चढ़ावा चोरी में शामिल लोग संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं

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डॉ. आदित्य

पटना। आरएसएस एक शुद्ध नास्तिकतावादी संगठन है. यह धर्म के प्रति नहीं बल्कि आरएसएस के प्रति निष्ठा सिखाता है. इस संगठन में सिर्फ धूर्तता, चुगलखोरी, आपसी प्रतिस्पर्धा इत्यादि की ट्रेनिंग दी जाती है. आरएसएस का हिंदुत्व सावरकर से प्रभावित है जो कि शुद्ध अनस्थावादी था जबकि गंगा पट्टी का हिंदुत्व की झलक चन्द्रनाथ बसु के हिंदुत्व विमर्श से मेल खाता है, जो कि शुद्ध आस्था पर टिका है. संघ चरित्र का निर्माण नहीँ करता है बल्कि कुलीन हिन्दू समाज के चरित्रवान बच्चों को फंसा कर उसे चरित्रहीन एवं निज परिवार से विमुख कर उसे निरर्थक बना देता है. आरएसएस, मराठा विस्तारवाद का प्रकल्प है. ये पूरे देश में मराठी आइकन जैसे सावरकर, फुले, अम्बेडकर, हेडगेवार इत्यादि की स्थापना करके लोकल legends की हत्या करता है.

आरएसएस वस्तुतः हिन्दुओं के विनाश के लिए ही बना है, इस बात को हिन्दू तब समझेंगे जब उनका विनाश होने को होगा. आरएसएस को जब भी सत्ता मिली, वे वामपंथी तत्वों को अपना सलाहकार बनाने लगता है. हिन्दुओं के सामूहिकता को नष्ट करने के विचार समाज में प्रेषित करता है. हिंदुत्व से अलग आयाम विकसित करने लगता है जैसे पर्यावरण, कुटुंब, समरसता इत्यादि. इन आयामों में हिन्दुओं को उलझा कर हिंदुत्व पर आसन्न चुनौतियों से उनका ध्यान भटका देता है. आरएसएस हिन्दू मोबिलइजेशन से डरता है और उसे हतोत्साहित करता है. राम मंदिर में आज जितने भी लड़के पकड़ाए हैं वे सभी संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं. यह इस बात को प्रमाणित करता है कि संघ से प्रशिक्षित स्वयंसेवक के लिए भगवान एवं ईश्वरीय दंड का भाव समाप्त हो जाता है.

संघ अपने स्वयंसेवकों को इस हद दर्जे का हिन्दू द्रोही बना देता है कि वे निज परिवार एवं ईश्वरीय आस्था का भंजक हो जाता है. संघ हिन्दू समाज का दुश्मन है. संघ का असली हिन्दू द्रोही चरित्र क्षेत्र प्रचारक स्तर से प्रारम्भ हो जाता है. प्रान्त तक हिंदूवादी संगठन दिखने वाला संगठन बस मौके की तलाश है. आरएसएस सिर्फ और सिर्फ mediocre मंद बुद्धि एवं तलवा चाट प्रचारक एवं स्वयंसेवकों को इसलिए आगे बढ़ाता है क्योंकि सच्चा, ईमानदार स्वयंसेवक या जिला या विभाग प्रचारक हिंदुत्व को लेकर गंभीर होते हैं. मुख्य तौर पर ऐसे प्रचारकों को गोबर इत्यादि प्रकल्पों में भेजकर उसे out of trend कर देते है. संघ ऐसे प्रतिभाशाली स्वयंसेवकों एवं प्रचारकों से डरता है कि कहीं इनके कारण सच में हिंदुत्व का जागरण न हो जाये. आरएसएस ने समाज को जातियों में बांटा है एवं वह जातीय उन्माद के प्रति मौन रहता है. अतः आरएसएस हिन्दू समाज का शुद्ध दुश्मन है.

सत्ता की बिसात, न्याय का सवाल और बिहार में नया सियासी भूचाल

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पटना। 17 जून 2026 की तारीख ने बिहार की राजनीति में एक ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है, जिसकी तपिश सत्ता के गलियारों से लेकर गांव की चौपालों तक महसूस की जा रही है। भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव के एक आम युवक, भरत तिवारी की पुलिस की गोली से हुई मौत ने सूबे की सियासत को पूरी तरह गर्मा दिया है। पुलिस इसे एक मुठभेड़ (एनकाउंटर) बता रही है, जबकि परिजनों का सीधा आरोप है कि यह ठंडे दिमाग से की गई हत्या है। अस्पताल में इलाज के दौरान भरत की मौत के बाद से ही यह मामला सिर्फ एक कथित एनकाउंटर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने बिहार की कानून-व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर कई गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

अपनों के घेरे में सरकार

इस घटना की सबसे खास और हैरान करने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के भीतर से ही विरोध के सुर मुखर होने लगे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए जहां सीएम ने आनन-फानन में हाई कोर्ट के पूर्व जज की निगरानी में एक जांच कमेटी गठित कर दी है, वहीं उनकी अपनी ही सरकार के साथी इस कदम से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिख रहे हैं।

जेडीयू अध्यक्ष संजय झा ने इस कथित मर्डर को लेकर बेहद कड़े और गंभीर सवाल उठाए हैं। वहीं दूसरी ओर, पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता अश्विनी चौबे ने तो इसे सीधे तौर पर ‘हत्या’ करार देते हुए पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए एक मुहिम शुरू करने का ऐलान कर दिया है। गठबंधन के भीतर से उठ रही सीबीआई जांच की मांग यह साफ दर्शाती है कि सम्राट चौधरी की कानून-व्यवस्था से उनके अपने ही साथी और नेता पूरी तरह खुश नहीं हैं।

तेजस्वी के लिए ‘टर्निंग पॉइंट’ और समावेशी राजनीति

इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य के मुख्य विपक्षी दल आरजेडी (राष्ट्रीय जनता दल) और उसके युवा नेता तेजस्वी यादव के लिए एक नया राजनीतिक फ्रेमवर्क तैयार करने का मौका दे दिया है। हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन इस जनाक्रोश ने तेजस्वी के सामने एक सुनहरा अवसर प्रस्तुत किया है।

बिहार सरकार के 2023 के जातीय सर्वेक्षण के आंकड़ों को देखें तो सूबे की कुल 13 करोड़ से अधिक की आबादी में सामाजिक ताना-बाना कुछ इस प्रकार है:

  • ओबीसी (पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वर्ग): 63% (27% पिछड़ा वर्ग + 36% अत्यंत पिछड़ा वर्ग)
  • अनुसूचित जाति (SC): 19%
  • मुस्लिम आबादी: 17% से अधिक
  • यादव आबादी: 14%
  • सामान्य वर्ग (सवर्ण जातियां): लगभग 10.56% (ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ)

आरजेडी के पास अपने पारंपरिक ‘माई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण के रूप में करीब 30-32 फीसदी वोटों का एक बेहद मजबूत और अटूट आधार पहले से ही मौजूद है। लेकिन सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने के लिए तेजस्वी को 5 से 10 फीसदी अतिरिक्त वोटों की सख्त जरूरत है।

भरत तिवारी ब्राह्मण समाज से आते थे, और उनकी लड़ाई किसी एक जाति विशेष के लिए नहीं, बल्कि विस्थापितों और समाज के दबे-कुचले वर्गों (जिसमें दलित, ओबीसी और यादव भी शामिल थे) के अधिकारों के लिए थी।

यही वजह है कि इस घटना ने सोशल मीडिया, नागरिक संगठनों और आम जनता को आंदोलित किया है। अगर तेजस्वी यादव इस मामले को केवल पारंपरिक विरोध की राजनीति तक सीमित न रखकर, इसे नागरिक अधिकारों, पुलिस जवाबदेही और ‘कानून के राज’ के रूप में उठाते हैं, तो वे सवर्ण समाज के उस बड़े हिस्से में भी अपनी पैठ बना सकते हैं जो अमूमन आरजेडी से दूरी बनाकर रखता है। इसे ही राजनीति में एक सफल ‘समावेशी रणनीति’ कहा जाता है, जो उनके राजनीतिक भविष्य के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है।

सम्राट चौधरी के सामने साख बचाने की चुनौती

फिलहाल, आरजेडी ने उदय नारायण चौधरी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल भेजकर पीड़ित परिवार से मुलाकात की है और सरकार को घेरने की पूरी तैयारी कर ली है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने अब अपनी सरकार की साख और कानून-व्यवस्था की छवि को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है। पूरी राज्य की नजरें अब पूर्व जज की निगरानी में बन रही जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। अगर इस जांच से भरत तिवारी का परिवार और जनता संतुष्ट होती है, तभी सरकार इस संभावित राजनीतिक नुकसान से बच पाएगी। तब तक, बुलेट और बैलेट के बीच फंसा यह मामला बिहार का सबसे बड़ा हॉट टॉपिक बना रहेगा।

पहले चंपतराय को जाने

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सर्वेश कुमार सिंह

लखनऊ । श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे को लेकर चर्चा है। सच क्या है एसआईटी जांच रिपोर्ट में पता चलेगा। लेकिन मीडिया, सोशल मीडिया में कई नामों को आरोपित किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी ने ट्रस्ट, संघ और भाजपा को निशाना बनाया है। ये उनकी भविष्य की रणनीति है। संदेह पैदा हुआ है तो सच सामने आना चाहिए।

मुझे सिर्फ चंपत जी के बारे में बात करनी है। वह भी इसलिए कि बगैर किसी आधार, तथ्य और प्रमाण के उन पर आरोप लगाए जा रहे है। आज अखिलेश यादव ने एक वीडियो शेयर किया है,जिसमें आल्हा की तर्ज पर इस प्रकरण को किसी गायक से तैयार कराया गया है। इसमें सीधे चंपत जी को आरोपित करके उनकी मानहानि की गई है। इस गायक और शेयर करने वालों को एसआईटी जांच रिपोर्ट के बाद अपनी गलती का अहसास होगा।
मैं चंपत जी को केवल पत्रकार के रूप में नहीं एक विद्यार्थी और शिक्षार्थी के रूप में 49 साल से जानता हूं। यानी कि 1977 से जब मैं 11वीं का छात्र था। उस समय चंपत जी संघ में थे, लेकिन प्रचारक नहीं थे। वे धामपुर (बिजनौर) के आरएसएम डिग्री कॉलेज में फिजिक्स के प्रवक्ता था। यानी डिग्री कॉलेज में वेतनभोगी। उन्होंने 1980 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन विभाग प्रचारक (मुरादाबाद) ओमप्रकाश जी की प्रेरणा से प्रचारक जीवन स्वीकार किया। जिस दिन ओमप्रकाश जी ने उनसे कहा नौकरी छोड़ दो उसी दिन उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। प्रचारक बन गए। संघ ने परंपरा के विपरीत उन्हें सीधे देहरादून का जिला प्रचारक बनाया। संघ में आमतौर पर कोई सीधे जिला प्रचारक नहीं बनता है। वे नगीना के बेहद सामान्य परिवार से है, परिवार में उनके बड़े भाई इंजीनियर से सेवानिवृत्त हुए है। अगर चंपत जी को धन की लालसा होती तो वे नौकरी में रहते। आज डिग्री कॉलेज के प्रिंसिपल से सेवानिवृत्त होते।
1977 से मेरा चंपत जी से परिचय आरम्भ हुआ और आज तक यथावत है। मैने उन्हें जिस सादगी में 1977 के एक प्रशिक्षण में अमरोहा में जैसे देखा, वैसे ही आज भी है। कम लोग जानते है कि जब 1984 में दिल्ली की धर्म संसद के बाद श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को विश्व हिंदू परिषद ने अपने हाथ में लिया, तो संघ से अशोक सिंहल जी समेत कई प्रचारक विहिप में भेजे गए थे। उनमें चंपत जी भी थे। उन्हें पश्चिम उत्तर प्रदेश प्रांत का संगठन मंत्री बनाया गया था। इस आंदोलन से प्रत्यक्ष रूप में अनेक नाम जुड़े है लेकिन पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने, क्रियान्वित करने, मुकदमों की सिस्टेमेटिक पैरवी करने, तथ्य एकत्रित करने का काम चंपत जी ने किया। सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमे की हर तारीख से पहले वकीलों की दिल्ली में बैठके कराते थे। मैं उन दिनों दिल्ली में था।
विश्व हिन्दू परिषद पर 2017-18 में ऐतिहासिक संकट आया था। जब कार्यकारी अध्यक्ष डॉ प्रवीण तोगड़िया जी के साथ नेतृत्व का टकराव हुआ। उस संकट से विहिप को चंपत जी के नेतृत्व ने ही उबारा था। जिस दिन डा तोगड़िया जी ने आरके पुरम कार्यालय पहुंचने की घोषणा की थी। उस दिन में संयोग से वहीं था।
चंपत जी विहिप में उपाध्यक्ष भी है। वे अशोक जी के अध्यक्ष रहते उनके साथ संगठन महामंत्री और महामंत्री भी रहे। अशोक जी का उन पर अटूट विश्वास था। उनके संघ और विहिप में प्रचारक जीवन पर कोई आरोप प्रत्यारोप कभी प्रमाणित नहीं हो सकता क्योंकि उनका लक्ष्य संगठन कार्य रहा है, धन कमाना होता तो शिक्षक की नौकरी का त्याग नहीं करते।
श्रीराम मंदिर निर्माण की नींव रखी जाने से लेकर उसकी पूर्णता और प्राण प्रतिष्ठा पूर्ण कराने तक उन्होंने जिस मनोयोग और विज्ञान के शिक्षक होने के नाते कौशल से कार्य पूर्ण कराया है उसके लिए उनका अभिनंदन किया जाना चाहिए। चंपत राय होना आसान नहीं है, एक जीवन होम करने के बाद कोई चंपतराय होता है।
मुझे अपने साथियों से भी आग्रह करना है। हमें सूचना देनी है और ये धर्म भी है और व्यवसायिक दायित्व भी। लेकिन तथ्यों के साथ ही। अतिशयोक्ति और सुनी हुई बातों को प्रकाशित करने से पहले जांच परख भी लेना चाहिए। मैं अपने निजी विश्वास से कह सकता हूं कोई भी जांच हो जाए, चंपत जी की निष्ठा और ईमानदारी निःसंदेह है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के 600 से अधिक लॉ स्टूडेंट्स सुप्रीम कोर्ट समेत दिल्ली के विभिन्न न्यायालयों में करेंगे इंटर्नशिप

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दिल्ली । अभाविप नीत दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) और अधिवक्ता परिषद दिल्ली प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर लॉ इंटर्नशिप 5.0 का शुभारंभ हुआ, छात्रों के शैक्षणिक ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव के बीच की दूरी को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए आज पाँचवे संस्करण का ओरिएंटेशन प्रोग्राम संपन्न हुआ।

यह इंटर्नशिप कार्यक्रम दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय के विद्यार्थियों को व्यावहारिक कानूनी अनुभव एवं न्यायिक व्यवस्था की गहन समझ प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किया गया है। इस पहल के अंतर्गत दिल्ली विश्वविद्यालय की विधि संकाय से कुल 964 आवेदन प्राप्त हुए थे,उनमें से 657 से अधिक विद्यार्थियों इंटरव्यू के आधार पर चुना गया आगामी 1 जुलाई से सभी चुने हुए विद्यार्थियों को प्रतिष्ठित अधिवक्ताओं एवं कानूनी विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में इंटर्नशिप करने का अवसर प्राप्त होगा। यह इंटर्नशिप कार्यक्रम विद्यार्थियों को सर्वोच्च न्यायालय, दिल्ली उच्च न्यायालय एवं दिल्ली की विभिन्न जिला अदालतों में कार्यप्रणाली को निकट से समझने का अवसर प्रदान करेगा।

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर लॉ इंटर्नशिप विद्यार्थियों के लिए एक प्रभावशाली मंच के रूप में स्थापित हुई है, जो भावी विधि पेशेवरों को न्यायिक प्रक्रियाओं, न्यायालयीन कार्यवाही, विधिक प्रारूपण (लीगल ड्राफ्टिंग) एवं अधिवक्ता कौशल को समझने और विकसित करने का अवसर प्रदान करती है। इस इंटर्नशिप के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली को समझने तथा अनुभवी अधिवक्ताओं से संवाद स्थापित करने का अवसर मिलेगा।

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ सचिव कुणाल चौधरी ने कहा कि इस इंटर्नशिप का उद्देश्य विधि छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान से सशक्त बनाना तथा उनके विधिक करियर के लिए मजबूत आधार तैयार करना है। यह कार्यक्रम युवा विधि विद्यार्थियों को न्याय व्यवस्था में सार्थक योगदान देने और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने के लिए प्रेरित करेगा तथा विद्यार्थियों के शैक्षणिक उत्कृष्टता, पेशेवर विकास एवं नेतृत्व क्षमता विकसित करेगा।

अधिवक्ता परिषद दिल्ली प्रांत के प्रदेश अध्यक्ष श्री संजय पोद्दार जी ने अधिवक्ताओं के व्यवहार और उनकी समाज उत्थान में भागीदारी पर प्रकाश डालते हुए कहा “डॉ. बी.आर. आंबेडकर लॉ इंटर्नशिप 5.0 केवल एक इंटर्नशिप कार्यक्रम नहीं, बल्कि विधि विद्यार्थियों के लिए न्यायिक व्यवस्था को निकटता से समझने का एक सशक्त माध्यम है। अधिवक्ता परिषद दिल्ली प्रांत सदैव युवा विधि विद्यार्थियों के मार्गदर्शन, कौशल विकास एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए प्रतिबद्ध रहा है। हमें विश्वास है कि यह इंटर्नशिप कार्यक्रम विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, व्यावसायिक दक्षता एवं नेतृत्व क्षमता को नई दिशा प्रदान करेगा और भविष्य में राष्ट्र को उत्कृष्ट विधि विशेषज्ञ प्रदान करेगा।

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