सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी तक पहुंचीं विवादित किताबों ने खड़े किए कई सवाल; जांच के घेरे में पूरी चयन प्रक्रिया

orig_26baran-pg1-0_1595809070.jpg

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

श्रीनगर : जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र की मोदी सरकार की सख्‍ती के परिणाम स्‍वरूप आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों ने लगातार बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। सीमापार से होने वाली घुसपैठ में कमी आई है, आतंकवादी नेटवर्क कमजोर हुए हैं, अलगाववादी संगठनों की आर्थिक गतिविधियों पर शिकंजा कसा गया है और कई संगठनों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, लेकिन इसी बीच जम्मू-कश्मीर के सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई दो किताबों को लेकर UAPA के तहत FIR दर्ज गई है।

दरअसल, इन किताबों में मुंबई हमलों के मास्टर माइंड आतंकी हाफिज सईद और अलगाववादी नेता मकबूल भट को महान हस्तियां बताया गया है। पुलिस की काउंटर इंटेलिजेंस विंग ने अब FIR दर्ज करके छापेमारी शुरू कर दी है। दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर सरकार ने सरकारी स्कूलों में वितरित इन पुस्तकों पर तत्काल प्रतिबंध लगाते हुए उन्हें वापस मंगाने के आदेश दिए हैं।

इन पुस्तकों में आतंकवाद और अलगाववाद से जुड़े व्यक्तियों का महिमामंडन करने के साथ ही पाकिस्तान समर्थित शब्दावली का इस्तेमाल किया गया और ऐसे कथन शामिल किए गए जो भारत की संवैधानिक स्थिति के विपरीत हैं। सरकार ने मामले को गंभीर मानते हुए आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया है, एक संविदा कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर दी हैं, लेखक और प्रकाशक को ब्लैकलिस्ट किया है तथा पूरी खरीद और स्वीकृति प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच शुरू कर दी है। लेकिन इस सब के बीच एक बड़ी चिंता सामने आई है, क्या जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी सोच अब शिक्षा और साहित्य के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है?

जेकेपीएफ के प्रयासों से सामने आया मामला

मामला उस समय सामने आया जब जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम (JKPF) ने आरोप लगाया कि वर्ष 2025-26 की समग्र शिक्षा योजना के अंतर्गत सरकारी स्कूलों के पुस्तकालयों में कुछ ऐसी पुस्तकें वितरित की गई हैं, जिनमें अलगाववादी नेताओं और आतंकवाद से जुड़े व्यक्तियों को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन पुस्तकों में सैयद अली शाह गिलानी, मसरत आलम, मीरवाइज उमर फारूक और अन्य अलगाववादी नेताओं के विचारों को प्रमुखता दी गई है। कुछ स्थानों पर आतंकवादियों तथा पत्थरबाजों को भी ऐसे रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे बच्चों के मन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है।

किन किताबों पर लगा प्रतिबंध

सरकारी जांच के दौरान विशेषज्ञ समिति द्वारा चयनित कुल 463 पुस्तकों की समीक्षा की गई। इनमें दो पुस्तकें विवाद के केंद्र में आईं हैं, Personalities and Legends of J&K और Great Personalities of Jammu and Kashmir।
सरकारी आदेश के अनुसार पहली पुस्तक की 123 प्रतियां जम्मू, रामबन और उधमपुर जिलों के सरकारी विद्यालयों तक पहुंची थीं, जबकि दूसरी पुस्तक की 128 प्रतियां जम्मू और बारामुला जिलों में वितरित की गई थीं। अब दोनों पुस्तकों की सभी प्रतियां तत्काल प्रभाव से वापस मंगाई जा रही हैं।

सबसे बड़ा विवाद किस बात पर?

विवाद का सबसे बड़ा कारण पुस्तक में मकबूल भट के बारे में लिखी गई सामग्री बनी। इस संबंध में सामने आई “जम्‍मू-कश्‍मीर अध्‍ययन केंद्र” की रिपोर्ट के अनुसार पुस्तक में उनके अध्याय का शीर्षक “शहीद मकबूल भट” रखा गया है। इतना ही नहीं, आगे उन्हें “शहीद-ए-आज़म”, “आधुनिक कश्मीर का महान क्रांतिकारी” और “कश्मीर का राष्ट्रपिता” जैसे विशेषणों से संबोधित किए जाने का आरोप है।

रिपोर्ट का दावा है कि पुस्तक स्वयं उनके विरुद्ध चली न्यायिक प्रक्रिया और सजा का उल्लेख करती है, लेकिन उसके बावजूद उन्हें सम्मानजनक शब्दों में प्रस्तुत करती है। विपक्ष के नेता सुनिल शर्मा का कहना है कि विद्यालयी स्तर की पुस्तक में किसी दोषसिद्ध व्यक्ति को इस प्रकार प्रस्तुत करना बच्चों के सामने न्यायिक व्यवस्था और इतिहास की भिन्न तस्वीर पेश कर सकता है। पुस्तक में यह भी उल्लेख है कि मकबूल भट की फांसी के बाद कश्मीर में “सशस्त्र क्रांति” का दौर शुरू हुआ और उनका मिशन अभी अधूरा है, जोकि भयंकर आपत्‍त‍िजनक है।

उल्‍लेखनीय है कि मकबूल भट वही व्यक्ति हैं जिसे आतंकवादी घटनाओं एवं कई हत्‍याओं के मामले में दोषी ठहराया गया था। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) का संस्थापक रहा है। उसे एक सीआईडी अधिकारी की हत्या, विमान अपहरण की घटनाओं से जुड़े आरोप तथा बाद में भारतीय राजनयिक रविंद्र म्हात्रे के अपहरण और हत्या के घटनाक्रम से जुड़ी परिस्थितियों के बाद फांसी दी गई थी।

किन-किन चेहरों को मिला प्रमुख स्थान?

विवादित पुस्तकों में जिन व्यक्तियों पर अलग-अलग अध्याय होने का दावा किया गया है, उनमें प्रमुख नाम हैं-

मकबूल भट, सैयद अली शाह गिलानी, मसरत आलम, शब्बीर शाह, मीरवाइज उमर फारूक, जबकि ये सभी किसी न किसी रूप में अलगाववादी राजनीति या हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े रहे हैं। पुस्तक में सैयद अली शाह गिलानी के विचारों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। अलगाववादी नेताओं सैयद अली शाह गिलानी, शब्बीर शाह, मीरवाइज उमर फारूक को प्रभावशाली व्यक्तित्व बताया है।

ऐसे में जम्‍मू कश्‍मीर अध्‍ययन केंद्र का मानना है कि पुस्तक में उनके राजनीतिक दृष्टिकोण का उल्लेख तो है, लेकिन उनके नेतृत्व वाले अलगाववादी आंदोलन, पाकिस्तान समर्थक रुख और भारत की संवैधानिक व्यवस्था के विरोध से जुड़े संदर्भ नहीं दिए गए। स्‍वभाविक है कि इन पुस्‍तकों के माध्‍यम से सिर्फ एक तरफा विचार प्रस्तुत किए गए जोकि अलगाववादियों के पक्ष में हैं।

पुस्तक में मसरत आलम का भी विस्तृत उल्लेख किया गया है। कई कथनों को उद्धृत किया गया है। साथ ही उनके जीवन का परिचय अपेक्षाकृत सहानुभूतिपूर्ण शैली में लिखा गया है। जबकि उनके विरुद्ध अनेक आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं, उन्हें कई बार हिरासत में लिया गया और बाद में उनके संगठन पर भी कार्रवाई हुई। इसी प्रकार शब्बीर शाह और मीरवाइज उमर फारूक पर लिखे अध्याय भी विवादों में हैं। दोनों नेताओं को मुख्यतः अलगाववादी आंदोलन के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि उनसे जुड़े विवाद, जांच और कानूनी कार्रवाइयों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

हुर्रियत का पूरा संदर्भ क्यों महत्वपूर्ण है?

रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (APHC) को समर्पित है। पुस्तक में जिन अधिकांश व्यक्तियों का उल्लेख है, वे किसी न किसी समय इसी मंच से जुड़े रहे हैं। हुर्रियत के घोषित उद्देश्यों में आत्मनिर्णय, कश्मीर को विवादित क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करना और भारत की संवैधानिक स्थिति को चुनौती देना शामिल रहा है।

‘IOK’ और ‘IHK’ शब्दों पर भी विवाद

विवाद केवल व्यक्तियों के महिमामंडन तक सीमित नहीं है। “जम्‍मू-कश्‍मीर अध्‍ययन केंद्र” की रिपोर्ट के अनुसार पुस्तक में कई स्थानों पर जम्मू-कश्मीर के लिए Indian Occupied Kashmir (IOK) और Indian Held Kashmir (IHK) जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। दरअसल, ये वही शब्द हैं जिनका उपयोग पाकिस्तान लंबे समय से अपने आधिकारिक प्रचार में करता रहा है। भारत का आधिकारिक और संवैधानिक दृष्टिकोण यह है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।

भारत को ‘दमनकारी राज्य’ बताने का आरोप

पुस्तक के कुछ हिस्सों में भारत को कश्मीर के संदर्भ में “कब्जा करने वाला” और “दमनकारी राज्य” बताया गया है। पुस्तक में भारत के शासन की तुलना औपनिवेशिक शासन से की गई है और लोकतांत्रिक मूल्यों तथा मानवाधिकारों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर भी प्रश्न उठाए गए हैं।

लल्लेश्वरी के बहाने ब्राह्मणों को किया गया टार्गेट

यहां विवाद अकेले राजनीति सोच तक सीमित नहीं है। पुस्तक में कश्मीर की महान संत और शिवभक्त लल्लेश्वरी (ललद्यद) के संबंध में भी ऐसे दावे किए गए हैं जिनका कई इतिहासकारों ने विरोध किया है। पुस्तक में लिखा गया कि लल्लेश्वरी ब्राह्मणों से असंतुष्ट थीं और बाद में उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया। जबकि ऐसा दावा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है। कश्मीर की साझा सांस्कृतिक विरासत में लल्लेश्वरी को हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदाय समान श्रद्धा से याद करते हैं। मुस्लिम समाज उन्हें “लल आरिफा” कहता है, जबकि हिंदू समाज उन्हें संत कवयित्री और शिवभक्त के रूप में पूजता है।

इतिहास या वैचारिक नैरेटिव?

सबसे गंभीर बहस इस बात पर है कि क्या यह सामग्री इतिहास प्रस्तुत कर रही थी या किसी विशेष वैचारिक दृष्टिकोण को स्थापित करने का प्रयास कर रही थी। यानी कि एक तरह से अकादमिक जिहाद फैला रही है! पूरा विवाद अब इस प्रश्न पर आकर टिक गया है कि आखिर ऐसी सामग्री सरकारी प्रणाली से होकर विद्यालयों तक पहुंची कैसे?

बताया गया है कि इन पुस्तकों को एक विशेषज्ञ समिति ने “आयु-उपयुक्त” मानते हुए अनुशंसित किया था। इसके बाद समग्र शिक्षा योजना के तहत सार्वजनिक धन से इनकी खरीद की गई और फिर सरकारी विद्यालयों के पुस्तकालयों में भेजा गया। यानी यह किसी शिक्षक या विद्यालय का व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद पुस्तकें बच्चों तक पहुंचीं।

किताबें या वैचारिक दस्तावेज?

पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है। क्या ये पुस्तकें केवल इतिहास और जीवनी प्रस्तुत कर रही थीं? या फिर उनमें एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव शामिल था, जिसे विद्यालयी छात्रों तक पहुंचाया जा रहा था? यही प्रश्न अब सरकारी जांच का सबसे बड़ा विषय है। आठ अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया, एक संविदा कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। पुस्तकों के लेखक और प्रकाशक को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।

30 दिन में मांगी गई रिपोर्ट

जांच की जिम्मेदारी अतिरिक्त मुख्य सचिव (वित्त) अश्विनी कुमार को सौंपी गई है। उन्हें निर्देश दिए गए हैं कि वे 30 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें। इस संबंध में स्कूल शिक्षा विभाग के आयुक्त सचिव राम निवास शर्मा का कहना है, “उक्‍त किताबों के चयन, खरीदारी और वितरण के हर स्तर की जांच हो रही है। यह देखा जाएगा कि किस-किस अधिकारी की क्या भूमिका थी और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।”

अलगाववाद का बदलता चेहरा

सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि आधुनिक समय में आज वैचारिक प्रभाव, डिजिटल माध्यम, सोशल मीडिया, सांस्कृतिक विमर्श और शिक्षा भी संघर्ष के महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुके हैं। यदि कोई संगठन प्रत्यक्ष हिंसा में सफल नहीं होता, तो वह समाज की नई पीढ़ी की सोच को प्रभावित करने का प्रयास कर सकता है, इसलिए विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली सामग्री की निष्पक्षता और तथ्यपरकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र की आरे से कहा गया है कि स्कूल पुस्तकालयों में पढ़ने के लिए भेजी गई ‘पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ जेएंडके’ और ‘ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ पुस्तक में आतंकवादियों, अलगाववादियों और देश विरोधी तत्वों को शामिल किए जाने का वह विरोध करता है और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की सरकार से मांग करता है।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने प्रारंभिक प्रतिक्रिया में कहा कि उन्होंने विवादित पुस्तक अभी तक नहीं पढ़ी है और न ही पहले उसके बारे में जानकारी थी। उन्होंने कहा कि पूरी सामग्री देखने और तथ्यों का अध्ययन करने के बाद ही वह कोई अंतिम टिप्पणी करेंगे।

एस.पी. वैद ने जताई गंभीर चिंता

जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी. वैद, जिनका नाम भी कथित रूप से पुस्तक में शामिल था, ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ऐसी पुस्तक में अपना नाम शामिल होना उनके लिए सम्मान नहीं बल्कि चिंता का विषय है। उनके अनुसार यदि विद्यालयों में ऐसी सामग्री पहुंचती है जिसमें अलगाववाद, आतंकवाद और भारत विरोधी सोच को वैचारिक आधार मिलता हो, तो यह आने वाली पीढ़ी के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। वैद का मानना है, “आतंकवाद सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से भी फैलता है। यदि बच्चों को गलत ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ दिए जाएं तो उसका प्रभाव वर्षों तक बना रह सकता है।”

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने इस पूरे मामले को विद्यालयों में राष्ट्रविरोधी सोच फैलाने की कोशिश बताया। उन्होंने मांग की कि केवल अधिकारियों के निलंबन से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि सार्वजनिक धन से खरीदी गई पुस्तकों में ऐसी सामग्री पहुंच सकती है तो यह प्रशासनिक गलती होने के साथ ही संस्थागत विफलता का संकेत भी है।

JKPF रिपोर्ट ने किन सवालों को उठाया?

इस विवाद को सामने लाने वाली जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम (JKPF) ने अपनी रिपोर्ट में कई गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पुस्तक किसने लिखवाई? विशेषज्ञ समिति ने किन मानकों पर इसे स्वीकृति दी? क्या समिति ने पुस्तक की पूरी सामग्री पढ़ी थी? लेखकों और प्रकाशक को कितना भुगतान किया गया? कुल कितनी प्रतियां खरीदी गईं? किन-किन विद्यालयों में इन्हें भेजा गया? सार्वजनिक धन का कुल कितना उपयोग हुआ? रिपोर्ट यह भी मांग करती है कि समग्र शिक्षा योजना के अंतर्गत खरीदी गई अन्य पुस्तकों की भी स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कहीं और ऐसी सामग्री शामिल तो नहीं है।

उल्‍लेखनीय है कि समग्र शिक्षा भारत सरकार की केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसके माध्यम से प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा 12 तक की शिक्षा के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता दी जाती है। जम्मू-कश्मीर जैसे केंद्रशासित प्रदेश में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी विशेष रूप से अधिक रहती है।

फ़िल्म ‘सतलुज’ (पंजाब 95) विवाद

1-2-2.png

चंडीगढ़। मिका गिल, जो खालिस्तानी आतंकी गुरुपतवंत सिंह पन्नू के गांव में तिरंगा फहराने वाले भारतीय सिख युवा हैं, ने पंजाब के गांव-गांव में बड़ी स्क्रीनों पर दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म ‘सतलुज’ (पूर्व नाम पंजाब 95) दिखाए जाने पर सवाल उठाया है। ज़ी5 से फ़िल्म हटने के बाद इसका ग्रामीण स्तर पर प्रचार क्यों हो रहा है? क्या यह कोई साजिश है? कौन जिम्मेदार है-रिलीज का ऑर्डर, हटाने का फैसला या अब गांवों में स्क्रीनिंग?

तथ्य यह हैं कि फ़िल्म जसवंत सिंह खालरा की कहानी पर आधारित है, जिसने 1980-90 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और गुप्त अंतिम संस्कारों का दस्तावेजीकरण किया था। सीबीएफसी ने 2022 में 21 कट्स और टाइटल चेंज की सिफारिश की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील के बाद भी थिएट्रिकल रिलीज नहीं हुई। 03 जुलाई 2026 को ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी5 पर ‘सतलुज’ नाम से बिना कट्स रिलीज हुई, लेकिन 48 घंटे में फिल्म भारत में हटा दी गई। ज़ी5 की स्क्रीन पर फिल्म अब ‘अनुपलब्ध’ दिखा रहा है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला दिया—कुछ हिस्सों का इस्तेमाल ‘एंटी-इंडिया ताकतें’ अपने हक में कर सकती हैं। अब भी यह फिल्म अंतरराष्ट्रीय ज़ी5 ग्लोबल पर उपलब्ध है। वहां से इसे नहीं हटाया गया है।

फ़िल्म में बब्बर खालसा (भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित आतंकी संगठन) के आत्मघाती हमलावर को ‘सूरमा’ और ‘आध्यात्मिक योद्धा’ दिखाया गया है, जबकि पूर्व सीएम बेअंत सिंह की हत्या का संदर्भ है। केपीएस गिल (जिन्होंने उग्रवाद पंजाब से खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी) को खलनायक बनाकर पेश किया गया है। 1990-91 में गिल को हटाने के दौरान बसों से हिंदू-सिखों का कत्लेआम हुआ, जिसे फ़िल्म में नजरअंदाज किया गया। यह एकतरफा नैरेटिव है जो इतिहास को विकृत करता है। पंजाब में 21,000+ मौतें हुईं; गिल की भूमिका को लेकर विवाद हो सकता है (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग्स के आरोप), लेकिन उन्होंने आतंक का सफाया भी किया।

दिलजीत दोसांझ की दोहरी छवि: कैमरे पर “ओम नमः शिवाय” और देशभक्ति, लेकिन ‘पंजाब 95’ जैसी स्क्रिप्ट पर काम। उनकी क्या कोई व्यावसायिक मजबूरी थी यह? संभव। वे मजबूरी में क्या कलाकार की जिम्मेदारी को भूल गए—जो आतंकियों को ग्लोरिफाई करने लगे। इस फिल्म की आलोचना करने पर अधिवक्ता विनीत जिंदल को जान से मारने की धमकियां मिलीं, जो खालिस्तानी तत्वों से आईं। इस पर दोसांझ क्या कहेंगे?

गांव-गांव स्क्रीनिंग का मामला: SAD (शिरोमणि अकाली दल) ने फ़िल्म गांवों में दिखाने का ऐलान किया, इसे ‘कांग्रेस दमन’ के खिलाफ बताया। वायरल वीडियो राजस्थान-पंजाब गांवों के हैं। ज़ी5 से हटने के बाद पायरेटेड कॉपीज या लोकल स्क्रीनिंग फैली। ‘पीपुल्स रिस्पॉन्स’ कहा जा रहा है, लेकिन बड़े स्क्रीन का आयोजन संगठित लगता है। कोई ‘बड़ी साजिश’ साबित नहीं, पर राजनीतिक फायदे (अकाली दल vs कांग्रेस/केंद्र) साफ हैं। रवनीत सिंह बिट्टू ने दिलजीत पर “पैसे के लिए फ्लिप-फ्लॉप” का आरोप लगाया।

जवाबदेही:

  1. ज़ी5 पर रिलीज—OTT नियमों की अनदेखी? CBFC प्रक्रिया पूरी नहीं हुई।
  2. हटाना—केंद्र का फैसला।
  3. गांव स्क्रीनिंग—स्थानीय प्रशासन, पुलिस और राजनीतिक दल जवाब दें। फर्जी/अनसर्टिफाइड शो अवैध।

पंजाब का इतिहास संवेदनशील है। 1984-95 का दर्द सच्चा है, लेकिन आतंकियों को हीरो बनाना गलत। दोनों पक्ष (पीड़ित, सुरक्षा बल) दिखाएं। सच्ची देशभक्ति छद्म नहीं, बल्कि एकता और सत्य पर टिकी होनी चाहिए।  साजिश की बजाय कानून, सत्य और जवाबदेही से समाधान निकालें।

सेवा समर्पण और राष्ट्र निर्माण के 90 वर्षो की गौरवपूर्ण यात्रा

1-1-12.jpeg

नई दिल्ली: राष्ट्र सेविका समिति, दिल्ली प्रांत के प्रबुध वर्ग मेधाविनी सिंधु सृजन द्वारा समिति की संस्थापक एवं आद्य संचालिका वंदनीया लक्ष्मीबाई केलकर (मौसीजी) के अवतरण दिवस पर “संकल्प दिवस” का गरिमामय आयोजन सर शंकर लाल कॉन्सर्ट हॉल, विश्वविद्यालय मार्ग, में संपन्न हुआ।

इस वर्ष का संकल्प दिवस, राष्ट्र सेविका समिति की सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण की 90 वर्षों की गौरवपूर्ण यात्रा को समर्पित था। इस अवसर पर वंदनीया मौसीजी के राष्ट्रजीवन, नारी जागरण और समाजसेवा के आदर्शों का स्मरण करते हुए उपस्थित जनों ने स्वयं को समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन हेतु पुनः संकल्पित किया।
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका माननीया अलका इनामदार जी रहीं।मेधाविनी प्रान्त संयोजिका प्रो. निशा राणा जी ने विषय की प्रस्ताना दी।राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष माननीया विजया रहाटकर जी मुख्य अतिथि तथा नई दिल्ली की सांसद माननीया बांसुरी स्वराज जी कार्यक्रम की अध्यक्षा के रूप में उपस्थित रहीं। विशिष्ट अतिथियों के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रचार टोली के सदस्य माननीय मुकुल कानिटकर जी एवं डूटा के अध्यक्ष प्रो. वी. एस. नेगी जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए राष्ट्र निर्माण में संगठित नारी-शक्ति की भूमिका को रेखांकित किया।प्रो.चारु कालरा जी तथा अंजू आहूजा जी ने मंच साझा किया।
इस अवसर पर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट सेवा सहयोग देने वाली नौ विशिष्ट महिलाओं को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में उपस्थित सेविकाओं, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं नागरिकों ने वंदनीया मौसीजी के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने तथा सेवा, संस्कार और राष्ट्र समर्पण की इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने का सामूहिक संकल्प लिया।
विजय रहाटकर.
जब देश की महिला संकल्प लेती है तब समझ ही नहीं पूरा देश बदल जाता है
दुनिया भारत की ताकत अर्थव्यवस्था से नहीं मातृशक्ति से नपेगी
विकसित भारत 2047 पूरे भारत का संकल्प है
महिला हर जगह चाहे वह साइंस स्पेस टेक्नोलॉजी मेडिसिन सब में भारत की महिलाएं सबसे आगे हैं

मुकुल कानिटकर जी:-

भारतीय नारी सारे विश्व में अग्रणी होकर अपना परचम लहरा रही है

आने वाली शताब्दी मातृशक्ति की शताब्दी हैं

आधुनिक होने के लिए प्राचीनता छोड़नी नहीं पड़ती

जिसकी पूजा करते हैं उसके जैसा बनना ही पूजा है।

बांसुरी स्वराज जी:-

जब व्यक्ति अपने वास्तविकता से परिचित होता है तब उसकी जड़े कोई नहीं हिला सकता

नारीवाद और समानता पाश्चात्य से गोद लेने की जरूरत नहीं है

मातृत्व, कृतत्व और नेतृत्व से महिला इस देश की निर्माता होगी

महिला गुुरु व ईंट की भूमिका निभाती है जिससे राष्ट्र की नींव बनने वाली है

अलका ईमानदार जी

विश्व में आज सबसे बड़ा महिला संगठन आज राष्ट्र सेविका समिति है जिसकी 5000 शाखाएं है

हिंदुत्व हमारी पहचान और हमारे राष्ट्र की भी पहचान है

महिला का प्रथम कर्तव्य है अगली पीढ़ी को संस्कार देना

आधुनिक ओटीटी का पारिवारिक खजाना: गुल्लक, ग्राम चिकित्सालय, प्रीतम और पेड्रो, द टाइटन स्टोरी

1-2-13.jpeg

 

मुम्बई : आजकल ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की भरमार है, लेकिन सच्चा, दिल को छूने वाला और पूरे परिवार के साथ देखा जा सकने वाला कंटेंट ढूंढना मुश्किल हो गया है। ऐसे में ये चार सीरीज एक ताजगी भरी हवा की तरह हैं। ये न तो अत्यधिक ड्रामा, सेक्स-वायलेंस से भरी हैं और न ही बोरिंग लेक्चर। ये साधारण जिंदगी, हंसी-मजाक, संघर्ष और सपनों की कहानियां हैं, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।

गुल्लक: मिश्रा परिवार की मिठास भरी गाथा (SonyLIV – TVF)

गुल्लक मध्यवर्गीय भारतीय परिवार की सच्ची तस्वीर है। मिश्रा परिवार – पिता संतोष मिश्रा, मां शांति, बेटे अनु और छोटे बेटे – का रोजमर्रा का जीवन, छोटी-छोटी झगड़ों, आर्थिक तंगी, सपनों और रिश्तों की गर्मजोशी को इतनी सादगी से दिखाता है कि हर कोई खुद को उसमें देख लेता है।

सीरीज में न कोई बड़े ट्विस्ट, न कोई विलेन – बस रोज की जिंदगी के छोटे-छोटे पल। 90s-2000s के बच्चे तो खासकर नॉस्टैल्जिक हो जाते हैं – गुड़िया वाला गुल्लक, साइकिल, पड़ोस की बातें। हास्य सूक्ष्म है, भावनाएं गहरी। परिवार के सदस्य लड़ते हैं, लेकिन संकट में एक हो जाते हैं।

ये सीरीज सिखाती है कि खुशी महंगी छुट्टियों या बड़े घर में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे पलों में है। पूरे परिवार के साथ देखने लायक – बच्चे हंसेंगे, बड़े रिलेट करेंगे और भावुक भी होंगे। Season 5 तक पहुंच चुकी यह सीरीज अभी भी अपनी मिठास बरकरार रखे हुए है। यह कम्फर्ट फूड की तरह है – देखने के बाद मन हल्का हो जाता है।

ग्राम चिकित्सालय: गांव की सच्ची मेडिकल ड्रामा (Amazon Prime – TVF)

अमोल पाराशर अभिनीत यह सीरीज एक शहर के डॉक्टर की कहानी है जो गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) में तैनात होता है। यहां ग्रामीण जीवन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, भ्रष्टाचार, ब्यूरोक्रेसी और आम लोगों की समस्याओं को हास्य के साथ दिखाया गया है।

सीरीज न तो मेडिकल ड्रामा की तरह सनसनीखेज है और न ही प्रचारात्मक। डॉक्टर प्रभात (या गर्गी) और गांव वाले पात्र इतने जीवंत हैं कि लगता है आप खुद गांव में रह रहे हैं। Season 2 और बेहतर है – ज्यादा ह्यूमर, गहराई और नए किरदार।

ये सीरीज हमें याद दिलाती है कि असली हीरो वे हैं जो बिना शोर के सेवा करते हैं। बच्चों को ग्रामीण भारत की सच्चाई दिखाने और डॉक्टर बनने का सपना दिखाने के लिए परफेक्ट। परिवार के साथ देखें तो चर्चा का विषय बन जाएगी – स्वास्थ्य, समर्पण और हंसी के मिश्रण से भरा। हल्का-फुल्का, दिल छूने वाला और प्रेरणादायक।

प्रीतम और पेड्रो: हास्य और सस्पेंस का अनोखा जोड़ी (JioHotstar)

राजकुमार हिरानी की पहली ओटीटी सीरीज। अर्शद वार्षी (पेड्रो – पुराने जमाने का गोवा पुलिस अधिकारी) और विर हिरानी (प्रीतम – टेक-सीवि हैकर) की जोड़ी साइबर क्राइम की दुनिया में कमाल की केमिस्ट्री दिखाती है। एक तरफ ‘दंडा’ वाला पुराना तरीका, दूसरी तरफ डेटा और टेक्नोलॉजी।

छोटे-छोटे एपिसोड (करीब 30-40 मिनट), हल्का-फुल्का हास्य, सस्पेंस और दिलचस्प केस। कोई अश्लीलता या अत्यधिक वायलेंस नहीं – बस मस्ती, दोस्ती और सही गलत का संदेश। विक्रांत मासी जैसे कलाकार अतिरिक्त मजा बढ़ाते हैं।

पूरे परिवार के लिए परफेक्ट एंटरटेनमेंट। बच्चे टेक और क्राइम की दुनिया देखेंगे, बड़े हिरानी स्टाइल के ह्यूमर का लुत्फ उठाएंगे। ये सिखाती है कि अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले लोग मिलकर कैसे बड़े काम कर सकते हैं। छोटी सीरीज, एक बार में खत्म करने लायक और देखने के बाद अच्छा मूड।

 

द टाइटन स्टोरी (मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी): सपनों की जीत की कहानी (Amazon MX Player)

नसीरुद्दीन शाह, जिम सरभ और अन्य कलाकारों वाली यह बायोपिक सीरीज टाटा ग्रुप की टाइटन वॉचेस बनाने की संघर्षपूर्ण यात्रा दिखाती है। प्री-लिबरलाइजेशन भारत, HMT का राज, स्मगलिंग और विदेशी ब्रांड्स के बीच भारतीय ब्रांड खड़ा करने का सपना।

जिम सरभ (जेरॉक्स देसाई) की मेहनत, टीम वर्क, असफलताएं और आखिरकार सफलता – सब कुछ साफ-सुथरे तरीके से। कोई ग्लैमराइजेशन नहीं, बस सच्ची प्रेरणा।

ये सीरीज युवाओं और बच्चों को उद्यमिता, धैर्य और ‘मेड इन इंडिया’ के गौरव का सबक देती है। परिवार के साथ देखने पर चर्चा होगी – कैसे एक आइडिया पूरा देश बदल सकता है। साफ, प्रेरणादायक और गर्व महसूस कराने वाली।

क्यों देखें ये कंटेंट?

ये चारों सीरीज साबित करती हैं कि अच्छा कंटेंट बड़ा बजट या स्टार पावर से नहीं, बल्कि सच्चाई, हास्य और भावनाओं से बनता है। इनमें:

  • पारिवारिक मूल्य मजबूत हैं – रिश्ते, समर्पण, हंसी।
  • कोई अश्लीलता या अनावश्यक वायलेंस नहीं।
  • रिलेटेबल कहानियां – चाहे मध्यवर्ग, गांव, पुलिस या बिजनेस।
  • प्रेरणा और मनोरंजन का सही मिश्रण।

आजकल जब नेगेटिविटी और सनसनीखेज कंटेंट हर तरफ है, तो इन सीरीज को परिवार, दोस्तों और सोशल मीडिया पर शेयर करें। बच्चों को दिखाएं कि भारतीय कहानियां भी दुनिया जितनी रोचक हैं।

ओटीटी का असली मकसद मनोरंजन के साथ कुछ सीखना और अच्छा महसूस करना है। ये चार सीरीज ठीक यही करती हैं। इन्हें देखिए, परिवार के साथ डिस्कस कीजिए और दूसरों तक पहुंचाइए। अच्छा कंटेंट बांटने से ही बढ़ता है!

scroll to top