वंचितों के साथ खड़े हो कर विफल किए जा सकते हैं कन्वर्जन के षड़्यंत्र!

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रवि पाराशर

दिल्ली । भारत में कन्वर्जन को लेकर विश्व हिंदू परिषद और दूसरे समान विचारों वाले संगठनों के सतत प्रयासों के कारण बन रहे जागरूकता के वातावरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। ऐसे में मतांतरण को धार्मिक कर्तव्य मानते हुए हिंदू समाज को आक्रांत करने के लिए निंदनीय हथकंडे अपनाने वाले कट्टरपंथी जिहादियों ने भी षड्यंत्र तेज कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर के बर्रा थाना क्षेत्र में साल 2021 में जो घटनाक्रम प्रकाश में आया, उसे षड्यंत्र के कुछ-कुछ नए स्वरूप के तौर पर समझा जा सकता है।

कन्वर्जन के दुर्जन आमतौर पर दूरदराज के उन इलाकों में खुल कर साजिशें रचते रहे हैं, जहां हिंदुओं की अपेक्षा मुस्लिम आबादी अधिक है। ऐसे स्थानों पर वे सबसे पहले अशिक्षित, दलित और कमजोर वर्गों के परिवारों की लड़कियों को निशाना बनाते हैं। ऐसे परिवार भी उनके निशाने पर होते हैं, जिनके भरण-पोषण और सुरक्षा का दायित्व किसी कारणवश महिलाओं पर ही होता है। संबल नहीं होने के कारण महिलाएं डर कर झुक जाती हैं या बाल-बच्चों के साथ पलायन के लिए विवश हो जाती हैं। दोनों ही सूरतों में षड्यंत्रकारी सफल हो जाते हैं। दूरदराज के क्षेत्रों में घटित ऐसे मामले मीडिया की पहुंच से दूर रहते हैं या मीडिया उन तक नहीं पहुंचता। पुलिस भी अक्सर कमजोर की सहायता नहीं करती।

कानपुर के बर्रा थाना क्षेत्र में हुई घटना से यह स्पष्ट हो गया है कि मतांतरण के षड्यंत्रकारियों का नया पैंतरा यह है कि अब वे शहरी क्षेत्रों में भी खुलेआम अपने काले मंसूबों को अंजाम देने में हिचक नहीं रहे हैं। एक दलित हिंदू महिला ने तब आरोप लगाया था कि मुस्लिम समुदाय के लोग उस पर अपनी दो नाबालिग बेटियों समेत कन्वर्जन के लिए दबाव बना रहे हैं। उसे 20 हजार रुपये का लालच भी दिया गया। जब उसने साफ इनकार कर दिया तो, उसे परेशान किया जाने लगा। यहां तक कि उसकी बेटियों से छेड़छाड़ तक की गई।

पुलिस ने समय पर कार्रवाई नहीं की, तो बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पीड़ित की सहायता का प्रयास किया, किंतु इस दौरान एक मुस्लिम व्यक्ति के साथ हुई छिटपुट मारपीट के कारण कुछ युवाओं को गिरफ्तार कर लिया गया। अब मूल मसला हाशिये पर चला गया और बजरंग दल को हिंदू युवकों के लिए न्याय की मांग पर आंदोलन करना पड़ा। अवसर देख कर मुस्लिम हितों की राजनीति का दम भरने वाले असदुद्दीन ओवैसी ने गिरफ्तार किए गए युवाओं को कट्टरपंथी हिंसक अपराधियों की संज्ञा दी। उधर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इसे भारतीय जनता पार्टी के उकसावे में की गई कार्रवाई करार देते हुए लोकतंत्र के लिए शर्मनाक घटना बताया था। पूरे मामले में पक्ष-विपक्ष की राजनीति हावी हो गई। जो पीड़ित महिला मतांतरण के लिए दबाव डालने का आरोप मीडिया के कैमरों के सामने लगा रही थी, उसे न्याय मिलने की बात नेपथ्य में चली गई।

कुल मिला कर जिस पुलिस को महिला की सहायता नहीं करने पर फटकार लगनी चाहिए थी, वही पुलिस उसके समर्थन में खड़े हुए पक्ष पर कानूनी कार्रवाई करने में लगी रही। यहां बड़ा प्रश्न यह है कि यदि बजरंग दल के कार्यकर्ता महिला के पक्ष में खड़े होने में विलंब करते और मतांतरण के लिए दबाव डालने वाले असामाजिक लोग उसके या उसकी नाबालिग बच्चियों को सबक सिखाने के लिए कोई जघन्य हिंसक वारदात कर डालते, तब क्या होता? और तब क्या होता, जब पुलिस और समाज से कोई सहायता न मिलने पर पीड़ित महिला दबाव में आ कर मजबूरन कन्वर्जन कर लेती? दोनों प्रश्नों के उत्तर हमें अवश्य खोजने चाहिए।

प्रश्न यह भी बड़ा है कि क्या कानपुर की कच्ची बस्ती की पीड़ित दलित महिला का हश्र बिहार के बेगूसराय जिले के डंडारी थाना क्षेत्र में महादलित परिवार की नाबालिग बेटी के साथ हुए बलात्कार जैसा नहीं हो सकता था? बिल्कुल हो सकता था। बेगूसराय जिले में आठ अगस्त, 2021 को दो मुस्लिम युवकों ने महादलित परिवार की बेटी के साथ बलात्कार किया। रिपोर्ट दो दिन बाद लिखी गई। यह वारदात दूरदराज के इलाके में हुई। बजरंग दल ने तत्काल पीड़ित के लिए न्याय की आवाज उठाई। न तो मीडिया में यह मामला सुर्खियां बना, न ही ओवैसी या अखिलेश यादव ने इसका विरोध किया। क्या यही अवसरवादी राजनैतिक संवेदनशीलता है?

कुल मिला कर नया ट्रेंड यह है कि अब शहरी क्षेत्रों में भी कमजोरों पर मतांतरण के लिए दबाव डाला जाए। मंसूबा पूरा हो जाए, तो ठीक और अगर फंस जाओ तो मुस्लिम हितों की राजनीति करने वाले बड़े नेता तो बचाव में आ ही जाएंगे। ओवैसी बिहार में महादलित नाबालिक लड़की से हुए रेप के मामले में कुछ इसलिए नहीं बोले, क्योंकि पीड़ित लड़की हिंदू है और बिहार में विधानसभा हो चुके थे। ओवैसी और अखिलेश यादव कानपुर के मामले में इसलिए बोले, क्योंकि यूपी में तब विधानसभा चुनाव होने थे। महादलित हिंदू महिला को न्याय मिले, इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं, हां, मुस्लिम आरोपितों का हर हाल में बचाव करना है, क्योंकि उनके वोट लेने हैं।

देश भर से ऐसे समाचार आने लगे हैं कि कन्वर्जन को जन्नत की सीढ़ियां मानने वाले कुत्सित वृत्ति के लोग आमतौर पर धोखे का आवरण तान कर भोली-भाली हिंदू लड़कियों को बहलाने-फुसलाने में लगे हैं। लेकिन क्योंकि अब विहिप जैसे संगठन के जन-जागरण अभियानों के कारण सनातन समाज अधिक चौकन्ना हो रहा है, इसलिए लव जिहाद के ऐसे बहुत से मामले अंजाम तक पहुंचने से पहले ही नाकाम होने लगे हैं। फिर भी इस दिशा में अभी बड़े पैमाने पर जन-जागरण की आवश्यकता है। दलित समुदाय और कमजोर वर्ग की नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। नाबालिग लड़कियां अपना अच्छा-भला ठीक तरह से नहीं सोच सकतीं, उनके परिवारों को समुचित सामाजिक संरक्षण भी प्राप्त नहीं है, इसलिए उन्हें बरगलाना आसान है।

देखने में आ रहा है कि मतांतरण के लिए दबाव दो प्रकार से डाला जा रहा है। एक तो हिंदू लड़कियों को धोखे से बहला-फुसला कर शादी या शादी के झांसे के नाम पर उनसे यौन संबंध बना लो और फिर राज खुल जाने पर लोकलाज का भय दिखा कर उन्हें चुपचाप मतांतरण के लिए विवश कर दो। दूसरा तरीका यह भी है कि पहले बलात्कार करो और फिर इज्जत के नाम पर मतांतरण करा कर लड़की से शादी कर अपनी गर्दन बचा लो। ऐसे बहुत से मामलों की चर्चा व्यापक स्तर पर नहीं हो पाती। बहुत से ऐसे मामलों की शिकायत पुलिस तक नहीं पहुंचती। पहुंचती है, तो शिकायतें दर्ज नहीं होतीं। कथित मुख्यधारा के मीडिया का दृष्टिकोण भी ‘सिलेक्टिव’ रहता है।

यह वाकया भी साल 2021 का है। उत्तर प्रदेश के बरेली में बीए की एक हिंदू छात्रा के माता-पिता ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी का अपहरण पांच अगस्त, 2021 को मुस्लिम लड़के ने कर उसका जबरन कन्वर्जन करा दिया है। इतना ही नहीं, आरोपित उन पर भी कन्वर्जन के लिए दबाव डाल रहा था, डरा-धमका रहा था। यह तीसरा तरीका है। हो सकता है कि समाज से व्यापक समर्थन नहीं मिलने पर और बेटियों की जान की रक्षा के लिए ऐसे पीड़ित माता-पिता भी धर्म बदलने की सोचने लगें और एक दिन ऐसा करने को मजबूर हो जाएं। उस वक्त तो पीड़ित और असहाय माता-पिता ने अपने घर पर ‘बिकाऊ है’ लिख दिया था और मामले का संज्ञान मीडिया ने भी लिया था।

सोचने वाली एक बात यह है कि हिंदू लड़कियों को धोखे से फंसा कर कोई मुस्लिम लड़का उनसे शादी कर लेता है, तो क्या ऐसा करना सामान्य प्रेम विवाह की श्रेणी में आ सकता है? न तो कानून के हिसाब से, न ही समाज के हिसाब से इसे मान्यता दी जा सकती है। ऐसा करना अपराध की श्रेणी में ही आएगा। लेकिन ऐसी शादियां होने के बाद लड़की पर मतांतरण के लिए दबाव बढ़ जाता है और लड़की या उसके परिवार की इच्छा के विरुद्ध होते हुए भी अधिकांश मामलों में ऐसा ही होता भी है। इस तरह के नियम विरुद्ध कथित विवाह मुस्लिम लड़के ही अधिक करते हैं।

ऐसा कोई विरला मामला ही सामने आता है कि कोई हिंदू लड़का अपनी पहचान मुस्लिम बना कर किसी मुस्लिम लड़की से धोखा दे कर शादी रचाए। यदि भारतीय समाज में यह प्रचलित चलन होता, तो हिंदू लड़कों के मुस्लिम लड़कियों से शादी करने और उनका मतातंरण करने के मामले भी बहुतायत में सामने आने चाहिए थे। किंतु ऐसा नहीं होता, इसलिए यह स्पष्ट है कि ‘लव जिहाद’ बाकायदा छद्म धार्मिक कर्तव्य या कहा जाए कि षड्यंत्र के तौर पर किया जा रहा है। धोखा देना किसी धर्म की शिक्षा नहीं हो सकती है। अगर है, तो फिर ऐसे धर्म पर लानत है!

भारतीय संस्कृति नारी को पूज्य और आराध्य मानती है। नारी देवी है। नारी हिंदू समाज की मान-प्रतिष्ठा, आदर का प्रधान मानक होती है। सनातन परंपरा देव से पहले देवी का स्मरण करती है, पूजा करती है। पहले सीता फिर राम, पहले राधा फिर कृष्ण इत्यादि। हालांकि हिंदू समाज में भी महिलाओं के प्रति संकुचित विचार रखने वाले पथभ्रष्ट लोग हैं। किंतु आदर्श स्थिति यही कि सभी समाजों में नारी को सम्मान मिलना चाहिए।

दुर्भाग्य से कट्टरपंथी मुस्लिम समाज में जिहादी मानसिकता के पथभ्रष्ट लोगों द्वारा हिंदू महिलाओं को निशाना बनाने के षड़्यंत्र अधिक रचे जा रहे हैं। विशेषकर गरीब, बेसहारा और कमजोर वर्ग की महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है। यह षड़्यंत्र मुद्दत से चला आ रहा है, लेकिन अब विहिप जैसे संगठनों की सक्रियता के कारण सनातन समाज जागरूक हुआ है और बहुत से मामले प्रकाश में आ रहे हैं, जिनका हरसंभव प्रतिकार किया जा रहा है।

हिंदू महिलाओं की अस्मिता तार-तार कर धार्मिक आधार पर आत्मतुष्टि की भावना से भरने की मानसिकता आज की बात नहीं है। वर्ष 1992 में राजस्थान के अजमेर में जो कांड सामने आया, वह आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। अजमेर के एक स्कूल में पढ़ने वाली हिंदू लड़कियों को संगठित रूप से षड़्यंत्र रच कर जिस तरह सैक्स रैकेट में फंसाया गया, उसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। पहले एक लड़की को धोखे से एक फार्म हाउस में बुला कर उसे बेहोश कर अश्लील तस्वीरें खींची गईं। फिर उसे ब्लैकमेल कर उसके माध्यम से दूसरी लड़कियों के साथ भी यही किया गया।

अजमेर कांड में सैकड़ों हिंदू लड़कियों को षड़्यंत्र की श्रृंखला का शिकार बनाया गया। उनकी तस्वीरें और वीडियो आम करने की धमकियां दे कर उन्हें बार-बार अनैतिक काम के लिए विवश किया गया। इस कांड में कांग्रेस के कई नेता, सरकारी अफसर और अजमेर दरगाह के कई खादिमों के लड़के शामिल थे। मुख्य कांड के मुख्य आरोपित थे यूथ कांग्रेस के तत्कालीन नेता फारूक चिस्ती, नफीस चिस्ती और अनवर चिस्ती। मामला प्रकाश में आने के बाद एक ही स्कूल की कई लड़कियों ने आत्महत्या कर ली थी। बहुत से परिवार अजमेर छोड़ कर चले गए थे, लेकिन बहुत से अपराधी पकड़े ही नहीं गए।

ऐतिहासिक संदर्भों में भी हमने पढ़ा है कि मुस्लिम आक्रांताओं का प्राथमिक उद्देश्य संपत्ति की लूटपाट और निरंकुश शासन के साथ सनातन हिंदू अस्मिता को तार-तार करना था। इसके लिए आक्रमणकारियों ने भारतीय स्त्रियों के अपमान को मुख्य माध्यम बनाया। यही कारण जौहर जैसी परंपराओं का जनक बना। यह षड़्यंत्र आज भी लव जिहाद जैसे दूसरे घ्रणित रूपों में जारी है, जिसका कड़ा प्रतिकार हमें सामाजिक विमर्श को प्रबल बना कर विधिसम्मत माध्यमों से करना चाहिए।

अपराध के आंकड़े जुटाने वाली संस्था नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी ऐसी कोई सूची नहीं बनाती, जिससे यह पता चले कि देश में लव जिहाद के कितने केस हो रहे हैं। हालांकि सच्चाई है कि रेप के केस सभी धर्मों की महिलाओं के साथ होते हैं और किसी भी ऐसी वारदात को धर्म के आधार पर गंभीर और कम गंभीर की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। सभी धर्मों की बेटियां भारत की बेटियां हैं। लेकिन अगर एनसीआरबी जाति और धर्म के आधार पर ऐसे आंकड़े जुटाए, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।

अब यदि कुछ राजनैतिक पार्टियां जाति आधारित जनगणना की पुरजोर हिमायत करती हैं, तो फिर अपराध के आंकड़े भी जाति और धर्म के आधार पर जुटाए जाएं, तो क्या परेशानी है? ऐसा होने पर वस्तुस्थिति स्पष्ट तौर पर सामने आ सकती है।

वस्तुस्थिति कितनी भयावह है, यह सामने आना ही चाहिए। जबरन कन्वर्जन, लव जिहाद, हिंसा के माध्यम से दहशत फैला कर बहुत से क्षेत्रों से अल्पसंख्यक हिंदुओं को पलायन के लिए विवश कर क्षेत्रों का आबादी संतुलन बदलने की साजिशें बड़े स्तर पर हो रही हैं। ऐसी सारी कारगुजारियां अपराध की श्रेणी में आती हैं। बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अगर धार्मिक या सामुदायिक कृत्य या कर्तव्य मान लिया जाएगा, तो इससे अधिक भयावह क्या होगा? यदि ऐसे निंदनीय कृत्य सामुदायिक दबदबा बढ़ा कर देश में राज करने के किसी दीर्घकालीन षड़यंत्र का हिस्सा हैं, तब तो यह बेहद चिंता की बात है।

धोखे से हिंदू लड़कियों से शादी के बहुत से मामले लोकलाज के डर से पुलिस के पास नहीं पहुंचते। ऐसी शादियों के बाद बनाए गए यौन संबंध भी बलात्कार ही हैं, जिनका मुखर विरोध अक्सर नहीं होता। ऐसे रेप की शिकार बहुत सी लड़कियां मन ही मन तड़पती रहती हैं। उनकी पीड़ा का अनुभव क्या कोई कर सकता है? सच्चाई सामने आने पर हिंदू लड़कियां भले ही शादियां तोड़ दें, गर्दनें झुका कर भले ही चुपचाप अपने घरों को लौट आएं, लेकिन अपने स्वत्व, अपनी अस्मिता, अपने अस्तित्व के साथ हुए बलात्कार का घिनौना दंश आजीवन भूल नहीं सकतीं।

माना जाता है कि लव जिहाद शब्दयुग्म का प्रयोग पहली बार वर्ष 2009 में केरल में इस तरह के कई मामले सामने आने के बाद हुआ। फिर कर्नाटक में भी ऐसा होता दिखाई दिया, तो इसका उल्लेख देश भर में होने लगा। वर्ष 2017 में केरल हाई कोर्ट ने (लव जिहाद के आधार पर) एक मुस्लिम पुरुष का हिंदू युवती से हुआ विवाद अमान्य करार दिया था। पुरुष ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। तब कोर्ट ने नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी यानी एनआईए को यह जांच करने का निर्देश दिया था कि क्या भारत में लव जिहाद का कोई पैटर्न स्थापित किया जा रहा है? इस मामले में एनआईए की जांच कहां तक पहुंची, पता नहीं।

बहुत से मामलों के बहुआयामी दृष्टिकोण से अध्ययन के बाद कहा जा सकता है कि भारत में लव जिहाद मतांतरण के व्यापक षड़्यंत्र से ही जुड़ा एक आयाम है। इस असामाजिक प्रवृत्ति का व्यापक विरोध होना ही चाहिए। लव जिहाद के माध्यम से किए जाने वाले बलात्कार सामान्य तौर पर अनायास हो जाने वाले अमानवीय जघन्य अपराध नहीं, बल्कि अधिक जघन्य अपराध की श्रेणी में रखे जाने चाहिए। क्योंकि अपराधी बाकायदा शिकार चुन कर संगठित और योजनाबद्ध तरीके से अपराध को अंजाम देते हैं। कर्तव्य मानते हुए वे लगातार अपराध करने की मानसिकता में जीते हैं।

दुर्भाग्य की बात है कि ज्यादातर भारतीय राजनैतिक दल ऐसे मामलों में भी सिर्फ राजनीति ही करते हैं। पीड़ित लड़कियों को न्याय दिलाना उनका अंतिम उद्देश्य नहीं होता। वे जातियों और धार्मिक चश्मे पहन कर ऐसी वारदात को देखते हैं और उनमें फर्क करते हैं। दलित हितों की राजनीति करने वाले कथित नेता बलात्कारियों में हिंदू और मुस्लिम के आधार पर विभेद करते हैं। जम्मू-कश्मीर के दूरदराज के क्षेत्र कठुआ में किसी मुस्लिम बच्ची से रेप का आरोप किसी पुजारी पर लगता है, तो संयुक्त राष्ट्र के महासचिव तक को पीड़ा होने लगती है। बहुत सी हिंदू लड़कियों पर लव जिहाद के अंतर्गत होने वाले जघन्य अपराधों पर वे मानवाधिकार की रक्षा की दुहाई देना उचित नहीं समझते।

तुष्टीकरण की राजनीति ने हालांकि अभी तक मुस्लिम समुदाय का कुछ भी भला नहीं किया है, फिर भी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, वामपंथी दल और सिर्फ मुस्लिम हितों की राजनीति करने वाले अददुद्दीन ओवैसी जैसे नेता उन्हें भरमाने में लगे हैं। वोट बैंक की राजनीति की चरम अवसरवादिता है कि मुसलमान लड़कों पर रेप के आरोप लगने पर मुलायम सिंह यादव जैसे वरिष्ठ नेता मंच से कहते हैं कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। ऐसी राजनीति की भर्त्सना खुल कर की जानी चाहिए।

जहां तक सनातन समाज की महिलाओं के सम्मान का प्रश्न है, तो समाज को ही कानून के दायरे में एकजुट होकर प्रतिकार करना होगा। सनातन समाज को महिला सशक्तीकरण की गति बढ़ानी होगी। कमजोर वर्गों के साथ खड़ा होना होगा। दहेज जैसी कुरीतियों को जड़ से समाप्त करना होगा। संपन्न सनातन वर्ग को सामाजिक समरसता के कर्तव्य का प्रभावी निर्वाह करना होगा। समाज की दलित, वंचित, गरीब और दूसरे स्तरों पर कमजोर कड़ियों के मन में यह विश्वास जगाना होगा कि अधिकार, शक्ति और साधन संपन्न सनातन समाज उनके साथ है।

अवैध कन्वर्जन रोकने के लिए केंद्र सरकार को बनाना चाहिए कड़ा कानून

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रवि पाराशर

दिल्ली । भारत में कई सदियों से सनातन धर्म के अनुयायियों पर बहुआयामी प्रहार किए जा रहे हैं। समय-समय पर हिंदू समाज ऐसे हमलों का हरसंभव प्रतिकार करता रहा है। धर्म संबंधी बहुत से वैश्विक विचारों से इतर हिंदू या सनातन धर्म मूलत: कर्म या कर्तव्य और लौकिक-अलौकिक आस्था में इस तरह अंतर्निहित है कि दोनों को किसी भी स्तर पर अलग-अलग करना संभव ही नहीं है।

हिंदुओं के सनातन धर्म पर अडिग रहने का आशय व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और अंतत: विश्व कल्याण के प्रति सुविचारित, सुसंगत मानवीय कर्तव्यों के प्रति प्रतिपल अडिग रहना ही है। सनातन समाज जीवनदायी संपूर्ण प्रकृति का समभाव से उपासक हैं। यही कारण है कि बहुत से संकट आए, बहुत से प्रहार हुए, किंतु विस्तारवादी न होते हुए भी हिंदू विचार संपूर्ण विश्व में सम्मानित हुआ। हर भारतीय को विश्वास है कि सनातन कर्तव्य और आस्था का ऊर्ध्वमुखी नैसर्गिक अटूट अस्तित्व विश्व भर में नई ऊष्मा, नई ऊर्जा, नई सुगंध के साथ सदैव पुष्पित और पल्लवित होता रहेगा।

परतंत्रता के समय हिंदुओं के दमन और मतांतरण के बहुत से दुष्चक्र चले। भारत माता के अनेक सुपूतों ने प्रतिकार स्वरूप सर्वोच्च बलिदान दिया। भारत अपनी सकारात्मक मौलिकता के कारण संपूर्ण विश्व में सद्गुरु के रूप में स्वीकार्य न रहे, इस उद्देश्य से भारतीय अस्मिता पर दिग्भ्रमित ईसाइयत और इस्लाम के हमले अब भी जारी हैं।

स्वतंत्रता के बाद भी भारत राष्ट्र की उदात्त उदारता और विशाल हृदयता की आड़ लेकर हिंदुओं को मतांतरित करने के अनेक षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। ऐसा तब हो रहा है, जबकि भारत के संविधान में हर पूजा पद्धति के प्रति पूर्ण सम्मान व्यक्त किया गया है। वयस्क भारतीय नागरिक अपने विवेक से किसी भी धर्म को अपना सकता है। किंतु भारत में धर्म के प्रचार-प्रसार की स्वीकार्यता के संवैधानिक अभयदान का अर्थ यह नहीं हो सकता कि हिंदुओं को कन्वर्जन के लिए तरह-तरह के प्रलोभन या लालच देकर, बहला-फुसला कर स्वार्थ सिद्धि की जाए और हम मूक-दर्शक बने रहें।

भारत लोकतांत्रिक गणराज्य है, इसलिए अवैध कन्वर्जन के दानवी दुष्चक्र को विफल करने के लिए शक्तिशाली कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए। भारतीय संविधान में विधि-व्यवस्था राज्यों का विषय है, इस कारण अवैध कन्वर्जन पर अंकुश लगाने के लिए कई राज्यों ने कानून बनाए हैं। किंतु षड्यंत्र की अंतरराष्ट्रीय व्यापकता के कारण ऐसे सभी कानून भारतीय समाज व्यवस्था की आस्थागत सहजता को क्षीण करने वाले अवैध कन्वर्जन पर प्रभावी अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं।

अब तो ऐसे बहुत से षड्यंत्रों के कर्ताधर्ता विदेश में बैठ कर जाल बुन रहे हैं। कन्वर्जन या मतांतरण के माध्यम से भारतीयता को क्षीण करने के लिए पाकिस्तान समेत कई इस्लामिक देशों से भारत में सक्रिय षड्यंत्रकारियों को बड़ी मात्रा में फंडिंग की जा रही है। विदेश में बैठ कर भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने के उद्देश्य से हिंदुओं का कन्वर्जन कराने के षड्यंत्र रचने और इसके लिए विदेशी फंडिंग करने वालों पर लगाम लगाने के लिए राज्यों के कानून पर्याप्त नहीं हैं। कन्वर्जन कराने वालों के तार तार आतंकवाद के दानव से भी सीधे जुड़े दिखाई देने लगे हैं। इस सारे चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए कड़ा केंद्रीय कानून ही एकमात्र विकल्प है।

विश्व चेतना का सर्वाधिक मौलिक और प्रखर प्रतीक हिंदुत्व ही है। भारतीयता के सूर्य की विलक्षणता, प्रखरता और पावनता को बनाए रखना हर हिंदू का सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कर्तव्य है। हिंदू समाज सदैव सचेत रहा है। यही कारण रहा कि मुगल काल में राज्याश्रय में दीन-ए-इलाही जैसा धर्म प्रचलित करने के प्रयास भारतीय धरती पर धड़क कर लहलहा नहीं सके। सजग और सतर्क हिंदू समाज अपनी ओर से आज भी ऐसे दुष्चक्रों को भेदने के लिए तत्पर है, किंतु बिना वैधानिक अस्त्र-शस्त्रों के ऐसा कर पाना कठिन है।

जिन कुछ राजनैतिक स्वार्थों ने समाज के प्रति अपने कर्तव्यों की ओर से आंखें मूंद ली हैं, उन्हें समझना चाहिए कि अनैतिक और अवैध कन्वर्जन संपूर्ण भारतीय अस्मिता को धूमिल करने का ही षड्यंत्र है। इसलिए इस राष्ट्र विरोधी गतिविधि पर रोक लगाने के लिए भारत सरकार को कड़े प्रावधानों वाला मतांतरण विरोधी केंद्रीय कानून जल्द से जल्द बनाना चाहिए, ताकि अनेकता में एकता और वसुधैव कुटुंबकम् जैसी विश्व कल्याण की भावना की जड़ें हर हिंदू के मन में सदैव चेतन रह सकें और देशद्रोहियों को मुंहतोड़ उत्तर दिया जा सके।

प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन का आयोजन

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अंडमान एवं निकोबार: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में अंडमान एवं निकोबार विभाग द्वारा 14 दिसंबर 2025 को डी.बी.आर.ए.आई.टी. ऑडिटोरियम में “प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन” का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

सम्मेलन में जनप्रतिनिधि, नगर परिषदों के निर्वाचित सदस्य, ज़िला परिषद व पंचायत राज संस्थाओं के प्रतिनिधि, वरिष्ठ नागरिक, सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षाविद्, चिकित्सक, अधिवक्ता, प्रतिष्ठित व्यापारी, कलाकार, विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक गैर-सरकारी संगठनों के सदस्य, मीडिया प्रतिनिधि और श्री विजयपुरम् के अनेक सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित नागरिक उपस्थित रहे।

प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन में मोहन भागवत जी ने संघ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके विकास की चर्चा करते हुए बताया कि संघ किस प्रकार गुणवान स्वयंसेवकों के निर्माण के माध्यम से स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र के निर्माण हेतु कार्य करता है। उन्होंने संघ से जुड़ी विभिन्न भ्रांतियों का भी निराकरण करते हुए कहा कि आरएसएस का उद्देश्य केवल “सज्जनों” अर्थात् गुणवान मनुष्यों का निर्माण करना है, जो निःस्वार्थ भाव से समाज में मूल्य आधारित जीवन का प्रसार कर राष्ट्र गौरव और विकास को सुदृढ़ करें।

कार्यक्रम के अंतर्गत प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें श्री विजयपुरम् के नागरिकों ने राष्ट्रीय सुरक्षा, शिक्षा, और राष्ट्रीय दृष्टिकोण से जुड़े प्रश्न प्रस्तुत किए। सरसंघचालक जी ने कहा कि प्रत्येक नागरिक अपनी प्राचीन भारतीय सनातन संस्कृति को अपनाकर, आत्मनिर्भरता (स्वदेशी आत्मनिर्भरता) को प्रोत्साहित करते हुए, राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकता है।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्र गीत “वंदे मातरम्” के साथ हुआ।

मिशनरी के नए हथकंडे: कन्वर्जन के नए षड्यंत्रों को पहचानिए

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रवि पाराशर

दिल्ली । किसी व्यक्ति, समूह या विषय को लेकर समय-समय पर धारणा-अवधारणा बदलना मनुष्य का मूल स्वभाव है। औषधियों और खाद्य पदार्थों समेत उपभोग की तमाम भौतिक वस्तुओं और उनके विशेषज्ञों के गुणधर्म और अनुभव स्थिर रहने पर भी उन्हें बरतने के मामले में व्यक्तियों की राय बदलना भी स्वाभाविक मानसिक प्रक्रिया है। किंतु बड़ा प्रश्न यह है कि किसी व्यक्ति या समूह की मौलिक आस्था में क्या परिवर्तन संभव है? मूल प्रकृति के उगाए ‘आलू’ को किसी तरह का कर्मकांड कर ‘POTATO’ कहने से उसके गुणधर्म में मौलिक तो छोड़िए, क्या कोई भी परिवर्तन हो सकता है? उत्तर के लिए कोई पोथी पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। सीधा सा जवाब है कि नहीं हो सकता।

कन्वर्जन अमानवीय है
यदि सैद्धांतिक और मौलिक व्यावहारिक व्याख्या सिद्ध करती है कि आध्यात्मिक आस्थाओं का मौलिक स्वरूप भौतिक कर्मकांड के माध्यम से नहीं बदल सकता, तो फिर बड़ा प्रश्न यह है कि इस्लाम और ईसाई धर्म दूसरी मान्यताएं, आस्थाएं रखने वाले लोगों के कन्वर्ज़न की मुहिम में क्यों लगे हैं? इसके लिए वे छल-कपट के तमाम प्रपंच क्यों रच रहे हैं? विद्वानों को इस बारे में व्यापक विवेचना करनी चाहिए कि दुनिया के दो बड़े और शक्तिशाली समूह संगठित तौर पर साम-दाम-दंड-भेद के सिद्धांत पर अमल करते हुए भारत में कन्वर्ज़न की काली मुहिम में क्यों जुटे हुए हैं?
एक स्थूल उत्तर अक्सर यह मिलता है कि इस्लाम का प्रचार करने वाले भारत समेत पूरी दुनिया को इस्लामिक वर्ल्ड में बदलना चाहते हैं, यह उनका अंतिम धार्मिक उद्देश्य है। पता नहीं ईसाई मिशनरी का भी अंतिम धार्मिक उद्देश्य यही है या नहीं। किंतु विश्व को मुस्लिम वर्ल्ड बनाने की लालसा क्या किसी भी तरह आध्यात्मिक कर्तव्य के दायरे में रखी जा सकती है और क्या ऐसा करना मानवीय हो सकता है? क्या नृविज्ञान में इस मानवीय प्रवृत्ति की कोई स्पष्ट व्याख्या है? इन प्रश्नों की विवेचना भी आवश्यक है।

परिवर्तनीय नहीं है हिंदुत्व
एक और प्रश्न पर भी संक्षेप में विचार कर लिया जाए कि क्या किसी तरह का कर्मकांड कर देने से किसी शाश्वत सनातनी मौलिक हिंदू का धर्म उसकी इच्छा या अनिच्छा से बलपूर्वक या छल-कपट से बदला जा सकता है? सनातन परंपरा में धर्म शब्द का आशय अंग्रेज़ी के रिलीजन शब्द जैसा नहीं है, बल्कि कर्तव्यों का द्योतक है। कोई हिंदू जानबूझ कर या धोखे से कन्वर्जन कर ले या षड्यंत्र का शिकार हो जाए, तो भी सैद्धांतिक तौर पर वह हिंदू ही रहेगा। पूजा पद्धति, वेशभूषा, खान-पान बदल लेने से मूल हिंदू नागरिक ईसाई या मुसलमान नहीं हो जाएगा।
भारतीय चिंतन परंपरा के हिसाब से सैद्धांतिक तौर पर ऐसा नहीं हो सकता, फिर भी कुचेष्टाओं के आगे झुकने से व्यावहारिक तौर पर नकारात्मक संदेश ही समाज में जाता है। इसलिए बहुत से संतों, महात्माओं, सिख गुरुओं ने प्राणों की आहुतियां दीं, लेकिन कन्वर्ज़न नहीं किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि धर्म बदलना सबसे बड़ा पाप है। इस चर्चा के बीच यह भी हम जानते ही हैं कि संवैधानिक तौर पर भारत आज पंथ-निरपेक्ष राष्ट्र है। कोई भी भारतीय स्वेच्छा से किसी रिलीजन को अपना सकता है। संविधान में हर धर्म का आदर सुनिश्चित किया गया है। इसलिए डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महापुरुष बड़े विमर्श के साथ धर्म बदलते हैं, तो वे हिंदू समाज के लिए तिरस्कृत या कम सम्माननीय नहीं हो जाते। बहुत से विदेशी महापुरुषों ने अपना मूल धर्म त्याग कर सनातन धर्म अपनाया है, तो वे अधिक आदरणीय नहीं हो जाते।

ईसाई मिशनरी ने ओढ़ा छद्म चोला
इस लेख में हम बताने का प्रयास कर रहे हैं कि धर्म परिवर्तन या मतांतरण या कन्वर्ज़न सबसे बड़ा पाप है, फिर भी इस्लाम और ईसाइयत के दलाल अमानवीय हरकतों में लिप्त हैं। हमें पता है कि जब दुनिया कोविड-19 महामारी से लड़ रही थी, तब भी ईसाई मिशनरी मानवता की सेवा के बजाय कन्वर्जन का कुचक्र रचने में जुटी थी। इसके लिए तरह-तरह के नए हथकंडे अपनाए जा रहे थे। अब तो कन्वर्जन के षड्यंत्रों को भारतीयता के रंग में रंगा हुआ दिखाया जा रहा है, ताकि निश्छल लोगों को आसानी से भ्रमित किया जा सके।

यीशु के भारतीयकरण का छद्म
मिशनरी ने अब ईसाई धर्म को भारतीय धार्मिक आवरणों, प्रतीकों, संस्कृति के अनुसार ढालना शुरू कर दिया है। भोले-भाले अशिक्षित लोगों को लगता है कि वे जो देख रहे हैं, गा रहे हैं, वह सनातन वैदिक परंपरा के रंग में ही रंगा हुआ है। लेकिन असल में वह ईसाइयत की मान्यताओं से ही जुड़ा है। इस्लाम धर्म के उलट हिंदुत्व की तरह ईसाई धर्म में भी मूर्ति पूजा निषिद्ध नहीं है। भारत में इस बात का ही लाभ मिशनरी उठाना चाहती है। लोगों को समझाया जा रहा है कि कृष्ण भक्ति छोड़े बिना यीशु की भक्ति की जा सकती है, क्योंकि दोनों में बहुत समानता है। कृष्ण, जगत को पालने वाले हैं, तो यीशु भी जगत के परमेश्वर हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि श्रीमद्भागवत और गीता के उद्धरण देकर, बचकाने तर्क गढ़ कर हिंदुओं को ईसाइयत अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। हमारे विचार से ही हम पर प्रहार किया जा रहा है।
ब्रज सहित पूरे भारत में भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को बहुत रुचिकर लगता है। मिशनरी ने इसका लाभ लेने का षड्यंत्र रचा और ईसा मसीह को बाल रूप में कृष्ण की तरह दिखाया जाने लगा है। मदर मेरी की छवि भी माता यशोदा जैसी बनाई जा रही है। इतना ही नहीं, मदर मैरी की गोद में बाल गणेश या बाल कृष्ण के बैठे होने की तस्वीरों का सहारा भी लिया गया, ताकि भोले-भाले हिंदुओं को भ्रमवश अनुभव हो कि वे किसी विधर्मी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि हिंदुत्व की ही किसी दूसरी सनातन परंपरा से जुड़ रहे हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
सनातन आस्था के बड़े केंद्रों और जनजातीय क्षेत्रों में काम कर रहे मिशनरी कार्यकर्ताओं की वेशभूषा में भी आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया गया है। कन्वर्जन के षड्यंत्रकारियों ने कोट-पेंट छोड़ कर भगवा कपड़े, माथे पर तिलक और गले में रुद्राक्ष, तुलसी इत्यादि की माला, हाथ में कलावा इत्यादि हिंदुत्व के प्रतीक अपना लिए हैं। परंपरागत भारतीय मालाओं में छोटे क्रॉस डालकर पहने-पहनाए जा रहे हैं। ईसाइयत के प्रति आस्था की व्याख्या वे खड़ी हिंदी में नहीं, बल्कि ब्रज भाषा और जनजातीय भाषाओं में ही उतने ही सधे हुए देशज उच्चारण में करते हैं। कुल मिला कर जिस तरह ‘साई’ अब ‘ओउम् साई राम’ हो गए हैं, उसी तरह जीसस या यीशु का भी विशुद्ध भारतीयकरण कर दिया गया है।
ब्रज में कृष्ण की उपासना के लिए तरह-तरह के लोकगीत आरती के रूप में ब्रजभाषा में वहां की लोकधुनों में गाए जाते हैं। इसी तरह मिशनरी ने ईसा मसीह की प्रार्थनाएं ब्रज भाषा में रच डाली हैं, जो कृष्ण भक्ति के गीतों की लोकधुनों पर ही आधारित हैं। यीशु के कृष्ण सदृश्य चित्रों, आरतियों की सीडी और पुस्तकों का वितरण बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। देखने में वे बिल्कुल भारतीय धार्मिक साहित्य जैसी लगती हैं। यीशु के लिए ‘परमेश्वर’ शब्द का ही प्रयोग मुख्य रूप से हो रहा है। परमेश्वर शब्द भारतीय आध्यात्मिक चिंतन प्रक्रिया में ईश्वर की परम् सत्ता के लिए प्रयुक्त होता है, इसलिए भ्रम की स्थिति बनती है। लोगों को लगता है कि यह कोई बहुत भिन्न राह नहीं है। दोनों राहें साथ-साथ अपनाई जा सकती हैं। कृष्ण भक्ति छोड़नी नहीं है, यीशु भक्ति अपनानी है, जिसके लिए उत्कोच (पैसे, अनाज, दूसरी वस्तुएं, रोजगार, इलाज, स्कूलों में प्रवेश इत्यादि) भी मिल रहा है, तो फिर परेशानी क्या है!
ब्रज की लोकधुनों पर आधारित यीशु के गीतों के वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल किए जा रहे हैं। चमत्कारी कहानियों पर आधारित वीडियो में यीशु के बाल रूप को कृष्ण के जैसा दिखाया जा रहा है। आम तौर पर भेड़ चराते यीशु की तस्वीरें देखने को मिलती हैं, लेकिन ब्रज क्षेत्र में गोवंश चराते हुए यीशु के चित्र प्रचलित किए जा रहे हैं। कुल मिला कर कृष्ण भक्तों को लालच देकर कन्वर्जन के जाल बुने जा रहे हैं। उन्हें समझाया जा रहा है कि यीशु और कृष्ण की भक्ति में कोई अंतर नहीं है। यदि वे यीशु की पूजा करेंगे, तो उनका परलोक तो सुधरेगा ही, जीवित रहते कई तरह की भौतिक सुविधाएं भी मिलेंगी। कुछ सेटेलाइट धार्मिक टीवी चैनलों पर स्लॉट लेकर और बहुत से यूट्यूब चैनलों के माध्यम से दुष्प्रचार को धार दी जा रही है। लोग झांसे में आ भी रहे हैं। हालांकि विश्व हिंदू परिषद और दूसरे कई संगठन इस दुष्प्रचार की धार कुंद करने में लगे हैं।

शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से सॉफ्ट कन्वर्जन
ईसाई मिशनरी देश भर में बहुत से शिक्षण संस्थान चला रही है। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति की गहरी जड़ों की वजह से देश में कॉन्वेंट शिक्षा के प्रति आग्रह बढ़ा है। हालांकि अब नई शिक्षा नीति लाई गई है, लेकिन शिक्षा के पूरी तरह भारतीयकरण में समय लगेगा। मिशनरी द्वारा संचालित स्कूलों में दैनिक प्रार्थनाओं और दूसरी कई नियमित परंपराओं के माध्यम से विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के मन में ईसाइयत के प्रति निष्ठा के बीज बोने का प्रयास किया जाता है। क्रिसमस और दूसरे ईसाई उत्सवों के अवसर पर छात्र-छात्राओं और अभिभावकों को प्रार्थना सभाओं और दूसरे कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए चर्च आने को विवश किया जाता है।
मिशनरी स्कूलों में भारतीय वेशभूषा निषिद्ध है। कोट-पेंट-टाई और स्कर्ट पहनना अनिवार्य है। गले में तुलसी या रुद्राक्ष की माला, जनेऊ, माथे पर तिलक, हाथ पर कलावा या सिर पर चोटी जैसे हिंदू प्रतीक छात्र-छात्राएं धारण नहीं कर सकते। अंग्रेज़ी नव वर्ष के अवसर पर सेंटा क्लॉज के माध्यम से अबोध बच्चों के मन में ईसाइयत के प्रति प्रेम जगाने के प्रयास किए जाते हैं। क्रिसमस पर बहुत से सनातनी परिवार छोटे-छोटे बच्चों को सेंटा की वेशभूषा पहनाने लगे हैं। घरों में क्रिसमस ट्री भी सजाने लगे हैं।
‘जिंगल बेल’ जैसी धुनें बहुत से लोगों की जुबान पर चढ़ चुकी हैं। जन्मदिन और दूसरे शुभ अवसरों पर पूजा-पाठ, कथा, हवन की बजाय केक काटने की परंपरा आम हो चुकी है। विरोध जताने के लिए या किसी मांग के समर्थन में मोमबत्तियां जला कर रैलियां या प्रदर्शन करने की परंपरा भी चर्च की ही देन है। मालाओं में सजावटी क्रॉस पहनना आम होता जा रहा है। इस तरह धर्म बदले बिना ही एक तरह से सॉफ़्ट कन्वर्जन किया जा रहा है। बहुत से सनातनधर्मी अज्ञानतावश या मजबूरी में इसके शिकार हो रहे हैं।

इलाज, सहायता के नाम पर कन्वर्जन
ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी इलाज के नाम पर कन्वर्जन की मुहिम चला रही है। उचित चिकित्सा व्यवस्था नहीं होने और आसपास के शहरी क्षेत्रों में महंगा इलाज होने के कारण अनुसूचित जनजाति और पिछड़े इलाकों के लोग मिशनरी के जाल में फंस जाते हैं। पंजाब में चंगाई सभाओं के माध्यम से ईसाइयत का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। विषम परिस्थितियों में या प्राकृतिक आपदाओं के समय सेवा कार्यों के माध्यम से सहानुभूति जता कर भी कन्वर्जन के लिए विपन्न लोगों को प्रेरित किया जा रहा है।

आयुर्वेद को नीचा दिखाने का षड्यंत्र
कोविड-19 महामारी के दौरान रोजगार दे कर और खाने-पीने की व्यवस्था कर भी कन्वर्जन की कई घटनाओं का पता चला है। इतना ही नहीं, कन्वर्जन के अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र के अंतर्गत बहुत सुनियोजित तरीके से भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को नीचा दिखाने का हरसंभव प्रयास काफी समय से किया जा रहा है। कोरोना महामारी के काल में आयुर्वेद के प्रति दुष्प्रचार की गति बढ़ी। वह तो संयुक्त राष्ट्र द्वारा भारतीय योग परंपरा को वैश्विक स्तर पर मान्यता देने के बाद आयुर्वेद का सिक्का पूरी दुनिया में चल निकला है। फिर भी षड्यंत्र जारी हैं।

आईएमए के दुरुपयोग का षड्यंत्र
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन अर्थात आईएमए की आड़ में कन्वर्जन के प्रयासों का भी पता चला है। सोचिए कि षड्यंत्र कितना बहुआयामी है। मई, 2021 के आखिर में दिल्ली की एक कोर्ट ने आइएमए के अध्यक्ष डॉ. जॉनरोज ऑस्टिन जयालाल को समन जारी किया। उन्होंने अपने एक लेख में कोविड-19 महामारी के प्रकोप को कन्वर्जन का सही अवसर मानते हुए बीमारी से जूझ रहे लोगों के ईसाई धर्म में कन्वर्जन के प्रयास तेज करने का सुझाव दिया था। जून की शुरुआत में कोर्ट ने डॉ. जयालाल को बाकायदा निर्देश दिया कि वे धर्म के प्रचार के लिए अपने पद का दुरुपयोग करते हुए आईएमए के मंच का प्रयोग न करें। एक रिपोर्ट के अनुसार अनफोल्डिंग वर्ल्ड के प्रमुख डेविड रीव्स ने अप्रैल में मिशनरी न्यूज नेटवर्क को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ‘कोरोना वर्ष यानी 2020 में भारत में चर्च प्लांटिंग पार्टनरों ने इतने चर्च बनाए, जितने इससे पहले के 25 वर्षों में नहीं बनाए गए थे।

जाल में फंसने से कैसे बचें?
ईसाई मिशनरी के कन्वर्जन के प्रयासों को नाकाम करना है, तो बहुत से स्तरों पर सावधानियां बरतने की आवश्यकता है। बच्चों में शुरुआत से ही सनातन संस्कार डालें। उन्हें संस्कारों से जुड़ी वैज्ञानिक अवधारणाओं के बारे में बताएं। जहां-जहां ईसाइयत को भारतीय जामा पहनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, उन क्षेत्रों में सनातन समाज को साधु-संतों के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाना चाहिए। भारतीयता की श्रेष्ठता और महत्ता के प्रति जागरूकता अभियान चलाना बहुत आवश्यक है।
कॉन्वेंट स्कूलों के सॉफ्ट कन्वर्जन के प्रयासों का दृढ़ता पूर्वक विरोध करें। जिस सीमा पर लगे कि बच्चों में कन्वर्जन के बीज रोपे जा रहे हैं, सामाजिक स्तर पर संस्थागत सोच के साथ इसका विरोध होना चाहिए। भागवत कथाओं और दूसरे धार्मिक आयोजनों में बच्चों को नियमित रूप से ले जाना चाहिए, ताकि कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ने के बाद भी उनके मन में ईसाइयत के रंग में रंगने का विचार न उभरे। घर में आंगन या बालकनी में तुलसी का पौधा अनिवार्य रूप से रखें। घर के मंदिर में नियमित रूप से पूजा-पाठ करें। बच्चों को भी इसकी आदत डलवाएं।
31 दिसंबर को अंग्रेजी नव वर्ष का अंत होता है, यह बात बच्चों के साथ-साथ युवाओं के मन में भी बैठानी चाहिए। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के संदेशों में ‘ईयर’ शब्द से पहले ‘इंग्लिश’ जोड़ने की परंपरा विकसित करने का आग्रह बच्चों से करें। पहले चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवरात्रि की शुरुआत से हिंदू नव वर्ष प्रारंभ होता है। उस दिन सपरिवार समारोह पूर्वक उत्सव मनाएं। शुभ अवसरों पर केक काटने की परंपरा से बचें। केक कटे, तो पूजा-पाठ भी हो। बच्चों को क्रॉस या दूसरे धार्मिक चिन्ह धारण करते पाएं, तो उन्हें सजग करें। ऐसी ही छोटी-छोटी सावधानियां बरत कर सॉफ्ट कन्वर्जन से बचा जा सकता है। सनातन संस्कारों की नींव शक्तिशाली होगी, तो बाद में आस्था के भवन पर दूसरा रंग नहीं चढ़ पाएगा। हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि का प्रयोग बढ़ाएं। सोशल मीडिया पर रोमन में हिंदी लिखने से बचें।
भारत का संविधान सभी धर्मों के आदर का संदश देता है। धर्मांतरण या मतांतरण या कन्वर्जन एक तरह से राष्ट्रांतरण ही है। कन्वर्जन मात्र आस्था या पूजा पद्धि बदलने का प्रश्न नहीं, इससे कहीं अधिक संवेदनशील मामला है। ईसाई मिशनरी यदि भगवान कृष्ण और दूसरे सनातन देवी-देवताओं से बहुत प्रभावित है, श्रीमद्भागवत और गीता में ईसाइयत का सार निहित है, तो वे ईसाइयत छोड़ कर हिंदुत्व क्यों नहीं अपना लेते?

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