युवा प्रतिभाओं को मंच देगा – आकाशवाणी – ‘युववाणी’ कार्यक्रम के लिए आवेदन 1 से 28 फरवरी 2026 तक

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संतोष द्विवेदी मनुज

दिल्ली। आकाशवाणी दिल्ली द्वारा युवाओं को प्रसारण क्षेत्र से जोड़ने के उद्देश्य से प्रतिष्ठित कार्यक्रम “युववाणी” के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। इच्छुक एवं योग्य अभ्यर्थी *1 फरवरी से 28 फरवरी* तक आवेदन प्रपत्र भर सकते हैं। आवेदन फॉर्म प्रसारण भवन, कमरा संख्या 37 से प्राप्त किए जा सकते हैं।

इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवाओं को आकाशवाणी के मंच पर आवश्यकता अनुसार अपनी प्रस्तुति देने तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान करना है, ताकि वे प्रसारण जगत से जुड़कर अपनी प्रतिभा को व्यापक मंच दे सकें।

अर्हता:
अभ्यर्थी 12वीं (इंटरमीडिएट) उत्तीर्ण हो।
आयु 18 वर्ष से कम तथा 30 वर्ष से अधिक न हो।
हिंदी एवं अंग्रेज़ी भाषा का अच्छा ज्ञान हो।
प्रसारण कार्य में अभिरुचि रखता हो।

चयन प्रक्रिया: उम्मीदवारों का चयन ऑडिशन (स्वर परीक्षा) के माध्यम से किया जाएगा। यह स्पष्ट किया जाता है कि यह प्रक्रिया किसी रोजगार हेतु नहीं है। आवश्यकता के अनुसार चयनित अभ्यर्थियों को जब जैसी आवश्यकता हो के आधार पर असाइनमेंट प्रदान किए जाएंगे।

आकाशवाणी के अन्य कार्यक्रमों की तरह यह पहल भी दिल्ली-एनसीआर के युवाओं के लिए अपनी रचनात्मकता अभिव्यक्त करने का एक सशक्त मंच सिद्ध होगी।

इच्छुक एवं योग्य युवा निर्धारित तिथियों के भीतर आवेदन कर इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं।

लोक संस्कृति में शिव-पार्वती!

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करुणा सागर पण्डा

रायपुर (छत्तीसगढ़): द्वार पर अगवान बनकर जमाई के स्वागत में गई रानी मैना जब शिव जी को भयानक वेष में देखती है तो वह क्रोध से परछन की थाली को वहीं द्वार पर ही पटक आती है। और उसी क्रोध में वह अपनी पुत्री को बुलाकर कहती है- “मेरी बात सुन लो पार्वती! उस बावले शिव से तुम्हारा विवाह नहीं होगा…नहीं होगा… नहीं होगा।”
~ “बावला? यह आप क्या कह रहीं हैं माता?”
— “सच ही तो कह रही हूँ। पूरा का पूरा बौराया हुआ है वह… वस्त्र तक पहनने का शऊर नहीं है उसे। वह कर्पूर की तरह गोरा है फ़िर भी उज्ज्वल दिखने के लिए उसने अपने पूरे तन पर राख मला हुआ है। उसके गले में सुगंधित फूलों की नहीं, मसान के नरमुंडों की माला है… उसने अपना कंगन-कुंडल सांपों का बना रखा है। और, वह तो जो है सो है…. उसके साथ में भी जो हैं न… उन सबका का रूप भी बहुत भयंकर है पुत्री! तुम तो उन्हें देखते ही डर जाओगी। इसलिए अपने पिता के समीप जा जाकर उनसे कह दो कि तुमको शिव से विवाह नहीं करना है। जाओ पार्वती! जाकर कह दो…”
~ “ऐसे कैसे विवाह को ‘ना’ कह दूं माता? आप तो विधाता की योजना को ही अस्वीकार करने को कह रही हैं।”
— “अरे! उसी विधाता से ही तो चूक हो गई है पुत्री! उसे जिस फल को कल्पवृक्ष में लगाना चाहिए था… वह उसे बबूल के पेड़ में लगाने जा रहा है। तुम्हारा ना कहना ही सर्वथा उचित है।”
~ “नहीं माता! कलंक के टीके को व्यर्थ में ही अपने कपार पर लगा लेना कैसे उचित हो सकता है? नियति ने जो रच दिया गया है, वह तो होकर ही रहेगा।”
— “होकर ही रहेगा तो तुम भी मेरी बात सुन लो! मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पड़ूंगी… आग में जल जाऊंगी… समुद्र में कूद जाऊंगी लेकिन इस बावले वर से तुम्हारा विवाह नहीं होने दूंगी।”
~ “माता! आप तनिक शांत होइए और शांति से नारद जी की कही बातों को स्मरण कीजिए। उन्हीं के कहने से ही तो घोर तपस्या करके मैंने इस मंगल दिन को पाया है।”
— “तुम तो नाम मत लो उसका… बाँझ स्त्री भला प्रसव की पीड़ा को क्या जाने? इतना तो सोचो पार्वती! कि जो स्वयं अविवाहित है… वह तुम्हारे घर बसाने का उपदेश क्या ही देगा, जो तुमने उसकी बातों को विश्वास कर लिया।”

…और इस तरह माता-पुत्री में तर्क-वितर्क तब तक निर्बाध चलता रहा जब तक पर्वतराज हिमाचल सप्तऋषियों और नारद जी के साथ मिलकर रानी मैना को यह आश्वस्त नहीं करा लिए कि यह विवाह सिर्फ़ दो आत्माओं का ही मिलन नहीं अपितु शिव के साथ शक्ति का मिलन है। पार्वती ही साक्षात जगदम्बा है जो पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की पुत्री सती थी… और उसे अपने हर जन्म में शिव को ही वरण करना है।

वैसे माता-पुत्री के पूरे संवाद में रानी मैना के जितने भी तर्क थे वे एक माँ के हृदय के तर्क थे। भला ऐसी कौन माँ होगी जो अपनी बेटी की गृहस्थी में सुख और शांति देखना नहीं चाहेगी? आज भी इस लोक में एक माँ उसे ही तो अपना जामाता चुनती है जिसका अपना घर हो, जिसके पास आजीविका के साधन हों, देखने-ताकने में भी जो भला मानुष दिखे…. लेकिन! देवी पार्वती के तर्क विश्वास के उस बीज से उपजे हुए तर्क थे जो प्रेम की धरातल पर बोये गए थे। सती के रूप में हवनकुंड में उनका आत्मदाह केवल संबंधों के प्रति समर्पण का उदाहरण भर नहीं था… वह एक विश्वास भी था कि उसके परमेश्वर उसकी प्रतीक्षा करेंगे, अगले जन्म में वह उसी गरिमा के साथ शिव की ही अर्धांगिनी बनेंगी।

यदि हम शास्त्रों से इतर लोकमानस को देखें तो उसके अनुसार भी गौरी-शंकर की जोड़ी ही संसार की सबसे सुंदरतम जोड़ी है। जानते हैं क्यों? क्योंकि शिव वह सब करते हैं जो एक सामान्य स्त्री अपने पुरुष से अपेक्षा रखती है। और वह अपेक्षा होती क्या है…. यही कि वह अंतिम निश्वास तक अपने पुरुष की अनन्या बनकर रहे, यही कि उसके पुरुष के प्रेम में कोई आडंबर न हो, यही कि उसका पुरुष दुनियादारी का गणितज्ञ न हो..… है न? तो बंधु! लोक संस्कृति में व्याप्त भोले बाबा की उन तमाम कथाओं को बाँच लीजिए, आपको बाबा वही करते मिलेंगे जो माता पार्वती उनसे अपेक्षा रखतीं हैं। और माता पार्वती? क्या उन्होंने भी कभी शिव जी के औघड़दानी होने का या उनके फक्कड़पना का प्रतिरोध किया? कभी नहीं किया। माता भी बाबा के रंग में ही रंगी रहतीं हैं। यही तो है दाम्पत्य का कुशल निर्वहन…. यदि संसार की सभी जोड़ियां भी गौरी-गौरा की जैसी हो जाएं तो उन सबका घर भी कैलाश जैसा ही पवित्र बन जाएगा।

।। महाशिवरात्रि मंगलकारी हो।।
।। ॐ नमः पार्वती पतये, हर-हर महादेव ।।

प्रथम अफ्रीका क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन में भागीदारी

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डॉ. जवाहर कर्णावट

मिस्र(Egypt) की राजधानी काहिरा में भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा प्रथम अफ्रीकी क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन 8- 9 फरवरी 2026 को संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में मुझे विशिष्ट वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था ।मिस्र के अलावा दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, जांबिया, केन्या, तंजानिया ,मॉरीशस आदि देशों के हिंदी लेखकों एवं शिक्षकों की भागीदारी रही। सम्मेलन के शुभारंभ अवसर पर विदेश सचिव (दक्षिण) श्रीमती नीना मल्होत्रा ,मिश्र में भारत के राजदूत श्री सुरेश के रेड्डी , ऐन शेम्स विश्वविद्यालय ,मिस्र के अध्यक्ष तथा नेपाल के राजदूत श्री सुशील कुमार लम्साल की विशिष्ट उपस्थिति रही

।इस सम्मेलन का संयोजन मौलाना अबुल कलाम आजाद, सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक श्री प्रकाश चौधरी ने किया। इस अवसर पर आईसेक्ट प्रकाशन द्वारा श्री संतोष चौबे जी के मार्गदर्शन में मेरे द्वारा संपादित पुस्तक ‘विश्व में हिंदी’ (70 देशों में हिंदी) विदेश सचिव (दक्षिण)श्रीमती नीना मल्होत्रा तथा भारतीय राजदूत श्री रेड्डी को भेंट की। सम्मेलन में मिस्र के विश्वविद्यालय तथा संस्थाओं में अध्यनरत सौ से अधिक विद्यार्थियों , शिक्षकों तथा लेखकों की भी भागीदारी रही।

लेखक का जीते-जी सम्मान करो तो उसे संतोष मिले – डॉ. सच्चिदानंद जोशी

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नई दिल्ली : वरिष्ठ लेखक, रंगकर्मी और इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी की पुस्तक ‘गूँजे देश राग’ का लोकार्पण एवं पुस्तक-परिचर्चा कार्यक्रम साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली में हुआ। पुस्तक का प्रकाशन यश पब्लिकेशंस ने किया है। यह पुस्तक डॉ. सच्चिदानंद जोशी की विदेश यात्राओं से जुड़े अनुभवों पर केन्द्रित है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल और विशेष अतिथि थीं प्रख्यात ट्रैवल ब्लॉगर डॉ. कायनात क़ाज़ी। इस अवसर पर, यश पब्लिकेशन के निदेशक जतिन भारद्वाज भी उपस्थित रहे।

अपने वक्तव्य में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने पुस्तक की रचना-प्रक्रिया, प्रेरणा-स्रोतों और इसके शीर्षक के निहितार्थ पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, यह यात्रा वर्णन उस तरह से नहीं लिखा गया है, जैसे आमतौर पर यात्रा वर्णन लिखे जाते हैं। यह पुस्तक यात्राओं के दौरान मिले मानवीय अनुभवों, आत्मीय व्यवहार और गहरी संवेदनाओं को सहेजने के उद्देश्य से लिखी गई है। जब आप विदेश में जाते हैं, तो कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं, जो दिल को छू जाती हैं। तब आप उसे लोगों को बताना चाहते हैं। इस पुस्तक के ज़रिये मैंने यही प्रयास किया है।

उन्होंने उल्लेख किया कि समय की तेज़ रफ्तार में साहित्य का कार्य आत्मीय क्षणों को थामना और उन्हें संवाद में बदलना है, चाहे वह कविता हो, कहानी हो या संस्मरण। उन्होंने कहा, यह लेखन कालजयी होने की महत्वाकांक्षा से प्रेरित नहीं है, बल्कि उस सहज अपेक्षा से उपजा है कि रचना अपने समय के पाठक से संवाद कर सके और उसे मानवीय मूल्यों पर सोचने के लिए प्रेरित कर सके। उन्होंने हिन्दी लेखक की दशा पर बात करते हुए कहा कि लेखक का जीते-जी सम्मान करो, तो उसे संतोष मिले। इस पुस्तक में शामिल यात्रा संस्मरण ‘हम तो ऐसे हैं भैया’ का पाठ कर उन्होंने अपने वक्तव्य का समापन किया।

मुख्य अतिथि व्योमेश अपने संबोधन में कहा, ‘गूँजे देश राग’ एक सांस में पढ़ी जाने लायक पुस्तक है। हिन्दी की मुख्यधारा का जो लेखन है, उसने अपने ऊपर बहुत ज़्यादा ले दायित्व ले लिया है। वह बहुत महत्त्वाकांक्षी है, इसलिए अपने ऊपर अत्यधिक दबाव ले लिया है। वह हर ‘बार’ को उछलकर पार कर जाना चाहता है। लेकिन इस किताब में लेखक ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया है। हिन्दी का ‘राज रोग’ है अमर हो जाने की चाह, लेकिन वह इस पुस्तक में नहीं है। उन्होंने कहा, ऐसा लिखना चाहिए कि मरहम लगे। डॉ. सच्चिदानंद जोशी ये नहीं लिखते कि मैं मरहम लगा रहा हूं, लेकिन वे अपने लेखन से खुद को भी स्वस्थ करते हैं और पाठकों को भी स्वस्थ करते हैं। ये पुस्तक आपको यह अनुभव करने के लिए प्रेरित करती है कि आप भी कवि हैं, आप भी लेखक हैं। यह भारत का गद्य है।

डॉ. कायनात क़ाज़ी ने कहा, पुस्तक को पढ़ते समय ऐसा लगता है कि लेखक के साथ हम भी उस स्थान की यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पुस्तक का यात्रा संस्मरण ‘प्रवासी घाट’ बहुत सरल और सहज तरीके से गिरमिटिया लोगों की पीड़ा को पाठकों के समक्ष साकार कर देता है। डॉ. जोशी के लेखन के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, साहित्य जगत के नवागंतुक डॉ. सच्चिदानंद जोशी के लेखन से प्रेरणा और ऊर्जा लेते हैं।

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार कात्यायनी चतुर्वेदी ने किया। उन्होंने लेखक की साहित्यिक यात्रा, रंगकर्म और सांस्कृतिक दृष्टि का सारगर्भित परिचय देते हुए चर्चा का सुंदर संचालन किया। अंत में, अर्पित शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में साहित्य, कला, रंगमंच और मीडिया जगत से जुड़े अनेक गणमान्य अतिथियों तथा पुस्तक-प्रेमियों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम का समापन सौहार्दपूर्ण संवाद और पुस्तक-हस्ताक्षर सत्र के साथ हुआ।

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