सीईसी और सीओएल-सीईएमसीए ने डिजिटल शिक्षा अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया छह माह का शोध इंक्यूबेशन कार्यक्रम

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नई दिल्ली : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अंतर-विश्वविद्यालय केंद्र कंसोर्टियम फॉर एजुकेशनल कम्युनिकेशन (सीईसी) और कॉमनवेल्थ एजुकेशनल मीडिया सेंटर फॉर एशिया (सीओएल-सीईएमसीए) ने आज नई दिल्ली स्थित सीईसी परिसर में दो दिवसीय राष्ट्रीय पूर्व-शोध कार्यशाला का उद्घाटन किया। कार्यशाला का शीर्षक है — “रिसर्च इंक्यूबेशन एंड एडवांस्ड ट्रेनिंग: एन्हांसिंग एकेडमिक रिसर्च इन द डिजिटल एरा”।
यह कार्यशाला देशभर के सीईसी के एजुकेशनल मल्टीमीडिया रिसर्च सेंटर्स (ईएमआरसी) से चुने गए संकाय सदस्यों और शोधकर्ताओं के एक चयनित समूह के लिए आयोजित की गई है। यह छह माह के संरचित शोध इंक्यूबेशन कार्यक्रम का पहला चरण है। आगामी महीनों में प्रतिभागियों को निरंतर मेंटरिंग और सहायता मिलेगी, ताकि वे अपने शोध अवधारणाओं को सुव्यवस्थित, वित्तीय रूप से व्यवहार्य और प्रभावशाली परियोजनाओं में बदल सकें।
कार्यशाला का मुख्य फोकस डिजिटल शिक्षा शास्त्र (pedagogy), शैक्षिक प्रौद्योगिकी, शिक्षार्थी जुड़ाव, डिजिटल मूल्यांकन, शैक्षिक प्रसारण और ऑनलाइन लर्निंग इकोसिस्टम पर है। ये सभी क्षेत्र राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020, स्वयं और स्वयं प्रभा जैसी राष्ट्रीय पहलों से जुड़े हुए हैं।
सीईसी के निदेशक प्रो. (डॉ.) परिक्षित सिंह मनहास ने उद्घाटन सत्र में कहा, “यह पहल भारत में भविष्य के शोध उत्कृष्टता, नवाचार और प्रौद्योगिकी-संचालित उच्च शिक्षा के लिए मानक स्थापित करेगी। हम भारत सरकार की स्वयं और स्वयं प्रभा पहलों के परिवर्तनकारी (transformative) विजन पर आगे बढ़ रहे हैं। हमारा प्रयास केवल डिजिटल शिक्षा को अपनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सार्थक क्रियान्वयन और मापनीय प्रभाव सुनिश्चित करना है।”
प्रो. मनहास ने कहा कि सीईसी की शोध परियोजनाएं शिक्षार्थियों के अनुभवों का मूल्यांकन करेंगी, मौजूदा डिजिटल संसाधनों की प्रभावशीलता जांचेंगी और साक्ष्य-आधारित अंतर्दृष्टि उत्पन्न करेंगी। “अनुकूलनशीलता, नवाचार और समावेशिता को मार्गदर्शक सिद्धांत बनाए रखते हुए हमें एनईपी 2020 के उद्देश्यों को आगे बढ़ाना चाहिए और उभरती प्रौद्योगिकियों की क्षमता का उपयोग कर अधिक सुलभ, समान, समावेशी और भविष्य-तैयार उच्च शिक्षा प्रणाली तैयार करनी चाहिए।”
सीओएल-सीईएमसीए के निदेशक डॉ. बी. शादरख ने इस सहयोग को ईएमआरसी और वैश्विक शैक्षणिक समुदाय दोनों के लिए युगांतरकारी बताया। उन्होंने कहा, “इस पहल का उद्देश्य एनईपी 2020 और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं की दिशा में शोध को उन्मुख करना, प्रौद्योगिकी-सक्षम शिक्षा में सीखने के डिजाइन और शोध क्षमताओं को बढ़ाना तथा संकाय सदस्यों को शोध को सहयोगी और समुदाय-निर्माण की प्रक्रिया मानने के लिए प्रेरित करना है।”
कार्यशाला का दिन डॉ. पर्विंदर कौर, प्रोजेक्ट मैनेजर, सीईसी के नेतृत्व में ‘आइडिया जनरेशन एंड रिसर्च फॉर्मुलेशन’ सत्र से शुरू हुआ। इसमें शोध समस्याओं की पहचान, शोध प्रश्न तैयार करना और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जोड़ने पर चर्चा हुई। इसके बाद औपचारिक उद्घाटन और कार्यशाला का अवलोकन हुआ।
दिन के प्रमुख आकर्षणों में शोध प्रस्ताव पिच सत्र शामिल था, जिसमें प्रतिभागियों ने अपने शोध समस्याओं, उद्देश्यों, पद्धति और अपेक्षित परिणामों को प्रस्तुत किया। यह सत्र सक्रिय सहकर्मी समीक्षा चर्चा में बदल गया। इसके बाद डॉ. मोहम्मद मामूर अली, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के टीचर ट्रेनिंग एंड नॉन-फॉर्मल एजुकेशन विभाग के सहायक प्रोफेसर ने सैंपलिंग, डिजाइन तकनीकों, डिजिटल शिक्षा शोध में एआई की भूमिका, गुणवत्ता आश्वासन और खुली, समावेशी तथा प्रौद्योगिकी-सक्षम शिक्षा पर सत्र संचालित किए।
यह साझेदारी सीईसी के राष्ट्रीय नेटवर्क और शैक्षिक संचार विशेषज्ञता को सीईएमसीए के शोध क्षमता निर्माण, प्रौद्योगिकी-सक्षम शिक्षा और ओपन एजुकेशनल प्रैक्टिसेज के अंतरराष्ट्रीय अनुभव के साथ जोड़ती है। कार्यशाला 16 जुलाई को शोध पद्धति, शैक्षणिक लेखन, विद्वतापूर्ण प्रकाशन, संशोधन और इंक्यूबेशन स्टूडियो सत्रों के साथ समाप्त होगी, जिसके बाद छह माह का शोध कार्यक्रम औपचारिक रूप से शुरू होगा।
सीईसी यूजीसी का अंतर-विश्वविद्यालय केंद्र है जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और डिजिटल प्रौद्योगिकियों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा को बढ़ावा देता है। सीओएल-सीईएमसीए कॉमनवेल्थ ऑफ लर्निंग का संस्थान है जो एशिया के कॉमनवेल्थ देशों में खुली, दूरस्थ और प्रौद्योगिकी-सक्षम शिक्षा के विकास का समर्थन करता है।
यह सहयोगात्मक प्रयास न केवल भारत की डिजिटल शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगा बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रौद्योगिकी-समर्थित शिक्षा पर महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि भी प्रदान करेगा।

मिलेगा यूरेनियम और बढ़ेगी खेल तथा व्यापार संबंधों की सघनता

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दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया ओैर न्यूजीलैंड की महत्वपूर्ण व एतिहासिक यात्रा संपन्न करने के बाद स्वदेश वापस आ गए हैं। हिंद प्रशांत महासागर के इन तीन देशों की यात्रा कई दृष्टियों से ऐतिहासिक सिद्ध हुई। इन यात्राओं में जहाँ एक ओर प्रधानमंत्री मोदी की लोगों से जुड़ाव बना लेने की अद्भुत क्षमता शिखर पर दिखाई दी वहीं दूसरी ओर कई ऐसे महत्वपूर्ण समझौतो पर हस्ताक्षर हुए जिनसे भविष्य की सुरक्षा व विकास का परिदृश्य पूरी तरह से बदलता दिखेगा।
तीन देशों की यात्रा के द्वितीय चरण में प्रधानमंत्री मोदी ऑस्ट्रेलिया पहुंचे जहां उन्होंने कई कार्यक्रमों में भाग लिया और भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच नागरिक परमाणु सहयोग को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की उपस्थिति में ऑस्ट्रेलिया -भारत परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए। जिसके अंतर्गत ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम देगा। भारत ने वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा से एक लाख मेगावाट बिजली बनाने का लक्ष्य रखा है जिसके लिए ऑस्ट्रेलिया से प्राप्त यूरेनिम बहुत ही किफायती होगा। यहाँ स्मरणीय है कि एक समय ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम देने से मना कर दिया था । प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष एंथनी अल्बनीज की अध्यक्षता में मेलबर्न में संपन्न तृतीय वार्षिक सम्मेलन में कुल 18 समझौतों और सहयोग दस्तावेजों पर मुहर लगी। इनमें रक्षा, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा, साइबर व क्रिटिकल प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र शामिल हैं। दोनों प्रधानमंत्रियों ने आतंकवाद के मुद्दे पर अत्यंत कड़ा रुख अपनाया । भारत और ऑस्ट्रेलिया के संयुक्त घोषणा पत्र में कहा गया कि दोनों प्रधानमंत्रियों ने आतंकवाद और हिंसक चरमपंथ के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों की निंदा की। उन्होंने सभी देशों द्वारा आतंकवाद के खतरे का व्यापक व निरंतर मुकाबला करने पर बल दिया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 समिति द्वारा सूचीबद्ध वैश्विक स्तर पर प्रतिबंधित आतंकवादियों, आतंकवादी संगठनों तथा उनके प्रॉक्सी सहयोगियों, प्रायोजकों और फाइनेंसर्स के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के मध्य यूरेनियम का समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक भारत केवल चार देशों कजाकिस्तान से 40 से 50 प्रतिशत, कनाडा से 20 से 30 प्रतिशत, रूस से 10 से 15 प्रतिशत और उज्बेकिस्तान से 10 प्रतिशत यूरेनियम खरीदता है जबकि दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादक देश ऑस्ट्रेलिया है। भारत 2070 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य लेकर चल रहा है, इसके लिए कोयले पर निर्भरता कम करने और परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की योजना है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के मध्य रक्षा ओैर सुरक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास और सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने पर सहमति बनी। अंतरिक्ष सहयेाग, समुद्री सुरक्षा, भारतीय तटरक्षक और ऑस्ट्रेलियाई मैरीटाइम बॉर्डर कमांड के मध्य समझौता हुआ है। व्यापार और निवेश को बढ़ाने, साइबर सुरक्षा और नई तकनीक पर समझौता हुआ है। शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट को लेकर भी समझौता हुआ है, अब ऑस्ट्रेलियाई यूनिवसिर्टी के कैंपस भारत में आसानी से खुल सकेंगे।
प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों देशों के बीच संबंधों को क्रिकेट व संस्कृति से भी जोड़ा। मेलबर्न के क्रिकेट स्टेडियम में प्रधानमंत्री मोदी का अत्यंत भव्य स्वागत हुआ। क्रिकेट भारत -ऑस्ट्रेलिया संबंधों की कूटनीतिक भाषा है। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की संयुक्त प्रेसवार्ता में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हम दोनों की बैठकें भी क्रिकेट की तरह होती हैं। दोनों देशों के बीच खेल और खेल उद्योग में सहयोग बढ़ाने के लिए रोडमैप जारी किया गया। इससे स्पष्ट हो गया कि इसी वर्ष दिसंबर में चेन्नई के स्टेडियम में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट की बिग बैश लीग का उद्घाटन मैच सबसे बड़ा आकर्षण बनेगा। तय कार्यक्रम के अनुसार ऑस्ट्रेलियाई पुरुष बिग बैश लीग का पहला मैच दिसंबर में चेक मेलबर्न रेनेगेडस और वर्तमान विजेता पर्थ स्कार्चर्स के बीच खेला जाएगा। यह भारत में आयोजित होने वाला पहला विदेशी क्रिकेट लीग मैच होगा।
प्रधानमंत्री मोदी के ऑस्ट्रेलिया प्रवास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि ऑस्ट्रेलिया द्वारा भारतीय मूल की तीन प्राचीन कलाकृतियों को वापस लौटाना है। इनमें एक पाषाण की नंदी प्रतिमा भी है। प्रधानमंत्री मोदी ने मेलबर्न में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि आपरेशन सिंदूर के दौरान दुनिया ने भारत की गूंज सुनी। 21वीं सदी का भारत आज विकसित होने के लक्ष्य पर काम कर रहा है, ये वो भारत है जो कहता है ग्रो मोर, अचीव मोर। उन्होंने कहा कि जब सोमवार के दिन आतंकवादियों के ठिकानों पर विस्फोट हो रहे थे तब दुनिया ने भारत के रक्षा उपकरणों की क्षमता और विश्वसनीयता देख रही थी। मेलबर्न का 30 हजार की क्षमता वाला स्टेडियम खचाखच भरा था जिस पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह शो तो पूरी तरह से हाउसफुल है।ऑस्ट्रेलिया में यह संभवतः पहला अवसर था जब किसी विदेशी नेता के लिए इतनी भीड़ आई जिसमें गजब का उत्साह था और वह मोदी -मोदी के नारे लगा रही थी।
न्यूजीलैंड- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की याात्रा का अंतिम पड़ाव न्यूजीलैंड रहा और वह भी मोदी के रंग में रग गया। भारत के प्रधानमंत्री की यह न्यूजीलैंड यात्रा 40 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद हुई थी। न्यूजीलैंड में तीन लाख प्रवासी भरतीय नागरिक रहते हैं जो वहां के विकास में सहभागिता कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के मध्य शिखर वार्ता के बाद 40 वर्षों का कूटनीतिक सन्नाटा टूट गया। दोनों प्रधानमंत्रियों ने साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और हिंद प्रशांत क्षेत्र की अहमियत के बीच द्विपक्षीय रिश्तों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर पहुंचा दिया। दोनों देशों ने रोडमैप 2030 को अनुमति प्रदान की है। दोनों देश 2030 तक व्यापार को दोगुना करेंगे, रक्षा -सुरक्षा संबंधों को भी बढ़ाएंगे। दोनों देशों के मध्य व्यापार 35 हजार करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य है। दोनों देशों के मध्य 10 समझौता ज्ञापनों और आठ अन्य प्रमुख फैसलों पर मुहर लगी। दोनों देशों ने व्यापार एवं निवेश, रक्षा एवं सुरक्षा, कृषि- प्रौद्योगिकी, खेल, शिक्षा, पर्यटन संस्कृति और लोगों के परस्पर रिश्तों सहित विभिन्न क्षेत्रों में संबंध मजबूत करने पर सहमति जताई गई है।
भारत और न्यूजीलैंड के मध्य मुक्त व्यापार समझौता संपन्न हुआ है। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने प्रधानमंत्री मोदी के पहुंचने से पूर्व एक महत्वपूर्ण घोषणा करी कि उनके देश से भारत को होने वाले निर्यात का 57 प्रतिशत हिस्सा पहले दिन से ही शुल्क मुक्त होगा। ऑकलैंड में भी प्रधानमंत्री मोदी ने प्रवासी भारतीयों को संबोधित किया, जहां उन्होंने भारत की विकास गाथा का वर्णन किया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ओैर न्यूजीलैंड के रिश्ते में यादे हैं- दोस्ती है, मूल्य और प्रतिबद्धता है। न्यूजीलैंड की सुंदर परंपरा में सदियों से एक शब्द वाका लोगो को जोड़ता आया है। भारत ड्रोन प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में नई ऊचाईयां छू रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह आर्थिक साझेदारी समावेशी और टिकाऊ व्यापार का एक आदर्श मॉडल बन सकती है।

रज्जू भैया : विज्ञान-साधना से राष्ट्र-आराधना तक

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 प्रणय विक्रम सिंह

नागपुर । कुछ व्यक्तित्वों पर लिखना शब्दों का काम नहीं होता, श्रद्धा का काम होता है। कलम चलती अवश्य है, लेकिन लिखता हृदय है। परम पूज्य चतुर्थ सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का स्मरण भी कुछ ऐसा ही है। उनके बारे में सोचते ही मन में किसी बड़े पद की नहीं, एक बड़े मनुष्य की छवि उभरती है। ऐसा मनुष्य, जिसने जितनी ऊंचाइयां प्राप्त कीं, उतनी ही सहजता अपने भीतर बचाए रखी। प्रसिद्धि उसे स्पर्श नहीं सकी, पद उसे बदल नहीं सका और सम्मान स्वभाव को प्रभावित नहीं कर सका। जितना समाज ने उन्हें स्वीकार किया, उतना ही उन्होंने स्वयं को समाज में विलीन कर दिया।

भारतीय परंपरा कहती है कि ‘फल से लदा वृक्ष झुक जाता है।’ रज्जू भैया इस सूक्ति के सजीव स्वरूप थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक बनने के बाद भी उनके भीतर कभी ‘सरसंघचालक’ नहीं बोला, जीवन भर एक सहज, सरल और आत्मीय स्वयंसेवक ही बोलता रहा। शायद इसी कारण उन्हें सुनने वाले केवल प्रभावित नहीं होते थे, उनसे जुड़ जाते थे। वे भाषण नहीं देते थे, विश्वास जगाते थे। वे संगठन नहीं चलाते थे, हृदयों को जोड़ते थे। वे विचार नहीं थोपते थे, संस्कार जगा देते थे।

उन्हें किसी एक परिचय में बांधना संभव नहीं। वे भौतिकी के प्रकाण्ड विद्वान थे, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लोकप्रिय प्राध्यापक थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक थे, किंतु इन सबसे पहले और इन सबसे ऊपर वे एक सहज स्वयंसेवक थे। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी। उन्होंने जीवन भर यह सिद्ध किया कि पद मनुष्य को बड़ा नहीं बनाता, मनुष्य अपने आचरण से पद को गरिमा प्रदान करता है।

रज्जू भैया के भीतर दो यात्राएं साथ-साथ चलती थीं। एक यात्रा परमाणुओं की थी, दूसरी आत्मा की। एक यात्रा प्रयोगशाला की थी, दूसरी प्रार्थना की। एक यात्रा तर्क की थी, दूसरी तप की। उन्होंने विज्ञान को कभी अध्यात्म का प्रतिद्वंद्वी नहीं माना। उनके लिए प्रयोगशाला में सत्य की खोज और राष्ट्रजीवन में चरित्र की खोज, दोनों एक ही साधना के दो आयाम थे। वे जानते थे कि विज्ञान मनुष्य को सामर्थ्य देता है, किंतु अध्यात्म उस सामर्थ्य के सदुपयोग का विवेक देता है। इसी समन्वय ने उनके भीतर वैज्ञानिक की स्पष्टता और ऋषि की करुणा का अद्भुत संगम रचा। भारत की ज्ञान-परंपरा सदैव इसी समन्वय की वाहक रही है, और रज्जू भैया उसका साकार रूप थे।

कल्पना कीजिए…इलाहाबाद विश्वविद्यालय का एक युवा और प्रतिभाशाली प्राध्यापक, जिसके सामने उज्ज्वल वैज्ञानिक भविष्य के असंख्य द्वार खुले हों। सम्मान, प्रतिष्ठा, शोध और विश्वस्तरीय पहचान उसकी प्रतीक्षा कर रहे हों। लेकिन वह सब कुछ छोड़कर उस पथ पर चल पड़े, ज
जहां न व्यक्तिगत उपलब्धियों का आकर्षण है, न सुविधाओं का आश्वासन, केवल राष्ट्रकार्य का कठिन व्रत है। ऐसे निर्णय तर्क से नहीं, तप से जन्म लेते हैं। शायद उसी दिन भारत को एक महान वैज्ञानिक नहीं, ‘रज्जू भैया’ मिले।

यहीं से रज्जू भैया की वास्तविक यात्रा आरम्भ होती है। यह किसी पद तक पहुंचने की यात्रा नहीं थी। यह स्वयं को मिटाकर एक विराट राष्ट्रीय चेतना में विलीन हो जाने की यात्रा थी। इसी यात्रा ने उन्हें लाखों स्वयंसेवकों का मार्गदर्शक बनाया, करोड़ों देशवासियों की श्रद्धा का केंद्र बनाया और भारतीय संगठन परंपरा का ऐसा अध्याय बना दिया, जिसे केवल पढ़ा नहीं, जिया जाता है।

श्रद्धेय डॉक्टर हेडगेवार जी ने बीज बोया, परम पूज्य गुरुजी ने उसे वैचारिक विस्तार दिया, आदरणीय बालासाहेब देवरस जी ने उसे सामाजिक चेतना से जोड़ा और श्रद्धेय रज्जू भैया ने उसमें आत्मीयता की वह ऊष्मा भर दी, जिसने लाखों स्वयंसेवकों को संगठन से नहीं, परिवार से जुड़ने का अनुभव कराया।

रज्जू भैया का संगठन कौशल किसी प्रबंधन संस्थान में नहीं सीखा जा सकता। वह मनुष्य को पढ़ने की कला थी। वे जानते थे कि संगठन भवनों से नहीं बनते, विश्वास से बनते हैं। शाखाएं मैदानों में लगती हैं, पर उनका वास्तविक निर्माण स्वयंसेवकों के हृदय में होता है।

कहा जाता है कि वे वर्षों बाद भी किसी स्वयंसेवक का नाम, उसके परिवार की स्थिति और उससे हुई पिछली बातचीत तक स्मरण रखते थे। संगठन उनके लिए रजिस्टर में दर्ज नामों का समूह नहीं था, वह आत्मीय संबंधों का विस्तृत परिवार था। यही कारण था कि उनसे मिलकर कोई स्वयंसेवक यह अनुभव नहीं करता था कि वह किसी बड़े पदाधिकारी से मिल रहा है, उसे लगता था कि परिवार का कोई बड़ा सदस्य उसका हाथ थामे खड़ा है। नेतृत्व का यही मानवीय पक्ष उन्हें असाधारण बनाता था। वे आदेश देने वाले नहीं, हाथ पकड़कर साथ चलने वाले नेतृत्व के प्रतीक थे।

रज्जू भैया का सबसे बड़ा योगदान यही था कि उन्होंने संगठन को मानवीय स्पर्श दिया। उन्होंने यह सिखाया कि संगठन आदेश से नहीं चलता, विश्वास से चलता है। अनुशासन भय से नहीं आता, आत्मीयता से आता है। और राष्ट्रनिर्माण भाषणों से नहीं, चरित्रवान व्यक्तियों के निर्माण से होता है।

इसी सोच ने आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार को नई ऊर्जा दी। विश्वविद्यालयों से लेकर गांवों तक, युवाओं से लेकर प्रबुद्ध समाज तक, रज्जू भैया की संवाद शैली ने असंख्य लोगों को जोड़ा। वे वैचारिक दृढ़ता के साथ संवाद की मधुरता भी रखते थे। मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं, उन्होंने इसे अपने जीवन से सिद्ध किया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उनके विद्यार्थी आज भी स्मरण करते हैं कि वे केवल भौतिकी नहीं पढ़ाते थे, जीवन पढ़ाते थे। कठिन सिद्धांत उनकी वाणी में सरल हो जाते थे। यही सहजता आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की भी पहचान बनी। वे जहां जाते, वहां औपचारिकता नहीं, आत्मीयता का वातावरण बन जाता। वे सुनते अधिक थे, बोलते कम थे। वे आदेश नहीं देते थे, विश्वास जगाते थे। वे कार्यकर्ता नहीं बनाते थे, कर्तव्यबोध जगाते थे।

आपातकाल ने अनेक लोगों की परीक्षा ली, पर कुछ व्यक्तित्व ऐसे थे जिन्होंने उस कालखंड को भी राष्ट्रचेतना के विस्तार का अवसर बना दिया। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक था। उस समय जब अनेक संस्थाएं दबाव में थीं, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हजारों कार्यकर्ताओं ने अद्भुत धैर्य और साहस का परिचय दिया। उस कठिन कालखंड में रज्जू भैया ने संगठन को केवल संरक्षित नहीं रखा, बल्कि कार्यकर्ताओं के मन में यह विश्वास भी जीवित रखा कि सत्य और राष्ट्रधर्म अंततः विजयी होंगे। उन्होंने संघर्ष को क्रोध नहीं बनने दिया, उसे संयम और चरित्र की शक्ति बना दिया।

उनका राष्ट्रवाद किसी के विरोध से नहीं, भारत के प्रति प्रेम से जन्म लेता था। उनके लिए भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं था, वह एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना था। वे बार-बार कहते थे कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग व्यक्ति निर्माण से होकर जाता है। व्यक्ति संस्कारित होगा तो परिवार सशक्त होगा, परिवार सशक्त होगा तो समाज संगठित होगा, समाज संगठित होगा तो राष्ट्र स्वतः वैभवशाली बनेगा। यही उनके समूचे चिंतन का केंद्र था।

सामाजिक समरसता उनके लिए कोई कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि भारतीयता का स्वाभाविक स्वरूप थी। वे मानते थे कि समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है, और विविधता तभी शक्ति बनती है जब उसमें आत्मीयता का भाव जुड़ा हो। इसलिए उन्होंने जीवन भर संवाद को संघर्ष पर, समरसता को विभाजन पर और संगठन को व्यक्तिवाद पर वरीयता दी।

अटल बिहारी वाजपेयी हों, लालकृष्ण आडवाणी हों, नानाजी देशमुख हों या अशोक सिंघल… राष्ट्रजीवन की उस पीढ़ी में रज्जू भैया एक ऐसे सेतु थे, जो विचार को व्यवहार से जोड़ते थे। वे जानते थे कि संगठन का विस्तार शाखाओं के साथ-साथ समाज के प्रत्येक वर्ग के हृदय तक पहुंचने से होगा। वे बार-बार कहते थे कि समाज की शक्ति उसके सबसे अंतिम व्यक्ति के सम्मान से मापी जाती है। यही कारण था कि उनके संवाद में आग्रह नहीं होता था, अपनापन होता था। वे विरोधी मत रखने वाले व्यक्ति से भी उसी आत्मीयता से मिलते थे, जिस आत्मीयता से किसी स्वयंसेवक से। उनके लिए संवाद पराजित करने का माध्यम नहीं, जोड़ने का संस्कार था।

आज जब हम ‘राष्ट्र प्रथम’ की बात करते हैं, तब अनायास ही ‘रज्जू भैया’ का स्मरण होता है। क्योंकि उन्होंने इसे मंचों से अधिक अपने जीवन में जिया। उन्होंने अपने लिए कुछ संचित नहीं किया। न संपत्ति, न प्रतिष्ठा, न वैभव। जो कुछ था, वह समाज का था, जो कुछ किया, वह राष्ट्र के लिए किया। ऐसे जीवन विरले ही होते हैं।

आज उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मन स्वयं से एक प्रश्न भी पूछता है कि क्या हम अपने समय के प्रति उतने ही उत्तरदायी हैं, जितने रज्जू भैया अपने समय के प्रति थे? क्या हम भी अपने जीवन का कुछ अंश समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित कर पा रहे हैं? यदि यह प्रश्न हमारे भीतर जागता है, तो समझिए रज्जू भैया आज भी हमें दिशा दे रहे हैं।

समय बीत जाता है। पीढ़ियां बदल जाती हैं। इतिहास के पृष्ठ भी नए अध्यायों से भर जाते हैं। किंतु कुछ जीवन ऐसे होते हैं, जो किसी पुस्तक में नहीं, लोगों के चरित्र में लिखे जाते हैं। परम पूज्य प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का जीवन भी ऐसा ही है। वे आज भी प्रत्येक शाखा की प्रार्थना में हैं, प्रत्येक स्वयंसेवक के प्रण में हैं, प्रत्येक राष्ट्रनिष्ठ हृदय की धड़कन में हैं।

प्रयोगशालाओं में अनेक वैज्ञानिक जन्म लेते हैं, पर राष्ट्र की प्रयोगशाला में युगद्रष्टा विरले ही जन्म लेते हैं। रज्जू भैया उन्हीं विरले पुरुषों में थे। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि ज्ञान का सर्वोच्च रूप वह नहीं जो केवल खोज करे, बल्कि वह है जो स्वयं को राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दे। इसलिए उनका जीवन इतिहास का विषय नहीं, प्रेरणा का स्रोत है। स्मृति का नहीं, साधना का विषय है।

उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन। उनके विचारों को प्रणाम। उनके तप को प्रणाम। उनकी सादगी को प्रणाम। और उस ‘राष्ट्र प्रथम’ की अखंड साधना को कोटिशः प्रणाम, जिसने एक वैज्ञानिक को युगद्रष्टा और एक स्वयंसेवक को कालजयी प्रेरणा बना दिया।

वाग्देवी के मंदिर पर मुस्लिम पक्ष की बेवजह जिद? अब उदारता दिखाने का समय!

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल । मध्‍य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के ताजा अंतरिम आदेश ने एक बार फिर उस ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक बहस को केंद्र में ला दिया है, जो वर्षों से चल रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने फिलहाल मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के निर्णय पर रोक लगाने से इनकार किया है और भोजशाला परिसर के भीतर शुक्रवार की नमाज की अनुमति नहीं दी है।

इसके साथ ही राज्य सरकार को मुस्लिम समुदाय के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को परिसर में किसी भी प्रकार के ढांचागत परिवर्तन से भी रोक दिया है। हालांकि यह सच है कि उक्‍त आदेश अंतिम निर्णय नहीं है, लेकिन इसने विवाद के केंद्र में मौजूद कई प्रश्नों को फिर से सामने ला दिया है।

इस विवाद पर अनेक मत हो सकते हैं! किंतु फिर भी जो सबसे प्रभावशाली मत हो सकता है, वह यही है कि यदि किसी संरक्षित परिसर को न्यायालय ने ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर माता वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर सहित भोजशाला माना है और साथ ही मुस्लिम समुदाय के लिए वैकल्पिक नमाज की व्यवस्था भी सुझाई गई है, तो ऐसे में टकराव की बजाय समाधान की दिशा में आगे बढ़ना अधिक उपयुक्त होगा।

देखा जाए तो भारत के इतिहास में अनेक मंदिरों के ध्वंस और उन स्थलों पर मस्जिदों के निर्माण के दावे लंबे समय से विवाद का विषय रहे हैं। इन दावों पर इतिहासकारों के बीच मतभेद भी हैं और कई मामलों में न्यायालयों में सुनवाई भी चलती रही है। किंतु क्‍या कोई एतिहासिक साक्ष्‍यों के आधार पर इस बात से मना कर सकता है कि इस्‍लामिक साम्राज्‍यों एवं गैर मुसलमानों के प्रति उनकी नफरत ने कई मंदिरों का विध्‍वंस किया, जिन्‍हें बनाने में कई हजार साल लगे होंगे, उन्‍हें भी इस आतताइयों ने नहीं छोड़ा!

इस संदर्भ में सबसे अधिक प्रमाणिक मानी जानेवाी पुस्‍तक, “What Happened to Hindu Temples” में प्रसिद्ध इतिहासकार सीताराम गोयल और उनके सहयोगियों ने अपनी गहन रिसर्च में लगभग 2,000 ऐसे विशिष्ट स्थानों (मस्जिदों/स्मारकों) की सूची तैयार की है, जो पहले मंदिर थे और जिन्हें तोड़कर या उनके मलबे से इस्लामिक ढांचे बनाए गए। कई अन्‍य इतिहासकारों का व्यापक अनुमान है कि लगभग 800 से 1,000 वर्षों के इतिहास में (महमूद गजनवी से लेकर औरंगज़ेब तक) छोटे-बड़े मिलाकर 30,000 से 60,000 तक मंदिर तोड़े, लूटे या क्षतिग्रस्त किए गए।
इसके बाद भी भारत में रह रहे मुसलमानों के मान-सम्‍मान को देखते हुए, यहां का बहुसंख्‍यक हिन्‍दू समुदाय इन सभी मंदिरों पर आज कोई दावा नहीं ठोक रहा, बल्‍कि इसी पृष्ठभूमि में 1991 का Places of Worship (Special Provisions) Act अस्तित्व में आया, जिसका उद्देश्य 15 अगस्त 1947 की धार्मिक स्थिति को यथावत बनाए रखना था। एएसआई की निगरानी की संपत्‍त‍ियों को छोड़कर इस कानून के लागू होने के बाद अधिकांश ऐतिहासिक विवाद न्यायिक या राजनीतिक रूप से आगे नहीं बढ़ाए गए। काशी, मथुरा तथा कुछ अन्य मामलों को छोड़ दें तो देश के अधिकांश ऐसे स्थल, जिनके संबंध में ऐतिहासिक दावे किए जाते रहे हैं, अपनी वर्तमान स्थिति में बने हुए हैं।

अब भोजशाला का विवाद भी कुछ विशेश प्रकार का धार्मिक आस्था से जुड़ा मामला है। यह एक संरक्षित पुरातात्विक स्मारक का भी प्रश्न है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने उपलब्ध अभिलेखों, ऐतिहासिक दस्तावेजों तथा एएसआई से संबंधित तथ्यों के आधार पर अपना निर्णय दिया था। इसके बाद भी सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आवश्यकताओं की उपेक्षा नहीं की है। उसने राज्य सरकार को वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायालय धार्मिक अधिकारों और विरासत संरक्षण इन दोनों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है।

भोजशाला विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम व्यवस्था बनाई है। यदि वैकल्पिक स्थान पर नमाज की व्यवस्था उपलब्ध कराई जा रही है और अंतिम निर्णय आने तक यथास्थिति बनाए रखने की बात कही गई है, तो प्रश्न उठता है कि क्या इस व्यवस्था को अस्थायी रूप से स्वीकार कर न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ने देना अधिक उचित नहीं होगा? अस्‍थायी ही क्‍यों, क्‍या इस व्‍यवस्‍था को स्‍थायी रूप से स्‍वीकार करना सही नहीं होगा? क्‍योंकि एतिहासिक तमाम साक्ष्‍य यह बता रहे है, इसलिए यह सर्वविदित है कि धार की भोजशाला मां वाग्‍देवी का मंदिर है। वह सदियों तक भारतीय ज्ञान परंपरा का साक्षी रहा है।

वस्‍तुत: यह सभी के लिए ध्‍यान रखने की बात है कि भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता सहअस्तित्व रही है। इतिहास में अनेक कठिन दौर आए, किंतु अंततः समाज ने संवाद और सहिष्णुता का रास्ता चुना। भोजशाला जैसे संवेदनशील मामलों में भी आवश्यकता इसी दृष्टिकोण की है। एक तरह से देखें तो भोजशाला को लेकर कोई विवाद होना ही नहीं चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में एक ओर हाईकोर्ट के निर्णय पर तत्काल रोक लगाने से इनकार किया है, तो दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय के लिए वैकल्पिक नमाज स्थल की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया है। इससे स्पष्ट है कि न्यायालय किसी एक पक्ष की पूर्ण विजय या पराजय की बजाय संतुलित व्यवस्था की दिशा में बढ़ रहा है। वहीं, मुस्‍लिम समाज से भी आग्रह है कि वाग्‍देवी का ज्ञान मंदिर भारतीयता के लिए सांस्कृतिक विरासत है, इसलिए वह भी इसके संरक्षण के लिए आगे आए।

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