अयोध्या मंदिर में चढ़ावा चोरी : यह मंदिर निर्माण विरोधियों का नया शोर या चोरी का कुचक्र भी

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अयोध्या (उप्र): विश्व प्रसिद्ध रामजन्म मंदिर अयोध्या में चढ़ावा चोरी के नित नये आरोप सामने आ रहे हैं, चार ट्रस्टियों के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट भी थाने में की है। ट्रस्ट की पहल पर उत्तर प्रदेश सरकार ने जाँच केलिये एसआईटी गठित कर दी है। जांच के बाद पता चलेगा कि क्या वाकई चढ़ावे में चोरी हुई अथवा यह श्रृद्धाओं की आस्था पर आघात करने का कोई कुचक्र है। इस चढ़ावा चोरी का आरोप लगाने वालों में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के वे नेता सबसे मुखर हैं जो मंदिर निर्माण अभियान के कभी सहमत नहीं रहे।

सामान्यता ग्रहणकाल कुछ घंटों का होता है। शनिदेव की महादशा अधिकतम साढ़े सात साल और राहु की महादशा अठारह वर्ष तक चलती है। लेकिन अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थान मंदिर पर जो ग्रहण लगभग नौ सौ वर्ष पहले लगा था उसकी मुक्ति अभी तक नहीं हो पा रही। युग बदला, सत्ताएँ बदली, सल्तनत और अंग्रेजीकाल भी चला गया लेकिन अयोध्या जन्मस्थान मंदिर को निशाने पर लेने की मानसिकता नहीं बदली। पहले सतत सैन्य आक्रमण हुये, लूटने, तोड़ने के बाद पुनर्निमाण का संघर्ष चला। पीढ़ियाँ बीतीं लेकिन रामभक्तों की जिजीविषा बनी रही। समय के साथ संघर्ष की शैली तो बदली लेकिन रामजन्म स्थान मुक्ति का संघर्ष कभी रुका नहीं। 1949 में संघर्ष का में नया अध्याय जुड़ा। अपने जन्मस्थान में रामलला स्वयं प्रकट हो गये। लेकिन दिल्ली सरकार का दृष्टि प्रतिकूल रही और मंदार में विधिवत प्राण प्रतिष्ठा न हो सकी। संघर्ष भी नये स्वरूप में बदला। न्यायालय में याचिकाओं के साथ देशभर से श्रृद्धालु कारसेवक के रूप में अयोध्या पहुँचने लगे, गोलियाँ चलीं, रामसेवकों के बलिदान हुये। ढाँचा ढहा। अंततः। 9 नवम्बर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय आया। 5 फरवरी 2020 को संसद की अनुमति से भारत सरकार द्वारा स्वतंत्र श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास का गठन किया गया। 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री श्रीनरेन्द्रजी मोदी की उपस्थिति में भूमिपूजन हुआ और 22 जनवरी 2024 को श्रीरामलला अपने जन्मस्थान पर विराजमान हो गये।
जिन दिनों यह प्रकरण न्यायालय में था तब सभी पक्षों ने न्यायालय के निर्णय को मानने की घोषणा की थी। रामभक्तों को आशा थी कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद स्थिति सामान्य होगी और संपूर्ण देश अपने आराध्य के निर्विवाद दर्शन कर सकेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जिस प्रकार रामजी का जीवन वनवास काटने के बाद भी निरापद नहीं ठीक वही स्थिति इस जन्मस्थान मंदिर की रही। सर्वोच्च न्यायलय में भी कयी पेशियों पर नये नये विन्दु उठाए गये। जिससे प्रकरण को निर्णय तक आने में वर्षों लगे। संभवतः भारत के न्यायालयीन इतिहास में यह पहला प्रकरण था जिसमें निर्णय को विलंब से देने की याचिका भी लगी। बात यहाँ भी निरंतर रुकी। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने के बाद राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया विवाद उठाये गये। इसमें ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया तथा चयनित नामों पर भी विवाद उठाने का प्रयास हुआ। फिर मंदिर निर्माण के लिये भूमि पूजन की विधि और मुख्य यजमान पर विवाद उठाया गया। एक ओर पूजन चल रही थी और दूसरी ओर मीडिया में इस भूमि पूजन मुहुर्त से लेकर मुख्य यजमान तक पर प्रश्न खड़े किये जा रहे थे। विवाद का अगला मुद्दा श्रीरामलला के विराजमान होने के दिन शंकराचार्य की अनुपस्थिति के साथ तिथि मुहूर्त का भी मुद्दा उछाला गया। इसके बाद ट्रस्ट द्वारा क्रय की गई भूमि के मूल्य को उछाला गया। लेकिन इन सब बातों और विवादों का रामभक्तों की श्रृद्धा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। देश विदेश से भक्तों का तांता लग गया। प्रतिदिन लाखों लोग अयोध्या आते। अब तक 45 करोड़ से अधिक श्रद्धालु अयोध्या जाकर श्रीरामलला के दर्शन कर चुके हैं।
लेकिन कथित चढ़ावा चोरी का यह हमला द्वितरफा है। एक ओर मंदिर प्रबंधन की साख पर और दूसरा श्रृद्धालुओं की भावनाओं पर। आरोप है कि मंदिर में आने वाले चढ़ावे और श्रृद्धालुओं की दान राशि में करोड़ों रुपये की चोरी हुई है। आरोप चढ़ावे में आये आभूषणों में भी चोरी के आरोप लगाये गये हैं। चोरी के केवल आरोप ही नहीं लगे राम मंदिर न्यास के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा, राम मंदिर की व्यवस्थापक गोपाल राव और चंपत राय के ड्राइवर रहे राम शंकर दयाल उर्फ टिन्नू यादव के विरुद्ध थाने में नामजद रिपोर्ट भी की गई। आरोप पर प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मैदी ने भी संज्ञान लिया और मंदिर प्रबंधन ने भी। मंदिर प्रशासन की पहल पर उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन कर दिया। एसआईटी की टीम ने मंदिर परिसर में दान पेटियों के प्रबंधन, कर्मचारियों की आवाजाही, चढ़ावा प्रक्रिया, दान के बही-खातों आदि की लगातार तीन दिन तक जांच की। एसआईटी अब नोट गिनने वाले उन पचास कर्मचारियों की संपत्ति की जांच कर रही है जिनपर नोट चोरी का आरोप है। एसआईटी को सात दिन में प्रारंभिक और पन्द्रह दिन में फाइनल रिपोर्ट देना है। यदि आरोप सही पाये गये तो चढ़ावे की चोरी के चेहरे सामने आयेंगे और एसआईटी का प्रतिवेदन एफआईआर में बदल जायेगा।
आरोपों की सच्चाई तो एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट में ही स्पष्ट होगी लेकिन आरोपों की शैली और शिकायत का विवरण बहुत आश्चर्यजनक है। सबसे पहले “चढ़ावा चोरी” शब्द। चोरी शब्द एक लंबे समय से राजनैतिक आरोप प्रत्यारोपण में प्रमुख बना। सबसे पहले “चौकीदार चोर” शब्द सामने आया। फिर “वोट चोरी” “सीट चोरी” “चुनाव चोरी” शब्द चर्चा में आये। और अब यह चढ़ावा चोरी शब्द आया। अब मंदिर में चढ़ावा चोरी शब्द ठीक उसी प्रकार उछाला जा रहा है जैसा कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी जैसे राजनैतिक दल से वोट चोरी, चुनाव चोरी या सीट चोरी के आरोप उछालते रहे हैं। इन राजनैतिक दलों के लोग भी इस कथित चढ़ावा चोरी का आरोप लगाने वालों में भी मुखर हैं।
आरोपों में दो और विन्दु आश्चर्यजनक हैं। एक ट्रस्ट के महासचिव चंपतराय जी सहित चार पदाधिकारियों को निशाने पर लेना और दूसरा विन्दु आरोपों में कथित चोरी की अनुमानित राशि और चोरी के तरीके का विवरण भी देना।
आरोपों में महासचिव चंपत राय जी, ट्रस्टी गोपालराव, अनिल मिश्रा तथा व्यवस्थापक टिन्नू यादव के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट होना भी आश्चर्यजनक है। । चंपतराय जी का संत जीवन है। उन्होंने रामजी की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया है। काँग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित मंदिर निर्माण विरोधियों के निशाने पर चंपतराय सदैव रहे हैं। लेकिन उनकी संकल्पशीलता कभी वाधित नहीं हुई। वे करोड़ो रामभक्तों के आदर का केन्द्र हैं। उनको चढ़ावा चोरी में नामजद जोड़ना भी सामान्य नहीं माना जा सकता। एक आरोपों के विवरण का विन्दु भी आश्चर्यजनक है। इसमें चोरी किस प्रकार की गई यह भी विवरण दिया गया है।
आरोपों की सच्चाई बहुत शीघ्र सामने आने वाली है। चूंकि ट्रस्ट के पदाधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री योगी जी और प्रधानमंत्री भी इस शिकायत के बाद गंभीर हैं। यदि चढ़ावे में चोरी हुई है तो यह साधारण चोरी नहीं हो सकती। यह मंदिर के प्रति जन आस्था में आघात पहुँचाने का एक योजनापूर्वक कुचक्र हो सकता है।
नियमानुसार नोटों की गिनती कैमरे की निगरानी में होने का प्रावधान है। नोट गिनने वाले कर्मचारियों की आते और जाते समय तलाशी होने और बिना जेब के साधारण कपड़े पहने का नियम भी है। क्या इन नियमों में ढिलाई बरती गई? यदि ढिलाई बरती गई तो इसका सूत्र कहाँ है? नोट गिनने वालों में कुछ लोग ट्रस्ट के नियमित कर्मचारी नहीं हैं? उनके जुड़ने का मार्ग कौनसा है? क्या कुछ बाहरी तत्वों ने योजनापूर्वक प्रबंधकों का विश्वास अर्जित करके यह चोरी कांड किया है, ताकि मंदिर प्रबंधन की छवि बिगाड़ी जा सके? उत्तर प्रदेश से वेष बदलकर मंदिरों में प्रवेश करने के समाचार आते रहे हैं। सौ से अधिक तो ऐसे नकली पुजारी पकड़ाये हैं जिनका सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं था। इसी माह जून में एक नकली साधू गले में रुद्राक्ष की माला पहनकर उज्जैन के महाकाल मंदिर की भस्म आरती में प्रवेश करता हुआ पकड़ाया। यह वे घटनाएँ हैं जो मंदिर प्रबंधकों और संपूर्ण समाज को अतिरिक्त सावधानी बरतने का संदेश दे रहीं हैं। सनातन धर्म के आस्था केन्द्रों में घुसपैठ करके आस्था पर आघात करने की घटनाएँ देशभर में घट रहीं हैं। क्या कोई ऐसा षड्यंत्र राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण बनाने में तो नहीं है। कथित चढ़ावा चोरी के आरोपियों को कठोर दंड देने के साथ इन सब प्रश्नों पर भी विचार आवश्यक है।

बांग्लादेश के हिंदुओं की हुंकार

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– प्रशांत पोळ

नागपुर : कल शुक्रवार 19 जून को, बांग्लादेश में एक अभूतपूर्व दृश्य देखने मिला। ढाका के नेशनल प्रेस क्लब के सामने, एक विशाल मानव श्रृंखला बनाई गई। फिर दोपहर तक ढाका के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र शाहाबाद क्षेत्र में एकत्र हुए। उनकी संख्या इतनी ज्यादा थी, कि समूचा शाहाबाद परिसर ठप्प हो गया। तब तक शाम हो गई थी। इन विद्यार्थियों ने भव्य और प्रभावी मशाल जुलूस निकाला। इस जुलूस को देखकर, मानो महानगर ढाका ठिठक गया..!

ढाका के लिए यह ऐसे दृश्य आम बात हैं। फिर कल 19 जून के इन प्रदर्शनों में ऐसी क्या विशेषता थी, की मात्रा ढाका ही नहीं, तो सारा बांग्लादेश सहम गया..?

*कारण, यह सारे छात्र हिंदू थे। मानव श्रृंखला बनाने वाले सारे कार्यकर्ता हिंदू थे। वह ‘हिंदू महजोट’ (Bangladesh National Hindu Grand Alliance) के अंतर्गत भगवान श्रीराम के अपमान के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।*

*फर्क था। बहुत ज्यादा अंतर था। कल तक मार खाने वाला हिंदू, आज आत्मविश्वास से लबालब होकर, अपने आराध्य की विडंबना का विरोध प्रकट कर रहा था। बांग्लादेश की सरकार को अल्टीमेटम दे रहा था।*

बांग्लादेश के मानचित्र की, यदि हम एक कुर्ता पहने हुए व्यक्ति के रूप में कल्पना करते हैं, तो उस व्यक्ति के गले के स्थान पर हैं, ‘गायबांधा’ जिला। इस गायबांधा जिले का पलाशबाड़ी गांव, इस समय समूचे बांग्लादेश में छाया हुआ हैं। इस पलाशबाड़ी में, हिंदू समुदाय द्वारा भगवान श्रीराम की 81 फीट की मूर्ति का निर्माण किया जा रहा हैं। श्री श्री राधा गोविंद और काली मंदिर परिसर में निर्माणाधीन इस मूर्ति का 80% काम पूरा हो चुका हैं। राधा गोविंद मंदिर समिति के अध्यक्ष हरिदास चंद्रदास के नेतृत्व में यह कार्य चल रहा हैं।

_(गायबांधा के बारे में कहा जाता हैं, कि यहां महाभारत काल में सम्राट विराट राज करते थे। उन्होंने सैकड़ो की संख्या में गायें पाल रखी थी। जहां पर यह शहर हैं, वहां पर गायें बांधी जाती थी। इसलिए इस स्थान को गायबांधा कहते हैं)_

विगत कुछ दिनों से इमाम-उलेमा परिषद तथा अन्य कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों के विरोध के कारण इस मूर्ति के निर्माण का कार्य पूरी तरह से रुका हैं। कट्टरपंथियों ने इस मूर्ति को ध्वस्त करने की धमकी दी हैं। इसी कडी में, इस हफ्ते कुछ उपद्रवी लोगों ने, निर्माणाधीन मूर्ति पर जूते – चप्पलों का ढेर लगा दिया। इस धार्मिक विडंबना के विरोध में बांग्लादेश के हिंदू आक्रामक हुए। ढाका के दक्षिणी हिस्से में स्थित, ‘जगन्नाथ विश्वविद्यालय’ के हिंदू विद्यार्थी सर्वप्रथम इस धार्मिक अवमानना के विरोध में सड़कों पर उतर आए। इस आंदोलन से जो चिंगारी सुलगी, उससे बांग्लादेश के हिंदू जागृत हुए। उसी कड़ी में कल ढाका में हिंदू विद्यार्थियों का अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ

बांग्लादेश में इस समय मात्र 9% से 10% हिंदू बचा हुआ हैं। गायबांधा में तो मात्र 7% हिंदू हैं। इससे पहले भी, इसी प्रकार का हिंदुओं का दमन होते आया हैं। बांग्लादेश में अनेकों बार हिंदुओं के मंदिर तोड़े गए। आराध्या देवताओं के विग्रह ध्वस्त किए गए। कभी हिंदुओं ने छुटपुट विरोध किया, तो अधिकतम समय, मन मसोस कर रह गए।

*तो फिर इस बार बांग्लादेश के हिंदुओं में यह साहस कहां से आया..?*

*इसका उत्तर हैं, पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम !*

*जी, हां। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम से निकली हिंदुत्व की लहर से बांग्लादेश के हिंदुओं को हिम्मत मिली। साहस मिला। उनका आत्मविश्वास जागृत हुआ, और कल का अभूतपूर्व आंदोलन संपन्न हुआ।*

हम हमेशा यह समाचार सुनते आए हैं, कि पाकिस्तान में हिंदुओं पर दुर्दांत अत्याचार हुए। उनका बलात धर्म परिवर्तन कराया गया। अनेक हिंदू लड़कियों को भगाया गया… आदि। ऐसे ही समाचार बांग्लादेश से भी आते हैं। 1947 से 1975 तक पूर्व पाकिस्तान में, और 1975 से आज तक बांग्लादेश में, अनेक हिंदू मंदिर समय-समय पर तोड़े गए। 1975 में पश्चिमी पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेश के हिंदुओं का नरसंहार (genocide) किया। 2024 के अराजक वातावरण में पुनः यही हुआ। सैकड़ो हिंदू मारे गए। भीड के द्वारा पीट – पीट कर (Mob Lynching) तो अनेकों बार हिंदुओं की हत्या की गई।

इन सभी अवसरों पर, ह्यूमन राइट्स की बातें करने वाले, मानवता का उपदेश देने वाले, सेकुलरिज्म का पाठ पढ़ने वाले हमेशा खामोश रहे। चुप्पी साध कर बैठे रहे।

ऐसा क्यों..?

भारत में भी लगभग 10% से 12% मुसलमान हैं। किंतु यहां अपवाद स्वरुप एक छोटी भी घटना हो जाती हैं, तो यह तमाम मानवाधिकार के पैरोकार, दुनिया में शोर मचाते हैं। अनेकों बार कुछ हुआ नहीं तो भी, ‘भारत में मुसलमान असुरक्षित’ का नारा घुमता हैं; जैसे कोरोना के समय गुंजा था।

फिर वही प्रश्न। बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों की कोई बराबरी ही नहीं हैं। फिर भी, भारत में छोटी-मोटी घटना होने या ना होने पर भी, विश्व के माध्यम जगत में वह बड़ा समाचार बनता हैं, किंतु बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू नरसंहार का सादा समाचार भी प्रमुखता से नहीं छपता।

ऐसा क्यों..?

इसका कारण हैं – संगठन। भारत का मुस्लिम समुदाय संगठित हैं, भले ही अलग-अलग टुकड़ों में, या संगठनों में हो, किंतु संगठित हैं।

दुर्भाग्य से पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदुओं के बारे में ऐसा नहीं कह सकते। 1947 के पहले मुसलमानों का राजनीतिक दल था, ‘मुस्लिम लीग’। विभाजन के पश्चात भारत में मुस्लिम लीग की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। किंतु फिर भी मुस्लिम लीग जिंदा रही। उसने ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ यह नया नामकरण कर लिया। केरलम में अपनी शक्ति बढ़ाते गए। उनके संसद सदस्य चुनकर आते गए। यूपीए का वह एक हिस्सा रहे। यूपीए के 10 वर्षों के शासनकाल में, उनका मंत्री, कांग्रेस के साथ मंत्रिमंडल का सदस्य था। आज भी केरलम में कांग्रेस का मुख्यमंत्री, इस मुस्लिम लीग की सहमति से और उसकी दम पर ही टिका हैं। एमआईएम जैसे अन्य मुस्लिम संगठन भी मुस्लिम राजनीति दमखम के साथ करते हैं।

विभाजन के पहले हिंदुओं का एकमात्र राजनीतिक दल था, ‘हिंदू महासभा’। दुर्भाग्य से, हिंदुस्तान के हिंदू उसे अपना दल नहीं मानते थे। अंग्रेज और मुसलमान, कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी समझते थे। जबकि कांग्रेस अपने आप को हिंदुओं की पार्टी नहीं मानती थी। कांग्रेस की सारी नीतियां मुस्लिम परस्त थी।

विभाजन के बाद क्या हुआ? पश्चिम पाकिस्तान में हिंदू महासभा का थोड़ा बहुत कार्य था। उसके अनेक कार्यकर्ता भारत आ गए। जो वहीं पर डटे रहे, उनका भी मनोबल टूटा हुआ था। इसलिए 1950 के आते-आते, पश्चिम पाकिस्तान से हिंदू महासभा का अस्तित्व समाप्त हो गया था।

तुलना में पूर्व पाकिस्तान में हिंदू महासभा की कुछ ताकत थी। अविभाजित बंगाल में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और निर्मल चंद्र चटर्जी जैसे ताकतवर नेता, हिंदू महासभा के पास थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कारण ही बंगाल का विभाजन होकर, पश्चिम बंगाल भारत में आ सका। अन्यथा पूरा बंगाल पाकिस्तान में मिलाने की बात हो रही थी।

किंतु पूर्वी पाकिस्तान बनने के बाद, वहां पर हिंदू महासभा का कोई खास अस्तित्व नहीं रहा। 1950 में ढाका, बारिसाल, खुलना और अन्य क्षेत्रों में हिंदू विरोधी दंगे हुए। इन दंगों के कारण, या तो हिंदू समाज ने पलायन किया, या वह दबकर रह गया।

*अर्थात, पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान, दोनों में अच्छी खासी संख्या होने के बावजूद भी हिंदू समाज राजनीतिक ताकत के रूप में सामने नहीं आया। दुनिया में शक्ति को ही सब प्रणाम करते हैं। हिंदू यह राजनीतिक या सामाजिक शक्ति के रूप में नहीं रहा, तो स्वाभाविक था, उन पर अत्याचार बढ़ते गए।*

आज बांग्लादेश में हिंदुओं के कुछ सामाजिक संगठन है। सन 2006 में कुछ हिंदू संगठनों ने मिलकर, ‘हिंदू महजोट’ बनाया। किंतु इसकी गतिविधियां सीमित थी। राजनीतिक शक्ति नहीं थी। अधिकतम हिंदू, शेख हसीना सरकार की अवामी लीग को समर्थन देते थे। 2024 में अवामी लीग का तख्तापलट होने के बाद, हिंदुओं पर जबरदस्त अत्याचार हुए। किंतु ‘हिंदू महजोट’ ने प्रारंभ में उन्हें राजनीतिक प्रतिशोध माना। इसलिए हिंदू समाज से अपेक्षित प्रतिकार नहीं खड़ा हुआ।

किंतु कल का आंदोलन अपवाद था। बांग्लादेश का हिंदू अब जाग गया हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण था।

पश्चिम बंगाल के चुनाव ने बहुत कुछ बदला हैं। अब बांग्लादेश के हिंदू आत्मविश्वास के साथ, संगठित शक्ति का हुंकार भर रहे हैं। यह हिंदुओं के लिए अत्यंत सकारात्मक दृश्य हैं।

सनातन व नारी सम्मान पर बड़ी लकीर खींचते योगी

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राजनीति से ऊपर उठकर सनातन धर्म तथा स्त्री गरिमा तथा सम्मान के हित में बड़ी रेखाएं खींच रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने सपा मुखिया अखिलेश यादव की बेटी के प्रति सोशल मीडिया के माध्यम से आपत्तिजनक बयानबाजी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने केआदेश जारी किए हैं। मुख्यमंत्री के आदेश के बाद अपराधियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गयी है। मुख्यमंत्री ने सख्ती के साथ कहा है कि किसी भी  बेटी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए हर बेटी का सम्मान होना चाहिए। हम उन संस्कारों में पले -बढ़े हैं जहां गांव की बेटी -बहन को पूरे गांव की बेटी -बहन माना जाता है।

मुख्यमंत्री योगी बेटियों की सुरक्षा के लिए संकल्पवान हैं । वह कई जनसभाओं मे अपना मंतव्य स्पष्ट  कर चुके हैं कि अगर किसी ने बेटियों की सुरक्षा में सेंध लगाने का प्रयास किया तो अगले चैराहे पर उसका इंतजार यमराज कर रहा होगा। योगी जी के बयानों का असर धरातल पर भी दिखाई पड़ता है। बेटियों के साथ होने वाली अप्रिय घटनाओं पर त्वरित कार्यवाही हो रही है। आरोपियों  का हाफ एनकाउंटर हो रहा है तथा आवश्यकता पड़ने पर बुलडोजर एक्शन भी हो रहे हैं। प्रदेश में नारी समाज को सशक्त बनाने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। नवरात्रि के अवसर पर मिशन शक्ति जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं । केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं के माध्यम से नारी सशक्तीकरण का महाअभियान चलाया जा रहा है।

सपा मुखिया अखिलेश यादव की बेटी पर टिप्पणी करने वालों के खिलाफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़ा रवैया दिखाकर सपा मुखिया अखिलेश  यादव द्वारा बुने जा रहे चक्रव्यूह को एक ही झटके में ध्वस्त कर दिया है। सपा मुखिया अखिलेश की बेटी अदिति पर सोशल मीडियापर अभद्र टिप्प्णी के बाद मुख्यमंत्री योगी ने जो एक्शन लिया है उसने इस दुखद घटना पर बनाए जा रहे सपा के राजनैतिक नैरेटिव को ध्वस्त  कर दिया है। जब सोशल मीडिया के माध्यम से यह विवाद बड़े राजनीतिक तूफान में बदल रहा था और सपा योगी जी व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहकर घेरने का प्रयास  कर रही थी कि, “जिनका खुद का परिवार नहीं वो परिवार का दर्द क्या समझेंगे“ तब योगी जी इस घटना के जिम्मेदार लोगों को ढूंढ रहे थे। योगी जी ने अपराधियों पर  तुरंत एफआईआर कराने के निर्देश जारी करते हुए कहा कि वह किसी भी बेटी क्यों न हो  बेटी पर अभद्र टिप्पणी बर्दाश्त नहीं है।

यूपी चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ ने अपने इस कदम से सिद्ध कर दिया है कि महिला सुरक्षा और सम्मान के मामले में उनकी सरकार बिना किसी भेदभाव  के काम करती है। इससे सपा मुखिया रक्षात्मक रुख अपनाने को बाध्य हो गए हैं । अब भाजपा सपा के पुराने बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर उस पर हमलावर  है। जो मुद्दा सरकार को घेरने के लिए तैयार किया जा रहा था उस पर योगी जी की प्रशासनिक और राजनीतिक सूझबूझ का बुलडोजर चल गया है। समाजवादी पूर्व में कई बार नारी सम्मान व उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली बयानबाजी करते रहे हैं । स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव ने एक बार कहा था कि “लड़के हैं गलतियां हो जाती हैं। सपा के कद्दावर नेता माने जाने वाले आजम खां जैसे नेता तो कई बार महिलाओं की गरिमा के खिलाफ अभद्र टिप्पणी कर चुके हैं । मायावती जी पर तो सपाइयों ने हमला ही बोल दिया था। सपा राज में महिला सुरक्षा की कितनी बुरी स्थिति थी यह हर कोई जानता है।

योगी की पाती दे रही सनातन विचार – विश्व वृद्धजन दुर्व्यवहार जागरुकता दिवस पर योगी जी ने एक पाती जारी की है।  इस पाती में उन्होंने वृद्धजनों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखा है कि उम्र के अमृतकाल में वृद्धजनों को अपनत्व की सर्वाधिक आवश्यकता होती है, दुर्भाग्य से समाज ऐसे समय का साक्षी बन रहा है जब वृद्धजनों को अपनों का दुर्व्यवहार सहना पड़ता है।

योगी जी ने आगे लिखा है  कि सनातन संस्कृति में माता- पिता और गुरु को साक्षात  ईश्वर माना जाता है। पाती में योगी ने एक प्राचीन कथा के माध्यम से इस विषय को समझाया। भगवान शिव- पार्वती ने पुत्र गणेश जी और कार्तिकेय के समक्ष  समस्त जगत की परिक्रमा की चुनौती रखी। भगवान गणेश ने माता -पिता को ही संपूर्ण सृष्टि  मानकर उनकी परिक्रमा कर ली। उन्होंने भगवान श्रीराम का भी उदाहरण दिया। योगी जी का स्पष्ट कहना है कि सनातन,  धार्मिक तथा सामाजिक परंपराओें, पारिवारिक संबंधों एवं मूल्यों पर आधारित जीवन शैली है। सनातन में बड़ों  का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने की परंपरा है ऐसा इसलिए क्योंकि वे हमारी संस्कृति और जीवन मूल्यों के धरोहर हैं ।वृद्धजनों का सम्मान केवल संस्कर नहीं बल्कि हमारी गौरवशाली सभ्यता की पहचान है। अपनी पाती मे वह बता रहे हैं कि वृद्धजन व  निराश्रित महिलाओं  के लिए प्रदेश सरकार ने 1500 रुपए प्रति माह पेंशन देने का निर्णय लिया है।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार सनातन संस्कृति के विचारों पर चलते हुए उन्हें आगे बढ़ा रही है और सनातन संस्कृति को पुष्ट करने वाले निर्णय ले रही है।

सृजनशील सोच, समाधानकारी संस्कार और समर्थ भारत

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लखनऊ।  भारत की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है जहाँ उसे यह तय करना है कि वह विद्यार्थियों को केवल जानकारी का भंडार बनाएगी या उन्हें भविष्य का निर्माता बनाएगी। सदियों से चली आ रही परीक्षा-केंद्रित मानसिकता ने शिक्षा को ज्ञानार्जन की प्रक्रिया से अधिक अंक प्राप्त करने की प्रतियोगिता में बदल दिया है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में लाखों विद्यार्थी प्रतिवर्ष असंख्य तथ्यों, परिभाषाओं और उत्तरों को याद करके परीक्षाएँ उत्तीर्ण करते हैं, किंतु जब वास्तविक जीवन की समस्याओं का सामना करने का अवसर आता है तो उनमें से बड़ी संख्या स्वयं को असहाय पाती है। इसका कारण प्रतिभा का अभाव नहीं, बल्कि ऐसी शैक्षिक संरचना है जो जिज्ञासा से अधिक स्मरणशक्ति को, प्रश्नों से अधिक उत्तरों को और सृजन से अधिक पुनरुत्पादन को महत्व देती रही है। आज जब विश्व ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है, तब भारत के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वह अपनी शिक्षा को रटने की संस्कृति से मुक्त कर रचनात्मकता, समस्या-समाधान और नवोन्मेष की संस्कृति से जोड़े।

वर्तमान युग में ज्ञान का स्वरूप बदल चुका है। कभी पुस्तकालयों और ग्रंथों में सीमित रहने वाली जानकारी आज कुछ क्षणों में उपलब्ध हो जाती है। ऐसे समय में किसी विद्यार्थी का मूल्य इस बात से नहीं आँका जाएगा कि उसे कितने तथ्य कंठस्थ हैं, बल्कि इस बात से आँका जाएगा कि वह उपलब्ध ज्ञान का उपयोग करके क्या नया सोच सकता है, क्या नया बना सकता है और समाज की चुनौतियों के समाधान में कितना योगदान दे सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, रोबोटिकी, जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल प्रौद्योगिकियों के विस्तार ने कार्यक्षेत्र की प्रकृति को बदल दिया है। जो कार्य केवल स्मृति और दोहराव पर आधारित हैं, वे तेजी से मशीनों के दायरे में जा रहे हैं। मनुष्य की विशिष्टता अब उसकी रचनात्मकता, कल्पनाशक्ति, संवेदनशीलता और जटिल समस्याओं को समझकर उनका समाधान खोजने की क्षमता में निहित है। यदि हमारी शिक्षा इन गुणों का विकास नहीं कर रही है, तो वह भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं कही जा सकती।

दुर्भाग्यवश भारतीय शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अभी भी उस औपनिवेशिक सोच की छाया में दिखाई देता है जिसका उद्देश्य स्वतंत्र चिंतन करने वाले नागरिक नहीं, बल्कि निर्देशों का पालन करने वाले कर्मचारी तैयार करना था। पाठ्यपुस्तक के निश्चित उत्तर, परीक्षा में अपेक्षित भाषा और अंक प्राप्ति की निरंतर चिंता ने विद्यार्थियों के भीतर से प्रश्न पूछने का साहस कम किया है। अनेक बार कक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी भी किसी वास्तविक समस्या पर स्वतंत्र रूप से विचार करने में कठिनाई अनुभव करता है। यह स्थिति केवल व्यक्ति के विकास को ही बाधित नहीं करती, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक सृजनात्मक क्षमता को भी सीमित कर देती है। एक ऐसा देश जो विश्वगुरु बनने का स्वप्न देखता है, उसे केवल ज्ञान का उपभोक्ता नहीं, बल्कि ज्ञान का उत्पादक बनना होगा।

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर निहित संभावनाओं का विकास करना है। जब किसी विद्यार्थी को किसी समस्या को समझने, उसके कारणों का विश्लेषण करने, विभिन्न विकल्पों पर विचार करने और अपने समाधान प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है, तभी उसकी बौद्धिक क्षमता का वास्तविक विस्तार होता है। यही प्रक्रिया वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जन्म देती है, यही नवाचार की आधारशिला रखती है और यही लोकतांत्रिक समाज में सक्रिय नागरिकता का निर्माण करती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहाँ जल संकट से लेकर पर्यावरणीय चुनौतियों तक और ग्रामीण विकास से लेकर शहरी प्रबंधन तक अनेक जटिल प्रश्न उपस्थित हैं, वहाँ ऐसी शिक्षा की आवश्यकता और भी अधिक है जो विद्यार्थियों को समस्याओं की पहचान करने और उनके व्यावहारिक समाधान खोजने के लिए प्रेरित करे।

यह परिवर्तन केवल पाठ्यक्रम बदल देने से नहीं आएगा। इसके लिए शिक्षा के पूरे दर्शन में परिवर्तन आवश्यक है। विद्यालयों को ऐसी जगह बनना होगा जहाँ जिज्ञासा का सम्मान हो, जहाँ प्रश्न पूछना अनुशासनहीनता नहीं बल्कि सीखने का संकेत माना जाए, जहाँ गलती को दंड का नहीं बल्कि सुधार और खोज का अवसर समझा जाए, और जहाँ विद्यार्थी केवल सुनने वाले नहीं बल्कि सक्रिय भागीदार हों। शिक्षा को पुस्तकों की सीमाओं से निकालकर प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, समुदायों, खेतों, उद्योगों और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ना होगा। जब विद्यार्थी अपने आसपास की समस्याओं को समझेंगे और उन्हें हल करने का प्रयास करेंगे, तभी शिक्षा उनके लिए जीवंत अनुभव बन सकेगी।

इस परिवर्तन में शिक्षकों की भूमिका निर्णायक है। शिक्षक केवल जानकारी देने वाले नहीं, बल्कि प्रेरणा देने वाले मार्गदर्शक होने चाहिए। उन्हें विद्यार्थियों को तैयार उत्तर देने के बजाय सही प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करना होगा। शिक्षा का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर ज्ञान की खोज करें। इसके लिए शिक्षकों के सतत प्रशिक्षण, शैक्षणिक स्वतंत्रता और आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है। यदि शिक्षक स्वयं सृजनात्मक और शोधपरक वातावरण में कार्य करेंगे, तभी वे विद्यार्थियों में इन गुणों का विकास कर पाएँगे।

परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार भी समय की मांग है। जब तक सफलता का निर्धारण मुख्यतः याद की गई सामग्री के आधार पर होगा, तब तक रटने की प्रवृत्ति समाप्त नहीं होगी। मूल्यांकन को इस प्रकार पुनर्गठित करना होगा कि वह विश्लेषणात्मक सोच, रचनात्मक अभिव्यक्ति, परियोजना-आधारित कार्य, सहयोगात्मक प्रयास और वास्तविक जीवन में ज्ञान के अनुप्रयोग को महत्व दे। विद्यार्थियों को यह अनुभव होना चाहिए कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक अर्जित करना नहीं, बल्कि जीवन को समझना और समाज को बेहतर बनाना है।

भारत के पास इस परिवर्तन के लिए मजबूत सांस्कृतिक आधार भी मौजूद है। हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा प्रश्न, संवाद और चिंतन पर आधारित रही है। उपनिषदों से लेकर प्राचीन विश्वविद्यालयों तक, भारतीय बौद्धिक परंपरा ने जिज्ञासा को ज्ञान का मूल माना है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उस चिंतनशील विरासत को आधुनिक विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के साथ जोड़ें। यह संयोजन भारत को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था प्रदान कर सकता है जो न केवल वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम हो, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी समृद्ध हो।

नीति-निर्माताओं के सामने आज एक ऐतिहासिक अवसर है। यदि वे शिक्षा को स्मृति-केंद्रित ढाँचे से निकालकर सृजन-केंद्रित ढाँचे में परिवर्तित करने का साहसिक निर्णय लेते हैं, तो इसका प्रभाव केवल विद्यालयों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे अनुसंधान को नई गति मिलेगी, उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलेगा, सामाजिक समस्याओं के समाधान विकसित होंगे और भारत की आर्थिक तथा बौद्धिक शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। विकसित भारत का सपना केवल नई इमारतों, राजमार्गों और डिजिटल प्रणालियों से पूरा नहीं होगा; वह तभी साकार होगा जब हमारे विद्यालय ऐसे युवाओं को तैयार करेंगे जो नई राहें बनाने का साहस रखते हों, जो चुनौतियों को अवसर में बदल सकें और जो ज्ञान को केवल ग्रहण ही नहीं, बल्कि उसका सृजन भी कर सकें। इसलिए आज की सबसे बड़ी शैक्षिक आवश्यकता यही है कि भारत अपने बच्चों को उत्तर याद करने के बजाय प्रश्न पूछना, समस्याओं से भागने के बजाय उनका समाधान खोजना और परंपरागत सीमाओं को स्वीकार करने के बजाय नए क्षितिजों का निर्माण करना सिखाए। यही शिक्षा भारत को आने वाले दशकों में ज्ञान, नवाचार और मानवीय प्रगति का अग्रदूत बना सकती है।

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