क्या सनातन का विरोध और अपमान ही सेक्युलर राजनीति है ?

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दिल्ली । भारत विभाजन के साथ मिली स्वाधीनता से कोई सबक न लेते हुए भारत की राजनीति आज तक तुष्टिकरण के आधार पर चलती रही है। मुस्लिम वोट बैंक को प्रसन्न करने के लिए तथाकथित समाजवादी लालू ने सम्मानित नेता आडवाणी जी को जेल में डाल दिया और एक कदम आगे बढ़ते हुए मुलायम सिंह ने निहत्थे रामभक्तों को गोलियों से भुनवा दिया, कांग्रेस साम्प्रदायिक हिंसा बिल ले आई वो तो भला हो उस समय विपक्ष में होने के बाद भी भाजपा ने इसे पारित होने से बचा लिया। मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण ही पाकिस्तान को सटीक उत्तर देने की जगह अमन का तमाशा किया जाता रहा। मात्र इतना ही नहीं मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए भारत की सनातन संस्कृति को अनेकानेक प्रकार से चोट पहुंचाई जाती रही । वर्ष 2014 में केन्द्रीय नेतृत्व प्रदान करते हुए नरेन्द्र मोदी जी ने तुष्टिकरण के कारण सनातन संस्कृति को हुई क्षति की भरपाई करने के प्रयास किए हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद एक बार फिर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले दल और अधिक कटु होकर सनातन हिंदू धर्म पर प्रहार कर रहे हैं । रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को उनकी दो दिवसीय भारत यात्रा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने श्रीमद्भगवद्गीता का रूसी अनुवाद भेंट किया। इसको देखकर कांग्रेस और वामपंथी दलों ने न केवल प्रधानमंत्री वरन श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग करते हुए इसका विरोध किया। कांग्रेसियों ने गीता के लिए माल शब्द का प्रयोग किया जो एक अक्षम्य अपराध है ।

वर्ष 2026 में पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव हैं अतः इन दो प्रान्तों में सनातन प्रतीकों तथा हिन्दू समाज को अपमानित करने का कार्य भी सबसे अधिक और सबसे तेजी से हो रहा है। पश्चिम बंगाल में वहां के तृणमूल विधायक हुमायूं कबीर ने गुलामी की मानसिकता से ग्रसित होकर बाबर के नाम की एक मस्जिद की आधारशिला रखी और प्रशासन चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि इस हरकत को मुख्यमंत्री का मौन समर्थन था। उसकी देखादेखी बिहार और तेलंगना में भी कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं ने बाबरी नाम की मस्जिद व स्मारक बनाने का ऐलान करके साप्रंदायिक तनाव बढ़ाने का काम आरम्भ कर दिया है। इस बाबरी भूत को वह सभी दल प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से समर्थन दे रहे हैं जिनकी राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण से चलती है और जो संविधान की किताब हाथ में लेकर घूमते हैं ।

उत्तर प्रदेश में सपा मुखिया सपरिवार शौर्य दिवस को सलीम चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाकर हिन्दुओं को चिढ़ाते दिखे । सपा मुखिया का तुष्टिकरण में संलिप्त यह कृत्य जनता समझ रही है। सपा मुखिया समय समय पर ऐसे बयान देते रहते हैं जिससे सनातन हिन्दू समाज आहत हो। महाकुंभ से लेकर लेकर अयोध्या के दीपोत्सव तक उन्होंने हिन्दू परम्पराओं का उपहास करते हुए उन्हें ढोंग बताया।

वहीं कांग्रेस ने तो हिदू सनातन आस्था के सभी केन्द्रों का अपमान करने की सुपारी ही ले रखी है। कर्नाटक में तो मुस्लिम तुष्टिकरण का खुला खेल चल ही रहा है। हिमाचंल प्रदेश कि कांग्रेस सरकार मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह “सुक्खू “ को हिंदू बच्चों के राधे -राधे बोलने पर आपत्ति है। तेलंगाना के कांग्रेस मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी लगातार सनातन और हिंदुओं के विरुद्ध आग उगल रहे हैं। रेवंत रेड्डी ने हिंदुओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि हर व्यक्ति और हर काम के लिए एक अलग भगवान होता है। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा हिंदू कितने भगवानों को मानते हैं ? तीन करोड़ हैं, इतने सारे क्यों हैं? जो लोग अविवाहित हैं उनके लिए एक भगवाण है हनुमान, जो लोग दो शादी करते हैं उनके लिए अलग भगवान हैं और जो लोग शराब पीते हैं व मुर्गी खाते हैं उनके लिए अलग भगवान हैं। हर ग्रुप का अलग भगवान है। रेड्डी के बयान से हिंदुओं की भावनाओं का आहत होना स्वाभाविक था । हिंदू संगठनों ने मुख्यमंत्री से माफी मांगने को कहा किंतु मुस्लिम परस्त रेवंत रेड्डी अपने बयान पर कायम हैं ।

उधर तमिलनाडु में भगवान मुरुगन के मंदिर में दीप जलाने को लेकर द्रमुक सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए न्यायालय की भी अवहेलना कर रही है। तमिलनाडु से ही हिन्दू और सनातन समाज को डेंगू -मलेरिया जैसे रोगों की संज्ञा दी जाती रही है।

आश्चर्य की बात ये है कि सनातन हिन्दू धर्म का अपमान करने वाली इस राजनीति को “सेक्युलर” कहा जाता है। छद्म धर्मनिरपेक्षता का ये खेल लम्बा चल चुका है अब इसे समाप्त होना ही होगा।

सरकारी जमीनों पर बने हैं चर्च, तो क्यों नहीं हो रही कार्रवाई?

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रवि पाराशर

दिल्ली । भारत में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के बुनियादी ढांचे का सर्वाधिक निर्माण ब्रिटिश शासन काल में हुआ। ईसाई धर्म को तत्कालीन सरकार का सीधा संरक्षण प्राप्त था, इसलिए कन्वर्जन को धार्मिक कर्तव्य मानने वाली मिशनरी की राह में कोई बड़ा रोड़ा नहीं था। हालांकि स्वतंत्रता के बाद भी मिशनरी की कन्वर्जन मुहिम में कमी नहीं आई और अब तो इसके लिए नए-नए हथकंडे भी अपनाए जा रहे हैं।

ब्रिटिश काल में अंग्रेज शासन चर्चों के लिए बड़े-बड़े भूखंड आसानी से मिशनरी को लीज पर दे देता था। लेकिन स्वतंत्र भारत में भी चर्च अथॉरिटी सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे जारी रखे हुए है। पिछले दिनों दिल्ली, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु से इस तरह के कई समाचार मिले कि सरकारी जमीन पर या तो चर्च बना लिए गए हैं या फिर ईसाई धर्म से जुड़े प्रतीकों का निर्माण कर लिया गया है और इस तरह स्थानीय शुभचिंतकों के सहयोग से कन्वर्जन का काम धड़ल्ले से जारी है।

ब्रिटिश शासन में चर्चों और ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार से जुड़े दूसरे भवनों के निर्माण और दूसरे कार्यों के लिए खाली जमीनें निश्चित समयावधि के लिए लीज पर दी गई थीं। बहुत से मामलों में समय बीत जाने के बाद न तो लीज का नवीनीकरण कराया गया, न ही सरकार को कब्जा वापस सौंपा गया। बेसुध सरकारी अधिकारियों ने भी कोई सुध नहीं ली या फिर भ्रष्टाचरण के कारण मामले दबा दिए गए। जानकारी नहीं होने के कारण कोई सामाजिक आंदोलन भी इसके विरोध में नहीं हुआ। इस तरह स्वतंत्रता के बाद से अभी तक चर्च भारत में सबसे बड़ा भूमि घोटाला कर चुका है और इसकी कहीं चर्चा भी नहीं है। ब्रिटिश काल से ही जमीनें आवंटित होते आने के कारण भारत में चर्च सर्वाधिक भूमि स्वामित्व रखने वाली सबसे बड़ी गैर-सरकारी संस्था है।
चर्च ने सिर्फ सरकारी जमीनें ही नहीं हड़पीं, बल्कि मंदिरों की भूमि पर भी अवैध कब्जे किए। दूसरे कामों के लिए आवंटित जमीनों पर भी चर्च की दृष्टि रही है। तमिलनाडु के तिरुनेलवेली पहाड़ी क्षेत्र में सातवीं शताब्दी के तिरुमलापुरम शिव मंदिर के क्षेत्र में एक ऊंची चट्टान पर चर्च बना दिया गया। इस प्राचीन मंदिर की देख-रेख आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पास है, लेकिन ईसाई मिशनरी ने चट्टानी इलाके पर अतिक्रमण कर लिया है।

आंध्र प्रदेश में मिशनरी माफिया ने गुंटूर जिले के ऐडिलापुडु गांव में एक ऊंची पहाड़ी पर नियम विरुद्ध विशाल क्रॉस का निर्माण कर लिया है। जानकारों के अनुसार जहां क्रॉस बना है, उस क्षेत्र को सीता पादुका कहा जाता है और वहां बहुत से आस्तिक हिंदू परिवार विवाह की रीति संपन्न करते हैं।

कहीं-कहीं सनातन समाज ने मिशनरी के अतिक्रमण पर सामूहिक प्रतिरोध भी किया है। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के मदनपुर गांव में करीब दो दशक पहले बने कंक्रीट के विशाल क्रॉस को अक्टूबर, 2021 में ढहा दिया गया। उससे करीब 200 मीटर दूर मंदिर का निर्माण कर दिया गया। छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम इस बात की पुष्टि करता है, लेकिन क्रॉस ढहाने का काम किसने किया, यह उसे नहीं पता। क्रिश्चियन फोरम ने माना कि जहां क्रॉस बनाया गया था, वह जमीन आधिकारिक रूप से चर्च के स्वामित्व में नहीं है। फिर भी 20 साल पहले वहां ईसाई धार्मिक चिन्ह बनाकर कर्मकांड शुरू कर दिया गया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जमीन घोटाले की चर्च की प्रवृत्ति पुरानी है और सुनियोजित तरीके से यह काम किया जा रहा है।

तिरुवनंतपुरम स्थित पेप्पारा वन्यजीव अभयारण्य के एक हिस्से में ईसाई संप्रदाय ने क्रॉस लगा कर तीर्थस्थल बनाने की कोशिश की थी। इसे ले कर ईसाईयों, वन अधिकारियों और आदिवासी समुदायों के बीच विवाद खड़ा हो गया था। केरल हाईकोर्ट के जस्टिस एन. नागरेश की सदस्यता वाली पीठ ने व्यवस्था दी कि किसी भी धार्मिक समुदाय को आरक्षित वन भूमि के अंदर किसी भी स्थान पर तीर्थाटन करने की अनुमति नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर लोगों का कोई समूह जबरदस्ती आरक्षित वन क्षेत्र में घुसता है और गैर-कानूनी रूप से कोई संरचना तैयार करता है, तो वन अधिकारियों को कानून के अनुसार ऐसी संरचना को हटाना चाहिए चाहिए और इस संबंध में कार्रवाई करनी चाहिए। ये मामला करीब चार साल पुराना है।

ऐसे और बहुत से मामलों की जानकारी देश भर से मिलती रहती है। खास तौर पर इस तरह की घटनाएं जनजातीय क्षेत्रों में ज्यादा घट रही हैं। हालांकि अब सनातन समाज में जागरूकता बढ़ने की वजह से ऐसे बहुत से मामलों में कानूनी कार्रवाई का दायरा बढ़ता जा रहा है। फिर भी केंद्र और राज्य सरकारों को देश भर में सर्वे करा कर यह पता लगाना चाहिए कि चर्चों के पुराने भवन और उनके कब्जे वाले भू-भाग पर लीज की अवधि खत्म तो नहीं हो गई है और अगर उसका नवीनीकरण नहीं हुआ है, तो कानूनन उस पर कब्जा वापस लिया जाना चाहिए।

वंचितों के साथ खड़े हो कर विफल किए जा सकते हैं कन्वर्जन के षड़्यंत्र!

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रवि पाराशर

दिल्ली । भारत में कन्वर्जन को लेकर विश्व हिंदू परिषद और दूसरे समान विचारों वाले संगठनों के सतत प्रयासों के कारण बन रहे जागरूकता के वातावरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। ऐसे में मतांतरण को धार्मिक कर्तव्य मानते हुए हिंदू समाज को आक्रांत करने के लिए निंदनीय हथकंडे अपनाने वाले कट्टरपंथी जिहादियों ने भी षड्यंत्र तेज कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर के बर्रा थाना क्षेत्र में साल 2021 में जो घटनाक्रम प्रकाश में आया, उसे षड्यंत्र के कुछ-कुछ नए स्वरूप के तौर पर समझा जा सकता है।

कन्वर्जन के दुर्जन आमतौर पर दूरदराज के उन इलाकों में खुल कर साजिशें रचते रहे हैं, जहां हिंदुओं की अपेक्षा मुस्लिम आबादी अधिक है। ऐसे स्थानों पर वे सबसे पहले अशिक्षित, दलित और कमजोर वर्गों के परिवारों की लड़कियों को निशाना बनाते हैं। ऐसे परिवार भी उनके निशाने पर होते हैं, जिनके भरण-पोषण और सुरक्षा का दायित्व किसी कारणवश महिलाओं पर ही होता है। संबल नहीं होने के कारण महिलाएं डर कर झुक जाती हैं या बाल-बच्चों के साथ पलायन के लिए विवश हो जाती हैं। दोनों ही सूरतों में षड्यंत्रकारी सफल हो जाते हैं। दूरदराज के क्षेत्रों में घटित ऐसे मामले मीडिया की पहुंच से दूर रहते हैं या मीडिया उन तक नहीं पहुंचता। पुलिस भी अक्सर कमजोर की सहायता नहीं करती।

कानपुर के बर्रा थाना क्षेत्र में हुई घटना से यह स्पष्ट हो गया है कि मतांतरण के षड्यंत्रकारियों का नया पैंतरा यह है कि अब वे शहरी क्षेत्रों में भी खुलेआम अपने काले मंसूबों को अंजाम देने में हिचक नहीं रहे हैं। एक दलित हिंदू महिला ने तब आरोप लगाया था कि मुस्लिम समुदाय के लोग उस पर अपनी दो नाबालिग बेटियों समेत कन्वर्जन के लिए दबाव बना रहे हैं। उसे 20 हजार रुपये का लालच भी दिया गया। जब उसने साफ इनकार कर दिया तो, उसे परेशान किया जाने लगा। यहां तक कि उसकी बेटियों से छेड़छाड़ तक की गई।

पुलिस ने समय पर कार्रवाई नहीं की, तो बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पीड़ित की सहायता का प्रयास किया, किंतु इस दौरान एक मुस्लिम व्यक्ति के साथ हुई छिटपुट मारपीट के कारण कुछ युवाओं को गिरफ्तार कर लिया गया। अब मूल मसला हाशिये पर चला गया और बजरंग दल को हिंदू युवकों के लिए न्याय की मांग पर आंदोलन करना पड़ा। अवसर देख कर मुस्लिम हितों की राजनीति का दम भरने वाले असदुद्दीन ओवैसी ने गिरफ्तार किए गए युवाओं को कट्टरपंथी हिंसक अपराधियों की संज्ञा दी। उधर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इसे भारतीय जनता पार्टी के उकसावे में की गई कार्रवाई करार देते हुए लोकतंत्र के लिए शर्मनाक घटना बताया था। पूरे मामले में पक्ष-विपक्ष की राजनीति हावी हो गई। जो पीड़ित महिला मतांतरण के लिए दबाव डालने का आरोप मीडिया के कैमरों के सामने लगा रही थी, उसे न्याय मिलने की बात नेपथ्य में चली गई।

कुल मिला कर जिस पुलिस को महिला की सहायता नहीं करने पर फटकार लगनी चाहिए थी, वही पुलिस उसके समर्थन में खड़े हुए पक्ष पर कानूनी कार्रवाई करने में लगी रही। यहां बड़ा प्रश्न यह है कि यदि बजरंग दल के कार्यकर्ता महिला के पक्ष में खड़े होने में विलंब करते और मतांतरण के लिए दबाव डालने वाले असामाजिक लोग उसके या उसकी नाबालिग बच्चियों को सबक सिखाने के लिए कोई जघन्य हिंसक वारदात कर डालते, तब क्या होता? और तब क्या होता, जब पुलिस और समाज से कोई सहायता न मिलने पर पीड़ित महिला दबाव में आ कर मजबूरन कन्वर्जन कर लेती? दोनों प्रश्नों के उत्तर हमें अवश्य खोजने चाहिए।

प्रश्न यह भी बड़ा है कि क्या कानपुर की कच्ची बस्ती की पीड़ित दलित महिला का हश्र बिहार के बेगूसराय जिले के डंडारी थाना क्षेत्र में महादलित परिवार की नाबालिग बेटी के साथ हुए बलात्कार जैसा नहीं हो सकता था? बिल्कुल हो सकता था। बेगूसराय जिले में आठ अगस्त, 2021 को दो मुस्लिम युवकों ने महादलित परिवार की बेटी के साथ बलात्कार किया। रिपोर्ट दो दिन बाद लिखी गई। यह वारदात दूरदराज के इलाके में हुई। बजरंग दल ने तत्काल पीड़ित के लिए न्याय की आवाज उठाई। न तो मीडिया में यह मामला सुर्खियां बना, न ही ओवैसी या अखिलेश यादव ने इसका विरोध किया। क्या यही अवसरवादी राजनैतिक संवेदनशीलता है?

कुल मिला कर नया ट्रेंड यह है कि अब शहरी क्षेत्रों में भी कमजोरों पर मतांतरण के लिए दबाव डाला जाए। मंसूबा पूरा हो जाए, तो ठीक और अगर फंस जाओ तो मुस्लिम हितों की राजनीति करने वाले बड़े नेता तो बचाव में आ ही जाएंगे। ओवैसी बिहार में महादलित नाबालिक लड़की से हुए रेप के मामले में कुछ इसलिए नहीं बोले, क्योंकि पीड़ित लड़की हिंदू है और बिहार में विधानसभा हो चुके थे। ओवैसी और अखिलेश यादव कानपुर के मामले में इसलिए बोले, क्योंकि यूपी में तब विधानसभा चुनाव होने थे। महादलित हिंदू महिला को न्याय मिले, इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं, हां, मुस्लिम आरोपितों का हर हाल में बचाव करना है, क्योंकि उनके वोट लेने हैं।

देश भर से ऐसे समाचार आने लगे हैं कि कन्वर्जन को जन्नत की सीढ़ियां मानने वाले कुत्सित वृत्ति के लोग आमतौर पर धोखे का आवरण तान कर भोली-भाली हिंदू लड़कियों को बहलाने-फुसलाने में लगे हैं। लेकिन क्योंकि अब विहिप जैसे संगठन के जन-जागरण अभियानों के कारण सनातन समाज अधिक चौकन्ना हो रहा है, इसलिए लव जिहाद के ऐसे बहुत से मामले अंजाम तक पहुंचने से पहले ही नाकाम होने लगे हैं। फिर भी इस दिशा में अभी बड़े पैमाने पर जन-जागरण की आवश्यकता है। दलित समुदाय और कमजोर वर्ग की नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। नाबालिग लड़कियां अपना अच्छा-भला ठीक तरह से नहीं सोच सकतीं, उनके परिवारों को समुचित सामाजिक संरक्षण भी प्राप्त नहीं है, इसलिए उन्हें बरगलाना आसान है।

देखने में आ रहा है कि मतांतरण के लिए दबाव दो प्रकार से डाला जा रहा है। एक तो हिंदू लड़कियों को धोखे से बहला-फुसला कर शादी या शादी के झांसे के नाम पर उनसे यौन संबंध बना लो और फिर राज खुल जाने पर लोकलाज का भय दिखा कर उन्हें चुपचाप मतांतरण के लिए विवश कर दो। दूसरा तरीका यह भी है कि पहले बलात्कार करो और फिर इज्जत के नाम पर मतांतरण करा कर लड़की से शादी कर अपनी गर्दन बचा लो। ऐसे बहुत से मामलों की चर्चा व्यापक स्तर पर नहीं हो पाती। बहुत से ऐसे मामलों की शिकायत पुलिस तक नहीं पहुंचती। पहुंचती है, तो शिकायतें दर्ज नहीं होतीं। कथित मुख्यधारा के मीडिया का दृष्टिकोण भी ‘सिलेक्टिव’ रहता है।

यह वाकया भी साल 2021 का है। उत्तर प्रदेश के बरेली में बीए की एक हिंदू छात्रा के माता-पिता ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी का अपहरण पांच अगस्त, 2021 को मुस्लिम लड़के ने कर उसका जबरन कन्वर्जन करा दिया है। इतना ही नहीं, आरोपित उन पर भी कन्वर्जन के लिए दबाव डाल रहा था, डरा-धमका रहा था। यह तीसरा तरीका है। हो सकता है कि समाज से व्यापक समर्थन नहीं मिलने पर और बेटियों की जान की रक्षा के लिए ऐसे पीड़ित माता-पिता भी धर्म बदलने की सोचने लगें और एक दिन ऐसा करने को मजबूर हो जाएं। उस वक्त तो पीड़ित और असहाय माता-पिता ने अपने घर पर ‘बिकाऊ है’ लिख दिया था और मामले का संज्ञान मीडिया ने भी लिया था।

सोचने वाली एक बात यह है कि हिंदू लड़कियों को धोखे से फंसा कर कोई मुस्लिम लड़का उनसे शादी कर लेता है, तो क्या ऐसा करना सामान्य प्रेम विवाह की श्रेणी में आ सकता है? न तो कानून के हिसाब से, न ही समाज के हिसाब से इसे मान्यता दी जा सकती है। ऐसा करना अपराध की श्रेणी में ही आएगा। लेकिन ऐसी शादियां होने के बाद लड़की पर मतांतरण के लिए दबाव बढ़ जाता है और लड़की या उसके परिवार की इच्छा के विरुद्ध होते हुए भी अधिकांश मामलों में ऐसा ही होता भी है। इस तरह के नियम विरुद्ध कथित विवाह मुस्लिम लड़के ही अधिक करते हैं।

ऐसा कोई विरला मामला ही सामने आता है कि कोई हिंदू लड़का अपनी पहचान मुस्लिम बना कर किसी मुस्लिम लड़की से धोखा दे कर शादी रचाए। यदि भारतीय समाज में यह प्रचलित चलन होता, तो हिंदू लड़कों के मुस्लिम लड़कियों से शादी करने और उनका मतातंरण करने के मामले भी बहुतायत में सामने आने चाहिए थे। किंतु ऐसा नहीं होता, इसलिए यह स्पष्ट है कि ‘लव जिहाद’ बाकायदा छद्म धार्मिक कर्तव्य या कहा जाए कि षड्यंत्र के तौर पर किया जा रहा है। धोखा देना किसी धर्म की शिक्षा नहीं हो सकती है। अगर है, तो फिर ऐसे धर्म पर लानत है!

भारतीय संस्कृति नारी को पूज्य और आराध्य मानती है। नारी देवी है। नारी हिंदू समाज की मान-प्रतिष्ठा, आदर का प्रधान मानक होती है। सनातन परंपरा देव से पहले देवी का स्मरण करती है, पूजा करती है। पहले सीता फिर राम, पहले राधा फिर कृष्ण इत्यादि। हालांकि हिंदू समाज में भी महिलाओं के प्रति संकुचित विचार रखने वाले पथभ्रष्ट लोग हैं। किंतु आदर्श स्थिति यही कि सभी समाजों में नारी को सम्मान मिलना चाहिए।

दुर्भाग्य से कट्टरपंथी मुस्लिम समाज में जिहादी मानसिकता के पथभ्रष्ट लोगों द्वारा हिंदू महिलाओं को निशाना बनाने के षड़्यंत्र अधिक रचे जा रहे हैं। विशेषकर गरीब, बेसहारा और कमजोर वर्ग की महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है। यह षड़्यंत्र मुद्दत से चला आ रहा है, लेकिन अब विहिप जैसे संगठनों की सक्रियता के कारण सनातन समाज जागरूक हुआ है और बहुत से मामले प्रकाश में आ रहे हैं, जिनका हरसंभव प्रतिकार किया जा रहा है।

हिंदू महिलाओं की अस्मिता तार-तार कर धार्मिक आधार पर आत्मतुष्टि की भावना से भरने की मानसिकता आज की बात नहीं है। वर्ष 1992 में राजस्थान के अजमेर में जो कांड सामने आया, वह आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। अजमेर के एक स्कूल में पढ़ने वाली हिंदू लड़कियों को संगठित रूप से षड़्यंत्र रच कर जिस तरह सैक्स रैकेट में फंसाया गया, उसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। पहले एक लड़की को धोखे से एक फार्म हाउस में बुला कर उसे बेहोश कर अश्लील तस्वीरें खींची गईं। फिर उसे ब्लैकमेल कर उसके माध्यम से दूसरी लड़कियों के साथ भी यही किया गया।

अजमेर कांड में सैकड़ों हिंदू लड़कियों को षड़्यंत्र की श्रृंखला का शिकार बनाया गया। उनकी तस्वीरें और वीडियो आम करने की धमकियां दे कर उन्हें बार-बार अनैतिक काम के लिए विवश किया गया। इस कांड में कांग्रेस के कई नेता, सरकारी अफसर और अजमेर दरगाह के कई खादिमों के लड़के शामिल थे। मुख्य कांड के मुख्य आरोपित थे यूथ कांग्रेस के तत्कालीन नेता फारूक चिस्ती, नफीस चिस्ती और अनवर चिस्ती। मामला प्रकाश में आने के बाद एक ही स्कूल की कई लड़कियों ने आत्महत्या कर ली थी। बहुत से परिवार अजमेर छोड़ कर चले गए थे, लेकिन बहुत से अपराधी पकड़े ही नहीं गए।

ऐतिहासिक संदर्भों में भी हमने पढ़ा है कि मुस्लिम आक्रांताओं का प्राथमिक उद्देश्य संपत्ति की लूटपाट और निरंकुश शासन के साथ सनातन हिंदू अस्मिता को तार-तार करना था। इसके लिए आक्रमणकारियों ने भारतीय स्त्रियों के अपमान को मुख्य माध्यम बनाया। यही कारण जौहर जैसी परंपराओं का जनक बना। यह षड़्यंत्र आज भी लव जिहाद जैसे दूसरे घ्रणित रूपों में जारी है, जिसका कड़ा प्रतिकार हमें सामाजिक विमर्श को प्रबल बना कर विधिसम्मत माध्यमों से करना चाहिए।

अपराध के आंकड़े जुटाने वाली संस्था नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी ऐसी कोई सूची नहीं बनाती, जिससे यह पता चले कि देश में लव जिहाद के कितने केस हो रहे हैं। हालांकि सच्चाई है कि रेप के केस सभी धर्मों की महिलाओं के साथ होते हैं और किसी भी ऐसी वारदात को धर्म के आधार पर गंभीर और कम गंभीर की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। सभी धर्मों की बेटियां भारत की बेटियां हैं। लेकिन अगर एनसीआरबी जाति और धर्म के आधार पर ऐसे आंकड़े जुटाए, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।

अब यदि कुछ राजनैतिक पार्टियां जाति आधारित जनगणना की पुरजोर हिमायत करती हैं, तो फिर अपराध के आंकड़े भी जाति और धर्म के आधार पर जुटाए जाएं, तो क्या परेशानी है? ऐसा होने पर वस्तुस्थिति स्पष्ट तौर पर सामने आ सकती है।

वस्तुस्थिति कितनी भयावह है, यह सामने आना ही चाहिए। जबरन कन्वर्जन, लव जिहाद, हिंसा के माध्यम से दहशत फैला कर बहुत से क्षेत्रों से अल्पसंख्यक हिंदुओं को पलायन के लिए विवश कर क्षेत्रों का आबादी संतुलन बदलने की साजिशें बड़े स्तर पर हो रही हैं। ऐसी सारी कारगुजारियां अपराध की श्रेणी में आती हैं। बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अगर धार्मिक या सामुदायिक कृत्य या कर्तव्य मान लिया जाएगा, तो इससे अधिक भयावह क्या होगा? यदि ऐसे निंदनीय कृत्य सामुदायिक दबदबा बढ़ा कर देश में राज करने के किसी दीर्घकालीन षड़यंत्र का हिस्सा हैं, तब तो यह बेहद चिंता की बात है।

धोखे से हिंदू लड़कियों से शादी के बहुत से मामले लोकलाज के डर से पुलिस के पास नहीं पहुंचते। ऐसी शादियों के बाद बनाए गए यौन संबंध भी बलात्कार ही हैं, जिनका मुखर विरोध अक्सर नहीं होता। ऐसे रेप की शिकार बहुत सी लड़कियां मन ही मन तड़पती रहती हैं। उनकी पीड़ा का अनुभव क्या कोई कर सकता है? सच्चाई सामने आने पर हिंदू लड़कियां भले ही शादियां तोड़ दें, गर्दनें झुका कर भले ही चुपचाप अपने घरों को लौट आएं, लेकिन अपने स्वत्व, अपनी अस्मिता, अपने अस्तित्व के साथ हुए बलात्कार का घिनौना दंश आजीवन भूल नहीं सकतीं।

माना जाता है कि लव जिहाद शब्दयुग्म का प्रयोग पहली बार वर्ष 2009 में केरल में इस तरह के कई मामले सामने आने के बाद हुआ। फिर कर्नाटक में भी ऐसा होता दिखाई दिया, तो इसका उल्लेख देश भर में होने लगा। वर्ष 2017 में केरल हाई कोर्ट ने (लव जिहाद के आधार पर) एक मुस्लिम पुरुष का हिंदू युवती से हुआ विवाद अमान्य करार दिया था। पुरुष ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। तब कोर्ट ने नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी यानी एनआईए को यह जांच करने का निर्देश दिया था कि क्या भारत में लव जिहाद का कोई पैटर्न स्थापित किया जा रहा है? इस मामले में एनआईए की जांच कहां तक पहुंची, पता नहीं।

बहुत से मामलों के बहुआयामी दृष्टिकोण से अध्ययन के बाद कहा जा सकता है कि भारत में लव जिहाद मतांतरण के व्यापक षड़्यंत्र से ही जुड़ा एक आयाम है। इस असामाजिक प्रवृत्ति का व्यापक विरोध होना ही चाहिए। लव जिहाद के माध्यम से किए जाने वाले बलात्कार सामान्य तौर पर अनायास हो जाने वाले अमानवीय जघन्य अपराध नहीं, बल्कि अधिक जघन्य अपराध की श्रेणी में रखे जाने चाहिए। क्योंकि अपराधी बाकायदा शिकार चुन कर संगठित और योजनाबद्ध तरीके से अपराध को अंजाम देते हैं। कर्तव्य मानते हुए वे लगातार अपराध करने की मानसिकता में जीते हैं।

दुर्भाग्य की बात है कि ज्यादातर भारतीय राजनैतिक दल ऐसे मामलों में भी सिर्फ राजनीति ही करते हैं। पीड़ित लड़कियों को न्याय दिलाना उनका अंतिम उद्देश्य नहीं होता। वे जातियों और धार्मिक चश्मे पहन कर ऐसी वारदात को देखते हैं और उनमें फर्क करते हैं। दलित हितों की राजनीति करने वाले कथित नेता बलात्कारियों में हिंदू और मुस्लिम के आधार पर विभेद करते हैं। जम्मू-कश्मीर के दूरदराज के क्षेत्र कठुआ में किसी मुस्लिम बच्ची से रेप का आरोप किसी पुजारी पर लगता है, तो संयुक्त राष्ट्र के महासचिव तक को पीड़ा होने लगती है। बहुत सी हिंदू लड़कियों पर लव जिहाद के अंतर्गत होने वाले जघन्य अपराधों पर वे मानवाधिकार की रक्षा की दुहाई देना उचित नहीं समझते।

तुष्टीकरण की राजनीति ने हालांकि अभी तक मुस्लिम समुदाय का कुछ भी भला नहीं किया है, फिर भी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, वामपंथी दल और सिर्फ मुस्लिम हितों की राजनीति करने वाले अददुद्दीन ओवैसी जैसे नेता उन्हें भरमाने में लगे हैं। वोट बैंक की राजनीति की चरम अवसरवादिता है कि मुसलमान लड़कों पर रेप के आरोप लगने पर मुलायम सिंह यादव जैसे वरिष्ठ नेता मंच से कहते हैं कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। ऐसी राजनीति की भर्त्सना खुल कर की जानी चाहिए।

जहां तक सनातन समाज की महिलाओं के सम्मान का प्रश्न है, तो समाज को ही कानून के दायरे में एकजुट होकर प्रतिकार करना होगा। सनातन समाज को महिला सशक्तीकरण की गति बढ़ानी होगी। कमजोर वर्गों के साथ खड़ा होना होगा। दहेज जैसी कुरीतियों को जड़ से समाप्त करना होगा। संपन्न सनातन वर्ग को सामाजिक समरसता के कर्तव्य का प्रभावी निर्वाह करना होगा। समाज की दलित, वंचित, गरीब और दूसरे स्तरों पर कमजोर कड़ियों के मन में यह विश्वास जगाना होगा कि अधिकार, शक्ति और साधन संपन्न सनातन समाज उनके साथ है।

अवैध कन्वर्जन रोकने के लिए केंद्र सरकार को बनाना चाहिए कड़ा कानून

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रवि पाराशर

दिल्ली । भारत में कई सदियों से सनातन धर्म के अनुयायियों पर बहुआयामी प्रहार किए जा रहे हैं। समय-समय पर हिंदू समाज ऐसे हमलों का हरसंभव प्रतिकार करता रहा है। धर्म संबंधी बहुत से वैश्विक विचारों से इतर हिंदू या सनातन धर्म मूलत: कर्म या कर्तव्य और लौकिक-अलौकिक आस्था में इस तरह अंतर्निहित है कि दोनों को किसी भी स्तर पर अलग-अलग करना संभव ही नहीं है।

हिंदुओं के सनातन धर्म पर अडिग रहने का आशय व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और अंतत: विश्व कल्याण के प्रति सुविचारित, सुसंगत मानवीय कर्तव्यों के प्रति प्रतिपल अडिग रहना ही है। सनातन समाज जीवनदायी संपूर्ण प्रकृति का समभाव से उपासक हैं। यही कारण है कि बहुत से संकट आए, बहुत से प्रहार हुए, किंतु विस्तारवादी न होते हुए भी हिंदू विचार संपूर्ण विश्व में सम्मानित हुआ। हर भारतीय को विश्वास है कि सनातन कर्तव्य और आस्था का ऊर्ध्वमुखी नैसर्गिक अटूट अस्तित्व विश्व भर में नई ऊष्मा, नई ऊर्जा, नई सुगंध के साथ सदैव पुष्पित और पल्लवित होता रहेगा।

परतंत्रता के समय हिंदुओं के दमन और मतांतरण के बहुत से दुष्चक्र चले। भारत माता के अनेक सुपूतों ने प्रतिकार स्वरूप सर्वोच्च बलिदान दिया। भारत अपनी सकारात्मक मौलिकता के कारण संपूर्ण विश्व में सद्गुरु के रूप में स्वीकार्य न रहे, इस उद्देश्य से भारतीय अस्मिता पर दिग्भ्रमित ईसाइयत और इस्लाम के हमले अब भी जारी हैं।

स्वतंत्रता के बाद भी भारत राष्ट्र की उदात्त उदारता और विशाल हृदयता की आड़ लेकर हिंदुओं को मतांतरित करने के अनेक षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। ऐसा तब हो रहा है, जबकि भारत के संविधान में हर पूजा पद्धति के प्रति पूर्ण सम्मान व्यक्त किया गया है। वयस्क भारतीय नागरिक अपने विवेक से किसी भी धर्म को अपना सकता है। किंतु भारत में धर्म के प्रचार-प्रसार की स्वीकार्यता के संवैधानिक अभयदान का अर्थ यह नहीं हो सकता कि हिंदुओं को कन्वर्जन के लिए तरह-तरह के प्रलोभन या लालच देकर, बहला-फुसला कर स्वार्थ सिद्धि की जाए और हम मूक-दर्शक बने रहें।

भारत लोकतांत्रिक गणराज्य है, इसलिए अवैध कन्वर्जन के दानवी दुष्चक्र को विफल करने के लिए शक्तिशाली कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए। भारतीय संविधान में विधि-व्यवस्था राज्यों का विषय है, इस कारण अवैध कन्वर्जन पर अंकुश लगाने के लिए कई राज्यों ने कानून बनाए हैं। किंतु षड्यंत्र की अंतरराष्ट्रीय व्यापकता के कारण ऐसे सभी कानून भारतीय समाज व्यवस्था की आस्थागत सहजता को क्षीण करने वाले अवैध कन्वर्जन पर प्रभावी अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं।

अब तो ऐसे बहुत से षड्यंत्रों के कर्ताधर्ता विदेश में बैठ कर जाल बुन रहे हैं। कन्वर्जन या मतांतरण के माध्यम से भारतीयता को क्षीण करने के लिए पाकिस्तान समेत कई इस्लामिक देशों से भारत में सक्रिय षड्यंत्रकारियों को बड़ी मात्रा में फंडिंग की जा रही है। विदेश में बैठ कर भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने के उद्देश्य से हिंदुओं का कन्वर्जन कराने के षड्यंत्र रचने और इसके लिए विदेशी फंडिंग करने वालों पर लगाम लगाने के लिए राज्यों के कानून पर्याप्त नहीं हैं। कन्वर्जन कराने वालों के तार तार आतंकवाद के दानव से भी सीधे जुड़े दिखाई देने लगे हैं। इस सारे चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए कड़ा केंद्रीय कानून ही एकमात्र विकल्प है।

विश्व चेतना का सर्वाधिक मौलिक और प्रखर प्रतीक हिंदुत्व ही है। भारतीयता के सूर्य की विलक्षणता, प्रखरता और पावनता को बनाए रखना हर हिंदू का सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कर्तव्य है। हिंदू समाज सदैव सचेत रहा है। यही कारण रहा कि मुगल काल में राज्याश्रय में दीन-ए-इलाही जैसा धर्म प्रचलित करने के प्रयास भारतीय धरती पर धड़क कर लहलहा नहीं सके। सजग और सतर्क हिंदू समाज अपनी ओर से आज भी ऐसे दुष्चक्रों को भेदने के लिए तत्पर है, किंतु बिना वैधानिक अस्त्र-शस्त्रों के ऐसा कर पाना कठिन है।

जिन कुछ राजनैतिक स्वार्थों ने समाज के प्रति अपने कर्तव्यों की ओर से आंखें मूंद ली हैं, उन्हें समझना चाहिए कि अनैतिक और अवैध कन्वर्जन संपूर्ण भारतीय अस्मिता को धूमिल करने का ही षड्यंत्र है। इसलिए इस राष्ट्र विरोधी गतिविधि पर रोक लगाने के लिए भारत सरकार को कड़े प्रावधानों वाला मतांतरण विरोधी केंद्रीय कानून जल्द से जल्द बनाना चाहिए, ताकि अनेकता में एकता और वसुधैव कुटुंबकम् जैसी विश्व कल्याण की भावना की जड़ें हर हिंदू के मन में सदैव चेतन रह सकें और देशद्रोहियों को मुंहतोड़ उत्तर दिया जा सके।

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