मोदी सरकार में कला और संस्कृति की संस्थाओं का लोकतंत्रीकरण: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र से पद्म पुरस्कारों तक एक नया अध्याय

PM-Narendra-Modi-1.jpg

अभिजात वर्ग से आम जन तक – सरकारी संस्थाओं में समावेशिता की बढ़ती यात्रा

पिछले एक दशक में भारत की कला और संस्कृति की प्रमुख संस्थाओं में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। 2014 से पहले कई संस्थाएं, जैसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए), मुख्य रूप से अभिजात वर्ग और विशेष विचारधारा से जुड़े कलाकारों तक सीमित रहीं। दिल्ली के दिल में स्थित होने के बावजूद ये संस्थाएं आम जनमानस से दूर रहीं और इन्हें ‘भद्र लोगों का क्लब’ कहा जाने लगा। हालांकि, मोदी सरकार के आने के बाद इन संस्थाओं के कामकाज में समावेशिता, पारदर्शिता और जन-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाया गया, जिससे कला-संस्कृति का लाभ अब समाज के बीच व्यापक स्तर पर पहुंच रहा है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र: अभिजात से जनसामान्य तक का सफर

आईजीएनसीए की आधारशिला 19 नवंबर 1987 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा रखी गई थी और इसे 24 मार्च 1987 को एक स्वायत्त ट्रस्ट के रूप में औपचारिक रूप से स्थापित किया गया। यह संस्था भारतीय कला, संस्कृति, पुरातत्व, नृत्य, संगीत और अन्य कलाओं के अध्ययन, संरक्षण और प्रसार के लिए बनी थी। 2014 से पहले यह मुख्य रूप से विशेषज्ञों और अभिजात कलाकारों का केंद्र बना रहा। आम लोगों का यहां पहुंचना कम था, और कार्यक्रम सीमित दायरे में होते थे।

2014 के बाद स्थिति बदली। आईजीएनसीए ने जन-उन्मुख कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया, जैसे प्रदर्शनियां, व्याख्यान, कार्यशालाएं और डिजिटल पहलें, जो आम जनता के लिए खुली रहीं। संस्था ने अपनी वेबसाइट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से सामग्री को सार्वजनिक बनाया। उदाहरण के लिए, नेशनल कल्चरल ऑडियोविजुअल आर्काइव्स (NCAA) जैसी परियोजनाएं शुरू हुईं, जिसे डिजिटल संरक्षण के क्षेत्र में विश्व स्तर पर मान्यता मिली।

हालांकि, सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत आईजीएनसीए की मूल जमीन (मान सिंह रोड पर) नए संसद भवन और सचिवालय भवनों के लिए ले ली गई और 2021 में संस्था को अस्थायी रूप से जनपथ होटल में स्थानांतरित किया गया। इस बदलाव के बावजूद आईजीएनसीए की गतिविधियों और सक्रियता में कोई कमी नहीं आई। कार्यक्रम जारी रहे, और जनता के लिए पहुंच आसान बनी। आज आईजीएनसीए के कार्यक्रमों में आम दर्शक बड़ी संख्या में शामिल होते हैं, जो पहले नहीं था। यह बदलाव मोदी सरकार की ‘सबका साथ, सबका विकास’ नीति का प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहां सरकारी संसाधनों का लाभ विचारधारा से ऊपर उठकर सभी को मिल रहा है।

पद्म पुरस्कार: राजनीतिक समावेशिता का प्रतीक

पद्म पुरस्कारों में भी मोदी सरकार ने एक नई परंपरा स्थापित कर दी। पहले ये पुरस्कार मुख्य रूप से सत्ताधारी विचारधारा या निकटवर्तियों तक सीमित माने जाते थे, लेकिन अब विपक्षी दलों के दिग्गज नेताओं को भी सम्मानित किया गया है, जो राजनीतिक संबद्धता की जगह देश और समाज के लिए व्यक्ति के योगदान के महत्व को प्राथमिकता देता है। मोदी सरकार में हुए इस परिवर्तन को मामूली बदलाव नहीं कहा जा सकता।

· शरद पवार: 2017 में पद्म विभूषण से सम्मानित। वे एनसीपी के प्रमुख हैं और भाजपा के विरोधी रहे हैं।
· मुलायम सिंह यादव: 2023 में मरणोपरांत पद्म विभूषण। समाजवादी पार्टी के संस्थापक और भाजपा के पुराने विरोधी।
· वी.एस. अच्युतानंदन: 2026 में मरणोपरांत पद्म विभूषण। केरल के पूर्व सीएम और सीपीआई(एम) के वरिष्ठ नेता।
· बुद्धदेव भट्टाचार्जी: 2022 में पद्म भूषण (मरणोपरांत), हालांकि उनके परिवार ने इसे अस्वीकार कर दिया।

इससे पहले ऐसे विपक्षी नेताओं को पद्म सम्मान मिलना दुर्लभ था। यह मोदी सरकार की ‘सबका साथ’ की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है, जहां विरोधी विचारधारा वाले भी सम्मानित होते हैं।

साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और अन्य संस्थाएं: निरंतरता और समावेश

मोदी सरकार के दस वर्षों में साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य अकादमी जैसी संस्थाओं के कामकाज में मूलभूत बदलाव नहीं आया, बल्कि ये और अधिक समावेशी बने। प्रकाशन विभाग की ‘आजकल’ जैसी पत्रिकाएं पहले की तरह प्रकाशित होती रहीं, जिसमें सरकार-विरोधी विचारकों पर विशेषांक निकलते रहे। फेलोशिप और पुरस्कार ऐसे कलाकारों को मिलते रहे जो सरकार की विचारधारा से असहमत हैं। मंत्रालयों के कवि सम्मेलनों से लेकर साहित्यिक आयोजनों तक पुराने कवि और कहानीकार जमे रहे।

उदाहरणस्वरूप, आईजीएनसीए से एक प्रमुख फेलोशिप प्राप्त व्यक्ति ने सार्वजनिक रूप से मोदी और योगी सरकार की आलोचना की। जब उनसे पूछा गया कि इतनी बड़ी फेलोशिप इसी सरकार से मिली है, तो उनका जवाब था – “यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।” यह घटना दर्शाती है कि मोदी सरकार में संस्थाएं विचारधारा से ऊपर उठकर काम कर रही हैं। संगीत नाटक अकादमी ने 2022-23 में 91 कलाकारों को पुरस्कार दिए, जिसमें विविध क्षेत्रों के कलाकार शामिल थे, बिना किसी भेदभाव के।

‘सबका साथ, सबका विकास’ का साकार रूप

मोदी सरकार ने कला और संस्कृति मंत्रालय के अधीन आने वाली दर्जनों संस्थाओं में भेदभाव खत्म किया। फेलोशिप, विशेष कार्यक्रम और पुरस्कार अब योग्यता और योगदान के आधार पर दिए जाते हैं, न कि विचारधारा के। आईजीएनसीए जैसे केंद्र अब आम जन के लिए खुले हैं, और पद्म पुरस्कार राजनीतिक समावेशिता का प्रतीक बन गए हैं।

यह बदलाव सिर्फ संस्थागत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का मजबूत प्रदर्शन है। जहां पहले संस्थाएं अभिजात वर्ग तक सीमित थीं, वहीं आज ये ‘सबका साथ, सबका विकास’ के सिद्धांत पर चल रही हैं। एक दशक से अधिक समय में मंत्री बदले, लेकिन मंत्रालय का जन-उन्मुख दृष्टिकोण मजबूत हुआ है। यह भारत की सांस्कृतिक विरासत को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

धुंधली होती स्याही: बंगाल गजट और हिक्की की विरासत:

5-budget-representative-image-770x433.jpg.avif

कोलकाता । जब हम जेम्स ऑगस्टस हिक्की, उस जांबाज़ आयरिश शख़्स की भावना को याद करते हैं, जिसने 29 जनवरी 1780 को भारत का पहला अख़बार हिक्कीज़ बंगाल गज़ट शुरू किया था, तो आज की पत्रकारिता को देखकर कन्फ्यूजन होता है, खासतौर पर डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकारिता देखकर। हिक्की का अख़बार बेख़ौफ़ था, वह औपनिवेशिक ज़ुल्म, भ्रष्टाचार और कलकत्ता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बिना लाग-लपेट दर्ज करता था। वही असली पत्रकारिता थी, घटनाओं का ईमानदार रिकार्ड, समाज का आईना, बिना किसी दलगत या वैचारिक मुलम्मे के। आज की पत्रकारिता, यानी, सटीक, निष्पक्ष रिपोर्टिंग, अब रायों, एजेंडों और सनसनी के शोर में दब गई है।

असल बीमारी साफ़ है। रिपोर्टिंग, जो कभी तथ्यात्मक बयान होती थी, अब निजी और संस्थागत पक्षपात का ज़रिया बन गई है। पहले रिपोर्टर “बॉल-बाय-बॉल” हालात बताते थे, शब्दों में चित्र खींचते थे। जो हुआ, जैसा हुआ, ताकि पाठक ख़ुद नतीजा निकालें। आज ख़बरों में चुनिंदा तथ्य और पहले से तय नैरेटिव घुसे होते हैं। सुर्ख़ियाँ आग भड़काती हैं, जानकारी नहीं देतीं। इतनी जल्दी फ़ैसला सुनाने की हड़बड़ी क्यों? स्कूप की दौड़ में पत्रकार जाँचकर्ता, अभियोजक और जज, तीनों बन जाते हैं। मीडिया ट्रायल सच से ज़्यादा वायरल होने को अहमियत देता है। नतीजा, आधी-अधूरी सच्चाइयों से भरा सार्वजनिक संवाद, बलि चढ़ जाता है।

यह मिलावट खामोशी से फैलती है। तथाकथित न्यूट्रल रिपोर्टों में भी पत्रकार की पसंद-नापसंद, सियासी झुकाव या निजी हित, स्याही की तरह रिस आते हैं। निष्पक्षता का दिखावा टूट जाता है और ख़बर, राय बनकर पेश होती है। सलाह और मूल्य-निर्णय, जो कभी संपादकीय पन्नों तक सीमित थे, अब फ्रंट पेज पर उतर आए हैं। स्पॉट रिपोर्टिंग, जिसमें दृश्य, आवाज़ और एहसास ज़िंदा होने चाहिए, फीकी विज्ञप्तियां बनकर रह गई है। पुराने दौर की पत्रकारिता में जो आँखोंदेखी वर्णन की ताक़त थी, वह कम होती जा रही है। इसकी वजह टेलीविजन और डिजिटल मीडिया भी है। जब सब कुछ रियल टाइम में दिख रहा है तो अखबारों में ये सब दोहराने की जरूरत नहीं है, एक युवा पत्रकार कहते हैं।

स्थानीय अख़बारों में यह गिरावट और भी साफ़ दिखती है। छोटे शहरों में, जहाँ समुदाय-केंद्रित सच्ची कहानियाँ पनपनी चाहिए थीं, वहाँ रिपोर्टिंग पीआर और विज्ञापन की गिरफ़्त में है। कार्यक्रम की आत्मा बताने के बजाय मेहमानों, प्रायोजकों और आयोजकों के नामों की भरमार होती है। विज्ञापनदाताओं का दबाव भारी पड़ता है और पत्रकारिता प्रचार में बदल जाती है। पुरानी पीढ़ी के पत्रकार बताते हैं, “भाषा की रंगत, मुहावरे, उपमाएँ, रूपक, जो कभी रपटों को जानदार बनाते थे, अब नदारद हैं। शब्दकोष की क़िल्लत से वही घिसे-पिटे जुमले घूमते रहते हैं।” संगीत सभाओं या सामाजिक जमावड़ों का माहौल, राग की लहर, झूमर तले फुसफुसाहट, आयोजन की धड़कन, काग़ज़ पर उतर नहीं पाती। संदर्भविहीन भाषण-रिपोर्टिंग स्वाद छीन लेते हैं।

यह एकरूपता यूँ ही नहीं है। आज की बहुत-सी ख़बरें पीआर एजेंसियों से छनकर आती हैं, इसलिए अख़बार X, Y या Z—सबमें वही एंगल, वही विवरण। निजी touch ग़ायब रहता है। साहित्यिक रिपोर्टिंग, जो रचनात्मक गहराई दे सकती थी, शोर और सनसनी में दब गई है। राय मशवरा देना, समीक्षा में तो ठीक है, ख़बर में नहीं, वरना भरोसा टूट सकता है। आजकल डिजिटल दबाव ने पत्रकारों को सच की बजाय ट्रेंड का पीछा करने पर लगा दिया है।
हिक्की का गज़ट हमें पत्रकारिता की जड़ों की याद दिलाता है, सत्ता के सामने ढाल, इतिहास के लिए साक्षी। बेबाक रिपोर्टिंग के लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा, पर उन्होंने ईमानदारी से समझौता नहीं किया।

आज का व्यावसायिक तंत्र एजेंडा तय करने वालों और मीडिया ट्रायल चलाने वालों को इनाम देता है। वक़्त है ठहरकर सोचने का, शायद एक पुनर्जागरण का, समृद्ध भाषा और निष्पक्ष नज़र के साथ। संपादकों को फ़ैसले का पहरेदार बनना होगा। तभी अख़बार सच के मीनार बनेंगे, पक्षपात के इको-चैंबर नहीं। जानकारी की भरमार के इस दौर में दुनिया को टिप्पणीकार नहीं, सच्चे क्रोनिकलर, इतिहासकार चाहिए।

टैरिफ के बावजूद आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका से आगे निकलता शेष विश्व

donald-trump_large_1133_23.webp

दिल्ली । दिनांक 20 जनवरी 2025 को डॉनल्ड ट्रम्प अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति बनाए गए थे। वर्ष 2024 में ट्रम्प ने अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव “Make America Great Again” अर्थात “अमेरिका को पुनः महान बनाएं”, नारे के साथ जीता था। वर्ष 2025 का पूरा वर्ष भर पूरे विश्व ने ट्रम्प को अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हुए देखा। लगभग पूरा 2025 का वर्ष ट्रम्प ने विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले उत्पादों के आयात पर टैरिफ लगाते हुए बिताया और मित्र देशों सहित कई देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर भारी भरकम टैरिफ लगाए। ट्रम्प का सोचना था कि टैरिफ को बढ़ाकर वे अन्य देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात को कम करेंगे और इससे अमेरिका में ही इन उत्पादों का उत्पादन प्रारम्भ हो जाएगा। ट्रम्प का संभवत: यह सोचना था कि उनका यह प्रयास अमेरिका को महान बनाते हुए शेष विश्व को विपरीत रूप से प्रभावित करेगा। परंतु, वर्ष 2025 में अमेरिका एवं शेष विश्व के आर्थिक क्षेत्र के आंकडें देखने पर ध्यान में आता है कि अमेरिका के मित्र राष्ट्रों सहित विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ का असर अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर लगभग नहीं के बराबर पड़ा है। बल्कि, इसका खामियाजा अमेरिका के नागरिकों को भुगतना पड़ा है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ से अमेरिका में उत्पादों की कीमतों में बेतहाशा बृद्धि दर्ज हुई है, इससे मुद्रा स्फीति में वृद्धि तेज हुई है एवं अमेरिकी नागरिकों को विभिन्न उत्पादों को बढ़ी हुई कीमतों दरों पर खरीदना पड़ रहा है। अमेरिकी नागरिक पिछले 5 वर्षों की तुलना में आज खाद्य सामग्री पर 30 प्रतिशत अधिक खर्च कर रहे हैं। अमेरिका में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें 22 प्रतिशत से बढ़ चुकी हैं। खाद्य पदार्थों एवं मकान की कीमतों में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई हैं। अमेरिका में मुद्रा स्फीति की दर भी 3 से 4 प्रतिशत के बीच बनी हुई है, जो पिछले कई वर्षों की तुलना में बहुत अधिक है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ से परेशान हो रहा है अमेरिकी नागरिक, न कि अन्य कोई देश। श्री रुचिर शर्मा, भारतीय मूल के अमेरिकी लेखक एवं फायनैन्शल टाइम्स के स्तम्भ लेखक, ने अपने एक साक्षात्कार में कई आंकडें दिए हैं, जिनका प्रयोग इस लेख को तैयार करने में किया गया है।

अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले आयात पर लगाए गए टैरिफ के पश्चात अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर कम होती हुई दिखाई दे रही है। वर्ष 2024 में अमेरिका में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 2.8 प्रतिशत की रही थी जो वर्ष 2025 में घटकर 2.1 प्रतिशत हो गई। जबकि वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर दोनों वर्षों, 2024 एवं 2025, में 2.8 प्रतिशत बनी रही है। वर्ष 2025 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में किसी प्रकार की कमी दृष्टिगोचर नहीं हुई है। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में वर्ष 2024 में वृद्धि दर, 6.5 प्रतिशत की रही थी, जो वर्ष वर्ष 2025 में बढ़कर 7.2 प्रतिशत की हो गई। वर्ष 2024 में उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से 52 प्रतिशत देशों की प्रति व्यक्ति सकल उत्पाद में वृद्धि दर अमेरिका की तुलना में अधिक रही थी जबकि वर्ष 2025 में 76 प्रतिशत देशों की प्रति व्यक्ति सकल उत्पाद में वृद्धि दर अमेरिका की तुलना में अधिक रही है। वर्ष 2025 में उभरती अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक विकास दर तेज गति बढ़ती हुई पाई गई है। इस प्रकार, अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ के बावजूद शेष विश्व में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर अमेरिका से अधिक रही है। इस प्रकार अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ का प्रभाव अन्य देशों के विकास पर विपरीत रूप से नहीं पड़ा है।

अमेरिका के पूंजी (शेयर) बाजार में भी वर्ष 2025 में निवेशकों को अपने निवेश पर कम आय प्राप्त हुई है। अमेरिका में निवेशकों द्वारा पूंजी (शेयर) बाजार में किए गए निवेश पर 18 प्रतिशत की आय का अर्जन हुआ है। जबकि, यूरोप में निवेशकों को 35 प्रतिशत, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में निवेशकों को 34 प्रतिशत, अमेरिका को छोड़कर शेष विश्व में निवेशकों को 32 प्रतिशत एवं चीन में निवेशकों को 31 प्रतिशत की आय अर्जित हुई है। इस प्रकार, अमेरिका की तुलना में अन्य देशों में पूंजी (शेयर) बाजार में निवेशकों को लगभग दुगनी आय अर्जित हुई है। अमेरिकी नागरिकों का पूंजी (शेयर) बाजार में निवेश तुलनात्मक रूप से अधिक है। अमेरिकी नागरिकों का जायदाद में निवेश 30 प्रतिशत है जबकि शेयर बाजार में 32 प्रतिशत निवेश है। चीन के नागरिकों का जायदाद में निवेश 55 प्रतिशत एवं शेयर बाजार में निवेश केवल 11 प्रतिशत है। इसी प्रकार, यूरोप के नागरिकों का निवेश क्रमश: 57 प्रतिशत एवं 16 प्रतिशत है। भारतीय नागरिकों के निवेश क्रमश: 50 प्रतिशत एवं 7 प्रतिशत है।

अमेरिका द्वारा अन्य देशों से अमेरिका में होने वाले आयात पर लगाए गए टैरिफ के चलते अमेरिका का राजकोषीय घाटा वर्ष 2024 के सकल घरेलू उत्पाद के 6.9 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2025 में 6 प्रतिशत हो गया है। एक रीसर्च प्रतिवेदन में यह तथ्य उभरकर भी सामने आया है कि टैरिफ के कारण अमेरिका में उत्पादों की कीमतों में वृद्धि हुई है एवं टैरिफ का लगभग 96 प्रतिशत भाग अमेरिकी नागरिकों द्वारा वहन किया गया है। इसके कारण अन्य देशों से अमेरिका को निर्यात कम नहीं हुए हैं। यूरोप का राजकोषीय घाटा वर्ष 2024 के 3.1 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में 3.2 प्रतिशत हो गया है। उभर रही अर्थव्यवस्थाओं का राजकोषीय घाटा वर्ष 2024 के 4.6 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में 4.8 प्रतिशत हो गया है। पूर्व में विभिन्न देशों का राजकोषीय घाटा लगभग 3 प्रतिशत तक रहता आया है जबकि वर्तमान परिस्थितियों के मध्य, विभिन्न देशों का राजकोषीय घाटा बढ़ते हुए 6 प्रतिशत के स्तर तक रहने लगा है। यह स्थिति वित्तीय क्षेत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

वर्ष 2025 में विदेशी व्यापार में वृद्धि दर भी अमेरिका की तुलना में अन्य देशों में अधिक रही है। अमेरिका को छोड़कर शेष विश्व के निर्यात में वर्ष 2019 से 2024 के दौरान औसत 5 प्रतिशत की वृद्धि रही थी जो वर्ष 2025 में बढ़कर 6.4 प्रतिशत की हो गई है। जबकि अमेरिका से निर्यात में वृद्धि दर इसी अवधि के दौरान 4.6 प्रतिशत से गिरकर 4.1 प्रतिशत रह गई है। टैरिफ का अमेरिका से अन्य देशों को होने वाले निर्यात पर विपरीत प्रभाव पड़ा है जबकि अन्य देशों ने आपस में नए बाजारों की तलाश करते हुए अपने विदेशी व्यापार, विशेष रूप से निर्यात, में वृद्धि दर्ज की है। कई देशों ने आपस में मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए हैं, इससे भी विभिन्न देशों के बीच विदेशी व्यापार में वृद्धि दर्ज हुई है। अमेरिका से अन्य देशों को निर्यात के कम होने के चलते अमेरिका में चालू व्यापार खाता घाटा 1.3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका में आज भी उत्पादन की तुलना में उपभोग बहुत अधिक मात्रा में हो रहा है।

अमेरिका की टैरिफ नीति के चलते अमेरिका पुनः महान (MAGA) बनता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। परंतु, विश्व के अन्य कई देश जरूर महान बनते हुए दिखाई दे रहे हैं। अतः टैरिफ का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को विपरीत रूप से प्रभवित करता हुआ दिखाई दे रहा है, जबकि विश्व में अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है। इस प्रकार, ट्रम्प इस धरा को महान बनाने (Make Earth Great Again – MEGA) में अपना योगदान करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर विपरीत परिस्थितियों के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। भारत का राजकोषीय घाटा प्रति वर्ष लगातार कम हो रहा है। यह वर्ष 2024 में 5.5 प्रतिशत था, जो वर्ष 2025 में 4.8 प्रतिशत हो गया एवं अब वर्ष 2026 में घटकर 4.4 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारत को यदि विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था बनाना है तो हमें भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 12 से 14 प्रतिशत वृद्धि के स्तर को प्राप्त करना होगा, जैसा कि चीन ने लम्बे समय तक अपनी अर्थव्यवस्था को इस दर पर आगे बढ़ाने में सफलता अर्जित की थी। सकल घरेलू उत्पाद में यह महत्वाकांक्षी वृद्धि दर हासिल करना कोई असम्भव कार्य नहीं है। अमेरिका यदि भारत का सहयोग करने को तैयार नहीं है तो भारत को अन्य बाजार तलाशते हुए विभिन्न उत्पादों के निर्यात को बढ़ाना होगा। आज भारतीय अर्थव्यस्था मुख्यतः आंतरिक उपभोग पर आधारित है, जबकि उत्पादों के निर्यात को भी आज तेजी से बढ़ाने की आवश्यकता है। भारत द्वारा निर्यात के सामर्थ्य का उपयोग बहुत कम स्तर पर किया है।

भारत निम्न मध्यम आय श्रेणी से उच्च मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने की ओर अग्रसर

after-robust-q3-imf-says-indias-growth-outlook-could-be-revised-upward-160818475-1x1-1.jpg

दिल्ली । भारत को निम्न आय श्रेणी में से वर्ष 2007 में निम्न मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने में 60 वर्ष का समय लगा था। भारत में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI) वर्ष 1962 में 90 अमेरिकी डॉलर थी जो मिश्रित वार्षिक 5.3 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2007 में बढ़कर 910 अमेरिकी डॉलर हो गई। इसी प्रकार, भारत के सकल घरेलू उत्पाद के वर्ष 2007 में एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को प्राप्त करने में 60 वर्ष लग गए थे। आगामी 7 वर्षों में अर्थात वर्ष 2014 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया था। पुनः आगामी 7 वर्षों में अर्थत वर्ष 2021 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया था। परंतु, आगामी केवल 4 वर्षों में अर्थत वर्ष 2025 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया है। एक अनुमान के अनुसार, आगामी केवल 2/3 वर्षों में भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर जाएगा। वर्ष 2009 में भारत को प्रति व्यक्ति आय 1,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर को प्राप्त करने में 62 वर्षों का समय लगा था। परंतु, आगामी केवल 10 वर्षों में, अर्थात वर्ष 2019 में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 2,000 अमेरिकी डॉलर हो गई। अब आगामी 7 वर्षों में अर्थात वर्ष 2026 में भारत में प्रति व्यक्ति आय के 3,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इसके भी आगे जाकर, केवल 4 वर्ष पश्चात अर्थात वर्ष 2030 में भारत में प्रति व्यक्ति आय 4,000 अमेरिकी डॉलर हो जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसी के चलते वर्ष 2030 तक भारत के निम्न मध्यम आय श्रेणी से उच्च मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इस श्रेणी में आज चीन एवं इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हो चुके हैं।

किसी भी देश को उच्च आय की श्रेणी में शामिल होने के लिए उस देश में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय 13,926 अमेरिकी डॉलर (आज की परिभाषा के अनुसार) के स्तर पर पहुंच जानी चाहिए। इसके बाद उस देश को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में भी शामिल कर लिया जाता है। इस दृष्टि से भारत को यदि वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है तो भारत में सकल घरेलू उत्पाद में संयुक्त रूप से 7.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज होना चाहिए, यह वृद्धि दर हासिल करने योग्य है क्योंकि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में औसत संयुक्त वृद्धि दर पिछले 23 वर्षों के दौरान (वर्ष 2001 से वर्ष 2024 के बीच) 8.3 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही है। इससे स्पष्ट है कि भारत आगामी कुछ वर्षों में ही प्रति व्यक्ति औसत आय 4,500 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करते हुए उच्च मध्यम आय श्रेणी के क्लब में शामिल हो जाएगा। इसके बाद भारत को वर्ष 2047 में उच्च आय श्रेणी के क्लब में शामिल होने के लिए प्रति व्यक्ति आय को 18,000 अमेरिकी डॉलर (उस समय की परिभाषा के अनुसार) के स्तर को पार करना होगा, इसके लिए आगामी 23 वर्षों में भारत में प्रति व्यक्ति आय के स्तर में संयुक्त रूप से 8.9 प्रतिशत की वृद्धि दर की आवश्यकता होगी। यह लक्ष्य भी बहुत कठिन नहीं हैं, यदि इस संदर्भ में केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा मिलकर इस प्रकार की आर्थिक नीतियां बनाई जाती हैं जिससे गरीब से गरीब नागरिक तक इन आर्थिक नीतियों के लाभ को पहुंचाया जा सकता हो ताकि इस वर्ग के नागरिकों का आर्थिक विकास भी सम्भव हो सके।

वैश्विक स्तर पर कुल 139 विकासशील एवं उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से केवल 6 देशों की अर्थव्यवस्थाएं भारत की तुलना में तेज गति से आर्थिक विकास करने में सक्षम हुई हैं। परंतु, विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच भारत की आर्थिक विकास दर आज भी सबसे अधिक बनी हुई है। दरअसल, छोटे देशों के सकल घरेलू उत्पाद का आकार तुलनात्मक रूप से बहुत छोटा होता है अतः प्रतिशत के आकलन में यह देश भारत की आर्थिक विकास की दर से कुछ आगे निकल जाते हैं परंतु जैसे जैसे सकल घरेलू उत्पाद का आकार बढ़ता जाता है वैसे वैसे इन देशों के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर कुछ कम दिखाई देने लगती है।

विश्व बैंक द्वारा समय समय पर विश्व के समस्त देशों को इन देशों में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के स्तर के आधार पर निम्न आय, निम्न मध्यम आय, उच्च मध्यम आय एवं उच्च आय के श्रेणी में विभाजित किया जाता है। वर्ष 1990 में पूरे विश्व में प्रति व्यक्ति निम्न आय की श्रेणी में 51 देश शामिल किए गए थे, जबकि प्रति व्यक्ति निम्न मध्यम आय की श्रेणी में 56 देश शामिल थे, प्रति व्यक्ति उच्च मध्यम आय की श्रेणी में 29 देश शामिल थे एवं प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में 39 देश शामिल थे। विश्व बैंक द्वारा ही वर्ष 2024 में किए गए एक आंकलन के अनुसार पूरे विश्व में प्रति व्यक्ति निम्न आय की श्रेणी में देशों की संख्या घटकर 26 हो गई एवं प्रति व्यक्ति निम्न मध्यम आय की श्रेणी में देशों की संख्या में भी गिरावट दृष्टिगोचर हुई है और इस श्रेणी में देशों की संख्या घटकर 50 हो गई है। जबकि प्रति व्यक्ति उच्च मध्यम आय की श्रेणी में शामिल देशों की संख्या बढ़कर 54 हो गई है। परंतु प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में तो देशों की संख्या और भी तेज गति से बढ़कर 87 के स्तर पर पहुंच गई है। इस संदर्भ में 2 उदाहरण दिये जा सकते हैं कि किस प्रकार प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में शामिल होने वाले देशों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

चीन, वर्ष 1990 में 330 अमेरिकी डॉलर की प्रति व्यक्ति आय के साथ निम्न आय श्रेणी के देशों में शामिल था, परंतु वर्ष 1999 में चीन में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 860 अमेरिकी डॉलर हो गई एवं चीन निम्न मध्यम आय श्रेणी में शामिल हो गया। आगे चलकर वर्ष 2010 में, चीन के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 4,410 अमेरिकी डॉलर हो गई और इस प्रकार चीन उच्च मध्यम आय श्रेणी में शामिल हो गया। वर्ष 2007 में चीन में प्रति व्यक्ति आय 2,555 अमेरिकी डॉलर की रही थी, जबकि भारत में प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2023 में 2580 अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच सकी है। दरअसल, भारत में आर्थिक विकास की लगातार तेज गति वास्तविक रूप में वर्ष 2014 से ही प्रारम्भ हुई है। इसी प्रकार, गयाना जैसे छोटे राष्ट्र में वर्ष 1997 में प्रति व्यक्ति आय 390 अमेरिकी डॉलर की थी और गयाना निम्न आय श्रेणी में शामिल था, वर्ष 2015 में गयाना में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 5,530 अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई और गयाना उच्च मध्यम आय की श्रेणी में शामिल हो गया। परंतु इसमें बाद वर्ष 2022 में तो गयाना में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 20,140 के स्तर पर पहुंच गई और आज गयाना उच्च आय श्रेमी में शामिल हो चुका है। अतः भारत को उच्च आय श्रेणी में शामिल होने के लिए अपनी आर्थिक विकास दर को और अधिक गति देनी होगी।

जैसा कि ऊपर के पैरा में वर्णन किया गया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत के आर्थिक विकास पर विशेष ध्यान दिया ही नहीं गया था। सकल घरेलू उत्पाद के स्तर की दृष्टि से वर्ष 1990 में पूरे विश्व में भारत का 14वां स्थान था, जबकि वर्ष 2025 में भारत पूरे विश्व में चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है एवं शीघ्र ही आने वाले 2/3 वर्षों भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इसी प्रकार भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार भी वर्ष 2027/28 तक 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर जाएगा तथा वर्ष 2035/36 तक भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 10 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारतीय नागरिकों को इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समाज को दिए गए पंच परिवर्तन कार्यक्रम में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। पंच परिवर्तन कार्यक्रम में जिन 5 बिंदुओं को शामिल किया गया है, वह निम्नप्रकार हैं – प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्यों का अनुपालन करते हुए अनुशासन में रहना, ताकि पुरे विश्व में भारत की साख को बढ़ाया जा सके। भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने की दृष्टि से स्वदेशी के उपयोग को बढ़ावा देना एवं अपने आप में “स्व” के भाव को विकसित करना। समाज के समस्त वर्गों को आपस में भाईचारा स्थापित करना ताकि वे भारत के विकास में शांतिपूर्वक अपना प्रबल योगदान दे सकें। भारत में पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने की महती आवश्यकता है, प्रकृति का शोषण नहीं करते हुए प्रकृति का पोषण करना भी सीखें। पूरे विश्व में केवल भारत में ही बहुत बड़े स्तर पर संयुक्त परिवार व्यवस्था पाई जाती है और यह व्यवस्था केवल भारत को ही ईश्वर का वरदान माना जाता है। इस व्यवस्था को अक्षुण बनाए रखने के लिए कुटुम्ब प्रबोधन की गतिविधियों को समस्त परिवारों में बढ़ावा देना होगा। कुल मिलाकर, भारतीय समाज यदि एकजुट होकर देश को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाना चाहता है तो यह कार्य कोई मुश्किल भी नहीं है। संघ द्वारा दिए गए उक्त वर्णित पंच परिवर्तन के कार्यक्रम को लागू कर मां भारती को पुनः विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया जा सकता है।

scroll to top