कांग्रेस का एपस्टीन फाइल हमला: खुद के लिए खोदा गड्ढा

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कांग्रेस की घटिया राजनीति का नया अध्याय

हाल ही में जेफरी एपस्टीन से जुड़े कुछ दस्तावेजों की रिलीज के बाद कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आधारहीन आरोप लगाने की कोशिश की है। पार्टी के प्रवक्ताओं ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि एपस्टीन के ईमेल में मोदी जी का जिक्र है, जिसमें 2017 के इजराइल दौरे को ‘नृत्य और गायन’ से जोड़ा गया और इसे अमेरिकी राष्ट्रपति के फायदे के लिए बताया गया। कांग्रेस ने इसे ‘राष्ट्रीय शर्म’ करार देते हुए स्पष्टीकरण मांगा। लेकिन सरकार की ओर से स्पष्ट जवाब आ चुका है—यह आरोप पूरी तरह झूठा और निराधार है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने इसे ‘एक दोषी अपराधी की घटिया कल्पनाएं’ (trashy ruminations by a convicted criminal) बताया और कहा कि इसे पूर्ण तिरस्कार के साथ खारिज किया जाना चाहिए।

सरकार का स्पष्ट खंडन: कोई संबंध नहीं, सिर्फ झूठ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम इन फाइलों में सिर्फ 2017 के आधिकारिक इजराइल दौरे के संदर्भ में आया है, जो भारत-इजराइल संबंधों की 25वीं वर्षगांठ पर हुआ था। एपस्टीन के ईमेल में कोई सबूत नहीं है कि मोदी जी ने कभी उससे सलाह ली, मुलाकात की या कोई संपर्क था।
MEA के अनुसार, “प्रधानमंत्री के इजराइल दौरे के अलावा बाकी सब कुछ एक दोषी अपराधी की घटिया कल्पनाएं हैं, जिन्हें पूर्ण तिरस्कार के साथ खारिज किया जाना चाहिए।” यह स्पष्ट है कि एपस्टीन जैसे व्यक्ति अपनी साख बढ़ाने के लिए बड़े नामों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन इसमें कोई सच्चाई नहीं। कांग्रेस ने ईमेल को तोड़-मरोड़ कर पेश किया, जैसे ‘सलाह’ और ‘यह काम कर गया’ जैसे शब्द जोड़े, जो मूल दस्तावेजों में नहीं हैं। BJP ने इसे फर्जीवाड़ा करार दिया।

मोदी जी का जीवन: तप और सादगी का प्रतीक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जीवन सादगी, अनुशासन और तपस्या का उदाहरण है। वे साल में दो बार नवरात्रि का कठोर व्रत रखते हैं-चौबीसों घंटे उपवास, ध्यान और राष्ट्रसेवा। उनके चेहरे पर वह तेज दिखता है जो कठिन तप से आता है।
ऐसे व्यक्ति पर ‘अय्याशी’ का आरोप लगाना न सिर्फ हास्यास्पद है, बल्कि कांग्रेस की नैतिक दिवालियापन को उजागर करता है।
क्या एक व्यक्ति एक साथ इतना कठोर तप और विलासिता कर सकता है? नहीं। यह आरोप मोदी जी की छवि पर कीचड़ उछालने की नाकाम कोशिश है।

कांग्रेस का दोहरा चरित्र: हाकिंग से लेकर संजय गांधी तक

कांग्रेस का तर्क अगर सही होता तो स्टीफन हॉकिंग भी ‘महा अय्याश’ होते, क्योंकि उनके एपस्टीन के साथ फोटो हैं। लेकिन हॉकिंग एक महान वैज्ञानिक थे, और फोटो से कोई गलत संबंध साबित नहीं होता। इसी तरह मोदी जी का नाम का जिक्र कोई आरोप नहीं है। उल्टे कांग्रेस को अपने इतिहास पर नजर डालनी चाहिए। नेहरू-एडविना माउंटबेटन के संबंधों पर सवाल उठते रहे हैं- बदले में देश का बंटवारा हुआ?
जामा मस्जिद के बुखारी को कांग्रेस हाईकमान क्यों संरक्षण देता था?
मेनका गांधी को पार्टी से निकालने में भी ऐसे कलंक थे?

कांग्रेस खुद गड्ढे में गिर रही है

कांग्रेस जितना गड्ढा खोदेगी, उतनी मिट्टी निकलेगी। यह घटिया राजनीति है, जिसमें झूठे आरोप लगाकर ध्यान भटकाने की कोशिश है।
मोदी जी पर लगे आरोप झूठे साबित हो चुके हैं। सरकार ने साफ कहा-कोई संबंध नहीं। कांग्रेस को अपने नेहरू-गांधी परिवार की अय्याशियों और घोटालों पर जवाब देना चाहिए। जनता जानती है कि कौन सच्चाई का साथ देता है और कौन झूठ की राजनीति करता है।
यह हमला कांग्रेस के लिए राजनीतिक सुसाइड साबित होगा।

भारत निम्न मध्यम आय श्रेणी से उच्च मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने की ओर अग्रसर

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दिल्ली । भारत को निम्न आय श्रेणी में से वर्ष 2007 में निम्न मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने में 60 वर्ष का समय लगा था। भारत में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI) वर्ष 1962 में 90 अमेरिकी डॉलर थी जो मिश्रित वार्षिक 5.3 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2007 में बढ़कर 910 अमेरिकी डॉलर हो गई। इसी प्रकार, भारत के सकल घरेलू उत्पाद के वर्ष 2007 में एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को प्राप्त करने में 60 वर्ष लग गए थे। आगामी 7 वर्षों में अर्थात वर्ष 2014 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया था। पुनः आगामी 7 वर्षों में अर्थत वर्ष 2021 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया था। परंतु, आगामी केवल 4 वर्षों में अर्थत वर्ष 2025 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया है। एक अनुमान के अनुसार, आगामी केवल 2/3 वर्षों में भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर जाएगा। वर्ष 2009 में भारत को प्रति व्यक्ति आय 1,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर को प्राप्त करने में 62 वर्षों का समय लगा था। परंतु, आगामी केवल 10 वर्षों में, अर्थात वर्ष 2019 में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 2,000 अमेरिकी डॉलर हो गई। अब आगामी 7 वर्षों में अर्थात वर्ष 2026 में भारत में प्रति व्यक्ति आय के 3,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इसके भी आगे जाकर, केवल 4 वर्ष पश्चात अर्थात वर्ष 2030 में भारत में प्रति व्यक्ति आय 4,000 अमेरिकी डॉलर हो जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसी के चलते वर्ष 2030 तक भारत के निम्न मध्यम आय श्रेणी से उच्च मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इस श्रेणी में आज चीन एवं इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हो चुके हैं।

किसी भी देश को उच्च आय की श्रेणी में शामिल होने के लिए उस देश में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय 13,926 अमेरिकी डॉलर (आज की परिभाषा के अनुसार) के स्तर पर पहुंच जानी चाहिए। इसके बाद उस देश को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में भी शामिल कर लिया जाता है। इस दृष्टि से भारत को यदि वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है तो भारत में सकल घरेलू उत्पाद में संयुक्त रूप से 7.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज होना चाहिए, यह वृद्धि दर हासिल करने योग्य है क्योंकि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में औसत संयुक्त वृद्धि दर पिछले 23 वर्षों के दौरान (वर्ष 2001 से वर्ष 2024 के बीच) 8.3 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही है। इससे स्पष्ट है कि भारत आगामी कुछ वर्षों में ही प्रति व्यक्ति औसत आय 4,500 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करते हुए उच्च मध्यम आय श्रेणी के क्लब में शामिल हो जाएगा। इसके बाद भारत को वर्ष 2047 में उच्च आय श्रेणी के क्लब में शामिल होने के लिए प्रति व्यक्ति आय को 18,000 अमेरिकी डॉलर (उस समय की परिभाषा के अनुसार) के स्तर को पार करना होगा, इसके लिए आगामी 23 वर्षों में भारत में प्रति व्यक्ति आय के स्तर में संयुक्त रूप से 8.9 प्रतिशत की वृद्धि दर की आवश्यकता होगी। यह लक्ष्य भी बहुत कठिन नहीं हैं, यदि इस संदर्भ में केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा मिलकर इस प्रकार की आर्थिक नीतियां बनाई जाती हैं जिससे गरीब से गरीब नागरिक तक इन आर्थिक नीतियों के लाभ को पहुंचाया जा सकता हो ताकि इस वर्ग के नागरिकों का आर्थिक विकास भी सम्भव हो सके।

वैश्विक स्तर पर कुल 139 विकासशील एवं उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से केवल 6 देशों की अर्थव्यवस्थाएं भारत की तुलना में तेज गति से आर्थिक विकास करने में सक्षम हुई हैं। परंतु, विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच भारत की आर्थिक विकास दर आज भी सबसे अधिक बनी हुई है। दरअसल, छोटे देशों के सकल घरेलू उत्पाद का आकार तुलनात्मक रूप से बहुत छोटा होता है अतः प्रतिशत के आकलन में यह देश भारत की आर्थिक विकास की दर से कुछ आगे निकल जाते हैं परंतु जैसे जैसे सकल घरेलू उत्पाद का आकार बढ़ता जाता है वैसे वैसे इन देशों के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर कुछ कम दिखाई देने लगती है।

विश्व बैंक द्वारा समय समय पर विश्व के समस्त देशों को इन देशों में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के स्तर के आधार पर निम्न आय, निम्न मध्यम आय, उच्च मध्यम आय एवं उच्च आय के श्रेणी में विभाजित किया जाता है। वर्ष 1990 में पूरे विश्व में प्रति व्यक्ति निम्न आय की श्रेणी में 51 देश शामिल किए गए थे, जबकि प्रति व्यक्ति निम्न मध्यम आय की श्रेणी में 56 देश शामिल थे, प्रति व्यक्ति उच्च मध्यम आय की श्रेणी में 29 देश शामिल थे एवं प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में 39 देश शामिल थे। विश्व बैंक द्वारा ही वर्ष 2024 में किए गए एक आंकलन के अनुसार पूरे विश्व में प्रति व्यक्ति निम्न आय की श्रेणी में देशों की संख्या घटकर 26 हो गई एवं प्रति व्यक्ति निम्न मध्यम आय की श्रेणी में देशों की संख्या में भी गिरावट दृष्टिगोचर हुई है और इस श्रेणी में देशों की संख्या घटकर 50 हो गई है। जबकि प्रति व्यक्ति उच्च मध्यम आय की श्रेणी में शामिल देशों की संख्या बढ़कर 54 हो गई है। परंतु प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में तो देशों की संख्या और भी तेज गति से बढ़कर 87 के स्तर पर पहुंच गई है। इस संदर्भ में 2 उदाहरण दिये जा सकते हैं कि किस प्रकार प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में शामिल होने वाले देशों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

चीन, वर्ष 1990 में 330 अमेरिकी डॉलर की प्रति व्यक्ति आय के साथ निम्न आय श्रेणी के देशों में शामिल था, परंतु वर्ष 1999 में चीन में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 860 अमेरिकी डॉलर हो गई एवं चीन निम्न मध्यम आय श्रेणी में शामिल हो गया। आगे चलकर वर्ष 2010 में, चीन के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 4,410 अमेरिकी डॉलर हो गई और इस प्रकार चीन उच्च मध्यम आय श्रेणी में शामिल हो गया। वर्ष 2007 में चीन में प्रति व्यक्ति आय 2,555 अमेरिकी डॉलर की रही थी, जबकि भारत में प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2023 में 2580 अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच सकी है। दरअसल, भारत में आर्थिक विकास की लगातार तेज गति वास्तविक रूप में वर्ष 2014 से ही प्रारम्भ हुई है। इसी प्रकार, गयाना जैसे छोटे राष्ट्र में वर्ष 1997 में प्रति व्यक्ति आय 390 अमेरिकी डॉलर की थी और गयाना निम्न आय श्रेणी में शामिल था, वर्ष 2015 में गयाना में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 5,530 अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई और गयाना उच्च मध्यम आय की श्रेणी में शामिल हो गया। परंतु इसमें बाद वर्ष 2022 में तो गयाना में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 20,140 के स्तर पर पहुंच गई और आज गयाना उच्च आय श्रेमी में शामिल हो चुका है। अतः भारत को उच्च आय श्रेणी में शामिल होने के लिए अपनी आर्थिक विकास दर को और अधिक गति देनी होगी।

जैसा कि ऊपर के पैरा में वर्णन किया गया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत के आर्थिक विकास पर विशेष ध्यान दिया ही नहीं गया था। सकल घरेलू उत्पाद के स्तर की दृष्टि से वर्ष 1990 में पूरे विश्व में भारत का 14वां स्थान था, जबकि वर्ष 2025 में भारत पूरे विश्व में चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है एवं शीघ्र ही आने वाले 2/3 वर्षों भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इसी प्रकार भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार भी वर्ष 2027/28 तक 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर जाएगा तथा वर्ष 2035/36 तक भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 10 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारतीय नागरिकों को इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समाज को दिए गए पंच परिवर्तन कार्यक्रम में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। पंच परिवर्तन कार्यक्रम में जिन 5 बिंदुओं को शामिल किया गया है, वह निम्नप्रकार हैं – प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्यों का अनुपालन करते हुए अनुशासन में रहना, ताकि पुरे विश्व में भारत की साख को बढ़ाया जा सके। भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने की दृष्टि से स्वदेशी के उपयोग को बढ़ावा देना एवं अपने आप में “स्व” के भाव को विकसित करना। समाज के समस्त वर्गों को आपस में भाईचारा स्थापित करना ताकि वे भारत के विकास में शांतिपूर्वक अपना प्रबल योगदान दे सकें। भारत में पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने की महती आवश्यकता है, प्रकृति का शोषण नहीं करते हुए प्रकृति का पोषण करना भी सीखें। पूरे विश्व में केवल भारत में ही बहुत बड़े स्तर पर संयुक्त परिवार व्यवस्था पाई जाती है और यह व्यवस्था केवल भारत को ही ईश्वर का वरदान माना जाता है। इस व्यवस्था को अक्षुण बनाए रखने के लिए कुटुम्ब प्रबोधन की गतिविधियों को समस्त परिवारों में बढ़ावा देना होगा। कुल मिलाकर, भारतीय समाज यदि एकजुट होकर देश को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाना चाहता है तो यह कार्य कोई मुश्किल भी नहीं है। संघ द्वारा दिए गए उक्त वर्णित पंच परिवर्तन के कार्यक्रम को लागू कर मां भारती को पुनः विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया जा सकता है।

टैरिफ के बावजूद आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका से आगे निकलता शेष विश्व

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ग्वालियर : दिनांक 20 जनवरी 2025 को डॉनल्ड ट्रम्प अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति बनाए गए थे। वर्ष 2024 में ट्रम्प ने अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव “Make America Great Again” अर्थात “अमेरिका को पुनः महान बनाएं”, नारे के साथ जीता था। वर्ष 2025 का पूरा वर्ष भर पूरे विश्व ने ट्रम्प को अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हुए देखा। लगभग पूरा 2025 का वर्ष ट्रम्प ने विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले उत्पादों के आयात पर टैरिफ लगाते हुए बिताया और मित्र देशों सहित कई देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर भारी भरकम टैरिफ लगाए। ट्रम्प का सोचना था कि टैरिफ को बढ़ाकर वे अन्य देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात को कम करेंगे और इससे अमेरिका में ही इन उत्पादों का उत्पादन प्रारम्भ हो जाएगा। ट्रम्प का संभवत: यह सोचना था कि उनका यह प्रयास अमेरिका को महान बनाते हुए शेष विश्व को विपरीत रूप से प्रभावित करेगा। परंतु, वर्ष 2025 में अमेरिका एवं शेष विश्व के आर्थिक क्षेत्र के आंकडें देखने पर ध्यान में आता है कि अमेरिका के मित्र राष्ट्रों सहित विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ का असर अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर लगभग नहीं के बराबर पड़ा है। बल्कि, इसका खामियाजा अमेरिका के नागरिकों को भुगतना पड़ा है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ से अमेरिका में उत्पादों की कीमतों में बेतहाशा बृद्धि दर्ज हुई है, इससे मुद्रा स्फीति में वृद्धि तेज हुई है एवं अमेरिकी नागरिकों को विभिन्न उत्पादों को बढ़ी हुई कीमतों दरों पर खरीदना पड़ रहा है। अमेरिकी नागरिक पिछले 5 वर्षों की तुलना में आज खाद्य सामग्री पर 30 प्रतिशत अधिक खर्च कर रहे हैं। अमेरिका में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें 22 प्रतिशत से बढ़ चुकी हैं। खाद्य पदार्थों एवं मकान की कीमतों में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई हैं। अमेरिका में मुद्रा स्फीति की दर भी 3 से 4 प्रतिशत के बीच बनी हुई है, जो पिछले कई वर्षों की तुलना में बहुत अधिक है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ से परेशान हो रहा है अमेरिकी नागरिक, न कि अन्य कोई देश। श्री रुचिर शर्मा, भारतीय मूल के अमेरिकी लेखक एवं फायनैन्शल टाइम्स के स्तम्भ लेखक, ने अपने एक साक्षात्कार में कई आंकडें दिए हैं, जिनका प्रयोग इस लेख को तैयार करने में किया गया है।

अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले आयात पर लगाए गए टैरिफ के पश्चात अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर कम होती हुई दिखाई दे रही है। वर्ष 2024 में अमेरिका में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 2.8 प्रतिशत की रही थी जो वर्ष 2025 में घटकर 2.1 प्रतिशत हो गई। जबकि वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर दोनों वर्षों, 2024 एवं 2025, में 2.8 प्रतिशत बनी रही है। वर्ष 2025 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में किसी प्रकार की कमी दृष्टिगोचर नहीं हुई है। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में वर्ष 2024 में वृद्धि दर, 6.5 प्रतिशत की रही थी, जो वर्ष वर्ष 2025 में बढ़कर 7.2 प्रतिशत की हो गई। वर्ष 2024 में उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से 52 प्रतिशत देशों की प्रति व्यक्ति सकल उत्पाद में वृद्धि दर अमेरिका की तुलना में अधिक रही थी जबकि वर्ष 2025 में 76 प्रतिशत देशों की प्रति व्यक्ति सकल उत्पाद में वृद्धि दर अमेरिका की तुलना में अधिक रही है। वर्ष 2025 में उभरती अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक विकास दर तेज गति बढ़ती हुई पाई गई है। इस प्रकार, अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ के बावजूद शेष विश्व में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर अमेरिका से अधिक रही है। इस प्रकार अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ का प्रभाव अन्य देशों के विकास पर विपरीत रूप से नहीं पड़ा है।

अमेरिका के पूंजी (शेयर) बाजार में भी वर्ष 2025 में निवेशकों को अपने निवेश पर कम आय प्राप्त हुई है। अमेरिका में निवेशकों द्वारा पूंजी (शेयर) बाजार में किए गए निवेश पर 18 प्रतिशत की आय का अर्जन हुआ है। जबकि, यूरोप में निवेशकों को 35 प्रतिशत, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में निवेशकों को 34 प्रतिशत, अमेरिका को छोड़कर शेष विश्व में निवेशकों को 32 प्रतिशत एवं चीन में निवेशकों को 31 प्रतिशत की आय अर्जित हुई है। इस प्रकार, अमेरिका की तुलना में अन्य देशों में पूंजी (शेयर) बाजार में निवेशकों को लगभग दुगनी आय अर्जित हुई है। अमेरिकी नागरिकों का पूंजी (शेयर) बाजार में निवेश तुलनात्मक रूप से अधिक है। अमेरिकी नागरिकों का जायदाद में निवेश 30 प्रतिशत है जबकि शेयर बाजार में 32 प्रतिशत निवेश है। चीन के नागरिकों का जायदाद में निवेश 55 प्रतिशत एवं शेयर बाजार में निवेश केवल 11 प्रतिशत है। इसी प्रकार, यूरोप के नागरिकों का निवेश क्रमश: 57 प्रतिशत एवं 16 प्रतिशत है। भारतीय नागरिकों के निवेश क्रमश: 50 प्रतिशत एवं 7 प्रतिशत है।

अमेरिका द्वारा अन्य देशों से अमेरिका में होने वाले आयात पर लगाए गए टैरिफ के चलते अमेरिका का राजकोषीय घाटा वर्ष 2024 के सकल घरेलू उत्पाद के 6.9 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2025 में 6 प्रतिशत हो गया है। एक रीसर्च प्रतिवेदन में यह तथ्य उभरकर भी सामने आया है कि टैरिफ के कारण अमेरिका में उत्पादों की कीमतों में वृद्धि हुई है एवं टैरिफ का लगभग 96 प्रतिशत भाग अमेरिकी नागरिकों द्वारा वहन किया गया है। इसके कारण अन्य देशों से अमेरिका को निर्यात कम नहीं हुए हैं। यूरोप का राजकोषीय घाटा वर्ष 2024 के 3.1 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में 3.2 प्रतिशत हो गया है। उभर रही अर्थव्यवस्थाओं का राजकोषीय घाटा वर्ष 2024 के 4.6 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में 4.8 प्रतिशत हो गया है। पूर्व में विभिन्न देशों का राजकोषीय घाटा लगभग 3 प्रतिशत तक रहता आया है जबकि वर्तमान परिस्थितियों के मध्य, विभिन्न देशों का राजकोषीय घाटा बढ़ते हुए 6 प्रतिशत के स्तर तक रहने लगा है। यह स्थिति वित्तीय क्षेत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

वर्ष 2025 में विदेशी व्यापार में वृद्धि दर भी अमेरिका की तुलना में अन्य देशों में अधिक रही है। अमेरिका को छोड़कर शेष विश्व के निर्यात में वर्ष 2019 से 2024 के दौरान औसत 5 प्रतिशत की वृद्धि रही थी जो वर्ष 2025 में बढ़कर 6.4 प्रतिशत की हो गई है। जबकि अमेरिका से निर्यात में वृद्धि दर इसी अवधि के दौरान 4.6 प्रतिशत से गिरकर 4.1 प्रतिशत रह गई है। टैरिफ का अमेरिका से अन्य देशों को होने वाले निर्यात पर विपरीत प्रभाव पड़ा है जबकि अन्य देशों ने आपस में नए बाजारों की तलाश करते हुए अपने विदेशी व्यापार, विशेष रूप से निर्यात, में वृद्धि दर्ज की है। कई देशों ने आपस में मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए हैं, इससे भी विभिन्न देशों के बीच विदेशी व्यापार में वृद्धि दर्ज हुई है। अमेरिका से अन्य देशों को निर्यात के कम होने के चलते अमेरिका में चालू व्यापार खाता घाटा 1.3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका में आज भी उत्पादन की तुलना में उपभोग बहुत अधिक मात्रा में हो रहा है।

अमेरिका की टैरिफ नीति के चलते अमेरिका पुनः महान (MAGA) बनता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। परंतु, विश्व के अन्य कई देश जरूर महान बनते हुए दिखाई दे रहे हैं। अतः टैरिफ का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को विपरीत रूप से प्रभवित करता हुआ दिखाई दे रहा है, जबकि विश्व में अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है। इस प्रकार, ट्रम्प इस धरा को महान बनाने (Make Earth Great Again – MEGA) में अपना योगदान करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर विपरीत परिस्थितियों के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। भारत का राजकोषीय घाटा प्रति वर्ष लगातार कम हो रहा है। यह वर्ष 2024 में 5.5 प्रतिशत था, जो वर्ष 2025 में 4.8 प्रतिशत हो गया एवं अब वर्ष 2026 में घटकर 4.4 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारत को यदि विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था बनाना है तो हमें भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 12 से 14 प्रतिशत वृद्धि के स्तर को प्राप्त करना होगा, जैसा कि चीन ने लम्बे समय तक अपनी अर्थव्यवस्था को इस दर पर आगे बढ़ाने में सफलता अर्जित की थी। सकल घरेलू उत्पाद में यह महत्वाकांक्षी वृद्धि दर हासिल करना कोई असम्भव कार्य नहीं है। अमेरिका यदि भारत का सहयोग करने को तैयार नहीं है तो भारत को अन्य बाजार तलाशते हुए विभिन्न उत्पादों के निर्यात को बढ़ाना होगा। आज भारतीय अर्थव्यस्था मुख्यतः आंतरिक उपभोग पर आधारित है, जबकि उत्पादों के निर्यात को भी आज तेजी से बढ़ाने की आवश्यकता है। भारत द्वारा निर्यात के सामर्थ्य का उपयोग बहुत कम स्तर पर किया है।

भारत के भविष्य को ध्यान में रखकर बनाया गया है इस वर्ष का बजट

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ग्वालियर : दिनांक 1 फरवरी 2026 को, रविवार के दिन, भारत की वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने भारतीय संसद में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बजट पेश किया। इस बजट में की गई घोषणाओं के माध्यम से वैश्विक स्तर पर घटित हो रही उथल पुथल से भारत को बचाने की पुरजोर कोशिश की गई दिखती है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपने द्वितीय कार्यकाल में वर्ष 2025 के दौरान पूरे वर्षभर लगातार कई देशों के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर टैरिफ की घोषणाएं की जाती रहीं एवं इसके विरोध स्वरूप कुछ देशों ने अमरीका से इन देशों को होने वाले निर्यात पर प्रतिकारी टैरिफ लगाने की घोषणाएं की जाती रहीं। चीन ने तो प्रतिशोध में अमेरिका को दुर्लभ खनिज पदार्थों की आपूर्ति ही रोक दी थी। हालांकि इसके पूर्व अमेरिका ने भी चीन को सेमीकंडक्टर एवं चिप्स की आपूर्ति को प्रभावित करने का प्रयास किया था। कुल मिलाकर, कुछ देश तो आपस में विभिन्न वस्तुओं के आयात एवं निर्यात को रोकने के प्रयत्न करते रहे। इन सभी घोषणाओं से वैश्विक स्तर पर विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में माहौल विपरीत रूप से प्रभावित होता रहा। ट्रम्प प्रशासन ने भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न वस्तुओं के निर्यात पर भी 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है, जो अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ में संभवत: आज अन्य देशों की तुलना में सबसे अधिक है।

इस वित्तीय वर्ष के बजट में तीन कर्तव्यों को ध्यान में रखा गया है। (1) विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करते हुए भारत की आर्थिक विकास दर को और अधिक तेज किया जाय ताकि भारत को वैश्विक स्तर पर चल रही उथल पुथल से बचाया जा सके; (2) भारतीय युवाओं में कौशल का विकास करना ताकि तकनीकी क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर हो रहे परिवर्तनों के लिए वे अपने आप को तैयार कर सकें; (3) देश में समावेशी विकास हो सके एवं भारत के संसाधनों का उपयोग समस्त नागरिकों की भलाई में किया जा सके और कोई भी नागरिक, नगर एवं राज्य आर्थिक विकास की धारा से बाहर नहीं रहे।

वैश्विक स्तर पर उक्त वर्णित परिस्थितियों के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बनी रही। परंतु, भारत की विकास दर की इस गति को आगामी वर्षों में भी बनाए रखने के उद्देश्य से वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई है। भारत आज दुर्लभ खनिज पदार्थों तथा सेमीकंडक्टर एवं चिप्स का भारी मात्रा आयात करता है। चिप्स को तो आज के उत्पादों के निर्माण में तेल की भूमिका के रूप में देखा जा रहा है। इन दोनों पदार्थों पर चीन एवं अमेरिका का लगभग पूर्णत: एकाधिकार है। भारत अपने आप को इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाना चाहता है, इस दृष्टि से बजट में भारत में ही दुर्लभ खनिज पदार्थों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए ओड़िसा, केरल, तमिलनाडु एवं आन्ध्रप्रदेश स्थित खदानों में से कच्चे माल को निकालकर इसे संसाधित करते हुए भारत में ही दुर्लभ खनिज पदार्थों के निर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बजट में उक्त चारों राज्यों में एक कोरिडोर बनाने की घोषणा की गई है। इसी प्रकार, भारत में ही सेमीकंडक्टर एवं चिप्स के निर्माण हेतु विनिर्माण इकाईयों की स्थापना को प्रोत्साहन देने के लिए बजट में कई उपायों की घोषणा की गई है एवं इस हेतु 40,000 करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान भी किया गया है। साथ ही, इसके लिए बजट में सेमीकंडकर मिशन 2.0 को लागू करने की भी घोषणा की गई है। इससे कम्पनियों को भारत में इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र में विनिर्माण इकाईयों को स्थापित करने का प्रोत्साहन मिलेगा।

हाल ही में भारत ने कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए हैं, इन समझौतों में 27 विकसित देशों के समूह, यूरोपीयन यूनियन से किया गया मुक्त व्यापार समझौता भी शामिल है। इसे “मदर आफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है क्योंकि यह समझौता 28 देशों (27+1) के बीच एक साथ किया गया सबसे बड़ा समझौता है। इन मुक्त व्यापार समझौतों से भारत में वस्त्र एवं परिधान उद्योग, समुद्रीय पदार्थ उद्योग, चमड़ा उद्योग, खिलौना उद्योग एवं जेम्स एवं ज्वेलरी उद्योग, आदि को सबसे अधिक लाभ होने जा रहा है। इन उद्योगों में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उपक्रम भारी मात्रा में कार्यरत हैं। भारत में उक्त वर्णित पदार्थों के निर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बजट में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को रियायतें देने का प्रयास किया गया है ताकि उक्त वर्णित उत्पादों की मांग में होने वाली वृद्धि को पूर्ण किया जा सके। इस उद्देश्य हेतु 10,000 करोड़ रुपए का एसएमई फंड भी बनाया गया है। टेक्स्टायल उद्योग को भी विशेष रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि भारत में निर्मित वस्त्र एवं परिधानों को विश्व के पटल पर रखा जा सके। साथ ही, बायोफार्मा क्षेत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भी 10,000 करोड़ रुपए के अतिरिक्त फंड की व्यवस्था, बायोफार्मा शक्ति के रूप में, इस बजट में की गई है। इससे भारतीय दवा उद्योग को विश्व के मानचित्र पर और आगे ले जाने में सहायता मिलेगी।

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में विकसित आधारभूत संरचना की अहम भूमिका रहती है। इस बजट के माध्यम से भारत में आधारभूत संरचना को विकसित करने के उद्देश्य से पूंजीगत खर्चों में भारी भरकम वृद्धि की गई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में पूंजीगत खर्चों के लिए 11.2 लाख करोड़ रुपए की राशि निर्धारित की गई थी, इसे वर्ष 2026-27 के बजट में बढ़ाकर 12.20 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 9 प्रतिशत अधिक है। वर्ष 2014-15 के बजट में पूंजीगत खर्चों के लिए केवल 2 लाख करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान किया गया था। पिछले 13 वर्षों में पूंजीगत खर्चों में 6 गुना से भी अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। पूंजीगत खर्चों में वृद्धि से कई क्षेत्रों में सरकारी निवेश भी बढ़ता है एवं इससे अंततः रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित होते हैं। बल्कि, अब तो सरकार के साथ साथ निजी क्षेत्र को भी अपने पूंजी निवेश को बढ़ाना होगा। क्योंकि, सरकार के पूंजीगत खर्चों में अतुलनीय वृद्धि से देश में ही विभिन्न उत्पादों के निर्माण में तेज गति से वृद्धि होगी और वर्तमान विनिर्माण इकाईयों की उत्पादन क्षमता का उपयोग 80 प्रतिशत से ऊपर निकल जाएगा, जो वर्तमान में लगभग 75 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया है, इससे नई उत्पादन इकाईयों को स्थापित करना आवश्यक होगा। अतः भारत में अब निजी क्षेत्र में भी निवेश बढ़ेगा, इसमें विदेशी निवेश भी शामिल है।

भारत में उत्पादों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में रेल्वे की मुख्य भूमिका रहती है। भारत में इन उत्पादों की गतिशीलता को बढ़ाने के उद्देश्य से 7 नए हाई स्पीड रेल कोरिडोर बनाए जाने की घोषणा भी इस बजट में की गई है। यह कोरिडोर मुंबई से पुणे, पुणे से हैदराबाद, हैदराबाद से बैंगलोर, हैदराबाद से चेन्नई, चेन्नई से बैंगलोर, दिल्ली से वाराणसी एवं वाराणसी से सिलीगुड़ी के बीच विकसित किए जाएंगे। यह क्षेत्र विकास के नए केंद्र बन जाएंगे।

भारत को विश्व में लाजिस्टिक हब के रूप में स्थापित करने के लिए इस बजट में 10,000 करोड़ रुपए का विशेष फंड बनाया जा रहा है ताकि भारत में ही कंटेनर के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सके। भारत में मेडिकल टुरिजम को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 5 हब बनाए जाएंगे। इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र एवं राज्यों को भी साथ में लिया जाएगा। इससे भारत में उच्च गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य सेवाएं सस्ती दरों पर उपलब्ध हो सकेंगी एवं अन्य देशों के नागरिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भारत की ओर आकर्षित होंगे। इसी प्रकार, भारत में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बौद्ध सर्किट का निर्माण भी किया जा रहा है। इससे अन्य देशों के बौद्ध धर्म के अनुयायी भारत में धार्मिक पर्यटन हेतु आकर्षित हो सकेंगे। भारत को पूरे विश्व की आध्यात्मिक राजधानी कहा जाता है क्योंकि भारत में समस्त धर्मों का आदर किया जाता है।

पूरे विश्व में ऐनिमेशन, विजुअल इफेक्ट, गेमिंग एवं कॉमिक क्षेत्र तेज गति से आगे बढ़ रहा है। भारतीय युवाओं को इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर तलाशने एवं इस क्षेत्र को भारत में ही बढ़ाने के उद्देश्य से इस क्षेत्र को प्रोत्साहन देने का निर्णय इस बजट में किया गया है। इस क्षेत्र में वर्ष 2030 तक 20 लाख युवाओं की आवश्यकता पड़ेगी। अतः इस हेतु भारत में ही विभिन्न विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में इस क्षेत्र में शिक्षा एवं कौशल प्रदान करने हेतु उच्च शिक्षा प्रदान किए जाने की व्यवस्था की जा रही है।

आयकर की दरों में किसी प्रकार की वृद्धि प्रस्तावित नहीं है। जबकि आयकर के नियमों को सरल बनाया गया है। आय कर की नई योजना के अंतर्गत अब 12 लाख रुपए तक की आय पर शून्य आयकर लगाया जाएगा। आयकर रिटर्न फाइल करने हेतु समय सीमा को भी बढ़ाया जा रहा है। इस प्रकार, इस संदर्भ में आयकर नियमों को सरल बनाया जा रहा है

वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए प्रस्तुत किए गए बजट की कुछ मुख्य विशेषताओं में वित्तीय अनुशासन का अनुपालन किया जाना भी शामिल है। बजटीय घाटे को 4.5 प्रतिशत के अंदर रखने का प्रयास सफल रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में बजटीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद का 4.4 प्रतिशत रखने में सफलता हासिल हुई है। जबकि, अमेरिका जैसे विकसित देश में भी आज बजटीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिशत से अधिक है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में बजटीय घाटे को कम करते हुए इसे 4.3 प्रतिशत तक नीचे लाने का प्रयास किया जा रहा है, हालांकि वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान पूंजीगत खर्चों में 1.1 लाख करोड़ रुपए की वृद्धि भी प्रस्तावित है।

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