मानसून जो रास्ते से भटक गया, आसमान जो बरसना भूल गया

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दिल्ली । जून गुजर गया। कैलेंडर ने नया महीना दिखा दिया, लेकिन खेत अब भी सूखे पड़े हैं।
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का किसान रामदीन रोज़ सुबह आसमान की तरफ देखता है। उसे बादलों का इंतज़ार है, मगर नज़र आती है सिर्फ़ धूल। खेतों की मिट्टी जगह-जगह फट गई है। धरती की दरारें जैसे किसी गहरे ज़ख्म की कहानी सुना रही हों।

इस साल जून ने किसानों की उम्मीदों पर पानी नहीं, मायूसी बरसाई। देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से 30 से 40 प्रतिशत कम हुई। कहीं-कहीं तो आधी से भी कम बारिश दर्ज की गई।
दक्षिण-पश्चिम मानसून, जो हर साल जून की शुरुआत में केरल से दस्तक देकर पूरे देश को राहत देता है, इस बार जैसे रास्ता ही भटक गया। कई इलाकों तक वह समय पर पहुंच ही नहीं पाया।

रामदीन अकेला नहीं है। देश के करोड़ों किसान इसी बेचैनी से आसमान निहार रहे हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में खेत सूने पड़े हैं। जहां इस समय तक धान, सोयाबीन, दालें और मोटे अनाज की हरियाली लहलहाती थी, वहां अब धूल उड़ रही है। खरीफ की बुवाई काफी पीछे चल रही है। कई जगह ट्रैक्टर खड़े हैं, बीज और खाद की दुकानों पर सन्नाटा पसरा है।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में पानी का संकट पहले ही पुराना है। हर कमजोर मानसून यहां की मुश्किलें कई गुना बढ़ा देता है। किसान साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेकर बीज खरीदते हैं। अगर बारिश न हो तो फसल चौपट हो जाती है। फिर पूरा साल कर्ज़ चुकाने की जद्दोजहद में निकल जाता है। गरीब किसान की ज़िंदगी जैसे उम्मीद और मायूसी के बीच झूलती रहती है।

देश के बड़े जलाशयों की तस्वीर भी तसल्ली देने वाली नहीं है। पानी का भंडार लगातार घट रहा है। इसका असर सिर्फ खेती पर नहीं पड़ेगा, बल्कि पीने के पानी, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भी दिखाई देगा। कई जिलों में सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं।

अब यह संकट गांवों तक सीमित नहीं रहा। शहर भी प्यासे होने लगे हैं।
मुंबई के जलाशयों में पानी तेजी से घट रहा है। बेंगलुरु में पानी के टैंकरों की मांग अचानक बढ़ गई है। दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे और दूसरे बड़े शहरों में भी भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई जगह पानी की कटौती शुरू हो चुकी है। स्विमिंग पूलों और निर्माण कार्यों में पानी के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाई जानी चाहिए।
सबसे बड़ी चिंता भूजल की है। हर साल हम ज़मीन के नीचे से लाखों लीटर पानी निकाल लेते हैं, लेकिन उसे वापस पहुंचाने का इंतज़ाम नहीं करते। नतीजा सामने है। टैंकर माफिया फिर सक्रिय हो गया है। लोग घंटों पानी का इंतज़ार कर रहे हैं। अगर जुलाई में भी अच्छी बारिश नहीं हुई, तो कई शहरों में पानी का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

कमज़ोर मानसून का असर सिर्फ खेतों तक नहीं रहेगा। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर भी पड़ेगा। अगर फसल कम हुई तो दाल, खाद्य तेल, सब्जियां और अनाज महंगे हो जाएंगे। महंगाई का बोझ हर घर तक पहुंचेगा। गांवों की आमदनी घटेगी तो बाज़ार की रौनक भी फीकी पड़ जाएगी। उद्योगों से लेकर छोटे कारोबार तक इसकी मार झेलेंगे।

मौसम वैज्ञानिक इसके पीछे एल नीनो और बदलती जलवायु को बड़ी वजह मान रहे हैं। उनका कहना है कि मौसम अब पहले जैसा भरोसेमंद नहीं रहा। कभी बादल अचानक फट पड़ते हैं, तो कभी हफ्तों तक आसमान साफ रहता है। जलवायु परिवर्तन ने मौसम का मिज़ाज ही बदल दिया है।

सरकार राहत पैकेज, फसल बीमा, सूखा-रोधी बीज और खाद पर सब्सिडी जैसी योजनाओं पर काम कर रही है। मगर किसान का दर्द सरकारी फाइलों से नहीं, खेतों में बरसने वाली बारिश से कम होगा। जब तक बादल मेहरबान नहीं होंगे, सारी योजनाएं अधूरी लगेंगी।

शाम ढल रही है। सूरज लाल होकर क्षितिज के पीछे छिपने लगा है। रामदीन अपने औजार समेटते हुए धीमी आवाज़ में कहता है, “मुश्किल साल पहले भी आए हैं, लेकिन तब दिल में उम्मीद थी। इस बार लगता है जैसे आसमान ही हमसे रूठ गया है।”

रामदीन सिर्फ एक किसान नहीं है। वह इस मुल्क के लाखों किसानों की आवाज़ है। उसकी आंखों में झलकती फ़िक्र, हर उस परिवार की फ़िक्र है जिसकी रोज़ी-रोटी खेतों से जुड़ी है।

अब सबकी निगाहें जुलाई पर टिकी हैं। अगर बादल जल्द नहीं बरसे, तो सिर्फ खेत ही नहीं सूखेंगे, शहरों की प्यास भी बढ़ेगी, महंगाई भी चढ़ेगी और देश की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा।
आसमान अभी भी ख़ामोश है। सवाल सिर्फ इतना है; क्या जुलाई यह ख़ामोशी तोड़ेगी, या फिर यह सूखा आने वाले दिनों की सबसे बड़ी कहानी बन जाएगा?

चाट, गोल गप्पे बने भारत की सबसे लोकतांत्रिक डिश

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आगरा से लेकर कोलकाता, चेन्नई से लेकर मुंबई, अहमदाबाद, भारत का सबसे लोकप्रिय स्ट्रीट फूड बन चुका है गोल गप्पा, पानी पूरी, पानी की टिकिया!

क्या आपने कभी सोचा है कि पहला गोलगप्पा किसने खाया होगा? किसी बादशाह ने, किसी रानी ने, या किसी भूखे राहगीर ने?

दिल्ली की चाँदनी चौक से लेकर आगरा, मथुरा, लखनऊ, बनारस और कोलकाता तक, चाट सिर्फ़ एक नाश्ता नहीं, बल्कि हमारी तहज़ीब का ज़िंदा हिस्सा है। यह अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े, सबकी पसंद है। सड़क किनारे ठेले पर मिलने वाली यह मामूली-सी दिखने वाली चीज़ सदियों का इतिहास अपने भीतर समेटे हुए है।
आगरा के हॉस्पिटल रोड पर शाम ढलते ही वही पुरानी खुशबू हवा में घुल जाती है। गरम तेल की महक, हरे धनिये की ताज़गी और इमली की खटास। ठेले पर खड़े बुलाकी चाट वाले अपनी उँगली से फुर्ती से गोलगप्पे में छेद करते हैं, मसालेदार पानी भरते हैं और ग्राहक के हाथ में पकड़ा देते हैं।
“अभी खाइए,” वे मुस्कराकर कहते हैं। “गोलगप्पा किसी का इंतज़ार नहीं करता।”
शायद यही बात चाट पर भी लागू होती है। इसे हमेशा ताज़ा ही खाना पड़ता है, और इसकी कहानी भी हर पीढ़ी के साथ नई हो जाती है।
सबसे मशहूर किस्सा यह है कि मुगल बादशाह चाँदनी चौक की नहर में नाव की सैर करते हुए चाट खाते थे। कहा जाता है कि रात में चाँद की रोशनी पानी पर पड़ती थी, संगीत बजता था और शाही मेहमान चटपटी चाट का लुत्फ़ उठाते थे।
सुनने में यह कहानी बेहद ख़ूबसूरत लगती है। लेकिन इतिहास इसकी पूरी तस्दीक़ नहीं करता।
इतिहासकार मानते हैं कि चाँदनी चौक की नहर सचमुच थी। इसे शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा बेगम ने बनवाया था। उसी नहर की वजह से इस बाज़ार का नाम चाँदनी चौक पड़ा। लेकिन कहीं भी ऐसा कोई भरोसेमंद दस्तावेज़ नहीं मिलता जिसमें लिखा हो कि बादशाह नाव में बैठकर चाट खाते थे।
यह शायद उन कहानियों में से एक है जो हर बार सुनाए जाने पर थोड़ी और रंगीन होती चली गईं।
एक और कहानी कुछ ज़्यादा भरोसेमंद लगती है। कहा जाता है कि शाहजहाँ के हकीमों ने दिल्ली के खारे पानी से होने वाली बदहज़मी दूर करने के लिए दही, इमली और मसालों वाली चाट खाने की सलाह दी थी। इसका भी कोई पक्का सबूत नहीं है, लेकिन यह बात पूरी तरह नामुमकिन भी नहीं लगती।
असलियत यह है कि चाट मुगलों से भी कहीं ज़्यादा पुरानी है।
गोलगप्पे की कहानी तो दो हज़ार साल पहले के मगध साम्राज्य तक पहुँच जाती है। एक और मशहूर दास्तान महाभारत से जुड़ी है। कहा जाता है कि द्रौपदी ने बचे हुए आटे और सब्ज़ियों से पांडवों के लिए पहला गोलगप्पा बनाया था।
इन दोनों बातों का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यह व्यंजन सदियों से आम लोगों का साथी रहा है।
हाँ, उस समय आलू नहीं था। आलू तो सोलहवीं सदी में पुर्तगाली भारत लाए थे। इसलिए शुरुआती गोलगप्पों में दाल, अनाज या मसालेदार साग भरा जाता होगा।
फूडी दर्शन भाई बताते हैं, “मुगलों ने चाट बनाई नहीं, लेकिन उसे नया मुक़ाम ज़रूर दिया। उनके दौर में दिल्ली, आगरा और मथुरा के बाज़ार तेज़ी से आबाद हुए। हिन्दू और जैन समाज की शाकाहारी परंपराओं ने आलू, दही, दाल और मसालों से बनने वाले सस्ते और स्वादिष्ट नाश्तों को खूब बढ़ावा दिया। यही बाज़ार आगे चलकर चाट की असली पहचान बने।”
दिल्ली की पापड़ी चाट, आगरा की करारी आलू टिक्की और मथुरा की भक्तिभाव से जुड़ी चाट आज भी उसी विरासत की याद दिलाती हैं। दिल्ली में शाह जहां रोड पर दही भल्ले की चाट खाने नेताओं की भीड़ लगी रहती थी, लोग बताते हैं मेनका गांधी भी इनकी चाट की शौकीन थीं।
फिर रेल आई। लोग एक शहर से दूसरे शहर पहुँचे। बँटवारे के बाद लाखों शरणार्थी दिल्ली आए और अपने साथ चाट के नए स्वाद भी ले आए। मुंबई ने भेलपूरी बनाई, कोलकाता ने पुछका को और तीखा कर दिया, जबकि हर शहर ने अपनी ज़ुबान में चाट का नया अध्याय लिख दिया।
आज चाट करोड़ों रुपये का कारोबार है। शादियों की दावतों में सबसे ज्यादा भीड़ चाट स्टॉल पर रहती है। बड़े बड़े इमरतबानों में तरह तरह के मसालेदार पानी रहते हैं। पाँच सितारा होटलों के मेन्यू में भी है और सोशल मीडिया की तस्वीरों में भी।
बादशाहों के किस्से सच हों या अफ़साने, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। सच यह है कि चाट ने हर सल्तनत को पीछे छोड़ दिया। आज भी भारत की गलियों में वही सबसे बड़ा बादशाह है, जिसके सामने हर कोई बराबर खड़ा होता है; जेब चाहे भरी हो या खाली।

म्यांमार में मानवीय त्रासदी गहराई, लाखों नागरिक अपने ही देश में बने शरणार्थी

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी । जब पूरी दुनिया 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस मना रही थी, उसी समय म्यांमार (बर्मा अथवा ब्रह्मदेश) से एक ऐसी त्रासद तस्वीर सामने आई, जिसने वहाँ के गहराते मानवीय संकट को फिर उजागर कर दिया। राजधानी नेपीता में सेना के नियंत्रण वाली सरकार पर अपने ही नागरिकों को विस्थापित और शरणार्थी बनने के लिए मजबूर करने के आरोप लग रहे हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अनुसार, 53 लाख से अधिक म्यांमारवासी इस समय अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन-यापन कर रहे हैं।

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) ने बताया कि 10 लाख से अधिक लोग बांग्लादेश, थाईलैंड और भारत (खासकर पूर्वोत्तर के मणिपुर और मिज़ोरम राज्य) जैसे पड़ोसी देशों में शरण ले चुके हैं। वहीं, लगभग 37 लाख लोग अपने ही देश में विस्थापित होकर सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने को विवश हैं, जहाँ उन्हें भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं और सुरक्षित आवास जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं। लगभग 5.5 करोड़ की आबादी वाले म्यांमार में करीब 80 प्रतिशत लोग लंबे समय से गरीबी से जूझ रहे हैं। ऐसे में, नाममात्र की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बावजूद अपने ही नागरिकों के विरुद्ध चलाए जा रहे सैन्य अभियान ने स्थिति को और भयावह बना दिया है।

1 फरवरी 2021 को हुए सैन्य तख्तापलट के बाद से हालात लगातार बिगड़ते गए। उस समय आंग सान सू ची के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार को तत्कालीन सेना प्रमुख मिन आंग ह्लाइंग ने अपदस्थ कर दिया था। विवादित राष्ट्रीय चुनावों के बाद ह्लाइंग अब राष्ट्रपति के रूप में सत्ता में हैं।

सैन्य बलों द्वारा लगातार किए जा रहे हवाई हमलों, गाँवों को जलाने और आम नागरिकों को निशाना बनाने की घटनाओं के कारण सैकड़ों गाँव खाली हो चुके हैं और हजारों परिवारों को पलायन करना पड़ा है। हालाँकि, ह्लाइंग अब शांति की बातें कर रहे हैं और म्यांमार के नागरिक प्रमुख के रूप में भारत तथा चीन की उनकी हालिया आधिकारिक यात्राओं से उन्हें कुछ हद तक अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी मिली है। रणनीतिक और आर्थिक हितों के कारण ‘गोल्डन पैगोडा की भूमि’ कहे जाने वाले म्यांमार में दोनों पड़ोसी देशों ने उनका औपचारिक स्वागत किया, लेकिन सैन्य शासन के अधीन जमीनी हालात अब भी गंभीर बने हुए हैं।

वर्तमान में म्यांमार सरकार का देश के केवल 30 प्रतिशत भूभाग पर ही नियंत्रण है, जबकि जातीय विद्रोही संगठन और पीपुल्स डिफेंस फोर्सेस (PDF) लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्रों में अपना प्रशासन चला रहे हैं। शेष इलाकों में लगातार सशस्त्र संघर्ष जारी है। दो वर्ष से अधिक समय पहले सैन्य शासन के विरोधी समूहों ने संयुक्त अभियान शुरू किया था, जिसके बाद देश गहरे राजनीतिक, आर्थिक और मानवीय संकट में फँस गया। अराकान आर्मी (AA) नामक शक्तिशाली विद्रोही संगठन वर्तमान में रखाइन राज्य के लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर चुका है और वहाँ अपना प्रशासन चला रहा है। एए के लड़ाके राज्य की राजधानी सितवे पर कब्ज़ा करने के उद्देश्य से जुंटा बलों के विरुद्ध अभियान जारी रखे हुए हैं।

संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुमान के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में इस संघर्ष में 75 हजार से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। रखाइन और मध्य म्यांमार आज भी सेना की कार्रवाई से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र बने हुए हैं। UN के मानवाधिकार उच्चायुक्त ने हाल ही में कहा कि इन दोनों क्षेत्रों में आम नागरिकों के विरुद्ध हिंसा और क्रूरता में और वृद्धि हुई है। लोकतंत्र समर्थक सशस्त्र समूहों से युद्ध के मैदान में लगातार चुनौतियाँ मिलने के बाद जुंटा सेना अक्सर नागरिक क्षेत्रों पर लड़ाकू विमानों, ड्रोन और पैरा-मोटर के माध्यम से विस्फोटक गिराती है तथा स्कूलों, अस्पतालों और शरणार्थी शिविरों तक को निशाना बनाती है।

गृहयुद्ध और आर्थिक संकट का सबसे अधिक असर बच्चों और युवाओं पर पड़ा है। अनुमान है कि 2026-27 के शैक्षणिक सत्र में 60 लाख से अधिक बच्चे और युवा विद्यालय नहीं जा सकेंगे। इस प्रकार देश के लगभग 1.3 करोड़ स्कूली बच्चों में से लगभग आधे औपचारिक शिक्षा से वंचित हो चुके हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था भी गंभीर संकट से गुजर रही है। क्लीनिकों पर बार-बार हुए हवाई हमलों में अनेक चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी मारे गए हैं, जबकि प्रशासन ने कई महत्वपूर्ण निजी अस्पतालों को भी बंद कर दिया है।

मीडिया जगत भी स्वतंत्रता के बाद के सबसे कठिन दौर का सामना कर रहा है। हजारों राजनीतिक बंदियों के साथ-साथ पिछले पाँच वर्षों में 215 मीडियाकर्मियों को निशाना बनाया गया है। जिनेवा स्थित वैश्विक मीडिया सुरक्षा एवं अधिकार संस्था प्रेस एम्बलम कैंपेन (PEC) के अनुसार लगभग 15 पत्रकार अब भी हिरासत में हैं। संस्था ने यह भी खुलासा किया है कि 97 मीडिया संस्थानों को कानूनी उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सैन्य तख्तापलट के बाद आंग सान सू ची की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) के निर्वाचित सांसदों द्वारा गठित नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (NUG) ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से पारदर्शिता, जवाबदेही और स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करने की अपील की है।

समानांतर नागरिक प्रशासन के रूप में कार्यरत एनयूजी का कहना है कि तख्तापलट के नेता मिन आंग ह्लाइंग के नियंत्रण वाली जुंटा सरकार के साथ किए गए किसी भी आर्थिक अथवा निवेश समझौते की वैधता संदिग्ध है और ऐसे समझौतों में कानूनी, वित्तीय तथा परिचालन संबंधी गंभीर जोखिम भी निहित हैं। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि म्यांमार में सामान्य स्थिति बहाल होने में अभी काफी समय लग सकता है। राजनीतिक अस्थिरता, सशस्त्र संघर्ष, आर्थिक संकट और मानवीय त्रासदी ने देश को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ लाखों नागरिक आज भी अपने ही देश में सुरक्षा, सम्मान और सामान्य जीवन की तलाश में संघर्ष कर रहे हैं।

(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक)

कुटिलता की चरम सीमा को पार करते आधुनिक कालनेमि

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लखनऊ । अयोध्या राम मंदिर का चढावा चोरी विवाद निश्चय ही सनातन संस्कृति के अभ्युदय काल में एक दुखद अध्याय है। अब, जब चढावा चोरी की दुखद घटना की एसआईटी द्वारा गहन जांच चल रही है ऐसे समय सनातन विरोधी अराजक राजनीतिक दलों ने इस मुददे को अपनी राजनीति चमकाने का एक सुनहरा अवसर समझ लिया है। जो लोग अभी तक पीडीए राजनीति तक ही सीमित थे वे, अत्यंत अशोभनीय तरीके से भाजपा, संघ तथा विश्व हिंदू परिषद पर हमलावर होकर स्वयं को सबसे बड़ा रामभक्त और भाजपा, विहिप व संध को सबसे बडा हिन्दू विरोधी और रामद्रोही साबित करने में जुट गए हैं।

विरोधियों के अनर्गल प्रलाप ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को खुलकर आक्रामक अंदाज में हिंदुत्व की बात करने का अवसर दे दिया है । उन्होंने सपा मुखिया अखिलेश यादव को मथुरा की श्री कृष्णजन्मभूमि की मुक्ति के लिए आगे आने की चुनौती दी है । सपा मुखिया भाजपा नेतृत्व को कटघरे में खड़ा करने के लिए बिना सिर –पैर के कुतर्कों का सहारा लेकर बयानबाजी कर रहे हैं जबकि आमजन तथा रामभक्त सरकार द्वारा उठाये गए कदमों और कार्रवाई को धैर्यपूर्वक देख-सुन रही है और उसे विश्वास है कि अपराधियों को उचित दंड अवश्य मिलेगा ।

वहीं दूसरी ओर जोर –जोर से चिल्लाकर समाचारों को संगीन बनाने वाले कुछ टीवी चैनल दानपत्रों से हुई चोरी पर बहस आयोजित कर रहे हैं जिनमें काफी अभद्र व आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग अत्यंत आक्रामक तरीके से हो रहा है जिसे नियंत्रित करने की आवश्यकता है। आज वही लोग हमलावर हो रहे हैं जिन्होंने अयोध्या विवाद की शुरूआत वर्ष 1947 से लेकर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय आने तक व फिर उसके बाद दिव्य व भव्य राम मंदिर के उदघाटन तक कभी भी विश्व हिंदू परिषद व रामभक्तो के आन्दोलन का समर्थन नहीं किया अपितु , अयोध्या में स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में अयोध्या की गलियों व सरयू नदी में रामभक्तों का खून बहाया गया था। 6 दिसंबर को अयोध्या में विवादित ढांचा ढह जाने के बाद भीषण दंगे करवाये गए थे तथा केंद्र की कांग्रेस सरकार ने भाजपा की चार प्रान्तों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया था। आज वही कालनेमि कपड़े बदलकर सनातनी हो गए हैं ।

पग- पग पर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले ये लोग जिस प्रकार से रामभक्तों के नाम पर विघटनकारी और उत्तेजक बयान दे रहे हैं ऐसे , घडि़याली आंसू बहाने वाले अराजक तत्वों से बेहद सतर्क हो जाने का समय आ गया है । यह सब कुछ जिस प्रकार से घटित हो रहा है उससे यह संकेत भी जा रहा है कि ये लोग एसआईटी की जांच को प्रभावित करके अपना विकृत निहित स्वार्थ सिद्ध करना चाह रहे हैं । इनके मंतव्य बहुत ही गहरे हैं है क्योकि यह लोग अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण वाली ओछी राजनीति त्याग नहीं सकते है। राम मंदिर उदघाटन के समय जब विश्व हिुंदू परिषद ने सभी राजनैतिक दलों को आमंत्रित किया था तब इन्हीं सब दलों ने यह कहकर वहां जाने से मनाकर दिया था कि अगर हम वहां चले गए तो हमारा मुस्लिम वोटबैंक बहुत नाराज हो जाएगा।आज वही लोग चढ़ावा चोरी की आड़ में राजनीतिक बयानबाजी कर रहे हैं जिन लोगों ने सत्ता में रहते हुए बंगाल, तमिलनाडु व केरल में बिजली की आपूर्ति इसलिए ठप करवा दी थी कि राम मंदिर का उदघाटन वहां का हिंदू जनमानस टीवी पर न देख सके ।

सबसे अधिक क्रोध और हंसी तो आप पार्टी पर आती है जिस पार्टी को, अपने आपको कट्टर ईमानदार बताकर अभूतपूर्व शराब घेाटाला करने के कारण दिल्ली की जनता नकार देती है जिस दल की सरकार को अब पंजाब की जनता भी डुबाने जा रही है वह भी अपने आपको कट्टर सनातनी बताने लग गई है । जन्मभूमि पर सुलभ शौचालय या अस्पताल बनाने की बात करने वाले वही कालनेमि अयोध्या गए , दान चोरी पर घडियाली आंसू बहाए, भाजपा, विहिप एवं संघ के शीर्ष नेतृत्व को गरियाने के नाम पर रामभक्त हिन्दुओं का अपमान किया । कुटिलता की सबसे तेज चाल आप पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवल ने चली तो प्रदेश के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय भी अवसर क्यों गंवाते वह भी लगे हाथ हो लिए ।

असल में, इस विवाद की आड़ में एक खतरनाक स्तर की राजनीतिक लड़ाई लड़ी जा रही है। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए सपा व समस्त विरोधी दल एक अलग तरह का हिंदू नैरेटिव पेश करने का प्रयास कर रहे हैं और यह दिखाना चाह रहे हैं कि वह सनातन विरोधी नहीं हैं बल्कि मंदिर व्यवस्था व पुजारियों के एक वर्ग के खिलाफ हैं। इस प्रोपेगेडा के माध्यम से वह भाजपा के राष्ट्रवादी व सांस्कृतिक हिंदुत्व के समानांतर एक ऐसा वर्ग खड़ा करना चाह रहे हैं जो आपस में बंट जाए अर्थात् वह हिंदू बनाम हिदू की लड़ाई करवान चाहते हैं तथा हिंदू समाज को टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित करके अपना स्वार्थ सिद्ध करने की विकृत चाल चल रहे हैं। सपा मुखिया को लगता है कि दलित व मुस्लिम गठजोड़ का वोटबैंक तो बस उनके साथ ही है अब, सवर्ण व पिछडी जातियों में भेद पैदा करके तथा उनके मन में भाजपा के खिलाफ आक्रोश उत्पन्न करके अपना स्वार्थ सिद्ध कर लिया जाए।
किंतु यह सब कुछ सपा के लिए इतना आसान नहीं रहने वाला क्योंकि आमजन मुख्यमंत्री योगी की सनातन छवि के साथ ही उनकी प्रशासनिक क्षमताओं की कायल हो चुकी है । प्रदेश में विकास कार्यों की द्रुतगति के साथ ही अपराधियों पर कठोर कार्यवाही योगी जी की पहचान बन गयी है । वे अपने भाषणों में अपनी सरकार के दौरान किये गए विकास कार्यों का विवरण देने केसाथ ही अपने आक्रामक तेवरों के साथ जनता को बताते हैं कि जो लोग कभी जयश्रीराम का नारा लगाने वालों पर लाठीचार्ज करवाते थे वे आज रामभक्ति की वकालत करने लग गए हैं। टीवी चैनलों की बहस में वही सपाई अपनी छातियां पीट रहे हैं जो कभी कहते थे हम किसी भी हालत में मदिर नहीं बनने देंगे। सपा मुखिया अखिलेश यादव आज रामालय ट्रस्ट के गबन की बात नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम को काल्पनिक बताया था उसके प्रवक्ता आज टीवी चैनलों पर अपनी छातियां पीट रहे हैं और आंसू बहा रहे हैं आज जब संपूर्ण भारत में मंदिरो का कायाकल्प हो रहा है तब उसे यह लोग भाजपा की लूट का जरिया बताकर सनातन का एक बार फिर अपमान ही कर रहे हैं।

ये वही कालनेमि अराजक तत्व हैं जिन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हुए भयानक अत्याचार के विरुद्ध कोई आवाज नहीं उठाई इन सेक्युलर नेताओ ने कभी जम्मू -कश्मीर के पंडितों के समर्थन मेंअपनी आवज नहीं बुलंद की, आज वही लोग नकली सनातनी बन गए है।

सपा व विरोधी दल यह सोच रहे है कि उन्हें इस विवाद का राजनीतिक लाभ मिल सकता है किंतु यही उनकी ऐतिहासिक भूल भी सिद्ध होने वाली है।राम मंदिर दानपात्र से चोरी का मामला गंभीर अवश्य है किंतु हिंदू जनमानस को मुख्यमंत्री योगी की सरकार पर पूरा भरोसा है कि केवल योगी सरकार ही इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराएगी और दोषियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करेगी जिससे भविष्य में पुनः कोई ऐसी धृष्टता करने से पहले दस बार सोचेगा । अभी एक सर्वे आया है जिसके अनुसार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि ,हिंदुत्व, कानून – व्यवस्था,मजबूत प्रशासन और विकास के एजेंडे पर लगातार मजबूत बनी हुई है। लोकसभा चुनावों के बाद यूपी में सपा मजबूत अवश्य हुई थी किंतु बंगाल का चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे अधिक भय का वातावरण सपा में ही है जिसे राम मंदिर चढावा विवाद के बहाने छुपाने का प्रयास किया जा रहा है ।

सपा मुखिया अखिलेश यादव चढ़ाव चोरी की घटना से अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने का असफल प्रयास कर रहे है किंतु उन्हें इसका बहुत बड़ा नुकसान होने वाला हैं क्योकि यूपी में योगी की लोकप्रियता व जनता के मन मे उनके प्रति जो भरोसा कायम है वह अटूट हैं । बस जनता को इन कालनेमियों से सावाधन व सतर्क करते रहना आवश्यक है।

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