कवि प्रदीप: शब्दशक्ति से राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान जागरण की यात्रा

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भोपाल : भारतीय स्वाधीनता संग्राम में करोड़ो प्राणों के बलिदान हुये। इन बलिदानों केलिये आव्हान करने वाले शब्द साधकों की धारा भी अनवरत रही। हर कालखंड में शब्द साधकों अपनी साहित्य रचना और गीतों के माध्यम से राष्ट्र को जाग्रत किया। ऐसे ही शब्द साधक और कालजयी रचनाकार हैं कवि प्रदीप। उनके गीत संपूर्ण राष्ट्र में गूँजे।

उनका संपूर्ण जीवन मानों ओजस्वी गीतों केलिये समर्पित था। स्वतन्त्रता के पूर्व उनके गीतों में संघर्ष केलिये आव्हान था तो स्वाधीनता के बाद राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा। स्वतंत्रता से पहले- “दूर हटो ये दुनियाँ वालो ये हिन्दुस्तान हमारा है ।” तो स्वतंत्रता के बाद- “ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आँख में भर लो पानी” जैसे अमर गीत के रचयिता कवि प्रदीप ही हैं वे दुनियाँ के उन विरले गीतकारों में से हैं जिनका हर गीत लोकप्रिय हुआ। उन्होंने दो हजार से अधिक गीत लिखे इसमें लगभग 1700 गीत फिल्मों में आये। उनके द्वारा लिखे गये सौ से अधिक राष्ट्र भक्ति के गीत तो अपने समय हर देशवासी की जुबान पर रहे। ऐसे अमर गीतों के गीतकार कवि प्रदीप का जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्यप्रदेश में उज्जैन जिले के अंतर्गत बड़नगर में हुआ। उनके पिता रामचंद्र द्विवेदी आर्य समाज से जुड़े थे। घर में राष्ट्रसेवा सांस्कृतिक गरिमा का वातावरण था। इसका प्रभाव प्रदीपजी मन और विचार पर पड़ा। वे बचपन से राष्ट्र और सांस्कृतिक चेतना से आह्लादित रहते थे। उनकी प्रारंम्भिक शिक्षा बड़नगर में और उच्चशिक्षा लखनऊ में हुई।

कविताएं लिखने का शौक उन्हे बचपन से था। वे एक दृश्य देखकर अथवा कोई प्रसंग सुनकर बहुत प्रभावी गीत या कविता रच देते थे। उनकी इसी विधा ने पढ़ाई के दौरान लखनऊ विश्वविद्यालय में लोकप्रिय हो गये। पढ़ाई के दौरान ही उनकी भेंट उस समय के एक प्रखर और प्रभाव शाली कवि गिरिजा शंकर दीक्षित से हुई। दीक्षितजी अपने समय में कवि सम्मेलनों के लोकप्रिय कवि और उनके शिक्षक भी थे। उनके मार्गदर्शन गीत जीवन की यात्रा आरंभ हुई ।
प्रदीपजी ने 1939 में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। आजीविका केलिये शिक्षक बनने की तैयारी भी करने लगे। इसके साथ गीत रचना भी निरन्तर रही।

प्रदीपजी के गीतों से उनके शिक्षक दीक्षित जी बहुत प्रभावित थे। उन्ही दिनों प्रदीपजी ने “चल चल रे नौजवान” एक गीत लिखा था। दीक्षितजी ने यह गीत मुम्बई भेज दिया। यह गीत एक फिल्म “नौजवान” में आ गया। फिल्म लोकप्रिय हुई और गीत भी। यह फिल्म 1940 में रिलीज हुई थी । इस गीत के साथ प्रदीप जी रातोंरात पूरे देश में लोकप्रिय हो गये। 1942 में उनका दूसरा गीत मानों “भारत छोड़ो आंदोलन” का एक मंत्र बन गया । यह गीत था “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है “। यह गीत समाज को आव्हान करने वाला था आँदोलन के दौरान उस समय हर गली चौराहे पर गाया गया। 1944 में उनके एक और गीत “दूर हटो ऐ दुनिया वालो, यह हिन्दुस्तान हमारा है” ने फिर पूरे देश में तहलका मचा दिया। अंग्रेजी सरकार ने उनके गीतों को भड़काने वाला माना और गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया। कवि प्रदीप गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गये। बाद में फिल्म निर्माताओं ने मध्यस्थता की और प्रशासन को फिल्म स्क्रिप्ट केलिये इन गीतों की आवश्यकता बताई तब जाकर वारंट निरस्त हुआ ।

प्रदीप जी ने स्वतंत्रता के बाद जागृति जैसी फिल्मों के लिये नये अंदाज से गीत लिखे। “हम लाए हैं तूफान से किश्त निकल के” आज भी लोकप्रिय है। उन्होंने 1954 में बच्चों को समझाया कि “आओ बच्चों तुम्हें दिखाये झाँकी हिन्दुस्तान की”। इस गीत में भारत के गौरवमयी अतीत की मानों एक झाँकी थी। स्वतंत्रता की इस यात्रा के बीच ही 1962 में भारत चीन युद्ध आ गया । उस युद्ध में भारतीय सैनिकों ने कितनी विषम परिस्थिति में भारत राष्ट्र की रक्षा की। वे कहानियाँ दिल को दहलाने वाली है । सैनिकों के बलिदान पर उनका गीत ” ऐ मेरे वतन के लोगो, जरा आँख में भर लो पानी” की रचना की । जिस भाव से प्रदीप ने इस गीत की रचना की उसी भावना से लता जी ने गाया। इस गीत के बोल आज भी हृदय को छू जाते हैं। यह गीत देश भक्ति के गीतों में अग्रणी माना गया। भारत सरकार ने उन्हे “राष्ट्र कवि” के सम्मान से सम्मानित किया ।

26 जनवरी 1963 को आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में लताजी ने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में यह गीत गाया। नई दिल्ली में आयोजित इस राष्ट्रीय गणतंत्र समारोह में ऐसा कोई नहीं था जिसकी आँख में आँसू न आये हों। प्रदीपजी ने इस गीत की रॉयल्टी सैनिकों की विधवाओं केलिये बनाये गये सहायता कोष अर्थात ‘वॉर विडो फंड’ में जमा करने की घोषणा की। पर गीत के अधिकार रखने वाली कंपनी “एच एम वी” ने समय पर पैसा जमा नहीं किया। और मामला कोर्ट में गया। एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने एचएमवी कंपनी को रॉयल्टी के बकाया के रूप में 1 मिलियन रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया।

देश भक्ति मानों प्रदीप जी के रक्त में थी । 1987 में प्रदीप जी ने कहा था- “कोई भी आपको देशभक्त नहीं बना सकता। यह आपके खून में होती है। आप इसे देश की सेवा के लिए कैसे लाते हैं जो आपको अलग बनाता है।” सतत शब्द साधना और अपने गीतों से राष्ट्र साधना में रत प्रदीप जी ने अंततः 11 दिसम्बर 1998 को 83 वर्ष की आयु में इस संसार से विदा ली ।
शत शत नमन ।

पैसा और त्याग कभी बराबरी से नहीं तौले जा सकते

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

रायपुर: कई साल पहले मैंने अपने माता-पिता का फ्लैट अपनी बहन को देने का फैसला किया था। जब इस पर सवाल उठे, तो मैंने कहा यह इस बात की ईमानदार स्वीकृति थी कि पिता के गंभीर बीमार होने पर बहन ने ही उनकी देखभाल की थी।

अधिकांश परिवारों की तरह हमारे परिवार में भी दो तरह के सिबलिंग्स थे- एक ‘सैटेलाइट चाइल्ड’ यानी मैं- सफल, दूर रहने वाला, पैसे भेजने वाला। और दूसरी ‘केन चाइल्ड’ यानी मेरी बहन- जो पिता को कई बार अस्पताल ले गईं और अंत तक उनकी देखभाल करती रहीं। उसी दौरान उसकी सेहत भी बिगड़ी, जिसकी परेशानियां आज तक बनी हुई हैं।

इस हफ्ते की शुरुआत में मुझे अपने जीवन का यह छोटा-सा हिस्सा फिर याद आ गया, जब मुझे मुंबई के एक ऐसे अस्पताल जाना पड़ा, जहां मेरे परिवार के एक सदस्य भर्ती थे। पास के कमरे में एक अन्य महिला भर्ती थीं और उनका बेटा उनकी देखभाल कर रहा था। बगल के कमरे में बैठे-बैठे मैं उस बेटे और विदेश में रहने वाले उसके बड़े भाई की बातचीत सुन सकता था।

छोटे बेटे और मां की बातचीत से मुझे समझ आ रहा था कि पैसे बड़ा भाई भेज रहा था और मां की रोजमर्रा की जरूरतों की जिम्मेदारी छोटा भाई निभा रहा था। एक बार छोटे भाई ने गुस्से में फोन पर कहा कि हर बात पर यह मत जताया करो कि तुमने इसके लिए पैसे भेजे, उसके लिए पैसे भेजे। जैसे ही उसकी नजर मुझ पर पड़ी, वह फोन लेकर बाहर चला गया।

जो मुझे समझ आया, वो यह था कि बड़ा बेटा विदेश में था और शायद सोच रहा था कि मेरी वजह से बिल चुकाए जा रहे हैं; मेरी वजह से मां ठीक से खा रही हैं और उनकी देखभाल हो रही है; मेरी वजह से चीजें ‘हैंडल’ की जा रही हैं।

वहीं छोटा बेटा अलग-अलग बातचीत में यह बताते हुए सुना गया कि उसकी मां भूल जाती हैं कि अस्पतालों में कई बार उनके भर्ती रहने के दौरान वही हर समय मौजूद रहा था, लेकिन उन्हें हमेशा याद रहता है कि बड़ा बेटा उनकी देखभाल के लिए पैसे भेजता है। एक बार उन्होंने उसे काट भी लिया था, लेकिन वह उन्हें छोड़ नहीं सकता ​​​था, क्योंकि उनकी देखभाल करने वाला कोई और नहीं था।

इस हफ्ते जब मैं एक रात वहां गया तो मैंने सुना कि छोटा भाई फूट पड़ा और ऊंची आवाज में बोला- भाई, मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूं, क्योंकि तुम्हारे पैसों की वजह से मैं मां को सबसे अच्छा इलाज दिला पा रहा हूं। लेकिन तुम पैसा भेजकर चैन की नींद सो जाते हो, जबकि मैं बीते चार सालों में एक भी रात ठीक से नहीं सो पाया हूं।

तुम्हारे पैसे सुबह तीन बजे उनकी चादरें साफ नहीं कर पाते, मैं करता हूं। जैसे ही उसने मुझे बाहर आते देखा, वह अचानक रुक गया। मैं उसे खुलकर बोलने देने के लिए वापस अंदर चला गया। उसने बोलना जारी रखा- भाई, शायद तुम्हें पता भी नहीं कि उन्हें नहलाते समय उठाते हुए मेरी कमर में चोट लग गई थी।

डॉक्टर ने बताया कि मुझे हर्नियेटेड डिस्क हो गई है। लेकिन मैं अपने लिए समय ही नहीं निकाल सकता, क्योंकि वे अस्पताल में हैं। तुम्हें अंदाजा नहीं है, भाई। तुम्हारे पैसे उन्हें तब थाम नहीं पाते हैं, जब वे गिर रही होती हैं- यह याद रखना। इतना कहकर उसने फोन काट दिया।

वह कितनी सच्ची बात कह रहा था! आज तक किसी ने नहीं सुना कि पैसा डायपर बदल सकता है या अकेलेपन में सहारा दे सकता है। शायद इसी वजह से मुझे अपनी बहन की​ याद आई। जब मैं पिता की दवाइयों के पैसे देता था, तो वही उन्हें दवा खिलाती थी। हो सकता है अंतिम संस्कार का खर्च मैंने उठाया हो, लेकिन आखिरी पल में पिता का हाथ उसने ही थामा था।

तब उसने मुझे फोन करके कहा ​था- भाई, मैंने उन्हें जाते हुए देखा। उस दिन मैंने खुद को कोसा। अस्पताल से डिस्चार्ज कराने से ठीक दो घंटे पहले मैं उनके साथ था, लेकिन उनके अं​​तिम क्षण में यह सैटेलाइट सक्सेसफुल चाइल्ड- यानी मैं- वहां मौजूद नहीं था।

फंडा यह है कि विरासत का मतलब सम्पत्ति को बराबर-बराबर बांटना नहीं होता। इसका मतलब यह पहचानना भी होता है कि किसने अपने जीवन में ज्यादा त्याग किए, ताकि कोई और अपना जीवन संवार सके। पैसा और त्याग कभी बराबरी से नहीं तौले जा सकते।
(प्रस्तुति : कल्पेश पटेल)

कीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025: आधुनिक कृषि की चुनौतियां, किसान हित और जीएम बीजों का भविष्य

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निलेश देसाई

भोपाल । भारतीय कृषि आज एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ उत्पादकता बढ़ाने के दबाव और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य हो गया है। 1968 के पुराने ‘कीटनाशक अधिनियम’ को प्रतिस्थापित करने के लिए प्रस्तावित ‘कीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025’ (PMB 2025) इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि, यह विधेयक केवल रसायनों के नियंत्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे भविष्य की खेती, बीजों की तकनीक और किसानों की आर्थिक सुरक्षा को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करने वाला है। विशेष रूप से जीएम (GM) बीजों का कीटनाशक के रूप में वर्गीकरण और कॉर्पोरेट जवाबदेही जैसे मुद्दे इस बहस के केंद्र में हैं।

जीएम (GM) बीजों पर प्रभाव: एक नई कानूनी परिभाषा

विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण और चर्चा वाली बात इसकी व्यापक परिभाषा है। दस्तावेज़ों के अनुसार, “टॉक्सिन-संबंधित जीन संशोधन” (Toxin-related gene modification) को भी इसके दायरे में लाने का प्रस्ताव है। इसका सीधा असर बीटी (Bt) कपास या बीटी बैंगन जैसी फसलों पर पड़ेगा।

1. कीटनाशक के रूप में वर्गीकरण: वर्तमान में, जीएम बीजों को मुख्य रूप से ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम’ और बीज नियमों के तहत विनियमित किया जाता है। लेकिन PMB 2025 के तहत, यदि कोई बीज स्वयं कीटों से लड़ने वाला ‘जहर’ (Toxin) पैदा करता है, तो उसे एक ‘कीटनाशक उपकरण’ या स्वयं कीटनाशक के रूप में माना जा सकता है। इसका मतलब यह है कि बीज कंपनियों को अब न केवल बीज मानकों का पालन करना होगा, बल्कि कीटनाशक पंजीकरण समिति (Registration Committee) से भी कड़े सुरक्षा प्रमाणपत्र लेने होंगे।

2. जवाबदेही और नियामक जांच: यदि किसी जीएम फसल के कीटनाशकीय गुणों के कारण मिट्टी के मित्र कीटों (जैसे केंचुए या मधुमक्खियां) को नुकसान पहुँचता है या मनुष्यों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो कंपनी को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा। यह ‘कॉर्पोरेट लायबिलिटी’ (Corporate Liability) के सिद्धांत को मजबूत करता है, जहाँ अब कंपनियां केवल यह कहकर नहीं बच सकतीं कि उन्होंने केवल बीज बेचा है।

किसान हित: मूल्य नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा

भारत में छोटे और सीमांत किसानों के लिए खेती की लागत का एक बड़ा हिस्सा कीटनाशकों और उर्वरकों पर खर्च होता है। विधेयक में ‘मूल्य नियंत्रण’ (Price Regulation) को शामिल करने की मांग किसानों के अस्तित्व से जुड़ी है।

• मूल्य निर्धारण की आवश्यकता: अक्सर देखा गया है कि कीटों के प्रकोप के समय बाजार में कीटनाशकों की कृत्रिम कमी पैदा कर दी जाती है और उन्हें मनमाने दामों पर बेचा जाता है। विधेयक में संशोधन का प्रस्ताव है कि सरकार को आवश्यक वस्तुओं की तरह कीटनाशकों की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) निर्धारित करने का अधिकार होना चाहिए। इससे किसानों को कर्ज के जाल से बचाने में मदद मिलेगी।
• गुणवत्ता का आश्वासन: मूल्य नियंत्रण के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि कम कीमत के नाम पर किसानों को नकली या मिलावटी कीटनाशक न दिए जाएं। इसके लिए ‘ट्रैसेबिलिटी’ (Traceability) यानी कारखाने से खेत तक की निगरानी अनिवार्य की जानी चाहिए।

कीटनाशक जहर राहत कोष: मानवीय संवेदना और न्याय

खेती के दौरान कीटनाशकों के संपर्क में आने से हर साल हजारों किसान और मजदूर बीमार होते हैं या अपनी जान गंवा देते हैं। प्रस्तावित धारा 44A के तहत एक ‘कीटनाशक जहर राहत कोष’ (Pesticide Poisoning Relief Fund) बनाने का सुझाव दिया गया है।

• अनिवार्य मुआवजा: इस कोष का निर्माण कीटनाशक कंपनियों के योगदान से किया जाना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में कीटनाशक के कारण सामूहिक बीमारी या आकस्मिक मृत्यु होती है, तो इस कोष से पीड़ितों को तत्काल राहत मिलनी चाहिए।
• बिना दोष के उत्तरदायित्व (Strict Liability): राहत पाने के लिए किसान को यह साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि कंपनी ने जानबूझकर गलती की है। यदि उत्पाद के उपयोग से नुकसान हुआ है, तो कंपनी को मुआवजा देना ही होगा।

पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श

विधेयक में सबसे बड़ी कमी पारदर्शिता की मानी गई है। वर्तमान में, कीटनाशकों के पंजीकरण की प्रक्रिया बंद कमरों में होती है, जहाँ केवल सरकारी अधिकारी और कंपनी के प्रतिनिधि होते हैं।

• सार्वजनिक परामर्श (Public Consultation): प्रस्तावित सुधारों में यह मांग की गई है कि किसी भी नए कीटनाशक को मंजूरी देने से पहले उसके विष विज्ञान (Toxicology) डेटा को सार्वजनिक किया जाए और किसानों, वैज्ञानिकों व नागरिक समाज से आपत्तियां मांगी जाएं।
• सूचना का अधिकार: किसान को यह जानने का पूरा हक है कि वह जो रसायन अपने खेत में डाल रहा है, उसका मिट्टी और आने वाली पीढ़ियों पर क्या असर होगा। पंजीकरण समिति को अपने हर निर्णय का लिखित कारण और वैज्ञानिक आधार सार्वजनिक पोर्टल पर साझा करना चाहिए।

पर्यावरण-मित्र खेती की ओर कदम

विधेयक का एक मुख्य उद्देश्य “पर्यावरण-मित्र” (Paryamitra) कृषि को बढ़ावा देना होना चाहिए। इसके लिए सुझाव दिया गया है कि:

1. जैव-कीटनाशकों को प्रोत्साहन: नीम, गौमूत्र और अन्य जैविक अर्क पर आधारित कीटनाशकों को पंजीकरण में छूट और सब्सिडी मिलनी चाहिए।
2. राज्यों को अधिकार: चूंकि कृषि राज्य का विषय है, इसलिए राज्य सरकारों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपने पारिस्थितिकी तंत्र के आधार पर किसी विशेष खतरनाक कीटनाशक को प्रतिबंधित कर सकें।

अंततःकीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025 भारत की खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा के बीच एक सेतु बन सकता है। जीएम बीजों की सख्त निगरानी, कीटनाशकों के मूल्यों पर लगाम, और पीड़ितों के लिए तत्काल राहत कोष जैसे प्रावधान इस कानून को वास्तव में ‘किसान-हितैषी’ बनाएंगे। संसद को चाहिए कि वह प्रस्तावित 54 संशोधनों पर गंभीरता से विचार करे ताकि यह विधेयक केवल कागजों पर न रहे, बल्कि खेतों में हरियाली और किसान के जीवन में खुशहाली सुनिश्चित करे। यदि हम आज एक पारदर्शी और जवाबदेह ढांचा तैयार नहीं करते, तो भविष्य की पीढ़ियों को जहरीली मिट्टी और असुरक्षित भोजन विरासत में मिलेगा।

इन दिनों ‘हिन्दू समाज’ और ‘राष्ट्र’ शब्दों का प्रयोग किस अर्थ में होता है

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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

दिल्ली । प्राचीन काल से हिंदू समाज की मुख्य विशेषता जो संसार भर के पर्यटक भी मानते थे और विद्वान तो मानते ही थे, वह यह थी कि यहां समाज की सभी इकाइयां कुल, वर्ण,और आश्रम, श्रेणि, संप्रदाय, आदि बहुत ही व्यवस्थित और बहुत स्पष्ट रूप से प्रतिपादित थे और उनका पालन सुनिश्चित करना स्थानीय पंचायत से लेकर राज्य तक का कर्तव्य सुनिश्चित था। प्रश्न यह नहीं है कि यह अच्छा था या बुरा। उस पर चर्चा अलग से करते रहेंगे। परंतु यह था, इस पर तो सर्वानुमति है। विश्व में सर्वमान्य है।

इसी प्रकार यह भी विश्व में इस समय सर्व ज्ञात है कि यह जो भारत का बचा हुआ क्षेत्र है इसमें एक राज्य नाम की इकाई है वह सुपरिभाषित है। उसकी इकाइयां, उसकी गतिशीलता, उसकी कार्य पद्धति सब कुछ परिभाषित है और विधिक रूप से केवल यह राज्य ही मान्य है। राज्य की तीनों इकाइयां विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका अधिकार संपन्न भी है प्रभुता संपन्न है और विधिक रूप से मान्य है। परंतु इसके अतिरिक्त और कुछ भी स्वतंत्र रूप से विधिक मान्य नहीं है, राज्य के द्वारा जो कुछ मान्य हो वही विधिक रूप से मान्य है इस समय भारत में। जोकि पहले कभी नहीं था। यह बताने का भी उद्देश्य कोई निंदा या प्रशंसा नहीं। मुख्य बात यह है कि ऐसा है। तब ऐसी स्थिति में जो चीज राज्य के स्तर पर और विधि के स्तर पर मान्य ही नहीं है उसको लेकर जो भी संगठन बात करते हैं वह या तो यह घोषणा करें कि शासन उनके अनुकूल होने पर वे उसे मान्यता दिलाएंगे या फिर यह मान लिया जाए कि वह कुछ निरर्थक हवाई बातें करते हैं और उनके जीवन का उस विषय में कोई लक्ष्य नहीं है, कोई प्रयोजन नहीं। ऐसे दो अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द इस समय जो चल रहे हैं, वह हैं राष्ट्र और समाज। विधिक स्तर पर ना तो राष्ट्र की कोई परिभाषा है केवल नेशन स्टेट की ही परिभाषा विधि के स्तर पर है, इसके अतिरिक्त राष्ट्र क्या है यह कोई नहीं जानता और कोई जानता भी हो तो कोई अन्य उसे मानता नहीं है। इसी प्रकार समाज। समाज के विषय में कैसी भीषण अस्पष्टता है, इस पर हम आगे चर्चा करेंगे।

समाज यानी क्या?
यहां मैं भाषा शास्त्र या धातु मूल या शास्त्रीय पद के रूप में इसकी विवेचना नहीं करूंगा। वह अलग से करेंगे ।वह स्वतंत्र विषय है। अभी हम व्यावहारिक राजनीतिक विषय पर चर्चा कर रहे हैं। इन दिनों कोई भी राजनेता जो भाषण आदि में “हिंदू समाज“ शब्द बोलते हैं, वह हिंदू समाज नाम की किसी सत्ता को बिल्कुल नहीं मानते वह हिंदू समाज के विषय में कोई धारणा ही नहीं रखते। जब जैसे लोग हुए, जहां लगता है कि हिंदू समाज शब्द बोल देना चाहिए वहां बोल देते है। यह सब प्रकार से परीक्षण के बाद मैं लिख रहा हूं।

भारत के सभी समकालीन महत्वपूर्ण और गंभीर राजनेता जब समाज शब्द बोलते हैं या संबोधित करते हैं तो वह भारतीय समाज नामक एक काम चलाऊ या काल्पनिक या मनमानी अवधारणा बोलते हैं। वह हर बात भारतीय समाज के लिए बोलते हैं। जिसमें उनके अनुसार हिंदू मुस्लिम ईसाई तथा अन्य लोग हिंदुओं के अन्य अंग जैन बौद्ध सिख आदि तथा जो नवबौद्ध भीमवादी आदि और अन्य अनेक समूह इसी प्रकार के शामिल हैं, उनको ही भारतीय समाज बोलते हैं और संपूर्ण भारतीय समाज के हित या कल्याण का दावा करते हैं। इस प्रकार वे एक ही स्ट्रोक में भारत के इतिहास को शून्य कर देते हैं।

कोई एक हिंदू समाज था जिस पर या तो बाहर से कोई आक्रमण हुआ या भीतर के लोग बदल गए और उसके नाश के लिए प्रयास करने लगे या विदेश से प्रभावित होकर मुसलमान ईसाई आदि बन गए और अपनी एक अलग पहचान बनाने लगे और अपने को एक अलग समाज या कौम कहने लगे और इस कौम को हिंदुओं का प्रतिस्पर्धी घोषित करने लगे और हिंदू पूजा पद्धति जीवन शैली विचार दर्शन सबको अज्ञान या गवाँर पन कहने लगे। इस सब बात को वह सब नेता पचा जाते हैं। केवल यही तक बात रहे तो कोई समस्या नहीं। परंतु फिर ऐसे नेताओं को भारत के इतिहास के विषय में कभी कुछ नहीं बोलना चाहिए। उन्हें बोलने का अधिकार ही नहीं है।

ऐसी स्थिति में जब यह नेता शताब्दियों की गुलामी की बात करते हैं तो वे भाषा के स्तर पर बहुत बड़ा घपला करते हैं और समाज में अंधेरा फैलाते हैं क्योंकि कभी यह बताते नहीं कि कौन गुलाम था? क्या भारत के सब मुसलमान गुलाम थे या भारत के सभी ईसाई गुलाम थे? कौन गुलाम थे?
यह तो वह कभी बताते ही नहीं कि गुलामी से उनका आशय क्या है? क्या कहीं से सेना आकर जीती थी पूरे समाज को या कहीं छलबल से फैल गए थे? गुलामी का क्या अर्थ होता है? संसार भर में गुलामी किसे कहते हैं? कुछ नहीं बताते।

क्या आपकी प्रभुता का हरण करना या आपकी प्रभुता में हिस्सा बटा लेना या आपकी प्रभुता को कुछ कम कर देना गुलामी कहलाता है? यह संसार की किस परिभाषा में गुलामी कहा जाता है?

अभी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विमर्श करते है।

हिन्दू समाज की संरचना का प्रश्नव

इस विषय में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नह है, हिन्दू समाज की संरचना का। हिन्दू समाज की संरचना क्या रही है? इसे जानने के क्या-क्या उपाय हैं? एक तो धर्म शास्त्र हैं। जिनमें मुख्य हैं – मानव धर्म शास्त्र, याज्ञवल्क्य स्मृति, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, महाभारत और वाल्मीकीय रामायण आदि। इनके ज्ञाताओं का परम्परा से एक निश्चित वर्ग रहा है जिसे ब्राह्मण वर्ण कहते है। सभी ब्राह्मण इनके ज्ञाता होते हो, ऐसा कभी रहा नहीं। क्योंकि अन्य सैकड़ो विषय है, जिनके ज्ञाता विद्वान विविध प्रकार के होते रहे है। धर्म विषयों में 15 अगस्त, 1947 तक मुख्य भारतीय क्षेत्र में वेदज्ञ और शास्त्रज्ञ ब्राह्मण ही प्रमाण माने जाते रहे है।

उन्हें प्रमाण कौन मानता था? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्ये और शूद्र चारों ही वर्ण अर्थात सम्पूर्ण हिन्दू समाज। यही परम्परा रही है। कुल, ग्राम, खाप, आदि की पंचायतों में जो भी निर्णय होते थे, वे धर्म शास्त्रों और परम्पराओं के अनुरूप ही होते थे और इनमें अलग से विद्वानों को बुलाने की आवष्यकता सामान्यतः नहीं होती थी, क्योंकि पठन और श्रवण के द्वारा, उपदेश तथा कथा प्रसंगों के द्वारा, कथाओं आख्यानों, गीतों, नाटकों आदि के द्वारा, भागवत पुराण जैसे विराट आयोजनों के द्वारा, मेलों और तीर्थों तथा मठों और मंदिरों में चलने वाले निरंतर सत्संगों और व्याख्यानों एवं कक्षाओं के द्वारा तथा हर गांवों में दो चार विद्वान पंडितों की उपस्थिति और सक्रियता के द्वारा आधारभूत बातें सर्व ज्ञात थी। उनमें कुल, क्षेत्र आदि के स्तर पर बहुत विविधता थी और अद्भूत गतिशीलता थी। यह स्थिति निरंतर चलती रही। ऐसे में शासक द्वारा अलग से कोई समाज संबंधी विधान बनाने का कहीं कोई अवसर ही नहीं था। शासन, गांव और खाप पंचायतों के स्तर पर न सुलझने वाले विवादों पर शास्त्र और परम्पराओं के अनुसार निर्णय देने का ही अधिकारी था।

विक्षेप और आघात

इस्लाम का मध्य एशिया में यानी प्राचीन भारतीय क्षेत्र में कुछ प्रभाव फैलने लगा और भारत के तुरूष्क क्षत्रियों ने बगदाद में खलीफा की गद्दी स्थापित की। मनमानी लूट और मनमाने भोग का प्रचण्ड आकर्षण उस क्षेत्र में प्रभावशाली लोगों में फैला और उसका प्रभाव पारसीक क्षेत्र तक गया। प्रारंभ में खलीफाओं ने संस्कृत साहित्य, गणित, विज्ञान आदि के विद्वान बुलाकर स्थानीय भाषा में अनुवाद कराया। गणित का ज्ञान वहीं से सटे हुए यूरोपीय क्षेत्र में भी फैला। बाद में पारसीक क्षेत्र के सम्पर्क में आने के कारण जहां इस्लाम के उन्माद से उन्मत लोगों ने भयंकर क्रूरताएं की और विनाश किया, जिनसे डरकर प्राण रक्षा करने के लिए बहुत सनातनी विद्वान सूफी बन गये और समर्पण कर दिया। वहीं पहली बार हदीस के नाम पर हजा़रों नियम उपनियम बनाये गये। क्योंकि मूल इस्लाम में न तो आहार विहार संबंधी व्यापक निर्देश है, न परिवार और सम्पत्ति संबंधी और न ही शासन तथा प्रशासन संबंधी। भाषा और व्याकरण की सूक्ष्मताओं का ज्ञान भी पारसीक क्षेत्र में ही था। इसीलिए कुरान के प्रसिद्ध पाठकर्ता आज भी अरब लोग नहीं है। पारसीक और तुर्क लोग ही है। इसी प्रकार कुरान के पाठकर्ताओं में महिला के रूप में इंडोनेशिया की एक महिला ही प्रसिद्ध है, जिसके पूर्वज लगभग 500 वर्ष पूर्व हिन्दू से मुसलमान बने थे।

यहां यह भी स्मरण करने योग्य है कि 11वीं शताब्दी ईस्वी तक पारसीक क्षेत्र में इस्लाम का प्रभाव बहुत ही कम था। यद्यपि पारसीकों का वध 7वीं शताब्दी ईस्वी से ही मुसलमानों ने शुरू कर दिया था यथाशक्ति। तब भी 11वीं शताब्दी के आरंभ तक पारस और खुरासान क्षेत्र हिन्दू और बौद्ध ही था। पारसीक क्षेत्र में ही पहली बार मुसलमानों ने ढल्ले हुए सिक्के देखे। उसके पहले उन्होंने कभी सिक्के देखें हीं नहीं थे। उन सिक्कों को छीन कर मुस्लिम गुडें उन पर बिस्मिल्लाह टंकित करने लगे। तुर्कों और अरबों में पहले भीषण युद्ध था और बाद में तुर्कों और पारसीकों में युद्ध हुआ। जब तुर्कों ने अरबों को गुलाम बना लिया तब से खलीफत बगदाद में स्थापित हो गई। जिसे 20वीं शताब्दी ईस्वी में अग्रंजों ने तोड़ा। उन्होंने ही उसमान साम्राज्य को खण्ड-खण्ड करके दर्जनों मुस्लिम राज्य बना दिये और सऊद घराने के जागीरदार को अरब क्षेत्र का मालिक बना दिया तथा उसका नाम उसके घराने के नाम पर सऊदी अरब रख दिया।

तुर्कों और पारसीकों की लड़ाई में तुर्क जीते और पारसीक सभ्यता को नष्ट कर दिया, परन्तु उनके अनेक महत्वपूर्ण प्रत्यय तुर्कों ने अपना लिया – शाह, बादशाह, पातिशाह आदि पारसीक शब्द ही है जो मुख्यतः भारतीय उपधियां है। इसी प्रकार नमाज भी नमन और नमस्कार के पर्याय के रूप में पारसीक शब्द है। मूल अरबी शब्द है – सलात। खुदा भी पारसीक शब्द है, जिसका अर्थ है हृदय में विराजे परमेश्वार। यह अल्लाह से नितांत भिन्न है।
इस प्रकार पारसीक क्षेत्र में प्रभावी होने के बाद मुसलमानों के प्रभाव में अनेक भारतीय क्षेत्रों में कतिपय लोग आने लगे और वे मनमानी लूटपाट तथा भोग विलास को मजहब कहने लगे। भारत में इस्लाम की आड़ में इसी प्रकार के लोग फैले है। अतः भारत में जो इस्लाम है वह उसमान के साम्राज्य के इस्लाम से बिल्कुल अलग है। वह सनातन धर्म से घृणा करने वाले विद्रोहियों का मजहब है। अंग्रेजों ने और उसे अधिक उन्मत्त बनाकर हिन्दुओं के समूल विनाष की घोषणा करने वाला एक पंथ बना दिया। गांधी जी ने ऐसे मुसलमानों को बढ़ावा देने का काम अंग्रेजों की नीति के अनुसार ही किया।
अंग्रेजों ने याचक बनकर भारत के राजाओं और जागीरदारों से दया दृष्टि की विनती की और धीरे-धीरे हिन्दू समाज तथा भारतीय क्षेत्र की जानकारी एकत्र कर छल-बल से यहां ईसाइयत फैलाने लगे। जिसका गांधीजी तक ने प्रचण्ड विरोध किया है और कहा है कि स्वतंत्र भारत में सनातन धर्म की छिनैती करने (कन्बर्जन) का अधिकार मिशनरियों को नहीं होगा। क्योंकि प्रबुद्ध अंग्रेज भी यह नहीं चाहते थे। इसका प्रमाण यह भी है कि स्वयं इंग्लैण्ड में आज ‘‘बिलीविंग क्रिश्चियन’’ 20 प्रतिशत ही है।

जवाहरलाल नेहरू अंग्रेजों के और ईसाइयत के परम प्रशंसक थे इसलिए सत्ता हस्तांतरण की शर्तों में उन्होंने बहुत ही गलत बातें मंजूर की। तब से आज तक ईसाई मिशनरियों को भारत की हर पार्टी सनातन धर्म की छिनैती की सभी सुविधाएं देती आयी है।

ऐसे में भारतीय समाज के नाम से यदि आप सनातन धर्म के पूर्ण विरोधी समुदायों को भी भारतीय समाज का ही समान अंग घोषित करते है तो आप की भारतीय समाज के विषय में धारणा बिना कोई घोषणा किये हिन्दू धर्म की विरोधी हो जाती है। क्योंकि हिन्दू धर्म के विनाष के लिए सार्वजनिक रूप से उद्घोष करने वाले समुदायों को आप सम्मान दे रहे है।

हिन्दू समाज के भीतरी मामले

हिन्दू समाज की रक्षा का कोई भी आश्वासन भारत की कोई बड़ी राजनैतिक पार्टी नहीं देती। परन्तु हिन्दू समाज को सुधारने की ललक हर पार्टी के भीतर है। इस सुधार का क्या अर्थ है, इस पर भी कोई स्पष्ट प्रकाश आज तक नहीं डाला गया है। कुछ लोगों के अनुसार जाति व्यवस्था का सम्पूर्ण नाश हिन्दू समाज का सुधार है, तो कुछ के अनुसार कतिपय जातियों को जिन्हें वे अनुसूचित जाति, जनजाति और ओ.बी.सी. कहते है, विशेष संरक्षण देकर शेष हिन्दुओं का दमन करना हिन्दू समाज का सुधार है। परन्तु ऐसी कोई भी बात अंग्रेजों से लड़ते समय किसी ने नहीं कही थी। ऐसी कोई भी बात 1947 ईस्वी तक किसी भी परम्परागत हिन्दू राजाओं और हिन्दू धर्माचार्यों ने नहीं कही थी।

अब प्रश्नग यह है कि जो हिन्दू जाति को एक सामान्य सहज और मर्यादित व्यवहार संस्था माने, उसे नष्ट करना राज्य का कर्तव्य किस आधार पर हो गया। तो इसके लिए शासक लोग इन नेताओं का नाम लेते है – डॉ. भीमराव राम जी अम्बेड़कर, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण। इस प्रकार इन चार प्रमुख नेताओं को हिन्दू समाज के विषय में सर्वाधिकार प्राप्त है, इसकी अनुमति परम्परागत हिन्दू समाज से किसी शासन ने कभी नहीं ली है। हिन्दू समाज की मुख्य धारा के लिए ये चारों सर्वमान्य नेता भी नहीं है। जवाहरलाल नेहरू अवश्य लोकप्रिय हुए, परन्तु पहले एक धनी परिवार के देशभक्त युवक के रूप में लोकप्रिय हुए और फिर प्रधानमंत्री के रूप में शासन के बल से प्रचारित और विज्ञापित किये गये। लोहिया और जे.पी. बहुत थोड़े समय लोकप्रिय रहे और उन्हें हिन्दू समाज ने अपना कोई धर्म त्राता कभी नहीं माना। उन्हें एक नैतिक व्यक्ति ही मानते रहे जो राजनीति में कुछ सुधार करना चाहते है। समाज सुधारक इनको कभी नहीं माना गया। अम्बेड़कर को मुश्किल से दो से तीन प्रतिशत लोग अपना धर्म त्राता मानते रहे है और उनकी संख्या बढ़ रही है। इन सब से अधिक मान्यता गांधीजी की थी परन्तु गांधीजी ने कभी भी जाति नाश या वर्ण नाश की बात एक बार भी नहीं कहीं।

इस प्रकार राजनेताओं द्वारा हिन्दू समाज के सुधार की जिम्मेदारी अपनी मान लेना एक जबरिया काम है। इसके लिए उन्हें चुनाव के समय सबसे अधिक यही मुद्दा उठाना चाहिए कि हम हिन्दू समाज की परम्परागत व्यवस्था के नाश के लिए चुनाव लड़ कर विधायिका में जाना चाहते है। परन्तु यह कहने का साहस आज तक किसी ने नहीं दिखाया है। नरेन्द्र मोदी जी ने भी नहीं।

हिन्दू समाज के लिए अथवा हिन्दू संगठन के लिए कार्यरत किसी भी संगठन ने खुलकर अपना यह एजेंडा आज तक घोषित नहीं किया है कि वे हिन्दू समाज की परम्परागत संरचना का समूल नाश करने के लिए समर्पित है और इसे ही हिन्दू संगठन का प्रमुख कार्य मानते है। उन्हें अपने स्वयंसेवकों को यह तथ्य बताना चाहिए और यह प्रतिज्ञा करानी चाहिए कि ‘‘मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि हिन्दू समाज की परम्परागत संरचना को तोड़-फोड कर नष्ट भ्रष्ट कर डालने के लिए तन-मन-धन से जीवन भर सक्रिय रहूँगा। यहीं मेरा व्रत है।’’

जब तक सत्य निष्ठा से ऐसी घोषणा नहीं की जाती और इसी दिशा में काम होता रहता है, तब तक उसे छल माना जायेगा। उसे न तो हिन्दू संगठन का कार्य कहा जायेगा और न ही हिन्दू समाज की सेवा।

विषेष बात यह है कि एक ओर ये लोग भारत के सभी समुदायों को भारतीय समाज कहते है। दूसरी ओर इस्लाम के अनुयायी समाज की परम्परागत संरचना अथवा ईसाइयों की परम्परागत संरचना में आधारभूत परिवर्तन के लिए कार्य करते नहीं देखे जाते और न ही ऐसे कार्य को अपना लक्ष्य बताते। तो क्या हिन्दू समाज को पूरी तरह से पलट कर बदल देना ही उनके जीवन का लक्ष्य है। अगर है तो इसे खुल कर कहने का साहस दिखाना चाहिए। यह नैतिक आवश्यतकता है। ऐसी विचित्र क्रियाओं को हिन्दू समाज की सेवा या हिन्दू संगठन का कार्य बताते हुए सक्रिय रहना व्यक्ति की नैतिकता पर प्रश्‍न उपस्थित करता है।

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