सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की परिकल्पना इन्हीं की थी

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भोपाल । भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कुछ ऐसी दूरदर्शी विभूतियाँ रहीं हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के लिये सार्वजनिक संघर्ष किया, अनेक बार जेल गये और इसके साथ ही सांस्कृतिक मूल्यों की पुर्नप्रतिष्ठा का अभियान भी चलाया । ऐसे ही महान स्वाधीनता सेनानी थे श्री के एम मुंशी ।
उनका पूरा नाम कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी था । वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, राजनेता, गुजराती एवं हिन्दी के ख्यातनाम साहित्यकार और शिक्षाविद थे। उन्होने भारतीय विद्या भवन की स्थापना की। सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की कल्पना सबसे पहले इन्हीं ने की थी । सरदार वल्लभभाई पटेल ने इन्ही को आगे करके हैदराबाद रियासत को भारतीय गणतंत्र में विलय करने की रणनीति का क्रियान्वयन किया था ।
इनका जन्म 30 दिसंबर 1887 को गुजरात के भड़ौच क्षेत्र में हुआ था । ये बचपन में बहुत आकर्षक और चंचल थे । इसलिये इनका नाम घनश्याम रखा । लेकिन माँ प्यार से इन्हें कन्हैया पुकारती थीं इनके पिता माणिकलाल व्यास अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे । यद्यपि परिवार भार्गव ब्राह्मण था। लेकिन उच्च शिक्षित पिता कुछ समय कोर्ट में मुंशी रहे और यही उनकी पहचान बनी । वे “व्यास” के स्थान पर मुंशी कहलाए और यही उनका उपनाम हो गया । और जब घनश्याम बड़े हुये तो उन्होंने माँ के द्वारा दिया गया कन्हैयालाल के साथ पिता का नाम जोड़कर कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी स्वीकार किया और यही उनकी पहचान बनी । माता बहुत आध्यात्मिक और धार्मिक विचारों की थीं। प्रतिदिन धार्मिक गीत गाया करतीं थीं। आसपास कहीं भी धार्मिक आयोजन होते तो वे अपने साथ इनको लेकर जातीं थीं। शिशुवय से मिली यही धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा के एम मुंशी जी के जीवन की चेतना बनी । 1900 में उनका विवाह अतिलक्ष्मी पाठक से हुआ । विवाह के बाद आधुनिक शिक्षा बड़ौदा भेजे गये।1907 में अंग्रेजी विषय में प्रथम श्रेणी में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की । महाविद्यालयीन शिक्षा में उन्हें अध्यापक के रूप में अरविंद घोष मिले । अरविन्द घोष क्राँतिकारी थे । वे शिक्षा के साथ युवाओं में राष्ट्र चेतना जगाने के अभियान में जुटे थे । अरविन्द घोष अलीपुर बम काण्ड में जेल गये थे बाद में सन्यास लेकर आध्यात्मिक और राष्ट्र साधना में लीन हो गये और महर्षि अरविन्द के नाम से प्रसिद्ध हुये । इन्हीं के सान्निध्य युवा कन्हैयालाल मुंशी के मन में स्वत्व एवं स्वाभिमान का भाव प्रबल हुआ और अंग्रेजी शासन से मुक्ति के संघर्ष से जुड़ गये । अरविन्द जी के सानिध्य वे बम बनाना भी सीख गये थे । स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण कर वकालत पढ़ने मुम्बई पहुँचे। 1910 में वकालत पास की और बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे । उन्होंने हर परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी । यह उनकी कुशाग्रता थी कि कम समय में ही उनकी गणना मुम्बई उच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित वकीलों में होने लगी थी । समय के साथ वे ऐनी बेसेन्ट के संपर्क में आये और उनकी संस्था होमरूल से जुड़ गये ।
आरंभिक कुछ वर्ष उनका भड़ौच और बड़ौदा आना जाना रहा । फिर 1914 में मुम्बई को उन्होंने अपना स्थाई निवास बना लिया । 1915 में होमरूल आँदोलन के सचिव बने। 1917 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन के भी सचिव बने। 1920 में अहमदाबाद में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया और कांग्रेस से जुड़ गए। काँग्रेस में उनकी गाँधीजी, सरदार वल्लभभाई पटेल, भूलाभाई देसाई आदि विभिन्न नेताओं से निकटता भी बढ़ी। 1921 के असहयोग आँदोलन में हिस्सा लिया और गिरफ्तार हुये । 1924 में पत्नि का निधन हो गया और 1926 में उन्होंने दूसरा विवाह किया ।
1927 में बॉम्बे विधान सभा के लिए चुने गए लेकिन त्यागपत्र देकर बारडोली सत्याग्रह में शामिल हुये, जेल गये। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया गिरफ्तार हुये और छह माह की सजा हुई । 1932 के सत्याग्रह के दौरान फिर गिरफ्तार हुये और दो साल की सजा हुई । उनका जेल जीवन लिखने और पढ़ने में ही बीतता । लगातार आँदोलनों और प्रभावशाली बौद्धिक क्षमता के चलते कांग्रेस में उनका विशिष्ट स्थान बना और 1934 में कांग्रेस संसदीय बोर्ड के सचिव बने। 1937 के बॉम्बे प्रेसीडेंसी चुनाव में पुनः निर्वाचित हुये और बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गृह मंत्री बने । उन्होंने 1938 में एक शैक्षिक ट्रस्ट, भारतीय विद्या भवन की स्थापना की । जिसमें साहित्य और सांस्कृतिक शोध प्रमुख कार्य थे ।

काँग्रेस से मतभेद

श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी के कांग्रेस में मतभेद 1934 से आरंभ हुये । वे समान नागरिक अधिकारके पक्षधरथे लेकिन काँग्रेस लोकल असेंबलियों के चुनाव में मुस्लिम लीग को विशिष्ट सुविधा देने पर सहमत हो गई थी। मुंशीजी ने इसका विरोध किया था पर उनकी बात नहीं मानी गई। इन्हीं दिनों पाकिस्तान की मांग के समर्थन में मुस्लिम लीग ने सशस्त्र गार्ड तैयार करके हिंसक गतिविधियाँ आरंभ कीं । जिन असेंबलियों मुस्लिम लीग प्रभावी थी वहाँ ये हिंसक गतिविधि बहुत बढ़ी। तब मुंशी जी इन हिंसक तत्वों से उनकी शैली में ही उत्तर देकर राष्ट्र और समाज रक्षा के पक्ष में थे। उनकी सोच साम्प्रदायिक नहीं थी वे मानते ​​थे कि हिंदुओं और मुसलमानों का भविष्य शाँति और “अखंड भारत” में ही निहित है । लेकिन मुस्लिम लीग पूरे देश को वैमनस्य और हिंसा में धकेल रही है । जिससे हिन्दु और मुसलमान दोनों को शक्ति से इन तत्वों से निबटना चाहिए। पर काँग्रेस में उनके मत को समर्थन न मिला उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी । लेकिन गाँधीजी और सरदार वल्लभभाई पटेल से उनका व्यक्तिगत संपर्क बना रहा । अंततः गांधी जी के आग्रह पर 1946 में कांग्रेस से पुनः जुड़ गये और संविधान सभा के सदस्य बने । श्री के एम मुंशी उस ध्वज समिति में भी रहे जिसमें भारत के ध्वज का चयन किया था । वे श्री भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता वाली उस समिति के भी सदस्य थे जिसमें संविधान का मसौदा तैयार किया गया था।

हैदराबाद विलय और सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में भूमिका

भारत की स्वतंत्रता के बाद श्री के एम मुंशी की महत्वपूर्ण भूमिका हैदराबाद रियासत के भारत विलय और सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में रही । वे सरदार वल्लभभाई पटेल के अति निकट और विश्वसनीय थे । रियासतों के भारत में विलीनीकरण के लिये सरदार पटेल की हैदराबाद और जूनागढ़ यात्रा में एनवी गाडगिल और के एम मुंशी साथ थे । सरदार पटेल ने श्रीमुंशी को हैदराबाद रियासत के लिए राजनयिक दूत और व्यापार एजेंट नियुक्त किया गया था । इस रूप में रहकर ही श्री मुंशी ने वहाँ सैन्य कार्रवाई का वातावरण बनाया । सरदार पटेल के जूनागढ़ में भी श्री मुंशी साथ रहे । सरदार पटेल ने जूनागढ़ में ही सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की थी । इसका पूरा मसौदा श्री के एम मुंशी ने ही तैयार किया था । पुनर्निर्माण पूरा होने से पहले ही सरदार पटेल का निधन हो गया था । लेकिन मुंशीजी ने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य जारी रखा ।
1950 में वे केंद्रीय खाद्य और कृषि मंत्री थे । पर्यावरण समृद्धि की दृष्टि से वन क्षेत्र बढ़ाने की दृष्टि से उन्होंने ही वन महोत्सव की शुरुआत की थी। तब से जुलाई माह में हर वर्ष वृक्षारोपण उत्सव और वन महोत्सव मनाया जाता है ।
वे 1952 से 1957 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे । उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के साथ स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की । वे समान नागरिक संहिता और अखंड भारत के समर्थक थे ।
अगस्त 1964 में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना के लिए आयोजित बैठक की अध्यक्षता श्री के एम मुंशी ने ही की थी । इसी वर्ष उन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया और अपना शेष जीवन अध्ययन और लेखन में ही व्यतीत किया । और 8 फरवरी 1971 को उन्होंने संसार से विदा ले ली ।

साहित्य रचना

वे स्वतंत्रता के बाद भारत के उसी साँस्कृतिक स्वरूप की कल्पना करते थे जो अतीत में रहा है । इसीलिए स्वतंत्रता आँदोलन के साथ वे भाषा, साहित्य और साँस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे । इसी दिशा में उनका लेखन रहा । उन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी और गुजराती तीन भाषाओं में अपने साहित्य की रचना की । वे राष्ट्र और समाज की उन्नति के लिये शक्ति और शास्त्र दोनों के समर्थक थे । इसीलिए उन्होंने भगवान परशुराम जी पर एक उपन्यास लिखा और अन्य साहित्य की रचना भी की । उनके रचना संसार में गुजरातनो नाथ, पाटणनी प्रभुता, पृथिवीवल्लभ, कृष्णावतार (सात खंडों में), राजाधिराज,जय सोमनाथ, भगवान कौटिल्य, भग्न पादुका, लोपामुद्रा, लोमहर्षिणी, भगवान परशुराम, वेरनी वसुलात, कोनो वांक, स्वप्नद्रष्टा, तपस्विनी, अडधे रस्ते, सीधां चढाण, स्वप्नसिद्धिनी शोधमां, पुरन्दर पराजय, अविभक्त आत्मा तर्पण, पुत्र समोवडी, वावा शेठनुं स्वातंत्र्य, बे खराब जण, आज्ञांकित, ध्रुवसंवामिनीदेवी, स्नेहसंभ्रम, डॉ॰ मधुरिका, काकानी शशी, छीए ते ज ठीक,ब्रह्मचर्याश्रम, मारी बिनजवाबदार कहाणी और गुजरातनी कीर्ति गाथा प्रमुख हैं।

चिनाब पर भारत का निर्णायक कदम, पाकिस्तान में मचा राजनीतिक भूचाल

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । दक्षिण एशिया की राजनीति में जल आज प्राकृतिक संसाधन से अधिक रणनीति, संप्रभुता और सुरक्षा का अहम हथियार बन चुका है। चिनाब नदी पर भारत द्वारा उठाया गया ताजा कदम इसी बदले हुए भू-राजनीतिक यथार्थ का सशक्त उदाहरण है। दुलहस्ती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के दूसरे चरण को जैसे ही भारत सरकार की पर्यावरणीय समिति से मंजूरी मिली, इस फैसले की गूंज सरहद पार पाकिस्तान तक सुनाई देने लगी। वहां की राजनीति में खलबली मच गई, आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए और एक बार फिर सिंधु जल समझौता चर्चा के केंद्र में आ गया है। भारत के लिए यह ऊर्जा आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय हित का सवाल है, जबकि पाकिस्तान इसे अपने अस्तित्व और जल अधिकारों से जोड़कर देख रहा है।

भारत सरकार की पर्यावरण विभाग की विशेषज्ञ समिति ने 27 दिसम्‍बर को जम्मू-कश्मीर स्थित दुलहस्ती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के स्टेज-2 को औपचारिक स्वीकृति प्रदान की है। वस्‍तुत: यह मंजूरी मिलते ही पाकिस्तान की सियासत में बेचैनी साफ दिखाई देने लगी। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की वरिष्ठ सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शेरी रहमान ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारत पर “पानी को हथियार बनाने” का संगीन आरोप लगाया। उनके अनुसार, यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है और अंतरराष्ट्रीय समझौतों की भावना के विरुद्ध है।

शेरी रहमान का दावा है कि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुए इस समझौते के तहत पाकिस्तान को चिनाब, झेलम और सिंधु नदियों के जल पर अधिकार प्राप्त हैं, जबकि भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। रहमान का आरोप है कि भारत ने एकतरफा तरीके से सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिया है, जो न तो कानूनी है और न ही नैतिक रूप से स्वीकार्य। पाकिस्तान की आपत्ति केवल दुलहस्ती परियोजना तक सीमित नहीं है। शेरी रहमान ने भारत द्वारा चिनाब घाटी में संचालित या प्रस्तावित कई अन्य परियोजनाओं को भी विवादास्पद करार दिया। उन्होंने सावलकोट, रेटल, बड़सर, पाकल डुल, क्वार, कीरू और किरथाई जैसी परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि भारत सुनियोजित ढंग से इन सभी पर काम तेज कर रहा है। पाकिस्तान का तर्क है कि इन परियोजनाओं के कारण भविष्य में उसके हिस्से के पानी में कटौती हो सकती है, जिससे उसकी कृषि, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

दूसरी ओर भारत का दृष्टिकोण इससे एकदम अलग और स्पष्ट है। भारत बार-बार यह दोहराता रहा है कि सिंधु जल समझौते में उसे पश्चिमी नदियों पर वैध अधिकार प्राप्‍त हैं। भारत इन नदियों पर रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं स्थापित कर सकता है। दुलहस्ती परियोजना इसी श्रेणी में आती है, जिसका उद्देश्य जल संरक्षण से अधिक स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन है। वहीं इस पूरे घटनाक्रम को हालिया सुरक्षा परिदृश्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

इसी वर्ष 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले ने भारत-पाक संबंधों में पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर दिया। इस हमले में 22 निर्दोष पर्यटकों की धर्म पूछकर हत्या कर दी गई थी। जांच एजेंसियों की रिपोर्ट में पाकिस्तानी आतंकवादियों की संलिप्तता सामने आने के बाद भारत सरकार ने बेहद सख्त रुख अपनाया। इसके बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को स्थगित करने का फैसला लिया और पाकिस्तान के साथ जल प्रवाह से जुड़ी तकनीकी जानकारियां साझा करना बंद कर दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संदर्भ में कई बार दो टूक शब्दों में कह चुके हैं कि “पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते।” यह कथन अब केवल राजनीतिक बयान नहीं माना जाना चाहिए, यह तो भारत की नई रणनीतिक सोच का प्रतीक बन चुका है। भारत का मानना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से संचालित आतंकवाद पर ठोस और निर्णायक कार्रवाई नहीं करता, तब तक किसी भी प्रकार के सहयोग या संवाद का आधार नहीं बन सकता।

इसके साथ एक तथ्‍य यह भी है कि दुलहस्ती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के दूसरे चरण के तहत लगभग 260 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन की योजना है। इससे जम्मू-कश्मीर में ऊर्जा उपलब्धता को मजबूती मिलेगी और देश की बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। यह परियोजना पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ ही स्थानीय विकास, रोजगार सृजन और बुनियादी ढांचे को भी गति देने वाली है।

इसके साथ ही भारत सरकार चिनाब नदी पर प्रस्तावित सावलकोट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को लेकर भी गंभीर तैयारी कर रही है। करीब 1856 मेगावाट क्षमता वाली यह परियोजना पूरी होने पर उत्तरी भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शुमार होगी। भारत का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय क्षेत्र जलविद्युत की अपार संभावनाओं से भरे हुए हैं और इनका उपयोग राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के लिए किया जाना चाहिए।

अंततः चिनाब नदी पर भारत का यह कदम कहना होगा कि तकनीकी या ऊर्जा परियोजना भर नहीं है, यह तो बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का संकेतक है। पाकिस्तान की बौखलाहट और आरोपों के बावजूद भारत यह संदेश देने में सफल रहा है कि अब राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और संप्रभु अधिकारों पर कोई समझौता नहीं होगा। फिलहाल मोदी सरकार अपने कहे पर अडिगता से खड़ी हुई नजर आ रही है। निश्‍चत ही इस निर्णय से प्रत्‍येक भारतवासी अपनी सरकार पर गौरव महसूस कर सकता है।

2026 में परंपरागत ज्ञान को मिलेगी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की ख़ामोश ताक़त

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बृज खंडेलवाल

दिल्ली । की आख़िरी सुबह है। सर्दियों की धुंध अब भी इंडस्ट्रियल एरिया पर छाई हुई है। जगन्नाथ अपनी छोटी-सी फैक्ट्री का शटर उठाते हैं। अंदर तेल, लोहे और पसीने की जानी-पहचानी गंध फैली है। एक तरफ़ दफ़्तर में कंप्यूटर और डिस्प्ले बोर्ड लगे हैं। घर पर उनकी पत्नी रजनी ने चाय का पानी चढ़ा दिया है। टिफ़िन बाँधते हुए, बच्चों के स्कूल के संदेश देखते हुए और बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल करते हुए वह धीमी आवाज़ में चल रही ख़बरें सुन रही है। अर्थव्यवस्था, तकनीक, एआई और भविष्य जैसे शब्द कमरे में तैरते हुए बड़े अच्छे लगते हैं।

इधर 85 साल के दादाजी मोबाइल पर दोस्त से राजनीति पर बहस कर रहे हैं, जबकि उनकी दंतहीन पत्नी सलीके से गोलियाँ और कैप्सूल गिनकर रख रही हैं। बेटी राधिका और बेटा नवीन डाइनिंग टेबल पर न्यू ईयर पार्टी की तैयारी कर रहे हैं।

यही है आज का शहरी भारत , सोच, परिवार, आस्था और परंपरा में गहराई से रचा-बसा देश, जो ख़ामोशी से एल्गोरिद्म, डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से चलने वाले भविष्य की ओर बढ़ रहा है।

जगन्नाथ जैसे परिवारों के लिए तरक़्क़ी कोई बड़ी हेडलाइन नहीं है। वह छोटे-छोटे बदलावों में महसूस होती है , मोबाइल से तुरंत भुगतान, ऑनलाइन डॉक्टर की सलाह, सरकारी स्कूल में बच्चे का कोडिंग सीखना। युद्धों, वैश्विक सुस्ती और जलवायु संकट की चिंता के बावजूद, 2025 में भारत की अर्थव्यवस्था ने चौंकाने वाली मज़बूती दिखाई है। दुकानें आबाद हैं, हाइवे फैल रहे हैं, फैक्ट्रियाँ गूंज रही हैं। घरेलू ख़पत मज़बूत है। छोटे कस्बों तक बुनियादी ढांचे के काम दिख रहे हैं।

आज के युवा नारे नहीं, हुनर चाहते हैं। आबादी का आधे से ज़्यादा हिस्सा 35 साल से कम उम्र का है। रोज़गार और मौक़ों का दबाव बहुत बड़ा है, लेकिन यही भारत की सबसे बड़ी ताक़त भी है। आधार और यूपीआई जैसे डिजिटल पब्लिक सिस्टम ने रोज़मर्रा की ज़िंदगी को ख़ामोशी से बदल दिया है । सब्ज़ी बेचने वाला डिजिटल पेमेंट लेता है, पेंशन सीधे गाँव के बुज़ुर्ग तक पहुँचती है, सब्सिडी रास्ते में नहीं गुम होती। जिस देश में कभी फ़ाइलों और बिचौलियों का बोलबाला था, उसके लिए यह कोई छोटी क्रांति नहीं है।

राजनीति में भी निरंतरता और स्थिरता की चाह दिखती है। बड़े राज्यों में हालिया चुनाव नतीजों ने बुनियादी ढांचे, कल्याण योजनाओं और आर्थिक विकास पर केंद्रित लंबी नीतियों में लोगों का भरोसा मज़बूत किया है। स्थिरता निवेशकों को भरोसा देती है और आम नागरिकों को अपनी ज़िंदगी की योजना बनाने का सुकून।

फिर भी, उम्मीद के नीचे कुछ जिद्दी चुनौतियाँ हैं । रोज़गार उतनी तेज़ी से नहीं बढ़े हैं, असमानता चुभती है, पानी की कमी, प्रदूषित नदियाँ और बढ़ता तापमान किसान और शहरवासी दोनों को परेशान करता है। जाति और लैंगिक भेद जैसे पुराने सामाजिक बँटवारे अब भी संभावनाओं को सीमित करते हैं। बाहर की दुनिया में भारत को बढ़ते तनावों के बीच रिश्तों और प्रतिद्वंद्विताओं का संतुलन साधना है।

यहीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई कहानी में प्रवेश करती है —। न विज्ञान-कथा की तरह, न किसी ख़तरे के रूप में, बल्कि एक ख़ामोश मददगार के तौर पर। समझदारी से इस्तेमाल हो, तो एआई भारत को बिना सामाजिक ताने-बाने को तोड़े आगे छलांग लगाने का मौक़ा दे सकती है।

शिक्षा में एआई, रट्टा-प्रथा की जकड़न तोड़ रही है। ग्रामीण स्कूल का बच्चा अब व्यक्तिगत पाठ, अनुकूल परीक्षाएँ और वर्चुअल ट्यूटर पा सकता है। भाषा की दीवारें टूट रही हैं। सीखना अब याद करने से ज़्यादा समझने पर आधारित हो रहा है । यह सिर्फ़ सुधार नहीं, एक आज़ादी है।

स्वास्थ्य सेवा में भी एक ख़ामोश क्रांति चल रही है। एआई आधारित जाँच से बीमारियाँ जल्दी पकड़ में आती हैं। टेलीमेडिसिन उन गाँवों तक पहुँच रही है, जहाँ विशेषज्ञ कभी नहीं पहुँचे। जिन परिवारों ने दूरी या ख़र्च के कारण इलाज टाल दिया था, उनके लिए यह जीवन और क्षति के बीच का अंतर बन सकता है।

खेती में, जहाँ परंपरा सबसे गहरी है, एआई अपनी क़ीमत साबित कर रही है। मौसम का अनुमान, मिट्टी का विश्लेषण और फसल योजना के औज़ार जोखिम घटाते हैं और आमदनी बढ़ाते हैं। ज़मीन की पुरानी समझ बादलों में मौजूद नई बुद्धिमत्ता से मिलती है। साथ मिलकर, वे ग्रामीण आजीविका को इज़्ज़त और स्थिरता का वादा देती हैं।

शासन भी बदल रहा है। प्रणालियाँ तेज़, पारदर्शी और व्यक्तिगत मनमानी पर कम निर्भर हो रही हैं। तकनीक मानवीय मूल्यों को नहीं हटाती, लेकिन मानवीय पक्षपात को कम कर सकती है। ख़ासकर महिलाएँ लाभ में हैं, क्योंकि दूरस्थ काम और डिजिटल उद्यमिता पुराने बंधनों को सीधे टकराव के बिना चुनौती देती हैं।

जगन्नाथ की फैक्ट्री में लौटें तो छोटे बदलाव साफ़ दिखते हैं । स्टॉक डिजिटल तरीके से ट्रैक होता है, मशीनें कम बर्बादी करती हैं, नए बाज़ारों से ऑर्डर आते हैं। उनके बच्चे ऐसे करियर की बात करते हैं जिनकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। रजनी मोबाइल से बचत और बीमा आत्मविश्वास के साथ संभालती हैं। परंपरा बनी रहती है । बड़ों का सम्मान, पारिवारिक भोजन, सुबह की प्रार्थना। लेकिन भविष्य धीरे से दस्तक दे रहा है, दरवाज़ा तोड़ नहीं रहा।

यही भारत की असली ताक़त है । बदलाव को अपनाने की क्षमता, बिना हिचकोले खाए।

भारत के उत्थान की कहानी सिर्फ़ बोर्डरूम में नहीं लिखी जाएगी; वह घरों, खेतों, कक्षाओं और फैक्ट्रियों में लिखी जाएगी । ख़ामोशी से, लगातार, उम्मीद के साथ।

सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की परिकल्पना इन्हीं की थी

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दिल्ली : भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कुछ ऐसी दूरदर्शी विभूतियाँ रहीं हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के लिये सार्वजनिक संघर्ष किया, अनेक बार जेल गये और इसके साथ ही सांस्कृतिक मूल्यों की पुर्नप्रतिष्ठा का अभियान भी चलाया । ऐसे ही महान स्वाधीनता सेनानी थे श्री के एम मुंशी ।

उनका पूरा नाम कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी था । वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, राजनेता, गुजराती एवं हिन्दी के ख्यातनाम साहित्यकार और शिक्षाविद थे। उन्होने भारतीय विद्या भवन की स्थापना की। सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की कल्पना सबसे पहले इन्हीं ने की थी । सरदार वल्लभभाई पटेल ने इन्ही को आगे करके हैदराबाद रियासत को भारतीय गणतंत्र में विलय करने की रणनीति का क्रियान्वयन किया था ।

इनका जन्म 30 दिसंबर 1887 को गुजरात के भड़ौच क्षेत्र में हुआ था । ये बचपन में बहुत आकर्षक और चंचल थे । इसलिये इनका नाम घनश्याम रखा । लेकिन माँ प्यार से इन्हें कन्हैया पुकारती थीं इनके पिता माणिकलाल व्यास अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे । यद्यपि परिवार भार्गव ब्राह्मण था। लेकिन उच्च शिक्षित पिता कुछ समय कोर्ट में मुंशी रहे और यही उनकी पहचान बनी । वे “व्यास” के स्थान पर मुंशी कहलाए और यही उनका उपनाम हो गया । और जब घनश्याम बड़े हुये तो उन्होंने माँ के द्वारा दिया गया कन्हैयालाल के साथ पिता का नाम जोड़कर कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी स्वीकार किया और यही उनकी पहचान बनी । माता बहुत आध्यात्मिक और धार्मिक विचारों की थीं। प्रतिदिन धार्मिक गीत गाया करतीं थीं। आसपास कहीं भी धार्मिक आयोजन होते तो वे अपने साथ इनको लेकर जातीं थीं। शिशुवय से मिली यही धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा के एम मुंशी जी के जीवन की चेतना बनी । 1900 में उनका विवाह अतिलक्ष्मी पाठक से हुआ । विवाह के बाद आधुनिक शिक्षा बड़ौदा भेजे गये।1907 में अंग्रेजी विषय में प्रथम श्रेणी में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की । महाविद्यालयीन शिक्षा में उन्हें अध्यापक के रूप में अरविंद घोष मिले । अरविन्द घोष क्राँतिकारी थे । वे शिक्षा के साथ युवाओं में राष्ट्र चेतना जगाने के अभियान में जुटे थे । अरविन्द घोष अलीपुर बम काण्ड में जेल गये थे बाद में सन्यास लेकर आध्यात्मिक और राष्ट्र साधना में लीन हो गये और महर्षि अरविन्द के नाम से प्रसिद्ध हुये । इन्हीं के सान्निध्य युवा कन्हैयालाल मुंशी के मन में स्वत्व एवं स्वाभिमान का भाव प्रबल हुआ और अंग्रेजी शासन से मुक्ति के संघर्ष से जुड़ गये । अरविन्द जी के सानिध्य वे बम बनाना भी सीख गये थे । स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण कर वकालत पढ़ने मुम्बई पहुँचे। 1910 में वकालत पास की और बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे । उन्होंने हर परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी । यह उनकी कुशाग्रता थी कि कम समय में ही उनकी गणना मुम्बई उच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित वकीलों में होने लगी थी । समय के साथ वे ऐनी बेसेन्ट के संपर्क में आये और उनकी संस्था होमरूल से जुड़ गये ।

आरंभिक कुछ वर्ष उनका भड़ौच और बड़ौदा आना जाना रहा । फिर 1914 में मुम्बई को उन्होंने अपना स्थाई निवास बना लिया । 1915 में होमरूल आँदोलन के सचिव बने। 1917 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन के भी सचिव बने। 1920 में अहमदाबाद में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया और कांग्रेस से जुड़ गए। काँग्रेस में उनकी गाँधीजी, सरदार वल्लभभाई पटेल, भूलाभाई देसाई आदि विभिन्न नेताओं से निकटता भी बढ़ी। 1921 के असहयोग आँदोलन में हिस्सा लिया और गिरफ्तार हुये । 1924 में पत्नि का निधन हो गया और 1926 में उन्होंने दूसरा विवाह किया ।
1927 में बॉम्बे विधान सभा के लिए चुने गए लेकिन त्यागपत्र देकर बारडोली सत्याग्रह में शामिल हुये, जेल गये। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया गिरफ्तार हुये और छह माह की सजा हुई । 1932 के सत्याग्रह के दौरान फिर गिरफ्तार हुये और दो साल की सजा हुई । उनका जेल जीवन लिखने और पढ़ने में ही बीतता । लगातार आँदोलनों और प्रभावशाली बौद्धिक क्षमता के चलते कांग्रेस में उनका विशिष्ट स्थान बना और 1934 में कांग्रेस संसदीय बोर्ड के सचिव बने। 1937 के बॉम्बे प्रेसीडेंसी चुनाव में पुनः निर्वाचित हुये और बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गृह मंत्री बने । उन्होंने 1938 में एक शैक्षिक ट्रस्ट, भारतीय विद्या भवन की स्थापना की । जिसमें साहित्य और सांस्कृतिक शोध प्रमुख कार्य थे ।

काँग्रेस से मतभेद

श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी के कांग्रेस में मतभेद 1934 से आरंभ हुये । वे समान नागरिक अधिकारके पक्षधरथे लेकिन काँग्रेस लोकल असेंबलियों के चुनाव में मुस्लिम लीग को विशिष्ट सुविधा देने पर सहमत हो गई थी। मुंशीजी ने इसका विरोध किया था पर उनकी बात नहीं मानी गई। इन्हीं दिनों पाकिस्तान की मांग के समर्थन में मुस्लिम लीग ने सशस्त्र गार्ड तैयार करके हिंसक गतिविधियाँ आरंभ कीं । जिन असेंबलियों मुस्लिम लीग प्रभावी थी वहाँ ये हिंसक गतिविधि बहुत बढ़ी। तब मुंशी जी इन हिंसक तत्वों से उनकी शैली में ही उत्तर देकर राष्ट्र और समाज रक्षा के पक्ष में थे। उनकी सोच साम्प्रदायिक नहीं थी वे मानते ​​थे कि हिंदुओं और मुसलमानों का भविष्य शाँति और “अखंड भारत” में ही निहित है । लेकिन मुस्लिम लीग पूरे देश को वैमनस्य और हिंसा में धकेल रही है । जिससे हिन्दु और मुसलमान दोनों को शक्ति से इन तत्वों से निबटना चाहिए। पर काँग्रेस में उनके मत को समर्थन न मिला उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी । लेकिन गाँधीजी और सरदार वल्लभभाई पटेल से उनका व्यक्तिगत संपर्क बना रहा । अंततः गांधी जी के आग्रह पर 1946 में कांग्रेस से पुनः जुड़ गये और संविधान सभा के सदस्य बने । श्री के एम मुंशी उस ध्वज समिति में भी रहे जिसमें भारत के ध्वज का चयन किया था । वे श्री भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता वाली उस समिति के भी सदस्य थे जिसमें संविधान का मसौदा तैयार किया गया था।

हैदराबाद विलय और सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में भूमिका

भारत की स्वतंत्रता के बाद श्री के एम मुंशी की महत्वपूर्ण भूमिका हैदराबाद रियासत के भारत विलय और सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में रही । वे सरदार वल्लभभाई पटेल के अति निकट और विश्वसनीय थे । रियासतों के भारत में विलीनीकरण के लिये सरदार पटेल की हैदराबाद और जूनागढ़ यात्रा में एनवी गाडगिल और के एम मुंशी साथ थे । सरदार पटेल ने श्रीमुंशी को हैदराबाद रियासत के लिए राजनयिक दूत और व्यापार एजेंट नियुक्त किया गया था । इस रूप में रहकर ही श्री मुंशी ने वहाँ सैन्य कार्रवाई का वातावरण बनाया । सरदार पटेल के जूनागढ़ में भी श्री मुंशी साथ रहे । सरदार पटेल ने जूनागढ़ में ही सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की थी । इसका पूरा मसौदा श्री के एम मुंशी ने ही तैयार किया था । पुनर्निर्माण पूरा होने से पहले ही सरदार पटेल का निधन हो गया था । लेकिन मुंशीजी ने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य जारी रखा ।
1950 में वे केंद्रीय खाद्य और कृषि मंत्री थे । पर्यावरण समृद्धि की दृष्टि से वन क्षेत्र बढ़ाने की दृष्टि से उन्होंने ही वन महोत्सव की शुरुआत की थी। तब से जुलाई माह में हर वर्ष वृक्षारोपण उत्सव और वन महोत्सव मनाया जाता है ।
वे 1952 से 1957 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे । उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के साथ स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की । वे समान नागरिक संहिता और अखंड भारत के समर्थक थे ।
अगस्त 1964 में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना के लिए आयोजित बैठक की अध्यक्षता श्री के एम मुंशी ने ही की थी । इसी वर्ष उन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया और अपना शेष जीवन अध्ययन और लेखन में ही व्यतीत किया । और 8 फरवरी 1971 को उन्होंने संसार से विदा ले ली ।

साहित्य रचना

वे स्वतंत्रता के बाद भारत के उसी साँस्कृतिक स्वरूप की कल्पना करते थे जो अतीत में रहा है । इसीलिए स्वतंत्रता आँदोलन के साथ वे भाषा, साहित्य और साँस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे । इसी दिशा में उनका लेखन रहा । उन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी और गुजराती तीन भाषाओं में अपने साहित्य की रचना की । वे राष्ट्र और समाज की उन्नति के लिये शक्ति और शास्त्र दोनों के समर्थक थे । इसीलिए उन्होंने भगवान परशुराम जी पर एक उपन्यास लिखा और अन्य साहित्य की रचना भी की । उनके रचना संसार में गुजरातनो नाथ, पाटणनी प्रभुता, पृथिवीवल्लभ, कृष्णावतार (सात खंडों में), राजाधिराज,जय सोमनाथ, भगवान कौटिल्य, भग्न पादुका, लोपामुद्रा, लोमहर्षिणी, भगवान परशुराम, वेरनी वसुलात, कोनो वांक, स्वप्नद्रष्टा, तपस्विनी, अडधे रस्ते, सीधां चढाण, स्वप्नसिद्धिनी शोधमां, पुरन्दर पराजय, अविभक्त आत्मा तर्पण, पुत्र समोवडी, वावा शेठनुं स्वातंत्र्य, बे खराब जण, आज्ञांकित, ध्रुवसंवामिनीदेवी, स्नेहसंभ्रम, डॉ॰ मधुरिका, काकानी शशी, छीए ते ज ठीक,ब्रह्मचर्याश्रम, मारी बिनजवाबदार कहाणी और गुजरातनी कीर्ति गाथा प्रमुख हैं।

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