फिल्म ‘धुरंधर’ : एक सिने–महाकाव्य की अंतर्ध्वनि

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~ परिचय दास

दिल्ली । धुरंधर किसी पर्दे पर चलती हुई साधारण कथा नहीं बल्कि एक ऐसी गहरी साँस है जो दर्शक के भीतर उतरकर देर तक थमती नहीं। यह फिल्म इतिहास की राख से उठती हुई चिंगारी की तरह सामने आती है, जहाँ हर दृश्य एक जले हुए स्मृति-खंड की तरह चमकता है। यह फिल्म राष्ट्रवाद का नारा नहीं बल्कि राष्ट्र की पीड़ा का मौन आख्यान बनकर उभरती है। जब परदे पर कंधार कांड और संसद पर हमले की स्मृतियाँ उभरती हैं तो वे केवल घटनाएँ नहीं रहतीं, वे एक पूरे समय की घबराई हुई धड़कनों में बदल जाती हैं। इसी भय के गर्भ से “ऑपरेशन धुरंधर” जन्म लेता है — एक ऐसा मिशन, जो बाहर से गुप्त है, पर भीतर से अत्यंत नग्न और असहाय।

इस फिल्म का नायक कोई चमकता हुआ पोस्टर नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता घाव है। रणवीर सिंह द्वारा अभिनीत हमज़ा अली मजहरी, या उसका भारतीय नाम, जैसे उसके भीतर दो मुल्क, दो पहचानें और दो आत्माएँ लगातार टकराती रहती हैं। वह सड़क पर चलता है तो उसके कदम नहीं, उसकी शंकाएँ आगे बढ़ती हैं। उसकी आँखें किसी रोमांच की तलाश में नहीं भटकतीं, वे हमेशा एक डरे हुए पक्षी की तरह आसपास के आकाश को नापती रहती हैं। वह जब पाकिस्तान की धरती पर उतरता है तो उसका पहला संघर्ष बाहर नहीं, अपने भीतर से शुरू होता है। उसे हर पल यह याद रखना है कि उसका चेहरा नक़ाब है, उसकी सांसें उधार हैं और उसका जीवन समय-सीमा के भीतर कैद है।

कराची का ल्यारी इलाका फिल्म में केवल एक जगह नहीं बल्कि एक मनोदशा की तरह रचा गया है। गली-गली फैला अँधेरा, दीवारों पर जमी घबराहटें, और हवा में घुली हुई बारूद की गंध—ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जहाँ इंसान होना ही एक जोखिम लगता है। यहीं उसका सामना होता है रहमान डकैत से, जिसे अक्षय खन्ना ने असाधारण संयम और आतंरिक निर्दयता के साथ जिया है। रहमान कोई चीखता-चिल्लाता अपराधी नहीं, वह शांत, योजनाबद्ध और अपने भीतर ठंडा पड़ा हुआ ज्वालामुखी है। उसकी आँखों में क्रूरता नहीं, बल्कि एक ठहरी हुई समझदारी है—जैसे उसने हिंसा को रोमांच नहीं बल्कि रोज़मर्रा की आवश्यकता मान लिया हो। जब हमज़ा उसके बेटे की जान बचाता है, तब वह केवल एक कृपा-पात्र नहीं बनता बल्कि उस शत्रु के घर का हिस्सा बन जाता है, जिसके भीतर उसे चुपचाप विस्फोट करना है।

इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहाँ दुश्मन चीखते नहीं, यहाँ दुश्मन सोचते हैं और जब दुश्मन सोचने लगते हैं तब संघर्ष केवल हथियारों से नहीं, आत्मा से लड़ा जाता है। इस धुंधले संसार में मेजर इक़बाल का प्रवेश फिल्म को एक नई सिहरन देता है। अर्जुन रामपाल द्वारा निभाया गया यह किरदार किसी साधारण खलनायक की तरह नहीं आता, बल्कि किसी ठहरे हुए तूफान की तरह धीरे-धीरे छा जाता है। उसके शब्दों में जल्दबाज़ी नहीं, उसके फैसलों में भावुकता नहीं। वह आतंक को जुनून की तरह नहीं, रणनीति की तरह जीता है। 26/11 जैसे हमलों की छाया इसी चरित्र के आसपास मंडराती रहती है और दर्शक बार-बार महसूस करता है कि वह केवल कहानी नहीं देख रहा, बल्कि इतिहास का एक जख्मी पन्ना उलट रहा है।

फिल्म में भारतीय खुफिया तंत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं अजय सान्याल, जिसे आर माधवन ने अत्यंत संयमित गंभीरता के साथ निभाया है। उनका चेहरा किसी नायक जैसा नहीं, बल्कि किसी ऐसे पिता जैसा है जो अपने ही बच्चों को युद्ध में भेजते समय मन ही मन टूटता रहता है। वे पर्दे पर कम दिखाई देते हैं, मगर उनकी उपस्थिति हर फ्रेम में महसूस होती है। उनकी आवाज़ में आदेश नहीं, जिम्मेदारी का बोझ है। वे “धुरंधर” को सिर्फ मिशन नहीं, बल्कि एक नैतिक बोझ की तरह संभालते हैं—जहाँ हर हार का अर्थ सिर्फ असफलता नहीं, बल्कि लाशों की संभावनाएँ हैं।

फिल्म का राजनीतिक पक्ष अपने भीतर कई परतें समेटे चलता है। सत्ता के गलियारों में होने वाले संवाद किसी औपचारिक बहस की तरह नहीं, बल्कि नुकीली फुसफुसाहटों की तरह हैं। यहाँ देश केवल सीमा रेखाओं से नहीं बनता, बल्कि निर्णयों से बनता है—और हर निर्णय का अर्थ किसी अनदेखे व्यक्ति की जान से जुड़ा होता है। इस धूसर राजनीति के बीच चौधरी असलम का किरदार फिल्म में एक विचित्र द्वंद्व लेकर आता है। Sanjay Dutt का यह पात्र पुलिस की वर्दी में एक ऐसा इंसान है जो कानून और इंसानियत के बीच फँस चुका है। उसका चेहरा कठोर है, पर उसकी आँखों में कहीं न कहीं थकान और पछतावे की परतें साफ दिखाई देती हैं। वह पूरी तरह खलनायक नहीं, पूरी तरह नायक भी नहीं—वह इस फिल्म का सबसे त्रासद चेहरा है, जो यह दिखाता है कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, भीतर की ज़मीन पर भी लड़ा जाता है।

फिल्म की प्रेमकथा भी किसी फूलों वाली कोमलता के साथ नहीं आती। एलीना के साथ हमज़ा का रिश्ता किसी राहत की तरह नहीं बल्कि और गहरी उलझन की तरह विकसित होता है। प्रेम यहाँ सुकून नहीं देता, बल्कि डर बढ़ा देता है, क्योंकि प्रेम का अर्थ है किसी के लिए कमजोर पड़ जाना। और कमजोर पड़ना एक जासूस के लिए मृत्यु का दूसरा नाम होता है। यह प्रेम कहानी नायक को नरम नहीं करती, बल्कि उसे और अधिक टूटने योग्य बना देती है।

“धुरंधर” की सिनेमाई भाषा बहुत आक्रामक नहीं बल्कि भीतर तक चुभने वाली है। कैमरा अक्सर चेहरों के बहुत पास जाकर रुक जाता है, मानो त्वचा से परे मन को पढ़ लेना चाहता हो। अंधेरा यहाँ केवल रोशनी का अभाव नहीं, बल्कि एक स्थायी भाव है। संगीत भी बहुत मुखर नहीं होता; वह कभी-कभी केवल एक धीमी धुन बनकर भीतर उतरता है और दर्शक के दिल की धड़कन के साथ घुल जाता है।

इस फिल्म का सबसे बड़ा साहस यह है कि यह अपने नायक को महिमामंडित नहीं करती। हमज़ा किसी आदर्श पुरुष की तरह नहीं उभरता—वह टूटता है, डरता है, घबराता है, गलतियाँ करता है। उसकी सीटियाँ नहीं बजतीं, उसके शरीर पर कभी-कभी पसीने की ठंडी बूंदें दिखती हैं। वह अपने देश के लिए लड़ता है, लेकिन वह अपने डर से भी लगातार लड़ रहा होता है। यही उसे महिमामंडित नहीं, बल्कि मानवीय बनाता है।

फिल्म के भीतर छिपा हुआ तनाव केवल बमों या गोलियों से नहीं, बल्कि पहचान के संकट से पैदा होता है। एक ऐसा व्यक्ति जो दिन भर दुश्मन की भाषा बोलता है, दुश्मन की तरह चलता है, दुश्मन की रोटी खाता है—वह कब तक अपने आपको याद रख सकता है? यह प्रश्न इस फिल्म की आत्मा है। “धुरंधर” इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमती रहती है, बिना उसका कोई आसान उत्तर दिए।

लंबाई के बावजूद फिल्म बोझिल नहीं लगती, क्योंकि हर दृश्य अपने साथ एक नया मनोभाव लेकर आता है। कहीं कोई क्षण बहुत तेज़ है, कहीं बहुत धीमा, लेकिन दोनों ही मिलकर दर्शक को बाँधे रखते हैं। यह फिल्म चीखती नहीं, धीरे-धीरे भीतर उतरती है। यह आपको झकझोरती नहीं, बल्कि आपको अकेला छोड़ देती है।

अंत की ओर आते-आते फिल्म एक खुला घाव छोड़ देने जैसा अनुभव देती है। कोई परिपूर्ण न्याय नहीं होता, कोई पूर्ण विजय नहीं आती। केवल यह एहसास बचता है कि कुछ लोग अपने जीवन की पूरी उम्र दूसरों की नींद बचाने में खर्च कर देते हैं और उनकी कोई तस्वीर दीवार पर नहीं लगाई जाती। वे केवल फाइलों की धूल में, खुफिया रिपोर्टों की स्याही में और कभी-कभी किसी फिल्म के किसी धुंधले फ्रेम में जीवित रहते हैं।

“धुरंधर” वही धुंधला फ्रेम है—पर भीतर से बहुत स्पष्ट, बहुत कठोर, बहुत सच्चा। यह फिल्म राष्ट्रभक्ति का शोर नहीं है, यह राष्ट्र के लिए चुपचाप जलने वालों की धीमी रोशनी है। इसे देखने के बाद दिल गर्व से नहीं बल्कि एक अजीब-सी नम्रता से भर जाता है। यह एहसास होता है कि बहादुरी अक्सर अनदेखी रहती है, और सबसे बड़े युद्ध अक्सर बिना तालियों के लड़े जाते हैं।

यह फिल्म इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि इसमें कितने धमाके हैं, बल्कि इसलिए कि इसमें कितने सवाल हैं। यह इसलिए याद नहीं रहती कि इसमें कितने खून के छींटे हैं, बल्कि इसलिए कि इसमें कितनी खामोशियाँ हैं। यह सिनेमा का वह रूप है जहाँ कहानी नहीं, विवेक बोलता है।

और जब फिल्म समाप्त होती है, तब मन एक अजीब से खालीपन से भर जाता है—ऐसा खालीपन जो भयावह नहीं, बल्कि आवश्यक है। क्योंकि कुछ फिल्में आपको भरने नहीं आतीं, वे आपको खाली करने आती हैं—ताकि आप अपने भीतर कुछ नया सोच सकें, कुछ नया महसूस कर सकें।

“धुरंधर” ऐसी ही एक फिल्म है।
वह खत्म नहीं होती।
वह भीतर शुरू होती है।

फिल्म जब पर्दे पर खुलती है, तो उसका पहला परिचय – एक अधीर धड़कन, एक गहरी साँस जैसा — आपको सीने से चिपक कर लेता है। कहानी, जासूसी, सत्ता संघर्ष, देश-विदेश के बीच छुपे षड़यंत्रों और व्यक्तिगत पहचान के द्वंद्व का मिश्रण है। पर “धुरंधर” सिर्फ थ्रिलर नहीं; वह एक आत्मीय, आध्यात्मिक, और नैतिक सवालों से भरी यात्रा है — जहाँ नायक, खलनायक, सत्ता, धर्म, देश, और पहचान — सब कुछ काल–विराम में खिसकता दिखाई देता है। इस बीच, यही भ्रम, यही असमंजस, यही धुंध ही फिल्म की असली ताकत बन जाती है।

नेतृत्व की कमान जो हैं — रणवीर सिंह — उनका किरदार सादगी या दिखावे से नहीं, बल्कि उस भीतरी उथल-पुथल, उस मानसिक सीमा पर टकराहट की माधुर्यता से जीता गया है। उनके हर इशारे, हर खामोशी, हर लड़खड़ाहट में देश, धर्म, पहचान और विश्वास के बीच उभरे द्वंद्व की गूंज सुनाई देती है। उनकी भूमिका “रोबोट-नायक” की तरह नहीं, बल्कि एक मानवीय लोकतंत्र के भीतर फटी आत्मा की तरह है। उनके अभिनय में शोर नहीं, कमल-सी सूक्ष्मता है — और हर बार जब वे स्क्रीन पर आते हैं, लगता है कि वह सिर्फ कोई मिशन पूरा नहीं कर रहे, बल्कि अपनी ही आत्मा से लड़ रहे हैं।

उनके खिलाफ — या उनके साथ — खड़े हैं अक्षय खन्ना, संजय दत्त और आर माधवन जैसे चेहरे, जो सिर्फ सहायक नहीं बल्कि स्वयं-स्वरूप धुरा-निर्माण करते हैं। खासकर अक्शय का खलनायक — विडंबना, भय और शक्ति का संगम है; उसके चेहरे पर आने वाली हल्की मुस्कान भी डराती है। वह वह है जो स्पष्ट बुराई नहीं, बल्कि उस बुराई की शुद्ध, तराश-सी निर्भीकता दिखाता है, जो सत्ता और प्रभाव की भाषा जानती है।

माधवन की भूमिका — साधारण चरित्र नहीं, बल्कि उस तर्क-धारा की मूरत है, जो जासूसी, राजनैतिक चालबाज़ी, विश्वास और धोखे के जाल में इंसान की मजबूरी को समझने की कोशिश करती है। वह सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि विचारक है — जिसके प्रत्येक वाक्य में सिर्फ मिशन की नहीं, मानवीय लागत की आसुई गहराई होती है।

फिल्म का ढांचा — एक द्वि-भागी कथा, जिसकी पहली कड़ी अभी हमारी आँखों के सामने है — स्वयं में एक साहसिक प्रयत्न है। यह दर्शाने की हिम्मत कि हर गूँजी बंदूक की गोली, हर दफन सूचना, हर छल-कपट के पीछे इंसान की खामोशी, उसकी बेचैनी, उसकी अस्मिता हलचल करती है। यह केवल देश की सीमाओं, जासूसी नेटवर्क, सत्ता संघर्ष नहीं दिखाती — बल्कि उस व्यक्ति की आंतरिक लड़ाई का दर्पण खड़ा करती है, जो हर मोड़ पर अपने अस्तित्व, अपने विश्वास, अपने नैतिक चयन से जूझता है।

लेकिन “धुरंधर” की महानता में इसके दोष भी हैं — 3 घंटे 34 मिनट (214.1 मिनट) की लंबाई, जो कभी-कभी कहानी की गति को बोझिल कर देती है। कुछ दृश्य, संवाद और हिंसात्मक तरीके — बारकी सूक्ष्मता के बजाय जोर-शोर से भाव जगाते हैं, जिससे वह अधूरी संवेदनशीलता कहीं खो जाती है। यह बॉक्स-ऑफिस की थ्रिलर-मासिकता व कथानक-चाल का दबाव हो सकता है, या निर्देशक की अभिलाषा — पर इन हिस्सों में फिल्म अपना दायित्व, अपनी आत्मा खोती नज़र आती है।

इस सबके बावजूद, “धुरंधर” अपना अस्तित्व सिर्फ एक फिल्म के रूप में नहीं बल्कि एक अनुभव, एक प्रतिध्वनि के रूप में जिंदा रखती है। थ्रिलर-जगत की चमक-दमक, जासूसी की चाल, अदाकारी की तीव्रता — सब कुछ एक साथ आते हैं, पर कहीं-कहीं उनकी परतों के बीच, उस भूली हुई मानवीय खामोशी की गूँज सुनाई देती है।

और जब पर्दा गिरता है तो केवल एक कहानी समाप्त नहीं होती — आप अकेले नहीं होते। आपके भीतर एक सवाल बच जाता है: शक्ति, देश, पहचान और इंसान — किसके लिए, किस हद तक? जब धुरंधर बन जाए, तब कौन बचता है? क्या जीत की परिभाषा बदल जाती है, या हार की?

“धुरंधर” एक संकल्प है — न कि सिर्फ सरकार या राजनीति का, बल्कि उस आत्मा का जो हर दिन, हर पल, अपने विश्वास और अस्मिता की लड़ाई लड़ती है। और यह लड़ाई, दर्शकों को सामने रखकर, उन्हें प्रतिबिंब दिखाकर, उन्हें सोचने पर मजबूर करके, इस फिल्म को सिर्फ देखते समय की नहीं — बल्कि जीवन भर की याद बना देती है।

शायद यही उसकी सबसे बड़ी विजय है: वह नायक नहीं बनाती, बल्कि मानव बनाती है।

फिल्म जब शुरू होती है तो पहली ही झलक में उसकी महत्वाकांक्षा साफ दिख जाती है — राष्ट्रहित, खुफिया मिशन, आतंक-तंत्र, देश की सुरक्षा और भावनात्मक दायित्वों का संगम। निर्देशक आदित्य धर ने जिस तीव्रता से शुरुआत की है, वह वाकई दिल धड़काता है। पहले हाफ की गति — मजबूत, खतरनाक, और आशाजनक — दर्शक को बांधे रखती है।

अभिनय — “धुरंधर” की असली ताकत यहां है। रणवीर सिंह, जो लीड किरदार में हैं, उन्होंने अपने किरदार “हमज़ा” को दिखावटी हीरोइज़्म नहीं, बल्कि भीतर की बेचैनी, संदिग्ध पहचान और जासूसी के दर्द के साथ जिया है। उनके किरदार की कड़कित — हल्के डगमगाते पल, शांति और अचानक सन्नाटा — सब कुछ दिखाता है कि वह केवल एक मिशन पर नहीं, एक तंत्र में फँसे हालात के बीच ज़िंदा हैं। कई समीक्षकों ने इसे “कैल्म प्रीडेटर” वाला अवतार कहा है।

लेकिन जब स्क्रीन पर आते हैं ~अक्षय खन्ना तो ऐसा लगता है कि फिल्म ने अपना सबसे भारी दांव वहीं लगाया है। उनका किरदार — रहमान डकैत या गैंगस्टर/विलेन — चेहरा जितना शांत, वह उतना ही खतरनाक। कई लोगों ने इसे “मास्टरक्लास” परफॉर्मेंस कहा है। जब वह पर्दे पर होते हैं, कैमरा खुद उनकी ओर मुड़ जाता है, हर हल्की हरकत, हर मुस्कान, हर आँख की हल्की चमक पर निगाह टिक जाती है।

अन्य कलाकार — जैसे संजय दत्त, अर्जुन रामपाल और आर माधवन — अपने-अपने हिस्से अच्छे लगे लेकिन उन्हें उतनी जगह नहीं मिली जिससे वे पूरी तरह पंख पसार सकें। कुछ समीक्षकों का कहना है कि सपोर्टिंग कास्ट ने फिल्म को मजबूती दी है लेकिन उनका उपयोग सीमित रहा।

जहाँ “धुरंधर” सफल होती है — वह है उसका विज़ुअल और सेट-अप। कराची की सड़कों, माफिया-एंडरस्लूम इलाकों, गुप्त ऑफिस, खुफिया बैठकें — सब कुछ ऐसा दिखता है कि आप असुरक्षा, डर, और गुप्तता की हवा महसूस करने लगते हैं। एक थ्रिलर होने के नाते यह वातावरण काम करता है।

लेकिन — और यह “लेकिन” काफी बड़ा है — फिल्म की लंबाई और कथानक की चपलता उसके सबसे बड़े बोझ बन जाते हैं। लगभग 3 घंटे 34 मिनट की अवधि में, कई बार ऐसा लगता है कि कहानी खिंची जा रही है, न कि आगे बढ़ रही। कुछ दृश्यों में कार्रवाई ज़ोर-जुल्म से अधिक, दिखावे के लिए लगती है; हिंसा और खून-खराबा ऐसे फ्रेमों में इस्तेमाल हुआ है जहाँ शायद मौन और तनाव अधिक असर देते।

क्लाइमैक्स — जो कि दर्शकों को एक मजबूत अंत की उम्मीद देता है — वहीं फिल्म फिसलती है। बहुत कुछ खुला छोड़ जाता है, कई धागे केवल “To be continued…” की ओर इशारा छोड़ कर। इसकी वजह से यह महसूस होता है कि यह कहानी अभी पूरी तरह नहीं हुई; उसका असली मुकाम अगली कड़ी में है।

फिर भी, “धुरंधर” उस तरह की फिल्म नहीं है जिसे आप सिर्फ छुट्टी फिल्म की तरह देखें और भूल जाएँ। यह एक अनुभव है — एक जासूसी-थ्रिलर का जो सिर्फ एक्शन नहीं, भय, कटुता, घुसपैठ, धोखा, पहचान और आत्मनिर्णय की जमीनी सच्चाइयों को उभारने की कोशिश करता है। इसमें चमक-दमक कम है, गहराई अधिक।

फिल्म के अंत तक, आप नायक से जुड़ जाते हैं — न कि उसकी जीत या हार के कारण बल्कि उसकी यात्रा, उसकी उलझन, उसकी उत्पीड़न और उसके मन के उस भय के कारण जो आपने कभी महसूस न किया हो लेकिन अब महसूस होता है।

यदि इसे देखा जाए, तो “धुरंधर” एक ऐसा थ्रिलर है जो आपको सिर्फ मनोरंजन नहीं देता — बल्कि सवाल देता है: पहचान क्या है? मिशन क्या है? सही और गलत की रेखा कब धुंधली होती है? और उस धुंध में भी इंसान अपनी मानवता कैसे बचाए रखता है?

“धुरंधर” उन फिल्मों में से है जो दिखने से पहले सोचने पर मजबूर करती हैं। जहाँ प्रदर्शन (performance), दिशा (direction) और माहौल (ambience) — तीनों मिलाकर एक असर छोड़ते हैं लेकिन उस असर को पूरी तरह साधने के लिए थोड़ी तीव्रता, थोड़ी परिपक्वता और थोड़ी कुशलता की कमी है।

इसलिए, यह फिल्म — सभी कमज़ोरियों के साथ — एक मतिभ्रष्ट नहीं बल्कि एक बहादुर, ज़ख्मी और असंतुष्ट कोशिश है। उन्हीं धड़कनों, उल्लासों, भय और सवालों के बीच, “धुरंधर” कहीं टूटता है, कहीं जलता है — और कहीं आपके मन में रुक जाता है।

रणवीर सिंह का परफॉर्मेंस गहराई, आंतरिक तनाव और शारीरिक ट्रांसफ़ॉर्मेशन के कारण सबसे मज़बूत पक्ष है। अक्षय खन्ना का खलनायक वाला किरदार डर और ठंडेपन का गहरा असर छोड़ता है। आदित्य धर की निर्देशकीय दृष्टि भव्य, गहरी और डार्क है लेकिन अत्यधिक लंबाई और कुछ अनावश्यक दृश्य इसकी गति को धीमा कर देते हैं। कहानी का विचार मजबूत है लेकिन उपकथाएँ और विस्तार कई जगह बोझिल महसूस होते हैं। छायांकन और बैकग्राउंड म्यूज़िक फिल्म का मिज़ाज बनाए रखते हैं। एडिटिंग थोड़ी और कसी हो सकती थी।
“धुरंधर” एक गहरी, गंभीर और महत्त्वाकांक्षी स्पाई-थ्रिलर है जो पूरी तरह “हल्की” मनोरंजक फिल्म नहीं बल्कि एक भावनात्मक और राजनीतिक अनुभव देना चाहती है। इसमें कमियाँ हो सकती हैं लेकिन यह फिल्म असरदार है — और लंबे समय तक याद रहती है।

‘धुरंधर’ सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं रह जाती, वह समय की नसों में उतरे भय, साहस और मौन की एक लम्बी, थरथराती हुई परछाईं बन जाती है। यह उन अदृश्य चेहरों की कथा है जो राष्ट्र की नींद की रखवाली करते हैं और अपनी पहचान को खुद ही दफ़ना देते हैं। रणवीर सिंह का किरदार किसी चमकते हुए नायक की तरह नहीं, बल्कि भीतर-ही-भीतर जलते हुए मनुष्य की तरह स्मृति में ठहरता है — एक ऐसा मनुष्य जो जीतने के लिए नहीं, केवल निभाने के लिए जीता है।

फ़िल्म की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह शोर में भी एक सन्नाटा रच देती है और विस्फोटों के बीच भी दर्शक के मन में एक प्रश्न छोड़ जाती है — देश की सुरक्षा का मूल्य क्या केवल दुश्मन की लाशों में मापा जा सकता है, या उन अपनों की ख़ामोश कुर्बानियों में, जिनकी कोई तस्वीर नहीं होती? अपनी सीमाओं और लंबे विस्तार के बावजूद, “धुरंधर” उस अदृश्य युद्ध का एक भारी, धुएँ से भरा पर ज़रूरी दस्तावेज़ बन जाती है।

परदे पर जब अंधेरा घिरता है, कहीं बहुत भीतर एक धीमी-सी आवाज़ गूंजती है — असली धुरंधर वे नहीं होते जो दिखते हैं, बल्कि वे जो सब कुछ खोकर भी राष्ट्र की छाया बनकर चलते रहते हैं। यही इस फ़िल्म की असली अंतर्ध्वनि है और यही उसकी सबसे गहरी विजय।

भारत के इतिहास में भावनात्मक स्मृति से जुड़ा हुआ दिन वीर बाल दिवस

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दिल्ली। ‘वीर बाल दिवस’भारतकेइतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भावनात्मक स्मृति से जुड़ा हुआ दिन है।यह वीरता, बलिदान और देशभक्ति की भावना को समर्पित है। यह दिन विशेष रूप से गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे पुत्रों – साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी और साहिबज़ादा फतेह सिंह जी के बलिदान की याद में मनाया जाता है।

इन दोनों साहिबज़ादों ने बहुत कम आयु (क्रमशः 9 वर्षऔर 6 वर्ष) मेंअपने धर्म और आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए इस्लाम स्वीकार करने से मना किया और दीवार में जिंदा चुनवा दिए जाने जैसी भीषण यातना को भी सहर्ष स्वीकार किया।

भारतके प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 26 दिसंबर 2022 कोघोषणा की थी कि हर वर्ष 26दिसंबर को “वीर बाल दिवस” के रूप में मनाया जाएगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

श्रीगुरु गोबिंद सिंह जी दशगुरुपरंपराके दसवें गुरु थे।उन्होंने निर्मलापंथऔरसेवापंथकेबादखालसा पंथ की स्थापना की, ताकि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ जनता को संगठित किया जा सके।1704 में, जब मुग़ल शासक और सिरहिंद के नवाब वज़ीर खान ने गुरु गोबिंद सिंह जी और उनके परिवार पर आक्रमण किया, जिसमेंगुरुजीकेबड़ेपुत्रसाहिबज़ादाअजितसिंहऔरसाहिबज़ादाजुजहारसिंहजीशहीदहोगए, तब परिवार बिछड़ गया।साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह और फतेह सिंह अपनी दादी माता गुजरी जी के साथ सिरहिंद पहुंचे, जहाँ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।वज़ीर खान ने उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन दोनों बालकों ने निडर होकर कहा कि ‘हम अपने धर्म से नहीं हटेंगे’।

उनकी इस अटल निष्ठा के कारण उन्हें दीवार में जिंदा चिनवा दिया गया, जो भारतकेइतिहास का एक अभूतपूर्व बलिदान है।

औरंगज़ेब की क्रूरता

औरंगज़ेब (1618–1707) मुग़ल साम्राज्य का सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाला बादशाह था।वह धार्मिक रूप से बहुत कट्टर था और उसने इस्लाम के नाम पर कई अत्याचार किए।

· धर्मांतरण (Conversion) का दबाव -औरंगज़ेब ने शासन के अंतर्गत आने वाले गैर-मुस्लिमों पर इस्लाम स्वीकारकरने का दबाव बनाया।कई क्षेत्रों में धर्मांतरण के लिए पुरस्कार दिए जाते थे।जिन अधिकारियों ने अधिक धर्मांतरण करवाए, उन्हें पदोन्नति दी जाती थी।
· गुरु तेग़बहादुर जी की हत्या -धर्म औरकश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए आवाज़ उठाने पर, उन्हें दिल्ली में शहीद कर दिया गया।
· मंदिरों का विध्वंस और मस्जिद निर्माण -औरंगज़ेब के शासनकाल में सैकड़ों प्रमुख हिन्दू मंदिर तोड़े गए,जैसे — काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी), केशव देव मंदिर (मथुरा) आदि।उनके स्थान पर मस्जिदें बनवाई गईं।इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि स्थानीय विरोधी राजाओं की शक्ति कम करना भी था।
· जज़िया कर की पुनः स्थापना -अकबर ने यह कर समाप्त कर दिया था, पर औरंगज़ेब ने गैर-मुसलमानों पर पुनः जज़िया लगाया। यह इस बात का प्रतीक था कि अब शासन ‘इस्लामी राज’अथवा‘शरीअत’ के सिद्धांत पर आधारित है।
· गुरुपरंपरापर अत्याचार -गुरु गोबिंद सिंह जी के परिवार को सताना और उनके बेटों को निर्दयतापूर्वक मारना इसी नीति का हिस्सा था।

गैर-मुसलमानोंके प्रति नीति

गुरु तेग़ बहादुर जी की शहादत – कश्मीर के पंडितों पर धर्मांतरण का दबाव औरंगज़ेब की नीतियों का परिणाम था।उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर जी से सहायता मांगी।गुरु जी ने इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई,जिसके परिणामस्वरूप उन्हें दिल्ली में शहीद कर दिया गया।यह घटना भारतीय इतिहास में धार्मिक स्वतंत्रता के लिए पहला सार्वजनिक बलिदान मानी जाती है।

गुरु गोबिंद सिंह जी और मुग़लोंसेसंघर्ष – गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की,जिसका उद्देश्य अन्याय के विरुद्ध धर्म और स्वाभिमान की रक्षा करना था।यह औरंगज़ेब की नीतियों के सीधे विरोध में था।परिणामस्वरूप, गुरु जी के परिवार, विशेषकर साहिबज़ादों और माता गुजरी जी, पर अत्याचार किए गए।औरंगज़ेब का प्रतिनिधि नवाब वज़ीर खान ने उनके निर्दोष पुत्रों की हत्या करवाई।

‘जफरनामा’ में गुरु गोविन्द सिंह काऔरंगजेब को दो टूक जवाव

मूल रूप से फारसी भाषा में लिखा गया ‘जफरनामा’ गुरु गोविन्द सिंह द्वारा मुगल आक्रान्ता औरंगज़ेब को लिखा गया वह ‘विजय पत्र’ है जो उन्होंने अपने चारों पुत्रों और सैकड़ों साथियों के बलिदान के उपरांत आनन्दपुर छोड़ने के बाद 1706 में तब लिखा था जब औरंगज़ेब दक्षिण भारत के अहमदनगर किले में अपने जीवन की अंतिम सांसें गिन रहा था।

फारसी में लिखे इस पत्र में कुल 134 काव्यमय पदों में खालसा पंथ की स्थापना, आनंदपुर साहिब छोड़ना, फतेहगढ़ की घटना, 40 सिखों के साथ अपने चार पुत्रों के बलिदान तथा चमकौर के संघर्ष के साथ मराठों तथा राजपूतों द्वारा औरंगजेब की करारी हार का वृत्तांत ऐसी शौर्यपूर्ण तथा रोमांचकारी शैली में मिलता है जो किसी भी राष्ट्रभक्त की भुजाओं में नवजीवन का संचार करने के लिए पर्याप्त है।

भारतीय इतिहासकारों के मुताबिक ’जफरनामा’ में गुरु गोविन्द सिंह द्वारा औरंगज़ेब के अत्याचारों के विरुद्ध मुखर विरोध अभिव्यक्त होता है। इस पत्र में दशम गुरु पूरी निर्भीकता से औरंगज़ेब की झूठी कसमों एवं उसके कुशासन की चर्चा के साथ उसकी क्रूर व बर्बर सोच की भर्त्सना करते हैं।

जफरनामा में गुरु गोविन्द सिंह औरंगजेब को ललकारते हुए ओजस्वी भाषा में लिखते हैं, “औरंगज़ेब! तू धर्म से कोसों दूर है जो अपने भाइयों व बाप की हत्या करके अल्लाह की इबादत करने का ‘ढोंग’ रचता है। तूने कुरान की कसम खाकर कहा था कि मैं सुलह रखूंगा, लड़ाई नहीं करूंगा पर तू अव्वल दर्जे का ‘धूर्त’, ‘फरेबी’ और ‘मक्कार’ है।“

तूने अपने बाप की मिट्टी को अपने भाइयों के खून से गूँथा और उस खून से सनी मिट्टी से अपने राज्य की नींव रखी है और अपना आलीशान महल तैयार किया है–

शहंशाहे औरंगज़ेबे लईन।
ज़ि दारा ए दूरस्त दूरस्त दीन॥११३॥[1]
(ऐ औरंगजेब ! तू शहन्शाह होकर भी धिक्‍कार का पात्र है। क्योंकि तू न्याय से दूर है तथा धर्म से भी दूर है।)

औरंगज़ेब द्वारा अपने दो छोटे साहिबजादों की निर्मम हत्या पर गुरु गोबिन्द सिंह जी औरंगज़ेब से कहते हैं–

चि शुद गर शिगाले व मकरो रिया।
हमीं कुश्त दो बच्च ए शेर रा॥१४॥[2]
(हिंदी अनुवाद – क्या हुआ यदि सियार ने छल और कपट से इस तरह शेर के दो बच्चों को मार दिया।)अर्थात क्या हुआ (परवाह नहीं) अगर तूने छल और कपट से मेरे दो छोटे पुत्रों को मार दिया।)

‘जफरनामा’ में एक और स्थान पर गुरु गोविन्द सिंह जी औरंगजेब को ललकारते हुए कहते हैं-

चिहा शुद कि चूँ बच्चगाँ कुश्त चार।
कि बाकी बिमाँदन्द पेचीदा मार॥६८॥[3]
(हिंदी अनुवाद- क्या हुआ अगर चार बच्चे (साहबज़ादेअजीतसिंह, साहबज़ादेजुझारसिंह, साहबज़ादेजोरावरसिंह, साहबज़ादेफतहसिंह) मारे गये। अभी कुण्डल वाले महाविष सर्प शेष बचे हुए हैं।)

चुं शेरे जियाँ जिन्दा मानद हमें।
जि तो इन्तकामे सितानद हमे॥१५॥[4]
(हिंदी अनुवाद- जबकि वीर शेर जीवित रहता है तो वह तुझसे प्रतिशोध लेगा।)

चि कुरआँ कसम रा कुनम ऐतवार।
बगरने तो गोई मन ई रा चिकार॥४७॥[5]
(हिंदी अनुवाद- (तेरी) कुरान की कसम का मैं क्या विश्वास करूँ। तू अन्यथा (काम निकालने पर) कह देता है कि मुझे इससे क्या काम।)

मैं युद्ध के मैदान में अकेला आऊंगा और मैं तेरे पांव के नीचे ऐसी आग रखूंगा कि पूरे देशमें उसे बुझाने वाला तथा तुझे पानी पिलानेवाला एक न मिलेगा। मैंने देशमें तेरी पराजय की पूरी व्यवस्था कर ली है। फिर इसके आगे गुरु गोविंद सिंह औरंगज़ेब को इतिहास से सीख लेने की सलाह देते हुए लिखते हैं कि तू अपनी मन की आँखों से देखकर विचार कर कि भारत को जीतने का सपना देखने वाले सिकंदर और शेरशाह; तैमूर और बाबर, हुमायूं और अकबर आज कहां हैं –

कुजा शाह इस्कन्दरों शेरशाह।
कि यक हम न माँदस्त जिन्दा बजाह॥१२९॥[6]
(सिकन्दर बादशाह कहाँ है, शेरशाह कहां है। एक भी जीवित और स्थान पर आसीन नहीं है।)

कुजा शाहे तैमूरों बाबर कुजास्त।
हुमायूँ कुजा, शाह अकबर कुजास्त ||१३०[7]
(आज तैमूर कहाँ है, बाबर कहाँ है, हुमायूँ कहाँ है और अकबर बादशाह कहाँ है? अर्थात् उनकी क्या दुर्गति हुए,ये बात तू…औरंगजेब ध्यान में रख।)

तु गर जब्र आजिज खराशी कुनी।
कसम रा बतेशा तराशी कुनी ॥१३२॥[8]
(और तू यदि दीन-दुबल को सताता है तो भगवान की कसम को आरी से चीरता है।)

न जेबद तुरा नामे औरंगजेब।
ज़ि औरंगज़ेबाँ न याबद फ़रेब॥५॥[9]
(तुझे औरंगजेब (आसन शोभा) नाम शोभा नहीं देता (क्योंकि) औरंगजेबों से (राजाओं से) छल नहीं मिलता।)

फिर आगे इस संदेश पत्र में गुरु गोविंद सिंह औरंगज़ेब को चेतावनी देते हुए कहते हैं-

हमाँ कू तुरा पादशाही बिदाद।
बमा दौलते दीं पनाही बिदाद॥३॥[10]
(औरंगज़ेब ! तू मेरी यह बात ध्यान से सुन कि जिस ईश्वर ने तुझे इस मुल्क की बादशाहत दी है, उसी ने मुझे धर्म और मेरे देश की रक्षा का जिम्मा सौंपकर वह शक्ति दी है कि मैं धर्म और सत्य का परचम बुलंद करूं।)वस्तुत: गुरु गोविंद सिंह का जफरनामा एक पत्र नहीं बल्कि भारतीय जनमानस की भावनाओं का प्रखर प्रकटीकरण है। अतीत से वर्तमान तक न जाने कितने ही देशभक्तों ने उनके इस पत्र से प्रेरणा ली है।

मुगल दरबार में वीर गुरुपुत्रोंका साहस और पराक्रम

करतार सिंह जी अपनी पुस्तक ‘लाइफ ऑफ गुरु गोबिन्द सिंह’ के 23वें अध्याय जिसका शीर्षक है‘Murder of the innocent’में साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेहसिंह के साहस और पराक्रम के बारे में विस्तार से बताया है। मुगल दरबार में जब इन दोनों गुरुपुत्रोंको प्रस्तुत किया गया और सिर झुकाकर सलाम करने को कहा गया तो इन वीरो का जवाब अद्भुत साहस से भरा हुआ था। करतार सिंह जी मुगल शासन में इन निर्दोष वीर बालकों की निर्मम हत्या और साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेहसिंह के साहस और पराक्रम का उल्लेख करते हुएलिखते हैं-

“A Minister of his, Sucha Nand by name, advised the little princes to bow down before the great Nawab,“Not we.” replied Zorawar Singh, the elder of the two, “We have been taught to bow to none but God and Guru.[11]

This daring reply astonished all. The Nawab told them that their father and two elder brothers had been killed a few days back.“They were infidels,” added he, “and merited death. Good luck has brought you to an Islamic darbar. Your souls will be washed of infidelity and made fit for paradise in the life to come. In this world you will be given all comforts and luxury which honour, rank, and wealth can bring. When you grow up, we shall marry you to beautiful princesses of royal descent. And from this earthly paradise you will, in due course, be ushered by angels to that genuine paradise where Hazrat Mohammad sits deputy to the Mighty Allah. If you say no to my proposal, you will be treated as kafirs are treated.”

‘Zorawar Singh turned to his younger brother Fateh Singh, and, in a low voice, asked him what answer he would make. Fateh Singh had seen but seven winters, yet in his veins ran the blood of Guru Arjan, Guru Hargobind, Guru Teg Bahadur, and Guru Gobind Singh. So, he replied, “Brother, no pleasure of palate or sense should induce us to forsake the true faith. We should remember the parting advice of our grandmother. We should never think of clouding the fair name of our brave and holy ancestors. What is there so precious in life that we should hug it at the cost of our souls? What is there so ugly indeath that we should shun it though it may be even coming as a deliverer from the snares of this world? I am prepared to die”.

There was dead silence in the court. So, the words of the two brothers, though uttered inundertones, were heard by quite a large number. All who heard them were filled with awe at the heroism of the children, and trembled at the fate which awaited them.

Zorawar Singh said in a clear, loud, and steady voice, “you say that our father has been killed. We can never believe it. He has yet a good deal of work to do in this world. He is alive and we are sure of that. Know that we are the sons of him, who, at my age, voluntarily sent his father to risk his life in an attempt to cure your Emperor of his bigotry. You know what happened. How can you ever think of our renouncing the faith which has been preserved and developed at such dear costs. We spurn your worldly pleasures. We have no desire for the paradise which you are so fond of. We would not live as renegades. Sweet life-giving death is far better to us. Our choice is made.

The words in themselves were enough to inflame the haughty Nawab. Sucha Nand said, “look here, gentlemen,this is their behaviour in childhood.What will it be when they grow up? Their father alone has given the government a lot of trouble. What will be the result when these two grow up and take his place?

The Nawabassented and looked round for someone to second what his minister had proposed. All sat with their heads bent lowand their eyes fixed on the ground. Ofcourse, the Qazis, the Islamic law-givers,were alert and clamorous. At last, the Nawab of Malerkotla spoke out that the holy Quran did not permit the slaughter of innocent helpless children. So, he urged that they should be allowed to go unharmed.

But the Qazis said, “What do you know of the holy law? How can you pretend to know more of it than we? The holy law gives them the choice between Islam and death. Let them choose as they like.

There could, however, be no lack of executioners for kafirs in a Mohammadan court. A part of the outer wall of the town was dismantled and the children were bricked alive. All the time they went on reciting and meditating on the word of the Guru. When they had been buried up to the breast, the Nawab again urged themto accept Islam. They kept their eye and minds fixed on the Lordand shook their heads. At a nod from him, their heads were severed from their bodies. This occurred on 13th of Poh, Sambat 1761. (27th of December, 1704).”[12]

प्रसिद्ध गुरुवाणी टीकाकार सोडी तेजा सिंह जी अपनी पुस्तक ‘जीवन दस गुरू साहिबान’ में लिखते हैं, “सरहिंद पहुँचने पर सूबा वजीर खां के हुक्म से साहिबजादों तथा माता जी को एक बुजे में कैद कर दिया गया था तथा अगले दिन जब वह कचहरी लगी तो सूबे ने साहिबजादों को बुलाकर कहा कि मुसलमान हो जाओ आप का अब कोई वारिस नहीं है, आप के बड़े भाई तथा पिता तथा और सिख सब लड़ाई में मारे गए हैं, परन्तु जब शाहजादों ने सूबे की मुसलमान हो जाने वाली बात न मानी तो उसने उनको नीवों में चिनकर शहीद कर देने का आदेश दिया। सूबे के आदेशानुसार साहिबजादों को 13 पोह को नींवों में चिनकर कत्ल कर दिया। इनकी शहीदी की खबर सुनकर माता जी भी इस ह्रदय विदारक बात को न सह सकी तथा शरीर त्याग कर परलोक सिधार गई।“[13]

कुलदीपचन्द्र अग्निहोत्री जी गुरु गोबिन्द सिंह जी के पुत्रो पर किए गए अत्याचार के बारे में लिखते हैं- “जोरावरसिंह और फतेहसिंह को इस्लाम धर्म में दीक्षित करने के भरसक प्रयास किए गए लेकिन दोनों गुरु पुत्रों ने हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम धर्म में जाना अस्वीकार कर दिया। सरहिन्द के नवाब के तन-बदन में आग लग गई। इनकी यह मजाल, सत्ता से लोहा लेने का हौसला, नजाम की आज्ञा उल्लंघन करने का साहस और फिर नजाम ने आपा खो दिया। “ये इस्लाम कबूल नहीं करते तो दीवारों में चिनवा दो। नवाब का क्रूर आदेश सरहिन्द से उठकर सारे गगन में गूंज गया । विश्व के इतिहास में 13 पोह का दिन अनन्त काल के लिए अंकित हो गया। गुरु गोविन्द सिंह जी के दोनों सुकुमार पुत्र जिन्दा ही ईंटों की दीवारों में चिनवा दिये गए। उनका अपराधकेवल इतना था कि उन्होंने सत्य धर्म का त्याग नहीं किया।[14]

वेणीप्रसाद जी अपनी पुस्तक गुरु गोविन्द सिंह में ‘दो कुमारों की अद्भुत धर्मबलि’ शीर्षक नामक अध्याय में गुरु साहब के पुत्रों के साहस को बताते हैं जिसमें जब गुरु पुत्रों को जबरन इस्लाम धर्म अपनाने को कहा जाता है तो उनका जवाब होता है-

“जोरावर-हमारे गुरु का यही उपदेश है कि “धर्म छोड़कर, यदि स्वर्ग भी मिलता हो तो वह नरक के समान समझना” इसलिये तुम्हारी इस मौज को मैं नरक के समान समझता हूँ।

सूबा–अरे लड़के, तू क्या पागल हो गया है जो बहकी बहकी बातें करता है! मुसलमान नहीं होगा तो क्या जान गवाँवेगा ?

जोराबर -जान क्‍यों जायेगी ?

सूबा–हमारी किताब का यही हुक्म है कि जो मजहब कबूल न करे उसे मार डालना चाहिए।

जोरावर—क्या मुझसे युद्ध करेगा? ला, दे हाथ में तलवार दे, गुरु का बच्चा युद्ध में जान जाने से नहीं डरता ।

सूबा–अरे बच्चा, तू निरा भोला है, युद्ध नहीं करना होगा। जल्लाद की तलवार तुम्हारा ‘सिर काटकर फेंक देगी। सोच और समझ, अगर अपने को इस आफत से बचना चाहता है तो मुसलमान होकर सारे ऐशो-आराम को भोग,नहीं तो बड़ी दुर्दशा होगी।

जोरावर–अच्छा, तू मेरे हाथ में तलवार नहीं देगा और योंही मेरा सिर कटवाकर मरवा डालेगा ! हाँ, ठीक है माताजी कहती थीं कि मेरे दादा गुरु तेगबहादुर जी भी योंही मारे गए थे; क्योंकि उन्होंने मुसलमान होना मंजूर नहीं किया था। अरे पापी ! लें सुन ले, मैं उसी गुरु का पोता हूँ! मैं भी उसी तरह कत्ल होऊँगा, पर मुसलमान नहीं होऊँगा।[15]

1. गुरु गोविन्द सिंह प्रणीत ‘जफरनामा’ (विजयपत्रम), अनुवादक आचार्य धर्मेन्द्रनाथ, निखिल भारतीय भाषापीठ प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 225

2 . गुरु गोविन्द सिंह प्रणीत‘जफरनामा’ (विजयपत्रम), अनुवादक आचार्य धर्मेन्द्रनाथ, निखिल भारतीय भाषापीठ प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 27
3.गुरु गोविन्द सिंह प्रणीत ‘जफरनामा’ (विजयपत्रम), अनुवादक आचार्य धर्मेन्द्रनाथ, निखिल भारतीय भाषापीठ प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 195
4गुरु गोविन्द सिंह प्रणीत ‘जफरनामा’ (विजयपत्रम), अनुवादक आचार्य धर्मेन्द्रनाथ, निखिल भारतीय भाषापीठ प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 29
5गुरु गोविन्द सिंह प्रणीत ‘जफरनामा’ (विजयपत्रम), अनुवादक आचार्य धर्मेन्द्रनाथ, निखिल भारतीय भाषापीठ प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 93
6गुरु गोविन्द सिंह प्रणीत ‘जफरनामा’ (विजयपत्रम), अनुवादक आचार्य धर्मेन्द्रनाथ, निखिल भारतीय भाषापीठ प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 257
7गुरु गोविन्द सिंह प्रणीत ‘जफरनामा’ (विजयपत्रम), अनुवादक आचार्य धर्मेन्द्रनाथ, निखिल भारतीय भाषापीठ प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 259
8गुरु गोविन्द सिंह प्रणीत ‘जफरनामा’ (विजयपत्रम), अनुवादक आचार्य धर्मेन्द्रनाथ, निखिल भारतीय भाषापीठ प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 263
9गुरु गोविन्द सिंह प्रणीत ‘जफरनामा’ (विजयपत्रम), अनुवादक आचार्य धर्मेन्द्रनाथ, निखिल भारतीय भाषापीठ प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 9
10गुरु गोविन्द सिंह प्रणीत ‘जफरनामा’ (विजयपत्रम), अनुवादक आचार्य धर्मेन्द्रनाथ, निखिल भारतीय भाषापीठ प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 5
12Kartar Singh, Life of Guru Gobind Singh, Lahore Book Shop Ludhiana, 1951, P 233-237
13सोडी तेजा सिंह जी प्रसिद्ध गुरवाणी टीकाकार,जीवन दस गुरू साहिबान (सम्पूर्ण इतिहास), प्रकाशक भाई चतर सिंह जीवन सिंह पुस्तकां वाले, अमृतसर,पृष्ठ 411
14कुलदीपचन्द्र अग्निहोत्री, गुरु गोबिन्द सिंह व्यक्तित्त्व एवं कृतित्व, आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली,पृष्ठ 28

15वेणीप्रसाद, गुरु गोविन्द सिंह, काशी नागरीप्रचारिणी सभा, काशी,पृष्ठ 137

क्या सनातन का विरोध और अपमान ही सेक्युलर राजनीति है ?

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दिल्ली । भारत विभाजन के साथ मिली स्वाधीनता से कोई सबक न लेते हुए भारत की राजनीति आज तक तुष्टिकरण के आधार पर चलती रही है। मुस्लिम वोट बैंक को प्रसन्न करने के लिए तथाकथित समाजवादी लालू ने सम्मानित नेता आडवाणी जी को जेल में डाल दिया और एक कदम आगे बढ़ते हुए मुलायम सिंह ने निहत्थे रामभक्तों को गोलियों से भुनवा दिया, कांग्रेस साम्प्रदायिक हिंसा बिल ले आई वो तो भला हो उस समय विपक्ष में होने के बाद भी भाजपा ने इसे पारित होने से बचा लिया। मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण ही पाकिस्तान को सटीक उत्तर देने की जगह अमन का तमाशा किया जाता रहा। मात्र इतना ही नहीं मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए भारत की सनातन संस्कृति को अनेकानेक प्रकार से चोट पहुंचाई जाती रही । वर्ष 2014 में केन्द्रीय नेतृत्व प्रदान करते हुए नरेन्द्र मोदी जी ने तुष्टिकरण के कारण सनातन संस्कृति को हुई क्षति की भरपाई करने के प्रयास किए हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद एक बार फिर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले दल और अधिक कटु होकर सनातन हिंदू धर्म पर प्रहार कर रहे हैं । रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को उनकी दो दिवसीय भारत यात्रा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने श्रीमद्भगवद्गीता का रूसी अनुवाद भेंट किया। इसको देखकर कांग्रेस और वामपंथी दलों ने न केवल प्रधानमंत्री वरन श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग करते हुए इसका विरोध किया। कांग्रेसियों ने गीता के लिए माल शब्द का प्रयोग किया जो एक अक्षम्य अपराध है ।

वर्ष 2026 में पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव हैं अतः इन दो प्रान्तों में सनातन प्रतीकों तथा हिन्दू समाज को अपमानित करने का कार्य भी सबसे अधिक और सबसे तेजी से हो रहा है। पश्चिम बंगाल में वहां के तृणमूल विधायक हुमायूं कबीर ने गुलामी की मानसिकता से ग्रसित होकर बाबर के नाम की एक मस्जिद की आधारशिला रखी और प्रशासन चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि इस हरकत को मुख्यमंत्री का मौन समर्थन था। उसकी देखादेखी बिहार और तेलंगना में भी कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं ने बाबरी नाम की मस्जिद व स्मारक बनाने का ऐलान करके साप्रंदायिक तनाव बढ़ाने का काम आरम्भ कर दिया है। इस बाबरी भूत को वह सभी दल प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से समर्थन दे रहे हैं जिनकी राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण से चलती है और जो संविधान की किताब हाथ में लेकर घूमते हैं ।

उत्तर प्रदेश में सपा मुखिया सपरिवार शौर्य दिवस को सलीम चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाकर हिन्दुओं को चिढ़ाते दिखे । सपा मुखिया का तुष्टिकरण में संलिप्त यह कृत्य जनता समझ रही है। सपा मुखिया समय समय पर ऐसे बयान देते रहते हैं जिससे सनातन हिन्दू समाज आहत हो। महाकुंभ से लेकर लेकर अयोध्या के दीपोत्सव तक उन्होंने हिन्दू परम्पराओं का उपहास करते हुए उन्हें ढोंग बताया।

वहीं कांग्रेस ने तो हिदू सनातन आस्था के सभी केन्द्रों का अपमान करने की सुपारी ही ले रखी है। कर्नाटक में तो मुस्लिम तुष्टिकरण का खुला खेल चल ही रहा है। हिमाचंल प्रदेश कि कांग्रेस सरकार मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह “सुक्खू “ को हिंदू बच्चों के राधे -राधे बोलने पर आपत्ति है। तेलंगाना के कांग्रेस मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी लगातार सनातन और हिंदुओं के विरुद्ध आग उगल रहे हैं। रेवंत रेड्डी ने हिंदुओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि हर व्यक्ति और हर काम के लिए एक अलग भगवान होता है। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा हिंदू कितने भगवानों को मानते हैं ? तीन करोड़ हैं, इतने सारे क्यों हैं? जो लोग अविवाहित हैं उनके लिए एक भगवाण है हनुमान, जो लोग दो शादी करते हैं उनके लिए अलग भगवान हैं और जो लोग शराब पीते हैं व मुर्गी खाते हैं उनके लिए अलग भगवान हैं। हर ग्रुप का अलग भगवान है। रेड्डी के बयान से हिंदुओं की भावनाओं का आहत होना स्वाभाविक था । हिंदू संगठनों ने मुख्यमंत्री से माफी मांगने को कहा किंतु मुस्लिम परस्त रेवंत रेड्डी अपने बयान पर कायम हैं ।

उधर तमिलनाडु में भगवान मुरुगन के मंदिर में दीप जलाने को लेकर द्रमुक सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए न्यायालय की भी अवहेलना कर रही है। तमिलनाडु से ही हिन्दू और सनातन समाज को डेंगू -मलेरिया जैसे रोगों की संज्ञा दी जाती रही है।

आश्चर्य की बात ये है कि सनातन हिन्दू धर्म का अपमान करने वाली इस राजनीति को “सेक्युलर” कहा जाता है। छद्म धर्मनिरपेक्षता का ये खेल लम्बा चल चुका है अब इसे समाप्त होना ही होगा।

सरकारी जमीनों पर बने हैं चर्च, तो क्यों नहीं हो रही कार्रवाई?

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रवि पाराशर

दिल्ली । भारत में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के बुनियादी ढांचे का सर्वाधिक निर्माण ब्रिटिश शासन काल में हुआ। ईसाई धर्म को तत्कालीन सरकार का सीधा संरक्षण प्राप्त था, इसलिए कन्वर्जन को धार्मिक कर्तव्य मानने वाली मिशनरी की राह में कोई बड़ा रोड़ा नहीं था। हालांकि स्वतंत्रता के बाद भी मिशनरी की कन्वर्जन मुहिम में कमी नहीं आई और अब तो इसके लिए नए-नए हथकंडे भी अपनाए जा रहे हैं।

ब्रिटिश काल में अंग्रेज शासन चर्चों के लिए बड़े-बड़े भूखंड आसानी से मिशनरी को लीज पर दे देता था। लेकिन स्वतंत्र भारत में भी चर्च अथॉरिटी सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे जारी रखे हुए है। पिछले दिनों दिल्ली, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु से इस तरह के कई समाचार मिले कि सरकारी जमीन पर या तो चर्च बना लिए गए हैं या फिर ईसाई धर्म से जुड़े प्रतीकों का निर्माण कर लिया गया है और इस तरह स्थानीय शुभचिंतकों के सहयोग से कन्वर्जन का काम धड़ल्ले से जारी है।

ब्रिटिश शासन में चर्चों और ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार से जुड़े दूसरे भवनों के निर्माण और दूसरे कार्यों के लिए खाली जमीनें निश्चित समयावधि के लिए लीज पर दी गई थीं। बहुत से मामलों में समय बीत जाने के बाद न तो लीज का नवीनीकरण कराया गया, न ही सरकार को कब्जा वापस सौंपा गया। बेसुध सरकारी अधिकारियों ने भी कोई सुध नहीं ली या फिर भ्रष्टाचरण के कारण मामले दबा दिए गए। जानकारी नहीं होने के कारण कोई सामाजिक आंदोलन भी इसके विरोध में नहीं हुआ। इस तरह स्वतंत्रता के बाद से अभी तक चर्च भारत में सबसे बड़ा भूमि घोटाला कर चुका है और इसकी कहीं चर्चा भी नहीं है। ब्रिटिश काल से ही जमीनें आवंटित होते आने के कारण भारत में चर्च सर्वाधिक भूमि स्वामित्व रखने वाली सबसे बड़ी गैर-सरकारी संस्था है।
चर्च ने सिर्फ सरकारी जमीनें ही नहीं हड़पीं, बल्कि मंदिरों की भूमि पर भी अवैध कब्जे किए। दूसरे कामों के लिए आवंटित जमीनों पर भी चर्च की दृष्टि रही है। तमिलनाडु के तिरुनेलवेली पहाड़ी क्षेत्र में सातवीं शताब्दी के तिरुमलापुरम शिव मंदिर के क्षेत्र में एक ऊंची चट्टान पर चर्च बना दिया गया। इस प्राचीन मंदिर की देख-रेख आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पास है, लेकिन ईसाई मिशनरी ने चट्टानी इलाके पर अतिक्रमण कर लिया है।

आंध्र प्रदेश में मिशनरी माफिया ने गुंटूर जिले के ऐडिलापुडु गांव में एक ऊंची पहाड़ी पर नियम विरुद्ध विशाल क्रॉस का निर्माण कर लिया है। जानकारों के अनुसार जहां क्रॉस बना है, उस क्षेत्र को सीता पादुका कहा जाता है और वहां बहुत से आस्तिक हिंदू परिवार विवाह की रीति संपन्न करते हैं।

कहीं-कहीं सनातन समाज ने मिशनरी के अतिक्रमण पर सामूहिक प्रतिरोध भी किया है। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के मदनपुर गांव में करीब दो दशक पहले बने कंक्रीट के विशाल क्रॉस को अक्टूबर, 2021 में ढहा दिया गया। उससे करीब 200 मीटर दूर मंदिर का निर्माण कर दिया गया। छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम इस बात की पुष्टि करता है, लेकिन क्रॉस ढहाने का काम किसने किया, यह उसे नहीं पता। क्रिश्चियन फोरम ने माना कि जहां क्रॉस बनाया गया था, वह जमीन आधिकारिक रूप से चर्च के स्वामित्व में नहीं है। फिर भी 20 साल पहले वहां ईसाई धार्मिक चिन्ह बनाकर कर्मकांड शुरू कर दिया गया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जमीन घोटाले की चर्च की प्रवृत्ति पुरानी है और सुनियोजित तरीके से यह काम किया जा रहा है।

तिरुवनंतपुरम स्थित पेप्पारा वन्यजीव अभयारण्य के एक हिस्से में ईसाई संप्रदाय ने क्रॉस लगा कर तीर्थस्थल बनाने की कोशिश की थी। इसे ले कर ईसाईयों, वन अधिकारियों और आदिवासी समुदायों के बीच विवाद खड़ा हो गया था। केरल हाईकोर्ट के जस्टिस एन. नागरेश की सदस्यता वाली पीठ ने व्यवस्था दी कि किसी भी धार्मिक समुदाय को आरक्षित वन भूमि के अंदर किसी भी स्थान पर तीर्थाटन करने की अनुमति नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर लोगों का कोई समूह जबरदस्ती आरक्षित वन क्षेत्र में घुसता है और गैर-कानूनी रूप से कोई संरचना तैयार करता है, तो वन अधिकारियों को कानून के अनुसार ऐसी संरचना को हटाना चाहिए चाहिए और इस संबंध में कार्रवाई करनी चाहिए। ये मामला करीब चार साल पुराना है।

ऐसे और बहुत से मामलों की जानकारी देश भर से मिलती रहती है। खास तौर पर इस तरह की घटनाएं जनजातीय क्षेत्रों में ज्यादा घट रही हैं। हालांकि अब सनातन समाज में जागरूकता बढ़ने की वजह से ऐसे बहुत से मामलों में कानूनी कार्रवाई का दायरा बढ़ता जा रहा है। फिर भी केंद्र और राज्य सरकारों को देश भर में सर्वे करा कर यह पता लगाना चाहिए कि चर्चों के पुराने भवन और उनके कब्जे वाले भू-भाग पर लीज की अवधि खत्म तो नहीं हो गई है और अगर उसका नवीनीकरण नहीं हुआ है, तो कानूनन उस पर कब्जा वापस लिया जाना चाहिए।

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