सूचना का अधिकार :  स्वप्रेरित प्रकटीकरण से लोकतंत्र होगा अधिक पारदर्शी

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लखनऊ। भारतीय लोकतंत्र ने सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के माध्यम से नागरिकों को शासन में भागीदारी का एक ऐसा संवैधानिक औजार प्रदान किया, जिसने पहली बार यह स्पष्ट किया कि सरकारी सूचनाएँ सरकार की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की धरोहर हैं। यह कानून केवल सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया निर्धारित करने वाला अधिनियम नहीं था, बल्कि शासन की संस्कृति बदलने का एक क्रांतिकारी प्रयास था। इसका उद्देश्य यह नहीं था कि प्रत्येक नागरिक अपने ही पैसे से चलने वाले सरकारी विभागों से हर छोटी-बड़ी जानकारी के लिए आवेदन लिखे, शुल्क जमा करे, निर्धारित समय तक प्रतीक्षा करे और आवश्यकता पड़ने पर प्रथम तथा द्वितीय अपीलों की लंबी प्रक्रिया से गुजरे। इस कानून का वास्तविक दर्शन इससे कहीं अधिक व्यापक था। इसकी मूल भावना यह थी कि सरकार स्वयं अधिकतम सूचनाएँ सार्वजनिक करे, ताकि नागरिकों को सूचना माँगने की आवश्यकता ही न्यूनतम रह जाए। दुर्भाग्य से दो दशकों के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में सूचना के अधिकार की प्रक्रिया तो विकसित हुई, किंतु उसकी आत्मा आज भी प्रशासनिक फाइलों में कहीं दबकर रह गई है। सूचना माँगना सामान्य हो गया है और सूचना देना अब भी अपवाद बना हुआ है।

आज देश में प्रतिवर्ष लाखों आरटीआई आवेदन दायर किए जाते हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे प्रश्नों की होती है जिनका उत्तर किसी भी आधुनिक, पारदर्शी और उत्तरदायी सरकार की वेबसाइट पर पहले से उपलब्ध होना चाहिए। नागरिक किसी भर्ती की चयन सूची जानना चाहता है, किसी सड़क निर्माण पर हुए व्यय का विवरण देखना चाहता है, किसी सरकारी योजना के लाभार्थियों की सूची प्राप्त करना चाहता है, किसी परियोजना की प्रगति रिपोर्ट समझना चाहता है, किसी विभाग का बजट या निविदा प्रक्रिया देखना चाहता है, या यह जानना चाहता है कि उसके आवेदन पर क्या कार्रवाई हुई। इन सूचनाओं के लिए आरटीआई आवेदन की आवश्यकता ही क्यों पड़े? यदि प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण नियमित रूप से अपनी वेबसाइटों को अद्यतन रखे और इन सभी जानकारियों को व्यवस्थित, खोजने योग्य तथा डाउनलोड करने योग्य स्वरूप में उपलब्ध कराए, तो न केवल नागरिकों का समय और धन बचेगा, बल्कि सरकार स्वयं भी अनावश्यक प्रशासनिक बोझ से मुक्त हो जाएगी। आज हजारों जन सूचना अधिकारी अपने समय का बड़ा भाग उन सूचनाओं को खोजने और उपलब्ध कराने में व्यतीत करते हैं जिन्हें तकनीकी रूप से एक बार सार्वजनिक कर देने के बाद लाखों लोग बिना किसी अतिरिक्त सरकारी प्रयास के देख सकते हैं। यह केवल प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों का अनावश्यक अपव्यय भी है।

लोकतांत्रिक शासन में पारदर्शिता का अर्थ केवल भ्रष्टाचार सामने आने के बाद जाँच करना नहीं होता, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना होता है जिसमें भ्रष्टाचार की संभावनाएँ प्रारंभ से ही सीमित हो जाएँ। स्वप्रेरित प्रकटीकरण इसी सिद्धांत पर आधारित है। जब किसी विभाग का प्रत्येक व्यय, प्रत्येक निविदा, प्रत्येक ठेका, प्रत्येक भुगतान, प्रत्येक परियोजना की प्रगति, प्रत्येक खरीद, प्रत्येक नियुक्ति और प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय जनता की निगाह में होता है, तब अनियमितताओं के लिए स्थान स्वतः संकुचित हो जाता है। दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों ने पिछले दो दशकों में ‘ओपन गवर्नमेंट’ और ‘ओपन डेटा’ की अवधारणाओं को इसलिए अपनाया क्योंकि उन्होंने समझ लिया कि सूचना को छिपाना शासन की शक्ति नहीं, बल्कि उसकी कमजोरी का संकेत है। जितनी अधिक जानकारी जनता के पास होगी, उतनी ही अधिक जवाबदेही स्थापित होगी और उतना ही अधिक विश्वास लोकतांत्रिक संस्थाओं में विकसित होगा। इसके विपरीत जहाँ सामान्य सूचनाएँ भी नागरिकों से छिपाई जाती हैं, वहाँ संदेह, अविश्वास और भ्रष्टाचार की संस्कृति स्वतः विकसित होती है।

डिजिटल प्रौद्योगिकी ने आज सरकारों के सामने वह अवसर उपलब्ध करा दिया है जिसकी कल्पना सूचना का अधिकार अधिनियम बनाते समय भी सीमित रूप में ही की गई होगी। अब किसी सूचना को सार्वजनिक करना न तो अत्यधिक महँगा है और न ही तकनीकी रूप से कठिन। प्रत्येक मंत्रालय, विभाग, विश्वविद्यालय, स्थानीय निकाय, सार्वजनिक उपक्रम, विकास प्राधिकरण और पंचायत अपने अभिलेखों का डिजिटल प्रबंधन कर सकता है। वेबसाइटों पर केवल औपचारिक परिचय या अधिकारियों की सूची डाल देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक पारदर्शिता तब होगी जब बजट, व्यय, ऑडिट रिपोर्ट, परियोजनाओं की प्रगति, निविदाएँ, अनुबंध, सेवा मानक, भर्ती प्रक्रिया, शिकायत निवारण की स्थिति, बैठकों के निर्णय, वार्षिक प्रतिवेदन, लाभार्थियों के आँकड़े और नागरिकों से संबंधित प्रत्येक महत्त्वपूर्ण सूचना समयबद्ध रूप से सार्वजनिक की जाए। यह भी आवश्यक है कि यह सूचना केवल अंग्रेज़ी तक सीमित न रहे, बल्कि भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध हो, ताकि सूचना का अधिकार वास्तव में प्रत्येक नागरिक का अधिकार बन सके, न कि केवल उन लोगों का जो तकनीकी या भाषाई दृष्टि से सक्षम हैं।

आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विश्लेषण और डिजिटल प्रशासन के युग में प्रवेश कर चुका है, तब सरकारी सूचनाओं का महत्व और भी बढ़ गया है। यदि सार्वजनिक सूचनाएँ मशीन-पठनीय स्वरूप में उपलब्ध हों, तो शोधकर्ता, विश्वविद्यालय, पत्रकार, उद्योग, स्टार्टअप, नीति निर्माता और नागरिक समाज संगठन उनके आधार पर बेहतर विश्लेषण कर सकते हैं। इससे न केवल अधिक वैज्ञानिक नीतियाँ बनेंगी, बल्कि प्रशासनिक कमियों की पहचान भी समय रहते की जा सकेगी। ओपन डेटा केवल पारदर्शिता का माध्यम नहीं, बल्कि नवाचार, आर्थिक विकास और बेहतर सार्वजनिक सेवाओं का भी आधार है। सूचना का लोकतंत्रीकरण ज्ञान का लोकतंत्रीकरण भी है। जो समाज अपनी सार्वजनिक सूचनाओं को खुला रखता है, वही भविष्य की ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने की क्षमता विकसित करता है।

यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि स्वप्रेरित प्रकटीकरण को केवल कानूनी अनुपालन का विषय न माना जाए। अनेक सरकारी वेबसाइटें वर्षों तक अद्यतन नहीं होतीं, अनेक लिंक निष्क्रिय रहते हैं, अनेक दस्तावेज़ अधूरे होते हैं और कई बार सूचना इस प्रकार प्रस्तुत की जाती है कि उसे समझना ही कठिन हो जाता है। ऐसी औपचारिकता पारदर्शिता नहीं कहलाती। सूचना तभी उपयोगी है जब वह समय पर, सटीक, पूर्ण, सरल, खोजने योग्य और नागरिकों के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो। यदि नागरिक को वेबसाइट पर जानकारी खोजने में उतनी ही कठिनाई हो जितनी आरटीआई आवेदन करने में होती है, तो स्वप्रेरित प्रकटीकरण का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।

भारत यदि वास्तव में सुशासन, डिजिटल लोकतंत्र और उत्तरदायी प्रशासन की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, तो सूचना के अधिकार की प्राथमिकता को पुनर्परिभाषित करना होगा। सफलता का मापदंड यह नहीं होना चाहिए कि कितने आरटीआई आवेदनों का निस्तारण हुआ, बल्कि यह होना चाहिए कि कितनी सूचनाएँ ऐसी थीं जिनके लिए नागरिकों को आवेदन करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। जिस दिन सरकारी कार्यालयों की वेबसाइटें इतनी समृद्ध, अद्यतन और विश्वसनीय हो जाएँगी कि सामान्य नागरिक अपनी अधिकांश आवश्यक जानकारियाँ कुछ ही क्लिक में प्राप्त कर सकेगा, उस दिन सूचना का अधिकार अधिनियम अपनी वास्तविक सफलता प्राप्त करेगा। लोकतंत्र का आदर्श नागरिकों को सूचना प्राप्त करने के लिए संघर्ष करने पर आधारित नहीं हो सकता; उसका आदर्श यह है कि शासन स्वयं नागरिकों के प्रति इतना पारदर्शी हो कि सूचना माँगना असाधारण घटना बन जाए। अंततः किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से नहीं आँकी जाती कि उसके पास सूचना का अधिकार कानून है या नहीं, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि उसकी सरकार जनता से सूचना छिपाने की संस्कृति का पालन करती है या जनता को सूचना देने की संस्कृति का। भारत के लिए अब समय आ गया है कि वह दूसरे मार्ग को पूरी प्रतिबद्धता के साथ अपनाए, क्योंकि सूचना का अधिकार तभी सार्थक होगा जब सरकार की पहली प्रवृत्ति सूचना रोकना नहीं, बल्कि उसे स्वेच्छा से सार्वजनिक करना होगी। यही लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का सर्वोच्च मानक है और यही सुशासन की वास्तविक पहचान भी।

साकार हुआ यमुना जल समझौता : राजस्थान की जल सुरक्षा का नया अध्याय

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जयपुर : राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल समझौते (एमओए) पर हस्ताक्षर, 32 साल पुरानी बहुप्रतीक्षित परियोजना साकार होने की दिशा में बढ़ी

34,102 करोड़ रुपये की परियोजना से राजस्थान की जल सुरक्षा होगी सुदृढ़, शेखावाटी सहित जल संकटग्रस्त क्षेत्रों को मिलेगा स्थायी पेयजल

नई दिल्ली, 29 जून। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व, सहकारी संघवाद की भावना तथा केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह के सतत मार्गदर्शन और समन्वयकारी प्रयासों से राजस्थान की बहुप्रतीक्षित यमुना जल परियोजना को ऐतिहासिक सफलता मिली है। सोमवार को नई दिल्ली में राजस्थान और हरियाणा के बीच यमुना जल समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। लगभग तीन दशक से लंबित यह परियोजना अब क्रियान्वयन के निर्णायक चरण में प्रवेश कर गई है। लगभग 34,102 करोड़ रुपये की लागत वाली यह महत्वाकांक्षी परियोजना राजस्थान के जल इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध होगी।

समझौते पर हस्ताक्षर के अवसर पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी.आर. पाटिल, राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भजन लाल शर्मा तथा हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी उपस्थित रहे। इस अवसर पर दोनों राज्यों एवं केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी भाग लिया।

मुख्यमंत्री श्री भजन लाल शर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के विजन में जल सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश में जल संरक्षण, जल प्रबंधन और राज्यों के बीच सहयोग की नई कार्य संस्कृति विकसित हुई है। नर्मदा परियोजना, जल जीवन मिशन, केन-बेतवा लिंक परियोजना तथा राम जल सेतु लिंक जैसी परियोजनाओं की तरह यमुना जल परियोजना भी इसी दूरदर्शी सोच का परिणाम है।

मुख्यमंत्री ने केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह के प्रति विशेष आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने दोनों राज्यों के मध्य विश्वास, संवाद और समन्वय का सेतु बनकर इस जटिल विषय का समाधान संभव बनाया। उन्होंने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी.आर. पाटिल की तकनीकी एवं प्रशासनिक नेतृत्व क्षमता की भी सराहना करते हुए कहा कि मंत्रालय के सक्रिय सहयोग से परियोजना की सभी आवश्यक प्रक्रियाओं को समयबद्ध गति मिली।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, केंद्र-राज्य समन्वय और समयबद्ध निर्णयों के माध्यम से दशकों से लंबित परियोजनाओं को भी सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पूर्वी राजस्थान के लिए राम जल सेतु लिंक परियोजना, जल जीवन मिशन और अब यमुना जल परियोजना इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

*हथिनीकुंड बैराज से बिछेगी 295.5 किलोमीटर लंबी भूमिगत पाइपलाइन*

यमुना जल परियोजना के अंतर्गत राजस्थान के हिस्से का 577 एमसीएम यमुना जल हरियाणा स्थित हथिनीकुंड बैराज से लगभग 295.5 किलोमीटर लंबी भूमिगत पाइपलाइन प्रणाली के माध्यम से चूरू जिले के हंसियावास जलाशय तक पहुँचाया जाएगा। परियोजना की अनुमानित लागत 34,102 करोड़ रुपये है।

परियोजना के अंतर्गत 3.6 मीटर व्यास की तीन भूमिगत पाइपलाइनें, निरीक्षण सड़क, कृत्रिम जलाशय तथा आधुनिक जल प्रबंधन प्रणाली विकसित की जाएगी। हरियाणा में भी दस स्थानों पर पेयजल उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है, जिससे यह परियोजना दोनों राज्यों के लिए समान रूप से लाभकारी सिद्ध होगी।

राजस्थान सरकार द्वारा परियोजना की विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार कर केंद्रीय जल आयोग के e-PAMS पोर्टल पर अपलोड की जा चुकी है तथा हरियाणा द्वारा पाइपलाइन अलाइनमेंट को सैद्धांतिक स्वीकृति भी प्रदान की जा चुकी है। परियोजना के निर्माण एवं संचालन के लिए राजस्थान हरियाणा यमुना वाटर परियोजना -SPV (RHYW-SPV) का गठन किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि यह ऐतिहासिक पहल राजस्थान की आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करेगी तथा शेखावाटी सहित प्रदेश के जल संकटग्रस्त क्षेत्रों के सामाजिक, आर्थिक और औद्योगिक विकास को नई गति प्रदान करेगी।

बताया हुआ काम करना चाहिए पर उसका ढोल पीटने की आवश्यकता नहीं

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दिल्ली । डॉक्टर जी अपनी बैठक में यह बार-बार बताते थे कि “बताया हुआ काम करना चाहिए पर उसका ढोल पीटने की आवश्यकता नहीं” तथा “यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि यदि अकेले हमने काम से जी चुराया तो कौन-सा बड़ा बिगड़नेवाला है। यह काम की सही पद्धति नहीं है।”

अपनी बात को पुष्ट करने के लिए वे एक घटना का उदाहरण देते थे। राजा लक्ष्मणराव भोंसले के यहाँ एक समारोह में पानदान का चूना समाप्त हो गया। उसी समय चूना लाने का आदेश हुआ। एक के बाद एक ‘चूना लाओ’, ‘चूना लाओ’ जोर-जोर से दूसरों से कहने लगे; परन्तु चूना नहीं आया। डॉक्टर जी घर से परिचित थे। अतः वे अन्दर जाकर चूना ले आये। पर उसके बाद भी काफी देर तक ‘चूना लाओ’ का हुकुम एक नौकर से दूसरे नौकर पर चल रहा था।

इसी प्रकार वे एक दूसरी कथा बताते थे। एक बार किसी राजा ने प्रातः सूर्योदय के पहले मन्दिर के कुण्ड में एक लोटा दूध डालने का आदेश अपनी सब जनता को दिया। प्रातः अंधेरे में राजाज्ञा का पालन करने के लिए निकलनेवाला प्रत्येक व्यक्ति सोचने लगा कि “सब तो दूध डालेंगे। यदि मैंने अकेले एक लोटा पानी डाल दिया तो क्या बिगड़ता है।” प्रत्येक ने ऐसा सोचकर एक-एक लोटा पानी डाल दिया। सूर्योदय के बाद देखा तो कुण्ड में पानी-ही-पानी था। दूध का कहीं नामोनिशान भी नहीं था।

इस प्रकार वे स्वयंसेवक के मन पर यह अंकित करते थे कि एक व्यक्ति के ठीक काम न करने का क्या परिणाम होता है।

साभार : डॉ. हेडगेवार चरित

CNFF-2026: भारतीय विरासत, देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों पर आधारित फिल्मों का राष्ट्रीय संगम 

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नव ठाकुरीया
गुवाहाटी: पूर्वोत्तर भारत के फिल्म प्रेमियों, समीक्षकों और फिल्म निर्माता-निर्देशकों के लिए 24 और 25 अक्टूबर 2026 को देशभक्ति, भारतीय सभ्यता, संस्कृति और विरासत पर आधारित फिल्मों को देखने का विशेष अवसर मिलेगा। चलचित्रम नेशनल फिल्म फेस्टिवल (CNFF) का 10वां संस्करण गुवाहाटी के कहिलीपाड़ा स्थित ज्योति चित्रबन फिल्म सोसाइटी परिसर में आयोजित होगा, जहां चयनित लघु फिल्में और डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शित की जाएंगी। विश्व संवाद केंद्र-असम की सहयोगी संस्था चलचित्रम (https://chalachitram.in/) द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रतिष्ठित फिल्म हस्तियों और फिल्म प्रेमियों की उपस्थिति में चयनित प्रविष्टियों को ट्रॉफी, प्रमाणपत्र और नकद पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे।
भारतीय चित्र साधना के मार्गदर्शन में शुरू हुए इस महोत्सव की शुरुआत वर्ष 2017 में गुवाहाटी फिल्म फेस्टिवल के रूप में हुई थी। वर्ष 2019 में इसका नाम बदलकर चलचित्रम नेशनल फिल्म फेस्टिवल रखा गया और इसे ‘हमारी विरासत, हमारा गौरव’ (Our Heritage Our Pride) विषय के साथ नया स्वरूप दिया गया। महोत्सव में भारतीय विरासत, स्थानीय समाज, स्वतंत्रता संग्राम के नायक, महाकाव्य एवं पौराणिक कथाएं, राष्ट्रीय एकता, कला एवं कलाकार, योग, ध्यान, आयुर्वेद, पांडुलिपियां, चित्रकला, पारिवारिक मूल्य, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, भूमि और जनजीवन, पर्यटन, हस्तशिल्प, वस्त्र उद्योग, लकड़ी की नक्काशी, संगीत, स्थानीय पर्व-त्योहार, पारंपरिक खेल, स्मारक एवं विरासत स्थल, समाज सुधारक, चाय एवं तेल उद्योग सहित अनेक विषयों पर आधारित फिल्मों को स्थान दिया जाता है।
कलाकारों, समीक्षकों, फिल्मकारों, लेखकों और अन्य विशेषज्ञों की जूरी पुरस्कार विजेता फिल्मों का चयन करती है। नॉर्थ-ईस्ट इंडिया कैटेगरी में सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फीचर, सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, पटकथा, सिनेमैटोग्राफी तथा संपादन सहित पांच पुरस्कार दिए जाएंगे, जबकि ऑल इंडिया कैटेगरी में सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फीचर और सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री के लिए दो पुरस्कार निर्धारित हैं। सभी श्रेणियां पेशेवर और नए फिल्मकारों के लिए समान रूप से खुली हैं। फिल्मों की अवधि 1 से 25 मिनट के बीच होनी चाहिए तथा उनका निर्माण 1 सितंबर 2025 से 1 सितंबर 2026 के बीच हुआ होना आवश्यक है। प्रविष्टियों के लिए अर्ली बर्ड (10-30 जून) में कोई शुल्क नहीं, रेगुलर डेडलाइन (1-20 जुलाई) के लिए 500 रुपये तथा फाइनल डेडलाइन (20 जुलाई-2 सितंबर) के लिए 1,000 रुपये शुल्क निर्धारित है। प्रविष्टियां सीधे CNFF कार्यालय (ई-मेल: chalachitramne@gmail.com) अथवा FilmFreeway के माध्यम से भेजी जा सकती हैं।
देशभर में आयोजित होने वाले विभिन्न राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों के बीच CNFF ने भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। यह अब उन प्रमुख आयोजनों की श्रेणी में शामिल है, जिनमें MAMI मुंबई फिल्म फेस्टिवल, ग्रेट इंडियन फिल्म एंड लिटरेचर फेस्टिवल, एशिया लाइवलीहुड डॉक्यूमेंट्री फेस्टिवल, अल्पविराम साउथ एशियन शॉर्ट एंड डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेस्ट, बैंगलोर क्वीर फिल्म फेस्ट, ब्रह्मपुत्र वैली फिल्म फेस्ट, सिनेमेला फिल्म फेस्ट, फ्लैशपॉइंट ह्यूमन राइट्स फिल्म फेस्ट, गोल्डन ज्यूरी फिल्म फेस्ट, हैदराबाद बंगाली फिल्म फेस्ट, इंडोग्मा फिल्म फेस्ट, जागरण फिल्म फेस्ट, जीविका फिल्म फेस्ट, कलाकारि फिल्म फेस्ट, मधुबनी फिल्म फेस्ट, नई दिल्ली फिल्म फेस्ट, नेशनल साइंस फिल्म फेस्ट, सिनेफैन फेस्टिवल ऑफ एशियन एंड अरब सिनेमा, पटना फिल्म फेस्ट, राजस्थान फिल्म फेस्ट, टाइगरलैंड इंडिया फिल्म फेस्ट, वेरिटे फिल्म फेस्ट और विबग्योर फिल्म फेस्ट जैसे प्रतिष्ठित आयोजन शामिल हैं।
पिछले यानी 9वें CNFF का उद्घाटन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असम क्षेत्र प्रचार प्रमुख सुनील मोहंती ने भारत माता तथा डॉ. भूपेन हजारिका, जुबीन गर्ग और दीपक शर्मा के चित्रों के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया था। इस संस्करण में प्रतियोगिता और गैर-प्रतियोगिता श्रेणी में 30 से अधिक लघु फीचर फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया। इनमें वृद्धावस्था का अकेलापन, जीवन का उद्देश्य, मृत्यु की नई व्याख्या, परिवार के साथ शांतिपूर्ण जीवन की तलाश, आधुनिक जीवन के आकर्षण और भ्रम, पर्यावरण, भारत की हजारों वर्षों पुरानी सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत तथा अनेक समकालीन विषयों को संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया। कुछ फिल्मों में शहरी क्षेत्रों में अकेले रह रहे बुजुर्ग पेशेवरों की चुनौतियों, लोककथाओं और लोकगीतों के माध्यम से मानसिक संबल, कमजोर होते पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक तनावों को रेखांकित किया गया।
कई फिल्मों ने जाति-आधारित सामाजिक संरचना और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्षरत वंचित समुदायों की चुनौतियों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। कुछ प्रविष्टियों में धीमी गति से सीखने वाले और दिव्यांग बच्चों की दुनिया से दर्शकों को परिचित कराया गया, जिससे उनके जीवन के भावनात्मक और संवेदनशील पहलुओं को समझने का अवसर मिला। मातृसत्तात्मक समाज में विवाह के बाद पुरुषों द्वारा अपना पैतृक परिवार छोड़ने की परंपरा, जादू-टोने से जुड़ी प्राचीन मान्यताएं, असम की पारंपरिक धागे वाली कठपुतली कला, भारत के प्राचीन वस्त्र उद्योग की विरासत और आधुनिक तकनीक से उत्पन्न चुनौतियां तथा ग्रामीण समाज में प्रचलित बुरी आत्माओं की लोककथाओं जैसे विषय भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहे।
कुछ फिल्मों में बदलती मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के कारण परिवार और रिश्तों से दूर होते युवाओं की समस्याओं को भी सामने रखा गया। साथ ही यह सकारात्मक संदेश भी दिया गया कि परिवार के निस्वार्थ प्रेम और स्नेह से वे पुनः आत्मविश्वास प्राप्त कर समाज के प्रति जिम्मेदारी और अपनत्व की भावना के साथ अपनी शिक्षा तथा भविष्य के करियर की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
समापन समारोह में तत्कालीन असम विधानसभा अध्यक्ष बिस्वजीत दैमारी, अनेक फिल्म हस्तियां, गणमान्य अतिथि और बड़ी संख्या में फिल्म प्रेमी उपस्थित रहे। आयोजन समिति की ओर से विश्व संवाद केंद्र-असम के सचिव किशोर शिवम, CNFF के सचिव भगवत प्रीतम ने आशा व्यक्त किया कि यह महोत्सव उभरते फिल्मकारों को सिनेमा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन, वंचित वर्गों के सशक्तिकरण और देशभक्ति की भावना को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सुदृढ़ करने के लिए प्रेरित करता रहेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और चलचित्रम नेशनल फिल्म फेस्टिवल (CNFF) के अध्यक्ष हैं)

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