
सीईसी और सीओएल-सीईएमसीए ने डिजिटल शिक्षा अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया छह माह का शोध इंक्यूबेशन कार्यक्रम


नागपुर । कुछ व्यक्तित्वों पर लिखना शब्दों का काम नहीं होता, श्रद्धा का काम होता है। कलम चलती अवश्य है, लेकिन लिखता हृदय है। परम पूज्य चतुर्थ सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का स्मरण भी कुछ ऐसा ही है। उनके बारे में सोचते ही मन में किसी बड़े पद की नहीं, एक बड़े मनुष्य की छवि उभरती है। ऐसा मनुष्य, जिसने जितनी ऊंचाइयां प्राप्त कीं, उतनी ही सहजता अपने भीतर बचाए रखी। प्रसिद्धि उसे स्पर्श नहीं सकी, पद उसे बदल नहीं सका और सम्मान स्वभाव को प्रभावित नहीं कर सका। जितना समाज ने उन्हें स्वीकार किया, उतना ही उन्होंने स्वयं को समाज में विलीन कर दिया।
भारतीय परंपरा कहती है कि ‘फल से लदा वृक्ष झुक जाता है।’ रज्जू भैया इस सूक्ति के सजीव स्वरूप थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक बनने के बाद भी उनके भीतर कभी ‘सरसंघचालक’ नहीं बोला, जीवन भर एक सहज, सरल और आत्मीय स्वयंसेवक ही बोलता रहा। शायद इसी कारण उन्हें सुनने वाले केवल प्रभावित नहीं होते थे, उनसे जुड़ जाते थे। वे भाषण नहीं देते थे, विश्वास जगाते थे। वे संगठन नहीं चलाते थे, हृदयों को जोड़ते थे। वे विचार नहीं थोपते थे, संस्कार जगा देते थे।
उन्हें किसी एक परिचय में बांधना संभव नहीं। वे भौतिकी के प्रकाण्ड विद्वान थे, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लोकप्रिय प्राध्यापक थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक थे, किंतु इन सबसे पहले और इन सबसे ऊपर वे एक सहज स्वयंसेवक थे। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी। उन्होंने जीवन भर यह सिद्ध किया कि पद मनुष्य को बड़ा नहीं बनाता, मनुष्य अपने आचरण से पद को गरिमा प्रदान करता है।
रज्जू भैया के भीतर दो यात्राएं साथ-साथ चलती थीं। एक यात्रा परमाणुओं की थी, दूसरी आत्मा की। एक यात्रा प्रयोगशाला की थी, दूसरी प्रार्थना की। एक यात्रा तर्क की थी, दूसरी तप की। उन्होंने विज्ञान को कभी अध्यात्म का प्रतिद्वंद्वी नहीं माना। उनके लिए प्रयोगशाला में सत्य की खोज और राष्ट्रजीवन में चरित्र की खोज, दोनों एक ही साधना के दो आयाम थे। वे जानते थे कि विज्ञान मनुष्य को सामर्थ्य देता है, किंतु अध्यात्म उस सामर्थ्य के सदुपयोग का विवेक देता है। इसी समन्वय ने उनके भीतर वैज्ञानिक की स्पष्टता और ऋषि की करुणा का अद्भुत संगम रचा। भारत की ज्ञान-परंपरा सदैव इसी समन्वय की वाहक रही है, और रज्जू भैया उसका साकार रूप थे।
कल्पना कीजिए…इलाहाबाद विश्वविद्यालय का एक युवा और प्रतिभाशाली प्राध्यापक, जिसके सामने उज्ज्वल वैज्ञानिक भविष्य के असंख्य द्वार खुले हों। सम्मान, प्रतिष्ठा, शोध और विश्वस्तरीय पहचान उसकी प्रतीक्षा कर रहे हों। लेकिन वह सब कुछ छोड़कर उस पथ पर चल पड़े, ज
जहां न व्यक्तिगत उपलब्धियों का आकर्षण है, न सुविधाओं का आश्वासन, केवल राष्ट्रकार्य का कठिन व्रत है। ऐसे निर्णय तर्क से नहीं, तप से जन्म लेते हैं। शायद उसी दिन भारत को एक महान वैज्ञानिक नहीं, ‘रज्जू भैया’ मिले।
यहीं से रज्जू भैया की वास्तविक यात्रा आरम्भ होती है। यह किसी पद तक पहुंचने की यात्रा नहीं थी। यह स्वयं को मिटाकर एक विराट राष्ट्रीय चेतना में विलीन हो जाने की यात्रा थी। इसी यात्रा ने उन्हें लाखों स्वयंसेवकों का मार्गदर्शक बनाया, करोड़ों देशवासियों की श्रद्धा का केंद्र बनाया और भारतीय संगठन परंपरा का ऐसा अध्याय बना दिया, जिसे केवल पढ़ा नहीं, जिया जाता है।
श्रद्धेय डॉक्टर हेडगेवार जी ने बीज बोया, परम पूज्य गुरुजी ने उसे वैचारिक विस्तार दिया, आदरणीय बालासाहेब देवरस जी ने उसे सामाजिक चेतना से जोड़ा और श्रद्धेय रज्जू भैया ने उसमें आत्मीयता की वह ऊष्मा भर दी, जिसने लाखों स्वयंसेवकों को संगठन से नहीं, परिवार से जुड़ने का अनुभव कराया।
रज्जू भैया का संगठन कौशल किसी प्रबंधन संस्थान में नहीं सीखा जा सकता। वह मनुष्य को पढ़ने की कला थी। वे जानते थे कि संगठन भवनों से नहीं बनते, विश्वास से बनते हैं। शाखाएं मैदानों में लगती हैं, पर उनका वास्तविक निर्माण स्वयंसेवकों के हृदय में होता है।
कहा जाता है कि वे वर्षों बाद भी किसी स्वयंसेवक का नाम, उसके परिवार की स्थिति और उससे हुई पिछली बातचीत तक स्मरण रखते थे। संगठन उनके लिए रजिस्टर में दर्ज नामों का समूह नहीं था, वह आत्मीय संबंधों का विस्तृत परिवार था। यही कारण था कि उनसे मिलकर कोई स्वयंसेवक यह अनुभव नहीं करता था कि वह किसी बड़े पदाधिकारी से मिल रहा है, उसे लगता था कि परिवार का कोई बड़ा सदस्य उसका हाथ थामे खड़ा है। नेतृत्व का यही मानवीय पक्ष उन्हें असाधारण बनाता था। वे आदेश देने वाले नहीं, हाथ पकड़कर साथ चलने वाले नेतृत्व के प्रतीक थे।
रज्जू भैया का सबसे बड़ा योगदान यही था कि उन्होंने संगठन को मानवीय स्पर्श दिया। उन्होंने यह सिखाया कि संगठन आदेश से नहीं चलता, विश्वास से चलता है। अनुशासन भय से नहीं आता, आत्मीयता से आता है। और राष्ट्रनिर्माण भाषणों से नहीं, चरित्रवान व्यक्तियों के निर्माण से होता है।
इसी सोच ने आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार को नई ऊर्जा दी। विश्वविद्यालयों से लेकर गांवों तक, युवाओं से लेकर प्रबुद्ध समाज तक, रज्जू भैया की संवाद शैली ने असंख्य लोगों को जोड़ा। वे वैचारिक दृढ़ता के साथ संवाद की मधुरता भी रखते थे। मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं, उन्होंने इसे अपने जीवन से सिद्ध किया।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उनके विद्यार्थी आज भी स्मरण करते हैं कि वे केवल भौतिकी नहीं पढ़ाते थे, जीवन पढ़ाते थे। कठिन सिद्धांत उनकी वाणी में सरल हो जाते थे। यही सहजता आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की भी पहचान बनी। वे जहां जाते, वहां औपचारिकता नहीं, आत्मीयता का वातावरण बन जाता। वे सुनते अधिक थे, बोलते कम थे। वे आदेश नहीं देते थे, विश्वास जगाते थे। वे कार्यकर्ता नहीं बनाते थे, कर्तव्यबोध जगाते थे।
आपातकाल ने अनेक लोगों की परीक्षा ली, पर कुछ व्यक्तित्व ऐसे थे जिन्होंने उस कालखंड को भी राष्ट्रचेतना के विस्तार का अवसर बना दिया। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक था। उस समय जब अनेक संस्थाएं दबाव में थीं, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हजारों कार्यकर्ताओं ने अद्भुत धैर्य और साहस का परिचय दिया। उस कठिन कालखंड में रज्जू भैया ने संगठन को केवल संरक्षित नहीं रखा, बल्कि कार्यकर्ताओं के मन में यह विश्वास भी जीवित रखा कि सत्य और राष्ट्रधर्म अंततः विजयी होंगे। उन्होंने संघर्ष को क्रोध नहीं बनने दिया, उसे संयम और चरित्र की शक्ति बना दिया।
उनका राष्ट्रवाद किसी के विरोध से नहीं, भारत के प्रति प्रेम से जन्म लेता था। उनके लिए भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं था, वह एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना था। वे बार-बार कहते थे कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग व्यक्ति निर्माण से होकर जाता है। व्यक्ति संस्कारित होगा तो परिवार सशक्त होगा, परिवार सशक्त होगा तो समाज संगठित होगा, समाज संगठित होगा तो राष्ट्र स्वतः वैभवशाली बनेगा। यही उनके समूचे चिंतन का केंद्र था।
सामाजिक समरसता उनके लिए कोई कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि भारतीयता का स्वाभाविक स्वरूप थी। वे मानते थे कि समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है, और विविधता तभी शक्ति बनती है जब उसमें आत्मीयता का भाव जुड़ा हो। इसलिए उन्होंने जीवन भर संवाद को संघर्ष पर, समरसता को विभाजन पर और संगठन को व्यक्तिवाद पर वरीयता दी।
अटल बिहारी वाजपेयी हों, लालकृष्ण आडवाणी हों, नानाजी देशमुख हों या अशोक सिंघल… राष्ट्रजीवन की उस पीढ़ी में रज्जू भैया एक ऐसे सेतु थे, जो विचार को व्यवहार से जोड़ते थे। वे जानते थे कि संगठन का विस्तार शाखाओं के साथ-साथ समाज के प्रत्येक वर्ग के हृदय तक पहुंचने से होगा। वे बार-बार कहते थे कि समाज की शक्ति उसके सबसे अंतिम व्यक्ति के सम्मान से मापी जाती है। यही कारण था कि उनके संवाद में आग्रह नहीं होता था, अपनापन होता था। वे विरोधी मत रखने वाले व्यक्ति से भी उसी आत्मीयता से मिलते थे, जिस आत्मीयता से किसी स्वयंसेवक से। उनके लिए संवाद पराजित करने का माध्यम नहीं, जोड़ने का संस्कार था।
आज जब हम ‘राष्ट्र प्रथम’ की बात करते हैं, तब अनायास ही ‘रज्जू भैया’ का स्मरण होता है। क्योंकि उन्होंने इसे मंचों से अधिक अपने जीवन में जिया। उन्होंने अपने लिए कुछ संचित नहीं किया। न संपत्ति, न प्रतिष्ठा, न वैभव। जो कुछ था, वह समाज का था, जो कुछ किया, वह राष्ट्र के लिए किया। ऐसे जीवन विरले ही होते हैं।
आज उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मन स्वयं से एक प्रश्न भी पूछता है कि क्या हम अपने समय के प्रति उतने ही उत्तरदायी हैं, जितने रज्जू भैया अपने समय के प्रति थे? क्या हम भी अपने जीवन का कुछ अंश समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित कर पा रहे हैं? यदि यह प्रश्न हमारे भीतर जागता है, तो समझिए रज्जू भैया आज भी हमें दिशा दे रहे हैं।
समय बीत जाता है। पीढ़ियां बदल जाती हैं। इतिहास के पृष्ठ भी नए अध्यायों से भर जाते हैं। किंतु कुछ जीवन ऐसे होते हैं, जो किसी पुस्तक में नहीं, लोगों के चरित्र में लिखे जाते हैं। परम पूज्य प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का जीवन भी ऐसा ही है। वे आज भी प्रत्येक शाखा की प्रार्थना में हैं, प्रत्येक स्वयंसेवक के प्रण में हैं, प्रत्येक राष्ट्रनिष्ठ हृदय की धड़कन में हैं।
प्रयोगशालाओं में अनेक वैज्ञानिक जन्म लेते हैं, पर राष्ट्र की प्रयोगशाला में युगद्रष्टा विरले ही जन्म लेते हैं। रज्जू भैया उन्हीं विरले पुरुषों में थे। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि ज्ञान का सर्वोच्च रूप वह नहीं जो केवल खोज करे, बल्कि वह है जो स्वयं को राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दे। इसलिए उनका जीवन इतिहास का विषय नहीं, प्रेरणा का स्रोत है। स्मृति का नहीं, साधना का विषय है।
उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन। उनके विचारों को प्रणाम। उनके तप को प्रणाम। उनकी सादगी को प्रणाम। और उस ‘राष्ट्र प्रथम’ की अखंड साधना को कोटिशः प्रणाम, जिसने एक वैज्ञानिक को युगद्रष्टा और एक स्वयंसेवक को कालजयी प्रेरणा बना दिया।
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भोपाल । मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के ताजा अंतरिम आदेश ने एक बार फिर उस ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक बहस को केंद्र में ला दिया है, जो वर्षों से चल रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने फिलहाल मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के निर्णय पर रोक लगाने से इनकार किया है और भोजशाला परिसर के भीतर शुक्रवार की नमाज की अनुमति नहीं दी है।
इसके साथ ही राज्य सरकार को मुस्लिम समुदाय के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को परिसर में किसी भी प्रकार के ढांचागत परिवर्तन से भी रोक दिया है। हालांकि यह सच है कि उक्त आदेश अंतिम निर्णय नहीं है, लेकिन इसने विवाद के केंद्र में मौजूद कई प्रश्नों को फिर से सामने ला दिया है।
इस विवाद पर अनेक मत हो सकते हैं! किंतु फिर भी जो सबसे प्रभावशाली मत हो सकता है, वह यही है कि यदि किसी संरक्षित परिसर को न्यायालय ने ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर माता वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर सहित भोजशाला माना है और साथ ही मुस्लिम समुदाय के लिए वैकल्पिक नमाज की व्यवस्था भी सुझाई गई है, तो ऐसे में टकराव की बजाय समाधान की दिशा में आगे बढ़ना अधिक उपयुक्त होगा।
देखा जाए तो भारत के इतिहास में अनेक मंदिरों के ध्वंस और उन स्थलों पर मस्जिदों के निर्माण के दावे लंबे समय से विवाद का विषय रहे हैं। इन दावों पर इतिहासकारों के बीच मतभेद भी हैं और कई मामलों में न्यायालयों में सुनवाई भी चलती रही है। किंतु क्या कोई एतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इस बात से मना कर सकता है कि इस्लामिक साम्राज्यों एवं गैर मुसलमानों के प्रति उनकी नफरत ने कई मंदिरों का विध्वंस किया, जिन्हें बनाने में कई हजार साल लगे होंगे, उन्हें भी इस आतताइयों ने नहीं छोड़ा!
इस संदर्भ में सबसे अधिक प्रमाणिक मानी जानेवाी पुस्तक, “What Happened to Hindu Temples” में प्रसिद्ध इतिहासकार सीताराम गोयल और उनके सहयोगियों ने अपनी गहन रिसर्च में लगभग 2,000 ऐसे विशिष्ट स्थानों (मस्जिदों/स्मारकों) की सूची तैयार की है, जो पहले मंदिर थे और जिन्हें तोड़कर या उनके मलबे से इस्लामिक ढांचे बनाए गए। कई अन्य इतिहासकारों का व्यापक अनुमान है कि लगभग 800 से 1,000 वर्षों के इतिहास में (महमूद गजनवी से लेकर औरंगज़ेब तक) छोटे-बड़े मिलाकर 30,000 से 60,000 तक मंदिर तोड़े, लूटे या क्षतिग्रस्त किए गए।
इसके बाद भी भारत में रह रहे मुसलमानों के मान-सम्मान को देखते हुए, यहां का बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय इन सभी मंदिरों पर आज कोई दावा नहीं ठोक रहा, बल्कि इसी पृष्ठभूमि में 1991 का Places of Worship (Special Provisions) Act अस्तित्व में आया, जिसका उद्देश्य 15 अगस्त 1947 की धार्मिक स्थिति को यथावत बनाए रखना था। एएसआई की निगरानी की संपत्तियों को छोड़कर इस कानून के लागू होने के बाद अधिकांश ऐतिहासिक विवाद न्यायिक या राजनीतिक रूप से आगे नहीं बढ़ाए गए। काशी, मथुरा तथा कुछ अन्य मामलों को छोड़ दें तो देश के अधिकांश ऐसे स्थल, जिनके संबंध में ऐतिहासिक दावे किए जाते रहे हैं, अपनी वर्तमान स्थिति में बने हुए हैं।
अब भोजशाला का विवाद भी कुछ विशेश प्रकार का धार्मिक आस्था से जुड़ा मामला है। यह एक संरक्षित पुरातात्विक स्मारक का भी प्रश्न है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने उपलब्ध अभिलेखों, ऐतिहासिक दस्तावेजों तथा एएसआई से संबंधित तथ्यों के आधार पर अपना निर्णय दिया था। इसके बाद भी सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आवश्यकताओं की उपेक्षा नहीं की है। उसने राज्य सरकार को वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायालय धार्मिक अधिकारों और विरासत संरक्षण इन दोनों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है।
भोजशाला विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम व्यवस्था बनाई है। यदि वैकल्पिक स्थान पर नमाज की व्यवस्था उपलब्ध कराई जा रही है और अंतिम निर्णय आने तक यथास्थिति बनाए रखने की बात कही गई है, तो प्रश्न उठता है कि क्या इस व्यवस्था को अस्थायी रूप से स्वीकार कर न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ने देना अधिक उचित नहीं होगा? अस्थायी ही क्यों, क्या इस व्यवस्था को स्थायी रूप से स्वीकार करना सही नहीं होगा? क्योंकि एतिहासिक तमाम साक्ष्य यह बता रहे है, इसलिए यह सर्वविदित है कि धार की भोजशाला मां वाग्देवी का मंदिर है। वह सदियों तक भारतीय ज्ञान परंपरा का साक्षी रहा है।
वस्तुत: यह सभी के लिए ध्यान रखने की बात है कि भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता सहअस्तित्व रही है। इतिहास में अनेक कठिन दौर आए, किंतु अंततः समाज ने संवाद और सहिष्णुता का रास्ता चुना। भोजशाला जैसे संवेदनशील मामलों में भी आवश्यकता इसी दृष्टिकोण की है। एक तरह से देखें तो भोजशाला को लेकर कोई विवाद होना ही नहीं चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में एक ओर हाईकोर्ट के निर्णय पर तत्काल रोक लगाने से इनकार किया है, तो दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय के लिए वैकल्पिक नमाज स्थल की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया है। इससे स्पष्ट है कि न्यायालय किसी एक पक्ष की पूर्ण विजय या पराजय की बजाय संतुलित व्यवस्था की दिशा में बढ़ रहा है। वहीं, मुस्लिम समाज से भी आग्रह है कि वाग्देवी का ज्ञान मंदिर भारतीयता के लिए सांस्कृतिक विरासत है, इसलिए वह भी इसके संरक्षण के लिए आगे आए।