आयुष्मान भारत: सात वर्षों का स्वर्णिम सफर और नारी सशक्तिकरण की नई उड़ान

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दिल्ली। भारत, जहां विविधता और विशालता एक साथ सांस लेती हैं, उस देश ने आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) के माध्यम से अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को सुरक्षित करने का एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। 23 सितंबर 2018 को शुरू हुई यह योजना, 2025 में अपने सात साल पूरे कर चुकी है और दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना बन गई है। यह 50 करोड़ से अधिक गरीब और असुरक्षित लोगों को प्रति परिवार प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये तक का मुफ्त स्वास्थ्य कवरेज प्रदान करती है। इस नवरात्रि के पावन अवसर पर, जब हम माँ दुर्गा की आराधना करते हैं, यह योजना ‘नारी तू नारायणी, तुझसे ही संसार बना’ के संदेश को साकार करती है, जो नारी को शक्ति, आत्मनिर्भरता और सम्मान का प्रतीक बनाती है।

आयुष्मान भारत ने न केवल स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाया, बल्कि महिलाओं के सशक्तिकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नवरात्रि में हम माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं, जो नारी शक्ति का प्रतीक हैं—‘हे नारी! तू काली है, तू दुर्गा है, तू नारायणी, जगदम्बा है।’ ठीक उसी तरह, आयुष्मान भारत ने महिलाओं को स्वास्थ्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया है। अब महिलाएं अपने और अपने परिवार के इलाज के लिए किसी पर निर्भर नहीं हैं। इस योजना के तहत 34.7 करोड़ आयुष्मान कार्ड जारी किए गए हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा महिलाओं के नाम पर है। विशेष रूप से, हाल ही में शुरू किए गए आयुष्मान वय वंदना कार्ड में 75.41 लाख कार्डों में से 32.3 लाख महिलाओं के लिए हैं, जो यह दर्शाता है कि महिलाएं इस योजना की मुख्य लाभार्थी हैं। यह नारी शक्ति का वह उत्सव है, जो नवरात्रि के पावन पर्व पर माँ दुर्गा की कृपा से और सशक्त होता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों ने पिछले सात वर्षों में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है। उज्ज्वला योजना ने लाखों महिलाओं को स्वच्छ ईंधन प्रदान किया, मुद्रा योजना ने उन्हें उद्यमी बनाया, और स्टैंड-अप इंडिया ने उनके आर्थिक सपनों को पंख दिए। आयुष्मान भारत ने इस श्रृंखला में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया, जिसने महिलाओं को स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्वावलंबी बनाया। अब ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की महिलाएं, चाहे वे दिहाड़ी मजदूर हों, घरेलू कामगार हों या छोटे व्यवसायों से जुड़ी हों, बिना आर्थिक चिंता के गंभीर बीमारियों का इलाज करवा सकती हैं। यह योजना न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करती है, बल्कि महिलाओं को यह विश्वास भी देती है कि वे अपने परिवार की देखभाल के साथ-साथ स्वयं की देखभाल भी कर सकती हैं। नवरात्रि के इस अवसर पर, यह योजना नारी की उस शक्ति को रेखांकित करती है, जो समाज का आधार है और जिसके बिना कोई राष्ट्र पूर्ण नहीं हो सकता।

आयुष्मान भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं को लोकतांत्रिक बनाया है। 27,000 से अधिक पैनल अस्पतालों के साथ, यह योजना ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समान रूप से प्रभावी है। अस्पताल में भर्ती से लेकर जटिल सर्जरी, कैंसर, हृदय रोग और किडनी संबंधी बीमारियों तक, यह योजना गरीब परिवारों के लिए वरदान साबित हुई है। डिजिटल इंडिया के साथ एकीकृत, आधार-लिंक्ड पहचान और ऑनलाइन रिकॉर्ड ने पारदर्शिता सुनिश्चित की है। परिवहन व्यय और भर्ती से पहले और बाद के खर्चों को शामिल करने से मरीजों पर आर्थिक बोझ कम हुआ है। यह योजना उन परिवारों के लिए विशेष रूप से लाभकारी

आयुष्मान भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं को लोकतांत्रिक बनाया है। 27,000 से अधिक पैनल अस्पतालों के साथ, यह योजना ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समान रूप से प्रभावी है। अस्पताल में भर्ती से लेकर जटिल सर्जरी, कैंसर, हृदय रोग और किडनी संबंधी बीमारियों तक, यह योजना गरीब परिवारों के लिए वरदान साबित हुई है। डिजिटल इंडिया के साथ एकीकृत, आधार-लिंक्ड पहचान और ऑनलाइन रिकॉर्ड ने पारदर्शिता सुनिश्चित की है। परिवहन व्यय और भर्ती से पहले और बाद के खर्चों को शामिल करने से मरीजों पर आर्थिक बोझ कम हुआ है। यह योजना उन परिवारों के लिए विशेष रूप से लाभकारी रही है, जो पहले इलाज के अभाव में कर्ज के जाल में फंस जाते थे या अपनी जमीन-जायदाद बेचने को मजबूर हो जाते थे।

हाल ही में, सरकार ने इस योजना को और समावेशी बनाते हुए 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों को इसके दायरे में शामिल करने का निर्णय लिया। इस फैसले से लगभग 6 करोड़ बुजुर्ग लाभान्वित होंगे, जिनके लिए आयुष्मान वय वंदना कार्ड की शुरुआत की गई है। अब तक 75.41 लाख आयुष्मान वय वंदना कार्ड जारी किए जा चुके हैं, जिनमें से 32.3 लाख कार्ड महिलाओं के लिए हैं। इसके अतिरिक्त, 1.06 लाख क्लेम सेटल किए गए हैं, जो इस योजना की त्वरित कार्यप्रणाली को दर्शाता है। यह कदम हमारे समाज के उन बुजुर्गों, विशेषकर महिलाओं के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिन्होंने जीवनभर परिवार और समाज की सेवा की है। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर, यह निर्णय माँ दुर्गा के उस रूप की याद दिलाता है, जो समाज के कमजोर वर्गों की रक्षा करती है।

दिल्ली के 35वें राज्य के रूप में इस योजना में शामिल होने से यह स्पष्ट है कि आयुष्मान भारत की स्वीकार्यता राष्ट्रव्यापी है। केवल पश्चिम बंगाल ही अब इस योजना से बाहर है, और हम आशान्वित हैं कि वह भी जल्द इसका हिस्सा बनेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन परिवार, अनुसूचित जाति-जनजाति, और दिव्यांग व्यक्तियों को प्राथमिकता दी गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों, जैसे सफाईकर्मी, फुटपाथ विक्रेता और घरेलू श्रमिक, को शामिल किया गया है। यह सुनिश्चित करता है कि समाज का सबसे कमजोर वर्ग इस योजना का लाभ उठाए। योजना की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया गया है। लाभार्थी ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से आयुष्मान कार्ड के लिए आवेदन कर सकते हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए पात्रता मानदंड अलग-अलग हैं, ताकि दोनों क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जा सके।

आयुष्मान भारत की सफलता का एक और महत्वपूर्ण पहलू इसकी तकनीकी दक्षता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से, लाभार्थियों की पहचान, क्लेम प्रक्रिया और अस्पतालों का चयन आसान हो गया है। यह योजना न केवल स्वास्थ्य सुविधाओं को सुलभ बनाती है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करती है कि इलाज की गुणवत्ता से कोई समझौता न हो। सरकारी और निजी अस्पतालों का एक मजबूत नेटवर्क इस योजना की रीढ़ है, जो देश के सुदूर क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाता है।

हालांकि आयुष्मान भारत ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है, फिर भी कुछ चुनौतियां बाकी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी, निजी अस्पतालों की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता, और डिजिटल प्रक्रियाओं को और सरल बनाने की जरूरत है। इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढांचे को और मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि मरीजों को नजदीकी अस्पतालों में ही उच्च गुणवत्ता वाली सुविधाएं मिल सकें। सरकार इन चुनौतियों से निपटने के लिए निरंतर प्रयासरत है। हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक पात्र व्यक्ति तक इस योजना का लाभ पहुंचे और कोई भी नागरिक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित न रहे।

नवरात्रि का यह पावन पर्व हमें नारी शक्ति की याद दिलाता है। जिस तरह माँ दुर्गा असुरों का संहार कर संसार को रक्षा प्रदान करती हैं, उसी तरह आयुष्मान भारत गरीब और असुरक्षित परिवारों को बीमारी के दानव से बचाती है। विशेष रूप से, महिलाओं के लिए यह योजना एक वरदान है, जो उन्हें न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा देती है, बल्कि आत्मनिर्भरता का नया आत्मविश्वास भी प्रदान करती है। यह योजना उस सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक है, जो भारत को एक समावेशी और समृद्ध राष्ट्र बनाने की दिशा में अग्रसर है।
प्रधानमंत्री मोदी की दूरदर्शी नीतियों ने इस दिशा में ऐतिहासिक बदलाव लाए हैं। महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सशक्त बनाने का उनका संकल्प आयुष्मान भारत के माध्यम से स्पष्ट दिखाई देता है। यह योजना न केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जहां हर नागरिक, विशेषकर नारी, सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जी सकती है। नवरात्रि के इस अवसर पर, जब हम माँ दुर्गा की शक्ति का उत्सव मना रहे हैं, आयुष्मान भारत हमें यह विश्वास दिलाता है कि नारी शक्ति के बिना कोई समाज समृद्ध नहीं हो सकता।

आयुष्मान भारत केवल एक स्वास्थ्य बीमा योजना नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति है। यह भारत के हर कोने में स्वास्थ्य समानता लाने का प्रयास है। यह योजना गरीबों के लिए आशा की किरण है और भारत को स्वस्थ, समृद्ध और सशक्त राष्ट्र बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर है। जैसे-जैसे हम इस योजना के सातवें वर्ष का उत्सव मना रहे हैं, हमारा संकल्प है कि इसे और मजबूत, समावेशी और प्रभावी बनाया जाए। हमारा लक्ष्य है कि भारत विश्व मंच पर एक स्वस्थ और सशक्त राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान और मजबूत करे, जहां हर नागरिक, विशेषकर नारी, अपने स्वास्थ्य और सम्मान के साथ एक बेहतर जीवन जी सके।

Nepal at the Edge: Broken Dreams, Fragile Democracy, and the Flight of a Generation

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Delhi : The fizz has gone flat. The promises of democracy in Nepal now taste like froth – empty, bitter, and vanishing fast. Will political stability ever return to this Himalayan nation? Can a country of three crore people, caught between India and China, offer its citizens more than despair and migration? These haunting questions echo louder each passing day.

“Democracy is an expensive hobby,” quips Professor Paras Nath Choudhary. “To expect a herd of white elephants (politicians) to feed the poor before filling their own coffers is a dream, not reality.” He reminds us that the monarchy once gave Nepal stability, but since embracing democracy in 2008, the country has witnessed 14 governments in 17 years – a carousel of chaos still spinning after the violent student uprisings.

From Hope to Ashes
The September rebellion, sparked by a clumsy social media ban, left more than seventy dead and $600 million in ruins. Prime Minister K.P. Sharma Oli fell within 48 hours, and for a fleeting moment, Chief Justice Sushila Karki’s “online coronation” as interim leader promised a new dawn. But as the smoke cleared, the scenery was painfully familiar: broken promises, fake change, and a public left disillusioned yet again.

The Calm Before the Next Storm
Curfews have lifted, and the streets look quiet, but the revolution hasn’t ended. On TikTok and Discord, young Nepalis are still demanding electoral reforms, an end to corruption, and justice for the fallen. Is Nepal now trapped in a “blocked revolution,” where unresolved rage could spill into bloodshed, dictatorship, or foreign intervention?

A Government Without Ground
Since 2008, not a single government has lasted its full term. The interim administration faces impossible deadlines – elections by March 2026, justice for victims, and rebuilding public trust. But faith is missing.
The economy, already fragile, is now shattered. Growth projections of 4.5% for 2025 have collapsed to near zero. The damage: 3 trillion rupees ($22.5 billion) – half the nation’s GDP. Tourism has evaporated, businesses have shuttered, and investors have fled.

Living on Borrowed Breath
Nepal does not survive on its own strength. It breathes through remittances and India’s lifeline. Every day, 2,000 young Nepalis leave the country for work abroad. Remittances, 30% of GDP, are both a blessing and a curse – sustaining families but hollowing out society.

Agriculture still employs the majority but fails to feed the population, forcing food imports worth 400 billion rupees annually. Industry contributes just 5–6% of GDP, mainly from selling edible oil to India. In short, Nepal imports life itself – fuel, electricity, grain, machinery – all from India.

Meanwhile, 10–15 lakh Nepalis toil in India, sending back $2–3 billion each year. This dependence is both Nepal’s crutch and chain.

The Young, Restless, and Unemployed
Nepal’s greatest resource – its youth – is also its greatest crisis. Educated and digitally connected but jobless, they face unemployment rates above 20%. Per capita income is stuck at $1,400, and one in five people still live in poverty. Their future is migration; their reality, exploitation.

The Darkest Tragedy
Each year, between 5,000 and 10,000 Nepali women and girls are trafficked into India’s flesh trade. Over one lakh remain trapped in brutal exploitation, invisible in brothels and cities. Despite decades of awareness drives and rescue missions, the numbers barely change. It is the most painful proof that political decay translates directly into human suffering.

Sandwiched Between India and China
Nepal’s helplessness must transform into dignity. India, as its closest partner, must extend genuine support rather than discrimination. And Nepalis themselves must recognize that India is their evergreen ally, while China lurks as an opportunist. But without courage in Kathmandu to uproot corruption and rebuild domestic productivity, Nepal risks falling deeper into the abyss of instability.

बिहार की वर्तमान स्थिति और प्रशांत के प्रयास

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पटना। बिहार, एक ऐसा राज्य जो अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए जाना जाता है, आज कई विरोधाभासों का केंद्र बना हुआ है। यह आश्चर्यजनक है कि बिहार के जिला मुख्यालयों में जमीन की कीमतें देश के बड़े शहरों और महानगरों के समकक्ष हैं, जबकि वहां बुनियादी सुविधाएं जैसे अच्छे अस्पताल या ठहरने के लिए उचित होटल तक उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थिति बिहार के विकास के असंतुलन को दर्शाती है, जहां आर्थिक असमानता और संसाधनों का अभाव स्पष्ट है।

प्रदेश की सामाजिक और आर्थिक विसंगतियां भी चिंताजनक हैं। एक ओर जहां सरकारी अधिकारियों का मासिक वेतन लाख रुपये से कम है, वहीं उनके बच्चे सवा लाख रुपये मासिक फीस वाले स्कूलों में पढ़ रहे हैं। यह विरोधाभास भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की गहरी जड़ों की ओर इशारा करता है। बिहार की जनता इन मुद्दों से भली-भांति परिचित है, लेकिन बार-बार ठगे जाने के कारण उनका विश्वास टूट चुका है। लोग इतने निराश हो चुके हैं कि वे अब किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद छोड़ चुके हैं और वर्तमान स्थिति को अपनी नियति मान चुके हैं।

इस बीच, प्रशांत किशोर जैसे प्रवासी बिहारी के प्रयासों ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। उनके अभियान और सुधारवादी दृष्टिकोण ने लोगों में चर्चा तो पैदा की है, लेकिन दीर्घकालिक बदलाव का भरोसा अभी भी कमजोर है। बिहार के लोगों की उम्मीदें अब मुख्य रूप से प्रवासी बिहारियों पर टिकी हैं, जो बाहर से नई सोच और ऊर्जा ला सकते हैं। प्रशांत जैसे व्यक्तियों के प्रयास भले ही शुरुआती हों, लेकिन वे बिहार के भविष्य के लिए एक नई दिशा की संभावना को दर्शाते हैं। फिर भी, इस विश्वास को पुनर्जनन करने और ठोस परिवर्तन लाने के लिए लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

स्वदेशी सोशलिज्म के 90 साल: टूटन की दास्तान

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पुणे में हाल ही में आयोजित “समाजवादी एकजुटता सम्मेलन” ने हमें उस सदी-भर पुराने आंदोलन की याद दिला दी, जिसने भारतीय लोकतंत्र को दिशा और ताक़त दी थी। यह सम्मेलन मानो एक आईना था—जिसमें अतीत की चमक, वर्तमान की मायूसी और भविष्य की उम्मीद—तीनों एक साथ दिखाई दिए।
जेपी से लोहिया तक की वह धारा, जिसने भारतीय राजनीति को गहराई से बदला, आज युवाओं की याददाश्त से तक़रीबन गायब हो चुकी है। दर्जनों दूरदर्शी नेताओं को जन्म देने वाला यह आंदोलन अब गुमनामी से जूझ रहा है। लेकिन इसकी मूल धारणाएं—बराबरी, इंसाफ़ और जनप्रतिबद्धता—आज भी उतनी ही रोशन हैं, जितनी 90 साल पहले थीं।

पुणे का जमावड़ा: यादें और सवाल
यह सम्मेलन 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) की स्थापना की 90वीं वर्षगांठ के अवसर पर बुलाया गया था। राजस्थान के सौ वर्षीय पंडित रामकिशन ने उद्घाटन किया और डॉ. जीजी पारीख ने तल्ख़ अंदाज़ में कहा—सत्ता के मोह ने हमें हमारे असूल भुला दिए। समतावादी नज़रिया ज़िंदगी में उतर नहीं पाया।

डॉ. सुनीलम, प्रो. आनंद कुमार, प्रो. राजकुमार जैन, प्रो. रामा शंकर सिंह, विजय प्रताप और योगेंद्र यादव जैसे वक्ताओं ने साफ़ कहा कि आंदोलन का सबसे बड़ा संकट है—युवा पीढ़ी की गैरहाज़िरी। एक विचारक ने चेतावनी दी, “अगर समाजवाद को डिजिटल दौर से नहीं जोड़ा गया, तो यह सिर्फ़ किताबों का हिस्सा बनकर रह जाएगा।”

सम्मेलन में एस.एम. जोशी और दूसरे पुरखों को याद किया गया। बुज़ुर्ग समाजवादियों की आँखों में चमक थी, मगर दर्द भी कि नई नस्ल समाजवादी सपनों से बेग़ाना हो चुकी है।

गौरवशाली अतीत: जब समाजवाद था जनता की आवाज़

प्रो. पारसनाथ चौधरी ने याद दिलाया—1934 में CSP का गठन महज़ एक संगठन नहीं था, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के भीतर बराबरी और सामाजिक न्याय की अलख जगाने वाला बिगुल था। भारत छोड़ो आंदोलन इसका स्वर्णिम अध्याय था, जब जयप्रकाश नारायण, लोहिया और उषा मेहता जैसे नेता भूमिगत संघर्ष का प्रतीक बने।

आज़ादी के बाद समाजवादियों ने विपक्ष की मज़बूत धारा तैयार की। मजदूरों, किसानों, पिछड़ी जातियों और ग़रीब तबकों को आवाज़ दी। लोकतंत्र की शुरुआती बुनियाद में समाजवाद की गहरी छाप है।

लेकिन, यह दास्तान जितनी गौरवशाली है, उतनी ही टूटन और विघटन से भरी हुई। अनुशासनहीनता, अहंकार और बार-बार के बंटवारे ने आंदोलन की ताक़त खोखली कर दी। 1950 के दशक में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और समाजवादी पार्टी का विभाजन हो या जनता पार्टी का बिखरना—हर बार आंदोलन पिछड़ गया।

नेताओं की बारात, मगर संगठन खोखला
लोहिया और उनके साथी जनता से गहरे जुड़े, बड़े आंदोलनों को जन्म दिया, मगर मज़बूत संगठन कभी खड़ा नहीं कर सके। हाँ, इस आंदोलन ने असंख्य विजनरी नेता दिए—मधु लिमए, मधु दंडवते, सुरेंद्र मोहन, जॉर्ज फर्नांडिस, नाथ पाई, बहुत लंबी लिस्ट है। जॉर्ज की 1974 की ऐतिहासिक रेल हड़ताल याद की जाती है, जिसने पूरे देश को हिला दिया। वह पल दिखाता था कि समाजवादी विचारधारा महज़ किताबों का नारा नहीं, बल्कि जन-शक्ति का विस्फोट है।

दो धाराओं की कहानी
समाजवादी आंदोलन broadly दो धाराओं में बंटा रहा—1. लोहियावादी SSP – जाति प्रश्न, मंडल राजनीति और हिंदी को केंद्र में रखकर। 2. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) – पश्चिमी लोकतांत्रिक समाजवाद की ओर झुकी। दोनों धाराओं ने युवाओं को जोड़ने की कोशिश की—राष्ट्र सेवा दल, समाजवादी युवक सभा, रेलवे यूनियनें। लेकिन अंततः निरंतर टूटन ने इस ताक़त को कमज़ोर कर दिया।

भारतीय रंग में ढला समाजवाद
भारतीय समाजवाद यूरोपीय मॉडल की नकल नहीं था। लोहिया और उनके साथियों ने इसे भारतीय हालात के मुताबिक ढाला। इसकी चार बुनियादी धारणाएं आज भी उतनी ही अहम हैं:

विस्तारित समानता: सिर्फ़ आर्थिक नहीं, जाति, लिंग और भाषा की बराबरी।

सतत विकास: पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित मॉडल।

सत्याग्रह की रणनीति: गांधीवादी तरीक़े से संघर्ष।

सांस्कृतिक राजनीति: भारतीय भाषाओं और लोक संस्कृति से जुड़ाव।

आज जब जलवायु संकट, बेरोज़गारी और असमानता चरम पर हैं, ये धारणाएं और भी प्रासंगिक हो उठती हैं।
नई पीढ़ी से दूरी: सबसे बड़ा संकट

आज “समाजवाद” शब्द ही सार्वजनिक विमर्श से ग़ायब हो चुका है। युवा इसे “वामपंथी अवशेष” मानते हैं। वैश्वीकरण और नवउदारवाद के दौर में समाजवाद को पुरातन कहकर किनारे किया जा रहा है। जबकि सच यही है कि यह असमानता और अन्याय के खिलाफ़ सबसे बड़ा औज़ार है।
इतने नेता, जितने सोशलिस्ट मूवमेंट ने दिए, कोई और धारा नहीं दे सकी—आचार्य नरेंद्र देव, कृपलानी, संपूर्णानंद, चंद्रशेखर, कर्पूरी ठाकुर, मुलायम सिंह, लालू यादव, नीतीश कुमार… और अनगिनत कार्यकर्ता जो गाँव-गाँव जनता के बीच लड़े। कर्पूरी ठाकुर की आरक्षण नीति ने सामाजिक न्याय को नई दिशा दी। पत्रकारिता और साहित्य में भी समाजवादी असर रहा। कई संपादक और लेखक जन-आंदोलनों की आवाज़ बने।

आज की हकीकत और उम्मीद
पुणे में जुटे बुज़ुर्ग समाजवादी—जिनमें से कई आपातकाल के दौरान जेल में रहे थे—आज भी लोकतंत्र की गिरती हालत पर बेचैन नज़र आते हैं। सवाल यही है कि क्या उनकी मशाल नई पीढ़ी तक पहुँचेगी? सम्मेलन में कुछ कोशिशें हुईं—युवाओं के लिए कार्यशालाएं, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, ऑनलाइन कैंपेन। लेकिन चुनौतियाँ बड़ी हैं—संगठनात्मक कमज़ोरी, फंडिंग की तंगी, मीडिया की बेरुख़ी।

विरासत या भविष्य का रास्ता?

समाजवाद की विरासत महज़ अतीत की याद नहीं, बल्कि भविष्य की कुंजी है। बराबरी, इंसाफ़, सांस्कृतिक जुड़ाव और अहिंसक प्रतिरोध—ये चार स्तंभ आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 90 साल पहले थे।
आज जब लोकतंत्र की बुनियाद पर सत्तावाद का साया है, जब अमीरी-ग़रीबी की खाई बढ़ रही है, तब समाजवाद की लौ को फिर से भड़काना ज़रूरी है। पुणे सम्मेलन ने यही संदेश दिया—“लौ बुझी नहीं है, उसे बस नए ईंधन की दरकार है।”

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