महिला क्रिकेट में एक नये युग का आरम्भ

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दिल्ली । दो नवंबर 2025 का दिन भारतीय महिला क्रिकेट के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरो में लिखा जाएगा। इस दिन भारत की महिला क्रिंकेट टीम ने कप्तान हरमनप्रीत कौर के नेतृत्व में विश्व विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया।कप्तान हरमनप्रीत का नाम भी अब उसी प्रकार स्वर्णिंम अक्षरों में लिखा जाएगा जिस प्रकार से पुरुष क्रिकेट में कपिल देव लिखा जाता है। एक समय यह दिवास्वप्न लग रहा था क्योंकि लगातार तीन लीग मैच हारने के बाद भारत के लिए सेमीफाइनल में भी पहुंचना बहुत कठिन था किन्तु भारत की बेटियों ने धैर्य के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ दिया और भारतीय महिला क्रिकेट को यह अभूतपूर्व सफलता मिली।

आज इस महान उपलिब्ध पर घर -घर चर्चा हो रही है। महिला विश्व कप में विजय का उत्सव हर भारतीय ने उसी प्रकार मनाया जिस प्रकार 1983 का पुरुष विश्व कप जीतने के बाद मनाया था। बेटियों के अभूतपूर्व प्रदर्शन पर हर तरफ आनंद ही आनंद बिखरा है, इसका उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार विधानसभा चुनावो की अपनी रैलियों मे भी किया है। विजयी टीम कि सभी बेटियों के संघर्ष की कहानियां मीडिया के माध्यम से समाज के समक्ष राखी जा रही हैं जिससे भविष्य की उन बेटियों को प्रेरणा मिल सके जो क्रीड़ा जगत में कैरियर बनाना चाहती रही हैं। हमारी बेटियों ने महिला क्रिकेट में आस्ट्रैलिया व इंग्लैड जैसे देशों का वर्चस्व ध्वस्त करने मे सफलता प्राप्त की है।

भारत के महिला क्रिकेट को इन ऊचाइयों तक ले जाने में आईसीसी के वर्तमान अध्यक्ष व भारतीय क्रिकेट बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष जय शाह कि दूरदर्शी सोच तथा भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। महिला क्रिकेट को सबसे अधिक बढ़ावा उनके कार्यकाल में ही मिला है। जय शाह के कार्यकाल में पहली बार महिला क्रिकेट खिलाडियों का वेतनमान पुरुष खिलाड़ियों के समकक्ष किया गया। स्मरणीय है कि 2005 में इन्हीं महिला खिलाड़ियों को मैच फीस के रूप में मात्र एक हजार रुपए मिला करते थे। जय शाह के कार्यकाल में महिलाओं के लिए आईपीएल लीग का आरम्भ किया गया। महिला क्रिकेट टीम के लिए अधिक से अधिक खेल व अभ्यास के अवसर उपलब्ध कराने के उददेश्य से दूसरे देशों के साथ द्विपक्षीय श्रृखलाओं की संख्या लगातार बढ़ाई गई। जय शाह की अध्यक्षता में महिला क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए किए गए प्रयासों का परिणाम अब सामने है। वर्ष 2025 भारतीय महिला क्रिकेट के लिए स्वर्णिम है क्योकि इस वर्ष भारत ने दो विश्व कप जीतकर इतिहस रचा है पहले भारतीय टीम ने अंडर -19 का खिताब जीता और अब यह विश्व कप जीतने मे सफलता प्राप्त की है।

जिन महिला क्रिकेट खिलाडियों को कभी मैच फी भी उनके परिश्रम के अनुरूप नहीं मिलती थी आज उन्हीं पर पुरस्कारों की बरसात हो रही है । बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने बताया कि महिला क्रिकेट टीम को बोर्ड सम्मान के तौर पर 51 करोड़ रुपए नकद इनाम देगा । हिमाचल प्रदेश सरकार ने टीम सदस्य रेणुका सिंह ठाकुर को एक करोड़ रुपए और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है। मध्य प्रदेश सरकार तेज गेंदबाज क्रांति गौड़ को एक करोड़ का नगद पुरस्कार देगी। आईसीसी ने टीम को ट्राफी के साथ 40 करोड़ का पुरस्कार देने की घोषणाकी है। उत्तर प्रदेश सरकार ने विश्व कप में यादगार प्रदर्शन करने वाली दीति शर्मा का प्रमोशन तत्काल प्रभाव से कर दिया है। सूरत के उद्योगपति राज्यसभा सांसद गोविंद ढोलकिया ने भारतीय टीम की सभी सदस्यों को डायमंड ज्वैलरी और सोलर पैनल देने की घोषणा की है ।

ऐसा माना जा रहा है कि इस विजय आने वाले समय में एक बड़ा बदलाव यह भी दिखाई देगा कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए बड़ी कंपनियों के निवेशक व विज्ञापनदाता उपलब्ध हो सकेंगे। भविष्य में नई खेल प्रतिभाएं उभरकर कर सामने आयेंगी। यह विजय एक -एक ऐतिहासिक टर्निग प्वाइंट है तथा आाने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।

विजय कि गाथा में यदि भारतीय महिला टीम के कोच अमोल मजूमदार की बात न की जाए तो यह बात अधूरी रह जाएगी। अमोल की भूमिका अभिनंदनीय है । अमोल का खेल कैरियर 1990 के दशक में उस समय प्रारंभ हुआ था जब राहुल द्रविड, सौरव गांगुली, वीवीएस लक्ष्मण जैसे दिग्गज मैदान पर थे जिस कारण उनका क्रिकेट कैरियर अधिक नहीं बढ़ पाया और वह केवल रणजी तक ही सीमित होकर रह गये। अमोल ने महिला क्रिकेट टीम के कोच के रूप में महिला खिलाड़ियों को लड़ने का साहस, सामर्थ्य और दृढ़ता दी। महिला क्रिकेट टीम ने भी उनको निराश नहीं किया और गुरुदक्षिणा में विश्व विजय की ट्राफी अर्पित कर दी।

विजयोत्सव के इस शोर में कुछ ध्यान रखना तो यह कि विजय के उत्सव कुछ समय बाद फीके पड़ जाते हैं उनका उत्साह और उल्लास बनाए रखने के लिए निरंतर जीत और जीत के प्रयास की आदत डालनी पड़ती है ।

देश के पहले लेखक ग्राम में हुआ लेखकों का जुटान

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देहरादून। तीन नवम्बर से पाँच नवंबर, 2025 को हिमालय की पावन अधित्यका में देहरादून के थानों ग्राम में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के दृष्टा, भारत के सर्वप्रिय पूर्व शिक्षा मंत्री, उत्तराखण्ड के यशस्वी पूर्व मुख्यमंत्री एवं अविभाजित उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक जी द्वारा परिकल्पित और स्थापित देश के पहले लेखक गाँव में स्पर्श हिमालय महोत्सव 2025 में विशिष्ट अतिथि के रूप में सम्मानित होने तथा कथेतर साहित्य पर अपने विचार रखने का पुनीत अवसर प्राप्त हुआ। इस कार्यक्रम में साठ से अधिक देशों की हिंदी प्रेमी विभूतियों ने सहभागिता की।

इस अवसर पर मित्रकुल के अनेक वरेण्य मित्रजन से दर्शन सुख तथा मिलन सुख प्राप्त हुआ, जिनमें स्वयं आदरणीय रमेश पोखरियाल निशंक जी, उत्तराखण्ड के लोकप्रिय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी, पद्मश्री डॉ हरमोहिंदर सिंह बेदी जी, परमार्थ निकेतन के आदरणीय चिदानंद मुनि जी महाराज, केंद्रीय मंत्री किरण रिजीजू जी, ब्रिटेन के आदरणीय अग्रज श्री तेजेन्द्र शर्मा जी, जापान की मित्र डॉ रमा पूर्णिमा अजय शर्मा, अमेरिका के अनूप भार्गव, अमेरिका से दीदी डॉ कविता वाचकक्नवी जी, नीदरलैंड की ऋतु शर्मा नन्नन पाण्डेय, नॉर्वे के मित्र शरद आलोक जी, जर्मनी से ऑनलाइन माध्यम से डॉ शिप्रा शिल्पी सक्सेना, उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी के कुलपति मेरे अग्रज नवीन चंद्र लोहनी जी, राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय के उपनिदेशक मित्र रघुबीर शर्मा, बम्बई विश्वविद्यालय, मुंबई के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो करुणाशंकर उपाध्याय जी, उत्तराखण्ड के राज्यपाल के पूर्व सचिव डॉ अरुण ढौंढियाल जी, दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ साधना अग्रवाल जी, डॉ ऋषि कुमार शर्मा जी, डॉ रवि कुमार गोंड जी, डॉ वेदप्रकाश वत्स, अनंग प्रकाशन के मित्र सत्यभान जी, अनिल जोशी जी, जयपुर के मित्र डॉ बाबूलाल मीणा जी, डॉ दीपक शर्मा, डॉ नीलू शर्मा, अमृतसर से डॉ किरण खन्ना जी Kiran Khanna, मिजोरम के मित्र प्रो सुशील कुमार शर्मा Sushil Sharma, खालसा कॉलेज, दिल्ली की पूर्व प्राचार्य डॉ हरविंदर कौर बिंद्रा जी, वाराणसी के मित्र प्रो राजमुनि शर्मा जी तथा अनेक इष्ट मित्र मिले। विस्तार भय के कारण सबके नाम नहीं लिख पा रहा हूँ किन्तु इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि अद्भुत,अप्रतिम, दिव्य, पुनीत और मनोरम स्मृतियों के साथ वापस लौट रहा हूँ। पूज्य डॉ रमेश पोखरियाल निशंक जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना स्वयं को लघु करना होगा। अतः इस अवसर पर उनके प्रति विनयावनत हूँ।

अधिकारी-कर्मचारी कथा

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शंकर कुमार झा

जंगल में शेर ने एक फैक्ट्री डाली… उसमें एकमात्र काम करने वाली चींटियाँ थी जो समय से आती जाती थीं और फैक्ट्री का सारा काम करती थी।
शेर का व्यसाय बहुत ही व्यवस्थित ढंग से चल रहा था।

एक दिन शेर ने सोचा कि ये चींटियां इतना सुंदर काम कर रही है, अगर इसको किसी विशेषज्ञ के निगरानी में रख दूँ तो और बेहतर काम कर सकती है।
ये ख्याल मन में आते ही शेर ने एक मधुमक्खी को मैनेजर नियुक्त कर दिया।

मधुमक्खी को कार्य का बहुत अनुभव था और वह रिपोर्ट्स लिखने में भी बहुत होशियार थी।

मधुमक्खी ने शेर से कहा कि सबसे पहले हमें चींटियों का काम करने का समय सारणी बनाना होगा। फिर उसके काम का सारा रिकार्ड अच्छी तरह रखने के लिए मुझे एक अलग से सेक्रेटरी चाहिए होगा।

शेर ने खरगोश को सेक्रेटरी के रूप में नियुक्त कर दिया।

शेर को मधुमक्खी का कार्य पसंद आया। उसने कहा कि चींटियों के अब तक पूरे हुए सारे कार्यों की रिपोर्ट दो और जो प्रगति हुई है उसको एक सुंदर ग्राफ बनाकर निर्देशित करो।

मधुमक्खी ने कहा ठीक है, मगर मुझे इसके लिए कंप्यूटर, लेज़र प्रिंटर और प्रोजेक्टर चाहिए होगा। इस सबके लिए शेर ने एक कंप्यूटर डिपार्टमेंट बना दिया और बिल्ली को वहां का सर्वेसर्वा नियुक्त कर दिया।

अब चींटी अपना काम करने के बजाय सिर्फ कागज़ी रिपोर्ट बनाने में ध्यान देने लगी, जिससे उसका काम पिछड़ता गया और अंततः प्रोडक्शन कम हो गया।
शेर ने सोचा कि कंपनी में एक तकनीकी विशेषज्ञ रखा जाय जो मधुमक्खी की सलाहों पर अपनी राय दे सके। ऐसा सोंचकर उसने बंदर को तकनीकी विशेषज्ञ नियुक्त कर दिया।

अब चींटी को जो भी काम दिया जाता वह उसको पूरी सामर्थ्य से करने की कोशिश करती लेकिन अगर काम कभी पूरा नहीं होता तो वह विवश होकर उसको अपूर्ण छोड़कर घर चली जाती।

शेर को लगातार नुकसान होने लगा तो वह बहुत बेचैन हो उठा। कोई उपाय न देख मजबूरी में उसने उल्लू को नुकसान का कारण पता लगाने के लिए नियुक्त कर दिया।

तीन महीने बाद उल्लू ने शेर को अपनी विस्तृत व बेहद गोपनीय रिपोर्ट सौंप दी; जिसमें उसने बताया कि फैक्ट्री में काम करने वालों की संख्या ज्यादा है औऱ कंपनी के घाटे को कम करने के लिए कर्मचारियों को सस्पेंड, नोटिस, बर्खास्त करना होगा…

शिक्षा:-

अब आप गंभीरता से सोचिए; किसको सस्पेंड, नोटिस, बर्खास्त किया जाएगा..??

चींटियों को… क्योंकि वास्तव में वही एक मात्र वर्कर थी। “यही व्यवस्था सरकार करती है, सरकारी विभागों में इतने ज्यादा अधिकारी है और वह सब केवल कर्मचारी से काम की रिपोर्ट मांगते हैं। आज कर्मचारी का ज्यादा समय साहब लोगों को रिपोर्ट भेजने में बर्बाद होता है, उसके पास वास्तविक काम का समय ही नहीं बचता।

हिंदी उपन्यास की नई आवाज़: एएमयू सेमिनार में असहमति, सृजन पर चर्चा

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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के हिंदी विभाग ने दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया, जिसका विषय था —“समकालीन हिंदी उपन्यास: समय, समाज और संस्कृति में असहमति की आवाज़”।

फ़ैकल्टी ऑफ आर्ट्स लाउंज में हुए इस आयोजन में देशभर के प्रसिद्ध विद्वान और लेखक शामिल हुए। चर्चा का केंद्र यह रहा कि आज का हिंदी उपन्यास कैसे समाज की आत्मा को टटोलते हुए एक जागरूक प्रतिरोध की आवाज़ बन गया है।

“वर्तमान को समझने के लिए अतीत को जानना ज़रूरी है”

सेमिनार के संयोजक प्रो. शंभूनाथ तिवारी ने कहा कि हर रचना अपने समय की गवाही देती है। अगर हम समकालीनता को समझना चाहते हैं, तो इतिहास और स्मृति को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

प्रो. तसनीम सुहैल, विभागाध्यक्ष और सेमिनार निदेशक, ने स्वागत भाषण में कहा कि आज का हिंदी उपन्यास सामाजिक यथार्थ और उत्तर-आधुनिक विस्थापन के बीच पुल बन रहा है—जहाँ व्यक्तिगत पीड़ा और सामूहिक असहमति एक साथ चलती हैं।

पूर्व कुलपति प्रो. मोहम्मद गुलरेज़ ने अपने संबोधन में कहा कि “समकालीन उपन्यास विद्रोह नहीं, बल्कि चेतना का जागरण है।” उन्होंने हिंदी में प्रवासी लेखन और मैजिकल रियलिज़्म की कमी पर अफसोस जताया और कहा कि रचनाकारों को नए प्रयोगों से डरना नहीं चाहिए।

“कथा-रस पाने से पहले बुद्धि-रस पाना ज़रूरी है”

मुख्य वक्ता प्रो. रोहिणी अग्रवाल (महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक) ने कहा कि समय, समाज और संस्कृति शक्ति-संरचनाएँ हैं। इन्हें समझे बिना समकालीनता को नहीं समझा जा सकता। उन्होंने कहा — “कथा-रस तक पहुँचने के लिए पहले बुद्धि-रस तक पहुँचना ज़रूरी है।” उन्होंने भारतीय आध्यात्मिक दर्शन, आस्था और सत्ता की राजनीति के जटिल रिश्तों पर भी विस्तार से बात की।

प्रो. श्रद्धा सिंह (बीएचयू) ने अपने विशेष वक्तव्य में बताया कि हिंदी में उपन्यास लेखन और स्त्री लेखन लगभग साथ-साथ विकसित हुए। उन्होंने मन्नू भंडारी की आपका बंटी, मृदुला गर्ग की चित्तकोबरा, कृष्णा सोबती की ज़िंदगीनामा और गीतांजलि श्री की ए लड़की जैसी रचनाओं का ज़िक्र किया और कहा कि आज की महिला लेखिकाएँ पर्यावरण, राजनीति और अस्तित्व जैसे गंभीर मुद्दों को गहराई से छू रही हैं।

समापन सत्र में प्रो. टी. एन. सतीशन (डीन, फ़ैकल्टी ऑफ आर्ट्स) ने कहा कि साहित्य मनोरंजन नहीं, समाज की सच्चाई उजागर करने का माध्यम है। “समकालीन उपन्यास सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक है, जिसने इंसान के नैतिक विवेक को फिर से जगाया है।”

नई हिंदी कथा: असहमति से आत्म-साक्षात्कार तक

वर्तमान हिंदी साहित्य की दिशा पर कई साहित्य प्रेमियों ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, आज का हिंदी उपन्यास प्रेमचंद के यथार्थवाद से आगे निकल कर कई आवाज़ों में बोलता है। उदय प्रकाश, निर्मल वर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, विनोद कुमार शुक्ल, अलका सरावगी, अनामिका, गीतांजलि श्री और यशपाल शर्मा जैसे लेखकों ने हिंदी कथा में भाषा और विचार दोनों स्तरों पर नई ताजगी दी है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ मांडवी के मुताबिक, “गीतांजलि श्री का रेत समाधि (Tomb of Sand) हिंदी कथा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाला मील का पत्थर साबित हुआ। वहीं विनोद कुमार शुक्ल के दीवार में एक खिड़की रहती थी जैसी कृतियों में यथार्थ और स्वप्न का अद्भुत मेल है।ये रचनाएँ समाज में फैलते असहिष्णु माहौल, जाति और लिंग की असमानता, और तेज़ी से बदलते शहरी जीवन की बेचैनी को बड़ी बारीकी से पकड़ती हैं। आज के उपन्यास में व्यक्तिगत अनुभव ही राजनीतिक सत्य बन गया है।”

गायब होती हंसी, खोता हुआ व्यंग्य

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “फिर भी अकादमियों के गलियारों में हाल के दिनों में एक साझा चिंता उभरी है। हिंदी साहित्य से हंसी और व्यंग्य जैसे गायब हो गए हैं। कभी हरीशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, और के. पी. सक्सेना ने जिस तीखे व्यंग्य से समाज को आईना दिखाया था, आज वैसी रचनात्मक चपलता कम दिखती है।”

दक्षिण भारत की साहित्य प्रेमी मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “आज का लेखन गंभीर तो है, पर कहीं न कहीं मुस्कान और हल्के व्यंग्य की मानवीय गर्मी खो गई है। इस दौर में “Humour Times” (हिंदी_इंग्लिश) जैसी पत्रिकाएँ इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं। यह पत्रिका आज भी राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर चुटीले, बौद्धिक व्यंग्य के माध्यम से लोकतांत्रिक सोच को ज़िंदा रखती है। इसकी भूमिका साहित्यिक दुनिया के लिए भी प्रेरक है।”
“साहित्य आईना भी है, आत्मा भी”

सच में, एएमयू का यह सेमिनार केवल अकादमिक विमर्श नहीं था, बल्कि हिंदी साहित्य की आत्मा की पड़ताल भी थी। आज का हिंदी उपन्यास असहमति की आवाज़ तो बन गया है, लेकिन उसे अनुवाद, वैश्विक पहचान और हंसी की खोई विरासत जैसी चुनौतियों से भी जूझना होगा। साहित्य का मकसद सिर्फ़ यथार्थ दर्ज करना नहीं, बल्कि उसके बीच मुस्कुराने की हिम्मत भी देना है। जैसे किसी कवि ने कहा था “जो हँस सकता है, वही सच बोल सकता है।”

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