बिहार में हिंदू शिक्षकों के साथ धार्मिक असमानता: सावन की उपेक्षा बनाम मुस्लिम सुविधाएं

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प्रशांत सौरभ

बेतिया (बिहार): बिहार को सेक्यूलर शासन वाला राज्य कहा जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग दिखाई देती है। सावन का पवित्र महीना चल रहा है। हजारों हिंदू शिक्षक कांवड़ यात्रा पर देवघर जाना चाहते हैं, भगवान शिव की आराधना करना चाहते हैं। यह यात्रा कम से कम 6 से 7 दिन की होती है। लेकिन छुट्टियों की कमी के कारण वे अपने धर्म का निर्वाह नहीं कर पा रहे। यदि वे आकस्मिक अवकाश का उपयोग कर लें, तो पूरे वर्ष के बाकी कामों और पारिवारिक जरूरतों के लिए छुट्टियां ही नहीं बचेंगी। 16 दिन के सालाना आकस्मिक अवकाश में से इतने दिन निकालना व्यावहारिक रूप से असंभव है।

अब तुलना करें मुस्लिम शिक्षकों की स्थिति से। शुक्रवार के दिन मध्यांतर के बाद उन्हें लगभग तीन घंटे की विशेष सुविधा मिलती है। वर्ष के 52 शुक्रवारों में यह लगभग 156 घंटे बनता है, जो दिन के हिसाब से 6 से 7 पूर्ण कार्यदिवसों के बराबर है। यह सुविधा नियमित रूप से उपलब्ध रहती है। इसके अलावा रमजान के पूरे महीने मुस्लिम कर्मचारियों और शिक्षकों को एक घंटा पहले जाने की अनुमति दी जाती है। लगभग 26-30 दिनों में यह 26-30 घंटे अतिरिक्त समय की बचत है। शिक्षा विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग के आदेशों से यह व्यवस्था हर साल लागू की जाती है।

प्रश्न यह है कि जब एक समुदाय के शिक्षकों को अपने धार्मिक कर्तव्यों के निर्वाह के लिए नियमित और व्यवस्थित समय-छूट दी जा सकती है, तो हिंदू शिक्षकों को सावन में कांवड़ यात्रा के लिए 6-7 दिनों की समान सुविधा क्यों नहीं? यह कोई पहाड़ तोड़ने वाला काम नहीं है। स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हुए बिना व्यवस्था की जा सकती है। मुस्लिम भाइयों की सुविधा को छीनने की बात नहीं है। मांग केवल समानता की है—कि हिंदू शिक्षक भी अपने धर्म का पालन कर सकें।

यदि सावन में हिंदू शिक्षकों को पूजा-अर्चना या यात्रा के लिए एक घंटे की भी दैनिक सुविधा नहीं दी जा सकती, तो सेक्यूलरिज्म का दावा खोखला लगता है। सेक्यूलरिज्म का अर्थ सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान होना चाहिए, न कि एक तरफ विशेषाधिकार और दूसरी तरफ उपेक्षा। हजारों हिंदू शिक्षक हर साल इस असमानता का अनुभव करते हैं। वे अपने बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन स्वयं अपने आस्था के अधिकार से वंचित रह जाते हैं।

यह स्थिति लंबे समय से चली आ रही है। आकस्मिक अवकाश सभी के लिए समान बताए जाते हैं, लेकिन व्यवहार में एक समुदाय को अतिरिक्त धार्मिक छूट मिलती है जबकि दूसरे को नहीं। सावन जैसे महत्वपूर्ण महीने में हिंदू शिक्षकों को कांवड़ यात्रा के लिए विशेष अवकाश या समय-समायोजन देना न्यायसंगत और व्यावहारिक दोनों है। इससे न तो प्रशासनिक व्यवस्था बिगड़ेगी और न ही शिक्षा प्रभावित होगी।

सच्ची समानता तभी स्थापित होगी जब सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने विश्वास का पालन करने का समान अवसर मिले। बिहार के हिंदू शिक्षकों की यह जायज मांग अब अनसुनी नहीं रहनी चाहिए।

स्टार और हैशटैग युक्त फ़ोन को कृपया कभी डायल नहीं करें। भूल कर भी नहीं।

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दयानंद पांडेय

लखनऊ। आजकल अकसर फ़ोन पर पैसे मांगने के संदेश आम बात हो गई है। कभी फेसबुक के मेसेंजर पर या वाट्सअप पर। अव्वल तो मेरे पास पैसा होता ही नहीं कि किसी को भेजूं। न यह सब आता है। फिर भी कहने की बात नहीं कि यह सभी याचक फर्जी , फ्रॉड और रैकेटियर लोग होते हैं। आज दिन कोई एक बजे बनारस से एक मित्र का वाट्सअप संदेश आया। 45 हज़ार रुपए तुरंत मांगा गया। लगातार संदेश पर संदेश। कहा कि इस नंबर पर तुरंत गूगल पे कीजिए : 9128877854

मुझे तुरंत शक हुआ। क्यों कि मित्र का नंबर कुछ और था। यह नंबर कुछ और। मैं ने संदेश भेजा कि फोन पर बात कीजिए। फ़ोन नहीं आया तो खुद किया। फोन काट दिया गया। संदेश आया कि अभी काल नहीं कीजिए। 45 हज़ार रुपए भेजिए। वाट्सअप काल , मोबाईल काल सब काट दिया जाता। संदेश भेज कर गालियां दीं। पुलिस में रिपोर्ट करने की धमकी दी। संदेश आने बंद हो गए। अभी थोड़ी देर पहले फिर मित्र को फोन किया। मित्र ने फोन उठा लिया। दोपहर की घटना बताई। वह जैसे किसी नदी के बांध की तरह फूट पड़े। सारे विवरण बाढ़ के पानी की तरह जैसे बहने लगे।
बीते 15 जुलाई को अपने साथ घटी एक घटना याद आ गई। 15 जुलाई की दोपहर मुझे एक फोन आया कि डी टी डी सी कोरियर से बोल रहा हूं। आप की किताबों का एक पैकेट आया है। डिलीवरी वाला लड़का नया है। आप का पता नहीं खोज पा रहा है। प्लीज़ उस को फोन कर अपना पता समझा दीजिए। मैं ने कहा कि आप उसे मेरा नंबर दे दीजिए। वही फ़ोन कर ले। फिर उस ने कहा प्लीज़ आप ही फोन कर लीजिए। लड़का बिलकुल नया है। उस का नंबर भेज रहा हूं। नंबर मेसेज बॉक्स में आया। नंबर कॉपी नहीं हो पा रहा था। कि कॉपी कर के फोन मिला लूं। तभी फिर फोन आया कि आप ने उस को फोन नहीं किया ? बताया कि वह नंबर कॉपी नहीं हो पा रहा। तब वह बोला , नंबर बोल रहा हूं डायल कर लीजिए। उस ने नंबर बोला। मैं ने डायल कर दिया। अजीब नंबर था।
*21*8294 421837#

लेकिन कोई घंटी नहीं गई। पलट कर चेक किया तो पाया कि काल लिस्ट में वह नंबर दर्ज भी नहीं था। पलट कर जिस नंबर से फोन करने के लिए फोन आया था 91 7061044569 पर उसे काल किया। वह बोला भोपाल से बोल रहा है। जितना भला बुरा कर सकता था , किया। वह सर , सर करता रहा। उस ने गालियों का भी बुरा नहीं माना। एक और फ़ोन 91 8294421837  से भी इसी बीच इसी बाबत फोन आया। उसे भी भरपेट भला बुरा कहा। फिर लगा कि यह तो बैंक वाला फ्राड भी कर सकता है। खाता ख़ाली कर सकता है। तुरंत बैंक में फोन किया। बैंक में लिखित की बात आई। हम ने कहा जब तक लिखित देने बैंक आऊंगा , तब तक तो खाता खाली हो जाएगा। बैंक कर्मी अभिषेक तिवारी मित्र हैं। बैंक यूनियन के नेता भी हैं। तुरंत  हमारा खाता फ्रिज कर दिया। उत्तर प्रदेश पुलिस में एस टी एफ में रहे रिटायर्ड डी आई जी अरविंद चतुर्वदी को फोन कर सारी बात बताई। अरविंद जी आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के सुपौत्र और इतिहासविद शैलनाथ चतुर्वेदी के सुपुत्र हैं। हमारे हर संकट में खड़े हो जाते हैं। संकट टल  जाता है। इसी बीच एक और संदेश आया।

You have successfully activated Call Forwarding on your Jio Number +919335233424 and calls will now be forwarded to +918294421837. To deactivate, use the settings on your mobile or click https://www.jio.com/dl/call_forwarding

उन को यह संदेश भी भेजा। अरविंद जी ने कहा पहले तो इस फारवर्ड को तुरंत डिएक्टिव कीजिए फिर बात कीजिए। अब मुझे यह सब भी नहीं आता। फिर हमारे नीचे एक परिवार की बेटी स्टूडेंट है। मेडिकल की तैयारी कर रही है। भाग कर उस के पास गया। आई फ़ोन की तकनीक उसे नहीं मालूम थी। पर दो मिनट में ही उस ने मेसेज फॉरवर्ड डिएक्टिवेट कर दिया। मेरे फोन पर फिर से मेसेज आने लगे। अरविंद जी ने भी संदेश भेज कर चेक किया : आशा है आप का खाता सुरक्षित होगा।

एक दुर्भाग्य का पटाक्षेप हुआ। यह सब कुछ पांच मिनट से भी कम में गुज़र गया। बाद में एक मित्र ने बताया कि अगर आप का फ़ोन आई फोन न होता तो पल भर में हैक हो गया होता। बैंक का खाता खाली होने में सेकेंड भर भी नहीं लगता। जो भी हो। एक तो मेरे पास बहुत पैसा नहीं है। जो थोड़ा बहुत है भी , ख़ून पसीने और मेहनत का है। ईमानदारी का है। कोई ऐसे ले भी कैसे सकता है भला , इतनी आसानी से। ख़ुद ही कुछ खर्च करना होता है तो दस बार सोचता हूं।

उस वक्त भी सोचा कि लिख कर मित्रों को सावधान कर दूं। पर आलस में टाल गया। पर आज अभी जब बनारस के मित्र ने बताया कि सब कुछ उन के साथ भी ऐसे ही हुआ। और उन का फोन तुरंत हैक हो गया। उन के घर के पास ही बैंक था। भाग कर वह बैंक गए और तुरंत खाता फ्रिज करवाया। पर फोन हैक होने के कारण दिन भर हैरान और परेशन हुए। उन को भी ऐसे ही स्टार और हैशटैग वाला फोन डायल करने को कहा गया था। डायल कर के फंस गए।

अकसर ऐसे फोन करने वालों को डांट कर फोन काट देता हूं। पर उस 15 जुलाई को किताब के पैकेट के नाम पर फंस गया।

पिछले हफ्ते नोएडा से भी एक लेखक मित्र का भी ऐसा ही संदेश आया था। एक बार तो रेलवे के एक बड़े अफसर मित्र जो लेखक भी हैं का रात ग्यारह बजे फेसबुक पर संदेश आया कि मेदांता हॉस्पिटल में पत्नी एडमिट हैं। हमारे यू पी आई की लिमिट खत्म हो गई है। तुरंत पचास हज़ार रुपए भेजिए। जवाब दिया कि इतने पैसे घर में हैं नहीं और कि यह सब मुझे नहीं आता पर आप अस्पताल में कहां हैं , बताएं आ जाता हूं। कुछ इंतज़ाम ज़रूर हो जाएगा। वह कहने लगा कि किसी मित्र को कह कर पैसे ट्रांसफर करवा दूं।

मुझे शक हुआ। फोन किया मित्र को। फोन उठ गया। वह सोए हुए थे। कहने लगे कि पता नहीं कौन है जो इस तरह सब से पैसे मांग रहा है। परेशान हो गया हूं। ऐसे ही प्रशासन के कई मित्रों के संदेश भी आते रहते हैं। एक बार तो इन्हीं अरविंद चतुर्वेदी की प्रोफ़ाइल से पैसे मांग लिए गए। समझ गया कि यह फ्राड है। बताया उसे कि जिस आई डी से यह फ्रॉड कर रहे हो , आई पी एस अफसर हैं। जेल में ठूंस देंगे। तब वह नौकरी में थे। सुनते ही वह गोल हो गया। ऐसे चार सौ बीसों से सर्वदा सतर्क रहिए। कोई मित्र सचमुच संकट में दिखे तो भी बिना बात किए किसी भी को इस तरह पैसे देने से सौ बार बचिए। भावनात्मक शोषण की सवारी की चार सौ बीसी से सर्वदा बच कर रहिए।

एक बार वाट्सअप पर वीडियो काल आई कि मुंबई से पुलिस कमिश्नर बोल रहा हूं। कुछ लड़के गैंग रेप में पकड़े गए हैं। उस में आप का लड़का भी है। गो कि वह पुलिस कमिश्नर टाइप वर्दी में था। आई पी एस वाली कॉलर आदि। तो भी हम समझ गए फ्राड है। पूछा कि कौन सा वाला लड़का है ? उस ने पूछा , कितने लड़के हैं ? मैं ने बताया कि पचास हैं। उस ने घबराते हुए पूछा , मशीन है क्या ? मैं ने बताया कि मशीन नहीं , फैक्ट्री है। उस ने फोन काट दिया।

ऐसे ही हाऊस अरेस्ट टाइप काल , फोन बंद हो जाएगा जैसी काल , लड़कियों की बाथरूम में आ जाओ जैसी वीडियो काल के भी क्या कहने ! पहले ही राऊंड में पूछ लेता हूं , ब्लैकमेलिंग करनी है ? कितने पैसे चाहिए ? सब भाग जाते हैं। साइबर ठगी के जाने क्या उपाय कर रही सरकार। कि सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही।

जंतर-मंतर पर लोकतंत्र, रांची में सन्नाटा! क्या सत्‍य समर्थन के लिए भी सिलेक्‍टिव होना होगा ?

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दिल्ली । लोकतंत्र की असली परीक्षा उस समय भी न्याय के पक्ष में खड़े रहने में होती है, जब सामने वाली सत्ता अपनी विचारधारा की हो। दरअसल, आज झारखंड के रांची में JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित धांधली और अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई ने देश के तथाकथित ‘लिबरल’ और वामपंथी विमर्श को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल सिर्फ लाठीचार्ज का नहीं है। सवाल उस राजनीतिक चयन का है, जिसमें एक जगह छात्रों पर कार्रवाई लोकतंत्र की हत्या बन जाती है और दूसरी जगह वही कार्रवाई अचानक प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई दिखाई देने लगती है।

रांची में रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता को लेकर छात्र लंबे समय से आंदोलनरत हैं। आंदोलन 18वें दिन तक पहुंच चुका है और सरकार तथा प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच बातचीत के कई दौर के बावजूद समाधान नहीं निकला। सोमवार को विधानसभा घेराव के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हुई। पुलिस ने पानी की बौछार, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया।

छात्रों का सवाल सत्ता से है, राजनीति से नहीं

यह समझना जरूरी है कि किसी छात्र आंदोलन को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता, क्‍योंकि उसके प्रभाव के परिणाम स्‍वरूप कहीं सत्‍ता हाथ से न निकल जाए! क्‍योंकि छात्र इस आन्‍दोलन के माध्‍यम से जो मूल प्रश्न उठा रहे हैं, वह यही है कि परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों की जांच पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए। वे हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा झारखंड सरकार जिसमें कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) शामिल हैं, आज पूछ रहे हैं कि क्‍या सोरेन सरकार के रहते युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों का पारदर्शी समाधान होगा या नहीं?

फिर यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण है तो पुलिस बल प्रयोग की आवश्यकता क्यों पड़ी? वस्‍तुत: यही प्रश्न जंतर-मंतर पर भी पूछे गए थे। वहां प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों के समर्थन में विपक्ष के बड़े नेता पहुंचे। राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारी छात्रों से मुलाकात की, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की और छात्रों के साथ खड़े होने का सार्वजनिक संदेश दिया। जंतर-मंतर के प्रदर्शन को लेकर विपक्षी नेताओं की सक्रियता इतनी स्पष्ट थी कि संसद के भीतर और बाहर भी उसका राजनीतिक प्रभाव दिखाई दिया, तो फिर रांची में वही राजनीतिक नैतिकता इतनी कमजोर क्यों पड़ जाती है?

जंतर-मंतर का आक्रोश क्या रांची की सीमा पर खत्म हो जाता है?

वास्‍तव में आज यही वह सवाल है जिसे हर कोई देशभक्‍त उठा रहा है। वे पूछ रहे हैं कि ि‍झारखंड में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के समय वही लोग क्यों दिखाई नहीं दे रहे, जोकि दूसरे मामलों में लोकतंत्र, अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सबसे आगे खड़े दिखाई देते हैं। निश्‍चित ही ये प्रश्‍न लोकतांत्रिक है, क्या छात्र के अधिकार का मूल्य इस बात से तय होगा कि वह किस सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहा है?

यदि केंद्र सरकार के खिलाफ छात्र प्रदर्शन करे तो वह लोकतंत्र की आवाज है, किंतु किसी विपक्ष शासित राज्य सरकार के खिलाफ वही छात्र प्रदर्शन करे तो वह कानून-व्यवस्था की समस्या है! यह दृष्टिकोण लोकतंत्र को कमजोर करता है। लोकतंत्र में सरकार केंद्र की हो या राज्य की, विरोध करने वाला छात्र और उसकी समस्‍याएं, समान होती हैं। वह भाजपाई, कांग्रेसी या वामपंथी नहीं होतीं।

‘सेलेक्टिव आक्रोश’ लोकतंत्र का सबसे खतरनाक चेहरा है

वास्तविक समस्या यही है और बहुत दुखद भी है कि भारत में राजनीतिक विमर्श तेजी से ‘कौन सही है’ से ‘किसके खिलाफ सही है’ में बदलता जा रहा है। सत्ता में अपना दल हो तो पुलिस की कार्रवाई ‘कानून-व्यवस्था’ है और विरोधी दल की सरकार हो तो वही कार्रवाई ‘तानाशाही’ है। अपने समर्थक प्रदर्शन करें तो वे ‘युवा शक्ति’ हैं, दूसरे पक्ष के समर्थक सड़क पर उतरें तो वे ‘राजनीतिक भीड़’ बन जाते हैं।

यह दोहरा मापदंड! मीडिया, सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और सोशल मीडिया के प्रभावशाली चेहरों की विश्वसनीयता भी इसलिए आज प्रश्‍नों के दायरे में है। जंतर-मंतर पर छात्रों के समर्थन में खड़ा होना लोकतांत्रिक अधिकार है और रांची में छात्रों के पक्ष में खड़ा होना…?

लाठी किसी भी सरकार की हो, सवाल वही रहना चाहिए

रांची से सामने आए वीडियो में पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। छात्रों ने चोटों, लाठी के निशानों और कुछ प्रदर्शनकारियों के घायल होने के समाचार हैं। किंतु सभी को समझना होगा कि JPSC और JSSC जैसी परीक्षाएं सरकारी नौकरियों की परीक्षा होने के साथ इनके पीछे हजारों-लाखों परिवारों की उम्मीदों से भी जुड़ी होती हैं।

एक युवा वर्षों तक तैयारी करता है, आर्थिक और मानसिक दबाव झेलता है और अंततः परीक्षा की निष्पक्षता पर ही उसका भविष्य टिका होता है।यदि परीक्षा में धांधली, पेपर लीक या चयन प्रक्रिया में अनियमितता के आरोप लगते हैं तो सरकार का पहला दायित्व छात्रों को राजनीतिक विरोधी समझना नहीं, बल्कि उनके संदेह का पारदर्शी समाधान करना होना चाहिए। यही शासन की विश्वसनीयता की पहली शर्त है।

हैशटैग की राजनीति से बाहर निकलने का समय

‘लोकतंत्र खतरे में है’ जैसे नारे तभी सार्थक हैं, जब लोकतंत्र की रक्षा का सिद्धांत सत्ता और दल से ऊपर हो, अन्‍यथा ऐसे नारे सिर्फ राजनीतिक हथियार बनकर रह जाते हैं। आज असली सवाल यह है कि क्या भारत में विरोध का अधिकार सत्ता बदलते ही बदल जाता है?

यदि जंतर-मंतर पर छात्रों पर बल प्रयोग गलत था, तो रांची में भी गलत है। यदि रांची में पुलिस कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए कानून-व्यवस्था का तर्क दिया जा सकता है, तो यही तर्क दूसरी सरकारों के मामलों में भी समान रूप से लागू होना चाहिए। लोकतंत्र कोई ऐसा तराजू नहीं है जिसका एक पलड़ा अपने राजनीतिक पक्ष के लिए भारी और दूसरे के लिए हल्का रखा जाए।

वास्‍वत में रांची का घटनाक्रम उन सभी लोगों के लिए आईना है जो खुद को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और छात्र अधिकारों का प्रहरी बताते हैं। यह आईना उन तमाम सार्वजनिक चेहरों के लिए भी है जोकि हर घटना पर नैतिकता का प्रमाण-पत्र बांटते हैं। ध्‍यान रहे, यहां किसी एक दल को निर्दोष घोषित करने का प्रश्न नहीं है। प्रश्न सिद्धांत का है। सरकार यदि गलत है तो उसके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए। प्रदर्शनकारी यदि हिंसा करते हैं तो उसकी भी आलोचना होनी चाहिए। पुलिस यदि जरूरत से अधिक बल प्रयोग करती है तो उसका जवाब मांगा जाना चाहिए और यदि परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी के आरोप हैं तो उनका निष्पक्ष निपटारा होना चाहिए।

जंतर-मंतर पर लोकतंत्र और रांची में कानून-व्यवस्था यह सुविधा के अनुसार बदली जाने वाली शब्दावली नहीं हो सकती। यदि लोकतंत्र सचमुच सबका है तो उसका आक्रोश भी सबके लिए होना चाहिए। वरना ‘सेलेक्टिव आक्रोश’ धीरे-धीरे उस विश्वास को खा जाएगा, जिस पर लोकतंत्र खड़ा है।

जातिगतआरक्षण से आगे बढ़कर आवश्यकता आधारित न्याय का समय

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 लखनऊ। भारत का संविधान समानता, सामाजिक न्याय और अवसरों की समान उपलब्धता के सिद्धांत पर आधारित हैस्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश के निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि सदियों से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना करने वाले समुदायों को मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान आवश्यक हैं। इसी सोच के अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई।

उस समय यह भी अपेक्षा थी कि यह व्यवस्था संविधान लागू होने से 10 वर्ष की अवधि के लिए एक संक्रमणकालीन उपाय होगी, जो समाज में समान अवसर स्थापित होने तक सहायक बनेगी। आज, स्वतंत्रता के आठ दशकों के बाद यह प्रश्न फिर से गंभीरता से उठ रहा है कि क्या वर्तमान आरक्षण व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य की दिशा में अपेक्षित परिणाम दे सकी है, अथवा अब समय आ गया है कि इसकी समीक्षा कर इसे अधिक व्यापक, न्यायसंगत और आवश्यकता-आधारित बनाया जाए।यह एक कड़वा सत्य है कि देश में करोड़ों ऐसे गरीब परिवार हैं जो किसी भी आरक्षित वर्ग में नहीं आते, फिर भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों से वंचित हैं।

ऐसे अनेक बच्चे हैं जिनके माता-पिता नहीं हैं, जो दिव्यांग हैं, जिनका परिवार अत्यंत निर्धन है, या जो दूरदराज़ के क्षेत्रों में संसाधनों के अभाव में जीवन संघर्ष कर रहे हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी जाति नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ हैं।यही कारण है कि आज जातिगत आरक्षण के स्थान पर आवश्यकता-आधारित आरक्षण अथवा विशेष अवसरों की व्यवस्था पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए। यदि किसी बच्चे के पास पढ़ने के लिए विद्यालय नहीं, रहने के लिए सुरक्षित घर नहीं, भोजन की नियमित व्यवस्था नहीं और परिवार का सहारा भी नहीं है, तो उसके लिए सबसे बड़ी पहचान उसकी जाति नहीं बल्कि उसकी वंचित स्थिति है। ऐसे बच्चों को यदि उच्च शिक्षा, छात्रवृत्ति, प्रतियोगी परीक्षाओं, तकनीकी प्रशिक्षण और सरकारी नौकरियों में विशेष अवसर नहीं मिलेंगे, तो सामाजिक न्याय का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।

भारतीय समाज में यह स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि आरक्षण का लाभ कई परिवारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलता रहता है, जबकि उसी वर्ग के अनेक अत्यंत गरीब और पिछड़े परिवार आज भी लाभ से वंचित रह जाते हैं। यह विसंगति नीति-निर्माताओं के लिए विचार का विषय होना चाहिए कि लाभ वास्तव में सबसे अधिक जरूरतमंद तक कैसे पहुँचे। किसी भी कल्याणकारी नीति का मूल्यांकन समय-समय पर होना लोकतंत्र की सामान्य और स्वस्थ प्रक्रिया है। समीक्षा का अर्थ किसी अधिकार को समाप्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उसका लाभ न्यायपूर्ण ढंग से वितरित हो।भारत में गरीबी किसी एक जाति तक सीमित नहीं है। खेतों में मजदूरी करने वाला गरीब किसान, फुटपाथ पर जीवन बिताने वाला परिवार, अनाथालय में पल रहा बच्चा, दुर्घटना में माता-पिता खो चुका विद्यार्थी, गंभीर दिव्यांगता के साथ संघर्ष कर रहा युवा तथा अत्यंत पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लाखों नागरिक अवसरों की कमी से जूझ रहे हैं।

यदि राज्य का उद्देश्य वास्तव में समान अवसर उपलब्ध कराना है, तो इन वर्गों के लिए भी सशक्त संवैधानिक और नीतिगत व्यवस्थाएँ विकसित की जानी चाहिए।विशेष रूप से अनाथ बच्चों की स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। उनका कोई पारिवारिक संरक्षण नहीं होता। वे न सामाजिक पूंजी के सहारे आगे बढ़ पाते हैं और न आर्थिक संसाधनों के बल पर। ऐसे बच्चों के लिए विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक, प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर सरकारी सेवाओं तक, विशेष अवसर और आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं पर गंभीर विचार किया जाना चाहिए। यही बात दिव्यांग बच्चों पर भी लागू होती है। वे जीवन की शुरुआत ही अतिरिक्त चुनौतियों के साथ करते हैं। उन्हें केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि संस्थागत सहयोग और पर्याप्त प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है।गरीबी भी अवसरों की सबसे बड़ी शत्रु है। आर्थिक अभाव प्रतिभा को जन्म लेने से पहले ही कुचल देता है। कितने ही मेधावी विद्यार्थी केवल इसलिए उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते क्योंकि उनके परिवार के पास फीस, पुस्तकें या आवास की व्यवस्था करने के लिए संसाधन नहीं होते। ऐसे में आवश्यकता-आधारित विशेष अवसर सामाजिक न्याय की अवधारणा को और अधिक व्यापक बना सकते हैं।यह भी आवश्यक है कि आरक्षण को केवल सीटों की संख्या तक सीमित न रखा जाए। गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, बेहतर शिक्षक, डिजिटल संसाधन, छात्रावास, छात्रवृत्ति, कौशल प्रशिक्षण, करियर मार्गदर्शन और रोजगारपरक शिक्षा जैसी सुविधाएँ अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकती हैं। यदि प्रारंभिक स्तर पर ही अवसरों की समानता सुनिश्चित कर दी जाए, तो भविष्य में असमानता स्वाभाविक रूप से कम होने लगेगी।नीतिनिर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन स्थापित करने की है। एक ओर उन समुदायों के ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, जिनके लिए संविधान ने विशेष संरक्षण की व्यवस्था की। दूसरी ओर वर्तमान समय की नई सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।

इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि व्यापक आँकड़ों, सामाजिक अनुसंधान और राष्ट्रीय सहमति के आधार पर समय-समय पर समीक्षा की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि सहायता का लाभ वास्तव में सबसे अधिक जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुँचे।लोकतंत्र की शक्ति उसकी संवाद क्षमता में निहित होती है। किसी भी सार्वजनिक नीति पर विचार करना संविधान-विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आरक्षण पर भी बहस भावनाओं के बजाय तथ्यों, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर होनी चाहिए। समाज को विभाजित करने के बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित करने का प्रयास होना चाहिए जिसमें सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा—तीनों का संतुलन बना रहे।भारत को आज ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो हर उस व्यक्ति का हाथ थामें जो वास्तव में पीछे छूट गया है। चाहे वह ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव का शिकार हो, चाहे आर्थिक रूप से अत्यंत निर्धन हो, चाहे अनाथ हो, चाहे दिव्यांग हो, चाहे किसी भी जाति या समुदाय से आता हो—यदि उसके पास अवसरों का अभाव है तो राज्य का दायित्व है कि उसे आगे बढ़ने का उचित अवसर प्रदान करे। सामाजिक न्याय का वास्तविक अर्थ भी यही है कि सहायता उस तक पहुँचे जिसे उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

इक्कीसवीं सदी का भारत यदि विश्वगुरु बनने का स्वप्न देखता है, तो उसे ऐसी समावेशी नीतियों की आवश्यकता होगी जो किसी भी प्रतिभा को केवल जन्म की परिस्थितियों के कारण पीछे न रहने दें।

आवश्यकता-आधारित सहायता, सामाजिक न्याय की मूल भावना और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित कर ही हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकते हैं जहाँ अवसर किसी पहचान का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का वास्तविक अधिकार बन जाए।

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