गाजियाबाद में हर्षोल्लास से मनाया गया ‘हिन्दू साम्राज्य दिवस’

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दिल्ली । भारत माता सांस्कृतिक संस्थान द्वारा आज 28 जून को छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के 353 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ‘हिन्दू साम्राज्य दिवस’ का भव्य एवं ऐतिहासिक आयोजन नवयुग मार्किट, बलिदान पथ पर किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ ठाकुरद्वारा तिराहे से भव्य शोभा यात्रा के साथ हुआ। यात्रा में छत्रपति शिवाजी, माँ जीजाबाई, रानी लक्ष्मी बाई सहित देश की वीरांगनाओं की वेशभूषा में महिला शक्ति ने अगुवाई की। नासिक ढोल, दर्जन भर बैंडबाजे, बुलेट वाहिनी, अश्व एवं खड़क वाहिनी के प्रदर्शन ने यात्रा को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया।

बलिदान पथ स्थित कार्यक्रम स्थल पर मुख्य समारोह आयोजित हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि निरंजन पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी कैलाशानंद गिरी महाराज, मुख्य वक्ता राज्यसभा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी, कार्यक्रम अध्यक्ष श्री ललित जायसवाल तथा संस्था के अध्यक्ष श्री राहुल सिंह द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्प-अर्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इससे पूर्व अतिथियों ने बलिदान पथ पर स्थित बलिदानियों की प्रतिमाओं एवं वाल्मिकी जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। साथ ही, वाल्मिकी समाज के बंधुओं का भी महाराज श्री द्वारा स्वागत-सत्कार किया गया।

मुख्य अतिथि डॉ. स्वामी कैलाशानंद गिरी महाराज ने संस्थान को इस अद्भुत आयोजन की बधाई दी। उन्होंने कहा कि शिवाजी महाराज को उनके गुरु जी ने दीक्षा में कहा था कि आप अपने जीवन को शिव की आराधना में लगा दो। गुरु के आदेश का शिवाजी ने जीवनपर्यंत निर्वहन किया। महाराज जी ने कार्यक्रम में शस्त्रों का प्रदर्शन करने वाली माता-बहनों को विशेष बधाई दी।

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि यह अद्भुत संयोग है कि भगवान शिव के आराधक कैलाशानंद गिरी महाराज आज मंच पर विराजमान हैं और भगवान शिव के नाम पर जिनका नामकरण हुआ, ऐसे ‘शिवा’ का हम राज्याभिषेक मना रहे हैं। उन्होंने कहा कि बालकों व बालिकाओं ने जो प्रदर्शन किया, उसे देखकर ऐसा आभास होता है कि शिवाजी महाराज की सेना बिल्कुल ऐसी ही होती होगी। गाजियाबाद की भूमि पर आयोजित इस अनूठे कार्यक्रम से सनातन संस्कृति, संस्कार, हिन्दू वीरों के पराक्रम और चरित्रबल का बड़ा संदेश भारत के समाज को जाएगा।

कार्यक्रम के दौरान 11 माताओं द्वारा अपने बच्चों का प्रतीकात्मक राज्याभिषेक किया गया। साथ ही बच्चे छत्रपति शिवाजी, रानी लक्ष्मी बाई, महाराणा प्रताप आदि की वेशभूषा में पहुंचे। इस बार महाराणा प्रताप की माता जयंता बाई के स्वरूप और उनके योगदान पर भी विशेष रूप से प्रकाश डाला गया।

शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित क्विज प्रतियोगिता के विजेताओं क्रमशः गौरांगी सिंह, उत्कर्ष व लावण्या सेठी को पुरस्कार प्रदान किए गए। कार्यक्रम का समापन शिवाजी के जीवन पर आधारित नृत्य-नाटिका की मनोहारी प्रस्तुति के साथ हुआ।

संस्था के महामंत्री मनमीत कुमार ने बताया कि इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन मूल्यों, स्वराज, सुशासन एवं राष्ट्रभक्ति से अवगत कराना है।

कार्यक्रम का संचालन प्रमोद कुमार द्वारा किया गया। इस अवसर पर देवेन्द्र कुमार, विजय गोयल, धुरेन्द्र कुमार, विपुल कुमार, विधायक अजीत पाल त्यागी, कथा वाचक विष्णु दत्त सरस, अरविन्द भाई ओझा, जीवन ऋषि महाराज, सुशील कुमार आदि अनेक गणमान्य उपस्थित रहे। साथ ही, हज़ारों की संख्या में महिलाओं, पुरुषों एवं बालकों ने सहभागिता की।

आपातकाल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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भोपाल । आपातकाल में सबसे अधिक दबाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर था। संघ पर प्रतिबंध लगा। सभी प्रमुख प्रचारक और दायित्ववान अधिकारी या तो गिरफ्तार हुये अथवा भूमिगत रहकर समाज जागरण के अभियान में सक्रिय रहे। आपातकाल के इक्कीस महीनों में 1.30 लाख से अधिक लोग जेल में रहे उनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता एक लाख से अधिक थे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये 25 जून 1975 को लागू आपातकाल किया था जो 21 मार्च 1977 तक रहा। इन पौने दो वर्षों तक भारत का प्रत्येक नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित रहा। सर्वोच्च न्यायालय को भी इस संबंधी किसी विषय पर विचार करने से रोक दिया गया था। भारत के सभी विपक्षी दलों के नेताओं की गिरफ्तारियाँ 25 और 26 जून की मध्य रात्रि से आरंभ हो गई थीं। आपातकाल में पुलिस और प्रशासन का सर्वाधिक दबाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर था। पूरे देश में संघ कार्यालयों पर छापे पड़े और प्रचारकों के घरों तक की तलाशी ली गई। तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस की गिरफ्तारी 30 जून को हुई। वे प्रवास पर जाने केलिये निकले थे। उन्हें नागपुर स्टेशन से गिरफ्तार किया गया ।
संघ को देश में प्रशासनिक स्तर पर किसी भी अप्रत्याशित निर्णय का अनुमान था। इसका स्पष्ट संकेत तीन माह पहले दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में मिल गया था। 15 और 16 मार्च 1975 को दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में चर्चा का विषय ही “संविधान में आपातकाल और लोकतंत्र” विषय था। इस चर्चा उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री कोका सुब्बाराव भी एक वक्ता थे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि- “ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जब राष्ट्रपति और मंत्रिमंडल संवैधानिक लोकतंत्र को नष्ट करने के लिए एकजुट हों।” (इस कार्यक्रम का उल्लेख पीजी सहस्रबुद्धे और माणिकचंद्र वाजपेई द्वारा लिखित पुस्तक “इमरजेंसी स्ट्रगल स्टोरी” में है) समय के साथ 12 जून को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय आ गया। लगभग सभी विचारक इंदिराजी के स्वभाव और कार्यशैली से परिचित थे। इसीलिए संघ ने अपनी वैकल्पिक नीति तैयार कर ली थी। सरसंघचालक जी को अपनी गिरफ्तारी का अनुमान था। उन्होने पहले ही संघ संचालन की भावी रूपरेखा का निर्धारण कर दिया था। इस विषम परिस्थिति में उन्होंने सभी स्वयंसेवकों से धैर्य से काम करने का संदेश दिया था। उन्होंने कहा था कि- “इस स्थिति असाधारण है, इसमें स्वयंसेवकों का कर्तव्य है कि वे अपना संतुलन न खोएं। उन्होंने संभवतः सरकार्यवाह माधवराव जी मुले को वैकल्पिक व्यवस्था बनाने का संकेत कर दिया था। इसीलिए संघ पर प्रतिबंध और संघ के अधिकारियों की देश व्यापी गिरफ्तारी होने केबाद भले नियमित शाखा या शिक्षण प्रशिक्षण या प्रबोधन रुक गया हो लेकिन संघ का जनसंपर्क, जन जागरूकता का काम निरन्तर रहा। सरसंघचालक जी गिरफ्तारी हुई और 4 जुलाई 1975 को संघ पर प्रतिबंध लगा। संघ पर प्रतिबन्धित लगाने का सबसे बड़ा कारण स्वयंसेवकों की ध्येयनिष्ट कार्यशैली है। स्वयंसेवक सीधे जन सामान्य से जुड़े रहते हैं। मंहगाई विरोधी जेपी आँदोलन में संघ शक्ति की भूमिका से भी इंदिराजी का प्रशासन अवगत था। इसलिए आपातकाल लागू होने के पहले चरण में सभी विपक्षी राजनैतिक दलों के कार्यालयों और प्रमुख नेताओं के घर पुलिस के छापे पड़े और दूसरे चरण में पुलिस ने देशभर में संघ कार्यालयों और कार्यकर्ताओं के घरों पर टूट पड़ी। जो जहाँ जैसा मिला, उसे पकड़कर जेल में डाल दिया गया। संघ पर प्रतिबंध और लगातार गिरफ्तारियों के बाद भी
संघ कार्यकर्त्ता बहुत धैर्य और योजना से काम करते रहे। योजना पूर्वक प्रतिदिन किसी न किसी नगर में कुछ न कुछ घटता। कभी परचे फेककर गिरफ्तारी दी जाती और कभी नारे लगाकर। एक टोली जेल जाती तो वह दूसरी टोली को तैयार करके जाती।
जिस प्रकार सरसंघचालक जी ने अपनी गिरफ्तारी के पूर्व संघ संचालन की वैकल्पिक व्यवस्था बना दी थी उसी प्रकार नानाजी देशमुख ने लोक संघर्ष समिति की वैकल्पिक व्यवस्था बना दी थी। लोक नायक जयप्रकाश नारायण जी के नेतृत्व में चलने वाले मँहगाई विरोधी आँदोलन की पूरी व्यवस्था यही समिति कर रही थी। नानाजी देशमुख ने अपनी गिरफ्तारी होने से पूर्व इस समिति की व्यवस्था श्री सुन्दर सिंह भंडारी को सौंप दी थी इसलिए नानाजी की गिरफ्तारी के बाद भी इस समिति का कार्य भी निरन्तर रहा। यह समिति भी आपातकाल विरोधी अभियान निरन्तर चलाती रही। प्रतिबंध और देश व्यापी गिरफ्तारियों के बाद भी संघ के स्वयंसेवकों के मनोबल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने इसे चुनौती के रूप में लिया। संघ के अनेक स्वयंसेवकों ने अपने घरों पर साइक्लोस्टाइल मशीन का प्रबंध कर लिया। वे स्वयं पंपलेट तैयार करते और हाॅट बाजार में छोड़ देते। कयी बार आपातकाल विरोधी साइक्लोस्टाइल सामग्री रद्दी के कागजों में दुकानदारों को बेच देते ताकि उनमें बँधा हुआ सामान लोगों के घरों पर पहुँचे। और लोग पढ़ सकें। कितने ही स्वयं सेवक रात के अंधेरे में दीवारों पर कोयले से लिख जाते और सबेरे पुलिस अथवा नगर निगम कर्मचारी उन्हें पानी से मिटाते हुये देखे जाते। पूरे आपातकाल यही क्रम चला।
समय अपनी गति से चला। अंततः 20 जनवरी 1977 को इंदिराजी ने घोषणा की और आपातकाल में गिरफ्तार राजनैतिक बंदियों की रिहाई का क्रम चला और 21 मार्च 1977 को आपातकाल की पूरी तरह विदाई हुई। देश को आपातकाल से मुक्त करने केलिये इंदिराजी की अपनी रणनीति हो सकती है। लेकिन पूरे इक्कीस महीने जन जागरण अभियान निरंतर रखने का काम केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने किया। आपातकाल हटने और सत्ता परिवर्तन के बाद भी संघ ने इसका कोई श्रेय कभी नहीं लिया। संघ की कार्यशैली में श्रेय लेने का स्वभाव है भी नहीं। वे कोई कार्य श्रेय अथवा किसी लाभ केलिये नहीं करते उनका उद्देश्य राष्ट्र का परम वैभव है। वे इसी केलिये समर्पित हैं। उस कालखंड में भारत का जन मानस मँहगाई से परेशान था। इसलिये स्वयंसेवकों ने मँहगाई विरोधी आँदोलन की व्यवस्था संभाली। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद आपातकाल और नागरिकों के संवैधानिक अधिकार निलंबित करना मानवता के साथ अन्याय था। इसलिए संघ से जुड़े कार्यकर्ता पूरे आपातकाल में सक्रिय रहे। संघ के अनेक प्रचारक पूरे आपातकाल भूमिगत रहे। भूमिगत रहकर उन्होंने उन परिवारों की देखभाल की जिन परिवारों के मुखिया जेल में डाल दिये गये थे। संघ की कार्यनिष्ठा और राष्ट्रभाव का जन सामान्य में सदैव सम्मान रहा है। इसका लाभ आपातकाल में मिला। जन सामान्य के सहयोग से वे सभी परिवार सुरक्षित रहे जिनके मुखिया अथवा एक मात्र संचालक को किसी न किसी बहाने जेल में डाल दिया गया था। आपातकाल के बाद राजनीति अपनी राह पर चली और संघ के स्वयंसेवक राष्ट्र सेवा की अपनी राह ।

चंपत राय चोर नहीं, तथ्यों से सिद्ध हुए एक असफल प्रशासक  

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विनय झा

अयोध्या : चम्पत राय को बिना न्यायिक प्रक्रिया के सीधे फाँसी दे दो,अथवा बिना न्यायिक प्रक्रिया के सीधे बरी कर दो । दोनों परस्पर विरोधी गुटों के मेंढकों में एक समानता है — न्यायिक प्रक्रिया को ताक पर रखों और केवल अपने झुण्ड की बात सुनो।

होमो इडियट प्रजाति स्वयं को सेपियन्स कहती है किन्तु कुछ अपवादों के सिवा इसे श्याम−श्वेत में ही सबकुछ देखने की बीमारी है,सतरङ्गी चीजें दिखायेंगे तो माथा दुखने लगता है।

कानपुर के ईसाई कॉलेज से पढ़े विनोद पाण्डे का कहना है कि विनय झा और चम्पत राय दोनो बिहारी है जिस कारण विनय झा ने चम्पत राय का समर्थन किया।

पिछले पोस्ट में मैंने चम्पत राय का न तो समर्थन किया और न विरोध,मैंने न्यायिक प्रक्रिया की बात कही ।
पिछले पोस्ट में चम्पत राय का जन्मस्थान उत्तरप्रदेश का नगीना दिया गया है । किसी को यह सूचना गलत लगे तो स्वयं ऑनलाइल ढूँढ ले,चम्पत राय प्रसिद्ध व्यक्ति है । बिना छानबीन का प्रयास किये कॉलेज में पढ़े व्यक्ति विनोद पाण्डे ने उनको झूठमूठ बिहारी क्यों कहा?

क्योंकि चम्पत राय को बिना न्यायिक प्रक्रिया के सीधे फाँसी देना चाहते हैं,मैंने न्यायिक प्रक्रिया की बात कही तो गुस्सा मुझपर भड़क गया ।

लगभग छ−सात लोगों ने इससे भी आगे बढ़कर मेरे लिए अपशब्दों का प्रयोग किया । उनमें से कई लोगों ने मेरे पोस्ट को पूरा पढ़ा भी नहीं,ऊपर की एकाध पङ्क्तियाँ पढ़कर राय बना लेते हैं और फिर गाली−गलौच पर उतर आते हैं।

किन्तु ऐसे मुट्ठी भर लोगों से सैकड़ों गुणा अधिक संख्या उन लोगों की है जिनको मेरा पिछला पोस्ट पसन्द आया और लाइक ठोके — मुझे वास्तविक शिकायत उनसे ही है । अभीतक चौदह सौ लोगों ने पिछले पोस्ट पर लाइक ठोके हैं,जबकि उससे लाखों गुणा अधिक महत्वपूर्ण “चरित्र” और पीछे के लेखों पर दौ−चार सौ लाइक ही मिलेंगे । चम्पत राय जैसे फालतू विषय पर एक सहस्र अतिरिक्त लाइक हैं जो “चरित्र” और उसी प्रकार के गम्भीर लेखों पर नदारद हैं । लोगों को फालतू और हल्के मनोरञ्जक विषय चाहिए । ऐसे हल्के विषयों पर लिखना मैंने बहुत पहले ही बन्द कर दिया था । चम्पत राय पर कुछ भी लिखने की मेरी ईच्छा नहीं थी,मैंने जानबूझकर यह देखने के लिए लिखा ताकि पता चले कि फेसबुक ने जानबूझकर मेरे लेखों को दबाना आरम्भ कर दिया है अथवा लोग ही गम्भीर लेखों पर लाइक नहीं करते । पिछले कई लेखों में मैंने एक नयी नीति अपनायी है — हर लेख में चित्र वा चलचित्र डाल देता हूँ क्योंकि उसे लाइक नहीं करने वालों ने भी यदि देखने के लिए क्लिक किया तो फेसबुक ऐसे लोगों की संख्या बता देता है । ऐसे लोगों की संख्या लेख पर लाइक ठोकने वालों से बीस गुणी अधिक है । अतः फेसबुक रीच नहीं घटाता,अधिकांश लोग ही ऐसे हैं जो गम्भीर विषय पसन्द नहीं करते।

मुझपर न तो गालियों का प्रभाव पड़ता है और न प्रशंसा का,इन बातों की जाँच केवल लोगों को समझने के लिए मैं करता हूँ।

पराशर होराशास्त्र में यह भी लिखा है कि धर्मभाव का ईश यदि कामभाव में हो तो काम पर धर्म का नियन्त्रण रहता है,किन्तु कामभाव के ईश यदि धर्मभाव में हों तो धर्मक्षेत्र में काम का प्रकोप रहता है । कामेश नीच का हो तो करैले पर नीम चढ़ा।

यह टिपण्णी किसी व्यक्ति पर नहीं है —
वैसे सभी दलों और संगठनों पर है जो होमो इडियट को “होमो” बनाना चाहते हैं

विनय झा ने पिछले पोस्ट में लिखा :

चम्पत राय को जब चढ़ावे के धन की चोरी का पता चला, तब मामला दबाया नहीं गया। अयोध्या पुलिस ने लवकुश मिश्र के घर छापा मारा और लगभग १०–१२ लाख रुपये बरामद किये। यह कार्यवाही चम्पत राय की उपस्थिति में हुई। यदि चम्पत राय चोरी छिपाना चाहते, तो क्या वे पुलिस कार्यवाही में उपस्थित रहते?
कैमरों से छेड़छाड़ और दान-गणना व्यवस्था में गड़बड़ी की जानकारी मिलने पर ट्रस्ट-स्तर पर गुप्त कैमरे लगवाये गये। उन्हीं गुप्त कैमरों और CCTV साक्ष्यों के आधार पर SIT के पास आज ठोस सामग्री है। अतः यह कहना कि चम्पत राय ही चोरी के संरक्षक थे, तथ्य के विपरीत और अन्यायपूर्ण है।
चम्पत राय का दोष अवश्य है—वे अच्छे प्रशासक सिद्ध नहीं हुए। इतने बड़े दान-तन्त्र में SOP टूटे, दान-गणना कक्ष की सुरक्षा शिथिल रही, चाबियों और कर्मियों पर नियंत्रण कमजोर रहा, और ऐसे लोग भीतर पहुँच गये जिन पर भरोसा करना भारी भूल सिद्ध हुआ। यह प्रशासनिक विफलता है, और इसकी नैतिक जिम्मेदारी शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति से बच नहीं सकती।
किन्तु प्रशासनिक अयोग्यता और चोरी में संलिप्तता — दोनों एक बात नहीं हैं। चम्पत राय की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही कि वे चिकनी-चुपड़ी बातें करने वालों पर शीघ्र भरोसा कर लेते हैं और मनुष्य की पहचान नहीं कर पाते। इसी कमजोरी का लाभ उन लोगों ने उठाया जो दान-व्यवस्था के भीतर पहुँच गये।
आज मीडिया का बड़ा भाग तथ्य की जगह मीडिया-ट्रायल कर रहा है। विपक्ष तो राजनीति करेगा ही; पर आश्चर्य यह है कि भाजपा-समर्थक मीडिया भी कुछ संकेतों पर चम्पत राय को ही बलि का बकरा बनाने में लगी है।
सही माँग यह होनी चाहिए कि SIT जाँच पूरी करे, केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित न रहे, बल्कि उन सभी लोगों तक पहुँचे जिनके कारण चोरी की व्यवस्था बनी, चाबियाँ गलत हाथों में पहुँचीं, कैमरों से छेड़छाड़ हुई और दान-गणना की मर्यादा टूटी।
चम्पत राय अपराधी हैं या नहीं — यह न्यायिक जाँच का विषय है। पर अभी तक जो तथ्य सामने हैं, वे उन्हें चोर सिद्ध नहीं करते; वे उन्हें एक असफल प्रशासक अवश्य सिद्ध करते हैं।
रामभक्तों के दान का विषय राजनीति या मीडिया-ट्रायल का विषय नहीं होना चाहिए। यह पारदर्शी जाँच, पूर्ण लेखा-परीक्षा और दोषियों को कठोर दण्ड देने का विषय है।

कुछ लोग मेरे पोस्ट का जानबूझकर गलत अर्थ लगा रहे हैं कि मैं चम्पत राय को निर्दोष मानता हूँ । उनकी जन्मकुण्डली में धर्म के भाव में प्रचण्ड धनयोग एवं अशुभ भी!ड्राइवर तो माध्यम है
।
चम्पतराय जी को बलि का बकरा बनाना अनुचित है क्योंकि बड़े बड़े मगरमच्छों ने इस बहती गंगा में हाथ धोये हैं । एक व्यक्ति को बलि का बकरा बनाकर बड़े मगरमच्छों को बचाना मीडिया का उद्देश्य है । घोटाला विशाल स्तर का है । चम्पत राय स्वयं चोर न भी हों तब भी दोषी है और जेल जाने योग्य हैं — क्योंकि सबसे वरिष्ठ पद पर वही थे और चोरी चलती रही ।
चम्पत राय की जानकारी और संलिप्तता के बिना कोई चोर वहाँ चोरी कर ही नहीं सकता ।
सबसे अधिक वेध=नृ : ट्रस्ट का सर्वेसर्वा बनने का प्रयास कर रहा है ।

एक्सपोज हुआ ‘ब्राम्हणवाद’ का झूठा प्रोपेगेंडा : भाग एक

राकेश उपाध्याय

दिल्ली। देश के विभाजन के पूर्व भारत बुरी तरह से अंग्रेजी साम्राज्य द्वारा लूटा गया, बांटा गया । गंगा घाटी की लूट ने संसार में लूट के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त किए। इन बातों से देश की जनता का ध्यान हटाने के लिए ही अंग्रेजी राज में जातिगत ऊंच नीच का नया ताना-बाना रचा गया।

वस्तुतः आज नए सिरे से हर तथ्य की पड़ताल आवश्यक है। मसलन, आजादी के समय मौजूद 582 गणराज्यों की स्वायत्त राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक-व्यापारिक व्यवस्था का अध्ययन करते समय यह पूछा ही जाना चाहिए कि ये गणराज्य किन जातियों के आधिपत्य में अपनी व्यवस्था का संचालन कर रहे थे?

शोधपरक आंकड़ों के मुताबिक, 582 रियासतों या गणराज्यों में केवल 19 रियासतें या गणराज्य ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण, कायस्थ आदि के नियंत्रण में थीं, उनमें भी ज्यादातर आज के महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात आदि इलाकों में थीं।
इन 19 कथित ब्राह्मण नियंत्रण के गणराज्यों  को हटा देने के बाद बचती हैं 563 रियासतें, इनमें से 370 गणराज्यों का शासन-प्रशासन सीधे तौर पर क्षत्रियों, क्षत्रिय उपजातियों, मराठों, कुनबी, कुर्मी, कुशवाहा, यादव, पाल आदि अनेक प्रमुख योद्धा जातियों के हाथ में था। इन 370 गणराज्यों में ग्वालियर के कुर्मी शासक, इंदौर होल्कर घराने के धनगड़ यानी पाल शासक, कोल्हापुर के शाहूजी महाराज, बड़ौदा के गायकवाड़, मराठी पंवार, परमार आदि अनेक समूह शामिल हैं।

स्पष्ट है कि आज के कथित ओबीसी समाज के अधिकांश जातियों के लोग ही भारत का शासन-प्रशासनन चलाते आ रहे थे। 563 रियासतों या गणराज्यों में अधिकांश रियासतें या गणराज्य आज की कथित पिछड़ी, अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जातियों के ही अधीन थे। इनके जाति प्रमुखों में ही इन गणराज्यों के संचालन का दायित्व था। लिहाजा इन जातियों के भीतर राजप्रमुख बनने के लिए भारी प्रतिस्पर्धा भी रहती थी।

शोध विवरण के अनुसार, गुजरात, एमपी, महाराष्ट्र, कर्नाटक में सागर किनारे तक फैले 39 गणराज्य ऐसे थे जिनका सीधा नियंत्रण, प्रशासन कृषक, मत्स्यपालन, आखेट, युद्धक सामग्री के उत्पादन से जुड़ी कोली आदि जातियों के हाथ में ही था।

पहले भी अनेक शोध विवरणों में यह जानकारी आ चुकी है कि बंगाल की रियासत पर अनुसूचित जाति की महारानी रानी रासमणि का ही नियंत्रण था। गंगा घाटी में यदुवंश, निषाद जाति, डोम जाति, राजभर जाति, कुशवाहा जाति, पासवान, खटिक और चर्मकार के भी अनेक स्वायत्त राजकीय व्यवस्थाएं चल रही थीं। इनमें से कई को गणराज्य का दर्जा मिला हुआ था।

वस्तुतः इन सभी की स्वायत्ता को अंग्रेजी राज में चुनौती दी गई, और षड्यंत्रपूर्वक धीरे धीरे उसे कमजोर किया गया, या नष्ट ही कर दिया गया। इसमें अनेक कारक सम्मिलित हैं, जिनपर शोधपूर्ण सामग्री कभी दी जाएगी।
1947 से 1950 के मध्य भारत सरकार ने विधिपूर्वक इन जाति समूहों के नियंत्रण में चल रहे स्वायत्त गणराज्यों को अपने अधीन कर लिया। सबसे अंत में गोवा का नियंत्रण हमें मिला। यह इतिहास का ऐसा सत्य है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

प्राचीन भारत की वर्ण व्यवस्था या जाति व्यवस्था पर जो उंगली उठाते हैं, उन्हें पहले इसका जवाब देना होगा कि यदि उनके बताए अनुसार चारों ओर ब्राह्णण ही ब्राह्मण था तो 563 से अधिक रियासतों पर किस तरह से अन्य गैर ब्राह्मण जातियों का आधिपत्य आया?

यहां यह बताना उल्लेखनीय है कि औरंगजेब की सत्ता उखड़ने के बाद धीरे धीरे भारत की कथित पिछड़ी जातियों ने अपनी स्वायतत्ता फिर से अपने गणराज्यों में कायम कर ली। 1857 आते आते 584 गणराज्यों में मुस्लिम नवाबों या उनके सूबेदारों का हिस्सा बुरी तरह घट गया। 1947 में तो मुश्किल से 50 से भी कम रियासतें मुस्लिम अगुवाई में शेष बची थीं।

इस प्रकार मुस्लिम आधिपत्य के कमजोर पड़ते ही कथित पिछड़ी जातियों के नेतृत्व ने और जनजातियों ने अपनी स्वतंत्रता कायम कर ली थी, जिन्हें पुनः ब्रिटिश राज में नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

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