प्यार के हज़ार रंग , हैं खिले हुए  

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अनिल शर्मा

दिल्ली। हाल में ही दिल्ली नगरपालिका द्वारा शांति पथ  पर आयोजित ट्यूलिप प्रद्शनी देखने का अवसर मिला । हमारे देश में सुंदरता का प्रतिमान गुलाब माना जाता रहा है – ‘ चमन के फूल भी तुझको गुलाब कहते है ‘ । गुलाब सी ख़ूबसूरती जैसे शायरों की आँखों में बस गयी । कितनी तरह के गुलाब । कैसा -कैसा वर्णन ।

भारत के महत्त्वपूर्ण लोग अपनी जेब में गुलाब की कली लगाते रहे हैं । उससे उनको लगता व्यक्तित्व कुछ निखर गया । भारत के पहले प्रधानमंत्री की जेब में गुलाब का फूल तो उनकी पहचान बन गया था ।

कमल का तो भारत में बहुत महत्व है । सुंदरता और दिव्यता का संगम । प्राचीन संदर्भों में कमल ही सुंदरता का प्रतीक रहा है । ‘ आँखें है जैसे झील में हँसता  हुआ कमल ‘ । यह कमाल की सुंदरता है ।
लक्ष्मी , सरस्वती , ब्रह्मा का तो कमल ही आसन है ।यहाँ कमल  सुंदरता से अध्यात्म की यात्रा करता है ।
गेंदा हर घर और संस्थान को बसंत का पीलापन देता है पर ‘ ससुराल गेंदा फूल ‘ का दर्जा लेने के कारण इसकी छवि को नुक़सान पहुँचा ।
गुलाब और कमल के संदर्भ में ट्युलिप की कहानी अत्यंत दिलचस्प है । हाल में ही ट्युलिप प्रदर्शनी में जाने से कई संदर्भ ताज़ा हो गए । तुर्की के सुल्तानों और कुलीन वर्ग से होता हुआ यह हालेंड पहुँचा । 1593 में हालेंड  के जिस वैज्ञानिक ने इसके बीज ( बल्ब ) तैयार किए । वे इसे लोगों से साझा नहीं करना  चाहते थे । पर उनकी खिड़की में झाँकने वाले बहुत थे । आख़िरकार यह सार्वजनिक जीवन में आ गया ।  इसमें गुलाब की तरह पत्तियों का झुरमुट तो नहीं  इसकी  लंबी – सीधी पत्तियाँ , इसकी सादगी , रंग विन्यास दिल पर छा जाता है । यह रंगों का बसंत है । मौसम का बसंतीपन , सुगंध और मादकता इसमें भरी हुई है । पूरा हालैंड इसका दीवाना हो गया । ज़ाहिर है यह वहाँ के मौसम के अनुकूल था । प्रसिद्ध चित्रकार वैन वाग के समकालीन  चित्रकार क्लाॉड मोनेट ने ट्युलिप का ऐसा चित्र बनाया कि जैसा तरह – तरह के रंग चारों और  बिखरा दिए गए हों । ( नीचे वह चित्र है ) व्यापारी कोई मौक़ा नहीं छोड़ते । जब कुलीन वर्ग इसका दीवाना हुआ तो यह महंगा बिकने लगा । कहते हैं ट्युलिप के एक प्रकार के फूल के बल्ब वर्तमान दरों पर 620000 यूरो में बिके । लोग इसके लिए पागल हो गए थे न ? पर आपको फूलों से प्यार है तो आप पागल हो सकते है । बेचारे फूल करेंसी का इतना बोझ कैसे उठा पाते । इतनी बड़ी क़ीमत के चलते कई व्यापारी बर्बाद हो गए । लोगों ने खूब मजाक उड़ाया और कई व्यंग्य चित्र भी बने । ( ऐसा ही एक चित्र नीचे है ) कबीर ने कहा भी है ‘ माया महाठगिनी हम जानी ‘ ।

काश्मीर में भारत का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन है , लगभग 74 एकड़ के विस्तार वाला । डल लेक में झाँकता हुआ / भारत में डल लेक की ढलान पर जब ट्यूलिप के 15 लाख से ज़्यादा बल्ब लगाए गए तो काश्मीर की सुंदरता , डल लेक की सुंदरता , हरियाली और ट्युलिप की सुंदरता मिल गयी ।
क्यूकेनहोफ – हालेंड में दुनिया का सबसे बड़ा ट्युलिप गार्डन है । बेहद ख़ूबसूरत । उसमें फिर मिलायी जाए थोड़ी सी .. के तर्ज़ पर देश के दो बड़े सितारों अमिताभ बच्चन और रेखा ने ट्यूलिप के फूलों के बीच ‘देखा कोई ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए …. प्यार के हज़ार रंग हैं खिले हुए ’  गा दिया । ट्यूलिप की ख़ूबसूरती में चार चांद लग गए । फिर तो ट्युलिप की एक क़िस्म को विश्व सुंदरी ऐश्वर्य राय का नाम दिया गया । पू्र्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविद ने ट्युलिप के एक प्रकार के बल्ब को हालैंड से ‘ मैत्री पुष्प ‘ का नाम दिया । अब  फूलों की स्टाक मार्केट में ट्युलिप के शेयर ऊँचे बिक रहे है । ऐसे विचित्र , दिलचस्प इतिहास वाले फूलों की प्रदर्शनी शांतिपूर्ण पथ पर  देखना यादगार रहा । बड़ी संख्या में उपस्थित राजनयिक बिरादरी के सदस्य यह बता रहे थीं कि ट्युलिप की प्रति यह दीवानगी अंतरराष्ट्रीय है ।

खेले मसान में होरी दिगम्बर….

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करुणा सागर पण्डा
रायपुर : मणिकर्णिका! एक महाश्मशान… चिताएं यहां अहर्निश दहकती रहती हैं। एक चिता ठंडी हुई नहीं कि दूसरी सजी हुई चिता सुलग उठती है। यह घाट हमें जीवन की अस्थिरता का, उसकी नश्वरता का बोध दिन-रात ही कराता रहता है। यहां मृत्यु की लौ चिता से अग्निशिखा बनकर ऐसे उठती है जैसे वह अंतिम बार विश्वेश्वर को देख लेना चाहती हो, उनमें समाहित हो जाना चाहती हो। कभी जाकर देखिएगा…. सचमुच अद्भुत घाट है मणिकर्णिका।
लेकिन क्या? मणिकर्णिका की महत्ता बस यूँ ही स्थापित हो गई? नहीं भाई! इसी मणिकर्णिका में भगवान शिव ने देवी सती को दाह किया था और उनकी राख से यहां खेली थी एक होली जिसे यह लोक शिव की ‘मसान होली’ कहता है। तब से लेकर आज तक काशी भी अपने देव के साथ उसी मणिकर्णिका में चिता के भस्म से ही रंगभरी एकादशी के अगले दिन “खेले मसान में होरी दिगम्बर….” गाते हुए होली खेल रही है।
मसान होली उल्लास और विरक्ति का एक अनूठा उत्सव है। रंगों की सांसारिक आनंद से अलग मसान होली वह होली है जिसमें शिवभक्त उनका गण बनकर आकाश में भस्म उड़ाते हुए मृत्यु का उत्सव मनाते हैं। वे जीवन का उल्लास और मृत्यु की शांति को एक पासंग में लाकर खड़े कर देते हैं। चढ़ते हुए जीवन की तरह उनका फेंका गया भस्म भी ऊपर की ओर उठता है और ढलती हुई आयु की तरह वही भस्म नीचे आकर धरती पर बैठने लगता है। बैठा हुआ भस्म मिट्टी के देह को मिट्टी में मिल जाने की बात करता है। मसान होली जीवन के प्रति मोह और मृत्यु के प्रति भय को त्यागते हुए जीवन में शिवत्व उतारने की बात करता है।
शिवत्व? -हाँ जी शिवत्व! शिव कोई देह का नाम तो नहीं…. यह तो चेतना की वह अवस्था जहां वैराग्य अपने चरम पर होता है। जैसे असंतुष्टि के चरम पर ही तृप्ति का भाव फूटता है वैसे ही मोह की पराकाष्ठा पर वैराग्य पनपता है जहां न तो मृत्यु का भय रहता है और न ही जीवन से कोई आसक्ति रहती है। वैराग्य का यही भाव तो शिवत्व है और मसान होली जीवन में उसी शिवत्व को उतारने का प्रेरणा पर्व है।
अच्छा, कभी आपने यह विचार है कि ‘मसान होली’ काशी को छोड़कर किसी दूसरे शिवधाम में क्यों नहीं खेली जाती? हो सकता है कि इस प्रश्न का कोई शास्त्रोक्त उत्तर भी हो लेकिन जो मुझे लगता है, वह काशी की उसकी अपनी वीतरागी प्रकृति का होना है। कहते हैं कि शंकर का हृदय कैलाश के बाद सबसे अधिक काशी पर ही मुस्कुराता है इसलिए काशी की उसकी अपनी वैरागी ठसक है। काशी अवघड़ है, काशी फक्कड़ है इसलिए उसे रंगों की होली से अधिक मसान की होली प्रिय है। वैसे भी इस काशी ने शैव-वैष्णव, द्वैत-अद्वैत, निर्गुण-सगुण सबको सुना है और सभी को स्वीकारा है और जो आचरण से अवघड़ या फक्कड़ न हो, वह सभी मतों को न तो सुन सकता है और न स्वीकार सकता है। मसान होली और काशी दोनों ही एक दूसरे की महिमा को सराहते हैं।
वैसे एक सच्चाई यह भी है काशी के साथ-साथ जगत का हर एक प्राणी भी शिव के साथ महाश्मशान की होली खेल ही रहा है। यह संसार श्मशान नहीं तो और क्या है… एक दिन खेलते-खेलते उसकी जीवन ज्योति भी शिव में ही समहित हो जाएगी।

होलिका दहन का शास्त्रोक्त निर्णय एवं प्रमुख ज्योतिषाचार्य के अनुसार होलिका दहन कब किया जाए

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मैनपुरी : होलिका दहन का शास्त्रोक्त निर्णय इस प्रकार है फाल्गुन शुक्ल पक्ष चतुर्दशी सायं काल 5:56 पर समाप्ति के साथ ही पूर्णिमा का प्रारंभ हो रहा है 2 मार्च 2026 दिन सोमवार को साइन कल भद्रा के पुंछ अर्थात् पूंछ के समय में 6:25 से 9:00 बजे तक ही होलिका माता का पूजन एवं दहन करना शास्त्र सम्मत होगा । और इसी समय आखत भी पड़ेंगे ।
अर्थात होलिका माता की परिक्रमा भी करनी होगी । और 3 मार्च 2026 दिन मंगलवार को चंद्र ग्रहण होने के कारण रंग नहीं खेला जाएगा । 4 मार्च 2026 दिन बुधवार चैत्र कृष्ण पक्ष प्रतिपदा के दिन रंग खेल कर वसंतोत्सव पर्व मनाया जाएगा । हमारे धर्म सिंधु नामक ग्रन्थ के अनुसार कहा गया है – इंदम चंद्रग्रहणसत्वे वेदमध्ये कार्यम ग्रस्तोदये परदिने प्रदोषे पूर्णिमासत्वे ग्रहणमध्य एव कार्यम। अन्यथा पूर्वदिने।।

डिजिटल मीडिया का बदलता गणित

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अनूप नारायण सिंह

पटना। बिहार के वरिष्ठ पत्रकार एवं Live Cities के संस्थापक ज्ञानेश्वर वात्सायन के हालिया पोस्ट ने बिहार के डिजिटल मीडिया जगत में एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। यह बहस सिर्फ व्यूज़ और रेवेन्यू की गिरावट की नहीं, बल्कि पूरे डिजिटल मीडिया इकोसिस्टम के बदलते चरित्र की है।

आज डिजिटल मीडिया का सबसे बड़ा मंच माने जाने वाले YouTube ने अपने एल्गोरिद्म में ऐसा बदलाव किया है, जिसने चैनलों की कमर तोड़ दी है। संस्थागत चैनलों के व्यूज़ में 50-60 प्रतिशत तक की गिरावट और मोनेटाइजेशन में 70 प्रतिशत तक की कमी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब सिर्फ वीडियो की संख्या मायने नहीं रखती। पहले यदि किसी बड़े इवेंट या प्रेस कॉन्फ्रेंस की वीडियो देखी जाती थी, तो उससे जुड़े अन्य चैनलों की वीडियो भी दर्शकों तक स्वतः पहुंच जाती थी।

इससे सभी को व्यूज़ मिलते थे। अब ‘Repetitive Content’ के नाम पर यह चक्र लगभग समाप्त हो चुका है।इस बदलाव का सीधा असर यह हुआ है कि संस्थानों में नई भर्तियां रुक गई हैं, कई जगह मैनपावर कम किया जा रहा है। जहां नियुक्तियां हो भी रही हैं, वहां न्यूनतम गारंटीड भुगतान से अधिक पाने के लिए व्यूज़ का लक्ष्य निर्धारित किया जा रहा है। यह मीडिया कर्मियों के पेशेवर जीवन में असुरक्षा की नई परत जोड़ रहा है।दूसरी ओर, Facebook ने तो वर्षों पहले ही वीडियो न्यूज़ पर लगभग भुगतान बंद कर दिया था। कभी एक मिलियन व्यूज़ पर संस्थानों को इतनी आय हो जाती थी कि रिपोर्टर और एडिटर को प्रोत्साहन राशि दी जा सके। आज हालत यह है कि एक मिलियन व्यूज़ पर 1 डॉलर भी मिल जाए तो उपलब्धि मानी जाती है। यह डिजिटल विज्ञापन बाजार के बदलते स्वरूप और प्लेटफॉर्म-नियंत्रित अर्थव्यवस्था की कठोर सच्चाई है।एल्गोरिद्म के इस नए दौर में नेताओं के बयान, प्रेस कॉन्फ्रेंस और तात्कालिक प्रतिक्रियाओं का महत्व घट रहा है।
प्लेटफॉर्म अब ‘Explainer’ और ‘Decoder’ को प्राथमिकता दे रहा है। यानी अनुभव, विश्लेषण और संदर्भ आधारित पत्रकारिता की आवश्यकता बढ़ गई है। यह बदलाव एक अवसर भी है—उनके लिए जो विषय की गहराई समझते हैं और सतही सनसनी से आगे बढ़कर तथ्य और व्याख्या प्रस्तुत कर सकते हैं।क्राइम कंटेंट को लेकर भी सख्ती बढ़ी है। मर्डर, रेप, सुसाइड जैसे विषयों पर प्लेटफॉर्म की निगरानी और प्रतिबंध अधिक कठोर हो गए हैं। ऐसे वीडियो न केवल सीमित सर्कुलेशन पाते हैं, बल्कि उन पर विज्ञापन भी न्यूनतम मिलते हैं। इससे स्पष्ट संकेत है कि केवल सनसनीखेज सामग्री के भरोसे डिजिटल मीडिया का भविष्य सुरक्षित नहीं है।एक और दिलचस्प पहलू बेरोजगारी से जुड़े कंटेंट का है। ऐसे वीडियो भारी व्यूज़ तो बटोरते हैं, लेकिन विज्ञापन कमाते नहीं। कारण स्पष्ट है—विज्ञापनदाता उन दर्शकों तक पहुंचना चाहते हैं जिनकी क्रय-शक्ति हो।
प्लेटफॉर्म की प्राथमिकता भी वहीं झुकती है।समग्र रूप से देखें तो डिजिटल मीडिया का ‘मात्रा युग’ समाप्ति की ओर है और ‘गुणवत्ता युग’ की शुरुआत हो रही है। यदि दिन भर में दर्जनों वीडियो डालने के बजाय 4-5 सशक्त, विश्लेषणात्मक और विश्वसनीय वीडियो प्रकाशित कर समान राजस्व अर्जित किया जा सकता है, तो यह आत्ममंथन का समय है।जो संस्थान विश्वसनीयता की पूंजी के साथ आगे बढ़े हैं, वे इस संक्रमण काल में भी टिकेंगे।
गप-गॉसिप और तात्कालिक उत्तेजना स्थायी समाधान नहीं दे सकते। अंततः दर्शक वही मंच चुनता है, जिस पर उसे भरोसा हो।डिजिटल मीडिया का यह संकट दरअसल एक अवसर भी है—पत्रकारिता को उसके मूल स्वरूप, तथ्य, विश्लेषण और जिम्मेदारी की ओर लौटने का अवसर। और शायद यही वह मोड़ है, जहां से अगली डिजिटल क्रांति जन्म लेगी।
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