एक महीने में खुद को कैसे सुधारें

Successful-no-spend-month-1024x683-1.webp

सुनील सिंह

1. अपने भाषण को डिटॉक्सीफाई करें। नकारात्मक शब्दों का प्रयोग कम करें। विनम्र रहें।
2. रोज पढ़ें। कोई फर्क नहीं पड़ता क्या। अपनी रुचि के अनुसार चुनें।
3. अपने आप से वादा करें कि आप अपने माता-पिता से कभी भी बदतमीजी से बात नहीं करेंगे। वे इसके लायक कभी नहीं हैं।
4. अपने आस-पास के लोगों को देखें। उनके गुणों को आत्मसात करें।
5. प्रतिदिन प्रकृति के साथ कुछ समय बिताएं।
6. आवारा जानवरों को खाना खिलाएं। हां, भूखे को खाना खिलाना अच्छा लगता है।
7. कोई अहंकार नहीं। कोई अहंकार नहीं। कोई अहंकार नहीं। बस सीखो, सीखो और सीखो।
8. किसी संदेह को स्पष्ट करने में संकोच न करें। “जो सवाल पूछता है वह 5 मिनट तक मूर्ख रहता है। जो नहीं पूछता वह हमेशा के लिए मूर्ख बना रहता है”।
9. आप जो भी करें, पूरी भागीदारी के साथ करें। यही ध्यान है।
10. ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखें जो आपको नकारात्मकता तो देते हैं लेकिन कभी भी द्वेष नहीं रखते।
11. दूसरों से अपनी तुलना करना बंद करें। यदि आप रुकेंगे नहीं, तो आप अपनी क्षमता को कभी नहीं जान पाएंगे।
12. “जीवन में सबसे बड़ी असफलता कोशिश करने में विफलता है”। यह हमेशा याद रखें।
13. “मैं रोता रहा क्योंकि मेरे पास जूते नहीं थे जब तक कि मैंने एक ऐसे आदमी को नहीं देखा जिसके पैर नहीं थे”। कभी शिकायत न करें।
14. अपने दिन की योजना बनाएं। इसमें कुछ मिनट लगेंगे लेकिन आपके दिन बचेंगे।
15. प्रतिदिन कुछ मिनटों के लिए मौन में बैठें। मेरा मतलब है अपने साथ बैठो। सिर्फ खुद। जादू बहेगा।
16. स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है। इसे कबाड़ से न भरें।
17. अपने शरीर को हमेशा हाइड्रेट रखें। 8-10 गिलास पानी पीने का अभ्यास करें।
18. रोजाना कम से कम एक बार कच्ची सब्जी का सलाद खाने की आदत डालें।
19. अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। “जिसके पास स्वास्थ्य है उसके पास आशा है और जिसके पास आशा है उसके पास सब कुछ है”।
20. जीवन छोटा है। जीवन सरल है। इसे जटिल मत करो। मुस्कुराना न भूलें।

जीवन में परिवर्तन के इन 20 सूत्रों को रोजाना कम से कम एक बार पढ़ा करें।

सुमित अवस्थी की टाइम्स नाउ नवभारत में नई पारी? छवि सुधारने की कवायद या कुछ और!

2-2-1.png

दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित एंकर सुमित अवस्थी ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, उन्होंने टाइम्स नेटवर्क को जॉइन कर लिया है और हिंदी न्यूज चैनल टाइम्स नाउ नवभारत में सीनियर कंसल्टिंग एडिटर की जिम्मेदारी संभाल ली है। कुछ महीने पहले ही सुमित ने एनडीटीवी इंडिया से इस्तीफा दिया था, जहां वे ढाई साल तक ‘हम भारत के लोग’ और ‘खबरों की खबर’ जैसे प्रमुख शो होस्ट करते रहे।

लखनऊ में जन्मे सुमित अवस्थी का पत्रकारिता सफर करीब ढाई दशक पुराना है। आज तक, जी न्यूज, नेटवर्क18, एबीपी न्यूज और एनडीटीवी जैसे बड़े चैनलों में अहम भूमिकाएं निभा चुके सुमित को राजनीतिक विश्लेषण और तीखे सवालों के लिए जाना जाता है। दादा साहेब फाल्के एक्सीलेंस अवॉर्ड और माधव ज्योति सम्मान भी उन्हें मिल चुके हैं।

लेकिन इस बार उनकी नई पारी को लेकर चर्चा सिर्फ प्रोफेशनल नहीं, बल्कि राजनीतिक नजरिए से भी हो रही है। टाइम्स नाउ नवभारत पिछले कई सालों से ‘गोदी मीडिया’ के ठप्पे से जूझता रहा है। चैनल पर अर्नब गोस्वामी के दौर से लेकर अब तक सत्तारूढ़ दल के प्रति खुला समर्थन दिखाने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में कई मीडिया विश्लेषक मान रहे हैं कि सुमित अवस्थी की एंट्री चैनल की उस छवि को संतुलित करने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है।

सुमित अवस्थी को लंबे समय से कांग्रेस के प्रति नरम रुख रखने वाला पत्रकार माना जाता रहा है। एनडीटीवी में उनके कार्यकाल के दौरान भी कई बार उनकी रिपोर्टिंग और सवालों को विपक्ष-मैत्रीपूर्ण कहा गया। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर कुछ लोग मजाक उड़ा रहे हैं कि जैसे राजदीप सरदेसाई आज तक में “कांग्रेस वाले” बनकर बैठे हैं, वैसे ही सुमित टाइम्स नाउ नवभारत में “विपक्षी चेहरा” बनकर आए हैं।

हालांकि यह भी सच है कि आज के दौर में “गोदी पत्रकार” की परिभाषा इतनी उलझ गई है कि बड़े-बड़े नेता भी कन्फ्यूज हो जाते हैं। राहुल गांधी का वह वाकया अभी ताजा है, जब उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक महिला पत्रकार को ही “बीजेपी वाली” कहकर डांट दिया था, जबकि उसका पूरा कॅरियर कांग्रेस की विश्वासपात्र पत्रकार बन कर बिता है।

जैसे सुप्रिया श्रीनेत जो भारत की पहली गोदी एंकर कही जाती हैं क्योंकि उनके पिताजी उत्तर प्रदेश से कांग्रेस नेता थे और वह खुद चैनल में एंकर थीं। उनके लिए कांग्रेस में बड़े से बड़े नेता का दरवाजा खुला रहता था। वह चैनल में एंकर थीं और कांग्रेस परिवार में बेटी। गोदी मीडिया की इससे अच्छी व्याख्या क्या होगी?।

फिलहाल, सुमित अवस्थी की एंट्री से टाइम्स नाउ नवभारत को निश्चित तौर पर एक संतुलित और विश्वसनीय चेहरा मिलेगा। सवाल यह है कि क्या वे चैनल की मूल डीएनए को बदल पाएंगे या फिर सिर्फ “टोकन बैलेंस” बनकर रह जाएंगे? आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन इतना तय है कि हिंदी न्यूज की जंग में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है।

मीडिया की आजादी का दोहरा मापदंड: चेन्नई प्रेस क्लब कांड और विचारधारा की गुंडागर्दी

2-2.png

चेन्नई प्रेस क्लब में 8 दिसंबर 2025 को जो हुआ, वह मीडिया की आजादी पर एक खुला हमला था। ‘May 17 मूवमेंट’ के कोऑर्डिनेटर थिरुमुरुगन गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तमिल जनम चैनल के पत्रकार को सिर्फ इसलिए अपमानित किया, बाहर निकलवाया और भविष्य में क्लब में आने से स्पष्ट मना कर दिया क्योंकि उनका चैनल कथित तौर पर आरएसएस की विचारधारा से जुड़ा हुआ था।

गांधी का सीधा बयान था—“मैं इसे प्रेस मानता ही नहीं।” यानी एक व्यक्ति ने अपनी विचारधारा के आधार पर तय कर लिया कि कौन पत्रकार है और कौन नहीं। यह घटना इसलिए खतरनाक है क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब विचारधारात्मक असहमति को मीडिया की आजादी को कुचलने का हथियार बनाया गया है, लेकिन इसे जिस बेशर्मी से अंजाम दिया गया, वह नया मानक स्थापित करता है।

कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच?

सबसे पहले तथ्य: थिरुमुरुगन गांधी ने तमिल जनम को ‘झूठ फैलाने वाला’ और ‘आरएसएस का चैनल’ कहा। वजह बताई कि पिछले साल अमरन से जुड़ी प्रेस मीट में चैनल ने उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया था। यह आरोप हो सकता है सही, हो सकता है गलत-लेकिन उसकी सजा यह है कि पूरे चैनल को प्रेस की परिभाषा से बाहर कर दो? क्या कोई व्यक्ति या संगठन यह तय करेगा कि कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच? अगर यही मानक लागू हुआ तो कल को कोई दूसरा संगठन द वायर, द क्विंट या स्क्रॉल को “सोरस का एजेंट”, “कांग्रेस का मुखपत्र” या “वामपंथी प्रोपेगैंडा मशीन” कहकर बाहर का रास्ता दिखा देगा। परसों कोई तीसरा न्यूज 24 या एबीपी को ‘खान मार्केट गैंग’ का बताकर निकाल देगा। और फिर कोई चौथा आज तक या रिपब्लिक को ‘गोदी मीडिया’ कहकर। अंत में प्रेस क्लब में सिर्फ वही बचेंगे जो आयोजक की विचारधारा से 100 फीसदी मैच करते हों। यह प्रेस की आजादी नहीं, विचारधारात्मक गुलामी है।

चलन में हैं ‘प्रेस्टीट्यूट’ और ‘लिबरल गैंग’ जैसे शब्द

यह कोई नई बात नहीं है। भारत में पिछले एक दशक से मीडिया को विचारधारात्मक खांचों में बांटने की कोशिश लगातार हो रही है। एक तरफ “गोदी मीडिया” का तमगा चस्पा किया जाता है, दूसरी तरफ ‘प्रेस्टीट्यूट’ और ‘लिबरल गैंग’ जैसे शब्द चलन में हैं। लेकिन अब तक यह बहस सोशल मीडिया और टीवी डिबेट तक सीमित थी। पहली बार इसे संस्थागत रूप दिया गया है—एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुले आम एक चैनल को बाहर निकालकर और भविष्य में आने से रोककर। यह सिर्फ तमिल जनम के खिलाफ नहीं, पूरे प्रेस की स्वतंत्रता के खिलाफ घोषणा-पत्र है।

कहां हैं  फ्रीडम ऑफ स्पीच के चैंपियन

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह काम वही लोग कर रहे हैं जो खुद को फ्रीडम ऑफ स्पीच का सबसे बड़ा चैंपियन बताते हैं। May 17 मूवमेंट और थिरुमुरुगन गांधी सालों से ईलम समर्थक आंदोलन, दलित अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सक्रिय रहे हैं। उनके ऊपर राजद्रोह के केस लगे, उन्हें जेल भेजा गया, विदेश यात्रा पर रोक लगी। उस वक्त पूरा ‘प्रोग्रेसिव’ खेमा उनके साथ खड़ा था। लेकिन आज वही लोग एक पत्रकार को सिर्फ उसकी कथित विचारधारा के आधार पर अपमानित कर रहे हैं। यह दोहरा मापदंड नहीं, पाखंड है। जब आपकी अभिव्यक्ति दबाई जाती है तो वह फासीवाद है, लेकिन जब आप दूसरों की अभिव्यक्ति दबाते हैं तो उसे सही मीडिया के चयन का नाम दे देते हैं।

इसलिए भी खतरनाक है यह घटना

यह घटना इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि यह प्रेस क्लब जैसी संस्थाओं को विचारधारात्मक कब्जे का अड्डा बनाने की शुरुआत है। आज चेन्नई में आरएसएस से कथित तौर पर जुड़े चैनल को निकाला गया, कल को कहीं और वामपंथी या कांग्रेस समर्थक चैनल को। परसों कोई हिंदुत्ववादी संगठन प्रेस क्लब पर कब्जा करके सेकुलर मीडिया को बाहर कर देगा। अंत में प्रेस क्लब पत्रकारों का साझा मंच नहीं, अलग-अलग गुटों के निजी ड्राइंग रूम बनकर रह जाएंगे। और इसका सबसे बड़ा नुकसान उन स्वतंत्र पत्रकारों को होगा जो किसी भी विचारधारा के साथ 100 फीसदी खड़े नहीं होते।

फासीवादी मानसिकता का जीता-जागता उदाहरण

तमिल जनम का पक्ष चाहे जो हो, लेकिन एक पत्रकार को सिर्फ इसलिए ‘पत्रकार नहीं’ कहना कि उसकी विचारधारा आपको पसंद नहीं, यह फासीवादी मानसिकता का जीता-जागता उदाहरण है। अगर यही मानक चल पड़ा तो जल्द ही प्रेस कार्ड जारी करने का अधिकार भी विचारधारात्मक संगठनों के पास चला जाएगा। कोई वामपंथी संघ बनेगा जो तय करेगा कि फलाने चैनल को प्रेस कार्ड मिलेगा या नहीं। कोई हिंदुत्ववादी संघ बनेगा जो अपना अलग प्रेस कार्ड बांटेगा। और बीच में आम पत्रकार मारा-मारा फिरेगा।

यह घटना सिर्फ चेन्नई या तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश के लिए चेतावनी है। अगर आज हम चुप रहे तो कल को कोई भी आयोजक, कोई भी संगठन, कोई भी व्यक्ति अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कह सकेगा—“इसे मैं पत्रकार नहीं मानता।” और बाहर का रास्ता दिखा देगा। यह प्रेस की आजादी का गला घोंटने की शुरुआत है। इसे रोकना होगा, अभी और यहीं। वरना जिस दिन प्रेस क्लब में प्रवेश के लिए विचारधारा का सर्टिफिकेट दिखाना पड़ेगा, उस दिन भारतीय मीडिया की आजादी की अंतिम सांस निकल जाएगी।

हाइप का हनीमूनः जब दो परिवारों का मिलन बन गया नेशनल एंटरटेनमेंट

2.png

 

मुम्बई : साल 2025 के मार्च-अप्रैल में भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के फोन में एक ही नोटिफिकेशन बार-बार आ रहा था – ‘स्मृति मंधाना की शादी टूट गई।’ किसी ने लिखा, ‘अरे यार, पलाश के साथ तो सेट था!’ किसी ने मीम बनाया, ‘स्मृति का छक्का तो लग गया, लेकिन शादी का स्टंप उखड़ गया।’ ट्विटर से लेकर इंस्टाग्राम रील्स तक, रेडिट के सब-रेडिट्स से लेकर यूट्यूब की लाइव स्ट्रीम तक – पूरा देश दो अजनबियों के रिश्ते पर ओपिनियन दे रहा था, जबकि वे दोनों कभी सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं, इस बात की आधिकारिक पुष्टि तक नहीं हुई थी।

कहानी शुरू हुई फरवरी में। एक क्रिकेट फंक्शन में स्मृति मंधाना और पलाश मुछाल (जो संगीतकार जोड़ी अजय-अतुल के भतीजे और खुद एक उभरते संगीतकार हैं) एक साथ नजर आए। किसी ने फोटो खींची, किसी ने स्टोरी डाली, और अगले चौबीस घंटे में हैशटैग #SmritiWedsPalash ट्रेंड करने लगा। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार शादी की खबरें किसी पत्रकार ने नहीं, बल्कि प्रशंसकों ने खुद गढ़ीं। कोई रोक नहीं। उल्टे, दोनों परिवारों के करीबी दोस्तों ने भी इशारों-इशारों में ‘बहुत अच्छा रिश्ता है’ जैसे बयान दिए, जिसे मीडिया ने हेडलाइन बना देता है।

फिर आया वह दौर जो आजकल हर सेलेब्रिटी रिश्ते के साथ होता है – प्री-वेडिंग फोटोशूट की अफवाहें, हल्दी की तारीख, डिजाइनर लहंगे की कीमत, जयमाला में कौन सा गाना बजेगा। सब कुछ तय था, सिवाय इसके कि वर-वधू ने खुद कुछ कहा हो। स्मृति ने एक बार लाइव सेशन में हंसते हुए कहा था, “आप लोग बहुत जल्दी कर रहे हो।” बस इतना काफी था कि लोग इसे “कन्फर्मेशन” मान लें।और फिर अचानक खबर आई – शादी टूट गई। वजह? “दोनों परिवारों में कुछ मतभेद।” कोई और डिटेल नहीं। लेकिन सोशल मीडिया को डिटेल की जरूरत कहाँ होती है। एक तरफ स्मृति की फैन आर्मी ने पलाश को ‘लालची’, ‘फेम का भूखा’ जैसे शब्दों से नवाजा। दूसरी तरफ कुछ लोगों ने स्मृति पर तंज कसे कि “क्रिकेट में तो छक्के मारती हो, रिश्ते में आउट हो गईं।” पलाश के इंस्टाग्राम पर ट्रोल्स की बाढ़ आ गई। उसकी माँ को भी नहीं बख्शा गया। एक यूजर ने लिखा, “आंटी, बेटे को संभालिए न!”

यहाँ सवाल सिर्फ ट्रोलिंग का नहीं है। सवाल यह है कि दो परिवारों का निजी मिलन कब से हमारा राष्ट्रीय तमाशा बन गया?
भारतीय समाज में शादी आज भी सिर्फ दो लोगों का नहीं, दो परिवारों का मिलन है। इसमें माता-पिता, चाचा-ताऊ, मौसी-बुआ सबकी राय होती है। कई बार रिश्ता इसी वजह से टूट जाता है। यह दुखद है, लेकिन निजी है।

जब आप एक सेलेब्रिटी हैं, तो आपका निजी दुख भी हमारा पब्लिक एंटरटेनमेंट बन जाता है। हम क्यों भूल जाते हैं कि दूसरी तरफ भी इंसान हैं। पलाश मुछाल कोई फिल्मी स्टार नहीं   हैं। वे एक मध्यमवर्गीय संगीतकार परिवार से हैं।

स्मृति मंधाना ने कभी अपने रिश्ते को पब्लिक नहीं किया। फिर भी उनसे अपेक्षा की गई कि वे हर अफवाह का खंडन करें। जब उन्होंने चुप्पी साधी, तो कहा गया कि “घमंड हो गया है।” जब पलाश ने एक स्टोरी डाली जिसमें लिखा था “कृपया निजता का सम्मान करें”, तो लोग हंसने लगे – “अब निजता की याद आई?”

यह हाइप सिर्फ सोशल मीडिया की देन नहीं है। यह हमारी सामूहिक बीमारी है। हम किसी के सुख-दुख को अपने खाली समय का मसाला बनाना चाहते हैं। शादी की खबर बनी, तो हमने शादी देखी। शादी टूटी, तो हमने ब्रेकअप पार्टी मनाई। दोनों ही बार असली लोग हारे।

स्मृति मंधाना ने बाद में एक इंटरव्यू में कहा था, “मैं क्रिकेटर हूँ, अभिनेत्री नहीं। मेरी जिंदगी में जो होता है, वह मेरा निजी मामला है।” लेकिन हमने उनकी बात अनसुनी कर दी। क्योंकि हमें उनकी जिंदगी से ज्यादा उनकी जिंदगी की कहानी चाहिए थी – वह कहानी जो हम मीम्स बनाकर, रील्स बनाकर, ट्रेंड चलाकर खुद लिख सकें।

आज जब मैं यह लिख रहा हूँ, तो #SmritiWedsPalash हैशटैग अभी भी जिंदा है। लोग अब भी पूछते हैं – “क्या सच में प्यार था या सिर्फ पीआर?” कोई जवाब नहीं है। और होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि जवाब देने की जिम्मेदारी न स्मृति की है, न पलाश की। जवाब देने की जिम्मेदारी हमारी है – कि हम कब तक दूसरों के निजी जीवन को अपना पब्लिक तमाशा बनाते रहेंगे?

दो परिवार आपस में मिले थे। बात आगे नहीं बढ़ी। बस इतनी सी बात। इसे यहीं छोड़ देते, तो शायद दो लोगों की जिंदगी में थोड़ा कम जहर घुलता। लेकिन हमने इसे “कंटेंट” बना दिया। और कंटेंट की भूख कभी नहीं मिटती।

शायद अगली बार जब कोई सेलेब्रिटी किसी के साथ फोटो खिंचवाए, तो हम थोड़ा रुकें। थोड़ा सोचें। कि क्या हर फोटो शादी की खबर है? क्या हर चुप्पी घमंड है? क्या हर रिश्ते का टूटना हमारा मनोरंजन है?

जवाब शायद “नहीं” में ही है। लेकिन हम “हाँ” कहते रहेंगे। क्योंकि हमें हाइप चाहिए।

scroll to top