आज से असम विधानसभा की अधिकारिक भाषा है हिन्‍दी: 

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मयंक चतुर्वेदी

गुवाहाटी : पूर्वोत्तर से राष्ट्रीय एकता के लिए हिमन्त सरकार का बड़ा संदेश

महात्‍मा गांधी से लेकर महर्ष‍ि अरविन्‍द, वीर सावरकर, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, मदनमोहन मालवीय, सुभाष बाबू से लेकर सभी स्‍वतंत्रता सेनानियों का एक स्‍वर में यही मानना रहा है कि भारत की पहचान उसकी भाषाई विविधता है, किंतु इस विविधता को एक सूत्र में पिरोने का काम यदि किसी ने सबसे अधिक किया है तो वह भाषा ‘हिंदी’ है। यही कारण है कि देश के विभिन्न हिस्सों में हिंदी संवाद का एक सशक्‍त माध्‍यम होने के साथ ही समुचे देश को सांस्कृतिक, सामाजिक और प्रशासनिक समन्वय में पिरोनेवाला एक सशक्त माध्यम है। अब पूर्वोत्तर भारत से भी हिंदी के बढ़ते प्रभाव की ऐतिहासिक तस्वीर सामने आई है।

दरअसल, स्‍वाधीनता के बाद देश में यह पहला अवसर है जब असम राज्‍य ने अपनी विधानसभा में पहली बार विधायी कार्य में हिंदी को आधिकारिक कामकाज की भाषा के रूप में शामिल करने का निर्णय लिया है और राज्‍य की डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने इस तरह से राष्ट्रीय एकात्मता और लोकतांत्रिक समावेशन का सभी को सशक्त संदेश दिया है। इसके साथ ही छह जुलाई से शुरू हुए 16वीं विधानसभा के बजट सत्र में असमिया, अंग्रेजी और बोडो के साथ हिंदी में भी सदन की कार्यवाही संचालित होना आरंभ हो चुकी है।

उल्‍लेखनीय है कि इससे पहले तक असम विधानसभा में अब तक सिर्फ असमिया, अंग्रेजी और बोडो भाषाओं में ही विधायी कार्य संचालित किया जाता था। पहली बार हिंदी को चौथी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किया गया है। यह निर्णय विधानसभा की सामान्य प्रयोजन समिति की बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता विधानसभा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने की।

बैठक में संसदीय कार्य मंत्री पिजूष हजारिका, विपक्ष के नेता वाजेद अली चौधरी, मंत्री केशब महंता, विधायक कमलाख्या डे पुरकायस्थ, चक्रधर गोगोई, सबहराम बसुमतारी तथा जय प्रकाश दास सहित विभिन्न दलों के जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। इसके साथ ही सर्वसम्मति से लिए गए इस निर्णय ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र में भाषा संवाद का माध्यम है, न कि विभाजन का, इसलिए इस निर्णय का राष्ट्रीय महत्व भी देखा जा रहा है।

ज्ञात हो कि पूर्वोत्तर भारत लंबे समय तक भौगोलिक दूरी और भाषाई विविधता के कारण मुख्यधारा से अलग होने की चर्चाओं में रहा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वहां संपर्क, शिक्षा, पर्यटन और व्यापार के विस्तार के साथ हिंदी की स्वीकार्यता भी तेजी से बढ़ी है। ऐसे में विधानसभा जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच पर हिंदी को स्थान मिलना इस बात का संकेत है कि यह कदम पूर्वोत्तर और देश के अन्य हिस्सों के बीच संवाद को और सहज बनाएगा।

सहज स्‍वीकारोक्‍ति के साथ हिंदी का बढ़ता क्षेत्र

इसके साथ ही हिंदी भाषा को लेकर एक महत्‍वपूर्ण तथ्‍य यही है कि यह आज देश के लगभग हर राज्य में संपर्क भाषा के रूप में समझी और बोली जाती है। सरकारी योजनाओं से लेकर सिनेमा, मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, शिक्षा, पर्यटन और व्यापार तक हिंदी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

देश के लाखों युवा शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से हिंदी से जुड़ रहे हैं। स्‍वभाविक है ऐसे में पूर्वोत्तर राज्यों में भी हिंदी सीखने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अत: असम विधानसभा का यह निर्णय बदलते भारत की भाषाई वास्तविकता को स्वीकार करने वाला कदम माना जा रहा है।

भाषाई सम्मान के साथ राष्ट्रीय संवाद

इस निर्णय की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें किसी भाषा को हटाकर दूसरी भाषा को स्थान नहीं दिया गया है। असमिया, अंग्रेजी और बोडो पहले की तरह विधानसभा की कार्यवाही का हिस्सा बनी रहेंगी। हिंदी अतिरिक्त भाषा के रूप में जोड़ी गई है, जिससे विधायी कार्य और अधिक समावेशी बन सके। हिंदी के शामिल होने से अब उन जनप्रतिनिधियों और नागरिकों को सुविधा मिलेगी जो हिंदी में अपनी बात बेहतर ढंग से रख सकते हैं या कार्यवाही को समझना चाहते हैं। इससे सदन की कार्यवाही का दायरा भी विस्तृत होगा और राष्ट्रीय स्तर पर विधायी संवाद को नई गति मिलेगी।

डिजिटल युग में विधानसभा की नई पहचान

भाषाई विस्तार के साथ असम विधानसभा ने अपनी डिजिटल पहचान को भी नया स्वरूप दिया है। अब तक ‘एएलए (असम विधानसभा)’ के नाम से संचालित चैनल को सोमवार से ‘असम विधानसभा टीवी’ के नाम से जाना जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में इस चैनल को लोकसभा टीवी और राज्यसभा टीवी की तर्ज पर विकसित किया जाएगा। यदि इस मंच पर बहुभाषी प्रसारण और हिंदी सामग्री को भी स्थान मिलता है तो विधानसभा की कार्यवाही देश के अधिक व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचेगी और लोकतांत्रिक पारदर्शिता को नई मजबूती मिलेगी।

हिन्‍दी है संपूर्ण भारत को जोड़ने का माध्यम

असम विधानसभा में हिंदी का प्रवेश वास्‍तव में आज के समय में उस भारत की तस्वीर है, जहां अपनी-अपनी मातृभाषाओं का सम्मान करते हुए एक साझा संवाद की भाषा को भी स्वीकार किया जा रहा है। असमिया अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की भाषा है, बोडो अपनी पहचान की, अंग्रेजी प्रशासनिक सुविधा की और हिंदी देश के व्यापक संवाद का माध्यम बन रही है।

पूर्वोत्तर से आई यह पहल बताती है कि नया भारत भाषाई विविधता को संरक्षित रखते हुए राष्ट्रीय एकता को और अधिक मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, नई शिक्षा नीति-2020, जिसमें त्री-भाषा फार्मुला भारत की एक अन्‍य क्षेत्रीय भाषा को सीखने के लिए है, उसका भी सकारात्‍मक असर देशभर में इन दिनों दिखना आरंभ हो गया है। ऐसे में असम विधानसभा का यह निर्णय देखा जाए तो भारतीय लोकतंत्र के उस स्वरूप का प्रतीक है, जिसमें विविध भाषाएं मिलकर राष्ट्र की आवाज को और अधिक सशक्त, व्यापक और समावेशी बनाती हैं।

ना सूरज के सम्मुख अंधेरा टिकेगा, निडर हैं सभी हम अमर हैं सभी हम

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सुरेंद्र चतुर्वेदी
जयपुर: भारतीय जनता पार्टी का चमकता सितारा और दैदीप्यमान नेतृत्व आज विपक्षियों को ही नहीं अपितु विश्व की महाशक्तियों को भी आश्चर्य चकित कर रहा है। *राजनीति की रणनीति अपनी जगह लेकिन उसके सैद्धांतिक पक्ष को चुनौती देने वाला विचार अभी तक सामने नहीं आ पाया है । हाँ इतना जरूर हुआ है कि अब बात हिंदूवादी राजनीति से बढ़कर सनातन संस्कृति की तरफ़ बढ़ रही है और यही वो कारण है कि भारत की आत्मिक ऊर्जा परिलक्षित होती दिख रही है, जिसका अनुभव पूरा विश्व कर रहा है।* इसी आत्मिक और आध्यात्मिक ऊर्जा से भारत के विपक्षी दल घबराए हुए हैं और अब वो भी छद्म धर्मनिरपेक्षता का चोला उतारने के लिए छटपटा रहे हैं।

तो मूल प्रश्न यह है कि *भाजपा के इस वैचारिक अधिष्ठान का रचयिता कौन है ? आज पूरा देश डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रद्धांजलि दे रहा है, कुछ भारतीय राजनीति में उनके योगदान को लेकर, कुछ भारतीय जनसंघ के संस्थापक के रूप में और कुछ राजनीतिक चलन के कारण उन्हें याद कर रहे हैं लेकिन क्या उन्हें सिर्फ़ इसीलिए याद किया जाना पर्याप्त है ?*

श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इसलिए याद किया जाना चाहिए कि वे पहले भारतीय राजनेता थे जिन्होंने नेहरू – लियाकत समझौते के विरोध में देश के उद्योग मंत्री के पद से त्यागपत्र देकर *1950 में यह सोचा कि देश को एक ऐसे राजनीतिक दल की आवश्यकता है, जो नेहरू के खोखले साम्यवाद, छद्म धर्मनिरपेक्षता, अवसरवादी गांधीवादी राजनीति के चुंगल से मुक्त हो और इस देश में धर्म के आधार पर पक्षपात नहीं हो। एक देश में दो संविधान, दो प्रधान और दो निशान ना हों। यानि वो पहले राजनेता थे जिन्होंने भारत की एकात्मता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समझा और एक ऐसे राजनीतिक दल को जन्म दिया, जिसने उनके विचार को राजनीतिक अधिष्ठान बना दिया।* उनके इस विचार को बल मिला पूजनीय श्रीगुरु जी ( माधव राव सदाशिव गोलवलकर) से। जिन्होंने दीनदयाल उपाध्याय के रूप में एक ऐसा सहयोगी दिया कि वो तब के जनसंघ और आज की भाजपा के प्रेरणा स्रोत बन गए।

राजनीति में हक़ और समाधान की बातें खूब उठती हैं। भारतीय राजनीति में ऐसे दो पुरोधा हुए हैं, एक डॉ अंबेडकर और दूसरे डॉ मुखर्जी । दोनों को ही देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उपेक्षित और अपमानित किया, दोनों नेहरू से मतभेदों के चलते कांग्रेस से अलग हुए लेकिन डॉ मुखर्जी ने अपनी ऊर्जा कांग्रेस का राष्ट्रवादी विकल्प तैयार करने में लगा दी। यह वह बड़ी बात है जिसके लिए उनको पूजा जाना चाहिए। उन्होंने समाधान के लिए संघर्ष किया।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी 6 जुलाई 1901 में जन्में और 23 जून 1953 में कश्मीर की जेल में संदिग्ध हालत में मृत पाए गए। जीवन के 52 वर्षों में उन्होंने राष्ट्रीय चेतना का एक ऐसा दीप प्रज्ज्वलित कर दिया, जो सूरज बनकर करोड़ों हिंदुओं और सनातनियों के संताप को नष्ट कर रहा है।

‘जलालाबाद’ से ‘परशुरामपुरी’ बनने की गौरवगाथा में सांस्कृतिक और आर्थिक पुनरुत्थान

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रुद्र प्रताप दुबे

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक बार फिर सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। 6 जुलाई को उत्तर प्रदेश सरकार की कैबिनेट बैठक में शाहजहांपुर जिले की जलालाबाद तहसील का नाम बदलकर ‘परशुरामपुरी’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। मुग़ल कालीन नाम को हटाकर अपनी मूल सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटना, मात्र एक नाम का परिवर्तन नहीं बल्कि भारत के गौरवशाली अतीत और सनातन अस्मिता की पुनर्स्थापना है। जलालाबाद से परशुराम पुरी की यह यात्रा केवल एक कस्बे के नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं है। यह उस सोच का विस्तार है जिसमें स्थानीय इतिहास, लोक-आस्था और सांस्कृतिक स्मृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है। भगवान परशुराम, जो शस्त्र और शास्त्र दोनों के प्रतीक माने जाते हैं, उनकी जन्मस्थली को उचित पहचान मिलना नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम बन सकता है।

जलालाबाद का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह भगवान परशुराम की तपोभूमि और जन्मस्थली रहा है। इसके बाद, महाभारत काल में भी इस क्षेत्र का विशेष महत्व था, माना जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहाँ के वनों में बिताया था लेकिन मुग़ल काल में थोपे गए इस नाम के कारण इस भूमि की वास्तविक पहचान कहीं छिप गई थी। मुग़ल दस्तावेज़ों में भी इस क्षेत्र का ज़िक्र एक महत्वपूर्ण परगने के रूप में करके इसकी महत्वपूर्ण धार्मिक पहचान को मिटाने का काम किया गया।

प्राचीन, सनातन और वास्तविक गौरव ‘परशुरामपुरी’ का यह नाम परिवर्तन वास्तविकता में केवल धार्मिक नहीं, बल्कि इस क्षेत्र के लिए एक बड़ा आर्थिक गेम-चेंजर साबित होने जा रहा है। जैसे ही यह क्षेत्र आधिकारिक तौर पर ‘परशुरामपुरी’ के रूप में स्थापित होगा, देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों का आवागमन बढ़ेगा। पर्यटकों की संख्या बढ़ने से होटल, लॉज, परिवहन, हस्तशिल्प, और पूजा-सामग्री से जुड़े स्थानीय व्यापार को भारी गति मिलेगी। युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। परशुरामपुरी के भव्य विकास के लिए सड़कों का चौड़ीकरण, मंदिर परिसर का सुंदरीकरण और बुनियादी ढांचागत विकास तेज होगा, जिससे इस पूरे क्षेत्र के आर्थिक स्तर में भारी सुधार देखने को मिलेगा। अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे धार्मिक केंद्रों में हाल के वर्षों में हुए कायाकल्प के बाद वहां श्रद्धालुओं की संख्या और स्थानीय आय दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है—परशुरामपुरी से भी वैसी ही अपेक्षा की जा रही है।वर्तमान में केंद्रीय राज्यमंत्री जितिन प्रसाद जब उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग के मंत्री थे तब बीजेपी की डबल इंजन सरकार ने परशुराम मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण, सड़क संपर्क, बिजली-पानी की बेहतर व्यवस्था और श्रद्धालु सुविधा केंद्रों पर निवेश करना प्रारंभ कर दिया था। अब शाहजहांपुर से सटे जिलों के लोगों का मानना है कि यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में एक प्रमुख धार्मिक-पर्यटन गंतव्य के रूप में उभर सकता है। शाहजहांपुर, जो अब तक मुख्यतः कृषि और लघु उद्योगों पर निर्भर रहा है, मात्र इस पहचान के जरिए ही धार्मिक अर्थव्यवस्था के मानचित्र पर भी अपनी जगह बना सकता है।

जलालाबाद को ‘परशुरामपुरी’ बनाने का यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस वृहद् सोच का हिस्सा है, जो भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान को राष्ट्र के विकास का आधार मानती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट मानना है कि भगवान परशुराम केवल एक जाति या वर्ग के आराध्य नहीं, बल्कि पूरे भारत के न्याय, करुणा और पुरुषार्थ के प्रतीक हैं। वहीं, गृहमंत्री अमित शाह ने कई अवसरों पर रेखांकित किया है कि भारत की प्राचीन अस्मिता और महापुरुषों के गौरव को पुनर्स्थापित करना ही ‘अमृत काल’ का मुख्य संकल्प है। वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां ‘विकास भी और विरासत भी’ की सोच को लेकर आगे बढ़ते हैं वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार यह रेखांकित करते रहे हैं कि उनकी सरकार विकास के साथ-साथ प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक पहचान को भी मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। बीते वर्षों में इलाहाबाद से प्रयागराज, मुगलसराय से पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर जैसे कई नामकरणों के जरिए यह नीति लगातार आगे बढ़ी है। इस ऐतिहासिक निर्णय को धरातल पर उतारने का श्रेय केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद के साथ ही शाहजहाँपुर के स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अनथक प्रयासों को जाता है। स्थानीय विधायकों और जनप्रतिनिधियों के एकजुट नेतृत्व और ‘भगीरथ प्रयास’ का ही परिणाम है कि शासन-प्रशासन स्तर की सभी कड़ियों को पार करते हुए इस प्रस्ताव को कैबिनेट की अंतिम मंजूरी मिल सकी। जनप्रतिनिधियों की इस सजगता ने क्षेत्र के लोगों को अपनी जड़ों पर गर्व करने का ऐतिहासिक अवसर देते हुए इस ऐतिहासिक क्षेत्र को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान देने का रास्ता खोल दिया है। अयोध्या में श्री राम मंदिर और काशी में विश्वनाथ कॉरिडोर के दिव्य स्वरूप के बाद, अब परशुरामपुरी का यह कायाकल्प सनातन संस्कृति के ध्वज को और ऊँचा ले जाएगा।

स्थानीय जनता की वर्षों पुरानी मांग को पूरा करके सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक विकास के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोना ही ‘नव्य उत्तर प्रदेश’ का असली मंत्र है। ‘परशुरामपुरी’ अब न केवल आस्था का एक बड़ा केंद्र बनेगी, बल्कि शाहजहांपुर और आसपास के जिलों के लिए आर्थिक समृद्धि का एक नया द्वार भी खोलेगी।

( लेखक सामाजिक विषयों के जानकार हैं)

कुढ़िए नहीं, पहले पढ़िए

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अनुराग पुनेठा 
आदमी जब अपने समय से हार जाता है, तो अक्सर अपने देश से लड़ने लगता है। फिर हर पुल में दरार, हर उपलब्धि में प्रचार, हर सम्मान में साज़िश और हर मुस्कान में अभिनय दिखाई देता है।
इसी राष्ट्रीय कुढ़न, इस आत्मपीड़क मनोवृत्ति और हर अच्छी ख़बर में बुरी ख़बर खोजने की आदत पर है कविता ‘कुढ़ो’

कुढ़ो,
पर अकेले मत कुढ़ो।
टोली बनाकर कुढ़ो।
विचार-गोष्ठी रखकर कुढ़ो।
कॉलम लिखकर कुढ़ो।
स्टूडियो में गर्दन तिरछी कर
राष्ट्र की हर उपलब्धि पर कुढ़ो।

भारत बढ़े—कुढ़ो।
भारत बोले—कुढ़ो।
भारत सुना जाए—और ज़ोर से कुढ़ो।
क्योंकि तुम्हारे हिसाब से
देश तभी लोकतांत्रिक था
जब देश बोलता कम था
और तुम्हें बुलाया ज़्यादा जाता था।

चंद्रमा पर भारत पहुँचे—कुढ़ो।
दक्षिणी ध्रुव पर झंडा लगे—कुढ़ो।
वैज्ञानिक मुस्कुराएँ—कुढ़ो।
दुनिया ताली बजाए—कुढ़ो।
और फिर गंभीर चेहरा बनाकर कहो—
“यह सब ठीक है,
मगर असली सवाल तो कुछ और है।”

अर्थव्यवस्था बढ़े—आँकड़ों पर कुढ़ो।
सड़क बने—धूल पर कुढ़ो।
एयरपोर्ट बने—कॉफी के दाम पर कुढ़ो।
वंदे भारत चले—सीट के रंग पर कुढ़ो।
डिजिटल भुगतान बढ़े—नेटवर्क पर कुढ़ो।
नेटवर्क ठीक चले—निगरानी पर कुढ़ो।
कुढ़ना ही जब धर्म हो जाए,
तो समाधान भी समस्या लगता है।

यूक्रेन में युद्ध हो,
भारत अपने बच्चों को निकाल लाए—कुढ़ो।
ईरान में संकट हो,
भारत अपने नागरिकों की चिंता करे—कुढ़ो।
समुद्र में जहाज़ फँसे,
दूतावास जागे—कुढ़ो।
क्योंकि तुम्हें दुख इस बात का नहीं
कि लोग बच गए,
तुम्हें दुख इस बात का है
कि कहानी में तुम्हारा उद्धरण नहीं आया।

गलवान हो—कुढ़ो।
सीमा पर सैनिक खड़े हों—कुढ़ो।
देश धैर्य रखे—कुढ़ो।
देश जवाब दे—कुढ़ो।
सेना बोले तो राष्ट्रवाद,
तुम बोलो तो विवेक;
वाह महापुरुष,
कितना संतुलित है तुम्हारा असंतुलन।

दुनिया का कोई नेता भारत की प्रशंसा करे—कुढ़ो।
पूर्व से प्रशंसा आए—कुढ़ो।
पश्चिम से आए—कुढ़ो।
उत्तर से आए—कुढ़ो।
दक्षिण से आए—कुढ़ो।
और फिर घोषणा करो—
“यह सब कूटनीतिक भाषा है।”
मानो तुम्हारी कुंठा ही
संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा हो।

भारत पाकिस्तान से बात न करे—कुढ़ो।
बात करे—कुढ़ो।
चुप रहे—कुढ़ो।
कठोर रहे—कुढ़ो।
नरम रहे—कुढ़ो।
तुम्हारी विदेश नीति का सिद्धांत साफ़ है—
दुश्मन नाराज़ न हो,
बस अपना देश कभी आश्वस्त न हो।

ग्लोबल साउथ भारत को सुने—कुढ़ो।
G20 में भारत एजेंडा बनाए—कुढ़ो।
योग दिवस दुनिया मनाए—कुढ़ो।
मिलेट्स को सम्मान मिले—कुढ़ो।
क्योंकि सभ्यता जब फिर खड़ी होती है,
तो सबसे पहले
दरबारी इतिहासकारों की कुर्सी हिलती है।

कुढ़ो कि अब निमंत्रण कम आते हैं।
कुढ़ो कि अब पहली पंक्ति में नाम नहीं लिखा जाता।
कुढ़ो कि अब “हमारे ज़माने में” सुनकर
लोग मोबाइल देखने लगते हैं।
कुढ़ो कि राष्ट्र आगे बढ़ गया
और तुम footnote में भी fit नहीं हो पाए।

पुरस्कार मिले तो “संस्थान स्वतंत्र”।
न मिलें तो “संस्थान ख़तरे में”।
सम्मान मिले तो “मेरी साधना”।
दूसरे को मिले तो “राजनीतिक नियुक्ति”।
वाह!
इतनी पारदर्शी ईर्ष्या
इतिहास में कम ही देखी गई है।

कुढ़ो।
हर पुल पर कुढ़ो।
हर सुरंग पर कुढ़ो।
हर ट्रेन पर कुढ़ो।
हर बंदरगाह पर कुढ़ो।
हर उपग्रह पर कुढ़ो।
हर startup पर कुढ़ो।
हर unicorn पर कुढ़ो।
हर उस बच्चे पर कुढ़ो
जो अंग्रेज़ी में अटकते हुए भी
दुनिया से आँख मिलाकर बोल रहा है।

कुढ़ो कि गाँव में इंटरनेट आ गया।
कुढ़ो कि किसान सीधे पैसा पा रहा है।
कुढ़ो कि गरीब का बैंक खाता खुल गया।
कुढ़ो कि गैस, शौचालय, बिजली, पानी
राजनीति की कविता से निकलकर
रसोई और आँगन तक पहुँच गए।
क्योंकि तुम्हारी क्रांति
कागज़ पर सुंदर थी,
ज़मीन पर असुविधाजनक।

कुढ़ो
कि भारत अब माफ़ी माँगकर नहीं,
आत्मविश्वास से बात करता है।
कुढ़ो
कि पासपोर्ट की लाइन में खड़ा नागरिक
अब राष्ट्र की हैसियत महसूस करता है।
कुढ़ो
कि संकट के समय विमान आता है,
सिर्फ़ बयान नहीं।

महापुरुष!
इतना कुढ़ो
कि तुम्हारी भौंहें राष्ट्रीय धरोहर घोषित हो जाएँ।
इतना कुढ़ो
कि शिकन मंत्रालय बनाना पड़े।
इतना कुढ़ो
कि इतिहास लिखे—
एक वर्ग था,
जो भारत की विफलता पर चिंतित नहीं,
भारत की सफलता से आहत था।

और कुढ़ते रहो।
जब तक कुढ़ना
तुम्हारी विचारधारा न बन जाए।
जब तक शिकायत
तुम्हारा राष्ट्रगान न बन जाए।
जब तक हर उपलब्धि के बाद
तुम्हारे भीतर से वही पुराना स्वर न निकले—

“ठीक है, मगर…”

हाँ,
ठीक है, मगर कुढ़ो।
थोड़ा और कुढ़ो।
शोर से कुढ़ो।
चौराहे पर कुढ़ो।
सेमिनार में कुढ़ो।
विदेशी अख़बार में कुढ़ो।
podcast में कुढ़ो।
और इतना कुढ़ो
कि आने वाली पीढ़ियाँ समझ सकें—

भारत के उठने का अर्थ क्या था,
और कुछ लोगों के भीतर
इतनी देर तक बैठे रहने की पीड़ा क्या थी।

कुढो, कुढो , और कुढो…महापुरूष कुढो…

 

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