भरत भूषण को गोली मारने वाले सस्पेंड होकर लौट आएंगे, नहीं लौटेगा कभी भरत भूषण

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सर्वेश

पटना। आरा में पुलिस की गोलियों से मारे गए भरत तिवारी की पुरानी तस्वीरें बता रही हैं कि लड़का सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता रहा है। जनता की समस्याओं को लेकर अधिकारियों नेताओं तक पहुंचना, उनका निदान ढूंढना, कमजोरों की मदद करना ही मुख्य काम रहा है। आज से नहीं, लम्बे समय से…

भरत की मानसिक दशा ठीक नहीं थी, यह तो स्पष्ट है। संभव है अधिकारियों, नेताओं के झूठे आश्वासनों से निराश होने के कारण उनकी मानसिक अवस्था खराब हुई हो, क्योंकि यह तो तय है कि लड़के को समाज सेवा के अतिरिक्त और कुछ सूझता नहीं था। ऐसे में उसने पिस्टल खरीदी और लहराते धमकाते हुए तीन दिन में उस मुद्दे को राष्ट्रीय फलक पर पहुंचा दिया जिसपर कोई बात नहीं कर रहा था।

कटाव के कारण नदी में विलीन हो चुके जमनिया गांव के लोगों को जिस जगह बसाया जा रहा था, वह जगह भी पानी में डूबी रहने वाली है। भरत लड़ रहा था कि इस जमीन को मिट्टी से भर कर कम से कम रहने लायक तो बना दिया जाय। यह सच है कि तब उसकी बात किसी ने नहीं सुनी।

आज उसके एनकाउंटर के विरोध में बहुत बड़ी संख्या सड़कों पर है। विपक्ष के सारे स्थानीय चेहरे उसे शहीद बता रहे हैं और सत्ता पक्ष के भी दर्जनों लोग फर्जी एनकाउंटर के विरुद्ध बोल चुके। पर इस तमाम विरोध प्रदर्शन से एक सत्य नहीं बदल सकता कि भरत मारे जा चुके हैं, उनकी माता को जीवन भर इस पीड़ा में जलना होगा।

हालांकि इसी बीच ऐसे लोगों की संख्या भी बहुत बड़ी है जो इस एनकाउंटर को सही ठहरा रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम माझी तो खुलेआम कह रहे हैं कि वह अपराधी था और उसे मारा जाना सही है। कुछ बड़े पत्रकार इसी बहाने उत्तर प्रदेश के अपराधियों के एनकाउंटर पर प्रश्न उठाने लगे हैं। वे ढके छुपे लहजे में हमेशा की तरह ब्राह्मणों को ट्रॉल करने में लगे हैं कि उत्तर प्रदेश के एनकाउंटर पर खुश हो रहे थे तो अब दुखी क्यों हो? आप चाहें भी तो ऐसे लोगों को नहीं समझा सकेंगे कि बीस बीस केसों में नामजद खूंखार अपराधियों और भरत भूषण में क्या अंतर है।

जिस टोले की लड़ाई लड़ रहे थे भरत भूषण, उस टोले के लोग मात्र छह महीने बाद उसी जीतन राम माझी को अपना बताएंगे, जो आज भरत के एनकाउंटर को जायज बता रहे हैं। अपने बिहार को इतना तो समझता ही हूं मैं…

कुछ पुलिस अधिकारी सस्पेंड हुए हैं। कुछ ही दिन में चुपचाप सस्पेंशन टूट जाएगा और वे ड्यूटी में लग जायेंगे। यही होता रहा है, यही होता रहेगा… पर भरत भूषण तिवारी अब अपने परिवार को नहीं मिलेंगे।

मैं जो कहना चाह रहा हूं शायद कह नहीं पा रहा, पर आप समझिएगा जरूर… आप भरत की हत्या करने वालों को दंडित करने की लड़ाई लड़िए, पर जनता की पीड़ा से विचलित हो कर हथियार उठाने वाले लड़के दिखें तो उन्हें समझाइए। उसकी तुलना जिन चंद्रशेखर आजाद से कर के प्रसन्न हो रहे हैं हम, उनका यज्ञोपवीत भी बहुतों की आंख में चुभता है… बिहार की राजनीति में आदमी आदमी बाद में है, जाति पहले है।

19 जून 1947 : गुरु को बचाने अपने प्राण न्यौछावर किये

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यह घटना उन दिनों की है जब अंग्रेजों ने भारत से जाने की घोषणा कर दी थी और भारत विभाजन की प्रकिया भी आरंभ हो गई थी। लेकिन अंग्रेज जाते जाते कुछ ऐसा करके जाना चाहते थे चर्च की जमाशट पर कोई अंतर न आये और न उनकी कोई सांस्कृतिक परंपरा प्रभावित हो। इसके लिये उनके कुछ “स्लीपर सेल” सक्रिय थे जो देशभर में काम रहे थे। इसी षड्यंत्र में इस बालिका का बलिदान हुआ।

कालीबाई एक तेरह वर्षीय वनवासी बालिका थी। यह राजस्थान के डूंगरपुर जिले के वनाँचल की रहने वाली थी । कालीबाई का जन्म कब हुआ इसका इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता । अनुमानतः कालीबाई का जन्म जून 1934 माना गया। अंग्रेजीकाल में चर्च ने वनवासी अंचलों में चर्च ने अपने विद्यालय आरंभ करने का अभियान चलाया हुआ था। जिनका उद्देश्य वनवासी समाज को उनके मूल से दूर करना था। उनकी शिक्षा की शैली कुछ ऐसी थी कि वनवासी क्षेत्र में मतान्तरण तेजी से होने लगा था । उस समय के अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और सामाजिक साँस्कृतिक संगठन इसके लिये चिंतित थे। विशेषकर ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जो आर्यसमाज या राम-कृष्ण मिशन से जुड़े हुये थे उनमें यह भाव अधिक प्रबल था। राजस्थान में स्वामी दयानन्द सरस्वती और स्वामी विवेकानंद के बहुत प्रवास हुये थे इसलिये राजस्थान क्षेत्र में इन दोनों संस्थाओं का प्रभाव था ।

सुप्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी नानाभाई खांट आर्यसमाज से जुड़े थे उन्होंने डूंगरपुर जिले के रास्तापाल गाँव में एक विद्यालय आरंभ किया। विद्यालय में वनवासी बच्चों की शिक्षा का प्रबंध किया गया था । विद्यालय में उस समय की आधुनिक शिक्षा तो दी जाती थी पर भारतीय गुरु शिष्य परंपरा को भी जीवंत किया था। विद्यालय ने शाम को एक प्रार्थना सभा का आरंभ भी किया। जिसमें वनवासी परिवार भी आने लगे। इस विद्यालय में मुख्य शिक्षक सेंगाभाई थे। वनवासी बालिका कालीबाई भी यहाँ पढ़ने आती थी । यह भील समाज से संबंधित थी। उसकी आयु अनुमानित तेरह वर्ष थी। यह क्षेत्र डूंगरपुर रियासत के अंतर्गत आता था। आर्यसमाज ने विद्यालय आरंभ करने की अनुमति महारावल डूंगरपुर से ले ली थी। इस क्षेत्र में एक चर्च भी सक्रिय था। इस विद्यालय और उसकी गतिविधि से वनवासी समाज चर्च से दूर होने लगा। चर्च को आपत्ति हुई। चर्च ने कमिश्नर को शिकायत की।

अंग्रेजों ने भले भारत से जाने की घोषणा कर दी थी पर उनकी पूरी प्रशासनिक व्यवस्था और रियासतों पर रुतबा कम न हुआ था। शिकायत मिलते ही कमिश्नर ने डूंगरपुर के महारावल पर दबाब बनाया और विद्यालय बंद करने के आदेश हो गये। आदेश मिलते ही नानाभाई ने विद्यालय तो यथावत रखा और उन्होने महाराज से मिलने का प्रयास किया लेकिन अनुमति न मिली। मिलने का समय टाला गया। नानभाई को आशा थी महाराज से मिलने के बाद अनुमति यथावत हो जायेगी इसलिये विद्यालय बंद न हुआ । वे यह भी जानते थे कि अंग्रेज तो जाने वाले हैं। तब चर्च और अंग्रेज अधिकारियों के आगे क्यों झुकना। उनके इंकार करने से अधिकारी बौखला गये । एक भारी पुलिस बल के साथ अधिकारी विद्यालय पहुँचे। वे ताला लगाकर विद्यालय सील करना चाहते थे । किन्तु शिक्षक सेंगाभाई ने विद्यालय के द्वार पर खड़े होकर रास्ता रोकना चाहा। पुलिस ने पकड़ कर किनारे किया और विद्यालय पर ताला लगा दिया । शिक्षक सेंगाभाई को रस्सी से गाड़ी के पीछे बाँध दिया गया। गाड़ी रवाना हुई तो शिक्षक सेंगाभाई घसीटते हुये जा रहे थे ।

उनका पूरा शरीर लहूलुहान हो गया । रास्ते में कालीबाई खेत में काम कर रही थी । उसने देखा कि उनके गुरू को पुलिस गाड़ी में पीछे बाँधकर घसीटते हुये लेकर जा रही है। कालीबाई के हाथ में हँसिया था । वह हँसिया लेकर दौड़ी और रस्सी काट दी। पुलिस इससे और बौखला गई। पुलिस ने गोलियाँ चला दीं। पुलिस की गोली से कालीबाई का शरीर छलनी हो गया। गोली की आवाज सुनकर भील समाज एकत्र हो गया। सबने शिक्षक की दुर्दशा और अपनी बेटी का शव देखा। पूरा भील समाज आक्रोशित हो गया और पुलिस दोनों को छोड़कर भाग गई। कालीबाई का बलिदान मौके पर ही हो गया था । यह घटना 19 जून 1947 की है । सेंगाभाई इतने घायल हो गये थे कि रात में उनका भी प्राणांत हो गया । अगले दिन बीस जून को दोनों का अंतिम संस्कार किया गया । गुरु के प्राण बचाने केलिये बालिका कालीबाई का बलिदान इतिहास की पुस्तकें में आज भी लोकगीतों में है । स्वतंत्रता के बाद उस स्थान पर एक पार्क बनाया गया है इस पार्क में कालीबाई की प्रतिमा भी स्थापित है ।

तिब्बत में चीन की नीतियों को समझाती यह खास किताब

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी । एक जागरूक भारतीय नागरिक के लिए चीन आज भी एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति के रूप में देखा जाता है जिसने सात दशक पहले तिब्बत पर कब्ज़ा कर भारत की उत्तरी सीमाओं तक अपनी पहुंच बनाई। भले ही नई दिल्ली की आधिकारिक नीति स्वतंत्र तिब्बत की अवधारणा का समर्थन नहीं करती हो, लेकिन भारत सहित दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोग अब भी मानते हैं कि तिब्बती जनता को अपने राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ जीने का अवसर मिलना चाहिए। दूसरी ओर, बीजिंग की कम्युनिस्ट सरकार तिब्बत के संसाधनों और रणनीतिक महत्व को देखते हुए वहां अपने नियंत्रण को बनाए रखने के लिए हर प्रकार के विरोध को दबाने का प्रयास करती रही है।

इसी पृष्ठभूमि में प्रकाशित पुस्तक ‘China’s Colonial Games in Tibet’ तिब्बत के प्रश्न को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास करती है। वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और तिब्बत मामलों के जानकार विजय क्रांति द्वारा संपादित यह पुस्तक VK Media Group द्वारा Center for Himalayan Asia Studies and Engagement (CHASE) के लिए प्रकाशित की गई है। 486 पृष्ठों की यह हार्डबाउंड पुस्तक केवल एक संकलन नहीं, बल्कि तिब्बत के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोणों, अनुभवों और शोधपरक विश्लेषणों का व्यापक दस्तावेज़ है।
पुस्तक में तिब्बत और चीन से जुड़े लगभग 39 प्रतिष्ठित विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, राजनयिकों और रणनीतिक मामलों के जानकारों के करीब 60 लेख शामिल हैं। यह सामग्री वर्ष 2020 से 2023 के बीच नई दिल्ली स्थित थिंक-टैंक CHASE द्वारा आयोजित 30 से अधिक अंतरराष्ट्रीय वेबिनारों और चर्चाओं से संकलित की गई है। इन लेखों में तिब्बत के अलावा पूर्वी तुर्किस्तान, दक्षिणी मंगोलिया, हांगकांग और मंचूरिया जैसे क्षेत्रों में चीन की नीतियों और उसके औपनिवेशिक दृष्टिकोण की भी पड़ताल की गई है।

विजय क्रांति, जिन्हें लंबे समय से तिब्बती आंदोलन के समर्थक और संवेदनशील पर्यवेक्षक के रूप में जाना जाता है, ने पुस्तक के माध्यम से उन आवाज़ों को मंच देने का प्रयास किया है जो अक्सर वैश्विक विमर्श में उपेक्षित रह जाती हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि यह परियोजना केवल तिब्बत तक सीमित नहीं रहेगी और भविष्य में चीन के नियंत्रण वाले अन्य क्षेत्रों पर भी इसी प्रकार के अध्ययन प्रकाशित किए जाएंगे। पुस्तक की तैयारी के दौरान तिब्बती यूथ कांग्रेस (TYC) के सहयोग को भी उन्होंने विशेष रूप से स्वीकार किया है।

इस संकलन में भूचुंग त्सेरिंग, क्लाउड अर्पी, डेचेन पाल्मो, एलेनोर बायरन-रोसेनग्रेन, एंगेबातु तोगोचोग, एनवर तोहती, एथन गुटमैन, गेब्रियल लाफिटे, गेशे ल्हाकडोर, जयदेव रानाडे, जेनिफर ज़ेंग, ल्हाडोन टेथोंग, ल्हाग्यारी नामग्याल डोलकर, थुबटेन साम्पेल, थिनले चुक्की और तेनज़िन पासांग जैसे अनेक विशेषज्ञों के लेख शामिल हैं। इसके अतिरिक्त प्रोफेसर रॉबर्ट डेस्ट्रो, प्रोफेसर समधोंग रिनपोछे और सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (CTA) के अध्यक्ष पेनपा त्सेरिंग जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों के विचार भी पुस्तक को विशेष महत्व प्रदान करते हैं।

पुस्तक के विभिन्न लेख इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि तिब्बतियों को उनके राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकार मिलने चाहिए, ताकि दशकों से जारी असुरक्षा और मानसिक पीड़ा को कम किया जा सके। इसमें उन दुखद घटनाओं का भी उल्लेख है जिनमें 150 से अधिक तिब्बती युवाओं ने विरोध स्वरूप आत्मदाह किया। पुस्तक यह सवाल भी उठाती है कि जिन वैश्विक शक्तियों और संगठनों ने दुनिया के अन्य हिस्सों में मानवाधिकार और सांस्कृतिक विरासत के मुद्दों पर मुखरता दिखाई, वे तिब्बत में हो रहे कथित सांस्कृतिक क्षरण और धार्मिक स्थलों के विनाश पर अपेक्षाकृत मौन क्यों रहे।

नई दिल्ली से इस लेखक से बातचीत में विजय क्रांति ने कहा कि पुस्तक का उद्देश्य तिब्बती समाज के सामने मौजूद औपनिवेशिक चुनौतियों, सांस्कृतिक दबावों और राजनीतिक प्रश्नों का तथ्याधारित दस्तावेज़ प्रस्तुत करना है। उनके अनुसार, दशकों से तिब्बती आबादी के पुनर्वास, निगरानी व्यवस्था, वैचारिक पुनर्शिक्षण कार्यक्रमों और राजनीतिक नियंत्रण जैसी नीतियों ने तिब्बती समाज को गहराई से प्रभावित किया है। उनका मानना है कि तिब्बती नेतृत्व और चीनी सरकार के बीच सार्थक संवाद की संभावनाएं सीमित रही हैं, इसलिए तिब्बतियों को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय समर्थन का विवेकपूर्ण आकलन करते रहना चाहिए।

पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसकी भूमिका (Foreword) है, जिसे परम पावन 14वें दलाई लामा ने लिखा है। अपने संदेश में उन्होंने तिब्बती पठार के पर्यावरणीय महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा है कि तिब्बत, जिसे वैज्ञानिक “तीसरा ध्रुव” (Third Pole) भी कहते हैं, एशिया की अनेक प्रमुख नदियों का स्रोत है और एक अरब से अधिक लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। इसलिए तिब्बती पठार का संरक्षण केवल तिब्बत का नहीं, बल्कि समूचे एशिया और विश्व का प्रश्न है।

दलाई लामा ने अपनी मातृभूमि और तिब्बती जनता के हितों की रक्षा के लिए किए गए प्रयासों का उल्लेख करते हुए विश्वास व्यक्त किया है कि सत्य और न्याय पर आधारित संवाद के माध्यम से तिब्बत के लंबे संघर्ष का शांतिपूर्ण एवं सम्मानजनक समाधान संभव है। उन्होंने आशा जताई है कि यह पुस्तक तिब्बत के बारे में बेहतर समझ विकसित करने और पारस्परिक सम्मान पर आधारित सार्थक संवाद को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी।
कुल मिलाकर, ‘China’s Colonial Games in Tibet’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि तिब्बत के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर केंद्रित एक गंभीर संदर्भ ग्रंथ है। शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, कूटनीतिज्ञों, सुरक्षा विशेषज्ञों और उन सभी पाठकों के लिए यह एक उपयोगी दस्तावेज़ है जो तिब्बत और चीन के जटिल संबंधों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहते हैं।

(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)

वह मिया थी, पर मुसलमान नहीं: हिजाब की वजह से मिले डेथ थ्रेट्स की कहानी

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हिजाब ना पहनने पर महिलाओं को मिली धमकियों की कहानियां खूब सुनी होगी आपने, लेकिन आज एक ऐसी कहानी से आपको सुनाते हैं, जहां एक युवति को जान से मारने की धमकियां हिजाब पहनने की वजह से मिली

बेरूत (Beirut) : मिया खलीफा का नाम जब भी लिया जाता है, तो एक विवादास्पद छवि उभरती है। 2014-15 के आसपास पॉर्नहब पर सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली अभिनेत्री बनने के बाद उन्हें न सिर्फ वैश्विक प्रसिद्धि मिली, बल्कि जानलेवा धमकियों का सामना भी करना पड़ा। सबसे दिलचस्प और दुखद पहलू यह था कि वे खुद को मुसलमान नहीं मानती थीं, फिर भी हिजाब पहनकर फिल्माए गए एक सीन की वजह से उन्हें इस्लाम की “बेइज्जती” का जिम्मेदार ठहराया गया।

मिया लेबनान की मूल निवासी हैं। उनका जन्म एक ईसाई परिवार में हुआ था। उन्होंने खुद स्पष्ट किया था, “मैं प्रैक्टिसिंग कैथोलिक नहीं हूँ, लेकिन कैथोलिक परिवार में पली-बढ़ी हूँ।” वे मुसलमान नहीं थीं, न ही कभी इस्लाम कबूल किया था। लेकिन बांग ब्रदर्स प्रोडक्शन की एक फिल्म में हिजाब पहनने के बाद पूरा मामला बदल गया। वीडियो में हिजाब पहनकर शुरू होने वाले सीन ने सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर दिया। कुछ लोग उन्हें “इस्लाम की बेइज्जती” करने वाला बताने लगे। ट्विटर (अब X) पर उनके खिलाफ नफरत भरे मैसेज और डेथ थ्रेट्स आने शुरू हो गए। एक फोटोशॉप्ड इमेज में उन्हें ISIS के नारंगी जंपसूट वाले कैदी की शक्ल में दिखाया गया, जो स्पष्ट रूप से मौत की धमकी थी।

मिया ने इन धमकियों को “pretty scary” बताया। कुछ लोग उन्हें “लेबनान का प्रतिनिधित्व करने लायक नहीं” कह रहे थे। लेबनान जैसे देश में, जहाँ शिया, सुन्नी, ईसाई और द्रूज समुदाय साथ रहते हैं, यह विवाद और भी संवेदनशील था। कुछ लोग मानते थे कि हिजाब एक धार्मिक प्रतीक है और उसे वयस्क फिल्म में इस्तेमाल करना पूरे समुदाय का अपमान है। लेकिन मिया का तर्क था कि बांग ब्रदर्स की फिल्में “satire” हैं। उन्होंने कहा, “साउथ पार्क ने इससे कहीं ज्यादा बुरा किया है।”

यह घटना संस्कृति, धर्म और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के टकराव को उजागर करती है। हिजाब मुस्लिम महिलाओं का धार्मिक प्रतीक माना जाता है, लेकिन मिया ने इसे एक अभिनय के रूप में इस्तेमाल किया। वे मुसलमान नहीं थीं, फिर भी उन्हें मुस्लिम समुदाय की “गद्दार” समझा गया। यह दर्शाता है कि मजहबी प्रतीकों को लेकर इस्लाम में संवेदनशीलता कितनी गहरी है। एक तरफ जहां कुछ लोग उन्हें समर्थन देते हुए कह रहे थे “Mia we love you”, वहीं दूसरी तरफ धमकियां इतनी बढ़ गईं कि उन्हें अपनी सुरक्षा का ख्याल रखना पड़ा।

पॉर्नहब के आंकड़ों के अनुसार, उस दौरान मिया खलीफा की सर्च में भारी उछाल आया। लेबनान, सीरिया और जॉर्डन से खासतौर पर सर्च बढ़ी। यह दिखाता है कि विवाद ने उनकी लोकप्रियता भी बढ़ाई, लेकिन कीमत भारी थी।

मिया खलीफा की कहानी सिर्फ एक पॉर्न स्टार की नहीं है। यह उस युवती की है जो अपनी पसंद से काम करती है, लेकिन धार्मिक कट्टरता का शिकार हो जाती है। वह मिया थी – लेबनानी ईसाई पृष्ठभूमि की – पर हिजाब के एक सीन ने उसे “बदनाम मुस्लिम महिला” बना दिया। आज भी जब इस मुद्दे पर बात होती है, तो यही सवाल उठता है: क्या किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद पूरे समुदाय का अपमान बन सकती है? और क्या धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल सिर्फ उसी समुदाय तक सीमित होना चाहिए?

मिया ने बाद में पॉर्न इंडस्ट्री छोड़ दी और नॉर्मल जीवन जीने की कोशिश की। लेकिन वह विवाद आज भी याद किया जाता है – एक युवती की, जो मुसलमान नहीं होने के बावजूद हिजाब की वजह से मौत की धमकियां झेल चुकी है।

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