संघ शताब्दी – राष्ट्र साधना के 100 वर्ष

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नरेन्द्र कुमार

विजयादशमी (2 अक्तूबर 2025) के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लेगा। संघ की स्थापना डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने विक्रमी संवत् 1982 की विजयादशमी को नागपुर (महाराष्ट्र) में की थी। डॉ. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। स्वाधीनता आन्दोलन के सभी प्रयासों में वे सक्रिय थे। कोलकाता में मेडिकल की पढ़ाई के समय अनुशीलन समिति के सदस्य के रूप में सक्रिय थे। 1921 में अंग्रेज़ सरकार ने राजद्रोह का मुक़द्दमा चलाया और एक वर्ष के कारावास की सजा हुई। 1930 में जंगल सत्याग्रह करके जेल गए, जिसमें उन्हें 9 महीने का कारावास हुआ।

संघ स्थापना का लक्ष्य

डॉ. हेडगेवार ने संघ स्थापना का लक्ष्य सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित कर हिन्दुत्व के अधिष्ठान पर भारत को समर्थ और परमवैभवशाली राष्ट्र बनाना रखा। इस महत्वपूर्ण कार्य हेतु वैसे ही गुणवान, अनुशासित, देशभक्ति से ओत-प्रोत, चरित्रवान एवं समर्पित कार्यकर्ता आवश्यक थे। ऐसे कार्यकर्ता निर्माण करने के लिए उन्होंने एक सरल, अनोखी किन्तु अत्यंत परिणामकारक दैनन्दिन ‘शाखा’ की कार्यपद्धति संघ में विकसित की। और संघ ने इस कार्यपद्धति से लाखों योग्य कार्यकर्ता तैयार किए जो इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए गत 100 वर्षों से समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं।

संघ कार्य विस्तार
इस यात्रा में संघ उपहास, विरोध के मार्ग पार कर स्वीकृति एवं समर्थन की प्राप्ति की स्थिति में पहुँच गया है। संघ अपने श्रेष्ठ अधिष्ठान, उत्तम कार्यपद्धति और स्वयंसेवकों के नि:स्वार्थ देशभक्ति से भरे, समरसतायुक्त आचरण के कारण समाज का विश्वास जीतने में सफल हुआ है। आज संघ कार्य सर्वदूर, सभी क्षेत्रों में दिखाई देता है और प्रभावी भी है। आज सम्पूर्ण भारत में 98 प्रतिशत जिलों और 92 प्रतिशत खण्डों (तालुका) में संघ की शाखाएं चल रही हैं। देशभर में 51740 स्थानों पर 83,129 दैनिक शाखाएं तथा अन्य 26460 स्थानों पर 32147 साप्ताहिक मिलन चल रहे हैं, जो लगातार बढ़ रहे हैं। इनमें 59 प्रतिशत शाखाएं युवाओं (छात्रों) की हैं।

समाज परिवर्तन की दिशा में बढ़ते कदम

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये पहले चरण में संगठन खड़ा करने पर ही ध्यान केंद्रित किया। समाज में यह विश्वास निर्माण किया कि हिन्दू समाज संगठित हो सकता है, एक दिशा में कदम से कदम मिलाकर एकसाथ चल सकता है। एक स्वर में भारत माता की जय-जयकार कर सकता है। संघ को इसमें सफलता भी मिली।
1940 के नागपुर वर्ग में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए देश के हर राज्य से स्वयंसेवक उपस्थित हुए थे। डॉ. हेडगेवार ने वर्ग में आए स्वयंसेवकों को अपने अंतिम भाषण में संबोधित करते हुए कहा था, “आज मेरे सामने मैं हिन्दू राष्ट्र की छोटी-सी प्रतिमा देख रहा हूँ।”
स्वाधीनता के पश्चात् 1948 में राजनीतिक कारणों से तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने संघ पर प्रतिबन्ध लगाकर समाप्त करने का दुस्साहस किया, जिसे स्वयंसेवकों ने लोकतांत्रिक पद्धति से सत्याग्रह करके सरकार को झुकने के लिये मजबूर किया और सरकार को संघ से प्रतिबन्ध हटाना पड़ा।
भारत के स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा ‘स्व’ के आधार पर थी, उसी ‘स्व’ के आधार पर समाज जीवन का प्रत्येक क्षेत्र खड़ा हो, यह आवश्यक था। इस हेतु संघ की प्रेरणा से स्वयंसेवकों ने दूसरे चरण में शिक्षा, विद्यार्थी, मजदूर, राजनीति, किसान, वनवासी, कला आदि क्षेत्रों में विविध संगठनों के माध्यम से कार्य प्रारम्भ किया। आज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विद्या भारती, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, संस्कार भारती, लघु उद्योग भारती, स्वदेशी जागरण मञ्च, प्रज्ञा प्रवाह जैसे 32 से अधिक संगठन समाज जीवन में सक्रिय हैं और अपने-अपने क्षेत्र में प्रभावी भी हैं। ये सभीसंगठन स्वायत्त, स्वतन्त्र और स्वावलंबी हैं।

सेवा कार्य

स्वयंसेवक अपनी योग्यता, क्षमता के अनुसार सामाजिक समस्याओं व चुनौतियों के समाधान करने के लिए हमेशा सक्रिय रहते हैं। देशभक्ति और सेवाभाव से ओत-प्रोत स्वयंसेवक समाज के दुःख देखते ही दौड़ पड़ते हैं, तभी आज किसी भी प्राकृतिक अथवा अन्य आपदाओं के समय वहाँ तुरन्त पहुँचते हैं और समाज की सेवा में जुट जाते हैं। केवल आपदा के समय ही नहीं, तो नियमित रूप से समाज में दिखने वाले अभाव, पीड़ा, उपेक्षा को दूर करने के लिए सर्वत्र प्रयास करते हैं। इसलिए संघ ने अपने तीसरे चरण में 1988-89 में संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी की जन्मशताब्दी में सेवा कार्यों को अधिक गति और व्यवस्थित रूप देने का निर्णय लिया। और 1990 में विधिवत सेवा विभाग आरंभ हुआ। आज संघ स्वयंसेवक अभावग्रस्त क्षेत्र व लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार और स्वावलंबन के विषयों पर ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों में 1,29,000 सेवा कार्य चला रहे हैं। समाज परिवर्तन के इन प्रयासों में स्वयंसेवकों को समाज का भरपूर सहयोग और समर्थन मिल रहा है।
इसके अतिरिक्त स्वयंसेवक प्रशासन अथवा सरकार पर निर्भर न रहते हुए अपने ग्राम का सर्वांगीण विकास सभी ग्रामवासी मिलकर करें, इस उद्देश्य से ‘ग्राम-विकास’ का कार्य भी कर रहे हैं। भारतीय नस्ल की गायों का संरक्षण, संवर्धन एवं नस्ल सुधार करते हुए जैविक खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षण, प्रबोधन एवं प्रोत्साहन देने की दृष्टि से ‘गौ संरक्षण एवं संवर्धन’ का कार्य भी करते हैं।

पंच परिवर्तन

संघ के स्वयंसेवक अपने परिवार में संघ जीवन शैली को अपनाते हुए समाजानुकूल परिवर्तन करने का निरन्तर प्रयास करते हैं। साथ ही व्यापक समाज परिवर्तन के लिए विभिन्न प्रकार के उपक्रम नियमित रूप से करते रहते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के पश्चात समाज परिवर्तन के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है। और यह समाज जागरण का एक बड़ा और व्यापक अभियान होगा। इस चरण में स्वयंसेवक समाज की सज्जन शक्ति के साथ मिलकर कार्य करने की दिशा में अग्रसर होंगे। इस हेतु समाज में जागरूकता निर्माण करने के लिए और व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन में व्यवहार में लाने के लिए पाँच विषयों का आग्रह है। इसे पंच परिवर्तन कहा गया।

ये पाँच विषय हैं – 1. सामाजिक समरसता, 2. पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन 3. कुटुम्ब प्रबोधन, 4. स्व आधारित जीवन, और 5. नागरिक कर्तव्यबोध। ये विषय समाज की एकता, अखण्डता और मानवता की
भलाई के लिए आज की परिस्थितियों में आवश्यक हैं।

गत सौ वर्षों से यह महायज्ञ अविरत रूप से चल रहा है। सम्पूर्ण समाज संगठन के द्वारा देश के सामने आने वाली सभी समस्याओं और चुनौतियों का समाधान कर, समाज में स्थायी परिवर्तन लाने हेतु समाज की व्यवस्थाओं का युगानुकूल निर्माण करना, यही संघकार्य का उद्देश्य है। किन्तु अपना देश बहुत विशाल है, और कोई एक संगठन इसमें स्थायी परिवर्तन नहीं ला सकता है। अमृतकाल का यह समय अपनी पवित्र मातृभूमि को पुनः विश्वगुरु सिंहासन पर आरूढ़ करने के लिए सभी मतभेद भुलाकर, एकसाथ आकर, पुरुषार्थ करने का समय है।

(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख हैं)
साभार :दैनिक जागरण

RSS @100: Guarding Its Own Flame

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Shefali Vaidya

Pune: As I was chanting Hanuman Chalisa today, one line particularly stood out, आपन तेज सम्हारो आपै. It means, ‘only you can manage your own radiance’.

When Goswami Tulsidas wrote this line in the Hanuman Chalisa, he was describing Hanuman ji’s ability to guard and manage his own strength and brilliance. As I watched the PM, Narendra Modiji release a special commemorative coin and a postage stamp to celebrate the centenary of the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS), I realised how these immortal words by Tulsidasji also echo the story of the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS).

Founded in 1925 by Dr. Keshav Baliram Hedgewar, the RSS was never meant to be a political outfit. It was born out of a deeper need; to heal a fractured Hindu society and rebuild self-respect in a colonised land. Dr. Hedgewar understood that while freedom could be gained by a political struggle, an independent Bharat could never be sustained by politics alone. Bharat needed cultural regeneration, a disciplined society, and rooted self-confidence, and Hindus needed an organisation that unites them together.

Dr. Hedgewar’s solution was ridiculously simple, and therefore, most effective. The shakha. All a shakha needs are a few people, a bamboo staff, a saffron flag, and a prayer. No oratory, no manifestos, no fanfare — just rhythm, discipline, and camaraderie. It is this ordinariness that built something extraordinary, a mammoth 100 year old organisation that focuses on shaping of character, melting individual egos and quietly trains leaders.

For a hundred years, that humble formula has endured. While governments have risen and fallen, while ideologies have waxed and waned, the RSS has remained the same — steady, silent, saffron-hued.

The RSS philosophy is not proclaimed or published, but practised. The first building block of this philosophy is Seva, or service. In every disaster, anywhere in the country, whether man-made or natural, floods, pandemics, earthquakes, partition or communal riots, it is often the Sangh swayamsevaks who arrive first and leave last. They do not wait for applause or awards. They are driven by the conviction that service itself is the award. As the line from Hanuman Chalisa reminds us, ‘apan teja sanvaro apai’, the flame sustains itself by its own fuel.

Those first shakhas with a few boys in Nagpur have made the RSS what it is today, the world’s largest voluntary organisation. The Sangh Parivar, as insiders like to call institutions working under the same ideology, includes thousands of institutions today, schools in remote villages all over Bharat, hospitals, tribal welfare projects, women’s empowerment collectives, and movements that preserve the culture and heritage of Bharat. The impact of RSS is not just visible in numbers but in the quiet transformation of communities all over the country.

As the RSS enters its centenary year, the prime minister, the president, the vice president and many chief ministers of various states in the country wear their RSS roots with pride. And yet, despite this proximity to political power, the Sangh has never lost its core identity. The basic unit of the RSS is still the shakha in the maidan, the saffron flag fluttering in the breeze, the evening prayer chanted by boys in simple white shirts and khaki pants.

The question is often asked: how has the RSS survived bans, constant vilification, fake propaganda and caricature? Again, the answers lie in the Hanuman Chalisa. Just like Tulsidas’s vision of Hanuman ji, the RSS has never depended on borrowed strength. Its strength comes from within — from discipline, service, and an unshakable faith in Dharma.

As it enters its hundredth year, the RSS is not merely an organisation marking a milestone. It is a living testament to an idea: that when a society learns to guard its own flame, no storm can extinguish it.

आपन तेज सम्हारो आपै

That is the story of Hanuman.

That is the story of the RSS.

A steady flame, luminous, eternal.

(Courtesy: Social Media)

ये हैं, श्री श्रीधर वेंबु!

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श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर

चेन्नई । अगर आपने अब तक इनका नाम नहीं सुना है तो शीघ्र ही सुनने वाले हैं। श्रीधर वेंबु की अपनी एक IT कंपनी है जिसका नाम है ‘जोहो’ (Zoho). जोहो के बारे में जो भी सुनेंगे वो आपको अचंभित कर देगा। आइए इनकी इस रोचक कहानी को शुरू से ही सुनते हैं!

श्रीधर वेंबु, तमिलनाडु के तंजावुर जिले के एक छोटे से गांव से आते हैं। 1989 में श्रीधर ने IIT चेन्नई से बी. टेक. की उपाधि प्राप्त की। इसके पश्चात प्रिंसटन यूनिवर्सिटी, न्यू जर्सी से आपने MS और Ph D की उपाधियां प्राप्त की। इसके पश्चात कुछ समय श्रीधर अमेरिका में ही IT कंपनी में कार्यरत रहे। भरपूर वेतन प्राप्त कर रहे श्रीधर को IT में कुछ अलग करना था। विशेषत: वे चाहते थे कि अपने देश भारत में कुछ किया जाय। फलतः 1996 में वे अमेरिका से भारत लौट आए और उन्होंने अपने दो भाइयों के साथ मिल कर एक IT कंपनी की स्थापना की जो आज ज़ोहो कॉर्पोरेशन के नाम से जानी जाती है।

श्रीधर बताते हैं कि प्रारम्भ में उन्हें कईं चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने व्यापार स्वयं के धन से याने बगैर किसी निवेशक का धन लगवाए प्रारंभ किया था। काम मिल नहीं रहा था। प्रत्येक काम के लिए एडी छोटी का जोर लगाना पड़ रहा था। उन्हीं दिनों क्लाउड तकनीक प्रचार में आई। जोहो ने इस तकनीक को अपना लिया और क्लाउड आधारित उत्पाद विकसित किए। अब जोहो को काम मिलने लगे और कंपनी कुलांचे भरने लगी।

महत्वपूर्ण यह है कि भारत में श्रीधर ने अपनी कम्पनी के मुख्यालय के लिए बैंगलोर या हैदराबाद जैसे शहर को नहीं बल्कि तमिलनाडु के छोटे जिले टेनकाशी के छोटे से गांव को चुना। यह अपने आप में एक क्रांति थी। जिस दौर में IT कंपनियां मेट्रो के अतिरिक्त दूसरी श्रेणी के नगरों में भी काम नहीं कर रही थी, श्रीधर एक छोटे से गांव में पहुंच गए थे और वहां से वैश्विक स्तर के उत्पाद बना रहे थे। देखते देखते जोहो का व्यापार बढ़े लगा। आज जोहो के क्लाउड आधारित 50 से भी ज्यादा IT उत्पाद है, जिन्हें 180 देशों में करोड़ों लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। श्रीधर वेंबु की संपत्ति आज लगभग 52000 करोड़ हो चुकी है और वे भारत के शीर्ष 50 धनपतियों में शुमार है। सरकार उन्हें पद्मश्री से सम्मानित कर चुकी है।

प्रारंभ में जोहो के उत्पाद पारम्परिक IT उत्पाद यानी कि अकाउंटिंग और CRM से संबंधित थे। परन्तु कुछ वर्ष पहले जोहो ने अपना ई मेल प्लेटफॉर्म बना लिया। इस क्षेत्र में गूगल की धाक बनी हुई है। परन्तु जोहो ने धीरे धीरे अपनी जगह बनाना शुरू की। अब तक, जोहो के उत्पादों की यह पहचान स्थापित हो चुकी थी कि उनके उत्पाद विश्वसनीय, उपयोग में आसान और अच्छे फीचर्स के साथ उपलब्ध रहते हैं। कुछ समय बाद जोहो ने अपना संवाद स्थापित करने का उत्पाद भी बना लिया और उसे नाम दिया गया Arattai। यह, एक तरह से लोकप्रिय संवाद ऐप व्हाट्स ऐप का भारतीय विकल्प है। Arattai का तमिल में अर्थ होता है Instant Chat यानी तुरन्त बातचीत!

सत्ता में आने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी का जोर भारत में विकसित उत्पादों पर रहा है। वे आत्म निर्भर भारत के हिमायती है। पिछले दिनों राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा जिस तरह से भारत को ब्लैकमेल करते हुए शुल्कों में अभूतपूर्व वृद्धि की गई है, उससे आत्मनिर्भरता का महत्व और अधिक सघन हो कर सामने आया है। इस बदली परिस्थिति में जोहो के उत्पाद भारतीय विकल्प के रूप में प्रसिद्ध हो रहे है। पिछले मात्र तीन दिनों में Arattai को डाउन लोड करने वालों की संख्या में 100 गुना की वृद्धि हुई है। आने वाले में कुछ समय में यह संख्या और 100 गुना बढ़ने की संभावना नजर आ रही है। रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव द्वारा रेलवे के इस्तेमाल के लिए जोहो के उत्पादों के उपयोग पर जोर दिया गया है। केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने भी यह कह कर जोहो अपनाने के लिए कहा है कि इनके उत्पाद विश्वस्तरीय और विश्वसनीय हैं। हालांकि गत दो दिनों से Arattai कि का तंत्र ठप पड़ गया है। मांग में हुई अप्रत्याशित वृद्धि के लिए उनके कंप्यूटर्स तैयार नहीं थे। निश्चित ही इस समस्या को शीघ्र ही हल कर लिया जाएगा।

श्रीधर वेंबु आज भारत की योग्यता ओर काबिलियत के उदाहरण बन चुके हैं। उन्होंने सिद्ध किया है कि उच्च कोटि के उत्पाद भारत के देहात में रह कर भी बनाए जा सकते हैं। वे भारतीय संस्कृति का सम्मान करते हैं और भारतीय मूल्यों में विश्वास रखते है। उन्होंने कंपनीयों में हर तिमाही में विक्रय के लक्ष्य रख कर कर्मचारियों पर सतत दबाव बनाए रखने की पाश्चिमात्य संस्कृति को अपनी कंपनी में नहीं अपनाया है। इसी प्रकार जोहो के इस असाधारण विकास के लिए न किसी निवेशक से धन लिया गया है और न ही शेयर बाजार से!

उम्मीद करें कि आने वाले कुछ समय में हम सभी व्हाट्स ऐप की बजाय Arattai का उपयोग करेंगे। यदि ऐसा संभव हो पाता है तो आत्मनिर्भरता की दिशा में यह एक बड़ा कदम होगा। और इसका श्रेय जाएगा तमिलनाडु के छोटे से गांव से आए श्रीधर वेंबु को। जिन्होंने एक सपना देखा और उस सपने को पूरा करने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। 

सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठित स्वरूप ही भारत की एकता, एकात्मता, विकास व सुरक्षा की गारंटी है – डॉ. मोहन भागवत जी

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नागपुर : सम्पूर्ण हिन्दू समाज का बल सम्पन्न, शील सम्पन्न संगठित स्वरूप ही इस देश के एकता, एकात्मता, विकास व सुरक्षा की गारंटी है। क्योंकि हिन्दू समाज अलगाव की मानसिकता से मुक्त और सर्वसमावेशक है। हिन्दू समाज ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की उदार विचारधारा का पुरस्कर्ता व संरक्षक है। इसलिए संघ सम्पूर्ण हिन्दू समाज के संगठन का कार्य कर रहा है। क्योंकि संगठित समाज अपने सब कर्तव्य स्वयं के बलबूते पूरे कर लेता है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत ने रेशिमबाग मैदान में आयोजित संघ के विजयादशमी उत्सव में कही। उल्लेखनीय है कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का शताब्दी वर्ष है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बल देकर कहा कि भारतवर्ष को वैभवशाली व सम्पूर्ण विश्व के लिए अपेक्षित व उचित योगदान देनेवाला देश बनाना, यह हिन्दू समाज का कर्तव्य है। इस अवसर पर मंच पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति मा. रामनाथ कोविंद जी, संघ के विदर्भ प्रान्त संघचालक मा. दीपक जी तामशेट्टीवार, विदर्भ प्रान्त सह संघचालक मा. श्रीधर जी गाडगे और नागपुर महानगर संघचालक मा. राजेश जी लोया उपस्थित थे।

स्वदेशी तथा स्वावलम्बन का कोई विकल्प नहीं

सरसंघचालकजी ने आगे कहा कि अमेरिका ने अपने स्वयं के हित को आधार बनाकर जो आयात शुल्क नीति चलायी है, जिसके कारण हमें भी कुछ बातों का पुनर्विचार करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि विश्व परस्पर निर्भरता पर जीता है, किन्तु यह परस्पर निर्भरता हमारी मजबूरी न बने, इसके लिए हमें आत्मनिर्भर बनना होगा। क्योंकि स्वदेशी तथा स्वावलम्बन का कोई पर्याय नहीं है।
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने विश्व के जड़वादी व उपभोगवादी नीति के परिणामस्वरूप हो रहे पर्यावरणीय असंतुलन पर चिन्ता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भारत में भी उसी नीति के चलते वर्षा का अनियमित व अप्रत्याशित होना, भूस्खलन, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं गत तीन-चार वर्षों में तेजी से बढ़ गई हैं। दक्षिण एशिया का सारा जलस्रोत हिमालय से आता है। उस हिमालय में इन दुर्घटनाओं का होना भारतवर्ष और दक्षिण एशिया के अन्य देशों के लिए खतरे की घंटी माननी चाहिए।

उपद्रवी शक्तियों से सावधान

डॉ. भागवत जी ने भारत के पड़ोसी देशों की अराजक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि गत वर्षों से हमारे पड़ोसी देशों में बहुत उथल-पुथल मची है। श्रीलंका, बांग्लादेश और हाल ही में नेपाल में प्रकार जन-आक्रोश का हिंसक उद्रेक होकर सत्ता का परिवर्तन हुआ । अपने देश में तथा दुनिया में भी भारतवर्ष में इस प्रकार के उपद्रवों को चाहनेवाली शक्तियां सक्रिय हैं, , वह हमारे लिए चिन्ताजनक है। शासन, प्रशासन का समाज से टूटा हुआ सम्बन्ध, चुस्त व लोकाभिमुख प्रशासकीय क्रिया-कलापों का अभाव यह असंतोष के स्वाभाविक व तात्कालिक कारण होते हैं। परन्तु हिंसक उद्रेक में वांच्छित परिवर्तन लाने की शक्ति नहीं होती। प्रजातांत्रिक मार्गों से ही समाज में ऐसे आमूलाग्र परिवर्तन लाया जा सकता है। अन्यथा ऐसे हिंसक प्रसंगों में विश्व की वर्चस्ववादी ताकतें अपना खेल खेलने के अवसर ढूंढ़ लेती हैं। सरसंघचालक जी ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि हमारे पड़ोसी देश सांस्कृतिक दृष्टि से तथा आपसी नित्य सम्बन्धों के कारण भी भारत से जुड़े हैं। एक तरह से यह हमारा परिवार ही है। वहाँ पर शान्ति रहे, स्थिरता रहे, उन्नति हो, सुख और सुविधा हो, इसकी हमारे लिए भी आवश्यकता है।

हमारी वर्तमान आशाएं और चुनौतियाँ

सरसंघचालक डॉ. भागवतजी ने कहा कि वर्तमान कालावधि एक ओर हमारे विश्वास तथा आशा को अधिक बलवान बनानेवाली है तथा दूसरी ओर हमारे सम्मुख उपस्थित पुरानी व नयी चुनौतियों को अधिक स्पष्ट रूप में उजागर कर रही है, साथ ही हमारे लिए नियत कर्तव्य पथ को भी निर्देशित करनेवाली है। सरसंघचालकजी ने आगे कहा कि गत वर्ष प्रयागराज में सम्पन्न महाकुम्भ ने श्रद्धालुओं की संख्या के साथ ही उत्तम व्यवस्थापन के भी सारे कीर्तिमान तोड़कर एक जागतिक विक्रम प्रस्थापित किया। इसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण भारत में श्रद्धा व एकता की प्रचण्ड लहर को अनुभव किया जा सकता है। वहीं 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में सीमापार से आये आतंकियों ने 26 भारतीय यात्री नागरिकों की उनका हिन्दू धर्म पूछकर हत्या की। सम्पूर्ण भारतवर्ष में नागरिकों में दुःख और क्रोध की ज्वाला भड़की। भारत सरकार ने योजना बनाकर मई मास में इसका पुरजोर उत्तर दिया। इस सब कालावधि में देश के नेतृत्व की दृढ़ता तथा हमारी सेना के पराक्रम तथा युद्ध कौशल के साथ-साथ ही समाज की दृढ़ता व एकता का सुखद दृश्य हमने देखा।
सरसंघचालक डॉ. भागवतजी ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर देते हुए कहा कि अन्य देशों से मित्रता की नीति व भाव रखते हुए भी हमें अपने सुरक्षा के विषय में अधिकाधिक सजग रहने और अपना सामर्थ्य बढ़ाते रहने की आवश्यकता है। नीतिगत क्रियाकलापों से विश्व के अनेक देशों में से हमारे मित्र कौन-कौन और कहाँ तक है, इसकी परीक्षा भी हो गई।
सरसंघचालकजी ने कहा कि देश के अन्दर उग्रवादी नक्सली आन्दोलन पर शासन तथा प्रशासन की दृढ़ कार्रवाई से बड़ी मात्रा में नियंत्रण आया है। उन क्षेत्रों में नक्सलियों के पनपने का मूल कारण वहाँ चल रहा शोषण व अन्याय, विकास का अभाव तथा शासन-प्रशासन में इन सब बातों के प्रति संवेदना का अभाव रहा। डॉ. भागवतजी ने इस बात पर जोर दिया कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न्याय, विकास, सद्भावना, संवेदना तथा सामंजस्य स्थापन करने के लिए कोई व्यापक योजना शासन-प्रशासन के द्वारा बनाने की आवश्यकता है।
संचार माध्यमों व अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण दुनिया के देशों में निकटता जैसी परिस्थिति का सुखदायक रूप दिखता है। परन्तु विज्ञान एवं तकनीकी की प्रगति की गति व मनुष्यों की इनसे तालमेल बनाने की गति में बड़ा अंतर है। इसलिए सामान्य मनुष्यों के जीवन में बहुत सारी समस्याएँ उत्पन्न होती दिखाई दे रही हैं। जैसे सर्वत्र चल रहे युद्धों सहित अन्य छोटे-बड़े कलह, पर्यावरण के क्षरण के कारण प्रकृति का प्रकोप, सभी समाजों तथा परिवारों में आयी हुई टूटन, नागरिक जीवन में बढ़ता हुआ अनाचार व अत्याचार ऐसी समस्याएँ भी साथ में चलती हुई दिखाई देती हैं। इन सबके उबरने के प्रयास हुए हैं, परन्तु वे इन समस्याओं की बढ़त को रोकने में अथवा उनका पूर्ण निदान देने में असफल रहे हैं। इसलिए अब सारा विश्व इन समस्याओं के समाधान के लिए भारत की दृष्टि से निकले चिन्तन में से उपाय की अपेक्षा कर रहा है।

हमारी सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने सामाजिक एकता के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी भी देश के उत्थान में सबसे महत्त्वपूर्ण कारक उस देश के समाज की एकता है। हमारा देश विविधताओं का देश है। अनेक भाषाएँ अनेक पंथ, भौगोलिक विविधता के कारण रहन-सहन, खान-पान के अनेक प्रकार, जाति-उपजाति आदि विविधताएं पहले से ही हैं।
डॉ. भागवतजी स्पष्ट रूपसे कहा कि हमारी विविधताओं को हम अपनी अपनी विशिष्टताएं मानते हैं और अपनी-अपनी विशिष्टता पर गौरव करने का स्वभाव भी समझते हैं। परन्तु यह विशिष्टताएं भेद का कारण नहीं बननी चाहिए। अपनी सब विशिष्टताओं के बावजूद हम सब एक बड़े समाज के अंग हैं। समाज, देश, संस्कृति तथा राष्ट्र के नाते हम एक हैं। यह हमारी बड़ी पहचान हमारे लिए सर्वोपरि है, यह हमको सदैव ध्यान में रखना चाहिए। उसके चलते समाज में सबका आपस का व्यवहार सद्भावनापूर्ण व संयमपूर्ण रहना चाहिए। सब की अपनी-अपनी श्रद्धाएँ, महापुरुष तथा पूजा के स्थान होते हैं। मन, वचन, कर्म से आपस में इनकी अवमानना न हो, इसका ध्यान रखना चाहिए।

अराजकता का व्याकरण रोकना जरूरी
डॉ. भागवत ने सामाजिक सद्भाव के लिए व्यापक समाज प्रबोधन करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि नियम पालन, व्यवस्था पालन करना व सद्भावपूर्वक व्यवहार करने का स्वभाव बनना चाहिए। छोटी-बड़ी बातों पर या केवल मन में सन्देह है इसलिए, कानून हाथ में लेकर रास्तों पर निकल आना, गुंडागर्दी, हिंसा करने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। मन में प्रतिक्रिया रखकर अथवा किसी समुदाय विशेष को उकसाने के लिए अपना शक्ति प्रदर्शन करना, ऐसी घटनाओं को योजनापूर्वक कराया जाता है। उनके चंगुल में फंसने का परिणाम, तात्कालिक और दीर्घकालिक, दोनों दृष्टि से ठीक नहीं है। इन प्रवृत्तियों की रोकथाम आवश्यक है। शासन-प्रशासन अपना काम बिना पक्षपात के तथा बिना किसी दबाव में आये, नियम के अनुसार करें। परन्तु समाज की सज्जन शक्ति व तरुण पीढ़ी को भी सजग व संगठित होना पड़ेगा, आवश्यकतानुसार हस्तक्षेप भी करना पड़ेगा।

पंचपरिवर्तन का आग्रह महत्त्वपूर्ण
सरसंघचालक डॉ. भागवतजी ने कहा कि हमारी एकता के आधार को डॉक्टर आम्बेडकर साहब ने Inherent cultural unity (अन्तर्निहित सांस्कृतिक एकता) कहा है। भारतीय संस्कृति प्राचीन समय से चलती आई हुई भारत की विशेषता है। वह सर्व समावेशक है। व्यक्तियों, समूहों में व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय चारित्र्य, दोनों के सुदृढ़ होने की आवश्यकता है। सरसंघचालकजी ने कहा कि अपने राष्ट्र स्वरूप की स्पष्ट कल्पना व गौरव, संघ की शाखा में प्राप्त होता है। नित्य शाखा में चलनेवाले कार्यक्रमों से स्वयंसेवकों में व्यक्तित्व, कर्तृत्व, नेतृत्व, भक्ति व समझदारी का विकास होता है। इसलिए शताब्दी वर्ष में व्यक्ति निर्माण का कार्य देश में भौगोलिक दृष्टि से सर्वव्यापी हो तथा सामाजिक आचरण में सहज परिवर्तन लानेवाला पंच परिवर्तन कार्यक्रम – सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध तथा स्वदेशी, नागरिक अनुशासन व संविधान का पालन – स्वयंसेवकों के आचरण के उदाहरण से समाजव्यापी बने, यह संघ का प्रयास रहेगा। संघ के स्वयंसेवकों के अतिरिक्त समाज में अनेक अन्य संगठन व व्यक्ति भी इसी तरह के कार्यक्रम चला रहे हैं। उन सब के साथ संघ के स्वयंसेवकों का सहयोग व समन्वय साधा जा रहा है।
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समारोह के अध्यक्ष एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविन्द जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि श्रीविजयादशमी उत्सव का ये दिन संघ का शतकपूर्ति दिवस है। आज विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति का संवाहक करनेवाली आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था का शताब्दी समारोह सम्पन्न हो रहा है। उन्होंने कहा कि नागपुर की यह पावन धरती आधुनिक भारत के विलक्षण निर्माताओं की पावन स्मृति से जुड़ी हुई है। उन राष्ट्र निर्माताओं में दो डॉक्टर ऐसे भी हैं – जिनका मेरे जीवन निर्माण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रहा। वे दोनों महापुरुष हैं – डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर। बाबासाहब आम्बेडकर के संविधान में निहित सामाजिक न्याय की व्यवस्था के बल पर ही मेरी तरह का आर्थिक व सामाजिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति, देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुँच सका। डॉ. हेडगेवार के गहन विचारों से समाज और राष्ट्र को समझने का मेरा दृष्टिकोण स्पष्ट हुआ। दोनों विभूतियों द्वारा निरूपित किए गए राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता के आदर्शों से मेरी जनसेवा की भावना अनुप्राणित रही है।
श्री. रामनाथ कोविन्द जी ने कहा कि संघ की अविरत राष्ट्रसेवा, राष्ट्रभक्ति और समर्पण के ये उदात्त आदर्श हम सबके लिए अनुकरणीय हैं। उन्होंने कहा कि सच्चे अर्थों में मनुष्य कैसे बनें, जीवन कैसे जिएँ, इसका मार्गदर्शन हमें महापुरुषों से प्राप्त होता है। आज भारतीयों के लिए व्यक्तिगत व राष्ट्रीय चारित्र्य से समृद्ध जीवनमार्ग की आवश्यकता है। हमारा सनातन, आध्यात्मिक और समग्र दृष्टिकोण ही मानवता के मन, बुद्धि और अध्यात्म का विकास करता है।
श्री. कोविन्द जी ने कहा कि सामाजिक व्यवहार में बदलाव केवल भाषणों से नहीं आता; इसके लिए व्यापक प्रबोधन आवश्यक है। विविधता होते हुए भी, हम सब एक बड़े समाज का अंग हैं। यह बड़ी पहचान हमारे लिए सर्वोपरि है। विचार, शब्द और कृति से किसी भी समुदाय के श्रद्धा या आस्था का अनादर न हो। जो लोग विकास यात्रा में पीछे छूट गए, उनका हाथ पकड़कर उन्हें अपने साथ ले चलना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।

दलाई लामा का संदेश

इस अवसर पर पूजनीय बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा के संदेश का पठन किया गया । जिसमें उनके द्वारा प्रेषित भावनाएँ व्यक्त की गयी कि, पुनर्जागरण की इस व्यापक धारा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया है। संगठन की स्थापना निःस्वार्थ भाव से हुई थी, जहाँ कर्तव्यबोध की निर्मल और स्पष्ट भावना थी, जिसमें किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं थी। संघ से जुड़ने वाला प्रत्येक स्वयंसेवक मन की पवित्रता और साधनों की पावनता पर आधारित जीवन जीना सीखता है। संघ की सौ वर्षीय यात्रा स्वयं में समर्पण और सेवा का एक दुर्लभ तथा अनुपम उदाहरण है। संघ ने निरंतर लोगों को एकजुट करने का कार्य किया है और भारत को भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से सशक्त बनाया है। भारत के दुर्गम और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी संघ ने शैक्षिक एवं सामाजिक विकास में योगदान दिया है तथा आपदा-ग्रस्त क्षेत्रों में आवश्यक सहयोग प्रदान किया है।

कार्यक्रम में देश-विदेश के गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही। इसमें मुख्य रूप से लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता (सेवानिवृत्त), कोयम्बटूर की डेक्कन इंडस्ट्रीज के प्रबंध निदेशक के. वी. कार्तिक, बजाज फिनसर्व के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक संजीव बजाज समेत घाना, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, थाईलैंड, यूके, यूएसए से भी अतिथि और बड़ी संख्या में नागपुर के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

लेफ्टिनेंट जनरल कलिता ने भारतीय सेना के पूर्व कमांड का नेतृत्व किया है। जून 1984 में उन्होंने कुमाऊ रेजिमेंट के माध्यम से अपनी सेवा शुरू की। उन्होंने सेना के विभिन्न अभियानों का नेतृत्व और मार्गदर्शन किया है। वैश्विक स्तर पर उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के सीरा लियोन मिशन में निरीक्षक के रूप में जिम्मेदारी निभाई है।

कोयम्बटूर की डेक्कन इंडस्ट्रीज के प्रबंध निदेशक के. वी. कार्तिक देश में मोटर पंप निर्माण क्षेत्र के अग्रणी व्यवसायियों में शामिल हैं। वर्तमान में वे इंडियन पंप मैन्यूफैक्चर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में भी कार्यरत हैं। भारत में निर्मित मोटर पंपों के निर्यात में वे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

बजाज फिनसर्व के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक श्री संजीव बजाज, बजाज समूह के वित्तीय सेवा व्यवसाय के प्रमुख हैं। उनके नेतृत्व में बजाज फिनसर्व देश की अत्यंत प्रतिष्ठित कंपनियों में शामिल हुई है। कॉर्पोरेट क्षेत्र में अपनी भूमिका के साथ उन्होंने भारतीय उद्योग परिसंघ के अध्यक्ष के रूप में भारतीय उद्योग क्षेत्र का दूरदर्शी नेतृत्व भी किया है। इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में भी सक्रिय योगदान दिया है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में प. पू. सरसंघचालक जी और प्रमुख अतिथी मा. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी ने शस्त्रपूजन किया । उसके पश्चात स्वागत प्रणाम, ध्वजारोहण और प्रार्थना हुई । तत्पश्चात प्रत्युत प्रचलनम् व प्रदक्षिणा संचलन हुआ । उसके बाद नियुद्ध एवम् घोष का प्रात्यक्षिक, सांघिक गीत, सांघिक योगासन हुए । मा. महानगर संघचालक राजेश जी लोया ने प्रास्ताविक, परिचय, स्वागत तथा सभी के प्रति आभार व्यक्त किया । ध्वजावतरण के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ.

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