सनातन संस्कृति, भारत एवं संघ के विरुद्ध गढ़े जा रहे हैं झूठे विमर्श

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ग्वालियर: भारत आज विश्व के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक परिदृश्य को बदलने में अपनी प्रभावी भूमिका निभा रहा है। पश्चिमी देशों के वर्चस्व को पूर्वी देशों से चुनौती मिल रही है, जिसका नेतृत्व भारत करता हुआ दिखाई दे रहा है। इसलिए, अमेरिका के कुछ विघ्नसंतोषी संस्थानों सहित कुछ विकसित देश सनातन हिन्दू संस्कृति, भारत एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निराधार आरोप लगाकर झूठे विमर्श गढ़ने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। दरअसल, पश्चिमी देशों की समस्या यह है कि वे केवल अपनी आधी अधूरी जानकारी को ही पूर्ण जानकारी मानते हुए अपने विचार तय करते हैं। जबकि, उनके विचार स्पष्टत: सत्यता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। भारत पर आक्रांताओं एवं अंग्रेजो के शासनकाल में भी सनातन हिंदू संस्कृति एवं भारतीय संस्कारों पर जो विचार गढ़े गए थे, वे पूर्णत: गलत पाए गए थे। जैसे, सनातन संस्कृति के संस्कार रूढ़िवादी हैं एवं यह विज्ञान के धरातल पर खरे नहीं उतरते हैं, आदि, आदि। उनके द्वारा सनातन संस्कृति के बारे में गढ़े गए विचार पूर्णत: उनके आधे अधूरे ज्ञान पर ही आधारित थे। परंतु, आज सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कार विज्ञान के धरातल पर खरे पाए जा रहे हैं। पश्चिमी देशों के तथाकथित विद्वानों में सनातन हिंदू संस्कृति, भारत एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में जानकारी का पूर्णत: अभाव है। अमेरिका से प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स नामक एक समाचार पत्र में हाल ही में प्रकाशित एक लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में असत्य विचार प्रकट किए गए हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित यह आलेख न तो भारत के सामाजिक यथार्थ का परिपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है, न ही संघ की वैचारिक और संगठनात्मक वास्तविकता को। इस लेख में तथ्यों, आंकड़ों और स्वतंत्र स्रोतों का संतुलित उपयोग नहीं किया गया है और यह लेख पूर्णत: पूर्वाग्रहों पर आधारित दिखाई देता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास एवं संघ के स्वयंसेवकों द्वारा सम्पन्न किए गए अतुलनीय कार्यों के बारे में इन महानुभावों को कोई जानकारी ही नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में हुई थी और इसके साथ ही संघ ने देश के विभिन्न नगरों एवं ग्रामों में शाखाओं की स्थापना करते हुए भारत के युवाओं में राष्ट्रीयता के भाव को जागृत करना प्रारम्भ कर दिया था। वर्ष 1947 आते आते तो भारत में संघ के स्वयसेवकों की एक बड़ी फौज खड़ी हो चुकी थी। वर्ष 1947 में जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा को पार करने की कोशिश की थी तब संघ के स्वयसेवकों ने कश्मीर की सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बिना किसी प्रशिक्षण के लगातार नजर बनाए रखी थी और तब पाकिस्तानी सेना को रोकने हेतु भारतीय सेना के जवानों के साथ संघ के कई स्वयसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी थी। साथ ही, भारत में विभाजन के समय दंगे भड़कने के दौरान पाकिस्तान से जान बचाकर आए हिंदू शरणार्थियों की सहायता के लिए संघ के स्वयसेवकों ने 3,000 से अधिक राहत शिविर भारत में लगाए थे।

कश्मीर के भारत में विलय के समय पाकिस्तान की सेना कबाईलियों के भेष में भारत की सीमा में घुस रही थी, ऐसे में तात्कालीन केंद्र सरकार यह फैसला नहीं ले पा रही थी कि इन परिस्थितियों के बीच क्या किया जाय क्योंकि उस समय कश्मीर के महाराजा श्री हरी सिंह जी भारत में कश्मीर के विलय सम्बंधी प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर नहीं कर पाए थे। इन विकट परिस्थितियों के बीच सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरु गोलवलकर जी से मदद मांगी और उन्हें कश्मीर में महाराजा श्री हरी सिंह जी से मिलने भेजा। श्री गुरु जी तुरंत कश्मीर गए एवं महाराजा श्री हरी सिंह जी को समझाया और कश्मीर के भारत में विलय सम्बंधी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करा लिए और उसे दिल्ली भेज दिया। इस प्रकार उन्होंने पाकिस्तानी सेना के पूरे कश्मीर पर कब्जे को विफल करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान किया।

दादरा, नगर हवेली और गोवा को मुक्त कराते हुए भारत में विलय में भी संघ के स्वयसेवकों की प्रमुख भूमिका रही थी। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया था, 28 जुलाई 1954 को नरोली और फिपारिया को मुक्त कराया गया और फिर राजधानी सिलवासा को मुक्त कराया गया था। संघ के स्वयसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुर्तगाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया था एवं दादरा नगर हवेली को पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त कराकर भारत सरकार को सौंप दिया था।

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु ने गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से साफ इंकार कर दिया था अतः वर्ष 1955 में संघ के स्वयंसेवकों ने श्री जगन्नाथ राव जोशी जी के नेतृत्व में गोवा पहुंच कर गोवा मुक्ति आंदोलन प्रारम्भ किया, जिसके परिणामस्वरूप जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कई कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाई गई। हालत बिगड़ते देख अंततः भारतीय सैनिकों ने हस्तक्षेप किया और वर्ष 1961 में गोवा को आजादी प्राप्त हुई।

इसी प्रकार वर्ष 1962 में भी चीन के साथ भारत के युद्ध के समय संघ के स्वयसेवकों ने भारतीय सेना की भरपूर मदद की थी। संघ के स्वयंसेवक पूरे उत्साह के साथ सेना की मदद के लिए सीमा पर पहुंचे थे। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी थी। सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद और ययां तक कि शहीदों के परिवारों की चिंता भी संघ के स्वयसेवकों ने की थी। संघ के इस महान योगदान को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु ने भी पहचाना था और 26 जनवरी 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के स्वयंसेवकों को शामिल होने का निमंत्रण दिया था। गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए महीनों की तैयारी की जाती है परंतु केवल 2 दिन पहिले मिले निमंत्रण पर संघ के 3,500 स्वयंसेवक गणवेश में गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल हुए थे।

वर्ष 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री को भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहायता की आवश्यकता पड़ी थी। आपने देश में कानून व्यवस्था की स्थिति को सम्भालने और विशेष रूप से दिल्ली की यातायात व्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अनुरोध किया था ताकि इन कार्यों में व्यस्त पुलिसकर्मियों का भारतीय सेना की मदद में उपयोग किया जा सके। युद्ध के इस कठिन समय में घायल जवानों को सबसे पहिले रक्तदान देने में भी संघ के स्वयंसेवक ही सबसे आगे रहे थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ हटाने का कार्य भी संघ के स्वयसेवकों द्वारा ही सम्पन्न किया गया था।

भारत में शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने हेतु विद्या भारती, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम, स्वदेशी जागरण मंच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों की स्थापना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने की। यह समस्त संगठन आज शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य करते हुए भारतीय संस्कृति के संस्कारों को भारतीय युवाओं के बीच ले जाने का कार्य सफलतापूर्वक कर रहे हैं। 1952 में गोरखपुर में प्रारंभ हुए प्रथम विद्यालय के साथ विद्या भारती वर्तमान में 12,830 औपचारिक विद्यालय तथा 11,350 अनौपचारिक केंद्र के साथ कुल 24,180 प्राथमिक, माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा स्तर पर संचालित करती है जिनमें अध्ययनरत छात्रों की संख्या लगभग 34,48,000 तथा शिक्षकों की संख्या 150,000 है।

वर्ष 1955 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की गई थी। भारतीय मज़दूर संघ विश्व का पहिला ऐसा मजदूर आंदोलन था, जिसने विध्वंस के स्थान पर निर्माण की धारणा की नीति अपनाई थी। विनिर्माण इकाईयों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मजदूर संघ ने ही प्रारम्भ किया था। आज भारतीय मजदूर संघ विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मजदूर संगठन बन गया है।

सेवा भारती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा चालित एक प्रकल्प है। यह मुख्यत: वनवासी क्षेत्रों में कार्य करता है। इसके मुख्य कार्य हैं – शिक्षा, संस्कार, सामाजिक जागरूकता, स्वरोजगार, धर्म-परिवर्तन से वनवासियों की रक्षा, आदि। सेवा भारती, भारत के दूरदराज और दुर्गम क्षेत्रों में 2 लाख से अधिक सेवा कार्य कर रहा है। लगभग 35,000 एकल विद्यालयों में 10 लाख से अधिक छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद में अनाथ हुए 57 बच्चों के गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम एवं 19 हिंदू बच्चे शामिल हैं।

वर्ष 1971 में ओड़िसा में आए भयंकर चक्रवात, वर्ष 1977 में आंध्रप्रदेश में आए चक्रवात, भोपाल गैस त्रासदी के दौरान, वर्ष 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों, वर्ष 2001 में गुजरात में आए भूकम्प, उत्तराखंड में आई भयंकर बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा में संघ के स्वयसेवकों ने राहत और बचाव कार्यों में हमेशा आगे रहकर भागीदारी की है।

महात्मा गांधी ने वर्ष 1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर की यात्रा के दौरान वहां पूर्ण अनुशासन देखा और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पूछताछ की और जाना कि वहां लोग एक साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में इसी प्रकार के विचार बाबा साहेब अम्बेडकर के भी थे।

भारतीय सनातन हिन्दू संस्कृति, भारत एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में हमें अपनी जानकारी को सुदृद्ध करना चाहिए, इसके बाद ही हम उक्त के बारे में गढ़े जा रहे झूठे विमर्श को ध्वस्त करने में सफल हो सकेंगे।

बाथटब बनाम बाल्टी: भारत की तरक़्क़ी में छुपा सोच का फासला

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बृज खंडेलवाल

आगरा : दोपहर की तपती धूप। सड़क किनारे सरकारी पंप। फटे-कपड़ों में एक आदमी, जिसे देखने वाले ‘भिखारी टाइप’ कह सकते हैं, महीनों बाद पानी से बदन भिगो रहा है। तभी एक चमचमाती कार रुकती है। भीतर से उतरी एक संभ्रांत महिला नाक सिकोड़कर कहती है: “देखो, कितना पानी बेकार बहा रहा है!”

नहाने वाला चुप नहीं रहता। गुर्राकर जवाब देता है, “मैडम, आपके बाथटब से कम ही खर्च कर रहा हूँ।”

बस, यही एक पल भारत की असली कहानी कह देता है, फासला संसाधनों का नहीं, सोच का।

यही फासला आज विकास की बहस में भी झलकता है। क्या भारत से यह कहा जा रहा है कि वह साफ़ हवा और करोड़ों लोगों को भूख से आज़ादी, इन दोनों में से किसी एक को चुने? यही डर की कहानी है, जो ज़ोर-शोर से फैलाई जा रही है। हर फ्लाइओवर तबाही की निशानी बना दिया जाता है, हर फैक्ट्री की चिमनी को क़यामत का ऐलान। मानो तरक़्क़ी कोई गुनाह हो।

ज़रा ठहरकर देखिए। भारत की शहरी गाड़ी तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रही है, थोड़ी शोरगुल वाली, थोड़ी बेतरतीब, मगर रुकने वाली नहीं। जहाँ कभी खेत थे, वहाँ इमारतें हैं। सड़कें दूर-दराज़ इलाक़ों को बाज़ार और मौक़ों से जोड़ रही हैं। शहर फैल रहे हैं, भीड़भाड़ वाले, अव्यवस्थित, मगर ज़िंदा।
हाँ, शहरों की हवा भारी है। नदियाँ बीमार हैं। कूड़ा बढ़ रहा है। लेकिन इसे तरक़्क़ी बनाम तबाही की बहस बना देना बौद्धिक बेईमानी है। यह क़यामत नहीं, यह बदलाव का दौर है।

आर्थिक विकास ने आख़िरकार वही करना शुरू किया है, जिसका उससे वादा था, ग़रीबी को पीछे धकेलना। कारख़ाने चल रहे हैं, बंदरगाहों पर रौनक़ है, रोज़गार पैदा हो रहा है। करोड़ों लोग, जो दशकों तक हाशिए पर थे, अब मुख्यधारा का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं। उन्हें घर चाहिए, सड़कें चाहिए, स्कूल और अस्पताल चाहिए, सफ़र की सहूलियत चाहिए, और सबसे ज़रूरी, इज़्ज़त।

क्या उनसे कहा जाए कि “पहले हवा पूरी तरह साफ़ हो जाए, तब तक इंतज़ार करो”?
शहरीकरण कोई साज़िश नहीं, एक नतीजा है। गाँव खाली हो रहे हैं क्योंकि शहर बुला रहे हैं। ट्रेनें तेज़ हैं, हवाई जहाज़ सस्ते हैं, मोबाइल हाथ में है। आज एक घरेलू कामगार का बेटा दिवाली पर हवाई जहाज़ से घर आता है। किसान की बेटी दूसरे राज्य में पढ़ती है। यही समावेशन है, थोड़ा अव्यवस्थित, थोड़ा शोरगुल वाला, मगर ज़रूरी।

और यही बात कुछ ख़ास तबक़ों को बेचैन करती है।
“पर्यावरण संकट” का सबसे ऊँचा शोर अक्सर उन्हीं लोगों से आता है, जिनकी तरक़्क़ी उस दौर में हुई जब मुक़ाबला कम था। असली परेशानी हवा या पेड़ों से नहीं, हिस्सेदारी से है। जब आम लोग बराबरी माँगते हैं, तो ख़ास सुविधाएँ सिकुड़ने लगती हैं। सड़कें भर जाती हैं, हवाई अड्डे भीड़ से गूँज उठते हैं, मोहल्ले बदल जाते हैं , तभी तरक़्क़ी अचानक “ख़तरनाक” कहलाने लगती है।

खनन, ड्रेजिंग, इंफ़्रास्ट्रक्चर, सबको दुश्मन बना दिया जाता है। यह भुला दिया जाता है कि बिना कच्चे माल के उद्योग नहीं, बिना उद्योग के रोज़गार नहीं, और बिना रोज़गार के कल्याण भीख बन जाता है, सशक्तिकरण नहीं। विडंबना यह कि सामाजिक न्याय की बातें करने वाले लोग उसी प्रक्रिया का विरोध करते हैं, जो उसे संभव बनाती है।

हाँ, प्रदूषण है। झुग्गियाँ हैं। कचरा है। मगर भूख भी है, बेरोज़गारी भी है, और दशकों की उपेक्षा का दर्द भी। लोकतंत्र में समस्याएँ पैकेज में आती हैं। हल पीछे हटना नहीं, बल्कि समझदारी से आगे बढ़ना है।

डर और अतिशयोक्ति पर ज़िंदा रहने वाली विकास-विरोधी लॉबी हर चीज़ में प्रलय देखती है। एक पेड़ कटा नहीं कि सभ्यता ख़त्म। एक सड़क बनी नहीं कि “जन-विरोधी” का तमगा। मोमबत्ती जुलूस तस्वीरें देते हैं, समाधान नहीं। नदियाँ भाषणों से साफ़ नहीं होतीं, विज्ञान से होती हैं। धुआँ नारों से कम नहीं होता, तकनीक से होता है।

और तकनीक रास्ता दिखा रही है—स्वच्छ ईंधन, इलेक्ट्रिक वाहन, कचरे से ऊर्जा, स्मार्ट योजना। ये सपने नहीं, औज़ार हैं। भारत के पास लोग हैं, दिमाग़ हैं, अब संसाधन भी हैं। जिसकी ज़रूरत नहीं, वह है डर के कारण ठहर जाना।

बदलाव में तकलीफ़ होती है। हालात बेहतर होने से पहले बिगड़ते हैं। शहर चरमराते हैं। मगर अब रुक जाना निर्दयता होगी। जो लोग देर से आगे आए हैं, उनसे यह कहना कि “अभी नहीं”, यह ज़ुल्म है।

सड़क किनारे नहाता वह आदमी और बाथटब में डूबा आराम, यही भारत की असली बहस है। सवाल विकास का नहीं, सोच के फासले का है। रास्ता साफ़ है, बदलाव को अपनाइए, उसे बेहतर बनाइए, मगर उसकी राह मत रोकिए। भारत आगे बढ़ रहा है, सारी मुश्किलों के साथ। और इस बार, हर कोई इसमें शामिल होना चाहता है।

निशाना भले ही ब्राह्मण पर हो, लेकिन निगाहें कहीं और हैं

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डाॅ. चन्द्र प्रकाश सिंह

दिल्ली । ब्राह्मण के विरोध में एक नया ज्वार आया है। आज हिन्दू शास्त्रों को मिथ (काल्पनिक) घोषित करने वाले एक विशेषज्ञ का लेख पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने बताया है कि पंद्रह सौ वर्ष पूर्व भारत में कोई ब्राह्मण नहीं था, हड़प्पा काल में भी भारत में कोई ब्राह्मण नहीं था। ब्राह्मण अपना घोड़ा लेकर यूरेशियाई देश से भारत आया और सूर्य के रथ में उन घोड़ों को जोत दिया। यही नहीं ब्राह्मण शेर भी भारत के बाहर से लाया था, जिसके ऊपर न केवल अपनी दुर्गा देवी को बैठा दिया, बल्कि उस दुर्गा से देशी भैंसे को मरवा दिया और देशी हाथी को शेर से कुचलवा दिया। उनका पूरा निहितार्थ यह था कि बहुत ही चालाकी से ब्राह्मण ने यहाँ के देशज प्रतीकों को अपने प्रतिमानों के साथ जोड़कर भारत में ब्राह्मणवाद फैला दिया।

यह बातें उन्हें बहुत अच्छी लगेंगी जिनके चिन्तन में जातिवाद के घेरे के अतिरिक्त और कोई विचार नहीं है और जिनके लिए जातियाँ राजनीतिक दांव-पेच की आधार ही नहीं हैं, बल्कि उनके लिए जाति के अतिरिक्त हमारे सांस्कृतिक चिन्तन में कुछ और है ही नहीं। बहुत लोग तो उनकी बातों का उद्धरण देकर यह भी बता देंगे कि जातियाँ को तो ब्राह्मणों ने ही बनाया है। आज कल ऐसे विचारक हिन्दू राष्ट्र के महारथियों को भी बहुत भाने लगे हैं।

लेकिन यह विषय जातियों का नहीं है, केवल एक जाति को लक्ष्य बनाकर यह हिन्दू संस्कृति के सम्पूर्ण चिन्तन और मेधा को मिथ्या और काल्पनिक घोषित करने की एक कुचेष्टा है।

जिस हड़प्पा सभ्यता की बात उन्होंने की है उसी में एक ऐसा चित्रांकन प्राप्त हुआ है, जिसमें दो पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हुए हैं, उनमें से एक फल खा रहा है और दूसरा चुपचाप बैठा हुआ है। यह चित्र परमात्मा और जीवात्मा की अवस्था का वह चित्रण है जिसका वर्णन मुण्डकोपनिषद् के “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया” मंत्र में किया गया है।

उपनिषदों में ब्राह्मण शब्द का अनेक स्थानों पर उल्लेख आता है। वहाँ ब्राह्मण का अर्थ कोई जाति नहीं बल्कि अवस्था है।उपनिषदों में ‘ब्राह्मण’ का अर्थ जाति नहीं, बल्कि परमतत्व (ब्रह्म) और उस परम तत्व को जानने वाले ज्ञानी व्यक्ति दोनों के अर्थ में किया गया है।

तैत्तिरीयोपनिषद् में “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न बिभेति कुतश्चनेति।” अर्थात् ब्रह्म के आनन्द को जानने वाला किसी से भयभीत नहीं होता। यहाँ ब्रह्मण का अर्थ पूर्ण व्यापक सनातन सत्ता से है। ऐसे ही बृहदारण्यक उपनिषद् में परमसत्ता के लिए तथा उसको जानने वालों के लिए ब्राह्मण शब्द प्रयोग किया गया है। छान्दोग्य उपनिषद् में तो सत्यकाम को केवल सत्य बोलने के आधार पर ब्राह्मण मान लिया गया।

ब्राह्मण जाति नहीं मानव की वह अवस्था है जो पूर्ण व्यापकता के साथ एकाकार थी, फिर ऐसे लोगों का समूह एक वर्ण के रूप में चिह्नित किया गया और बाद में वह वंशानुगत रूप में परिवर्तित होकर जाति बन गया।

आज इस आक्रमण का लक्ष्य केवल आज की वंशानुगत ब्राह्मण जाति नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मतत्व, ब्रह्मबोध और भारतीय मेधा के उस शिखर पर आक्रमण है जो मानव चिन्तन की पूर्णता को अभिव्यक्त करती है। यह एक व्यापक चिन्तन को जाति के रूप में खड़ा कर सम्पूर्ण संस्कृति को लांक्षित करने की एक कुचेष्टा है।

जनसंघ, जनतापार्टी और भाजपा के संस्थापक सदसय और कार्यकर्ताओं की अनोखी पीढ़ी तैयार की

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–रमेश शर्मा

दिल्ली । स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे भारत की ऐसी ऋषि परंपरा के वाहक रहे हैं। जिन्होंने अपनी साधना, तपस्चर्या और सेवा संकल्प से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी को कीर्तिमान स्वरूप प्रदान करने के लिये पूरा जीवन समर्पित कर दिया। आज यदि भारतीय जनता पार्टी ने अपने जन समर्थन और संगठनात्मक स्वरूप में पूरे विश्व में सबसे बड़ा राजनीतिक दल के रूप में आकार लिया है तो इसके पीछे कुशाभाऊ ठाकरे जैसे तपोनिष्ठ ऋषि तुल्य विभूतियों की साधना ही रही है।
कुशाभाऊ ठाकरे जी का जन्म 15 अगस्त 1922 को मध्यप्रदेश के धार नगर में हुआ था । आज उनकी शताब्दी वर्ष की पूर्णता के तिथि हैं। विक्रम संवत की दृष्टि से यह तिथि संवत् 1979 भाद्रपद माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी थी । यह अष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के अवतार की तिथि है, इसे जन्माष्टमी कहते है। तपस्या और त्यागमयी जीवन के साथ संस्कृति, समाज और राष्ट्रसेवा का व्रत उन्हें अपने परिवार के संस्कार में मिला था। उनके पिता डाक्टर सुन्दरराव जी ठाकरे अपने समय के सुप्रसिद्ध चिकित्सक थे जिन्होंने अहमदाबाद मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की डिग्री ली थी। प्लेग और अन्य महामारी के समय अपने प्राणों बिना परवाह किये पीड़ितों की सेवा करने के लिये सुविख्यात रहे हैं। ठाकरे जी का परिवार कोंकण के पाली गाँव का मूल निवासी था। किन्तु समय के साथ उनके प्रपितामह गुजरात के मेहसाणा में आ बसे थे। जहाँ उनकी गणना एक संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार के रूप में होने लगी थी । पिता सुन्दरराव जी का जन्म मेहसाणा में हुआ। सुन्दरराव जी अपने छात्र जीवन से ही स्वदेशी आंदोलन से जुड़ गये थे । स्वदेशी अभियान के साथ ही उन्होने अपनी पढ़ाई की थी । वे मेडिकल की पढ़ाई करने अहमदाबाद मेडिकल कॉलेज गये। मेडिकल की पढ़ाई के बीच ही उनका विवाह धार के प्रतिष्ठित दिघे परिवार की बेटी शांता बाई के साथ हो गया था। पढ़ाई पूरी करने लौटे तो परिवार में संपत्ति बँटवारे पर कुछ खींचतान आरंभ हुई। तब पत्नि के परामर्श से अपने हिस्से की संपत्ति भी अपने भाई विनायकराव को देकर खाली हाथ एक जोड़ी कपड़े से धार आकर गये थे। धार में आधुनिक मेडिकल चिकित्सा पद्धति का कोई डाक्टर भी नहीं था। इसीलिए उन्हें अपना प्रतिष्ठित स्थान बनाने में अधिक कठिनाई नहीं हुई। महाराजा धार ने भी उनका स्वागत किया । कुशाभाऊ जी का जन्म यहीं धार में हुआ। उनकी आभा बहुत सौम्य और आकर्षक थी। उनका जन्म जन्माष्टमी को हुआ था। इसलिये उनके नाना ने इस नन्हे बालक को कृषा कहकर पुकारा। समय बीता । नामकरण संस्कार का समय आया। तब उनका नाम शशिकांत रखा गया। नाम भले शशिकांत रखा गया हो पर वे प्रचलन में “कृषा” और “कुशा” और कुशाभाऊ के नाम से ही जाने गये। समय के साथ बड़े हुये। धार के विद्यालय में शिक्षा आरंभ हुई। तब उनका पूरा नाम “शशिकांत सुन्दरराव ठाकरे” अंकित किया गया। उनका छात्र जीवन इसी नाम का रहा। औपचारिक रूप में भले उनका नाम शशिकांत ठाकरे रहा । पर घर बाहर और विद्यालय के मित्रों के बीच उनकी पहचान कुशाभाऊ नाम से प्रतिष्ठित रही ।
स्वदेशी आंदोलन के प्रबल समर्थक और गाँधीजी के खादी आंदोलन में सहभागी रहे पिता डाक्टर सुन्दर राव का जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हो गया था। इस नाते परिवार में संघ विचार का वातावरण था । कुशाभाऊजी किशोर वय में संघ और संघ विचार से परिचित हो गये थे। और उनका शाखा जाना आरंभ हो गया। 1939 में कुशाभाऊ जी ने धार से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। पिता अपने पुत्र को अपनी ही भांति डाक्टर बनाना चाहते थे। इसीलिए आगे की पढ़ाई के लिये ग्वालियर भेज दिया। कुशाभाऊ जी कुशाग्र बुद्धि थे। मैट्रिक परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी । इसलिये ग्वालियर में सरलता से प्रवेश भी मिल गया। उन्होने 1941 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की और मेडिकल में दाखिला भी ले लिया । किन्तु नियति ने उनके लिये कुछ कार्य निर्धारित किया था । वे संघ विचार में ढल गये थे, शाखा के नियमित स्वयं सेवक थे । उन्होंने 1942 में संघ के शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षण लिया और अपना पूरा जीवन राष्ट्र, संस्कृति और संघ को समर्पित कर दिया । उन दिनों संघ के शिक्षा वर्ग को “ओ टी सी” नाम से जाना जाता था । ओटीसी के बाद ठाकरे जी अपनी पढ़ाई छोड़कर संघ के प्रचारक निकल गये । पढ़ाई छोड़ने संघ का प्रचारक बनने की अनुमति परिवार से मांगी, जो सहज ही मिल गई । और 1942 से उनका संघ जीवन पूर्ण कालिक प्रचारक के रूप हो गया ।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उन्हें मालवा और मालवा से लगे राजस्थान के क्षेत्र में संघ के विस्तार का कार्य सौंपा । उन्होंने नीमच को अपना केन्द्र बनाया और इसके चारों ओर धार, झाबुआ, रतलाम मंदसौर राजगढ़ शाजापुर से लेकर चित्तौड़ तक निरंतर प्रवास किये । उज्जैन, धार, झाबुआ, शाजापुर, रतलाम मंदसौर आदि जिलों का तो संभवतः कोई गाँव ऐसा शेष हो जहाँ ठाकरे जी ने संपर्क न किया हो, उन्होंने निरंतर प्रवास किये। जहाँ जो साधन मिला साइकल बस बैलगाड़ी जो मिला उसी से यात्रा निरंतर रही । हनुमान जी ने कभी कहा था “रामकाज कीजै बिना मोहि कहाँ विश्राम” संभवतः यही मंत्र ठाकरे जी का था अंतर केवल एक ठाकरे जी संकल्प था ” संघ कार्य कीजै बिना मोहि कहाँ विश्राम” । सुन्दर लाल पटवा, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा और कैलाश जोशी जैसे सुपरिचित व्यक्तित्वों को उनकी युवा आयु में ठाकरे जी ने ही संघ से जोड़ा था । 1947 में सुन्दर लाल पटवा को संघ कार्य के लिये प्रचारक के रूप में ठाकरे जी ने ही तैयार किया था । और जब 1951 में राजनैतिक दल के रूप जनसंघ अस्तित्व में आया तब ठाकरे जी ने ही पटवा जी को मालवा में जनसंघ कार्य विस्तार का दायित्व दिया ।
समय अपनी गति से साथ दौड़ता रहा । समय के साथ संघ और जनसंघ का कार्य भी गति लेता रहा । समय के साथ परिवार की एक शाखा इंदौर आ गयी । इस नाते कुशाभाऊ जी को यहाँ परिवार से संघ कार्य में सहायता मिली । हो सकता है किसी को यह बात सुनने में सच न लगे किन्तु यह सत्य है कि ठाकरे जी ने संघ और जनसंघ के कार्य विस्तार में परिवारजनों का तो सहयोग लिया किंतु स्वयं परिवार की कभी सहायता न की । वे पाँच भाई एक बहन थे । स्वाभाविक है समय के साथ परिवार का और विस्तार हुआ । परिवार की शाखाएँ विभिन्न नगरों मे हैं । एक शाखा धार में भी । पर सभी सामान्य जीवन ही जी रहे हैं । ठाकरे जी का संगठन के प्रति, अपने कार्य के प्रति कितना समर्पण था इसका अनुमान इस घटना से भी लगाया जा सकता है कि 1953 में जब उनकी माता जी शाँताबाई मरणासन्न हुईं तब संदेश मिलने के बाद भी वे धार न जा सके । और अंतिम संस्कार में ही गये । यह ठाकरे जी की साधना का ही प्रभाव था कि मालवा क्षेत्र में संघ और जनसंघ की जड़ें तो गहरी हुईं ही, संघ कार्य विस्तार के लिये प्रचारक भी बड़ी संख्या में इस क्षेत्र से निकले । ठाकरे जी ने अपने कार्य विस्तार में परिवार का ही सहयोग नहीं लिया अपितु अपने मित्रों को भी संघ और जनसंघ के कार्य विस्तार में जोड़ा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ग्वालियर के नारायण कृष्ण शेजवलकर हैं । वे ग्वालियर में इंटर की पढ़ाई के साथ ठाकरे जी के मित्र बने और पहले संघ से और फिर जनसंघ से जुड़े ।

मध्यप्रदेश में जनसंघ की स्थापना के साथ उन्होंने पूरे मध्यप्रदेश की यात्राएं कीं। उन दिनों छत्तीसगढ भी मध्यप्रदेश का एक अंग था । मुरैना से बस्तर तक और झाबुआ से रीवा तक मध्यप्रदेश का ऐसा कोई नगर कस्बा नहीं जहाँ ठाकरे जी ने यात्रा न हो और कार्यकर्ता न खड़े किये हों । वे संघ प्रचारक के रूप में सर्वाधिक समय मालवा में रहे । जनसंघ को और बाद में भारतीय जनता पार्टी को सबसे अधिक सफलता इसी क्षेत्र से मिलती थी ।
वे जनसंघ और बाद में भाजपा के लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर रहे । संगठन मंत्री, महामंत्री और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे ।
लेकिन पद उनके लिये महत्व पूर्ण न था । वे किसी भी पद पर रहे हों उनकी जीवन शैली सदैव एक सी रही । उन्होंने जीवन भर धोती कुर्ता पहना । खादी का कुर्ता उन्हें सदैव प्रिय रहा । वे बिना प्रेस के धोती कुर्ता पहनते थे और अपने हाथ से स्वयं धोते थे । और जब पार्टी के काम विस्तार हुआ तब उनके सहायक की वृद्धि हुई । बड़ी मुश्किल से उन्हे समझाया जा सका और वे तैयार हुये । वे चने मुरमुरे से शाम का अल्पाहार करते थे और मिठाई में इमरती उन्हे पसंद थी । वे बोलते कम थे । भोपाल में जनसंघ का प्रांतीय कार्यालय पहले चौक बाजार के पास लखेरापुरा में था फिर सोमवारा आया । वे भोपाल में जब भी रहते तो कार्यकर्ताओं से मिलने केलिये अधिक समय देते थे । प्रदेश चारों कौनों पर उन्होंने जिन कार्यकर्ताओं को जोड़ा वे सब प्रभावशाली और संगठन के लिये उपयोगी रहे । उस समय हिन्दु महासभा के अत्यंत प्रभावशाली नेता विदिशा के निरंजन वर्मा जी और भोपाल के भाई उद्धवदास जी मेहता को जनसंघ में लाने वाले ठाकरे जी थे । राजमाता जी के लिये जनसंघ में आने का मार्ग बनाने वाले ठाकरे जी थे । ठाकरे जी सुनते अधिक थे और बोलते कम थे । पता नहीं उनमें वह क्या विशेषता थी कि बातचीत के बाद कार्यकर्त्ता उनसे सदैव प्रसन्नचित्त और संतुष्ट भाव से ही लौटता था । दूरदराज से कोई कार्यकर्त्ता उनके पास कैसी भी शिकायत लेकर आता पर उनके सामने उसका सारा असंतोष निकल जाता और वह उत्साह के साथ संगठन के काम में जुट जाता । सारी बात सुनकर कार्यकर्ता का एक हाथ मोड़ कर पीठ पर घूँसा मारना मानों उनके आत्मीय स्नेह की वर्षा होती और कार्यकर्त्ता प्रसन्न और सन्तुष्ट होकर लौटकर जाया करते थे । जनसंघ के संगठन मंत्री के रूप में उन्होंने उड़ीसा, राजस्थान, गुजरात महाराष्ट्र आदि अनेक प्रातों में कार्य को विस्तार दिया । उन्होंने खंडवा लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा के लिये दो चुनाव लड़े । पहले उपचुनाव में तो सफलता मिली पर दूसरी बार आमचुनाव में सफलता न मिल सकी । सबने आग्रह किया तो चुनाव लड़ लिया । न जीत की खुशी न हार का गम । वे जैसे पहले थे वैसे ही जीत के बाद भी और हार के बाद भी रहे । उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के पूर्व बीच में कुछ समय ऐसा भी बीता जब लगा ठाकरे जी एकाकी हो रहे हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली कार्यालय के अंग के समीप के परिसर में ही रहा करते थे । पर तब भी उनके व्यवहार में विचार में कोई अंतर न आया था । जो भी मिलने जाता उससे उसके परिवार ही नहीं उसके मित्रों का भी हालचाल पूछते थे । उनकी स्मरण शक्ति भी अद्भुत थी। वे एक बार नाम पूछते तो सदैव स्मरण रखते थे । मध्यप्रदेश और देश के कितने कार्यकर्ता थे जिन्हे ठाकरे जी नाम लेकर ही पुकारते थे । वे विलक्षण विद्वान थे, कौनसा ऐसा विषय था जिसका वे समुचित समाधान न सुझा देते थे । वे मनोविज्ञान के तो मानों विशेषज्ञ थे । मन के भाव जानकर कार्यकर्त्ता को मार्गदर्शन देते थे ।

आपातकाल में मीसा में निरुद्ध रहे । जेल के भीतर सभी कार्यकर्ताओं को ढांढस बँधा कर गीत भजन में लगाना उनकी विशेषता थी। जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच कुल कालखंड जनता पार्टी के रूप में भी बीता। उस काल खंड कुछ अन्य घटक समूहों ने अनावश्यक जनसंघ घटक के लोगों पर दबाना आरंभ किया । तब ठाकरे जी उनकी भी पूरी बातें सुनते और अपने कार्यकर्ताओं को संयम बनाये रखने की सलाह देते । अंततः वह स्थिति अधिक दिन न सकी । इसका आभास ठाकरे जी को था। आपातकाल के बाद 1977 में जनता पार्टी सत्ता में आई। किंतु 1979 से ही ठाकरे जी ने बिना कुछ कहे जनता पार्टी के भीतर जनसंघ घटक के कार्यकर्ताओं को सामाजिक और जनहित के मुद्दों पर सक्रिय कर दिया था । और अंततः 1980 में भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई । कौन कौन कार्यकर्त्ता मध्यप्रदेश से मुम्बई अधिवेशन में जायेगा इसका समन्वय स्वयं ठाकरे जी किया और मुम्बई में पाँडालों में ठहरे कार्यकर्ताओं की व्यवस्था को स्वयं जाकर देखा था । 1984 के लोकसभा और 1985 के विधानसभा चुनाव में आशातीत सफलता न मिलने के बाद जनहित के मुद्दों पर आंदोलन की रणनीति ठाकरे जी ने तैयार की । विशेषकर किसानों की समस्या पर आंदोलन का निर्णय ठाकरे जी ने लिया था । और 1990 में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई ।

राजनैतिक उतार चढ़ाव कैसे भी रहे हों पर ठाकरे जी जीवन शैली विचार बीथि में कभी अंतर नहीं आया। वे संघ के प्रचारक रहे हों या भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हों। सदैव एक सी शैली में जिये। सेवा और संगठन का विस्तार उनका प्रमुख ध्येय था। उन्होंने कभी प्रशंसा आलोचना अथवा पद पाने, या न पाने की चिंता नहीं की । वे समान गति और समान चिंतन से ही जिये। आज देश में और विशेषकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का जो भी स्वरूप है उसके आधार स्तंभ हैं ठाकरे जी । वे मानों प्राण शक्ति हैं संगठन की । 28 दिसंबर 2003 को उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ । पर वे आज भी संगठन में जीवन्त हैं सबकी स्मृतियों में हैं। संगठन की प्राण शक्ति में संवाहित हैं और सदैव रहेंगे ।

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