रामचंद्र गुहा का “Control Freaks!” कॉलम या विकास की गति को रोकने वाली निराशावादी प्रोपेगैंडा

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दिल्ली। रामचंद्र गुहा का 13 जून 2026 का कॉलम “Control Freaks!” एक बार फिर पुरानी लेफ्ट-लिबरल सोच का नमूना है, जिसमें तथ्यों को तोड़-मरोड़कर, चुनिंदा आंकड़ों से यथार्थ छिपाकर और व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से भरे आरोप लगाकर मोदी सरकार की उपलब्धियों को बदनाम करने की कोशिश की गई है। यह लेख आर्थिक चुनौतियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। गुहा की निराशा BJP की लोकप्रियता और हिंदू बहुसंख्यक राष्ट्र की सकारात्मक दिशा से उपजी है, न कि तथ्यों से।

सबसे पहले अर्थव्यवस्था: गुहा दावा करते हैं कि अर्थव्यवस्था अच्छी नहीं चल रही—रुपया कमजोर, पूंजी भाग रही, निजी निवेश सुस्त, खपत कमजोर, विनिर्माण ठप। सच्चाई उलट है। FY26 में भारत का GDP ग्रोथ 7.4-7.7% रहा, जो वैश्विक मंदी और ईरान संकट के बावजूद मजबूत है। विश्व बैंक, IMF और अन्य एजेंसियां भारत को सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था मानती हैं। प्राइवेट फाइनल कंजम्प्शन और ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन दोनों 7-8%+ बढ़े। मैन्युफैक्चरिंग में 8-10% ग्रोथ दर्ज की गई, खासकर PLI स्कीम्स के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो और व्हाइट गुड्स में। FDI मजबूत रहा, मार्च 2026 में 6 बिलियन USD+। UPI, डिजिटल इकोनॉमी और इंफ्रास्ट्रक्चर बूम से खपत मजबूत है।

रुपया दबाव में है, लेकिन यह वैश्विक तेल कीमतों (ईरान युद्ध) का असर है, न कि नीतिगत विफलता। भारत ने रिजर्व्स मैनेजमेंट, निर्यात बढ़ावा और गोल्ड इंपोर्ट कटौती से संभाला। स्टॉक मार्केट: सेंसक्स-निफ्टी बार-बार नए हाई बना रहे हैं (जून 2026 में सेंसक्स 75,000+), IT सेक्टर AI चुनौती के बावजूद अनुकूलित हो रहा है। गुहा का ‘दो साल पहले के स्तर’ दावा सही नहीं जान पड़ता।

गुहा अर्थशास्त्रियों की “सुधार” सलाह का हवाला देते हैं—कस्टम्स-टैक्स ब्यूरोक्रेसी कम मनमानी, हेल्थ-एजुकेशन पर खर्च, लेबर इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग आदि। लेकिन मोदी सरकार ने इन्हें पहले ही अमल में लाया। GST ने टैक्स सिस्टम को सरल बनाया, IBC ने दिवालिया प्रक्रिया सुधारी, लेबर कोड सुधार किए। PLI स्कीम (2 लाख करोड़+) ने लाखों नौकरियां पैदा कीं। इंफ्रास्ट्रक्चर पर अभूतपूर्व खर्च (सड़कें, रेल, एयरपोर्ट) से हेल्थ-एजुकेशन इंडायरेक्ट बूस्ट मिला। आयुष्मान भारत, NEP 2020, PM SHRI स्कूल्स—ये सब साक्ष्य हैं। फर्टिलाइजर सब्सिडी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से बेहतर टारगेटेड हुई। BJP-शासित राज्यों में विकास तेज, गैर-BJP राज्यों में भी केंद्र सहयोग देता है। अब पूर्वोत्तर भारत नहीं बल्कि भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा कहा जाता है, असम से लेकर मिजोरम,अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय जैसे राज्यों को। वहां आ रहे परिवर्तन को जाकर रामचन्द्रजी को एक बार देखना चाहिए।

ईरान युद्ध का असर स्वीकार्य है, लेकिन सरकार ने तेल डायवर्सिफिकेशन, रिजर्व बिल्डअप और कंजर्वेशन से सामना किया। रेमिटेंस में गिरावट अस्थायी है।

मोदी की महत्वाकांक्षाएं: तथ्यों का विकृत चित्रण

गुहा लिखते हैं कि मोदी सत्ता में बने रहना चाहते हैं, चौथा चुनाव जीतकर नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ना चाहते हैं, पर्सनालिटी कल्ट, हिंदू राष्ट्र। यह व्यक्तिगत हमला है। मोदी 2014 से सुशासन, विकास और राष्ट्र-निर्माण पर फोकस्ड हैं। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” नारा जारी है। 25 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी से बाहर निकले (NFHS, UNDP डेटा)। राम मंदिर और सोमनाथ—ये सांस्कृतिक पुनरुत्थान हैं, न कि विभाजन। हिंदू बहुसंख्यकवाद का आरोप मुस्लिम तुष्टिकरण की पुरानी कांग्रेस संस्कृति को छिपाने का प्रयास है। CAA, UCC, Article 370 जैसे कदम समान नागरिकता और राष्ट्रीय एकता के लिए थे।

व्यक्तित्व पूजा? हर नेता की छवि होती है, लेकिन मोदी का फोकस डिलीवरी पर है—2 करोड़+ घर, बिजली, शौचालय, जल जीवन मिशन, उज्ज्वला। पेट्रोल पंप, एयरपोर्ट पर नाम—ये ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी के प्रतीक हैं, न कि वेनिटी। अमित शाह पर हमला भी राजनीतिक पूर्वाग्रह दिखाता है। वे कुशल संगठक हैं, जिन्होंने BJP को 22+ राज्यों तक पहुंचाया।

सत्ता का ‘फॉर्मूला’: हिंदुत्व + हैंडआउट्स + संस्थाएं + क्रोनी कैपिटलिज्म?

यह सबसे घृणित आरोप है। BJP का वोट बैंक विकास, राष्ट्रवाद और अच्छे शासन पर आधारित है। 2014 में कांग्रेस 14 राज्यों में, BJP 4 में। 2026 में BJP/NDA 20+ राज्यों में, कांग्रेस मुट्ठी भर में। यह ‘इनेप्ट कांग्रेस’ नहीं, बल्कि मोदी-शाह की रणनीति—ग्रासरूट कनेक्ट, डिजिटल कैंपेन, डायरेक्ट बेनिफिट्स (पीएम किसान, उज्ज्वला, लाडली बहना सम्मान आदि) का परिणाम है। महिलाएं, किसान, युवा, गरीब—सबको लाभ।

संस्थाओं पर कब्जा? चुनाव आयोग स्वतंत्र चुनाव कराता है। ED/CBI ने भ्रष्टाचार पर कार्रवाई की—कांग्रेस के घोटालों (2G, कोल, CWG) का जवाब। क्रोनी कैपिटलिज्म? Adani-Ambani पर हमला पुराना है। वास्तव में, Ease of Doing Business में सुधार, इंसॉल्वेंसी कोड, डिफेंस-रेलवे में FDI से हजारों कंपनियां फलीं। स्टार्टअप्स बूम (1 लाख+), MSME सपोर्ट। ओलिगार्की (जिसमें राजनीतिक शक्ति मुख्य रूप से धनवान अभिजात्य वर्ग के हाथों में होती है) नहीं, बल्कि इंक्लूसिव ग्रोथ।

प्रेस पर दबाव और ‘गोदी मीडिया’? विपक्षी चैनल खुलेआम सरकार की आलोचना करते हैं। Godi मीडिया का आरोप उन मीडिया हाउस पर है जो कांग्रेस के जमाने में चापलूसी करते थे। आज डिबेट विविध हैं। आज सभी को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता है। रवीश कुमार, अजीत अंजुम, पूण्य प्रसून, अभिसार शर्मा, साक्षी जोशी जैसे पत्रकार एक दशक से अधिक समय से लगातार आलोचना ही कर रहे हैं और कहते हैं कि कहने की आजादी नहीं है। अब उनके प्रोपगेंडा को जनता समझ चुकी है और उन्हेंं समाचार के लिए कम और मनोरंजन के लिए अधिक देख सुन रही है तो इसमें मोदी सरकार को कसूरवार कैसे ठहराया जा सकता है?

कांग्रेस का पतन और BJP की सफलता

2013-14 में यूपीए भ्रष्टाचार, नीति लकवे, उच्च मुद्रास्फीति और जीडीपी 5% के आसपास छोड़ गई। मोदी ने इसे स्थिरता, सुधार और महत्वाकांक्षी विकास से बदला। 22 राज्यों में बीजेपी की सरकार का अर्थ है कि लोगों का उन पर विश्वास है। कांग्रेस का पतन उसकी विरासत राजनीति, परिवारवाद और वोट बैंक पॉलिटिक्स का नतीजा है।

पर्यावरण और दीर्घकालिक स्वास्थ्य

गुहा पर्यावरण का जिक्र करते हैं। मोदी सरकार ने सोलर, रिन्यूएबल एनर्जी में विश्व लीडरशिप ली (450 GW टारगेट), इंटरनेशनल सोलर अलायंस, वन कवर बढ़ाया, स्वच्छ भारत। चुनौतियां हैं, लेकिन पर्यावरण की दिशा में प्रगति साफ दिखाई दे रही है।

रामचंद्र गुहा जैसे कमेंटेटर्स का निराशावाद भारत की उभरती ताकत को स्वीकार नहीं कर पाता। मोदी-शाह की प्राथमिकता राष्ट्र-निर्माण, आर्थिक आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास है। क्रोनीज्म छोड़कर ओपन कॉम्पिटिशन—PLI, स्टार्टअप इंडिया, ऑटोमेशन और स्किल इंडिया यही कर रहे हैं। संस्थाएं मजबूत हो रही हैं। हिंदुत्व ‘मेजॉरिटेरियनिज्म’ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास है।

भारत 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी की ओर बढ़ रहा है। चुनौतियां (तेल, वैश्विक मंदी) हैं, लेकिन नेतृत्व सक्षम है। गुहा की “कंस्ट्रक्टिव” सलाहें पहले से लागू हैं; उनकी निराशा केवल राजनीतिक है। भारत जाग रहा है—विकास, एकता और गौरव के पथ पर।

मित्रो, रामचंद्र गुहा का ताज़ा कॉलम भी पढ़ लीजिए…

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सुदीप ठाकुर

रायपुर: इतिहासकार और महात्मा गांधी की खासी सराही गई जीवनी सहित समकालीन भारत में कुछ बेहतरीन किताबें लिखने वाले रामचंद्र गुहा के पिछले कॉलम पर खासा बवाल मचा। मूल रूप से द टेलीग्राफ और करीब दर्जन भर अन्य संस्थानों में छपने वाले अपने कॉलम में रामचंद्र गुहा ने नरेंद्र मोदी और भाजपा की जीत के लिए राहुल गांधी और गांधी परिवार को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाया था।

इसे कई लोगों ने यह माना कि रामचंद्र गुहा भी उस पाले में चले गए हैं। उनके इतिहास बोध से लेकर समकालीन राजनीति और अर्थव्यवस्था तक की उनकी समझ पर सवाल उठाए गए। यहां तक कि कुछ लोगों ने इस अंदाज में सवाल किया था कि देखते हैं कि अगली बार वह क्या लिखते हैं। मैंने इस संबंध में लिखी अपनी पोस्ट में उनके कुछ नए पुराने उन कॉलम का जिक्र किया था, जिसमें उन्होंने भाजपा और खासतौर से नरेंद्र मोदी की अधिनायकवादी छवि को रेखांकित किया था।

रामचंद्र गुहा ही नहीं, बल्कि किसी भी बौद्धिक की मान्यताएं खारिज की जा सकती हैं। इतिहास गवाह  है कि महान दार्शनिक प्लेटो की आदर्शवाद और समता संबंधी कुछ मान्यताओं को उनके शिष्य अरस्तू ने ही खारिज कर दिया था!

भारत तो वैसे भी विमर्श वाला देश है। यह अलग बात है कि यह विमर्श एकालाप में बदलता जा रहा है। और यह एकालाप सत्ता के शिखर तक से जोरशोर से रहा है। दिक्कत यह है कि रामचंद्र गुहा ने जो लिखा उस पर एतराज या विमर्श के बजाए बात उनकी बौद्धिकता और समझ पर आ गई।

तो इस बार रामचंद्र गुहा ने क्या लिखा?

रामचंद्र गुहा ने द डेलीग्राफ के ताजा कॉलम ( 13.6.2026) में देश की अर्थव्यवस्था और आम तौर पर पूरे हालात के बारे में लिखा है।

इसका शीर्षक है, Control freaks!

इसका तर्जुमा सर्वसत्ताधारी या अधिनायकवादी या इसके करीब कुछ हो सकता है। यानी पूरा नियंत्रण।

उन्होंने अपने कॉलम में देश की आर्थिक बदहाली और उस पर देश के चुनींदा अर्थशास्त्रियों की चिंताओं की चर्चा की है। वह अपने ढंग से देश की बदहाली की शिनाख्त करते हुए लिखते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी तीन लक्ष्यों पर काम कर रहे हैं…. पहला, वह किसी भी सूरत में सत्ता में बने रहना चाहते हैं…. वह लगातार चौथा चुनाव जीतना चाहते हैं ताकि किसी भी तरह से उन जवाहरलाल नेहरू के चुनाव जीतने के रिकॉर्ड को तोड़ सकें, जिनकी वे सार्वजनिक रूप से निंदा करते हैं, लेकिन मन ही मन उनस ईर्ष्या करते हैं। दूसरी है, पर्सनाल्टी कल्ट यानी व्यक्तित्व पूजा।

वह लिखते हैं कि उनकी यह छवि बनाने के लिए बड़े पैमाने पर सार्वजनिक धन खर्च किया गया है। मोदी की तीसरी आकंक्षा हिंदू राष्ट्र से जुड़ी हुई है। मोदी ने 2014 का अपना नारा सबका साथ सबका विकास पीछे छोड़ दिय है। रामचंद्र गुहा लिखते हैं, नरेंद्र मोदी की तीनों महत्वाकांक्षाओं में से दो को अमित शाह पूरी तरह साझा करते हैं—अपने लिए अधिक राजनीतिक शक्ति और हिंदू बहुसंख्यकवाद का विस्तार।

उन्होंने यह भी लिखा है कि अमित शाह खुद को मोदी के वफादार सहयोगी नहीं, बल्कि संभावित राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर देख रहे हैं। उनकी ताकत को चार बिंदुओं में आंका है। उन्होंने लिखा है कि किस तरह से मोदी और शाह ने हिंदुओं में यह भय पैदा कर कि वे अल्पसंख्यकों (मुस्लिमों) से दब जाएंगे, एक हिंदू वोट बैंक तैयार कर लिया है। दूसरा महिलाओँ और किसानों को नकद भुगतान। तीसरा, चुनाव आयोग , ईडी जैसी संस्थाओं पर पूरा नियंत्रण और चौथा चुनींदा पूंजीपतियों को बढ़ावा देना, ताकि वे बदले में भाजपा को धन दें।

रामचंद्र गुहा ने मोदी-शाह के सत्ता पर नियंत्रण को प्रेस पर दबाव बनाकर और गोदी मीडिया को बढ़ावा देकर  भी आसान किया गया है।

टीवी चैनलों के बारे में वह लिखते हैं….In the case of television, the regime has gone beyond suppression, turning news anchors into attack dogs charging the Opposition with all sorts of faults and failures while never holding the government to account at all.

इसके साथ ही, रामचंद्र गुहा ने एक बार फिर कांग्रेस के नेतृत्व पर भी सवाल उठाया है। लिखा कि,  2013 में जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब 14 राज्यों में उसकी सरकारेे थीं। भाजपा की चार राज्यों में। 13 साल बाद तीन लोकसभा चुनाव जीतकर भाजपा की 22 राज्यों में सरकारें हैं। कांग्रेस की चार राज्यों में सरकार है और दो राज्यों में वह गठबंधन सरकार का हिस्सा है।

(सोशल मीडिया से साभार)

टेलीग्राफ में रामचन्द्र गुहा का प्रकाशित लेख : https://www.telegraphindia.com/opinion/control-freaks-the-modi-regimes-failure-to-undertake-economic-reforms-prnt/cid/2165281#goog_rewarded

एओ ह्यूम और कांग्रेस की स्थापना: ऐतिहासिक संदर्भ

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दिल्ली। ऑलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A.O. Hume), ब्रिटिश इंडियन सिविल सर्विस (ICS) के अधिकारी थे। उन्होंने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। ह्यूम ने इसे भारतीयों के लिए एक मंच के रूप में देखा, जहां वे अपनी शिकायतें संवैधानिक तरीके से रख सकें। कई इतिहासकार इसे “सेफ्टी वॉल्व” थ्योरी कहते हैं-ब्रिटिश साम्राज्य के हित में उग्र राष्ट्रवाद को नियंत्रित करने का साधन।

ह्यूम ने 1883 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों को खुला पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने एक राष्ट्रव्यापी संगठन की जरूरत बताई। पहला अधिवेशन 28 दिसंबर 1885 को मुंबई में हुआ, जिसमें 72 प्रतिनिधि थे (ज्यादातर वकील और शिक्षित वर्ग)। ह्यूम इसके पहले 22 वर्षों तक महासचिव रहे। कांग्रेस शुरू में ब्रिटिश शासन के सुधारों की मांग करती थी, न कि पूर्ण स्वराज की। प्रारंभिक नेता जैसे वी.सी. बनर्जी, दादाभाई नौरोजी आदि ब्रिटेन में पढ़े हुए थे।

यह सही है कि कई बड़े कांग्रेस नेता लंदन से बैरिस्टर (बैरिस्टर-एट-लॉ) थे। ब्रिटिश कानूनी शिक्षा महंगी थी, जो मुख्यतः धनी परिवारों तक सीमित थी। इनका क्लाइंटेल अक्सर जमींदार, तालुकदार और बड़े व्यापारी होते थे, जो ब्रिटिश व्यवस्था से जुड़े थे। मोतीलाल नेहरू इसका क्लासिकल उदाहरण हैं। वे इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रमुख वकील थे। उन्होंने जमींदारों के मुकदमे लड़े, जैसे लखना राज केस (इटावा), अमेठी राज आदि। प्रिवी काउंसिल तक गए और भारी फीस कमाई। किसानों-मजदूरों के मुकदमे उनका मुख्य स्रोत नहीं थे।

कांग्रेस बाद में उग्र राष्ट्रवादी बनी (स्वदेशी, असहयोग, सविनय अवज्ञा), जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी। ह्यूम खुद भारतीय स्वशासन के पक्षधर थे और बाद में लंदन से समर्थन करते रहे। औपनिवेशिक काल में अंग्रेजी शिक्षा ही उच्च पद और राजनीति का द्वार थी।

नेहरू: सत्ता हथियाना, विभाजन और विरासत

जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने, लेकिन उनका चयन विवादास्पद रहा। 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए प्रादेशिक कांग्रेस कमेटियों (PCC) की नॉमिनेशन में सरदार वल्लभभाई पटेल को 12 में से 12 समर्थन मिला, नेहरू को शून्य। पटेल ने गांधीजी के अनुरोध पर नाम वापस ले लिया। गांधी ने नेहरू को पसंद किया क्योंकि वे युवा, अंग्रेजी बोलने वाले, आधुनिक विचारों वाले और अंतरराष्ट्रीय छवि वाले थे। पटेल को मजबूत संगठनकर्ता माना जाता था।

नेहरू अंतरिम सरकार (1946) के उप-प्रधानमंत्री बने और 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री। 1952 के चुनावों तक यह “अनचुने” प्रधानमंत्री वाली बहस सही है-कोई सार्वजनिक वोट नहीं था, लेकिन कांग्रेस की आंतरिक प्रक्रिया और गांधी की पसंद तय कर गई। नेहरू ने बाद में 1952, 1957, 1962 में लोकप्रिय जनादेश जीते।

विभाजन पर: 1946 कैबिनेट मिशन प्लान में ढीला संघीय ढांचा था, जिसे नेहरू ने अस्वीकार किया क्योंकि यह कमजोर केंद्र बनाता। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग की। जिन्ना की ‘डायरेक्ट एक्शन’ और दंगे बढ़े। गांधी ने एक बार जिन्ना को संयुक्त भारत का पीएम बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह नेहरू को स्वीकार नहीं था। ना नेहरू को यह स्वीकार था कि देश के प्रधानमंत्री पटेल बने।

जिन्ना का कैंसर 1940 के दशक के अंत में पता चल गया था, उन्हें सशर्त प्रधानमंत्री बनाया जा सकता था। यदि ऐसा होता तो देश का बंटवारा नहीं होता। इसलिए आगे से जब हम बंटवारे की बात करे तो इसके बंटने से किसे डायरेक्ट बेनीफिट हासिल हुआ। इस पर जरूर चर्चा करें।

ब्रिटिश (माउंटबेटन) जल्दी निकलना चाहते थे। कांग्रेस नेतृत्व ने नेहरू के दबाव में अंततः विभाजन स्वीकार किया क्योंकि विभाजित भारत में हिन्दुस्तान वाले हिस्से का नेतृत्व नेहरू करेंगे, यह बात तय हो गई थी। गांधी इसके खिलाफ थे लेकिन असहाय हो गए। आजादी मिलने के बाद भी एक बार गांधी ने दोनों देशों को जोड़ने के लिए आंदोलन की योजना बनाई थी, उसे कार्यान्वित करते। उसके पहले उनकी हत्या हो गई। जब गांधी की हत्या हुई। फिर उन लोगों की जांच कौन करता, जो सत्ता में थे। जो कांग्रेसी पत्रकार आज मीडिया के विपक्ष की भूमिका निभाने की इतनी वकालत करते हैं, वे गांधी हत्या के बाद उन लेखों को तलाश कर लाएं, जिसमें कांग्रेस और नेहरू से प्रश्न पूछा गया हो। सरकार नेहरू चला रहे थे, फिर गांधी हत्या का सारा ठीकरा आरएसएस पर क्यों फोड़ दिया गया? गांधी की जान खतरे में है, इस बात की जानकारी सरकार के पास थी, नेहरू ने गांधी की सुरक्षा के लिए क्या किया? यह क्या कोई संयोग था कि गांधी ने कांग्रेस पार्टी को खत्म कर देने की बात की और उनकी हत्या हो गई। इस पर कभी किसी समाचार पत्र में उस दौर में क्यों नहीं लिखा? राजदीप, प्रणॉय रॉय, रामचन्द्र गुहा, करण थापर, सिद्धार्थ वरदराजन को कभी इस मुद्दे पर कुछ लिखने की क्यों नहीं सुझी? जिम्मेदारी ब्रिटिश ‘डिवाइड एंड रूल’, लीग की दो-राष्ट्र थ्योरी और कांग्रेस की गलतियों पर बंटती है।

 ऐतिहासिक तथ्यों की कसौटी पर नेहरू

कश्मीर: 1947 में पाक आक्रमण पर भारतीय सेना भेजी, लेकिन UN में शिकायत कर युद्धविराम स्वीकार किया। पूर्ण एकीकरण नहीं हुआ। नेहरू की अंतरराष्ट्रीय छवि और ‘सेकुलर’ इमेज इसकी दोषी थी।

विदेश नीति: गुटनिरपेक्षता आदर्शवादी थी, लेकिन 1962 चीन युद्ध में भारत की तैयारी कमजोर पड़ी। नेहरू ने चीन को ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ कहा, लेकिन सीमा विवाद अनसुलझा रहा। भारत ने मुंह की खाई।

आर्थिक नीति: समाजवादी मॉडल, लाइसेंस राज, भारी उद्योग पर जोर। प्रारंभिक विकास हुआ लेकिन 1960-70 के दशक में कृषि और निजी क्षेत्र उपेक्षित रहे।

परिवारवाद: नेहरू के बाद इंदिरा-राजीव लाइन चली, जो लोकतंत्र के लिए सवालिया निशान।

धर्मनिरपेक्षता: कुछ आलोचक कहते हैं कि मुस्लिम तुष्टीकरण (हिंदू कोड बिल बनाम मुस्लिम पर्सनल लॉ) ने विभाजन की मानसिकता को बढ़ावा दिया।

कांग्रेस ब्रिटिश काल में elite-driven थी, ह्यूम का रोल safety valve जैसा था। ह्यूम ने अपना डबल एजेन्ट की भूमिका खुबसूरती से निभाई। अंग्रेज भी चाहते थे कि भारत की सत्ता एक ऐसा व्यक्ति संभाले जो सिर्फ पैदा भारत में हुआ हो। उसकी सोच और परवरिश सब ब्रिटिश हो। नेहरू उनकी सोच पर पूरी तरह खरे उतरते थे। उन्होंने सत्ता संभाली भी। वह सिर्फ गांधी की पसंद थे। देश पटेल को प्रधानमंत्री देखना चाहता था।

Open Letter to Ramachandra Guha

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Dear Dr. Ramachandra Guha,
Your column “Control Freaks!” published in The Daily Telegraph on 13 June 2026 presents a familiar narrative of despair about India’s economy and governance under Prime Minister Narendra Modi. While you frame it as constructive criticism rooted in concern for the nation, a closer examination reveals selective facts, exaggerated gloom, and deep ideological bias. This open letter offers a fact-based counter-narrative. India is not in decline but advancing as the world’s fastest-growing major economy despite global headwinds.
You claim the Indian economy ‘is not doing well’ – rupee weak, capital fleeing, private investment laggard, consumption sluggish, manufacturing stagnant. Reality tells a different story. In FY26, India recorded robust GDP growth of approximately 7.6%, accelerating from 7.1% in FY25, according to World Bank assessments. India remains the fastest-growing major economy globally, with strong domestic demand, manufacturing gains in automobiles and consumer goods, and resilient services. IMF projections for 2026 hover around 6.5%, still far ahead of most peers amid Middle East tensions.
Stock markets have not stagnated at levels from two years ago. The BSE Sensex has hovered near or above 74,000–84,000 in recent sessions, reflecting investor confidence despite volatility. IT firms face AI disruption, yet the broader economy adapts through digital innovation and policy support. FDI inflows reached record levels, with FY25-26 seeing around $58–94 billion in gross inflows, boosted by manufacturing and infrastructure. Private investment has strengthened via PLI schemes, which have catalyzed electronics, semiconductors, and auto sectors. Consumption remains supported by urban demand, rural recovery, and formal job creation.
You cite economists urging reforms on tax bureaucracy, health-education spending, labour-intensive manufacturing, level playing field, and subsidy rationalisation. Many of these are already in motion. GST simplified taxation, IBC reformed insolvency, and labour codes modernised regulations. Public expenditure on infrastructure has been unprecedented — roads, railways, airports, and digital public goods like UPI have transformed delivery. Ayushman Bharat expanded health coverage, while NEP 2020 targets education quality. Direct Benefit Transfers have made fertiliser and power subsidies more targeted and less leaky. Discrimination against non-BJP states is a myth; central schemes benefit citizens nationwide, with special focus on Northeast and aspirational districts.
The external shocks from the US-Iran conflict and oil prices are real, yet India has managed reserves, diversified energy sources, and maintained buffers. Remittances and exports show underlying strength. Your portrayal ignores this resilience.You dissect Modi’s “three principal ambitions”: clinging to power, personality cult, and creating a Hindu Rashtra. This reduces complex leadership to caricature. Modi has consistently emphasised “Sabka Saath, Sabka Vikas, Sabka Vishwas.” Over 25 crore people have exited multidimensional poverty since 2014, with 13.5 crore lifted between 2015-16 and 2019-21 alone per NITI Aayog-UNDP data. Schemes like PM-KISAN, Ujjwala, Jan Dhan, and PMAY have delivered tangible inclusion across castes, genders, and regions.
Visible presence of the Prime Minister on public assets symbolises accountability and ownership of national projects, not vanity. Cultural initiatives like the Ayodhya Ram Temple and Somnath represent civilisational reclamation and national heritage for all Indians, fostering unity rather than division. Article 370’s abrogation, CAA, and pushes for UCC advance equality and integration. “Hindu majoritarianism” is a convenient label for restoring cultural self-confidence in a nation long subjected to selective secularism that often appeased minorities at the expense of the majority.Amit Shah’s organisational acumen has strengthened federalism through electoral victories, not authoritarianism. BJP/NDA now governs or allies in around 20+ states, up from a handful in 2014. This reflects voter mandate for governance, not manipulation alone. Congress’s decline stems from its dynastic inertia, corruption scandals (2G, coal, CWG), and policy paralysis that left the economy scarred in 2014. Your four pillars of BJP power — Hindu vote bank via fear, handouts, captured institutions, and crony capitalism — distort reality. BJP’s support rests on delivery: toilets, electricity, bank accounts, LPG connections, highways, and digital empowerment. ED and CBI actions target corruption across parties; many cases predate Modi. Election Commission has conducted free, fair polls with record turnout. “Crony capitalism” accusations against a few names ignore Ease of Doing Business reforms, startup boom (over 1 lakh recognised), MSME support, and broader corporate participation. Adani and Ambani have invested massively in ports, airports, green energy, and defence — creating jobs and infrastructure. Oligarchy claims overlook competitive markets and rising unicorns.
Press freedom thrives in a vibrant, noisy democracy. Critical voices like yours appear regularly. “Godi media” is a tired trope; diverse TV debates and digital platforms amplify opposition views daily.
You admire economists’ reform calls but predict deaf ears. Yet reforms continue: fiscal consolidation, renewable energy leadership (International Solar Alliance), Swachh Bharat, and skill development. Environmental concerns you raise are addressed through afforestation, pollution control, and net-zero commitments, even as challenges persist.
Dr. Guha, your pessimism echoes pre-2014 Lutyens cynicism that failed to anticipate India’s rise. Modi-Shah’s focus remains long-term economic health, Viksit Bharat by 2047, and inclusive growth. Challenges like global oil shocks exist, but leadership has navigated worse. Abandoning “cronyism” for competition? PLI, Atmanirbhar, and open FDI precisely enable that. Impartial institutions and rule of law strengthen daily.India’s trajectory — from fragile 5% growth under UPA to sustained 6.5-7.5%+ — speaks louder than columns. Millions of aspirational Indians reject defeatism. They embrace development, cultural pride, and strong governance. Your duty as a public intellectual deserves facts over narrative. India is rising. History will judge policies by outcomes, not ideological lenses.
The nation deserves optimism grounded in achievement, not despair manufactured from prejudice.
Sincerely,
A Concerned Observer of India’s Progress 
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