आरक्षण के मुद्दे पर कन्फ्यूज हो गईं न्यूज 24 पर गरिमा सिंह

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दिल्ली। अपने डिबेट ‘सबसे बड़ा सवाल’ में एंकर गरिमा सिंह कन्फ्यूज हो गई थीं। उन्होंने अल्पसंख्यक की अवधारणा और आरक्षण में संबंध स्थापित करने की ऐसी जिद अपने शो में की कि उनके साथ पैनलिस्ट भी कन्फ्यूज दिखाई दीं। जबकि उन्हें गरिमाजी से पूछना था कि अल्पसंख्यक की अवधारणा और आरक्षण में वह क्या संबंध स्थापित करना चाहती हैं?

एंकर ख़ुद भी कन्फ़्यूज़ थीं और पैनलिस्ट को भी कर रहीं थी।  पैनलिस्ट  समझ ही नहीं पाईं कि गरिमा कहना क्या चाहती हैं?

 न्यूज़ 24 में आने से पहले, 2020 में किसान आंदोलन के दौरान  गरिमाजी  का राकेश टिकैत के साथ लिया गया इंटरव्यू मील का पत्थर था। वहां गरिमा जी ने बिना किसी हिचकिचाहट के सवालों की बौछार की थी – किसानों की मांगों पर सीधी बात, सरकार की नीतियों पर कटाक्ष। टिकैत ने भी उनकी तीक्ष्णता की तारीफ की थी। वह इंटरव्यू इतना प्रभावशाली था कि आज भी सोशल मीडिया पर वायरल होता रहता है। लेकिन न्यूज़ 24 जैसे बड़े चैनल में आने के बाद लगता है गरिमा जी अपनी इमेज के बोझ तले दब सी गई हैं। कॉर्पोरेट प्रेशर, रेटिंग्स की दौड़ और एडिटोरियल लाइन ने उनके अंदर के उस जुनूनी पत्रकार को दबा दिया है, जो स्क्रीन पर अब फीका नजर आता है। शायद वे सुरक्षित खेल खेल रही हों – विवाद से बचते हुए, लेकिन असल पत्रकारिता से दूर होकर।

यह घटना एक सबक है : एंकर का कन्फ्यूजन पूरे शो को कमजोर कर देता है। गरिमा जी से सवाल पूछा जाना चाहिए था कि अल्पसंख्यक और आरक्षण का वह ‘संबंध’ आखिर क्या है? स्पष्टता के बिना बहस सिर्फ शोर बन जाती है। उम्मीद है, गरिमा जी अपनी पुरानी चमक वापस लाएंगी।

अल्पसंख्यक की अवधारणा और आरक्षण में संबंध: एक स्पष्ट व्याख्याभारतीय संदर्भ में अल्पसंख्यक की अवधारणा मुख्य रूप से धार्मिक या भाषाई आधार पर परिभाषित होती है। संविधान के अनुच्छेद 29-30 के तहत अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति, भाषा और शिक्षा संस्थानों को संरक्षण का अधिकार है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के अनुसार, भारत सरकार ने मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया है। यह दर्जा राष्ट्रीय स्तर पर लागू होता है, लेकिन राज्य स्तर पर यह भिन्न हो सकता है (जैसे, कुछ राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक माने जाते हैं)। इसका उद्देश्य बहुसंख्यक आबादी के दबाव से अल्पसंख्यकों की पहचान और अधिकारों की रक्षा करना है।

आरक्षण के साथ संबंध : आरक्षण प्रणाली (अनुच्छेद 15, 16, 46) सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए है, लेकिन यह मुख्य रूप से जातिगत/जनजातिगत आधार पर है, न कि धार्मिक। संविधान सभा ने 1949 में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को अनुच्छेद 335 से हटा दिया, क्योंकि विभाजन के बाद धार्मिक आधार पर आरक्षण अलगाववाद को बढ़ावा दे सकता था। हालांकि, कुछ राज्यों में अल्पसंख्यकों (जैसे मुसलमानों) को OBC के अंतर्गत आरक्षण मिलता है, यदि वे सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े साबित होते हैं (उदाहरण: आंध्र प्रदेश में 4%, केरल में 12%)। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य अल्पसंख्यक संस्थानों पर अपनी आरक्षण नीति थोप नहीं सकता। सच्चर समिति जैसी रिपोर्टें अल्पसंख्यकों के पिछड़ेपन को उजागर करती हैं, लेकिन आरक्षण मुख्यतः सामाजिक न्याय पर केंद्रित है, न कि धार्मिक कोटा पर।

SC, ST, OBC का संबंध : SC (अनुसूचित जाति, 15% आरक्षण), ST (अनुसूचित जनजाति, 7.5%) और OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग, 27%) का आरक्षण ऐतिहासिक भेदभाव (जैसे छुआछूत, अलगाव) को दूर करने के लिए है। ये वर्ग मुख्य रूप से हिंदू समाज (और कुछ अन्य धर्मों) से जुड़े हैं, जहां हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन इन समुदायों को सदियों की जातिगत असमानता के कारण ‘पिछड़ा’ माना जाता है। आरक्षण यहां जाति/जनजाति के सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित है, न कि धार्मिक अल्पसंख्यकता पर। उदाहरणस्वरूप, SC/ST में हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन उनका आरक्षण धार्मिक नहीं, बल्कि संवैधानिक (अनुसूची) है। OBC में कुछ अल्पसंख्यक (जैसे मुस्लिम उप-समूह) शामिल हो सकते हैं, यदि वे पिछड़े साबित हों। हालिया सुप्रीम कोर्ट फैसले (2024) ने SC/ST में सब-कैटेगरी आरक्षण की अनुमति दी, ताकि अधिक पिछड़े उप-समूहों को लाभ मिले। इस प्रकार, जबकि हिंदू समाज बहुसंख्यक है, SC/ST/OBC आरक्षण जातिगत अन्याय को संबोधित करता है, जो धार्मिक अल्पसंख्यक अवधारणा से अलग लेकिन सामाजिक न्याय से जुड़ा है।

Award given at 7th Annual BW Applause Experiential Marketing Summit & Awards in New Delhi

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NEW DELHI: KidZania India’s Madhya Pradesh Tourism experience Centre has been honoured with the Best Consumer Activation of the Year – Silver Award at the 7th Annual BW Applause Experiential Marketing Summit & Awards, held at the Eros Hotel in New Delhi. The recognition celebrates the innovative Madhya Pradesh Tourism Experience Centre; an immersive, first-of-its-kind platform that introduces young audiences to the state’s rich cultural, natural, and historical heritage.

Shri Sheo Shekhar Shukla, Additional chief Secretary, Tourism, Culture, Home and Religious trust and endowment and Managing Director of the Madhya Pradesh Tourism Board, said, “This recognition is a testament to our longstanding association with KidZania India and our shared commitment to creating meaningful, future-oriented tourism experiences. Our collaboration blends the goals of promoting Madhya Pradesh’s rich heritage with KidZania’s strength in immersive, child-centric engagement. Together, we have built an experience that not only entertains but also inspires curiosity and responsible travel among young audiences. We are delighted that this joint effort has been acknowledged by the experiential marketing community, reinforcing our belief in innovation-driven, impactful tourism outreach.”

Tarandeep Singh Sekhon, Chief Business Officer at KidZania India, said, “This award is a testament to our commitment to creating meaningful experiential learning environments that inspire the next generation of travellers and responsible citizens. The Madhya Pradesh Tourism Experience Centre demonstrates how experiential platforms can seamlessly blend education and entertainment, allowing children to discover India’s cultural treasures in an engaging, interactive manner. We are proud to partner with the Madhya Pradesh Tourism Board in cultivating curiosity and fostering genuine connections between young audiences and one of India’s most remarkable destinations. This recognition strengthens our belief that experiential marketing, when executed with purpose and innovation, can drive real impact beyond traditional engagement metrics.”

Developed in collaboration with the Madhya Pradesh Tourism Board, the Madhya Pradesh Tourism Experience Centre features two high-impact virtual journeys: an engaging Jungle Safari and an exhilarating River Rafting simulation. Using advanced VR, motion sensors, and 3D immersive technologies, the experience brings the biodiversity, landscapes, and ecological treasures of Madhya Pradesh to life in a way that is both educational and captivating for children.

With this award, KidZania India and the Madhya Pradesh Tourism Board reaffirm their shared dedication to building impactful, purpose-driven experiences that leave lasting impressions on young explorers. The organisations remain committed to expanding engaging, responsible, and immersive tourism storytelling that inspires future generations and strengthens India’s experiential learning ecosystem.

श्री राम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर पूर्ण गौरव के साथ धर्म ध्वजारोहण

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अयोध्या : रामराज्य का प्रतीक धर्मध्वज आज पूर्ण श्रद्धा के साथ श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के उत्तुंग शिखर पर चढ़ाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ध्वज को 191 फिट ऊंचाई पर चढ़ाने की प्रक्रिया पूरी की। हजारों की संख्या में उपस्थित हर जाति वर्ग के लोग भाव विभोर होकर पांच सौ वर्षों के निरंतर संघर्ष के बाद आए इस सार्थकता दिवस के साक्षी बने। इससे पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने रामदरबार में आरती कर रामलला का दर्शन पूजन किया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री, सरसंघचालक जी सहित सभी आगंतुकों का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि भव्य मंदिर पर ध्वजारोहण एक यज्ञ की पूर्णाहुति ही नहीं, अपितु नए युग का शुभारंभ है। रामराज्य के मूल्य कालजयी हैं। अनगिनत पीढ़ियों की प्रतीक्षा भव्य मंदिर के रूप में है। यह ध्वज धर्म और मर्यादा के साथ ही राष्ट्रधर्म और विकसित भारत की संकल्पना का प्रतीक है। “नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना..” की रामराज्य की परिकल्पना में सभी को अन्न, स्वास्थ्य सुविधा, आवास आदि उपलब्ध कराना है। यही रामराज्य की उद्घोषणा का संकल्प है। 500 वर्षों के संघर्ष के बाद इस ध्वजारोहण से अयोध्या अब उत्सवों की वैश्विक राजधानी बन गई है।

सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि आज का दिन हम सबके लिए सार्थकता का दिवस है। इसके लिए कितने लोगों ने सपना देखा, कितनों ने प्रयास किया, कितनों ने अपने प्राण अर्पण किए। अशोक जी, महंत रामचंद्र दास जी महाराज, डालमिया जी सहित कितने ही संत पुरुषों, गृहस्थ, विद्यार्थियों ने अपने प्रणार्पण किए, आज उनकी आत्माएं तृप्त हो रही होंगी। आज उस मंदिर निर्माण की शास्त्रीय प्रक्रिया पूर्ण हो गई। यह उसी ध्वज का आरोहण व रामराज्य का ध्वज है जो कभी अयोध्या में फहराता था और संपूर्ण विश्व में अपने आलोक से सुख शांति प्रदान करता था। उसी ध्वज को आज फिर से हमने नीचे से ऊपर चढ़ता हुआ, अपने शिखर पर विराजमान होते अपनी आंखों से देखा है। मंदिर बनने में भी समय लगा, 500 साल छोड़ें तो भी 30 साल तो लगे ही हैं। मंदिर के रूप में हमने कुछ तत्वों को उच्चतम शिखर पर पहुंचाया, जिससे सारा विश्व ठीक चले। व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन से लेकर तो संपूर्ण सृष्टि का जीवन ठीक चले, यही धर्म है। उस धर्म का प्रतीक भगवा रंग ही इस ध्वज का रंग है। इस धर्म ध्वज पर रघुकुल का प्रतीक कोविदार वृक्ष है। यह वृक्ष उस रघुकुल की सत्ता का प्रतीक है, जिससे यह व्यक्त होता है कि स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों के लिए छाया प्रदान करें। ध्वजारोहण यह भी संदेश देता है कि इस जीवन का झंडा शिखर तक पहुंचना है, चाहे जितनी प्रतिकूलता, कठिनाई क्यों न हो। भले ही सारी दुनिया स्वार्थ में बैठी हो, लेकिन हमारा संकल्प सूर्य भगवान के तेज जैसा है। हिन्दू समाज ने लगातार 500 साल और बाद के दीर्घ आंदोलन में अपने इस तत्व को सिद्ध किया और रामलला आ गए, मंदिर बन गया। यह ध्यान रहे कि संपूर्ण दुनिया में सुख बांटने वाला भारतवर्ष खड़ा करने का काम शुरू हो गया है। इस प्रतीक को देखकर हिम्मत रखकर सतत प्रयास करते हुए, सब प्रकार की प्रतिकूलताओं में भी हम सबको मिलकर करना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि आज यह हमारे संकल्प की पुनरावृत्ति का दिवस है, जो संकल्प हमारे पूर्वजों ने दिया है। यह देश जहां हम जन्मे हैं, सबसे प्राचीन है, इसलिए बड़े भाई हैं, ऐसा जीवन जिएं कि पृथ्वी के सर्वमानव चरित्र की शिक्षा, जीवन की विद्या भारतवासियों से सीखें। सबको विकास का सुफल देने वाला भारतवर्ष खड़ा करना है। यह विश्व की अपेक्षा है, यही हमारा कर्तव्य है। मंदिर में श्री रामलला विराजमान हैं, उनका नाम लें और इस कार्य की गति बढ़ाएं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश और दुनिया इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बन रहे हैं। आज अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के उत्कर्ष बिंदु की साक्षी बन रही है। संपूर्ण भारत, संपूर्ण विश्व राममय है। राम भक्तों को संतोष, असीम कृतज्ञता, अपार अलौकिक आनंद है। सदियों का संकल्प आज सिद्धि को प्राप्त हो रहा है। आज उस यज्ञ की पूर्णाहुति है, जिसकी अग्नि 500 वर्ष तक प्रज्ज्वलित रही। यह एक पल भी आस्था से डिगी नहीं, एक पल भी विश्वास से टूटी नहीं। आज भगवान श्रीराम के गर्भगृह की अनंत ऊर्जा श्रीराम परिवार का दिव्य प्रताप, इस धर्म ध्वजा के रूप में दिव्यतम्, भव्यतम् मंदिर प्रतिस्थापित हुआ। यह पुनर्जागरण का ध्वज है, इसका भगवा रंग इस पर रचित सूर्यवंश की ख्याति, वर्णित ‘ॐ’ शब्द और अंकित कोविदार वृक्ष रामराज्य की कीर्ति को प्रतिरूपित करता है। यह ध्वज संकल्प है, सफलता है, संघर्ष से सृजन की गाथा है, सदियों से चले आ रहे सपनों का साकार स्वरूप है। यह ध्वज संतों की साधना और समाज की सहभागिता की सार्थक परिणीति है। यह धर्म ध्वज आह्वान करेगा सत्यमेव जयते का। यह धर्म ध्वज प्रेरणा बनेगा प्राण जाई पर वचन न जाई। धर्म ध्वजा कामना करेगा परेशानी से मुक्ति, समाज में शांति और सुख हो, यह ध्वज दूर से ही रामलला की जन्मभूमि के दर्शन कराएगा। युगों-युगों तक प्रभु श्री राम के आदेशों और प्रेरणा को मानव मात्र तक पहुंचाएगा। संपूर्ण विश्व के करोड़ों राम भक्तों को इस अद्वितीय अवसर की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। आज उन सभी भक्तों को भी प्रणाम करता हूं, हर उस दानवीर का आभार व्यक्त करता हूं, जिसने राम मंदिर निर्माण के लिए अपना सहयोग दिया। राम मंदिर के निर्माण से जुड़े हर श्रमवीर, हर कारीगर, हर योजनाकार, हर वास्तुकार सभी का अभिनंदन करता हूं।

अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्श आचरण में बदलते हैं। यही वह नगरी है, जहां श्रीराम ने अपना जीवन पथ शुरू किया था। इसी अयोध्या में संसार को बताया कि एक व्यक्ति कैसे समाज की शक्ति से, उसके संस्कारों से, पुरुषोत्तम बनता है। जब श्रीराम अयोध्या से वनवास को गए तो वे युवराज राम थे, लेकिन जब लौटे तो मर्यादा पुरुषोत्तम बन करके आए। उनके मर्यादा पुरुषोत्तम बनने में महर्षि वशिष्ठ का ज्ञान, महर्षि विश्वामित्र की दीक्षा, महर्षि अगस्त्य का मार्गदर्शन, निषाद राज की मित्रता, मां शबरी की ममता, भक्त हनुमान का समर्पण, इन सब की शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

विकसित भारत बनाने के लिए भी समाज की इसी सामूहिक शक्ति की आवश्यकता है। राम मंदिर का दिव्य प्रांगण भारत के सामूहिक समर्थ्य का भी चेतना स्थल बन रहा है। यहां सप्त मंदिर बने हैं, माता शबरी का मंदिर बना है जो जनजातीय समाज के प्रेम भाव और आतिथ्य परंपरा की प्रतिमूर्ति है। यहां निषादराज का मंदिर बना है, यह उस मित्रता का साक्षी है जो साधन नहीं, साध्य को, उसकी भावना को पूजती है। यहां एक ही स्थान पर माता अहिल्या है, महर्षि वाल्मीकि है, महर्षि वशिष्ठ है, महर्षि विश्वामित्र है, महर्षि अगस्त्य है और संत तुलसीदास हैं। रामलला के साथ-साथ इन सभी ऋषियों के दर्शन भी होते हैं। यहां जटायु जी और गिलहरी भी हैं, जो बड़े संकल्पों की सिद्धि के लिए हर छोटे से छोटे प्रयास के महत्व को दिखाती है। हमारे राम भेद से नहीं, भाव से जुड़ते हैं। उनके लिए व्यक्ति का कुल नहीं, उसकी भक्ति महत्वपूर्ण है। उन्हें वंश नहीं, मूल्य प्रिय है। शक्ति नहीं, सहयोग महान लगता है।

कार्यक्रम में राज्यपाल आनंदी बेन पटेल, ट्रस्ट अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास, कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंददेव गिरि सहित अन्य न्यासीगण व आमंत्रित संत समाज व अनेक प्रतिष्ठित जन उपस्थित रहे।

विपरीत परिस्थितियों ने उन्हें बना दिया दूरदर्शी

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रमेश दुबे

पटना। आज पूर्वांचल के गाँव के सवर्ण नौजवानोंके बर्बाद होने की असली वजह ईर्ष्या और दिखावा है. सवर्ण समुदाय की नई पीढी अब तुलनात्मक रूप से कामचोर नहीं है. सवर्ण समुदाय में ब्राह्मण ही जातीय अहंकार की वजह से कुछ काम को छोटा समझते हैं इसीलिए अभी भी पिछड़े हैं. उन्नाव, कन्नौज, एटा, इटावा इत्यादि ज़िलों के राजपूत और ब्राह्मण नौजवानों को देखकर आप दंग रह जाएँगे वे हर तरह के धंधे कर रहे हैं. कन्नौज के इत्र के धंधे पर देखिए कैसे यादव राजपूत ब्राह्मण अब एक बराबरी पर आने लगे पता करिए यह पुश्तैनी धंधा किनका था.

सरकारी दस्तावेज के मुताबिक पिछड़ी जातियों के नौजवानों के बर्बाद होने की वजह उनके पुश्तैनी काम को छोटा बताकर उन्हें हीन भावना का शिकार बना दिया गया. अब वे मालिक से नौकर बनने की तरफ़ बढ़ रहे हैं. जैसे- समझो मल्लाह के नौजवानों नौकरी करने जा रहे हैं और सवर्ण और मुस्लिम मछली पालने से बेचने तक के धंधे पर दिल्ली से देवरिया तक देख लीजिए कब्जा कर चुके हैं. सब्जी का धंधा पुश्तैनी कुशवाहा समाज का था उनके बेटे 10 हजार की नौकरी पर जा रहे हैं जबकि बनारस की मंडी से गाजियाबाद की साहिबाबाद मंडी तक पर सवर्ण और मुस्लिम समुदाय हावी है.

अच्छा चलिए इस बात से समझिए नाच की परंपरा किनकी थी जो सदियों से पारंगत थे जब लिबराइजेशन हुआ तो इसमें पैसा आया तो वे बाहर हो गये बताइए बॉलिवुड पर किन लोगों का कब्जा था और है? ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि आपके दिमाग में भर दिया राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वालों ने कि आपका पुश्तैनी काम छोटा है. सोचिए बाबू साहब खेत में गन्ना, गेहूँ धान पैदा करें मतलब मेहनत और खर्च का काम आप करिए और आपके पैदा हुए को बेचने का धंधा करके बनिया अमीर बनता गया. क्योंकि पहले बाबू साहब से किसान बन चुके लोगों को बताया गया कि यह बेचने का काम छोटा होता है. और इसी वजह से बाबू साहब की सारी जमीन बिकती चली गयी. नई पीढ़ी यह समझ रही है.

हर तरह की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद मुस्लिम समुदाय सिर्फ़ अपनी मेहनत और हर काम को इज़्ज़त की नज़र से देखने की वजह से टिके हुए हैं. आगे बढ़ रहे हैं. आज पिछड़े और दलित नौजवानों को अपने नेताओं की बकलोली के बजाए मुस्लिम समुदाय और बदल रहे सवर्ण समुदाय से सीखने की जरूरत है. अपने पुश्तैनी काम में आप माहिर थे सोचिए मल्लाह से अच्छा मछली का धंधा राजपूत भूमिहार शेख सैय्यद कैसे कर पाता? आप हटे और इन लोगों ने धंधे को क़ब्ज़ा लिया.

मैं बिहार के लखीसराय, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर के ग्रामीण अंचल तक के भूमिहारों को देखा. वे धंधा करने यूरोप, साउथ अफ़्रीका के देशों तक में कर रहे हैं. इसीलिए गाँव की उनकी जमीन बची रह गयी हैं. जो माइग्रेट हुआ वह भी सफल रहा क्योंकि बाहर गया लिबराइजेशन का फ़ायदा मिला जो वहाँ रुका वह लालू राज में एक हाथ से हथियार उठाया दूसरे हाथ से धंधा किया. हर तरह का धंधा.

आपको एक उदाहरण से समझाता हूँ. मुजफ्फरपुर के किसान समूह में मिलकर ट्रेन से अपनी लीची वे दिल्ली और गाजियाबाद साहिबाबाद मंडी में आज से चालीस साल पहले से बेंचते हैं. इंदिरापुरम में ऐसे सैकड़ों किसानों ने तब यहाँ घर ख़रीद लिया था. ताकि सीजन में मंडी आते थे ठहरते थे. बाद में लालू राज के दौरान अपने बच्चों को यहाँ पढ़ने भेज दिये. सोचिए विपरीत परिस्थितियों ने उन्हें कितना दूरदर्शी बना दिया उस वक्त पूर्वांचल के लोग गाँव के बनियों तक सीमित थे. आज उसी इंदिरापुरम के पार्षद पिछले बीस साल से उसी बिहार के भूमिहार हैं. क्योंकि यहाँ वह मात्र बिहारी है.

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