क्या सनसनी फैलाना ही पत्रकारिता का उद्देश्य है?

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उदयपुर : राजस्थान पत्रिका ने अपने 8 जुलाई के सभी संस्करणों में प्रथम पृष्ठ पर प्रमुखता से ‘धरोहर पर प्रहार : जो काम मुगल और अंग्रेज़ नहीं कर पाए, वो एक ठेकेदार ने कर दिखाया’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया। इस समाचार में दावा किया गया कि उदयपुर के सरस्वती मंडल पुस्तकालय में स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत डिजिटलीकरण के नाम पर लगभग एक हजार दुर्लभ पुस्तकें फाड़ दी गईं और अब उन्हें दीमक खा रही है।

यह समाचार जितना आकर्षक शीर्षक के साथ प्रस्तुत किया गया, उतना ही आवश्यक था कि उसके तथ्य भी पूरी तरह सत्यापित होते। दुर्भाग्य से इस मामले में कई महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की गई।

वास्तविकता यह है कि स्मार्ट सिटी परियोजना के अंतर्गत सरस्वती मंडल पुस्तकालय में सुरक्षित दुर्लभ एवं ऐतिहासिक पुस्तकों का डिजिटलीकरण किया जाना था। इसके लिए नगर निगम द्वारा विधिवत निविदा जारी की गई और पटना की एक फर्म को यह कार्य सौंपा गया।

डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में पुरानी पुस्तकों की जिल्द (बाइंडिंग) सावधानीपूर्वक खोली जाती है, ताकि प्रत्येक पृष्ठ को अलग-अलग स्कैन किया जा सके। यह पुस्तक संरक्षण और डिजिटलीकरण की दुनिया में एक सामान्य एवं स्वीकृत तकनीकी प्रक्रिया है। स्कैनिंग पूर्ण होने के बाद पुस्तकों की पुनः बाइंडिंग (रीबाइंडिंग) की जाती है।

किन्तु उदयपुर के इस प्रकरण में स्कैनिंग के बाद संबंधित फर्म और स्मार्ट सिटी परियोजना के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। परिणामस्वरूप फर्म कार्य अधूरा छोड़कर चली गई और पुस्तकों की रीबाइंडिंग नहीं हो सकी। यह पूरा घटनाक्रम वर्ष 2022 का है।

इसके बाद पुस्तकालय प्रशासन ने सभी खुली हुई पुस्तकों को सुरक्षित रूप से समेटकर अलमारियों में संरक्षित रख दिया, ताकि भविष्य में जब किसी नई एजेंसी को यह कार्य सौंपा जाए तो उनकी रीबाइंडिंग कराई जा सके। पुस्तकालय द्वारा इस संबंध में स्मार्ट सिटी अधिकारियों से लगातार पत्राचार भी किया गया, किन्तु आवश्यक कार्रवाई नहीं हुई और परियोजना का पहला चरण समाप्त हो गया।

ऐसी स्थिति में यह कहना कि “एक हजार किताबें फाड़ दी गईं”, वस्तुस्थिति का सही चित्रण नहीं है। किसी पुस्तक की जिल्द को तकनीकी आवश्यकता के तहत खोलना और पुस्तक को नष्ट कर देना—दोनों अलग-अलग बातें हैं। यदि रीबाइंडिंग नहीं हुई तो यह निश्चित रूप से प्रशासनिक लापरवाही और परियोजना के अधूरे क्रियान्वयन का विषय है, लेकिन इसे पुस्तकों को “फाड़ देना” कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं कहा जा सकता।

इसी प्रकार यह लिखना कि “अब उन्हें दीमक खा रही है” भी अत्यधिक सनसनीखेज प्रस्तुति प्रतीत होती है। पुस्तकालय प्रशासन के अनुसार पुस्तकें सुरक्षित अलमारियों में रखी गई हैं और उनकी रीबाइंडिंग आज भी संभव है, जिसे शीघ्र कराने की प्रक्रिया की जा रही है।

निस्संदेह यह मामला गंभीर है। परियोजना अधूरी रहना, वर्षों तक रीबाइंडिंग न होना और प्रशासनिक उदासीनता—ये सभी प्रश्न उठाते हैं। इन पर कठोर और तथ्याधारित पत्रकारिता होनी चाहिए। लेकिन यदि तकनीकी प्रक्रिया को “धरोहर पर प्रहार” और “किताबें फाड़ दी गईं” जैसे शीर्षकों में बदल दिया जाए, तो इससे पाठकों तक वास्तविक स्थिति के बजाय एक भ्रामक और अतिरंजित तस्वीर पहुँचती है।

पत्रकारिता का मूल धर्म तथ्यों को सामने लाना है, न कि उन्हें सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करना। प्रश्न यह भी है कि क्या किसी प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादकीय स्तर पर ऐसे शीर्षकों और दावों का पर्याप्त तथ्य परीक्षण नहीं होना चाहिए था? क्या डिजिटलीकरण की मानक प्रक्रिया को समझे बिना उसे “किताबें फाड़ना” कहना उचित है?

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए समाचारों में संवेदनशील विषयों पर तथ्य, तकनीकी प्रक्रिया और सभी पक्षों का समुचित परीक्षण होना चाहिए। आलोचना अवश्य हो, लेकिन वह तथ्यों पर आधारित हो, ताकि जनविश्वास भी बना रहे और वास्तविक जिम्मेदारी भी तय हो सके।

(नवल पांडेय के सोशल मीडिया पेज से साभार)

वेलनेस उद्योग की विडंबना

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डॉ नीलम महेंद्र

दिल्ली । सभ्यताएँ केवल अपने आविष्कारों से महान नहीं बनतीं, अपितु वे अपनी प्राथमिकताओं से इतिहास में याद रखी जाती हैं। हमारी सभ्यता ने अंतरिक्ष तक पहुँचने की क्षमता विकसित कर ली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का निर्माण कर लिया, सूचनाओं को प्रकाश की गति से भी तेज़ गति से दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँचा दिया,लेकिन इसी सभ्यता का मनुष्य आज रात भर चैन की नींद सोने के लिए संघर्ष कर रहा है। उसके पास सुविधा है, साधन हैं, संसाधन हैं, पर सुकून नहीं है। और शायद हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि अब सुकून भी एक उत्पाद बन चुका है।

अच्छी नींद के लिए स्लीप क्लिनिक हैं, तनाव से मुक्ति के लिए माइंडफुलनेस प्रोग्राम हैं, जंगल में समय बिताने के लिए फॉरेस्ट बाथिंग है, तारों को निहारने के लिए स्टार बाथिंग है और मोबाइल से दूर रहने के लिए डिजिटल डिटॉक्स रिट्रीट। इनमें से किसी उपाय पर आपत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि इनके लाभ वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैं। प्रश्न केवल इतना है कि जिन अनुभवों पर कभी किसी का स्वामित्व नहीं था, वे आज पैकेज और प्रीमियम सेवाओं में क्यों बदल गए? क्या हमने जीवन इतना कृत्रिम बना लिया है कि अब अपनी सबसे स्वाभाविक ज़रूरतों तक पहुँचने के लिए भी बाज़ार की मध्यस्थता आवश्यक हो गई है?

दरअसल हाल ही में तीन समाचार लगभग एक साथ चर्चा में रहे। देश के गृह मंत्री ने सार्वजनिक रूप से बताया कि अपनी जीवनशैली में बदलाव कर उन्होंने मधुमेह पर विजय प्राप्त कर ली है। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने इंसुलिन एवं अन्य किसी भी प्रकार की एलोपैथिक दवा से भी मुक्ति पा ली है। इसी प्रकार जर्नल ऑफ एन्वायरमेंटल साइकोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में यह पाया गया कि रात में आकाश को निहारने का मानसिक स्वास्थ्य और खुशी के बीच सकारात्मक संबंध है। तो अब वेलनेस थेरेपी के अंतर्गत ‘स्टार बाथिंग’ (रात में खुले आकाश के नीचे लेट कर तारों को निहारना) मानसिक स्वास्थ्य की चिकित्सा का रूप ले चुका है। इसी प्रकार एक अन्य रिपोर्ट में न्यूरोलॉजिस्टों ने चेतावनी दी है कि देर रात तक मोबाइल स्क्रीन देखने की आदत के कारण युवाओं से लेकर छोटे बच्चों तक में माइग्रेन और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। खास बात यह है कि इस प्रकार के लक्षण किसी दवा से नहीं बल्कि स्क्रीन टाइम कम करने, रात को समय पर सोने, पर्याप्त नींद लेने जैसे साधारण उपायों से ठीक हो रहे हैं।

देखने में ये तीनों समाचार अलग-अलग हैं, लेकिन इनके भीतर एक ही संदेश छिपा है,मनुष्य अपनी प्राकृतिक जीवन-लय से दूर होता जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में होने वाली लगभग 74 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों के कारण होती हैं। इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के अनुसार भारत में दस करोड़ से अधिक लोग मधुमेह से पीड़ित हैं, जबकि तेरह करोड़ से अधिक लोग प्रीडायबिटीज की स्थिति में हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद भी मानती है कि अनियमित दिनचर्या, तनाव, शारीरिक निष्क्रियता और असंतुलित भोजन इस संकट के प्रमुख कारण हैं। इसे क्या कहा जाए कि एक ओर चिकित्सा विज्ञान लगातार प्रगति कर रहा है, तो दूसरी ओर जीवन की स्वाभाविक लय लगातार टूट रही है।

दरअसल समस्या केवल बीमारी नहीं है। समस्या यह है कि हमने सुविधा को ही विकास मान लिया है। हमने समय बचाने वाली मशीनें बनाईं, लेकिन अपने लिए समय नहीं बचा पाए। हमने श्रम कम किया, पर शरीर की सक्रियता छीन ली। हमने संचार के असंख्य साधन बना लिए, लेकिन संवाद खो दिया। हमने घरों को बड़ा बनाया, पर आँगन छोटे कर दिए। हम स्क्रीन के पहले कभी इतने जुड़े हुए नहीं थे और शायद भीतर से कभी इतने अकेले भी नहीं थे।

विकास की इस यात्रा में हमने बहुत कुछ पाया, लेकिन शायद उससे अधिक कुछ खो भी दिया।

आधुनिक उपभोक्तावादी व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि वह वस्तुएँ बेचती है, उसकी सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह जीवन के सामान्य अनुभवों को भी असाधारण बना देती है। जिस आकाश के नीचे कभी बच्चे ध्रुव तारा पहचानते थे, आज वही ‘स्टार बाथिंग’ है। जिस जंगल को भारतीय परंपरा ने तप और आत्मचिंतन का स्थान माना, वही आज वेलनेस अनुभव बन गया है। नतीजन वस्तुएँ नई नहीं हैं, उन्हें देखने का हमारा दृष्टिकोण बदल गया है।

आधुनिक उपभोक्तावाद की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उसने हमारी सबसे सामान्य आवश्यकताओं को भी विशेष अनुभव में बदल दिया। पहले स्वास्थ्य जीवन का परिणाम था, आज वह जीवन का प्रोजेक्ट बन गया है। पहले अनुशासन परिवार और परिवेश सिखाते थे, आज उसके लिए अलग से कोच, ऐप और कार्यक्रम उपलब्ध हैं। पहले सुबह की सैर किसी लक्ष्य का हिस्सा नहीं होती थी,वह दिनचर्या थी। आज वही कदम स्मार्ट वॉच गिनती है और उनकी संख्या हमारी उपलब्धि बन जाती है।

कुछ दशक पहले तक गर्मियों की रातें आँगन और छतों पर बीतती थीं। बच्चे दादी-नानी से सप्तऋषि, ध्रुव तारे और चंद्रमा की कहानियाँ सुनते हुए सो जाते थे। गाँवों में किसान खुले आकाश के नीचे रात गुज़ारते थे। तब यह कोई ‘वेलनेस एक्टिविटी’ नहीं थी, बल्कि जीवन की स्वाभाविक लय थी। आज वही अनुभव अंग्रेज़ी नाम, विशेषज्ञों की सलाह और पैकेजिंग के साथ लौट रहा है। यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति का बाज़ारीकरण है।

यही स्थिति भोजन, योग और ध्यान की भी है। सादा भोजन अब ‘डिटॉक्स डाइट’ कहलाता है। उपवास ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ बन गया है। मौन ‘माइंडफुलनेस’ है और योग अनेक स्थानों पर आत्मानुशासन से अधिक फिटनेस उद्योग का हिस्सा बन गया है। इन परिवर्तनों से लाभ मिल सकता है, लेकिन वे एक असुविधाजनक प्रश्न भी छोड़ जाते हैं,क्या हम अपनी परंपराओं को तब तक नहीं पहचानते जब तक वे विदेशी शब्दावली और आकर्षक पैकेजिंग में हमारे सामने वापस न आएँ?

भारतीय चिकित्सा परंपरा आयुर्वेदि का मूल सिद्धांत है,”स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्”, अर्थात् चिकित्सा का पहला उद्देश्य रोगी का उपचार नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा है।

आज जब चिकित्सा और अस्पताल भी एक उद्योग बन चुके हैं, हमारे लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्वास्थ्य का पहला आधार दवा नहीं, बल्कि जीवन जीने का ढंग है। क्योंकि डॉक्टर उपचार दे सकता है, पर समय पर सोना, संतुलित भोजन करना, नियमित चलना और मानसिक संतुलन बनाए रखना अंततः व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी है।

इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक चिकित्सा, तकनीक या वेलनेस सेवाएँ अनावश्यक हैं। उन्होंने लाखों लोगों का जीवन बेहतर बनाया है। प्रश्न उनका अस्तित्व नहीं, बल्कि हमारी प्राथमिकताओं का है। यदि समाज पहले ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करे जिनमें तनाव, निष्क्रियता और अकेलापन सामान्य हो जाएँ, और फिर उन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए उद्योग खड़े करे, तो हमें केवल उपचार पर नहीं, कारणों पर भी विचार करना होगा।

यही कारण है कि आज सबसे बड़ी आवश्यकता नए वेलनेस ट्रेंड की नहीं, बल्कि जीवन की खोई हुई लय को पुनः स्थापित करने की है। स्वास्थ्य कोई ऐसा लक्ष्य नहीं जिसे सप्ताहांत में हासिल किया जाए, वह हर दिन जी जाने वाली छोटी-छोटी आदतों का संचय है। सुबह की धूप, थोड़ी-सी पैदल चाल, परिवार के साथ बैठकर खाया गया भोजन, पर्याप्त नींद, सीमित स्क्रीन समय और प्रकृति से नियमित संपर्क,इनका कोई विकल्प नहीं हो सकता।

सभ्यता की वास्तविक परीक्षा उसकी ऊँची इमारतों या तेज़ इंटरनेट से नहीं होगी। उसका मूल्यांकन इस बात से होगा कि उसने मनुष्य को कितना संतुलित, स्वस्थ और भीतर से शांत बनाया। यदि विकास का परिणाम यह हो कि बच्चों को खेलने के लिए कृत्रिम पार्क, बड़ों को चलने के लिए ट्रेडमिल, नींद के लिए क्लिनिक और शांति के लिए रिट्रीट खोजने पड़ें, तो हमें विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार करना ही होगा।

शायद आने वाली पीढ़ियाँ विश्वास भी न करें कि एक समय ऐसा था जब लोग बिना किसी ऐप के अपनी नींद पूरी कर लेते थे, बिना किसी स्मार्ट वॉच के प्रतिदिन कई किलोमीटर चल लेते थे, बिना किसी ‘स्टार बाथिंग’ पैकेज के तारों को निहारते थे और बिना किसी वेलनेस सदस्यता के भीतर से शांत भी रहते थे। यदि वह समय उन्हें किसी लोककथा जैसा लगे, तो समझ लीजिए कि हमने केवल जीवन की शैली नहीं बदली, जीवन का अर्थ बदल दिया है।

एक महान राष्ट्रभक्त और अद्वितीय प्रतिभा थे डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी

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दिल्ली । विट्ठल भाई पटेल भवन में डिप्टी स्पीकर हाल में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की 126वीं जयंती की पूर्व संध्या पर भारतीय जनसंघ की ओर से एक आयोजन हुआ ।
आयोजन की अध्यक्षता जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री भारत भूषण पांडे जी ने की।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में विद्वान विचारक प्रोफेसर रामेश्वर मिश्र पंकज ने कहा:-
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक महान राष्ट्रभक्त और अद्वितीय प्रतिभा थे।
उनकी अन्य विशेषताओं की चर्चा पूर्व वक्ताओं ने की है।
यहां मैं एक मुख्य बात की चर्चा करना चाहता हूं ,कि वस्तुत: भारतीय जनसंघ की स्थापना की प्रेरणा और पहल
मुख्यतः डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की ही रही।
(पहले तो अंग्रेजों ने अपने व्यापार की रक्षा के लिए सिपाहियों की भर्ती के नाम पर एक रक्षक दल बनाया और बाद में उसे ही सेना कहने लगे।
जबकि स्वयं इंग्लैंड में कोई स्टैंडिंग आर्मी नहीं थी। प्रथम महायुद्ध के समय उन्होंने ताबड़तोड़ अपने सभी वयस्क नागरिकों की सेना में अनिवार्य भारती की थी क्योंकि उनके वहां कोई स्टैंडिंग आर्मी नहीं थी।
भारतीयों की उस सेवा के बल पर उन्होंने भारत में भारत के वीर राष्ट्रभक्तों क्रांतिकारियों का भयंकर दमन और संहार किया। परंतु उन्हें अंतत: भारतीय सेना की वीरता से ही घबराकर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की वीरता से घबरा कर भारत छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा।
तब उन्होंने कांग्रेस की ठंडी धारा के अपने मित्र नेताओं जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाकर जाने का निर्णय किया। )

जवाहरलाल नेहरू जितना अंग्रेजों से प्रभावित थे ,उतना ही स्टालिन और लेनिन से प्रभावित थे और सोवियत संघ का आदर्श अपने सामने रखते थे।।
इसलिए उन्हें हिंदू समाज की स्वाभाविक शक्ति का उभरना अपने लिए बहुत खतरा दिखता था।
इस बीच विभाजन में गांधी जी की भूमिका से देश में क्षोभ था और गांधी जी के प्राणों पर संकट था।
यह खबर गुप्तचर विभाग को लग गई थी परंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने कोई आवश्यक सतर्कता नहीं बरती।
शायद उनके मन में था कि घटना को घट जाने दिया जाए और फिर हम इसका लाभ उठाएंगे ।
असल रहस्य क्या था यह तो अगर विस्तृत जांच हो तब पता चलेगा।
तो गांधी जी की हत्या हो गई और जवाहरलाल नेहरू ने या कांग्रेस पार्टी ने पहले से ही ऐसी कोई तैयारी कर रखी थी कि तत्काल ही महाराष्ट्र तथा अन्य स्थानों पर चितपावन ब्राह्मणों की हत्या और उनके घर जलाने का क्रम शुरू हो गया ।मध्य प्रदेश राज्य में भी काफी दमन हुआ और बिना किसी प्राथमिकी को दर्ज किए तथा बिना किसी साक्ष्य के हिंदू शक्तियों की दोनों धाराओं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा पर प्रतिबंध लगा दिया गया और वीर सावरकर तथा गुरु गोलवलकर जी को बंदी बना लिया गया।
वीर सावरकर में तो राजनीतिक प्रखरता और चेतना सदा ही थी परंतु गुरु जी गोलवलकर आध्यात्मिक झुकाव के थे और वह संपूर्ण राष्ट्र से यानी विशेष कर अपने संपूर्ण हिंदू समाज से अतिशय प्रेम करते थे इसलिए उन्हें यह बहुत ही आघात कारी लगा कि जिसे हम स्नेह करते हैं जिनको पूरी तरह अपना मानते हैं उन्होंने अकारण ,बिना किसी प्रमाण, बिना किसी साक्ष्य ,बिना किसी संभावना की जांच किए इस तरह से संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया और मुझे बंदी बना लिया ।
व्यापक लोकजागरण और आंदोलन से अंततः उन्हें गुरुजी को रिहा करना पड़ाम संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा।इसमें द्वारिका प्रसाद मिश्र सरदार पटेल और पंडित मौलिचंद्र शर्मा की विशेष भूमिका थी ।

रिहा होने के बाद उनसे देश के अनेक मनीषियों ने मंत्रणा की ।
डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही यह समझाया कि यह जो आधुनिक किस्म की पार्टियां हैं वह प्रतिस्पर्धी को सहन नहीं करती है और इनको यानी जवाहरलाल नेहरू जी को हिंदू शक्तियों से डर है इसलिए स्वयं हिंदू शक्तियों की भी प्रतिनिधि कोई एक पार्टी बनाना बहुत आवश्यक है।
इस प्रकार जनसंघ के निर्माण की मुख्य प्रेरणा और पहला तथा उसके पक्ष में तर्क सर्वप्रथम डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही दिए थे ।गुरु गोलवलकर जी को ये तर्क सही लगे और उन्होंने कहा कि ठीक है आप पार्टी बनायें ।
तो उन्होंने अपने कुछ स्वयंसेवक दिए अटल बिहारी वाजपेई, दीनदयाल उपाध्याय , बलराज मधोक और नानाजी देशमुख आदि को और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय पार्टी गठित हो गई ।इसमें शुरू में बहुत ही उच्च कोटि के विद्वानों और राष्ट्रभक्तों को शामिल किया गया। अटल जी ,डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सचिव का काम करते थे ।इस प्रकार जनसंघ की स्थापना में निर्णायक भूमिका डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की है जो इतिहास ,राजनीति और सनातन धर्म के आधारों के बहुत बड़े ज्ञाता थे ।
इसीलिए जनसंघ का लक्ष्य अखंड भारत ,गोवंश की सम्पूर्ण रक्षा और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने तथा भारत के सभी समुदायों में राष्ट्रीय भावना का उन्मेष करना था ।

संस्कृति वस्तुतः धर्म के सिवाय और कुछ नहीं होती। धर्म ही संस्कृति है

जिसे अंग्रेजी में कल्चर कहते हैं वह तो बहुत मामूली चीज है ।वह छोटे-छोटे भेद के द्वारा अलग संस्कृति कहने लगते हैं। अलग कल्चर कहने लगते हैं।
लेकिन सनातन धर्म की संस्कृति संपूर्ण राष्ट्र की एक है ।इसलिए धर्म ही जनसंघ का प्रयोजन था ।धर्म की स्थापना और धर्म मय राज्य की स्थापना जनसंघ का मूल प्रयोजन था।

बाद में 1980 में उसके एक प्रमुख अंश ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। शेष लोग उससे अलग मूल जनसंघ चला रहे हैं।
इन दिनों विश्व की जैसे स्थिति है उसमें अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का राजनीति के स्वरूप निर्धारण में बहुत महत्व है।
तो पहले जो समाजवादी दौर था उसके कारण कांग्रेस और उसके विरोधी दल सभी समाजवाद की बात करते थे। समाजवाद समाजवाद चारों तरफ था।
सोवियत संघ का विघटन हो गया और समाजवाद दुनिया में बहुत ही भयंकर मतवाद के रूप में बदनाम हो चुका है क्योंकि उसने बहुत बर्बरता की है अतः अब समाजवाद का कांग्रेस का और अपने को समाजवादी कहने वाली किसी भी धारा का कोई भविष्य नहीं है ।

कांग्रेस लगातार बदलती रही है और राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी ने उसे ईसाई मिशनरियों की सेवक पार्टी बनाने की पहल की। राहुल वही लक्ष्य आगे बढ़ा रहे हैं।
मैं ने 2014 में ही आस्था चैनल पर अपने प्रसारण में भी कहा था और लेख में भी लिखा था कि भारतीय समाज बहुत परिपक्व समाज है और उसने धीरज से कांग्रेस को काफी अवसर दिए और जब कांग्रेस सोनिया गांधी के समय हिंदू विरोधी हो गई तो उसने उसे बदलने का निश्चय किया ।
नरेंद्र मोदी केवल किसी संगठन के बल पर नहीं आए हैं। वह देवताओं के आशीर्वाद और संत महात्माओं के आशीर्वाद तथा धर्म प्राण हिंदुओं की योजना से आए हैं ,इच्छा से आए हैं, प्रयास से आए हैं ।
हिंदुत्व का यह परिवेश कम से कम 50 वर्ष रहेगा और अगर हिंदू दलों ने अच्छा कार्य किया तो सदा के लिए भारत हिंदू राष्ट्र के रूप में पुनः प्रतिष्ठित हो जाएगा ।
भारतीय जनता पार्टी का विकल्प भी कोई हिंदू पार्टी ही बन सकेगी जो सनातन धर्म से प्रेरित हो ,जो भारत के मर्म को जानती हो और भारत के सत्व को आगे बढ़ाने वाली हो।
जनसंघ पहले से ही इसी के लिए गठित एक पार्टी है ।इसलिए जनसंघ के सामने अवसर ही अवसर है।
परंतु केवल विचारों से कोई पार्टी नहीं आगे बढ़ती ।पुरुषार्थ और तप करना होगा ।राजनीतिक पुरुषार्थ और लक्ष्य प्राप्ति के लिए तपस्या के द्वारा ही संगठन आगे बढ़ते हैं ।यदि अगले 10 वर्षों तक जनसंघ ने पुरुषार्थ और तप किया तो चहुं ओर विजय ही विजय है। भारतीय जनता पार्टी के विकल्प के रूप में वह राष्ट्र को मान्य हो सकेगी।
पुरुषार्थ और तप करना आपके हाथ में है।
भारत माता की जय।

यूपी पीसीएस एसोसिएशन ने जारी की आधिकारिक विज्ञप्ति

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भास्कर

लखनऊ । यूपी पीसीएस एसोसिएशन में बड़ा बदलाव।
आपसी सहमति के बाद नए अध्यक्ष और महासचिव का चयन।
विभू भूषण मिश्र संभालेंगे अध्यक्ष का दायित्व।
डॉ. सृष्टि धवन को महासचिव की जिम्मेदारी।
सूत्र : मौजूदा अध्यक्ष पुष्पराज सिंह अध्यक्ष पद छोड़ने के पक्ष में नहीं थे।
काफी समय तक चली अंदरूनी चर्चा और सहमति बनाने की कोशिश।
आखिरकार आपसी सहमति से निकाला गया समाधान।
कार्यकारिणी की बैठक में कई अहम प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित
उपाध्यक्ष संजय कुमार समेत चार पदाधिकारी ऑनलाइन जुड़े
पंकज कुमार, पूजा अग्निहोत्री और संजय कुमार पांडेय ने वर्चुअली की सहभागिता।
श्रावण माह के बाद बुलाई जाएगी वार्षिक आम सभा (AGM)
2014 बैच या उसके बाद के अधिकारियों को चुनाव लड़ाने पर जोर।
नई कार्यकारिणी के लिए निर्वाचन समिति का होगा गठन
सोशल मीडिया पर चल रही अटकलों के बीच एसोसिएशन ने जारी की आधिकारिक विज्ञप्ति।
एसोसिएशन ने सदस्यों से केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करने की अपील की।

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