
Speaking about the fate of Sanatani Hindus, he expressed anguish that the majority society of India continues to be divided in various castes, regional and linguistic differences which finally put the Hindus to suffer in their own land.



“अगर राजनीतिक नेता अस्पताल जाकर सोनम से मिलें और उन्हें भरोसा दिला दें कि संसद सत्र में शिक्षा की जवाबदेही का मुद्दा उठाएंगे, तो सोनम कल अपनी भूख हड़ताल खत्म कर देंगे।”
बस। इतना ही।
न कोई धरना, न कोई चक्का जाम, न कोई इस्तीफे की मांग। खासकर धरमेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो सोनम के शब्दों में कहीं था ही नहीं। जैसे किसी ने अरुंधति सुजेना रॉय, कॉलिन गोंसाल्वेस, योगेन्द्र यादव के लिखे पूरे स्क्रिप्ट को बीच में ही फाड़कर फेंक दिया हो।
अब देखिए मजा। राकेश टिकैत, अभिजीत दिपके, चंद्रशेखर आजाद, विजेता दहिया, संजय सिंह, मनोज झा — ये सारे ‘जन-नेता’ जो शिक्षा के मुद्दे पर सोनम की भूख हड़ताल को अपनी दुकान खोलने का सुनहरा मौका समझ रहे थे, उनकी सारी तैयारी धरी की धरी रह गई।
कल तक तो ये लोग सोनम को अपना हथियार बना रहे थे। “देखो, मोदी सरकार शिक्षा का गला घोंट रही है, प्रधान इस्तीफा दो!” का नारा लगाकर कुदरती बिरयानी बांट रहे थे। इन महानुभावों को लगा था कि इस बार फिर वही पुराना फॉर्मूला चल जाएगा — कोई मुद्दा पकड़ो, कोई चेहरा आगे करो, खुद पीछे से वोट और वायरल फेम बटोर लो।
लेकिन सोनम ने, या कहें उनकी पत्नी ने, एक ही वाक्य में सबकी दुकान उजाड़ दी।
कोई इस्तीफा नहीं। कोई व्यक्तिगत हमला नहीं। सिर्फ शिक्षा में जवाबदेही। बस।
अब ये सारे ‘ आंदोेलनजीवी योद्धा” क्या करें?
सोनम की भूख हड़ताल को कुदरती बिरयानी बांटने वालों ने अपना राजनीतिक स्टॉक बढ़ाने का अवसर समझ लिया था।
जंतर-मंतर पर आज जो हवा चली, वो क्रांति की नहीं, हकीकत की थी। और हकीकत ने कई दुकानों का सामान एक झटके में बिखेर दिया। अब ये ‘आंदोलनजीवी’ सोच रहे होंगे — अगली बार किस मुद्दे पर ‘जन-आंदोलन’ का ड्रामा रचा जाए? क्योंकि इस बार तो सोनम ने स्क्रिप्ट ही बदल दी।
लेकिन षडयंत्रकारियों का गिरोह इतनी आसानी से मानेगा नहीं। जो मंच के पीछे थे, धीरे धीरे मंच पर आकर कब्जा लेने लगे थे। सोनम के एक बयान ने उनके इरादे के गुब्बारे को फिलहाल पंचर दिया है। अब जंतर मंतर पर बैठे पंचर ठीक करने वाले कल कौन सा नया बखेड़ा खड़ा करते हैं, देखते रहिए।
कहानी में बड़ा बदलाव तब आया जब रंजीत पंडित 1944 में गुज़र गए और देश आजाद होता देख संपादक जी फिर से भारत वापस आ गए. सरकार की कमान नेहरूजी के पास आजादी से पहले ही आ गई थो. आजादी के बाद नेहरूजी को उनका इलाज करना था तो बहन और उनके प्रेमी दोनों को अलग अलग देशों का राजदूत बनाकर भेज दिया. अब अपने देशों में मिलो या तीसरे में, लेकिन भारत से दूर रहो.
क्या गांधी जी का प्रेमी जोड़े को अलग करना नैतिक या कानूनी रूप से ठीक था? पटेल की जगह नेहरू को चुनने जैसे कई उनके निर्णय ऐसे ही विवादित रहे हैं. ऐसे ही ध्वज समिति की पसंद भगवा होने के बावजूद तिरंगा चुनना भी गांधीजी की जिद थी और उसपर ये कहकर कि अंग्रेज़ स्वेच्छा से भारत छोड़कर जा रहे हैं तो उनका झंडा यूनियन जैक तिरंगे के कोने पर हो, ये चूक की पराकाष्ठा थी. हालांकि जल्द मरने जा रहे जिन्ना को पीएम बनाने के उनके सुझाव पर नेहरू ने टाँग ना अड़ाई होती तो देश का विभाजन रुक जाता. क्या होता? जिन्ना पीएम और कैबिनेट आपके नेताओं का. एक भी ग़लत फ़ैसला नहीं लेने देते.
कई बार ये निर्णय आपके किसी व्यक्ति से करीबियों के चलते भी प्रभावित होते हैं. नेहरू जी ने भी ऐसे तमाम निर्णय लिए, ये क्या घर की खेती थी कि किसी को भी राजदूत बनाकर कहीं भी भेज दिया? जबकि उनकी बहन ने तो किसी स्कूल तक से औपचारिक शिक्षा तक नहीं ली थी. और भी सैकड़ों केस हैं उनके ऐसे निर्णयों के. याद रखिए उनके ख़ुद के बहनोई ने उनके नाम मीडिया में खुला पत्र लिखा था, जवाहर लाल इस देश का सबसे बड़ा nepotist है. (मेरी किताब में पढ़िये)
इंदिरा गांधी तो गलतियों का ख़ज़ाना थीं, उनका बेटा संजय लड़कपन में एक कर्नल की कार चुराकर भागता है, कार डिवाइडर पर चढ़ जाती है. केस पीएम हाउस पहुंचता है और रातों रात संजय फ्लाइट से लंदन, कहा यहाँ था ही नहीं और रातों रात कार की जगह बाइक हो जाती है और चोरी का तो कोई केस ही नहीं बना. आप देश के प्रधानमंत्री से ऐसी उम्मीद कर सकते हैं. महाराष्ट्र में एक बिज़नेस मेन ने एक फाइव स्टार होटल खोलने की अनुमति मांगी तो सीएम ए आर अंतुले ने कहा इंदिरा प्रतिष्ठान ट्रस्ट में 5 करोड़ सहयोग राशि जमा कर दो. सीधे पीएम देखती हैं. बिज़नेस मेन अरुण शौरी का दोस्त था. इंदिरा गांधी ने अपना पल्ला झाड़ लिया लेकिन अरुण शौरी ने इंदिरा गांधी के उस ट्रस्ट के पेपर को साइन करने का फोटो छाप दिया.
ऐसे में वित्त मंत्री केआर नारायणन को आगे किया गया. उन्होंने झूठ तक बोला. बाद में उनको राष्ट्रपति बना दिया गया. बावजूद इसके उन्होंने कोई इस्तीफ़ा नहीं दिया, ना माफ़ी माँगी.
माफ़ी तो बोफोर्स कांड के बाद राजीव गांधी ने भी नहीं माँगी, उल्टा बिग बी को फँसा दिया. मुलायम ने ख़ुद माना था कि हमने बोफोर्स की फाइल रक्षा मंत्री रहते ग़ायब करवा दी. ना कभी इंदिरा ने शिकवा किया, ना राजीव ने और ना मुलायम सिंह ने. कितना बड़ा अपराध था कि अमेरिका में बॉम्ब फोड़ने के आरोप में बंद राजीव गांधी के दोस्त के बदले एंडरसन को छोड़ दिया गया. सबके कार्यकाल में ऐसे अपराधों, भयंकर चूकों और घोटालों को लिस्ट लंबी है . यहाँ जगह नहीं उन सबके बारे में लिखने की.
लेकिन ऐसे निर्णयों को उनकी पार्टी के नेता परिस्थिति जन्य त्वरित निर्णय या ‘एरर ऑफ़ जजमेंट’ कहकर टाल देते हैं. ऐसे में दुख तब होता है जब जिंदगी राम के नाम होम कर देने वाले प्रोफेसर रहे चंपत राय से एक ऐसा ही एरर ऑफ़ जजमेंट हुआ तो चिरकुट से लोग आकर उनके और टिन्नू के बीच सेक्सुअल रिश्तों के आरोप लगाने लगे. हज़ारों ऋषि मुनि विवाह नहीं करते थे तो क्या उन सबके बारे में आपकी यही सोच है? है तो बड़ी वीभत्स है.
ये एरर ऑफ़ जजमेंट ही तो था कि उन्होंने कुछ लोगों पर भरोसा किया और ये भी कि चोरी पकड़े जाने के बाद, पुलिस की मदद लेने के बावजूद FIR नहीं करवाई. उनको लगा कि राम का ये पावन धाम इन चोरों की वजह से बदनाम हो जाएगा. मेरे पास ऐसे १००० केस तो होंगे ही जो देश भर की सर्वोच्च हस्तियों से जुड़े हैं, जहाँ उन्होंने इस तरह की ग़लतियाँ की हैं. मैंने इस केस की पड़ताल की तो पाया MoU में साफ़ लिखा है कि गणना बैंक की ज़िम्मेदारी थी, पकड़े गए सभी कर्मचारी (टिन्नू के अलावा) बैंक से pay ले रहे थे. काउंटिंग भी मंदिर के मुख्य भाग के बजाय गेट नंबर १ के पास एक सुविधा केंद्र के बेसमेंट में बैंक का गणना कक्ष में होती थी. सीसीटीवी की जिम्मेदारी भी पुलिस की थी, ट्रस्ट की नहीं. उनकी जिम्मेदारी बस एक आदमी को वाहन सहायता के लिए रखने और बॉक्स पर दो तालों में से एक पर ताला लगाने खोलने की थी. गणना भी हाथ से नहीं बल्कि मशीन से होती थी. कर्मचारियों का काम बस मुड़े नोटों को सीधा कर मशीन में डालना भर होता था.
ऐसे में चंपत राय की ये गलती थी कि उन्होंने हर बात अपने या ट्रस्ट के सर ले ली, सीधे कह देते कि बैंक से पूछिए. यहाँ तक कि लोगों ने जब अपने अपने दान किए सामानों के बारे में पूछा तो उनका जवाब लेट था, उनको अंदाज़ ही नहीं था कि इसका मतलब क्या होगा? हर कोई ऐरा सच मानकर वीडियो बनाता रहेगा.
जबकि सच ये था कि SIT वाले रजिस्टर ही उठा ले गए थे, सारे समान की लिस्ट और कहाँ रखा है या जमा है, उसकी जानकारी भी उसी में थी. तो उनको ढूँढ ढूँढ कर दिखाया गया. यहीं ट्रस्ट के पास कोई सुधांशु त्रिवेदी या संबित पात्रा जैसा प्रवक्ता होता तो सबको अपने जवाबों से शांत कर देता. मंदिर निर्माण में कमीशन के भी आरोप लगे, मंदिर निर्माण का जिम्मा एल एंड टी के सर था, जो देश भर में मेट्रो का जाल बिछा रही है. इसके रोजमर्रा के काम का भी ट्रस्ट से कोई लेना देना नहीं, पीएम के FIR ना करवाने के अलावा जो बड़ी गलती है वो ये कि बैंक या एल एंड टी ने कुछ बंदे मांगे तो जो लोग उनसे नौकरी माँगते रहते थे, अयोध्या के दौरान जो संपर्क में आए थे उनको बढ़ा दिया. उन्हीं में से एक मुख्य अभियुक्त अनुकल्प मिश्रा था. अनुकल्प और उसके लाये 5 साथियों को बैंक ने कुंभ मेले की व्यस्तता में बैंक ने अस्थायी तौर पर रख लिया. इसलिए टिन्नू पर भी अभी कोई बड़ी बरामदगी या उसके ख़िलाफ़ सुबूत नहीं मिला. इन गिरफ्तार लोगों में वो अकेला ट्रस्ट का कर्मचारी है. लेकिन किसी ने भी चंपत राय, अनिल मिश्रा या गोविंद गिरी जी का नाम गैंग में नहीं लिया.
ऐसे में निजी क्षेत्र में सारी नौकरियां ही सिफारिश पर मिलती हैं, मेरी तो सारी ही क्योंकि न्यूज़ चैनल्स, अख़बारों में कभी कभी ही विज्ञापन निकलते या टेस्ट होते हैं और मैंने दिग्विजय सिंह तक का हाथ से लिखा हुआ सिफ़ारिशी पत्र देखा है. और FIR ना करवाना अगर अपराध है तो मैंने मीडिया चैनल्स में यौन शोषण के आरोपियों तक को दोबारा नौकरी पर रखते देखा है, ऐसे कई केस सारे मीडिया वालों को पता है. ना जाने कितने भ्रष्ट पत्रकार एचआर ने पकड़े, उनको वार्निंग देकर नौकरी से निकाला गया बस, जेल नहीं भेजा गया. हाल ही में एक चैनल में एचआर वाले भी फरजीवाड़े में पकड़े गए लेकिन किसी थाने में FIR नहीं. लेकिन वही लोग अब इस मुद्दे को उछालें तो दिलचस्प तो लगता ही है, हालांकि मेरा मानना है कि चंपत राय जी को नैतिक जिम्मेदारी तो इस केस की लेनी ही चाहिए.
लेकिन असली कहानी तो चंपत राय के बहाने योगी, मोदी तक को निपटाने की है. सनातनियों के बीच संघ की छवि ख़राब करने की है. इसलिए ‘बिलो द बेल्ट’ वार करने में भी गुरेज नहीं. इसलिए पुराना ज़मीन ख़रीद का मुद्दा भी निकाला गया, जबकि उस मामले पर कई बार कागजों के साथ स्थिति स्पष्ट की जा चुकी है कि हर ख़रीद पारदर्शिता से हुई है. बहती गंगा में हाथ धोने के लिए कुछ वो लोग भी मैदान में उतर गए जो आजकल संघ परिवार में साइड लाइन हैं. और वो लोग भी जो ट्रस्ट में जगह पाकर अपनी हैसियत और बढ़ाना चाहते हैं.
हो सकता है चंपत राय में लोगों को थोड़ा बहुत अहंकार दिखता हो, लेकिन किसी भी पद पर बैठा व्यक्ति सबके मन की तो नहीं कर सकता, सो किसी को भी मना करने अहंकार जैसे आरोपों को न्योता देता है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि चंपत राय किसी भी तरह की चोरी या स्कैम में शामिल हैं. अमिताभ बच्चन भी सात साल बाद बोफोर्स घोटाले से बरी हुए थे. ऐसे में जबरन मीडिया ट्रायल केवल तर्क कुतर्कों के आधार पर चलाने से व्यूज़ तो आ सकते हैं, लेकिन आपकी विश्वसनीय पर सवाल भी उठाते हैं. लेकिन जिम्मेदारीपूर्ण संघ व ट्रस्ट की भी है कि जो सवाल उनकी विश्वसनीय को लेकर उठ गए हैं, उनसे भी निपटे.
(जाहिर है ये मैंने SIT रिपोर्ट आने से पहले लिखा है, रिपोर्ट आने के बाद काफ़ी कुछ स्पष्ट होगा)
Jodhpur: Prime Minister Shri Narendra Modi will visit Rajasthan and Gujarat on 4 July 2026. At around 10:45 AM, Prime Minister will inaugurate the Terminal Building of Jodhpur Airport and launch the Modified UDAN scheme in Jodhpur…
PM in Jodhpur
In a major boost to the aviation sector, with a particular focus on regional connectivity, Prime Minister will launch the Modified UDAN Scheme in Jodhpur. This marks a significant leap forward in India’s civil aviation landscape and will further advance the vision of “Ude Desh ka Aam Nagrik”. With an allocation of ₹28,840 crore over the next 10 years, the scheme aims to accelerate the next phase of aviation-led development. It focuses on multiple strategic components designed to ensure comprehensive and sustainable connectivity.
A key emphasis is on the development of 100 aerodromes from existing unserved airstrips, supported by an outlay of over ₹12,000 crore, to expand aviation infrastructure across the country. In addition, over ₹2,500 crore has been earmarked for Operations and Maintenance (O&M) support to ensure the viability of regional airports during their initial years of operation. To address accessibility challenges in remote and difficult terrains, the scheme also proposes the development of 200 modern helipads.
The scheme also continues Viability Gap Funding (VGF) support of over ₹10,000 crore for airlines, ensuring sustained regional operations while encouraging gradual commercial viability. Further strengthening the vision of Aatmanirbhar Bharat, the initiative includes the procurement of indigenous aircraft and helicopters, such as HAL Dhruv and Dornier platforms, to enhance connectivity and operations in underserved regions.
During the programme, the Prime Minister will also inaugurate the New Terminal Building at Jodhpur Airport. The project has been developed at a total cost of ₹480 crore. Spread over an area of more than 23,000 sqm., the New Terminal Building is designed to handle up to 20 lakh passengers annually. It is equipped with modern passenger amenities to ensure a seamless and comfortable travel experience.
Architecturally inspired by Rajasthan’s royal heritage, the terminal seamlessly blends traditional elements such as arches and jharokhas with contemporary design. Sustainability has been integral to the terminal’s design, with features such as energy-efficient systems, water conservation measures, and green building practices aimed at achieving a 5-Star GRIHA rating. The inauguration of the New Terminal Building at Jodhpur Airport will provide a significant boost to tourism, trade, and employment generation in the region.