सोनम वांगचुक का संदिग्धता का सफर और भारत के खिलाफ खड़ी होने की कहानी

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जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला, जो दशकों पुरानी मांग का समाधान था। यह कदम लद्दाख की आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रतीक था, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की गतिविधियों ने धीरे-धीरे संदेह के घेरे में आना शुरू कर दिया। 2019 से 2025 तक की घटनाओं का विश्लेषण दर्शाता है कि वांगचुक की कार्रवाइयां शांतिपूर्ण मांगों से आगे बढ़कर राजनीतिक महत्वाकांक्षा, विदेशी संपर्कों और हिंसा भड़काने की दिशा में मुड़ गईं।

अनुच्छेद 370 हटने के बाद, आभार से असंतोष तक

अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बाद, 5 अगस्त 2019 को लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने का फैसला आया। वांगचुक ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देते हुए ट्वीट किया: “लद्दाख का लंबे समय से चला आ रहा सपना पूरा हुआ। 30 साल पहले 1989 में लद्दाखी नेताओं ने केंद्र शासित प्रदेश की मांग की थी।” यह बयान उनकी प्रारंभिक समर्थन को दर्शाता है। लेकिन जल्द ही असंतोष उभरा। वांगचुक ने छठी अनुसूची (आदिवासी क्षेत्रों के लिए संवैधानिक सुरक्षा) की मांग उठाई, जो पूर्वोत्तर राज्यों में लागू है। यह मांग वैध लगती थी, लेकिन वांगचुक ने इसे राजनीतिक हथियार बनाया।

2020-2023 के बीच, वांगचुक ने शांतिपूर्ण आंदोलन चलाए, लेकिन 2024 में उनके बयान संदिग्ध हो गए। मार्च 2024 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, “यदि मांगें पूरी न हुईं तो लद्दाखी चीनी आक्रमण का प्रतिरोध नहीं करेंगे।” यह बयान न्यूजचेकर और अल जजीरा जैसी रिपोर्टों में उद्धृत है, जहां वांगचुक ने एक स्थानीय कॉमेडियन का हवाला देते हुए कहा कि लद्दाखी “चीन को रास्ता दिखा देंगे।” हालांकि उन्होंने इसे हास्य बताया, लेकिन सीमा क्षेत्र में यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा था। यह बयान चीनी आक्रामकता के संदर्भ में भारत की संप्रभुता पर सवाल खड़ा करता है।

विदेशी संपर्क और पाकिस्तान यात्रा

2025 में वांगचुक की गतिविधियां और संदिग्ध हो गईं। फरवरी 2025 में वे इस्लामाबाद (पाकिस्तान) गए, जहां ‘ब्रीद पाकिस्तान’ जलवायु सम्मेलन में भाग लिया। यह सम्मेलन डॉन मीडिया ग्रुप द्वारा आयोजित था, जो पाकिस्तान का प्रमुख मीडिया हाउस है और अक्सर भारत-विरोधी कंटेंट प्रकाशित करता है। वांगचुक ने ‘ग्लेशियर मेल्ट’ पर पैनल चर्चा में भाग लिया, जहां उन्होंने पीएम मोदी की ‘मिशन लाइफ’ पहल की सराहना की, लेकिन पाकिस्तानी मीडिया को ‘पर्यावरण चैंपियन’ बताया। द वायर और बूम लाइव की रिपोर्टों के अनुसार, यह यात्रा संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से हुई, लेकिन लद्दाख डीजीपी एस.डी. सिंह जमवाल ने सितंबर 2025 में कहा कि वांगचुक का एक पाकिस्तानी पीआईओ (इंटेलिजेंस अधिकारी) से संपर्क था।

इसके तुरंत बाद, मार्च 2025 में पुणे में रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में भाग लिया। ओपइंडिया और द कम्यून की रिपोर्टों में कहा गया कि यह विरोध विकास परियोजनाओं को बाधित करने का प्रयास था। ये घटनाएं संयोग नहीं लगतीं। राष्ट्रीय एजेंसियों ने वांगचुक को एफसीआरए उल्लंघन के लिए चिह्नित किया। सितंबर 2025 में, गृह मंत्रालय ने वांगचुक की एनजीओ The Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECMOL) का एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया। सीबीआई जांच में पाया गया कि 2021-22 में ₹3.35 लाख की अनियमित डिपॉजिट और ₹54,600 लोकल फंड्स एफसीआरए अकाउंट में डाले गए। The Himalayan Institute of Alternatives Ladakh (HIAL) पर भी ₹1.63 करोड़ विदेशी फंड्स के बिना रजिस्ट्रेशन के आरोप लगे।

अनिश्चितकालीन अनशन और हिंसा का राजनीतिक उद्देश्य

सितंबर 2025 में वांगचुक ने अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया, भले ही गृह मंत्रालय ने 6 अक्टूबर को वार्ता की घोषणा की हो। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के साथ बातचीत चल रही थी, जिसमें 45% से 84% तक आदिवासी आरक्षण, महिलाओं के लिए 33% कोटा और भोटी-पुर्गी भाषाओं की मान्यता जैसे लाभ मिल चुके थे। फिर भी, वांगचुक ने अनशन जारी रखा।

24 सितंबर 2025 को प्रदर्शन हिंसक हो गया। बीजेपी कार्यालय जला दिया गया, सीआरपीएफ वाहन फूंके गए, और 4 लद्दाखी युवाओं की मौत हो गई। 105 सुरक्षाकर्मी घायल हुए। गृह मंत्रालय के बयान के अनुसार, वांगचुक के ‘उत्तेजक बयानों’ ने भीड़ को भड़काया। उन्होंने नेपाल, बांग्लादेश और अरब स्प्रिंग का हवाला दिया, जो ‘जन जेड क्रांति’ की तरह परिवर्तन ला सकता है। वांगचुक ने कहा कि वे हिंसा के लिए जिम्मेदार नहीं, लेकिन वीडियो साक्ष्य दिखाते हैं कि उनके भाषणों ने युवाओं को उकसाया। कांग्रेस नेताओं की सोशल मीडिया अपीलों ने हिंसा को बढ़ावा दिया; बीजेपी आईटी हेड अमित मालवीय ने कांग्रेस काउंसलर फुंट्सोग स्टैंजिन त्सेपाग को भीड़ भड़काते वीडियो शेयर किया।

वांगचुक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल में शामिल होना चाहते थे, लेकिन अस्वीकृति के बाद कांग्रेस के करीब आ गए। उनकी पत्नी गितांजली अंगमो ने बीजेपी पर ‘भावनात्मक कथानक गढ़ने’ का आरोप लगाया, लेकिन हिंसा के दौरान वांगचुक का पीछे हटना, युवाओं से पहचान छुपाने की अपील और विदेशी आंदोलनों का संदर्भ संदेह पैदा करता है। वांगचुक ने शांति की अपील की, लेकिन देर से।

वार्ता से पीछे हटना और कांग्रेस का समन्वय

6 अक्टूबर 2025 को तय वार्ता से Leh Apex Body (LAB) और The Kargil Democratic Alliance (KDA) ने पीछे हटने की घोषणा की। यह वांगचुक की गिरफ्तारी और न्यायिक जांच की मांग पर आधारित था। लेकिन कांग्रेस का रोल स्पष्ट है। वांगचुक का परिवारिक कनेक्शन कांग्रेस से मजबूत है-उनके पिता सोनम वांगयाल जम्मू-कश्मीर सरकार में कांग्रेस मंत्री थे। 2025 में समन्वित बयान और आंदोलनों का तालमेल दिखाता है कि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। LAHDC लेह चुनाव से पहले यह राजनीतिकरण स्पष्ट है।

कांग्रेस ने ऐतिहासिक रूप से लद्दाख की उपेक्षा की। 1989 की गोलीबारी में तीन लद्दाखियों की मौत हुई, लेकिन वांगचुक की चुप्पी बीजेपी पर हमलों तक सीमित रही। कांग्रेस नेताओं की अपीलों ने बीजेपी कार्यालयों पर हमले भड़काए। BJP ने शांति बनाए रखी, जबकि कांग्रेस और वांगचुक ने अराजकता फैलाई।

दावों पर सवाल: श्रेय हड़पना और संसाधनों का दुरुपयोग

वांगचुक के दावे भी संदिग्ध हैं। आइस स्तूपा का श्रेय वे लेते हैं, लेकिन मूल आविष्कारक चेन्जे अंगचुक को मान्यता नहीं दी। HIAL इंस्टीट्यूट बिना UGC/AICTE रजिस्ट्रेशन के संचालित था, और ₹37 करोड़ का प्रीमियम बकाया था। आरोप है कि भूमि का दुरुपयोग हुआ, और ‘बाहरी लोग लद्दाख का शोषण कर रहे हैं’ दावा बिना प्रमाण के भावनाओं को भटकाने का प्रयास था।

सरकार का विकास कार्यक्रम

इसके विपरीत, बीजेपी सरकार ने लद्दाख को मजबूत बनाया। 2019 से ₹32,143.16 करोड़ का निवेश हुआ, जिसमें ₹10,371.98 करोड़ जनजातीय कल्याण पर। IBEF और द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टों के अनुसार, 1,670 किमी सड़कें, शिंकुन ला सुरंग (₹1,681 करोड़), 136 मोबाइल टावर, हनले डार्क स्काई रिजर्व जैसे पर्यटन केंद्र बने। 85% नौकरियों में स्थानीय आरक्षण, सीमा गांवों के लिए 4% अतिरिक्त, महिलाओं के लिए 33% कोटा। 3,800+ गैर-राजपत्रित और 200+ राजपत्रित पद भरे। 96% इंटरनेट कवरेज, सार्वभौमिक विद्युतीकरण, भोटी-पुर्गी भाषाओं की मान्यता। 1989 के शहीदों को सम्मानित किया।

फिर भी, बीजेपी कार्यालयों को निशाना बनाया गया। हिंसा में 105 सुरक्षाकर्मी घायल हुए, लेकिन BJP ने शांति चुनी। आगामी भूमि सुरक्षा निर्णयों से प्रभावित होने के डर से कांग्रेस और वांगचुक ने अशांति भड़काई, जो पर्यटन और आजीविका को खतरे में डालता है।

राजनीतिक महत्वाकांक्षा जनकल्याण से ऊपर

वांगचुक का अनशन और आंदोलन छठी अनुसूची की मांग को हाईजैक करने का हिस्सा थे, खुद को ‘नायक’ बनाने के लिए। पूर्व राजनीतिक असफलताओं के बावजूद, 24 सितंबर की हिंसा उनकी महत्वाकांक्षा को उजागर करती है। उनकी गतिविधियां भारत के खिलाफ खड़ी हो गईं-विदेशी संपर्क, उत्तेजक बयान, हिंसा के लिए उकसावा । बीजेपी ने वार्ता और विकास चुना, जबकि वांगचुक ने अराजकता। लद्दाख की शांति राजनीतिक लाभ के लिए दांव पर नहीं लगनी चाहिए। तथ्य साफ कहते हैं: वांगचुक की संदिग्धता अब सिद्ध है।

लद्दाख : सुरक्षा और समृद्धि के लिए राज्य का दर्जा या स्वायत्तता का रास्ता

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लद्दाख, भारत का एक विशाल और दुर्गम भूभाग, अपनी अनूठी भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामरिक स्थिति के कारण लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने और लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाए जाने के बाद, यह सवाल और प्रासंगिक हो गया है कि क्या लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देना चाहिए!

लद्दाख की भौगोलिक और जनसांख्यिक स्थिति

लद्दाख का क्षेत्रफल लगभग 59,146 वर्ग किलोमीटर है, लेकिन इसकी जनसंख्या केवल 2.74 लाख (2011 की जनगणना के अनुसार) है। यह भारत के सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों में से एक है, जहाँ प्रति वर्ग किलोमीटर केवल 4-5 लोग रहते हैं। तुलना के लिए, पुडुचेरी, जो सबसे छोटा विधानमंडल वाला केंद्रशासित प्रदेश है, की आबादी 12 लाख से अधिक है और वहाँ 30 विधायकों की विधानसभा है।

इतनी कम जनसंख्या के लिए लद्दाख को पूर्ण राज्य बनाना अव्यवहारिक और आर्थिक रूप से बोझिल हो सकता है। केंद्रशासित प्रदेश के रूप में, लद्दाख को केंद्र सरकार से प्रति व्यक्ति अधिक वित्तीय सहायता मिलती है। उदाहरण के लिए, 2023-24 के केंद्रीय बजट में लद्दाख को 5,958 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जो प्रति व्यक्ति आधार पर कई राज्यों से अधिक है। यह सहायता क्षेत्र की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, जैसे सड़क, बिजली और संचार, के लिए महत्वपूर्ण है।

सामरिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ

लद्दाख की सीमाएँ चीन और पाकिस्तान से लगती हैं, जो इसे सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बनाती हैं। 2020 के गलवान संघर्ष ने इस क्षेत्र की सुरक्षा चुनौतियों को और उजागर किया। पूर्ण राज्य का दर्जा देने से भूमि उपयोग, बुनियादी ढांचा विकास और अन्य नीतिगत निर्णयों में राज्य सरकार को अधिक अधिकार मिल सकते हैं। यह सैन्य रसद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं, जैसे सड़क निर्माण और अग्रिम हवाई पट्टियों, को जटिल बना सकता है। वर्तमान में, केंद्र सरकार की प्रत्यक्ष निगरानी के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में त्वरित निर्णय लेना संभव है। उदाहरण के लिए, लद्दाख में BRO (सीमा सड़क संगठन) द्वारा निर्मित सड़कें, जैसे दौलत बेग ओल्डी रोड, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि राज्य सरकार को इन परियोजनाओं पर नियंत्रण मिलता है, तो नौकरशाही देरी और स्थानीय राजनीतिक दबाव प्रगति को बाधित कर सकते हैं।

लेह और कारगिल के बीच मतभेद

लद्दाख में लेह और कारगिल के बीच धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मतभेद लंबे समय से मौजूद हैं। लेह में मुख्य रूप से बौद्ध आबादी (लगभग 66%) है, जबकि कारगिल में शिया मुस्लिम बहुसंख्यक (लगभग 77%) हैं। 2019 में केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद, लेह में उत्साह देखा गया, लेकिन कारगिल में कुछ असंतोष था, क्योंकि वहाँ के निवासियों को जम्मू-कश्मीर के साथ कुछ सांस्कृतिक और आर्थिक जुड़ाव महसूस होता था। पूर्ण राज्य का दर्जा देने से इन मतभेदों के ध्रुवीकरण का जोखिम बढ़ सकता है। एक विधानसभा इन क्षेत्रों के बीच संसाधनों और प्रतिनिधित्व को लेकर तनाव को और गहरा सकती है। इसके विपरीत, वर्तमान में लेह और कारगिल में लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (LAHDC) स्थानीय शासन के लिए प्रभावी मंच प्रदान करती हैं।

छठी अनुसूची और LAHDC का सशक्तिकरण

लद्दाख की लगभग 97% जनसंख्या अनुसूचित जनजाति (ST) है, जिसमें बौद्ध, शिया मुस्लिम, और अन्य समुदाय शामिल हैं। छठी अनुसूची लागू करना लद्दाख के लिए एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है। यह अनुसूची स्वायत्त जिला परिषदों को भूमि, संस्कृति और संसाधनों पर नियंत्रण प्रदान करती है, जो स्थानीय पहचान और अधिकारों की रक्षा करती है। वर्तमान में, LAHDC को भूमि, शिक्षा, और स्थानीय विकास पर कुछ अधिकार हैं, लेकिन इन शक्तियों को और बढ़ाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, LAHDC को भूमि हस्तांतरण और स्थानीय रोजगार नीतियों पर अधिक नियंत्रण दिया जा सकता है। साथ ही, डोमिसाइल आधारित आरक्षण लागू करने से स्थानीय लोगों को रोजगार और शिक्षा में प्राथमिकता मिल सकती है। यह मॉडल नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों, जैसे मिजोरम और मेघालय, में सफल रहा है, जहाँ छठी अनुसूची ने स्थानीय स्वायत्तता और विकास को बढ़ावा दिया है।

पारिस्थितिकी और आर्थिक विकास

लद्दाख का पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत नाजुक है। ग्लेशियरों पर निर्भर जल संसाधन और उच्च ऊंचाई वाला पर्यावरण इसे औद्योगिक शोषण के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। पूर्ण राज्य का दर्जा देने से स्थानीय सरकारें औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए पर्यावरणीय नियमों में ढील दे सकती हैं, जो दीर्घकाल में हानिकारक हो सकता है। इसके बजाय, केंद्र सरकार की निगरानी में सख्त पर्यावरणीय नियम लागू किए जा सकते हैं। लद्दाख की अर्थव्यवस्था पर्यटन, पशुपालन और अक्षय ऊर्जा पर आधारित हो सकती है। उदाहरण के लिए, लद्दाख में सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं। 2023 में, लद्दाख में 1.7 गीगावाट की सौर परियोजना शुरू की गई, जो क्षेत्र को ऊर्जा आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक कदम है। इसके अतिरिक्त, स्थानीय उत्पादों, जैसे पश्मीना और जैविक कृषि, को बढ़ावा देने से आर्थिक समृद्धि संभव है।

केंद्रशासित प्रदेश मॉडल की प्रासंगिकता

केंद्रशासित प्रदेश के रूप में, लद्दाख को केंद्र सरकार की योजनाओं से प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। उदाहरण के लिए, उड़ान योजना के तहत लेह और कारगिल में हवाई संपर्क बढ़ा है, और PMGSY (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना) ने ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ा है। पूर्ण राज्य का दर्जा देने से ये योजनाएँ स्थानीय राजनीति और नौकरशाही की जटिलताओं में उलझ सकती हैं। इसके बजाय, केंद्रशासित प्रदेश ढांचे के तहत LAHDC को और सशक्त करना, छठी अनुसूची लागू करना, और डोमिसाइल आधारित नीतियाँ बनाना अधिक व्यवहार्य है।

लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देना न तो व्यावहारिक है और न ही राष्ट्रीय हित में। इसकी कम जनसंख्या, सामरिक संवेदनशीलता, और लेह-कारगिल के बीच मतभेद इसे केंद्रीकृत शासन के लिए उपयुक्त बनाते हैं। समाधान का मार्ग है—LAHDC को और अधिक शक्तियाँ देना, छठी अनुसूची लागू करना, और पर्यावरण व संस्कृति की रक्षा के लिए सख्त नियम बनाना। साथ ही, क्षेत्र-विशिष्ट आर्थिक योजनाएँ, जैसे सौर ऊर्जा और पर्यटन को बढ़ावा देना, लद्दाख को समृद्ध और सुरक्षित बनाए रख सकता है। केंद्रशासित प्रदेश का ढांचा लद्दाख की अनूठी पहचान, पर्यावरण, और सुरक्षा को संरक्षित करने का सबसे प्रभावी तरीका है।

जंगल की सौंधी खुशबू में नहाई है कांतारा:चैप्टर वन

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ऋषभ कुमार

भारतीय संस्कृति की पहचान सनातन संस्कृति के रूप में होती है। सनातन’ यानी कि “हमेशा रहने वाला” या “शाश्वत”, जिसका न कोई आदि है और न कोई अंत। नाम से इतर भी अगर बात करें तो इस पृथ्वी पर मौजूद सभी संस्कृतियों में सबसे पुरातन भारतीय संस्कृति को कहा जा सकता है। हमारी अपनी एक समृद्ध परंपरा रही है, जो सहस्त्राब्दियों में हुए तमाम परिवर्तनों को साधते हुए, अभी भी अपनी पुरातनता में जीवित है। इसको समृद्ध करने और बनाए रखने में सबसे बड़ा योगदान यहां की लोकपरंपराओं और लोकआस्था का रहा है। हमारे यहां हर एक गांव के अपने लोकदेवता होते हैं, जिनको ग्रामदेवता और क्षेत्रपाल के रूप में जाना जाता है और पूजा जाता है। ये या तो ईश्वर के कोई गण होते हैं या कोई ऐसी महान आत्मा जिसने अपने अच्छे कार्यों द्वारा देव का दर्जा प्राप्त किया होता है। इनके बारे में तमाम दंतकथाएं भी प्रचलित होती हैं। ये वहां के रहवासियों को हर समस्या से जूझने की शक्ति और विश्वास प्रदान करते हैं। तमाम संकटों के बाद भी आस्था के द्वारा उनमें जिजीविषा को बनाए रखने में मदद करते हैं। ऐसे ही लोक देवताओं और उनसे जुड़ी दंतकथाओं को पर्दे पर चरितार्थ करते हुए ऋषभ शेट्टी एक बार फिर लेकर आए हैं ‘कंतारा’ का प्रिक्वल ‘कांतारा-अ लिजेंड:चैप्टर वन’।

फिल्म का आधार है,भूतकोला। जिसका अर्थ है दैवीय नृत्य। जो तुलुनाडु अर्थात कर्नाटक और उत्तरी केरल के तटीय इलाकों में प्रचलित है और जो समर्पित किया जाता है, वहां के लोकदेवता पंजुरी और गुलिका को। जिनको शिव के गण के रूप में पूजा जाता है। इनके पृथ्वी पर आने की अलग-अलग दंतकथाएं प्रचलित है। वो कथाएं फिर कभी। जहां पंजुरी शांत स्वभाव के हैं वहीं गुलिका अपने रौद्र स्वभाव और अनंत भूख के लिए जाने जाते हैं, भूख ऐसी कि जिसे शांत करने के लिए साक्षात नारायण को अपनी उंगली परोसनी पड़ी और जब फिल्म में यह अपने विविध रूपों में ऋषभ शेट्टी पर आते हैं तो यह दृश्य देखते ही बनता है।

अब यह पृथ्वी पर हैं और इनका कार्य है; क्षेत्रपाल के रूप में, क्षेत्र रक्षण का। इनके रक्षण का क्षेत्र है ‘ईश्वर का मधुवन’ जहां साक्षात् भगवान शिव और माता पार्वती तपस्या में लीन रहते हैं। इस क्षेत्र को कांतारा के नाम से भी जाना जाता है। इसी क्षेत्र में एक आदिवासी समुदाय रहता है। जिन्होंने प्रकृति से अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया हुआ। यह जंगल का सम्पूर्ण क्षेत्र अद्भुत और बेशकीमती औषधियों से भरा है जो और कहीं प्राप्त नहीं होती हैं। अब संपदा है, तो स्वार्थ भी है और लालच भी, इस प्रकृति के वरदान को हड़पने का। तो एक राजा है स्वार्थ की प्रतिमूर्ति, अत्यंत क्रुर जिसकी नज़र पड़ती है ईश्वर के मधुवन पर।

जो वहां के आदिवासियों को हटा कर उस समूचे वन क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहता है पर वह देव के क्रोध का शिकार बनता है और साथ ही देव के भयंकर रूप को देखकर उसका पुत्र भय से आतंकित होकर इस जंगल से भागता है और नन्हा राजकुमार मिलता है, एक दूसरी जनजाति से जो है, कदबा। जिनका स्वार्थ है, देव की अद्भुत शक्तियां और जो काला जादू करके देव की शक्तियों को अपने वश में करना चाहती है। सब अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में रहते हैं और तब कहानी फैलती है, कांतारा में ब्रह्मराक्षस होने की। भय की वज़ह से वो एक दूसरे के क्षेत्र में नहीं जाते हैं। पर जब अधिकार क्षेत्र की मर्यादाएं टूटतीं है तो फिल्म में असली संघर्ष शुरू होता है और संघर्ष ऐसा की कई जगह आपको गूज़वम्प आते हैं।

फिल्म की कहानी में जो लोक परंपरा और आस्था को दर्शाता गया है, वह बहुत ही दर्शनीय बन पड़ा है। ऋषभ शेट्टी ने जो कहानी को गढ़ा और संवारा है वह तारीफ योग्य है। बल्कि यहां मैं यह जोडूंना चाहूंगा कि लोककथा या किंवदंतियों से जुड़ा यह कहानियों का एक ऐसा क्षेत्र है जो हीरे की वह खदान है जिसमें अभी खनन की शुरुआत की गई है और अगर इसका अच्छा उपयोग किया जाए तो इससे एक से बढ़कर एक कहानी रूपी हीरे निकल सकते हैं।‌ कहानी का एक यूनीक पार्ट है आदिवासियों को टिपिकल फिल्मों से अलग दिखाते हुए। बुद्धिमान रुप में प्रस्तुत करना। जो अशिक्षित तो है पर कॉमन सेंस का प्रयोग करते हुए स्वयं से विकसित संस्कृति की तमाम खूबियों को बहुत ही कम समय में अपनी तार्किक बुद्धि द्वारा सीख कर अपने यहां उनका प्रयोग करने लगता है।

बात अगर एक्टिंग की करें तो ऋषभ शेट्टी चौकाते हैं, वो अपनी एक्टिंग के लिए पूरी तरह से कमिटेड दिखाई देते हैं, उन्होंने वरमै के चरित्र को जीवंत किया है। क्लाइमेक्स में उन्हें देखना अद्भुत है, जब चामुंडी उनके अंदर आतीं हैं तो उनका एकदम से स्त्रैण हो जाना बाकई दर्शनीय है। दूसरी किरदार है राजकुमारी कनकावती जिसे निभाया है, रुक्मिणी वसंत। जो कोमलांगी प्रेमिका और दुष्ट राजकुमारी दोनों ही रूप में बखूबी जंची हैं। राजा राजशेखर बने हैं जयराम जो अपने चरित्र के साथ न्याय करते हैं और उसके शेड्स को बखूबी साधते नज़र आते हैं। राजा कुलशेखर बने हैं गुलशन देवैया जो अय्याश राजा का टिपिकल कैरैक्टर ही निभाते दिखते हैं। शायद ऋषभ शेट्टी को इनके कैरेक्टर को लिखने में और मेहनत करने की आवश्यकता थी। बांगरा के पहले राजा विजेंद्र बने हरिप्रशांथ ने भी छोटा और इंपैक्टफुल किरदार निभाया है। मायाकारा का भी किरदार भी बहुत इंपैक्टफुल रहा है।

फिल्म में चार चांद लगाते हैं उसके सीन्स और बैकग्राउंड म्यूजिक जो दृश्य में प्रयुक्त इमोशन की इंटैंसिटी को बढ़ाने का कार्य करता। यह फिल्म हमें एक अलग तरह का ही एक्शन दिखाता है जो मजेदार है, विजुअल इफेक्ट्स भी लाजबाव बन पड़े हैं। डबिंग की बात करें तो गीतों और कॉमिक पर अभी काम करने की आवश्यकता है। डबिंग में कॉमेडी का पूरी तरह से खत्म हुई लगती है। हां, कुछ-कुछ डायलॉग बढ़िया बन पड़े हैं।

कुलमिलाकर कहा जाए तो फिल्म बहुत ही अच्छी बन पड़ी है। जो आपको कुछ अलग ही एक्सपीरियंस देती है। जंगल को आप तक लाती है और आपको बारिश में भींगी सौंधी मिट्टी की खुशबू देती है। तो इसे देखना एक ट्रीट जैसा है तो जाइए खुदको और अपने परिवार को यह ट्रीट दीजिए और दोस्तों को भी।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं)

पूरे देश में एकत्व और सामाजिक जागरण का अलख जगाया

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भोपाल । महर्षि वाल्मीकि भारत के उन विरली विभूतियों में से एक हैं जिनकी उपस्थिति पूरे देश में है और सभी सामाजिक स्वरूप में मान्यता है । हर समाज उन्हें अपना पूर्वज मानकर गर्व करता है । भारत की समाज व्यवस्था जन्म के आधार पर कभी नहीं रही । गुण और कर्म के आधार पर रही है । महर्षि व्यास की माता मछुआरा समाज से हैं तो महर्षि जाबालि की माता गणिका। लेकिन अपने गुण कर्म ऋषि बने । इसी प्रकार बाल्मीकि जी भी अपने गुण कर्म से महर्षि बने । इसलिये समाज में उनकी गणना महर्षि परंपरा में होती है
उनकी मान्यता भारत के सभी समाज जनों में हैं । सब उन्हें अपना मानते हैं । भारत के भील वनवासी समाज उन्हेंअपना पूर्वज मानता है, पंजाब में एक समाज स्वयं को क्षत्रिय मानता है और वाल्मीकि जी को अपना पूर्वज, मालवा और राजस्थान में सेवावर्ग से संबंधित एक समाज स्वयं को बाल्मीकि का वंशज मानता है । गुजरात में उन्हें निषाद समाज से संबंधित माना जाता है । भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में बाल्मीकि जी अलग अलग समाज से जोड़ कर देखा जाता है । स्वयं को वाल्मीकी जी का वंशज मानने वालों में उपनाम भी ऐसे हैं जो सभी वर्गों की ओर इंगित करते हैं । वाल्मीकि समाज में “चौहान” उपनाम भी होता है और “झा” उपनाम भी । बिहार प्राँत के भोजपुरी क्षेत्र में “झा” ब्राह्मणों में उपनाम होता है तो “चौहान” पूरे देश में क्षत्रियों का उपनाम माना जाता है । वाल्मीकि समाज में “वर्मा” भी होते हैं और चौधरी एवं पटेल भी । इस प्रकार वे लगभग सभी वर्गों और उपवर्गो में मान्य हैं । महर्षि वाल्मीकि किस समाज या समूह से संबंधित हैं, इस पर मतभेद हो सकते हैं पर यह तथ्य सर्व स्वीकार्य है कि वे संसार के आदि कवि हैं, उन्होंने पुरुषार्थ, परिश्रम और तप से अपने व्यक्तित्व का निर्माण किया । वे सर्व समाज में मार्गदर्शक और पूज्य हैं । वे भारत में सामाजिक एकत्व और समरसता के प्रतीक हैं । उन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से संपूर्ण समाज और भूभाग को एक सूत्र में पिरोया । वे सबके लिये आदर्श थे तभी तो दशरथ नंदन राम ने उन्हें धरती पर लेटकर साष्टांग प्रणाम किया था और उन्हीं से वन में रहने के लिय सुगम स्थान पूछा । माता सीता उन्ही के आश्रम में रहीं और बाल्मीकि जी ने ही लवकुश को शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा दी । भारतीय वाड्मय में जिस प्रकार उनकी सामाजिक व्यापकता है । भारत के हर प्राँत और क्षेत्र में बाल्मीकि जी के आश्रम होने का उल्लेख मिलता है । इससे एक बात स्पष्ट होती है कि या तो स्वयं वाल्मीकि जी ने संपूर्ण भारत की यात्रा करके समाज और राष्ट्र को एक स्वरूप में बांधने का प्रयास किया होगा अथवा उनकी शिष्य परंपरा पूरे देश में फैली और अपने गुरु महर्षि बाल्मीकि जी के नाम पर आश्रम स्थापित करके संपूर्ण भारत राष्ट्र को एक ही ज्ञानसूत्र में पारोया । इसीलिये उनका संदर्भ सभी समाजों में और देश के सभी स्थानों में मिलते हैं ।

बाल्मीकि जी का जन्म और जन्म कथायें

उनका जन्म अश्विन माह की पूर्णिमा को माना जाता है । शरद पूर्णिमा के रूप में यह पूर्णिमा विशिष्ट है । इस वर्ष यह पूर्णिमा 6 अक्टूबर को पड़ रही है । इसलिये इस वर्ष 17 अक्टूबर को बाल्मीकि जयंति मनाई जा रही है । भारत के विभिन्न स्थानों बाल्मीकि के मंदिर या तपस्या स्थल मिलते हैं। इन सभी स्थानों में उनके जन्म स्थान होने की मान्यता है । नेपाल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, विहार, मध्यप्रदेश महाराष्ट्र, गुजरात और छत्तीसगढ़ ही नहीं सुदूर केरल में भी वाल्मीकि जी के मंदिर हैं । नेपाल के चितवन जिले में वाल्मीकि मंदिर है तो उत्तर प्रदेश में तमसा, सोना और सप्त गंडक के संगम स्थल को उनकी जन्म स्थली और आश्रम होने की मान्यता है । एक दावा प्रयाग से लगभाग चालीस किलोमीटर दूर झाँसी माणिकपुर रोड पर उनके जन्म स्थान होने का दावा किया जाता है तो एक दावा चित्रकूट का है । एक दावा सीतामढी के बिठूर में तो एक दावा हरियाणा फतेहाबाद में और कोई मध्यप्रदेश के मंडला जिले में नर्मदा संगम पर बने वाल्मीकि आश्रम को उनकी तपोस्थली मानता है । इन सभी स्थानों पर शरद पूर्णिमा को पूजन भंडारे होते हैं । कहीं कहीं तो चल समारोह भी निकलते हैं ।
जैसी विविधता उनके जन्मस्थान की है वैसी ही विविध पुराणों और ग्रंथो विविधता से भरा उनका संदर्भ मिलता है । उनकी जन्म कथाएँ भी विविध हैं । कुछ पुराण कथाओं में उन्हें प्रचेता का ग्यारहवाँ पुत्र और महर्षि भृगु का भाई बताया है तो कहीँ महर्षि अंगिरा का वंशज, कहीँ उन्हे वनवासी बताया गया है और पिता का नाम सुमाली लिखा है । लेकिन सभी कथाओं में यह एक बात समान है कि बाल्मीकि जी का नाम रत्नाकर था, और उनका पालन पोषण वनवासी भील समाज में हुआ । वे आजीविका के लिये चाँडाल कर्म करते थे । उन दिनों चोरी डकैती, शमशान घाट में काम करके अथवा हिंसात्मक कार्यों से आजीविका कमाने वालों को चाँडाल कहा जाता था । पुराण कथाओं के अनुसार एक दिन नारदजी कहीं जा रहे थे । मार्ग में रत्नाकर ने रोका और लूटने का प्रयास किया पर नारद जी ने कहा कि उनके पास तो वीणा है ।इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं । रत्नाकर ने वीणा ले ली । वीणा देकर नारद जी ने पूछा कि यह सब किसलिये करते हो । रत्नाकर ने कहाकि “परिवार पालन केलिये” । नारद जी ने कहा कि यह दस्युकर्म तो पाप है और पूछा कि “क्या परिवार जन इस पाप में भी भागीदार होंगे” ? सुनकर चौंक पड़े रत्नाकर और घर जाकर यही प्रश्न परिवार से पूछा तो सबने पाप की सहभागिता से अपना पल्ला झाड़ लिया । इसी घटना से रत्नाकर का हृदय परिवर्तन हो गया । उन्होंने चाँडाल कर्म छोड़कर भक्ति आरंभ की । कठोर तप के बाद ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हुआ। और उनके मुँह से व्याकरण युक्त संस्कृत के पहला श्लोक प्रस्फुटित हो गया । आगे चलकर उन्हें ऋषित्व प्राप्त हुआ और वे महर्षि कहलाये ।

“वाल्मीकि” नाम का रहस्य

वाल्मीकि नाम साधारण नहीं है ।।सामान्य तौर पर कहा जाता है कि कठोर तप और साधना में इतने निमग्न हो गये थे शरीर पर दीमक लग गयी थी दीमक का एक नाम बाल्मी भी कहा जाता है इसलिए उनका नाम वाल्मीकि पड़ा । लेकिन यह तो लोक चर्चा है । जिस संस्कृत में स्वर और व्यंजन की ध्वनि भी गहरे अनुसंधान के बाद निश्चित किये गये, प्रत्येक नाम सार्थक रखे जाते थे तब वाल्मीकि नाम निरर्थक नहीं हो सकता है । वस्तुतः “वाल्मीकि” शब्द संस्कृत की दो धातुओं से मिलकर बना है । संस्कृत में एक धातु है “वल्” जिसका अर्थ होता है केन्द्रीयभूत शक्ति । दूसरी धातु है “मक्” जिसका अर्थ आकर्षण होता है । इन दोनों धातुओं की संधि से शब्द बना “वाल्मीकि” जिसका अर्थ होता आंतरिक शक्ति का आकर्षण । नाम के अर्थ के संदर्भ में भी वाल्मीकि जी के व्यक्तित्व को देखें । उनका अमृत्व उनके जन्म या परिवार की पृष्ठभूमि के कारण नहीं अपितु उनकी ज्ञानशक्ति के कारण है । यह ज्ञान उन्हे अपनी आंतरिक प्रज्ञा शक्ति से उत्पन्न हुआ और इसी से संसार के प्रत्येक व्यक्ति के लिये आकर्षण का केंद्र बने ।

वाल्मीकि जी का कृतित्व

महर्षि वाल्मीकि संस्कृत में काव्यविधा के जन्मदाता माने जाते हैं । यह मान्यता है कि संस्कृत की पहली काव्य रचना उन्हीं के स्वर में प्रस्फुटित हुई । भारत के लगभग सभी काव्य रचनाकारों ने अपना साहित्य सृजन करने से पहले उनकी वंदना की है । इनमें पूज्य आदिशंकराचार्य भी हैं और रामानुजार्य भी । राजाभोज भी हैं और संत तुलसीदास भी । वैदिक काल से आधुनिक काल तक भारत में ऐसा कोई काव्य रचनाकार नहीं जिनने उनका स्मरण न किया हो । उन्होंने ऋषित्व ही नहीं देवत्व भी प्राप्त किया । वे वैदिक ऋषि हैं। उनके द्वारा रचित वाल्मिकी रामायण भारत ही नहीं अपितु संसार भर का पहला महाकाव्य है । इस महाकाव्य में पच्चीस हजार श्लोक हैं और हर हजारवें श्लोक का आरंभ गायत्री मंत्र के प्रथम अक्षर होता है । उनकी रामायण रचना की दो विशेषताएं हैं । एक तो इसमें सूर्य और चन्द्र की स्थिति का सटीक उल्लेख है । इससे अनुमान है कि उन्हें अंतरिक्ष या सौर मंडल का भी ज्ञान था । दूसरा रामजी के वनवास काल के वर्णन में स्थानों के नाम, उनकी भौगोलिक स्थिति और मौसम का जिस प्रकार का वर्णन है, यह केवल कल्पना से संभव नहीं हैं । स्थानों के नाम और स्थिति का उल्लेख यथार्थ परक है इससे लगता है कि उन्होंने रामायण लिखने से पूर्व राम जी के वन गमन पथ की यात्रा की, अध्ययन किया और उसी आधार पर वर्णन किया । उनके वर्णन में सामाजिक एकत्व और समरसता को जिस प्रमुखता से विवरण दिया गया है । विशेषकर वनवासी एवं ग्रामवासी समाज के विभिन्न समूहो एवं उप समूहों में एकरूपता का अद्भुत विवरण है । इससे यह बात स्पष्ट है कि प्राचीन भारत के विभिन्न भूभागों में निवास रत व्यक्तियों के बीच वे एकत्व और समरसता का भाव रहा है और इसी का सटीक विवरण बाल्मीकि जी ने दिया । वे सही मायने में राष्ट्र जागरण और सामाजिक एकत्व के अभियान में सक्रिय रहे । उन्होंने रामायण के अतिरिक्त और भी काव्य रचनाएं तैयार की। भारतीय रचना शीलता जगत में गुरु वंदना के अतिरिक्त भगवान गणेशजी और माता सरस्वती के बाद बाल्मीकि जी की ही वंदना की जाती है । इसे भारतीय वाड्मय के किसी भी ग्रंथ रचना से समझा जा सकता है ।

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