धामी के लिए क्यों खास है चार जुलाई की तारीख? उत्तराखंड में पांच साल में क्या हुए पांच ऐतिहासिक काम?

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देहरादून । इस बार चार जुलाई की तारीख उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए खास है। मुख्यमंत्री के तौर पर पहली बार उन्होंने शपथ चार जुलाई, 2021 को ली थी। इस लिहाज से चार जुलाई, 2026 को सीएम के रूप में वे पांच साल का निर्बाध कार्यकाल पूरा कर रहे हैं।

दूसरी बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ उन्होंने 23 मार्च, 2022 को ली थी। इस हिसाब से दूसरे कार्यकाल के पांच साल अगले साल 23 मार्च को पूरे होते हैं। लेकिन उससे पहले ही राज्य में विधानसभा चुनाव संपन्न हो जाएंगे। इसलिए चार जुलाई को पूरे हो रहे पांच साल खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

इन पांच वर्षों में उत्तराखंड में ऐसा बहुत कुछ घटित हुआ है, जिसकी पहले कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। चार जुलाई को लगातार शासन के पांच साल पूरे होने पर राज्य में बड़े खर्चीले तामझाम वाले कार्यक्रम आयोजित करने की बजाए धामी सरकार ने जनता की विशेष सेवा का संकल्प लिया है। इसके लिए चार जुलाई को सेवा पखवाड़े का दूसरा चरण शुरू किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री धामी जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार के बैनर तले सेवा पखवाड़े की शुरुआत कर रहे हैं। इस दौरान 15 दिनों तक राज्य के सभी जिलों में जनसेवा कैंप लगाए जाएंगे। इन कैंपों में राज्य के निवासियों की सेहत की जांच के साथ ही सभी सरकारी योजनाओं का लाभ एक ही जगह पर दिया जाएगा।

मुख्यमंत्री धामी का मकसद सरकार को आम लोगों के और ज्यादा पास लाना है। यानी सरकार चाहती है कि योजनाओं का फायदा अंतिम व्यक्ति तक हर हाल में पहुंचे। यानी, अगर आप उत्तराखंड के निवासी हैं और किसी वजह से अभी तक आयुष्मान भारत कार्ड नहीं बनवा पाए हैं, तो चिंता मत करिए। अगर आप पात्रता रखते हैं, तो सेवा पखवाड़े के दौरान कैंप में जा कर यह कार्ड आसानी से बनवा सकते हैं।

इसी तरह सामाजिक सुरक्षा पेंशन, दिव्यांगजन कल्याण, राजस्व संबंधी मामलों का हल, विभिन्न प्रमाण-पत्रों से जुड़ी सेवाओं, महिला और बाल विकास, कृषि, उद्यान, पशुपालन, कौशल विकास, स्वरोजगार समेत दूसरी सभी सरकारी योजनाओं से जुड़ी सेवाएं आप तक इस दौरान खास तौर पर पहुंचाई जाएंगी। कुल मिलकर सरकारी विभागों से जुड़ी सभी समस्याओं का सिंगल विंडो समाधान सेवा पखवाड़े के दौरान किया जाएगा।

मुख्यमंत्री धामी मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में वे उत्तराखंड की अप्रतिम सेवा कर पा रहे है। केंद्र सरकार को धामी सरकार पर पूरा भरोसा है। यही वजह है कि मोदी सरकार ने उत्तराखंड के लिए खजाना खोलते हुए एसएएससीआई योजना के तहत 2355 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। आइए, जानते हैं कि धामी सरकार के पांच साल के लगातार दो कार्यकालों में कौन से पांच काम ऐसे हुए, जो उत्तराखंड और देश के लिए ऐतिहासिक रहे हैं-

मदरसा बोर्ड का वजूद खत्म

गत एक जुलाई से ‘उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड’ का अस्तित्व पूरी तरह खत्म हो गया है। इसकी जगह अब ‘राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ ने काम शुरू कर दिया है। ऐसी व्यवस्था करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है। खास बात यह है कि मदरसों समेत अब सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान एक ही दायरे में आ गए हैं। सभी पर एक समान नियम लागू होंगे।

समान नागरिक संहिता

उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है, जिसने राज्य में विवाह, तलाक और संपत्ति के बंटवारे जैसे मामलों में सभी धर्मों के लिए समान कानून लागू किया है। इससे मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को खास तौर पर सामाजिक सुरक्षा मिल रही है।

कड़ा नकल विरोधी कानून

उत्तराखंड में नौकरियों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए देश का सबसे कड़ा नकल विरोधी कानून पास किया गया है। इसके तहत दोषियों पर भारी जुर्माना और उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया गया है।

अवैध अतिक्रमण पर कार्रवाई

राज्य में वन भूमि और सरकारी जमीनों से अवैध कब्जे हटाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाकर हजारों एकड़ जमीन खाली कराई गई है।

पर्यटन का रिकॉर्ड

राज्य में बुनियादी ढांचे के विकास पर काफी ध्यान दिया गया है। ऑल-वेदर रोड का जाल बिछाया गया है। बेहतर प्रबंधन के जरिए चारधाम यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या ने नए रिकॉर्ड बनाए हैं। इसके अलावा होम-स्टे और शीतकालीन यात्रा को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

इसके अलावा देशी-विदेशी निवेश की संभावनाएं तलाशने के लिए उत्तराखंड की धानी सरकार ने पहली बार ‘ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट’ का आयोजन किया। इसके माध्यम से राज्य में बड़े पैमाने पर निवेश की संभावनाएं बनी हैं। साथ ही, स्थानीय उद्योगों, एमएसएमई प्रोत्साहन, और पलायन रोकने के साथ ही राज्य में वापसी की दिशा में सरकार ने कई नई असरदार नीतियां लागू की हैं।

समय से पहले विधानसभा चुनाव

चलते-चलते यह भी जान लें कि अटकलें हैं कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव समय से पहले कराए जा सकते हैं। विधानसभा का कार्यकाल आगामी फरवरी में खत्म होना है। ऐसे में नियमानुसार अगस्त, 2026 के बाद कभी भी विधानसभा चुनाव संपन्न कराए जा सकते हैं।

राज्य में समय से पहले चुनाव की अटकलें इस वजह से लगाई जा रही हैं, क्योंकि फरवरी, 2027 से राष्ट्रीय जनगणना का दूसरा चरण शुरू होना है। इसके अलावा जनवरी 2027 से हरिद्वार में अर्द्धकुंभ मेला शुरू होना है। ऐसे में विधानसभा चुनाव, जनगणना और अर्धकुंभ के सफल आयोजन के लिए बड़े पैमाने पर सरकारी कर्मचारियों की जरूरत कैसे पूरी होगी? ऐसे में या तो चुनाव पहले कराने पड़ेगे या फिर जनगणना का काम स्थगित करना होगा। अर्धकुंभ को तो टाला नहीं जा सकता।

प्रचारक: राष्ट्र-यज्ञ के निस्पृह तपस्वी

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जयपुर : दुनिया के अधिकांश मतों ने मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य सुख या आनंद को माना है। सुख की प्रकृति और उसकी प्राप्ति के साधनों को लेकर मतभेद अवश्य हैं, किंतु इस बात पर व्यापक सहमति है कि मनुष्य अंततः सुख की ही खोज में जीता है। किंतु प्रश्न यह है कि सुख का वास्तविक आधार क्या है? दुःख से मुक्ति का उपाय क्या है? और सबसे बड़ा प्रश्न यह कि क्या कोई मनुष्य अकेले सुखी रह सकता है?

उत्तर निस्संदेह ‘नहीं’ में ही मिलेगा। मनुष्य का सुख समाज से जुड़ा है, राष्ट्र से जुड़ा है। जिस समाज और राष्ट्र से उसका नाभिनाल संबंध हो, जिसके प्रति आत्मीयता, रागात्मकता और अखंड निष्ठा हो, वही उसके जीवन को सार्थक बनाता है। इसी आत्मिक जुड़ाव के साथ माँ भारती की सेवा में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर देने वाले सेवाव्रती साधकों का दूसरा नाम प्रचारक है। उन्हें श्वेत वस्त्रधारी संत कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनका त्याग, तप और समर्पण उसी कोटि का है। प्रचार और प्रसिद्धि, निंदा और स्तुति से सर्वथा निर्लिप्त रहकर वे राष्ट्र-यज्ञ में निरंतर अपनी आहुति देते रहते हैं।

प्रत्येक प्रचारक का जीवन अपने आप में प्रेरणा का एक जीवंत स्रोत होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यप्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष व्यक्ति-निर्माण है। वहाँ व्यक्तित्व का शोधन, परिमार्जन और परिष्कार निरंतर चलता रहता है। जैसे साधारण प्रस्तर निरंतर घिसने पर शालिग्राम बनता है, वैसे ही प्रचारक का जीवन भी सतत साधना की प्रक्रिया से गुजरता है। अनुशासन की छेनी, तप की हथौड़ी और ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा उसके व्यक्तित्व के प्रत्येक अनगढ़ कोने को तराशती रहती है। यही कारण है कि संघ की कार्यपद्धति में चरित्र-निर्माण कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि सतत चलने वाली साधना है और प्रचारक उसकी केंद्रीय धुरी हैं।

अपवाद हर क्षेत्र में होते हैं, किंतु उदाहरण सदैव सामान्य प्रवृत्तियों से बनते हैं। सामान्यतः प्रचारकों का जीवन देखकर संस्कृत का यह वाक्य साकार होता प्रतीत होता है, “स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः” – अर्थात् प्रत्येक मनुष्य अपने आचरण से ही संसार को शिक्षा देता है। यही सच्ची शिक्षा है। भौतिकता और उपभोक्तावाद के इस युग में भी प्रचारकों का जीवन इस आदर्श का सजीव प्रमाण है।

प्रचारकों का अधिकांश जीवन प्रवास में ही बीतता है। संगठन के विस्तार के साथ उनकी यात्राएँ भी अधिक व्यापक और सघन हुई हैं। बैठकों, संस्थागत कार्यक्रमों, सार्वजनिक आयोजनों तथा विविध दायित्वों के बीच उनका समय लगभग पूर्णतः समाज को समर्पित रहता है। ऐसे जीवन में अपने स्वास्थ्य, विश्राम और व्यक्तिगत सुविधाओं की चिंता स्वाभाविक रूप से पीछे छूट जाती है। उनके लिए कार्यक्रम की सफलता, समाज की अपेक्षाएँ और संगठन का कार्य ही सर्वोपरि होता है।

यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि मेरा प्रत्यक्ष अनुभव है। अभी कल की ही बात है। #प्रज्ञा_प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक आदरणीय श्री जे. नंद कुमार जी दिसंबर में आयोजित होने वाले लोकमंथन की बैठक के लिए जयपुर में थे। प्रातः नौ बजे से रात्रि नौ बजे तक वे निरंतर बैठक में व्यस्त रहे। कुछ दिनों पूर्व मैंने उनसे अपने संस्थान में आयोजित आईपीएससी टीचर्स कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में पधारने का आग्रह किया था। तब उन्होंने बताया था कि वे पुणे प्रवास पर हैं। 28 तारीख को वे पुणे से दिल्ली लौटे। 1 तारीख को पूरा दिन जयपुर में बैठक चली। बैठक समाप्त होते ही रात्रि लगभग 9:45 बजे वे हमारे कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए जयपुर से रवाना हुए और लगभग 11:45 बजे अजयमेरू पहुँचे। अगले दिन प्रातः 9:30 बजे उन्हें गोटन स्थित हमारे संस्थान के उद्घाटन सत्र को संबोधित करना था।

इसी बीच रात्रि लगभग 8:30 बजे पाञ्चजन्य के यशस्वी संपादक आदरणीय श्री हितेश शंकर जी का मुझे व्हाट्सएप कॉल आया। उन्होंने केवल इतना बताया कि श्री जे. नंद कुमार जी गोटन पहुँच रहे हैं। वस्तुतः यह सूचना भर नहीं थी, बल्कि उनके प्रति आत्मीय चिंता का सहज प्रकटीकरण था। संघ-जीवन की यही विशेषता है, एक-दूसरे के प्रति सतत आत्मीयता का भाव और उत्तरदायित्व का बोध।

स्वाभाविक है कि इतना व्यस्त दिन बिताने के बाद कोई व्यक्ति बिस्तर पर लेटते ही सो जाए, यह आवश्यक नहीं। किंतु मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब प्रातः 7:21 बजे मैंने उनके साथ यात्रा कर रहे श्री पंकज जी को फोन किया और पता चला कि वे मेड़ता रोड पहुँचने वाले हैं। मार्ग में रेलवे फाटक बंद होने के कारण उन्हें लगभग पच्चीस मिनट प्रतीक्षा भी करनी पड़ी, फिर भी वे प्रातः 8:20 बजे हमारे परिसर में उपस्थित थे। सहज ही मन में प्रश्न उठा, वे कितनी देर सो पाए होंगे? कितने बजे जगे होंगे? उन्हें विश्राम का अवसर कितना मिला होगा?

आज समय के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता कितने लोगों के जीवन में दिखाई देती है? दूसरे के कार्यक्रम को अपना दायित्व मानकर कितने लोग इस प्रकार का कष्टसाध्य जीवन जीते हैं? संघ के प्रचारकों के लिए यह कोई असाधारण घटना नहीं, बल्कि सामान्य कार्य-संस्कृति का हिस्सा है। कार्यक्रम का प्रथम सत्र समाप्त होते ही उन्हें पुनः लगभग सौ किलोमीटर की यात्रा कर जोधपुर पहुँचना है और वहाँ से दिल्ली के लिए प्रस्थान करना है। जीवन के जिस पड़ाव पर वे हैं, उस आयु में इतना सघन प्रवास निश्चय ही सहज नहीं होता। किंतु उनके चेहरे पर न थकान का प्रदर्शन, न असुविधा की चर्चा और न ही किसी प्रकार की अपेक्षा। केवल कर्तव्य, केवल ध्येय और केवल राष्ट्रकार्य। यह सौभाग्य की बात थी कि श्री पंकज जी पूरे प्रवास में उनके साथ थे और हर प्रकार से उनकी चिंता कर रहे थे। अन्यथा यह यात्रा उनके लिए और भी अधिक कष्टसाध्य हो सकती थी।

अपने अनुभव के आधार पर मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में लोकमंगल की भावना से जहाँ कहीं कोई सकारात्मक, रचनात्मक और राष्ट्रहितकारी प्रकल्प सफलतापूर्वक चल रहा है, वहाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा, उसके प्रचारकों का मार्गदर्शन अथवा कार्यकर्ताओं का मौन सहयोग किसी न किसी रूप में अवश्य उपस्थित मिलता है।यही उनकी कार्यशैली है, बिना श्रेय की अपेक्षा के, बिना प्रचार की आकांक्षा के और बिना किसी व्यक्तिगत आग्रह के राष्ट्र के लिए निरंतर कार्य करते रहना। ऐसे निस्पृह कर्मयोगी ही वास्तव में राष्ट्र की उस मौन शक्ति के प्रतीक हैं, जिनकी तपस्या मंचों पर कम दिखाई देती है, परंतु जिनके श्रम, त्याग और साधना से समाज का भविष्य निरंतर निर्मित होता रहता है।

सोनिया सिंह: स्टाइलिश इन्फ्लुएंसर और सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल

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दिल्ली। इंटरनेट पर इन दिनों हर कोई यही बात कर रहा है कि कैसे सोनिया सिंह नाम की लड़की अपने फोटो और वीडियो में एक महीने में लाखों रुपये कमा रही हैं। किसी एक्ट्रेस की तरह सोनिया की भी इंस्टाग्राम पर तगड़ी फैन-फॉलोइंग है। उनके ड्रेस वाले स्टाइलिश रूप देखकर आपकी भी नजरें ठहर जाएंगी। रोजाना कोई न कोई वीडियो वायरल होते हुए आपने देखा होगा। रोहित खत्री की पत्नी सोनिया सिंह खत्री को लोग फिट गर्ल के नाम से भी जानते हैं। उनके एक-एक वीडियो पर लाखों व्यूज आना अब आम हो गया है। इससे भी बड़ी बात यह है कि सोनिया की फोटो और वीडियो को देखने के लिए लोग पैसे तक भरते हैं। तभी वो एक महीने में अपने कंटेंट से लाखों रुपये कमा रही हैं।
सोनिया खत्री फिटनेस से जुड़े वीडियो डालने के लिए इंटरनेट पर मशहूर हैं। उन्हें 2.8 मिलियन यानी 28 लाख यूजर्स फॉलो करते हैं। जैसे ही वो कोई वीडियो डालती हैं, लाइक और कमेंट्स की बरसात हो जाती है। रिल क्रिएटर आदित्य गौतम बताते हैं कि सोनिया के 6 हजार एक्सक्लूसिव सब्सक्राइबर हैं जो 400 रुपये खर्च करके उनका कंटेंट देखते हैं। इससे वे महीने में 24 लाख के आसपास कमाती हैं। अब सब्सक्राइबर बढ़कर 6-7 हजार हो गए हैं और कमाई लगभग 29 लाख रुपये तक पहुंच गई है।
सोनिया अपने लुक को खास बनाने के लिए कोई भी आउटफिट पहन लेती हैं। मिनी ड्रेसेस पहनने में भी वो हिचक नहीं दिखातीं। लेपर्ड प्रिंट वाली ड्रेस में गहरा गला और हॉल्टर नेकलाइन उनके फिगर को हाइलाइट करती है। लाल परी वाला लुक भी कमाल का है। स्कर्ट-टॉप सेट में फूल वाला एलिमेंट और थाई हाई स्लिट वाला रफल डिजाइन लुक को ग्लैमरस बनाता है। हर लुक में उनकी ब्यूटी देखते बनती है और स्टाइल वायरल हो जाता है।
सोनिया सिंह ओबीसी समाज से आती हैं। लगता नहीं कि इनकी जाति की वजह से किसी में इतना साहस होगा जो इनके साथ भेदभाव करे। आज सोशल मीडिया के युग में ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय से आने वाले कई इन्फ्लुएंसर अपनी मेहनत से सफलता हासिल कर रहे हैं। सोनिया की कहानी इसी मेहनत और क्रिएटिविटी का उदाहरण है। यदि ऐसे इन्फ्लुएंसर परिवार धीरे-धीरे अपना आरक्षण का अधिकार छोड़ना शुरू कर दें और इसे दूसरे जरूरतमंद परिवारों के लिए उपलब्ध कराएं, तो यह एक बेहद अच्छी और सराहनीय पहल होगी।
इससे भविष्य में जब आरक्षण छोड़ने वाले परिवारों की संख्या बढ़ती जाएगी, तो देश की कल्याणकारी योजनाएं समाज तक किस गति से पहुंच रही हैं, इसका सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा। साथ ही, समाज में इससे कितना सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है – जैसे आर्थिक उन्नति, सामाजिक गतिशीलता और समानता की भावना में वृद्धि – इसका भी बेहतर आकलन संभव होगा। सोनिया जैसी सफल इन्फ्लुएंसर अगर इस दिशा में कदम उठाएं, तो यह दूसरों के लिए प्रेरणा बनेगा। आरक्षण व्यवस्था अधिक लक्षित और न्यायसंगत बनेगी। जरूरतमंद वर्गों को और बेहतर अवसर मिलेंगे।
सोनिया की सफलता दिखाती है कि मेहनत और स्टाइल से कोई भी ऊंचाई छू सकता है। उनके वायरल कंटेंट ने लाखों युवाओं को फिटनेस की ओर प्रेरित किया है। अगर वे और अन्य प्रभावशाली लोग सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए आरक्षण के लाभ को वंचितों तक पहुंचाएं, तो देश का समग्र विकास तेज होगा। कुल मिलाकर, सोनिया सिंह की कहानी स्टाइलिश सफलता के साथ सामाजिक योगदान का सुंदर मिश्रण है।

Lokmanthan 2026: National Dialogue Mahayagya on the Theme ‘We the People of India’ to be Held in Jaipur

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Jaipur: Preparations for ‘Lokmanthan 2026’, a prestigious platform dedicated to Indian knowledge traditions, folk culture, and national thought, are in full swing. On Wednesday, the Welcome Committee and Organizing Committee for Lokmanthan 2026 were formally announced at a grand event held at the Constitution Club in Jaipur. Rajasthan Chief Minister Bhajanlal Sharma presided over the ceremony, inaugurated the event, and unveiled the official website of Lokmanthan 2026.

The chief speaker, J. Nandkumar, National Convener of Pragya Pravah, elaborated on the concept and objectives of Lokmanthan. He said, “India was built through meaningful dialogue, and the India of the future will also be strengthened only through continuous, creative, healthy, and multidimensional dialogue. This is not just a right, but our duty as well.”

Nandkumar explained that Lokmanthan was initiated to revive the ancient Indian tradition of dialogue in the modern context. The first edition focused on the theme “Liberation of the Indian Psyche from Colonialism,” which received enthusiastic participation from thinkers, scholars, and people from all sections of society across the country. Lokmanthan 2026 will now be held from 4 to 6 December in Jaipur on the theme “We the People of India”.

He emphasized that dialogue should not be limited to cities or the intellectual class alone. People from villages, rural areas, forests, and tribal regions must also be given full participation in the national discourse. “India’s dialogue should be the dialogue of the entire society, in which even the person standing in the last row has an equal voice,” he asserted.

Nandkumar reminded the audience that India was not built merely through the discourse of the so-called educated class sitting in big cities. Forest dwellers living in jungles, villagers in rural areas, and citizens in urban centres — all have collectively enriched India’s tradition of dialogue. Lokmanthan is an effort to carry forward this inclusive tradition.

While announcing the committees, Chief Minister Bhajanlal Sharma assured that Rajasthan would ensure the successful organization of Lokmanthan 2026. He described the platform as a unique opportunity for the exchange of knowledge, culture, and national consciousness.

Lokmanthan will not only be a forum for discussions and seminars but a grand churning (manthan) on the diversity of Indian folk life, ancient knowledge systems, cultural heritage, and contemporary national issues. Scholars, researchers, artists, and social workers from different parts of the country will participate in the event.

The organizers believe that in the present times, when numerous challenges are emerging at the global level, it is extremely important to strengthen India’s ancient values and tradition of dialogue. Lokmanthan 2026 will prove to be a significant step in this direction.

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