की युवा पीढ़ी की क्षमता और सकारात्मक प्रतिसाद को देखते हुए हमें विश्वास है कि भारत का भविष्य युवाओं के हाथों में सुरक्षित है।

इसके साथ ही धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संगठनों को भी युवाओं में सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन के लिए मिलकर कार्य करने का आह्वान किया गया।

प्रश्न: सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी की प्रस्तावित अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा का उद्देश्य क्या है?

उत्तर:
यह यात्रा संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर व्यापक वैश्विक संपर्क का हिस्सा है। इसके तीन प्रमुख उद्देश्य हैं।

पहला—भारत, हिंदू समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में विश्व में व्याप्त भ्रांतियों और दुष्प्रचार के बीच तथ्यपरक एवं सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना।

दूसरा—भारत के ऋषि-मुनियों द्वारा दिए गए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और वैश्विक एकात्मता के संदेश को विश्व के विभिन्न समाजों तक पहुँचाना।

तीसरा—विश्व के विभिन्न देशों में रहने वाले हिंदुओं और भारतीय मूल के लोगों के हितों एवं अधिकारों के विषय में वहाँ के मुख्यधारा समाज से संवाद बढ़ाना।

इस क्रम में डॉ. मोहन भागवत जी न्यूयॉर्क में Universal Oneness कार्यक्रम तथा टोरंटो और लंदन में सामुदायिक नेतृत्व के कार्यक्रमों में सहभागिता करेंगे।

प्रश्न: पंच परिवर्तन में पर्यावरण संरक्षण को लेकर केवल प्रस्ताव या संकल्प से आगे व्यावहारिक रूप से क्या किया जा सकता है?

उत्तर:
पंच परिवर्तन की कल्पना लगभग तीन वर्ष पूर्व संघ के शताब्दी वर्ष की योजना बनाते समय की गई थी। हमारा मानना है कि किसी भी व्यवस्थागत परिवर्तन से पहले सामाजिक परिवर्तन आवश्यक है।

पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति को बाहर से बचाने का विषय नहीं है। भारतीय दृष्टि में मनुष्य स्वयं इस संपूर्ण सृष्टि और पर्यावरण का अभिन्न अंग है।

इसलिए प्रत्येक व्यक्ति और परिवार अपने दैनिक जीवन में कम से कम तीन स्तरों पर योगदान कर सकता है—जल का विवेकपूर्ण उपयोग, प्लास्टिक के उपयोग को कम करना और अपने आसपास हरियाली बढ़ाना।

केवल प्रस्ताव पारित करने से परिवर्तन नहीं आएगा। जीवनशैली में परिवर्तन आवश्यक है। इसी संदेश को परिवारों, गांवों और देश के दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है। व्यक्ति और परिवार के व्यवहार में आया छोटा परिवर्तन भी व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय परिवर्तन का आधार बन सकता है।

इस प्रेस वार्ता में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री सुनील आंबेकर, अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख श्री नरेंद्र जी, श्री प्रदीप जोशी जी, दक्षिण मध्य क्षेत्र प्रचार प्रमुख श्री आयुष जी, आंध्र प्रदेश प्रांत प्रचार प्रमुख श्री बय्या वासु जी तथा सह प्रचार प्रमुख श्री वासुदेव राव जी भी उपस्थित रहे।

तीन दिवसीय समन्वय बैठक में हुए विचार-मंथन का आधार राष्ट्र के प्रति समर्पण, समाज की वर्तमान चुनौतियों का समाधान तथा आने वाले वर्षों में सकारात्मक एवं रचनात्मक सामाजिक परिवर्तन के लिए सामूहिक प्रयास रहा।

कम्युनिस्ट इकोसिस्टम के DNA में है गालीबाजी और गद्दारी

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर : गालीबाजी और देश से गद्दारी कम्युनिस्टों का चरित्र है। ये मैं नहीं इतिहास के पन्ने कह रहे हैं। ख़ुद 1945 में पंडित नेहरू ने भी ऐसा कहा। तथ्यों के आलोक में चलते हैं। जंतर-मंतर नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गा’लियां देने को जो लोग कूल बता रहे थे। नई लैंग्वेज बता रहे थे। कसीदे पर कसीदे पढ़े जा रहे थे।असल में इनका DNA ही गालीबाज है और इनका ये मुखौटा कई बार उतर चुका है। क्योंकि ये उन्हीं कम्युनिस्टों की औलादें हैं जो पूज्य महात्मा गांधी, गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, पंडित नेहरू, सरदार पटेल तक को गाली देते रहे हैं। क्योंकि इनकी निष्ठा भारत और भारत के लोकतंत्र में कभी नहीं रही है। स्वाधीनता संग्राम के विरोध, पाकिस्तान निर्माण में पैरोकारी से लेकर भारत-चीन 1962 के युद्ध में ये चीन के समर्थन में कम्युनिस्ट लामबंद थे। चीन को आक्रमणकारी मानने से इनकार कर दिया था।भारत के पोखरण परमाणु परीक्षण कार्यक्रम का वामपंथियों ने देश भर में विरोध किया था। वर्तमान में भी जहां-जहां भारत शक्तिशाली होता नज़र आता है। ये विदेशों में बैठे अपने आकाओं की कमांड पर प्रहसन में जुट जाते हैं। कांग्रेस की वैचारिकी में कब्ज़ा जमा कर कांग्रेस को ख़त्म करने वाले कम्युनिस्टों को कांग्रेस जिस तरह से खाद पानी दे रही है। उसे क्या इनके कुकृत्य नहीं मालूम हैं ? कांग्रेस जहां स्वाधीनता संग्राम का क्रेडिट ‘एक दो लोगों’ के नाम पर कॉपीराइट और कैश कराती मिलती है। वहीं दूसरी ओर इन कम्युनिस्ट गालीबाजों को शीर्ष पर विराजती है। सो, क्या कांग्रेस की नज़र में ये स्वाधीनता संग्राम का अपमान नहीं होता?

मूल मुद्दे पर क्रमशः तथ्यात्मक प्रकाश डालेंगे लेकिन इन ऐतिहासिक और वर्तमान पृष्ठभूमि के विषय में जानना आवश्यक है।दूसरा बिंदु ये कि भारतीय उद्योगपतियों से भी वामपंथी इकोसिस्टम की नफ़रत जगज़ाहिर है। ये कभी भी विदेशी उद्योगपति के ख़िलाफ़ कुछ भी बोलते नहीं मिलते हैं। लेकिन अगर कोई भारतीय उद्योगपति शीर्ष पर पहुंचता है तो इनके पेट में मरोड़ें उठने लगती हैं। क्योंकि भारतीय उद्योगपति बढ़ेंगे तो भारत का प्रभुत्व होगा। हम आत्मनिर्भर होंगे। लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा। इसलिए ये कहां बर्दाश्त होगा? आज कल ये गिरोह ‘अडानी-अंबानी’ के नाम से जैसे विध्वंसक ज़हर की खेती करता है। ठीक उसी तर्ज़ पर ये पहले ‘टाटा और बिरला’ के नाम पर पंडित नेहरू और सरदार पटेल को टारगेट करते थे। इतिहासकार स्व. सीताराम गोयल ने वर्षों पहले पुस्तक लिखी थी —’हिन्दू समाज : संकटों के घेरे में’ जिसका प्रथम प्रकाशन 1984 में हुआ। इसी पुस्तक के 50वें पृष्ठ पर वो लिखते हैं —“भारत में कम्युनिज्म ने एक गाली-शास्त्र का आविष्कार भी किया है। इस शास्त्र में विहित गालियों की बौछार पार्टी अपने विरोधियों पर बरसाती रहती है। इन गालियों की चोट कितनी गहरी हो सकती है यह कई-एक उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा। १९४८-५० के दौरान पार्टी रणदिवे-नीति का अनुसरण कर रही थी। उस समय महात्मा गाँधी को “पूँजीवाद का सबसे धूर्त गुण्डा” बतलाया गया था और कविगुरु रविन्द्रनाथ को “माघीर दलाल” अर्थात “वेश्याओं का दलाल” ठहराया गया था।”

वर्तमान में आप देखते होंगे कि ये पूरा इकोसिस्टम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर अपमानजक टिप्पणियां करता है। भारतीय उद्योगपतियों यथा बहुधा ‘अडानी-अंबानी’ के नाम पर घ्रणा और नफ़रत का दुष्प्रचार करता रहता है। कांग्रेस और उसके वर्तमान नेता इसमें आनंद का अतिरेक प्राप्त करते हैं। चुनावी अभियान समझते हैं। जबकि ठीक इसी पैटर्न से पूर्व में कम्युनिस्ट पंडित नेहरू और सरदार पटेल को लांछित और अपमानित करते थे। इसी संदर्भ में सीताराम गोयल लिखते हैं कि —

“किन्तु सबसे भारी-भरकम गाली पण्डित नेहरू तथा सरदार पटेल के हिस्से में आई थी। पार्टी ने उनको “फासिस्ट-द्वय” की पदवी से तो विभूषित किया ही था, साथ ही पार्टी के लब्धप्रतिष्ठ बंगला मासिक ‘परिचय’ ने “अमरीकी साम्राज्यवाद की सेवा में रत” इन नेताओं की “काली करतूतों” का “भण्डाफोड़” भी एक कविता में कर डाला था। कविता की एक पंक्ति में कहा गया था कि ये दोनों “श्याला सुआरेर बाच्चा, बिड़ला टाटार जारोज शोन्तान” हैं, अर्थात “ये साले सूअर के बच्चे बिड़ला-टाटा की नाजायज़ सन्तान हैं।”

किन्तु कम्युनिस्ट पार्टी की किसी भी पुरानी करतूत का दोष पार्टी पर लगाना कठिन है। कारण, पार्टी को ज्यों ही रूस का आदेश मिलता है कि नीति बदल दी जाए, त्यों ही पार्टी अपनी भूलें स्वीकार कर लेती है और छाती पीट कर अपने पुराने पापों पर विलाप करने लगती है।

लोग समझते हैं कि चलो कम्युनिस्ट पार्टी सही रास्ते पर आ गई और मामला रफा-दफा हो गया। किन्तु पार्टी किसी भी समय अपने गाली-शास्त्र का नया पाठ शुरू कर सकती है। इन दिनों पार्टी के गाली-शास्त्र का अखण्ड पाठ आत्मनिष्ठ राष्ट्रवाद के विरुद्ध किया जा रहा है। इस राष्ट्रवाद के अनुयाइयों को नित्य ही सम्प्रदायवादी, आक्रामक प्रवृत्ति वाले, अल्पसंख्यकों के फासिस्ट हत्यारे, नरमेध के प्रवर्तक, प्रतिक्रिया के पोषक और अतीत का अन्धानुकरण करने-कराने वाले कहा जा रहा है। यह याद करने पर कि पार्टी का स्वर कितना प्रखर हो सकता है, इतना मानना पड़ेगा कि पार्टी का रुख अभी अपेक्षाकृत सौम्य है। किन्तु ऐसे संकेत भी मिलते हैं कि जरूरत पड़ने पर कम्युनिस्ट पार्टी का स्वर फिर अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच सकता है।”
(संदर्भ:हिन्दू समाज : संकटों के घेरे में, पृ-50, सीताराम गोयल, भारत भारती प्रकाशन नई दिल्ली संस्करण 2010)

ठीक इसी तरह कम्युनिस्ट नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को लेकर कैसी मानसिकता रखते थे? उसे समझना आवश्यक है। ख्यातिलब्ध लेखक, डॉ शंकर शरण 22 अक्टूबर 2018 को ‘नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को तोजो का कुत्ता बताते थे वामपंथी’ ; इस शीर्षक से लेख लिखा। इसमें वो लिखते हैं —“1940 में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी पुस्तिका ‘बेनकाब दल व राजनीति’ में नेताजी को ‘अंधा मसीहा’ कहा गया। फिर उनके कामों को कहा गया, ‘सिद्धांतहीन अवसरवाद, जिसकी मिसाल मिलनी कठिन है। यह सब तो नरम मूल्यांकन था। धीरे-धीरे नेताजी के प्रति कम्युनिस्ट शब्दावली हिंसक और गाली-गलौज से भरती गई। जैसे, ‘काला गिरोह’, ‘गद्दार बोस’, ‘दुश्मन के जरखरीद एजेंट’, ‘तोजो (जापानी तानाशाह) और हिटलर के अगुआ दस्ते’, ‘राजनीतिक कीड़े’, ‘सड़ा हुआ अंग जिसे काटकर फेंकना है’,आदि। ये सब विशेषण सुभाष बोस और उनकी सेना आई़ एऩ ए़ (इंडियन नेशनल आर्मी) के लिए थे। तब कम्युनिस्ट मुखपत्रों, पत्रिकाओं में नेताजी के कई कार्टून छपे थे, जिससे कम्युनिस्टों की घोर अंधविश्वासी मानसिकता की झलक मिलती है (उन पर सधी नजर रखने वाले इतिहासकार स्व़ सीताराम गोयल के सौजन्य से वे कार्टून उपलब्ध हैं)। अधिकांश कार्टूनों में सुभाष बाबू को ‘जापानी, जर्मन फासिस्टों का कुत्ते या बिल्ली’ जैसा दिखाया गया है, जिससे उसका मालिक जैसे चाहे खेलता है।”

इतना ही नहीं कम्युनिस्ट – नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और महात्मा गांधी जी को लेकर कैसे परिभाषित कर रहे थे। उस पर भी डॉ शंकर शरण लिखते हैं — “एक कार्टून में बोस को तोजो का मुखौटा, तो अन्य में भारतवासियों पर जापानी बम गिराने वाला दिखाया गया है। एक में बोस को ‘गांधीजी की बकरी छीनने वाला’ दिखाया गया। एक कार्टून में तोजो एक गधे के गले में रस्सी डाले सवारी कर रहा है, उस गधे का मुंह बोस जैसा बना था। दूसरे में बोस को ‘तोजो का पालतू क्षुद्र बौना’ दिखाया, आदि।”

साथ ही कम्युनिस्ट कैसे परजीवी बन जाते हैं सुविधानुसार वो कैसे अपना स्टैंड बदलते हैं? शंकर शरण के इस विवेचन से और सुस्पष्ट होता है —“कम्युनिस्ट अखबार पीपुल्स डेली (10 जनवरी 1943) में तब कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता रणदिवे ने अपने लेख में बोस को ‘जापानी साम्राज्यवाद का गुंडा’ तथा उनकी सेना को ‘भारतीय भूमि पर लूट, डाका, विध्वंस मचाने वाला भड़ैत’ बताया। लेकिन रोचक बात यह है कि यह सब कहने के बाद, समय बदलते ही, जब आई़ एऩ ए. की लोकप्रियता देशभर में बढ़ने लगी, तो कम्युनिस्टों ने उसके बंदी सिपाहियों के पक्ष में लफ्फाजी शुरू कर दी।”

इस क्रम में ये तथ्य भी उल्लेखनीय हैं। ‘कम्युनिस्ट विश्वासघात की कहानी’ पुस्तक के लेखक और ख्यातिलब्ध संपादक रहे रामशंकर अग्निहोत्री अपने एक लेख में लिखते हैं — “भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान भारत की कम्युनिस्ट पार्टी सोवियत संघ के इशारे पर अंग्रेजों की चाटुकारिता करने, गांधी जी और सुभाष चन्द्र बोस को जापान का एजेंट बताने, भारतीय स्वाधीनता सेनानियों को बन्दी बनवाकर जेलों में सड़ने देने की राष्ट्रघाती नीतियों को व्यावहारिक रूप देने में जोर-शोर से लगी हुई थी।”

आगे रामशंकर अग्निहोत्री ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाते हैं कि – आखिर कैसे कम्युनिस्ट न सिर्फ़ भारत छोड़ो आंदोलन की ख़िलाफ़त कर रहे थे। बल्कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को अपमानित कर रहे थे। रामशंकर अग्निहोत्री लिखते हैं —“इस संबंध में यह तथ्य ध्यान रखने योग्य है कि जब कांग्रेस अगस्त, 1942 में अंग्रेजों के विरुद्ध ‘भारत-छोड़ो’ का उद्घोष करने जा रही थी उसी समय 26 जुलाई, 1942 को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस कार्यसमिति के नाम एक खुली चिट्ठी प्रकाशित की थी। इसमें कहा गया था कि “आपके प्रस्तावित अगस्त-प्रस्ताव के द्वारा संघर्ष छेड़ने से अंग्रेज नौकरशाहों को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को “पंचमांगी” कहकर बदनाम करने का अवसर मिलेगा। आपका प्रस्तावित भारत-छोड़ो संघर्ष फासिस्ट जापानियों को देश के भीतर आने में सहायता पहुंचाएगा।” इसी तरह नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की अवमानना और अवज्ञा करते हुए कम्युनिस्टों ने लिखा कि “आखिर जापान-समर्थक भावना किन लोगों में पैदा हुई थी? उन्हीं लोगों में जिनमें आत्मविश्वास नहीं था और जो जापानियों से यह आशा करते थे कि वे अंग्रेजों को इस देश से निकालकर सम्पूर्ण हिन्दुस्थान उन्हें सौंप देंगे।”

(संदर्भ- भारत का कम्युनिस्ट पार्टी-एक संक्षिप्त इतिहास, लेखक-एम.आर.मसानी)

कम्युनिस्टों के राष्ट्रघाती दुष्प्रचार को तो रामशंकर अग्निहोत्री तथ्यात्मक रूप से उद्धृत करते ही हैं। इसके साथ ही पंडित नेहरू की कम्युनिस्टों को लेकर की गई महत्वपूर्ण टिप्पणी को भी उल्लेखित करते हैं। वे लिखते हैं कि —“केरल के अन्दर ए.के. गोपालन और ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद जैसे नेता संकट की उस घड़ी में कांग्रेस को छोड़कर सम्पूर्ण दल-बल के साथ कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए थे। इसीलिए कम्युनिस्टों की इन राष्ट्रघाती कारगुजारियों पर टिप्पणी करते हुए अक्तूबर, 1945 में पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि —“जब देश के हित के लिए लाखों भारतीयों ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था, उस समय कम्युनिस्ट देश के शत्रुओं से जा मिले थे, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।”
(संदर्भ- माडर्न इंडियन पालिटिकल थिंकर्स लेखक-डा. विष्णु भगवान)।

अभिप्रायत: कम्युनिस्टों की वैचारिकी, कृत्यों को संक्षेप में समझना चाहें तो इन तथ्यों से उनका भारत विभाजनकारी मूल प्रकट होता है। गालियां इनके रणनीतिक हथियार हैं। गद्दारी इनका स्वभाव है। दुर्भाग्यवश वर्तमान कांग्रेस इसका अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। वो भी कम्युनिस्टों की वैचारिकी के गुलाम की तरह नज़र आ रही है। जिस तरह से कम्युनिस्टों ने पूज्य बापू से लेकर गुरुदेव टैगोर, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस समेत स्वातंत्र्य वीरों को अपमानित किया। गालियां दी। उनके विरुद्ध अभियान चलाए। भारत के सशक्तिकरण के ख़िलाफ़ व्यापक अभियान और वैचारिक दुष्प्रचार, घ्रणा का व्यापार किया। वो कभी माफ़ करने के योग्य नहीं है। आवश्यकता इनके मूल, कुकृत्यों को समझने और जानने की है। इन्हें बेनकाब करने की है। क्योंकि ये मुखौटा कोई और धारण करते हैं और प्रोपेगैंडा कोई और चलाते हैं।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस इकोसिस्टम को यों ही ‘दिमागी नक्सली’ न कहा होगा? क्योंकि जो भी समाज में हिंसा, अराजकता, उपद्रव, वैमनस्य आदि को फैलाए। वो और भला क्या हो सकता है?

सनसनीखेज : उफ ! माफिया के शूटर से वह इंटरव्यू !

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सुरेंद्र किशोर

पटना । बात 1984 की है। उन दिनों मैं ‘जनसत्ता’ का बिहार संवाददाता था।पटना के लोहिया नगर में किराए के मकान में रहता था।

सन 1983 में जनसत्ता ज्वाइन करने से पहले मैं दैनिक ‘आज’ के पटना संस्करण में मुख्य संवाददाता था। चर्चित बाॅबी हत्याकांड को उद्घाटित करने के कारण मेरी चर्चा पहले से थी। उधर जनसत्ता ने अपने प्रकाशन के साथ ही तहलका मचा रखा था जिसका मैं संवाददाता था।
शायद इसी पृष्ठभूमि में आत्म प्रचार के चक्कर में एक दिन अचानक एक शार्प शूटर रघुनाथ सिंह मेरे घर आ धमका। उसके साथ मेरे एक पूर्व परिचित थे। रघुनाथ काफी लंबा-चैड़ा और हट्ठा-कट्ठा था। हुलिया देख कर मैं थोड़ा असहज हो गया। उसकी कमर में रिवाल्वर थी। बाद में पता चला कि वह साथ में हैंड ग्रेनेड लेकर भी चलता है।
मेरे परिचित ने मुझे बताया कि ये मेरे रिश्तेदार हैं। बिहार के एक बड़े माफिया का नाम लेते हुए कहा कि ये उनके बाॅडीगार्ड और शूटर थे। पर, अब उससे इनका झगड़ा हो गया है। दोनों एक दूसरे की जान के प्यासे हैं।
रघुनाथ की शिकायत थी कि उस माफिया के लिए सारे मर्डर मैंने किये, पर मीडिया में नाम सिर्फ उसका होता है। जबकि वह तो भारी डरपोक आदमी है। एक चूहा भी नहीं मार सकता है। मेरा नाम भी होना चाहिए।
ऐसी सनसनी खेज बात सुनकर मैं रघुनाथ की ओर मुखातिब हुआ।
मैंने उससे पूछा कि आपने कितने मर्डर किये हैं ? इस पर उसने अपना रिवाल्वर निकाल कर टेबुल पर रख दिया। कहा कि यह हथियार मेरे लिए शुभ साबित हुआ है। इससे मैंने कई मर्डर किये हैं। हालांकि कुल तेरह लोगों को मारा है। उस माफिया का नाम लेते हुए कहा कि सब उसी के कहने पर।
फिर उसने विस्तार से बताया कि एक चर्चित मजदूर नेता को उसने कैसे मारा।
आप क्या चाहते हैं ? -मैंने पूछा।
उसने कहा कि मैं चाहता हूं कि फोटो सहित आप मेरा इंटरव्यू छापिए। मैंने कहा कि आपको इंटरव्यू में यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आपने कितने और कैसे मर्डर किये हैं।
उसने कहा कि ‘‘आप कहिए तो मैं हैंडनोट पर लिखकर दे दूंगा। पर मेरा नाम और फोटो जरूर छपना चाहिए। मैंने सुना है कि आपमें छापने की हिम्मत है।’’
मैंने कहा कि छपने के बाद पुलिस आप पर केस कर देगी। वैसा कोई केस होने पर उसका सामना करने को वह तैयार लगा।
मैंने कुछ सोचने के बाद कहा कि आप एक सप्ताह के बाद आइए। मैं विस्तार से आपसे बातचीत करूंगा। अभी मैं थोड़ा व्यस्त हूं।
वह चला गया।
मैंने सोचा कि रघुनाथ शायद अपने लोगों से इस बीच राय-मशविरा करेगा। लोग यही राय देंगे कि सिर्फ नाम छपने के लिए स्वीकारोक्ति देकर मत फंसो। और वह मान जाएगा। मेरे पास दोबारा नहीं आएगा। मैं इस बात को लेकर भी द्विविधा में था कि ऐसे शूटर का इंटरव्यू छापना चाहिए या नहीं। पर इसमें सार्वजनिक हित का पहलू यह था कि इसका इंटरव्यू उस बड़े माफिया के खिलाफ जाने वाला था। उस बड़े माफिया के समर्थकों और संरक्षकों में बड़े-बड़े नेता शामिल थे।
उन दिनों बिहार में गैंगवार और नरसंहारों का दौर था।
मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि ठीक एक सप्ताह के बाद वह मेरे यहां आ धमका।
उससे पहले मैंने उसके बारे में पुलिस सूत्रों से जानकारी ली थी। सुना था कि वह ‘शब्द भेदी वाण’ चलाता है। यानी आवाज की दिशा में गोली चला देता है और निशाने पर लगती है।
वह उत्तर प्रदेश के पी.ए.सी. का भगोड़ा सिपाही है।
इस बात की भी पुष्टि हुई कि वह माफिया इसकी जान का प्यासा बना हुआ है जिसके यहां यह पहले काम करता था।
एक बार फिर अपने आवास में देखकर मैं थोड़ा चिंतित हुआ। इस बार वह अकेला था। मैंने उससे कहा कि आपको मारने के लिए ‘कोई’ खोज रहा है।
यदि उसके लोग यहां हमला कर दें तब तो हम सब मारे जाएंगे। मैं परिवार के साथ रहता हूं।
चेहरे पर निर्भीक भाव के साथ इस बार उसने रिवाल्वर के साथ-साथ हैंड ग्रेनेड भी निकाल कर टेबुल पर रखा।
कहा कि ‘‘इसमें छह गोलियां हैं। मेरा निशाना खाली नहीं जाता है। उसके बाद यह ग्रेनेड एक भीड़ को रोक लेगा। उसके बाद तो जय भवानी !’’
इसके बाद मैंने उससे बातचीत शुरू की। वह सनसनीखेज बातें बताता चला गया। मैं हाथ से लिख रहा था। क्योंकि तब मेरे पास कोई टेप रिकाॅर्डर भी नहीं था। मुझे यदि इस बात का पक्का भरोसा होता कि यह दूसरी बार मेरे यहां आ ही जाएगा तो मैं किसी मित्र से टेप रिकाॅर्डर मांग कर रख लेता।
लंबी बातचीत हुई। बातचीत बहुत ही सनसनीखेज थी।
वह चला गया।
इस बीच मैंने जो लिखा था, उसे फेयर किया।उसकी तीन प्रतियां बनाई।
एक काॅपी करीब तीस पेज में थी।
रघुनाथ ने मुझे साथ में छापने के लिए कुछ सनसनीखेज फोटोग्राफ्स भी दे दिए थे।
मैंने ‘जनसत्ता’, ‘रविवार’ और ‘माया’ के लिए काॅपियां बनायीं।
मुझे आशंका थी कि यह इतना सनसनीखेज है कि जल्दी कोई इसे छापेगा नहीं।
एक नहीं छापेगा तो दूसरे को भेजूंगा।
फेयर काॅपी बनाकर मैं रघुनाथ की प्रतीक्षा करने लगा ताकि उस पर रघुनाथ का दस्तखत ले सकूं।
उधर वह इस बात की प्रतीक्षा कर रहा था कि वह कब छपता है। वह मोबाइल फोन का जमाना था नहीं।
मेरे उस परिचित ने भी रघुनाथ ने संपर्क नहीं रखा था जो मेरे यहां पहली बार उसे लेकर आया था।
करीब एक माह बाद रघुनाथ मेरे यहां तीसरी बार आया। इस बार वह थोड़ा गुस्से में था।
कहा कि आपने मुझसे इतनी लंबी बातचीत की और कहीं छपा नहीं। ध्यान रहे कि वह बलिया की खास तरह की भोजपुरी में बोलता था। उसमें दबंगियत का लहजा होता है।
मैंने कहा कि आप दस्तखत कर दीजिए मैं अखबारों को भेज दूंगा। उसने कहा कि लाइए जहां कहिए वहां दस्तखत कर देता हूं। उसने तीनों काॅपियों के करीब सौ पेज पर खुशी-खुशी दस्तखत कर दिये।
मैंने पहले जनसत्ता और माया को भेजा। जनसत्ता में छपने की मुझे कत्तई उम्मीद नहीं थी। पर चूंकि मैं वहां नौकरी करता था, इसलिए वहां भेजना नैतिक रूप से जरूरी समझा।
पर मैं यह इच्छा रखता था कि वह जनसत्ता में नहीं छपे।
दरअसल यह ‘माया’ के स्वभाव वाला आइटम था।
पर संयोग से दोनों जगह शेड्यूल हो गया।
जनसत्ता के मैगजिन सेक्सन में बेहतर डिसप्ले के साथ छपा। साथ ही ‘माया’ ने भी छाप दिया।
इस पर माया के बाबूलाल शर्मा मुझसे थोड़ा नाराज हुए। उन्होंने मुझे नाराजगी का एक पत्र भी लिखा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जनसत्ता ने पहले ही वाहवाही लूट ली थी। शर्मा जी ने लिखा कि आपको एक ही जगह भेजना चाहिए था।
रघुनाथ के शहर में जनसत्ता ब्लैक में बिका। पचास रुपए में एक काॅपी।
बाद में प्रभाष जोशी ने मुझे बताया था कि उस इंटरव्यू पर इंडियन एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका भी प्रसन्न थे। गोयनका जी ने प्रभाष जी से कहा था कि ‘‘पंडत, तुम्हारा पटना वाला आदमी तो बड़ा खरा है।’’
इंटरव्यू छपने के बाद रघुनाथ बहुत चर्चित हो गया था। काफी खुश हुआ। मेरे आफिस में आया। पैर छूकर प्रणाम किया। फिर एक सनसनीखेज आॅफर दिया। ‘मैं आपको इसके बदले तो कुछ दे नहीं सकता। पर एक काम जरूर कर सकता हूं। आप जिसे कहिएगा, उस एक आदमी को मैं मार दूंगा।’
मैंने उसे समझाया। कहा कि आप हत्या करना छोड़कर उस माफिया की तरह अब आप भी चुनाव लड़िए। इंटरव्यू छपने के बाद लोग आपको भी जान ही गए हैं।
उसने फिर मेरा पैर छुआ और चला गया।
पर एक साल के बाद वह फिर मेरे पास आया। तब तक वह एक अन्य माफिया के साथ हो लिया था। उस दूसरे माफिया ने भी 1985 में विधानसभा का चुनाव लड़ा। पर हार गया।
चुनाव के दौरान विजयी उम्मीदवार के लोगों ने माफिया के भाई को मार डाला। उस माफिया ने रघुनाथ से कहा कि विजयी उम्मीदवार को मार दो। उसी के संबंध में मुझसे बात करने रघुनाथ आया था।
बोला कि भइया, आपने तो अब मर्डर करने से मना किया है। पर ‘वह’ कह रहा है कि फलां को मार दो। मैं नहीं चाहता। क्योंकि उस बड़े माफिया का अनुभव खराब है। मैंने उसके कहने पर एक बड़ा मर्डर किया। पर, उसने मुझे सिर्फ ढाई सौ रुपया दिया और कहा कि भाग जाओ और कहीं छिप जाओ। मुझे छिपने के दिनों में बड़ा कष्ट हुआ।
इस मामले में मैं क्या करूं। आपको मैं गुरु मानता हूं।
मैंने उससे कहा कि अब एक बार फिर कहंूगा कि आप यह सब काम छोड़ दीजिए। यह कह कर वह चला गया कि ‘हां, ठीक कहत बार भइया।’ जाते समय उसने फिर मेरा पैर छुआ।
(इस इंटरव्यू के कारण बाद में बहुत सारी शुभ-अशुभ बातें हुईं।उसका विवरण मैं कभी आगे के लिए अभी छोड़
देता हूं।)
25 अप्रैल 2016 के ( हरिशंकर व्यास द्वारा संपादित )दैनिक ‘नया इंडिया’ में पूरा इंटरव्यू  प्रकाशित )

बंटवारा की समीक्षा, जहाँ शनि होकर भी नहीं हैं और आमिर ना होकर भी हैं 

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सर्वेश
गोपालगंज, बिहार। फिल्म अपलोड कर दी है। सन्नी फिल्म में हो कर भी नहीं हैं, आमिर फिल्म में नहीं हो कर भी हैं। सो यह फिल्म आमिर खान की ही कही जाय तो ठीक होगा…
एक दृश्य है, पाकिस्तान में एक मौलाना साहब के सामने वहां का गुंडा कहता है, ” एना काफ़िरा ने हम पे बड़ा जुल्म कित्ता है जी, मैंने अपने मुसलमान भाइयों दा कत्लेआम देखा है…” इसपर मौलाना साहब का पवित्र उत्तर सुनिए, “तो तू भी वही करना चाहता है पुत्तर?” यह बातचीत पाकिस्तान के लाहौर में हो रही है। मतलब जो लाहौर एक झटके में हिंदुओं से खाली करा लिया गया, जहां के हजारों लोग काट डाले गए, स्त्रियों को नोच डाला गया, सारी संपत्ति हड़प ली गई, वहां का व्यक्ति काफिरों द्वारा जुल्म किए जाने की बात करता है और बुजुर्ग कहते हैं कि तुम भी उनके जैसा बनना चाहते हो? वाह… क्या बात है… यह है असगर वाहियात का एजेंडा…
पूरी फिल्म यह दिखाना चाहती है कि बंटवारे के समय जो हुआ वह क्षणिक आक्रोश था, वरना पाकिस्तानी लोग बिल्कुल ही सज्जन हैं। वे अमन चैन के साथ जीने वाले लोग हैं, उन्हें दूसरे धर्म के लोगों से घृणा नहीं है, वे अब से मिल जुल कर रहने वाले लोग हैं? क्या संसार का कोई मूर्ख व्यक्ति भी यह बात मानेगा?
कहानी भारत से भाग कर पाकिस्तान गए सिकंदर मिर्जा की है जिन्हें वहां रहने को एक बड़ी हवेली अलॉट की जाती है, जो रतनलाल जौहरी की हवेली है। रतनलाल दंगों में मारे जा चुके हैं, लेकिन उनकी मां हवेली में ही रह कर उनका इंतजार कर रही है। शुरुआती आपत्ति के बाद सिकंदर मिर्जा उस बुढ़िया से स्नेह करने लगते हैं, उसे अपनी मां मान लेते हैं, उसके लिए लाहौर भर से लड़ने लगते हैं, और उसकी मृत्यु पर स्वयं उसे मुखाग्नि देते हैं। और लाहौर के लोग उनके साथ इस तरह खड़े हैं कि बुढ़िया की शव यात्रा में हजारों लोग जाते हैं। वाह… तालियां…
फिल्म कहती है कि सिकंदर मिर्जा बुढ़िया को घर में रहने देते हैं, यह बड़ी और प्यारी बात है। मैं देखता हूं, सिकंदर मिर्जा रतननाथ की शानदार हवेली को कब्जा कर के उसकी सारी संपत्ति के मालिक बनते हैं, यह कितनी अमानवीय बात है…
फिल्म कहती है, सिकंदर मिर्जा रतन की मां को कंधा देते हैं, उसे मुखाग्नि देते हैं, यह कितनी बड़ी और सुंदर बात है। मैं देखता हूं, उस एक बेटे की मां को किसी दूसरे के हाथ से मुखाग्नि मिलती है, यह कितनी बड़ी त्रासदी है… उसके बेटे बहू और मासूम पोती को जिन्दा जला कर मारने वाले यदि उसकी शवयात्रा के पीछे चार कदम चल पड़ें तो क्या वे अच्छे हो जाते हैं? दुर्गा देवी का रतनलाल, सावित्री और शांति को सिकन्दर, हमीदा और तन्नो में ढूंढना और पाना सौभाग्य नहीं, त्रासदी है।
संसार का कोई लेखक, कोई फिल्मकार, कोई अभिनेता लाहौर के उन राक्षसों के पाप को झुठला नहीं सकता जिन्होंने एक झटके में ही लाखों लोगों को मार काट कर खत्म कर दिया… असगर वाहियात अपनी झूठी किताब में एक एजेंडा परोसते हैं और आमिर उस एजेंडे को अपनी फिल्म में ढोते हैं, पर इससे सत्य नहीं बदलेगा। समय के न्यायालय में पाकिस्तान और वहां के लोग हमेशा अपराधी की तरह ही खड़े मिलेंगे…
रतनलाल की हवेली आंखों पर नाच रही है। अपनी बुद्धि केवल हवेली बनाने में ही लगाने वाले रतनलालों की आगे भी यही गति होनी है…
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