भेदभावपूर्ण यूजीसी विनियम 2026 ने भारत की सॉफ्ट पावर बनने की क्षमता को कमजोर कर दिया है

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बक्सर (बिहार) : ऐसे समय में जब भारत अधिक विदेशी छात्रों को आकर्षित कर रहा था, 2019-20 में 168 देशों के 49,000 से अधिक छात्रों ने दाखिला लिया था, जिससे शिक्षा के माध्यम से सॉफ्ट पावर को बढ़ावा मिल रहा था, यूजीसी के नए भेदभावपूर्ण नियम 2026 ने शिक्षा के माध्यम से वैश्विक स्तर पर सॉफ्ट पावर बनने की भारत की संभावनाओं को कम कर दिया है।

2026 के यूजीसी विनियमन को लेकर उत्पन्न अशांति दोहरे मोर्चे पर चुनौती पेश करती है: आंतरिक रूप से, यह सामाजिक सद्भाव और राजनीतिक स्थिरता को बाधित करने की धमकी देती है, जबकि बाहरी रूप से, यह भारत की आर्थिक और सॉफ्ट पावर को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाई गई “अंतर्राष्ट्रीयकरण” रणनीति को कमजोर करने का जोखिम पैदा करती है। भेदभावपूर्ण यूजीसी विनियम 2026 को लेकर मचे बवाल ने भारत के लिए आंतरिक सामाजिक एकता, राजनीतिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़ी एक जटिल और बहुआयामी चुनौती खड़ी कर दी है। जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए कड़े उपाय लागू करने के उद्देश्य से बनाए गए इन विनियमों के कारण सामान्य वर्ग के प्रति पूर्वाग्रह, झूठी शिकायतों से सुरक्षा का अभाव और कैंपस के माहौल को खंडित करने की संभावना के चलते काफी अशांति फैल गई है।

ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर शिक्षा क्षेत्र तेजी से सॉफ्ट पावर बनता जा रहा है, विश्वविद्यालय राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं और बदलते राजनीतिक गठबंधनों के दबाव का सामना कर रहे हैं। यूजीसी के भेदभावपूर्ण नियम 2026 ने तीव्र राजनीतिक ध्रुवीकरण को जन्म दिया है, जो व्यापक राष्ट्रीय और वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता का एक सूक्ष्म उदाहरण प्रस्तुत करता है। नए यूजीसी भेदभाव-विरोधी नियमों के लागू होने के बाद, छात्र समूहों (वामपंथी बनाम एबीवीपी) और प्रशासन के बीच झड़पें हुईं, और जाति और पीड़ित होने के मुद्दे पर विवादास्पद टिप्पणियों के बाद जेएनयू के कुलपति के इस्तीफे की मांग की गई।

भारत जटिल भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रहा है, व्यापार और प्रौद्योगिकी समझौतों के बीच अमेरिका के साथ संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है, साथ ही रूस के साथ संबंध बनाए रखने और चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा मुद्दों का प्रबंधन करने का भी प्रयास कर रहा है। यह शैक्षणिक अशांति भारत में संभावित राजनीतिक अस्थिरता के दौर में हो रही है, जिसमें 2026 की शुरुआत में व्यापक विरोध प्रदर्शनों और नीतिगत बहसों की भविष्यवाणी की गई थी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत विदेशी उच्च शिक्षा संस्थानों (एफएचईआई) के प्रवेश को सुगम बनाने के लिए बनाए गए थे। मौजूदा अशांति और विदेशी विश्वविद्यालय नियमों में मौजूद सख्त “राष्ट्रीय हित” प्रावधानों के कारण, संभावित नियामक अस्थिरता और राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते अंतरराष्ट्रीय साझेदार परिसर स्थापित करने में हिचकिचा सकते हैं। भारत विदेशी प्रतिभा और राजस्व को आकर्षित करने के लिए खुद को एक वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है (जिसका उद्देश्य विदेशी विश्वविद्यालयों को सालाना 13-30 अरब डॉलर के बहिर्वाह को कम करना है)। ऐसे में आंतरिक अस्थिरता और “परिसर में व्याप्त अराजकता” एक स्थिर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केंद्र के रूप में देश की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का खतरा पैदा कर रही है।

कुलपतियों की नियुक्ति का केंद्रीकरण और योग्यता के बजाय वैचारिक नेतृत्व की संभावना से अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक साझेदारों की भागीदारी कम हो सकती है, जिससे ज्ञान का आदान-प्रदान और सहयोगात्मक अनुसंधान सीमित हो जाएगा, जो भारत की “ज्ञान महाशक्ति” बनने की आकांक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। यूजीसी के नियमों (केंद्रीय) और राज्य विश्वविद्यालय अधिनियमों (राज्य) के बीच टकराव से शक्ति संतुलन पर सवाल उठते हैं, क्योंकि शिक्षा समवर्ती सूची में है। शक्ति का केंद्रीकरण राज्यों की अपने संस्थानों के प्रबंधन की स्वायत्तता को कम करता है, जिससे राज्य सरकारों और केंद्र के बीच संघर्ष उत्पन्न होता है।

सामाजिक संघर्ष को व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्यों से ध्यान भटकाने वाला कारक मानते हुए, 2026 के यूजीसी विनियमों का प्राथमिक और प्रलेखित प्रभाव केवल घरेलू कानूनी और राजनीतिक उथल-पुथल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका भारत की विदेश नीति और भू-राजनीतिक स्थिति पर भी प्रभाव पड़ता है, क्योंकि यह भारत के सॉफ्ट पावर बनने की राह में एक बाधा है। गरीबी, असमानता और बेरोजगारी जैसी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां पहले से ही भारतीय मॉडल की “आकर्षण क्षमता” को कम करती हैं, और भेदभावपूर्ण यूजीसी 2026 विनियमों के कारण उत्पन्न नए विवाद ने भारत के लिए समस्याओं का दायरा और बढ़ा दिया है।

भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोकतांत्रिक मूल्यों और तकनीकी प्रगति का लाभ उठाते हुए तेजी से एक वैश्विक सॉफ्ट पावर के रूप में उभर रहा है। इसके प्रमुख कारकों में योग और आयुर्वेद का वैश्विक प्रसार, बॉलीवुड और भारतीय व्यंजनों की लोकप्रियता, 35 लाख सदस्यों वाला मजबूत प्रवासी समुदाय और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन तथा वैक्सीन मैत्री जैसी पहलें शामिल हैं। “डिजिटल इंडिया” अभियान, अन्य देशों द्वारा यूपीआई (एकीकृत भुगतान इंटरफ़ेस) को अपनाना और इसरो की सफलताएं भारत की आधुनिक तकनीकी क्षमता को प्रदर्शित कर रही हैं। भारत की जी20 अध्यक्षता ने “ग्लोबल साउथ की आवाज” पर जोर दिया, जिससे देश विकासशील देशों के लिए एक अग्रणी देश के रूप में स्थापित हुआ। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) जैसी पहलें सतत विकास के प्रति इसकी प्रतिबद्धता को उजागर करती हैं।

धर्मेंद्र प्रधान और उनकी टीम ने भेदभावपूर्ण यूजीसी विनियम 2026 के माध्यम से भारत की शिक्षा व्यवस्था को काफी हद तक पटरी से उतार दिया। 2014 से कमजोर और विवादास्पद शिक्षा मंत्रियों की नियुक्ति एक गंभीर मुद्दा है जिस पर विचार करने की आवश्यकता है कि मोदी के नेतृत्व वाली सरकार शिक्षा के प्रति गंभीर क्यों नहीं हो सकती, जबकि यह भारत के मानव संसाधन विकास का एक महत्वपूर्ण कारक है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के इर्द-गिर्द मोदी सरकार का राजनीतिक-सामाजिक दृष्टिकोण समझ से परे है, जबकि भारतीय शिक्षा परिसर योग्यता के आधार पर अधिक से अधिक अंतरराष्ट्रीय छात्रों का स्वागत करने के लिए तैयार हो रहे थे।

फिर पकड़ा गया अफवाहबाज चैनल फोर पीएम का झूठ

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दिल्ली। संजय शर्मा के यूट्यूब चैनल (4PM News) का इतिहास विवादों से भरा रहा है। यह चैनल अक्सर एकतरफा कंटेंट और प्रोपगैंडा फैलाने के लिए उत्तर प्रदेश समेत हिन्दी पट्टी में जाना जाता है। इस चैनल की यूएसपी ही झूठ और अफवाह है। जिसके दम पर यह हिन्दी वालों के बीच टिका हुआ है।

हाल ही में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सरकार ने इसे “राष्ट्रीय सुरक्षा” के आधार पर ब्लॉक कर दिया था, जिसके खिलाफ संजय शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। चैनल के लिए इंडि अलायंस से जुड़े दलों जैसे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का खुला समर्थन देखा जाता है। कपिल सिब्बल जैसे बड़े वकीलों का साथ भी इस मक्कार और अफवाहबाज चैनल को हासिल है, जिससे चैनल पर ‘झूठ’ फैलाने में बेफिक्री दिखती है।

ताजा विवाद आशुतोष महाराज से जुड़ा है। संजय शर्मा ने अपने कंटेंट में शामली के एक योगी आशुतोष (या योगी आशुतोष जी महाराज) की जगह दिव्य ज्योति जागृति संस्थान (DJJS) के संस्थापक दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी की तस्वीर जानबूझकर इस्तेमाल की। दोनों व्यक्तियों में नाम की समानता है, लेकिन दोनों अलग-अलग हैं।

श्री आशुतोष महाराज जी DJJS के संस्थापक और प्रमुख हैं, जो ब्रह्म ज्ञान और विश्व शांति के संदेश पर काम करते हैं। उनकी संस्था 1991 से सक्रिय है और दुनिया भर में शाखाएं हैं। 2014 में उन्हें क्लिनिकली डेड घोषित किया गया था, लेकिन शिष्य उन्हें गहरी समाधि में मानते हैं।

दूसरी ओर, शामली से जुड़े योगी आशुतोष एक अलग व्यक्ति हैं, जिनका संदर्भ स्थानीय गतिविधियों में आता है।

यह गलती (या जानबूझकर भ्रम) गंभीर है, क्योंकि इससे आध्यात्मिक गुरु की छवि को नुकसान पहुंचा है। अगर संजय शर्मा को दोनों के बीच फर्क नहीं पता, तो उनके समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के ‘कथित प्रवक्ता’ होने पर सवाल उठता है। पत्रकारिता तो वे करते नहीं। कम से कम अपने झूठ को बीजेपी और आरएसएस तक ही सीमित रख सकते थे लेकिन अब वे सन्यासियों लेकर झूठ फैलाने की नीचता तक उतर आए हैं।

झूठ और गलत सूचना फैलाने की संजय शर्मा को अपनी यह आदत अब बंद कर देनी चाहिए। फोर पीएम जैसे चैनल समाज में भ्रम फैलाते हैं। सच्चाई की जांच जरूरी है।

इला भट्ट ने महिलाओं के बीच गांधी जी के कार्यों को आगे बढ़ाया- रामबहादुर राय

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अनुराग पुनेठा

नई दिल्ली : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि विभाग द्वारा प्रसिद्ध चिंतक इला भट्ट के चुनिंदा व्याख्यानों के संकलन पर आधारित पुस्तक ‘महिलाएं, काम और शांति’ के लोकार्पण एवं चर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार, विश्लेषक एवं लेखिका सुश्री नीलम गुप्ता द्वारा अनूदित है तथा नवजीवन साम्प्रत् द्वारा प्रकाशित की गई है। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने इला भट्ट के विचारों को भारतीय समाज में महिला सशक्तिकरण, श्रम गरिमा और शांति स्थापना के महत्वपूर्ण आयामों से जोड़ते हुए कहा कि यह पुस्तक समकालीन समाज के लिए प्रेरक मार्गदर्शक का कार्य करेगी।

कार्यक्रम में प्रमुख वक्ताओं के रूप में गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति श्री सुदर्शन आयंगर, वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री रजनी बख्शी और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती रेनाना झाबवाला ने अपने विचार व्यक्त किए। आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) एवं कला निधि विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। वक्ताओं ने इला भट्ट के जीवन, उनके सामाजिक कार्यों तथा ‘सेवा’ आंदोलन के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान करने के उनके प्रयासों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने इस पुस्तक को महिला श्रम, शांति और समावेशी विकास पर गंभीर चिंतन का दस्तावेज़ बताया।

श्री रामबहादुर राय ने कहा कि यह पुस्तक भाषणों का संकलन है, लेकिन इसमें सिर्फ बोले हुए शब्द नहीं है, बल्कि गहन अनुभव हैं और ये अनुभव आकाश जैसा है। गांधीजी और कस्तूरबा जो प्रयोग महिलाओं के बीच करना चाहते थे, उसे इला भट्ट ने महिलाओं के बीच किया और आगे बढ़ाया। इस पुस्तक में सिर्फ भारतीय महिलाओं की चिंता नहीं है, बल्कि दक्षिण-एशियाई महिलाओं की चिंता है। उन्होंने कहा कि माइक्रोफाइनेंस इला जी की सबसे बड़ी देन है। वे दिमाग़ से कम और दिल से ज़्यादा काम करती थीं। श्री रामबहादुर राय ने कहा, यह बहुत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है और हम सबको पढ़नी चाहिए। अगर आपको अंधेरे से बाहर निकलना है, आप रोशनी की तलाश में हैं, तो यह पुस्तक टॉर्च की तरह, रोशनी की तरह, सूरज की किरण की तरह काम करेगी।

श्री सुदर्शन आयंगर ने कहा कि इला भट्ट ने गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांतों पर चलते हुए महिलाओं को सशक्त बनाने का कार्य किया। प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती रेनाना झाबवाला ने भी अपने वक्तव्य में इला भट्ट के साथ अपने अनुभव साझा करते हुए महिलाओं के संगठित श्रम और सामाजिक न्याय की दिशा में उनके योगदान को रेखांकित किया। पुस्तक की अनुवादक सुश्री नीलम गुप्ता ने अपने विचार रखते हुए कहा कि यह पुस्तक इला भट्ट के लेखों का संग्रह नहीं है, बल्कि उनके भाषणों का संकलन है। इसमें इला भट्ट के 27 भाषण संकलित हैं। उन्होंने कुछ भाषणों के अंश भी पढ़कर सुनाए। उन्होंने कहा कि इला भट्ट ने ही उन्हें अपनी पुस्तक ‘वीमेन, वर्क एंड पीस’ के हिन्दी अनुवाद की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद उन्होंने इला भट्ट को समर्पित किया। सुश्री नीलम गुप्ता ने कहा कि अनुवाद करते समय उन्होंने मूल भाव, संवेदना और वैचारिक गहराई को पाठकों तक सहज रूप में पहुंचाने का प्रयास किया है, ताकि अधिकाधिक हिन्दी पाठक इस महत्वपूर्ण विचार-परम्परा से जुड़ सकें।

ग़ौरतलब है कि इला रमेश भट्ट (1933–2022) भारत की प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता, श्रमिक नेता और महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत थीं। वे स्व-रोज़गार वाली महिलाओं के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करती रहीं और असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को संगठित शक्ति देने का ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने 1972 में ‘सेल्फ एम्प्लॉयड वीमेंस एसोसिएशन’ यानी ‘सेवा’ (Self-Employed Women’s Association- SEWA) की स्थापना की थी। ‘सेवा’ का उद्देश्य था— असंगठित क्षेत्र की कामकाजी महिलाओं को संगठित करना, उन्हें श्रमिक अधिकार दिलाना और वित्तीय आत्मनिर्भरता के साधन उपलब्ध कराना। इस संगठन से आज लाखों महिलाएं जुड़ी हुई हैं और यह विश्व स्तर पर महिला सहकारी आंदोलन का एक सफल मॉडल माना जाता है।

कार्यक्रम में विद्वानों, शोधार्थियों, पत्रकारों तथा साहित्य और समाज के विविध क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य जनों की गरिमामयी उपस्थिति रही। कार्यक्रम के अंत में प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने अतिथियों एवं आगंतुकों के प्रति आभार भी प्रकट किया। यह आयोजन न केवल एक पुस्तक लोकार्पण का अवसर रहा, बल्कि महिलाओं की भूमिका, श्रम की गरिमा और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर सार्थक संवाद का मंच भी सिद्ध हुआ।

प्रमोद भार्गव को मिलेगा सूरतगढ़ में लक्ष्मणराम सेवटा स्मृति कथा सम्मान

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शिवपुरी।भाषा, साहित्य, संस्कृति, कला एवं सामाजिक जागरण को समर्पित संस्था विविधा, सूरतगढ़ राजस्थान की ओर से प्रतिवर्ष दिए जाने वाले सम्मानों की घोषणा की गई है। संस्था के संस्थापक अध्यक्ष डॉ एनके सोमानी ने बताया कि साल 2024-25 के लिए स्व. श्री लक्ष्मण राम सेवटा स्मृति कथा सम्मान प्रमोद भार्गव (शिवपुरी मध्य प्रदेश) को उनके कथा संग्रह ‘प्रमोद भार्गव की चुनिंदा कहानियां’ पर दिया जाएगा।प्रमोद को हाल ही में इसी कथा संग्रह पर महाराष्ट्र के नासिक में विद्योत्तमा सम्मान भी मिला है।मार्च के अंत में राजस्थान के सूरतगढ़ में भव्य समारोह में इस सम्मान के अंतर्गत 11,000 हजार की राशि,स्मृति चिन्ह, प्रशस्ति पत्र शॉल और श्रीफल भेंट लिए जाएंगे।

प्रमोद भार्गव के अलावा कृष्णा देवी कामरा स्मृति हिंदी कविता सम्मान डॉ प्रभा मुजुमदार (गुजरात) को उनके कविता संग्रह ‘नकारती हूं निर्वासन’ पर दिए जाने का निर्णय लिया गया है। राजस्थानी कविता के क्षेत्र में दिया जाने वाला श्रीमती गोपी देवी चांडक स्मृति सम्मान चांदकौर जोशी (जोधपुर )को उनके कविता संग्रह ‘बिलखता बादल’ को, जुगल किशोर सोमानी स्मृति व्यंग पुरस्कार वरिष्ठ व्यंगकार अखिलेश श्रीवास्तव (लखनऊ) को उनके व्यंग्य संग्रह ‘दफ्तरनामा’पर दिया जाएगा। उपन्यास के क्षेत्र में दिया जाने वाला भेरूदान सोमानी स्मृति उपन्यास पुरस्कार अलंकार रस्तोगी (लखनऊ) को उनके उपन्यास ‘पंडित भया न कोई’ तथा अर्जुन राम सुथार स्मृति प्रथम प्रकाशित पुस्तक पुरस्कार डॉ नेहल शाह(भोपाल) को उनकी पहली कविता पुस्तक ‘और इन सब के बीच’ पर दिया जाएगा । संस्था के सचिव संजय कामरा ने चयनित साहित्यकारों को बधाई दी और कहा कि सभी साहित्यकारों को मार्च माह के अंत तक आयोजित होने वाले भव्य समारोह में सम्मानित किया जाएगा।

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