चोरी भी… वापसी भी! आखिर भारत की सांस्कृतिक धरोहरों का प्रहरी कौन?

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भोपाल । एक ओर दुनिया से लौट रही हैं भारत की बेशकीमती पुरावस्तुएं, दूसरी ओर राज्यों की लापरवाही से देश के भीतर ही असुरक्षित हैं हमारी ऐतिहासिक विरासतें…

भारत इन दिनों अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर दो बिल्कुल विपरीत धाराओं में चलता हुआ दिखाई दे रहा है। पहली तस्वीर गौरव से भर देने वाली है। दुनिया के बड़े-बड़े संग्रहालयों, निजी संग्रहों और नीलामी घरों में पहुंच चुकी भारत की सैकड़ों प्राचीन मूर्तियां, शिलालेख और कलाकृतियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाए गए पुरा-संपदा वापिसी अभियान के कारण एक-एक कर स्वदेश लौट रही हैं, तो दूसरी तस्वीर उतनी ही पीड़ादायक है।

वस्‍तुत: देश के किलों, मंदिरों और संरक्षित स्मारकों से आज भी हमारी अमूल्य धरोहरें और मूर्तियां चोरी हो रही हैं। कई बार प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगती, तब तक कि कोई इस बारे में ध्‍यान नहीं दिलाता है! सवाल यह है कि जब भारत विदेशों से अपनी खोई हुई विरासत वापस लाने में सफल हो रहा है, तब हम अपने ही घर की विरासत को सुरक्षित क्यों नहीं रख पा रहे?

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के ऐतिहासिक “नरवर” किले में हुई घटना ने इस प्रश्न को और अधिक सोचनीय बना दिया है। करीब पांच सौ वर्ष पुरानी, तीन हजार किलोग्राम से अधिक वजनी अष्टधातु की ऐतिहासिक तोप रात के अंधेरे में हथियारबंद बदमाश क्रेन और ट्रक के सहारे उठाकर ले गए। 25 से 30 बदमाशों का गिरोह आया, सुरक्षा कर्मियों को आधुनिक हथियारों के दम पर धमकाया और सदियों पुरानी धरोहर लेकर चला गया। यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि भारत की विरासत सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर है।

सबसे अधिक चिंता की बात इस तोप चोरी प्रकरण में यह है कि घटना से पहले संदिग्ध गतिविधियों की सूचना स्थानीय लोगों ने दी थी। सुरक्षा बढ़ाने की मांग भी हुई थी, किंतु जिम्मेदार तंत्र ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। जिस किले में करोड़ों रुपये मूल्य की ऐतिहासिक धरोहर रखी हो, वहां न पर्याप्त रोशनी, न आधुनिक निगरानी व्यवस्था और न प्रशिक्षित सुरक्षा बल! आखिर ऐसी लापरवाही की कीमत कौन चुका रहा है? इतिहास तो पहले ही चुका रहा है, देश के सामने अनेक मसले हैं जो एतिहासिक भूल के कारण आज भी भारत के समक्ष नासूर बनी हुई हैं!

ऐसे में यह घटना सोचने पर विवश कर रही है कि नरवर ही क्‍यों पिछले कई दशकों से देश के अनेक राज्य अंतरराष्ट्रीय पुरावस्तु तस्करों के लिए आसान निशाना क्‍यों बने हुए हैं! भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि उसके संरक्षित स्मारकों से ही 480 से अधिक महत्वपूर्ण पुरावशेष गायब हो चुके हैं। सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। तमिलनाडु के चोलकालीन मंदिरों से लेकर बिहार के नालंदा संग्रहालय, कर्नाटक के होयसल मंदिरों, आंध्र प्रदेश के प्राचीन मंदिरों और हिमालयी क्षेत्रों के दुर्लभ देवस्थानों तक, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जहां तस्करों ने अपनी पहुंच न बनाई हो।

खजुराहो की दुर्लभ मूर्तियां हों, तंजावुर के मंदिरों की कांस्य नटराज प्रतिमाएं, चंद्रकेतुगढ़ की मौर्यकालीन टेराकोटा कलाकृतियां या मथुरा की कुषाणकालीन प्रतिमाएं, आज भी भारत की हजारों अमूल्य धरोहरें वर्षों तक फर्जी दस्तावेजों के सहारे विदेशों के संग्रहालयों और निजी संग्रहों तक पहुंचती रही हैं। विरासत संरक्षण से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा बार-बार तथ्‍यों एवं संदर्भों के आधार पर बताया जा रहा है कि भारत से हर दशक हजारों महत्वपूर्ण कलाकृतियां अवैध रूप से बाहर भेजी जाती हैं, जबकि वास्तविक चोरी के मामलों का बहुत छोटा हिस्सा ही पुलिस रिकॉर्ड तक पहुंच पाता है।

अब इसके उलट बात तस्वीर के दूसरे पक्ष की भी करते हैं जोकि आशा जगाता है। वर्ष 2014 के बाद भारत ने अपनी सांस्कृतिक विरासत की वापसी को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। पहले जहां विदेशों में पहुंच चुकी भारतीय कलाकृतियों को वापस लाने के प्रयास बिखरे हुए थे, वहीं अब यह भारत की विदेश नीति और सांस्कृतिक कूटनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

आंकड़े स्वयं इस परिवर्तन की कहानी कहते हैं। स्वतंत्रता से लेकर वर्ष 2014 तक भारत सिर्फ 13 चोरी हुई पुरावस्तुएं ही वापस ला सका था, किंतु पिछले एक दशक में यह संख्या बढ़कर 600 से अधिक और नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 668 तक पहुंच चुकी है। स्‍वभाविक है ये दृष्‍य भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना है।

इस अभियान में अमेरिका सबसे बड़ा सहयोगी बनकर सामने आया। अकेले अमेरिका से 500 से अधिक भारतीय पुरावस्तुएं वापस मिली हैं। सितंबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान 297 ऐतिहासिक कलाकृतियों की वापसी विश्व इतिहास की सबसे बड़ी सांस्कृतिक प्रत्यावर्तन घटनाओं में गिनी गई। इनमें दो हजार वर्ष ईसा पूर्व से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक की दुर्लभ मूर्तियां, जैन तीर्थंकर, विष्णु, गणेश, अप्सराएं और अनेक पवित्र कलाकृतियां शामिल थीं।

ऑस्ट्रेलिया ने चोलकालीन नटराज प्रतिमा लौटाई, ब्रिटेन ने दुर्लभ मूर्तियां वापस कीं, इटली, कनाडा, जर्मनी, सिंगापुर और स्कॉटलैंड ने भी भारत की विरासत लौटाने में सहयोग दिया। हाल ही में नीदरलैंड से चोलकालीन दुर्लभ ताम्रपत्र ‘सेप्पू पट्टायम’ की वापसी ने इस अभियान को नई ऊंचाई दी। यह स्पष्ट संकेत है कि आज विश्व भारत की सांस्कृतिक विरासत पर उसके अधिकार को पहले की तुलना में कहीं अधिक सम्मान दे रहा है।किंतु वहीं एक असहज प्रश्न भी खड़ा हो रहा है?

यदि केंद्र सरकार विदेशों से सदियों पहले चोरी हुई धरोहरों को वापस ला सकती है, तो क्या राज्य सरकारें अपने अधिकार क्षेत्र में मौजूद धरोहरों की सुरक्षा भी उसी गंभीरता से नहीं कर सकतीं? आखिर क्यों आज भी अनेक संरक्षित स्मारकों में सीसीटीवी कैमरे नहीं हैं? क्यों रात में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था नहीं होती? क्यों प्रशिक्षित सुरक्षा बलों की जगह मात्र औपचारिक चौकीदारी से काम चलाया जा रहा है? और इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्‍न? किसी चोरी के बाद प्रशासन की जवाबदेही भी कभी तय होती है क्‍या ?

वास्‍तव में यह किसी को नहीं भूलना चाहिए कि सांस्कृतिक विरासत पर्यटन का साधन होने के साथ ही किसी राष्ट्र की स्मृति, उसकी पहचान और उसके आत्मसम्मान का आधार होती है। एक मंदिर से चोरी हुई मूर्ति पत्थर या धातु का टुकड़ा होने तक सीमित नहीं है, वह तो सदियों से उस समाज की आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक निरंतरता का केंद्र बिन्‍दु है, इसलिए जब कोई प्रतिमा चोरी होती है तो वह पूरे समाज की सांस्कृतिक चेतना का भी ह्रास है।

यहां अब कहना यही है कि नरवर किले की चोरी को सिर्फ एक आपराधिक घटना मान लेना बड़ी भूल होगी। यह उन सभी राज्यों के लिए चेतावनी है जहां हजारों संरक्षित स्मारक आज भी न्यूनतम सुरक्षा व्यवस्था के भरोसे खड़े हैं। यदि तीन हजार किलो वजनी तोप को अपराधी योजनाबद्ध तरीके से उठा सकते हैं, तो छोटी प्रतिमाओं और दुर्लभ पुरावशेषों की सुरक्षा का अनुमान सहज लगाया जा सकता है।

अब समय घटनाओं पर एफआईआर दर्ज करने के साथ इस बात का भी है कि देश में विरासत सुरक्षा की नई राष्ट्रीय कार्यसंस्कृति विकसित हो। प्रत्येक राज्य को अपने सभी पुरावशेषों की डिजिटल सूची तैयार करनी चाहिए। साथ ही वह आधुनिक निगरानी प्रणाली स्थापित करे। विरासत अपराधों के लिए विशेष पुलिस इकाइयां बनाए और पुरातत्व विभाग, स्थानीय प्रशासन तथा खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय को अनिवार्य बनाया जाए। इसे सभी समझें कि विरासत संरक्षण किन्‍हीं फाइलों तक सीमित हो जानेवाला विषय नहीं है, यह तो शासन की प्राथमिकता में सबसे ऊपर के मुख्‍य 10 पायदानों में होना चाहिए।

आज इस बात को भी सभी गहराई से समझ लें; वस्‍तुत: भारत आज दुनिया से अपनी बिखरी हुई सांस्कृतिक पहचान वापस ला रहा है। यह स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धियों में से एक है, किंतु इस उपलब्धि का वास्तविक सम्मान तभी होगा, जब देश के भीतर मौजूद प्रत्येक मंदिर, प्रत्येक किला, प्रत्येक संग्रहालय और प्रत्येक पुरावशेष भी उतना ही सुरक्षित होगा, जितनी मेहनत से उन्हें विदेशों से वापस लाया जा रहा है। यदि एक हाथ से हम अपनी विरासत वापस ला रहे हैं और दूसरे हाथ से उसे लापरवाही के कारण खोते जा रहे हैं, तो यह निश्‍चित तौर पर राष्ट्रीय चेतना के सामने खड़ा सबसे बड़ा आज का मुख्‍य प्रश्न है?

केजरीवाल की नई ‘क्रांतिकारी’ मांग – सोनम वांगचुक को बनाओ शिक्षा मंत्री, पंजाब को भूल जाओ!

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दिल्ली: आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर देश को चौंकाने वाली मांग रख दी है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि सोनम वांगचुक को धर्मेंद्र प्रधान की जगह देश का शिक्षा मंत्री बना दिया जाए। केजरीवाल साहब का तर्क है कि सोनम जी लद्दाख के मास्टर प्लानर हैं, वे शिक्षा में क्रांति ला देंगे।

लेकिन दिल्ली से पंजाब की ओर रुख करें तो तस्वीर कुछ और ही है। पंजाब, जहां आप की सरकार है, शिक्षा व्यवस्था की हालत बेहद खस्ता है। सरकारी स्कूलों में शिक्षक कम, बुनियादी सुविधाएं नदारद, ड्रॉपआउट रेट ऊंचा और युवा बेरोजगारी चरम पर। केजरीवाल जी जब पंजाब में सत्ता में आए थे तो वादा किया था – “मॉडल स्कूल, मॉडल शिक्षा”। आज स्थिति यह है कि पंजाब के कई जिलों में स्कूल बंद हो रहे हैं या बस नाम को चल रहे हैं।

कानून व्यवस्था की बात करें तो पंजाब में अपराध, नशीले पदार्थों का तस्करी और युवाओं का पलायन रोजमर्रा की खबर बन चुका है। जहां एक तरफ केजरीवाल जी केंद्र पर मांग कर रहे हैं, वहीं अपनी सरकार वाले राज्य में ‘डिलिवरी’ का हाल यह है कि जनता सड़कों पर उतर रही है।

सवाल उठता है – अगर केजरीवाल जी को सोनम वांगचुक पर इतना भरोसा है तो उन्हें पंजाब का मुख्यमंत्री क्यों नहीं बना देते? सोनम जी पंजाब आकर शिक्षा, रोजगार और पर्यावरण में अपरिवर्तनकारी काम कर दिखाएं। अगर पंजाब में उनका मॉडल सफल हो गया तो अगले चुनाव में आप के लिए एक उम्मीद तो जगेगी, क्योंकि फिलहाल तो हार लगभग तय नजर आ रही है।

केजरीवाल जी, सड़क से मांग करते-करते, आप सत्ता के मंच तक आ गए, अब मांगना छोड़िए और डिलिवरी करके दिखाइए। पंजाब में आपकी सरकार है।  यहां-वहां मांगना छोड़िए, पंजाब की गद्दी सोनम जी को सौंप दीजिए। इससे देश भर के युवाओं को सकारात्मक संदेश जाएगा कि आप सिर्फ नौटंकी नहीं, बल्कि जमीन पर काम करने की काबिलियत भी रखती है। सोनम जी भी साबित कर पाएंगे कि वे जो कहते हैं, उसे कर भी सकते हैं।

इसके साथ ही आप के पूर्व 5-7 कर्मचारियों को, जिन्हें केजरीवाल जी ने जंतर मंतर के नए काम पर लगाया है, आईटी सेल में वापस बहाल कर लें। वे सोशल मीडिया और व्हाट्सएप संभालने में माहिर हैं। सोनम की पंजाब सरकार में भी ये काम जारी रख सकते हैं।

कुल मिलाकर, केजरीवाल जी, अब ‘मांग’ वाली राजनीति से ऊपर उठकर ‘काम’ वाली राजनीति दिखाइए। पंजाब इंतजार कर रहा है।

जब सड़कों पर इंसानों से ज़्यादा जानवरों का राज हो जाए

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लखनऊ । सुबह की पहली किरण ताजमहल पर पड़ने से पहले ही आगरा के लोग अपने घरों से निकलते हैं। लेकिन अब उनकी पहली चिंता ट्रैफिक नहीं, बल्कि सड़क पर खड़े या दौड़ते जानवर होते हैं। दयालबाग, कमला नगर, शाहगंज, ताजगंज, सिकंदरा, बल्केश्वर और ट्रांस यमुना कॉलोनियों तक एक जैसा मंजर दिखाई देता है।

कहीं आवारा कुत्तों के झुंड राहगीरों का पीछा करते हैं। कहीं बंदर छतों और बालकनियों पर नज़र गड़ाए बैठे रहते हैं। यमुना किनारा रोड पर भैंसों और गायों के झुंड सड़क को अपना चारागाह समझ लेते हैं। ऐसा लगता है मानो शहर की सड़कें अब इंसानों की नहीं रहीं।

ताजमहल के कारण दुनिया भर में पहचान रखने वाले इस शहर के लिए यह सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर नागरिक संकट बन चुका है। अस्पतालों, वाहन चालकों, स्कूली बच्चों और सुबह टहलने वालों के लिए हर दिन एक नई परीक्षा बन गया है।

डराने वाले आंकड़े

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि आगरा में 90 हजार से अधिक आवारा कुत्ते और लगभग 60 हजार पालतू कुत्ते हैं। हर दिन करीब 300 लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं। यह संख्या कई बड़े महानगरों से भी अधिक है।

दिल्ली जैसे विशाल शहर में छह महीने के दौरान जितने डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए थे, आगरा में लगभग उतने मामले कुछ ही दिनों में सामने आ जाते हैं। यह तुलना बताती है कि ताज नगरी की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है।

गांधी नगर क्षेत्र के एक वरिष्ठ चिकित्सक बताते हैं कि उनके पास आने वाले अधिकांश पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं। कई बच्चे खेलते समय या कुत्तों को खाना खिलाते हुए घायल हो जाते हैं। निजी क्लीनिकों में ही रोज़ सौ से अधिक मरीज पहुंचते हैं। जिला अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर अलग से भारी दबाव रहता है।

नगर निगम भी बेबस
नगर निगम के अधिकारी मानते हैं कि मौजूदा संसाधनों से इतनी बड़ी संख्या में कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करना आसान नहीं है। अभियान चल रहे हैं, लेकिन उनकी रफ्तार समस्या के मुकाबले बहुत धीमी है।

इसी कारण अब पूरे शहर में बड़े स्तर पर नसबंदी और वैक्सीनेशन का काम किसी निजी एजेंसी को सौंपने की योजना बनाई जा रही है। लेकिन लोगों का सवाल है कि जब वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब भी हालात क्यों नहीं बदले?

सिर्फ कुत्ते ही नहीं

मुसीबत केवल आवारा कुत्तों तक सीमित नहीं है। मंदिरों, बाजारों और ताजमहल के आसपास बंदरों का आतंक लगातार बढ़ रहा है। वे बच्चों के हाथ से टिफिन छीन लेते हैं, बुजुर्गों के चश्मे और मोबाइल उठा ले जाते हैं। कई पर्यटक भी उनका शिकार बन चुके हैं।

उधर यमुना किनारा रोड पर शाम के समय नदी से लौटते भैंसों और गायों के झुंड पूरी सड़क घेर लेते हैं। दोपहिया और चारपहिया वाहन किसी तरह रास्ता निकालते हैं। कई बार दुर्घटनाएं होते-होते बचती हैं।

रात का समय सबसे खतरनाक होता है। अंधेरे में काले रंग के मवेशी सड़क पर दिखाई नहीं देते। बाइक सवार अक्सर उनसे टकरा जाते हैं। कई हादसों में लोगों को गंभीर चोटें भी आई हैं।

बदल गई है शहर की दिनचर्या
जो पार्क कभी बुजुर्गों की हंसी और बच्चों की खिलखिलाहट से गूंजते थे, वहां अब डर का माहौल है। सुबह की सैर करने वाले लोग बताते हैं कि कुत्तों के झुंड उनका पीछा करते हैं। कई लोगों ने अपनी सैर का समय घटा दिया है।

माता-पिता अब छोटे बच्चों को अकेले बाहर खेलने भेजने से घबराते हैं। स्कूल जाते समय भी बच्चों के साथ किसी बड़े का होना ज़रूरी समझा जाने लगा है।

देशभर की चिंता, आगरा की चुनौती

देश के कई शहरों में आवारा जानवरों की समस्या बढ़ रही है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा कि नागरिकों को बिना भय के सार्वजनिक स्थानों पर चलने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने भीड़भाड़ वाले इलाकों से आवारा कुत्तों को हटाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी तय की।

अब ठोस कार्रवाई की जरूरत

रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि आगरा केवल स्थानीय लोगों का शहर नहीं, बल्कि करोड़ों पर्यटकों की मंज़िल भी है। यदि सड़कों पर असुरक्षा का माहौल बना रहेगा तो शहर की छवि और पर्यटन, दोनों प्रभावित होंगे।

समाधान आधे-अधूरे उपायों से नहीं निकलेगा। बड़े पैमाने पर नसबंदी और टीकाकरण, छोड़े गए मवेशियों के पुनर्वास, बंदरों के वैज्ञानिक प्रबंधन और लापरवाह पशु मालिकों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है।

जब तक ऐसा नहीं होता, ताज नगरी के लोग हर सुबह घर से निकलते समय पहले सड़क पर नज़र डालेंगे और फिर अपने कदम आगे बढ़ाएंगे। किसी भी सभ्य शहर के लिए इससे बड़ी बदकिस्मती और क्या हो सकती है?

CEC and COL-CEMCA Launch Six-Month Research Incubation Programme to Boost Digital Education Research in India

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New Delhi : The Consortium for Educational Communication (CEC) and the Commonwealth Educational Media Centre for Asia (COL-CEMCA) today inaugurated a two-day National Pre-Research Workshop titled “Research Incubation and Advanced Training: Enhancing Academic Research in the Digital Era” at the CEC campus here, marking the beginning of an ambitious six-month research incubation programme aimed at strengthening digital education across Indian higher education institutions.
The workshop has brought together a select group of faculty members and researchers from CEC’s network of Educational Multimedia Research Centres (EMRCs) spread across the country. Over the next six months, participants will receive intensive mentoring to transform initial research ideas into robust, implementation-ready projects. The focus areas include digital pedagogy, educational technology, learner engagement, digital assessment, educational broadcasting, and online learning ecosystems, all aligned with national priorities such as the National Education Policy (NEP) 2020, SWAYAM, and SWAYAM Prabha platforms.
The workshop has brought together a select group of faculty members and researchers from CEC’s network of Educational Multimedia Research Centres (EMRCs) spread across the country. Over the next six months, participants will receive intensive mentoring to transform initial research ideas into robust, implementation-ready projects. The focus areas include digital pedagogy, educational technology, learner engagement, digital assessment, educational broadcasting, and online learning ecosystems, all aligned with national priorities such as the National Education Policy (NEP) 2020, SWAYAM, and SWAYAM Prabha platforms.
Manhas emphasised that CEC’s research projects would evaluate learners’ experiences, assess the effectiveness of existing digital resources, and generate evidence-based insights. “Adaptability, innovation, and inclusivity must remain the guiding principles as we advance the objectives of NEP 2020 while harnessing the potential of emerging technologies to create a more accessible, equitable, inclusive and future-ready higher education system,” he added.
Dr. B. Shadrach, Director of COL-CEMCA, described the collaboration as pathbreaking for both EMRCs and the global academic community. “Our mission through this initiative is closely aligned with that of CEC, guided by three strategic goals: orienting research towards the vision of NEP 2020 and global best practices; enhancing learning design and research competencies for technology-enabled education across disciplines; and motivating faculty members to view research as a collaborative, community-building endeavour,” he stated. “Learning should lead to skill and competency development that would enhance the workplace that drives innovation and academic excellence.”
The day’s proceedings began with a session on Idea Generation and Research Formulation led by Dr. Parvinder Kour, Project Manager at CEC. Participants explored strategies for identifying research problems, formulating sharp research questions, and aligning their work with national and international priorities. This was followed by the formal inauguration and an overview of the workshop structure.
A key highlight was the Research Proposal Pitch Session, where participants presented their research problems, objectives, methodology, and expected outcomes. The session evolved into a dynamic peer-review discussion, with constructive feedback helping refine ideas in real time. Later, Dr. Mohd Mamur Ali, Assistant Professor at Jamia Millia Islamia’s Department of Teacher Training and Non-formal Education, conducted sessions on refining research through sampling and design techniques, the role of AI and quality assurance in digital education research, and approaches to open, inclusive, and technology-enabled education.
The partnership leverages CEC’s extensive national network and expertise in educational communication with COL-CEMCA’s international experience in research capacity building, technology-enabled learning, and open educational practices. The two-day workshop will conclude on July 16 with sessions on research methodology, academic writing, scholarly publishing, and a revision and incubation studio session. This will officially kickstart the six-month research initiative.
CEC, an Inter-University Centre of the University Grants Commission (UGC), promotes quality higher education through electronic media and digital technologies via its network of EMRCs and supports research and publication at undergraduate and postgraduate levels. COL-CEMCA, a Commonwealth of Learning institution, focuses on advancing open, distance, and technology-enabled learning to support sustainable development across Commonwealth member states in Asia.
This collaborative effort is expected to produce high-impact research that not only strengthens India’s digital learning infrastructure but also contributes valuable insights to the global discourse on technology-enhanced education. By fostering evidence-based innovations, the programme aims to make higher education more inclusive and responsive to the evolving needs of learners and educators in the digital age.

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