जैसलमेर का अर्धसाका : विश्वासघात और वीरता की वेदना

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प्रणय विक्रम सिंह

राजस्थान का इतिहास केवल रणभूमि का राग नहीं, बल्कि मित्रता और विश्वास के मर्म का भी महाकाव्य है। उसी महाकाव्य का एक हृदयविदारक अध्याय है जैसलमेर का अर्धसाका।

अमीर अली, कंधार का नवाब, जो अपने ही भाई से हारकर शरणागत हुआ। शरणागत की रक्षा भारतीय संस्कृति का अटल धर्म है, अतः जैसलमेर के महाराजा लूणकरण ने उसे आश्रय दिया। मित्रता की मर्यादा निभाने हेतु दोनों ने पगड़ियां बदलीं, और यही पगड़ी-प्रसंग भविष्य में जैसलमेर के लिए प्राणघातक सिद्ध हुआ।

दिन बीतते गए, विश्वास की डोर गहरी होती गई। एक दिन अमीर अली ने कहा कि उसकी बेगमें रानीवास की महिलाओं से मिलना चाहती हैं। राजधर्म निभाने वाले महाराज लूणकरण ने सरलता से अनुमति दे दी। परंतु यह सरलता ही संहार का सूत्र बन गई।

जब विवाहोत्सव में अधिकांश पुरुष किले से बाहर थे, उसी अवसर को अमीर अली ने छल की ढाल बना लिया। स्त्रियों की पालकियों में स्त्रियां नहीं, सैनिक छिपे थे। शृंगार की जगह शस्त्र थे। आशीर्वाद की जगह आक्रमण छिपा था। जैसे ही संदेह हुआ और तलाशी की बात उठी, अमीर अली ने अपने सैनिकों को आक्रमण का आदेश दे दिया।

अचानक हुए इस विश्वासघात ने किले की सुरक्षा को चीर डाला। भीतर संदेश पहुंचा “अमीर अली ने विश्वास तोड़ा, अब युद्ध अनिवार्य है।” पुरुष थोड़े थे, परंपरा प्रबल थी। साका होना ही था।

परंतु यहां त्रासदी और गहरी थी। सामान्यतः साके में सबसे पहले जौहर होता है। स्त्रियां अग्नि की गोद में समा जाती हैं, फिर पुरुष केसरिया बाना पहन रणभूमि में उतरते हैं। लेकिन इस बार समय शत्रु से भी निर्दयी सिद्ध हुआ। जौहर के लिए क्षण न बचे। महिलाएं बोलीं कि “अग्नि-स्नान का समय नहीं है, हमें तलवारों से काट दिया जाए।” और वैसा ही हुआ।

इसलिए इतिहास ने इस युद्ध को अर्धसाका कहा क्योंकि यहां स्त्रियां अग्नि की ज्वाला में नहीं, बल्कि तलवार की धार पर समर्पित हुईं। केवल पुरुषों ने केसरिया किया। यह विश्वासघात और वीरता का विलक्षण संगम था।

अमीर अली ने किले पर कब्जा कर लिया, पर विजय क्षणभंगुर थी। जैसे ही समाचार राजकुमार मालदेव भाटी तक पहुंचा, वे सेना संग आए और अमीर अली का अंत कर पुनः जैसलमेर की धरा को स्वाभिमान दिलाया।

यह प्रसंग केवल विश्वासघात का इतिहास नहीं, बल्कि चेतावनी है। यह बताता है कि जब राष्ट्र और धर्म के शत्रु छल का सहारा लेते हैं, तब भोलेपन की कीमत रक्त से चुकानी पड़ती है। जो कौम इतिहास से सबक नहीं सीखती, वह न केवल मूर्ख, बल्कि आत्मद्रोही होती है और अंततः अपने ही विनाश का आह्वान करती है।

आज भी यह कथा गूंजती है…
*विश्वास जब वेश बदलकर विष बनता है*
*तब तलवारें ही अंतिम प्रहरी रह जाती हैं*

तिरंगे की तलाश: विदेशी चमक में भटके देशभक्त

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अक्षय कुमार की 2015 की फिल्म एयरलिफ्ट में रणजीत कटियाल का किरदार कहता है, “जो अपने झंडे का सम्मान नहीं करते, जब विदेश में उनके पिछवाड़े पर लात पड़ती है तो सबसे अधिक याद अपने देश की आती है।” यह डायलॉग कुवैत में बसे एक भारतीय पर आधारित है, जो भारत को गालियां देता है, कुवैत की नागरिकता की शान में डूबा है। लेकिन जब 1990 में खाड़ी युद्ध की आग लगती है और उसे वहां से निकाला जाता है, वह घबराहट में तिरंगा तलाशता फिरता है। यह कहानी उन NRIs की आंखें खोलती है, जो विदेश की चमक में अपनी जड़ों को भूल चुके हैं।

देखिए इन ‘ग्लोबल इंडियंस’ को – न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर में सेल्फी, लंदन के ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट पर शॉपिंग, और दुबई की गगनचुंबी इमारतों में सपने। भारत? “ओह, वह तो गंदगी, ट्रैफिक और देसी ड्रामा!” लेकिन 2025 की वैश्विक मंदी ने इनके सपनों पर लात मारी है। नौकरियां छिन रही हैं, वीजा रद्द हो रहे हैं, और अचानक ‘मेक इन इंडिया’ की याद आ रही है। जो कभी ‘मेड इन इंडिया’ को हंसी में उड़ाते थे, अब LinkedIn पर देसी जॉब्स की भीख मांग रहे हैं।

ये वही लोग हैं, जो विदेशी पासपोर्ट की शेखी बघारते थे, लेकिन अब एयरपोर्ट पर सूटकेस में तिरंगा ढूंढ रहे हैं। व्यंग्य यह है कि इनका ‘देशप्रेम’ तब जागता है, जब विदेशी ‘सपना’ टूटता है। लौट रहे हैं, मगर तिरंगा अब भी उनके लिए सिर्फ ‘प्लान बी’ है। सावधान, भाइयों! अगली बार तो शायद तिरंगा भी मुंह फेर ले। घर लौटो, लेकिन इस बार जड़ों को गले लगाओ, न कि सिर्फ जॉब्स की तलाश में भटको।

हेल्थकेयर होराइजन 2.0: 70 फीसदी कैंसर मौतें देर से पहचान के कारण: रोकथाम और शुरुआती स्क्रीनिंग पर दिया जोर

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 विजन के तहत मेडीवेज हेल्थ फाउंडेशन ने नई दिल्ली में हेल्थकेयर होराइजन 2.0 सम्मेलन आयोजित किया। इसमें देशभर के डॉक्टरों, पालिसी मेकर और एक्सपर्ट्स ने भाग लिया। सम्मेलन का मुख्य फोकस प्रिवेंटिव केयर, महिलाओं को अपनी स्वास्थ्य जाँच के लिए प्रोत्साहित करना और अफोर्डेबल हेल्थ सर्विसेज रहा। विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में कैंसर से होने वाली 70 फीसदी मौतें देर से पहचान के कारण होती हैं।

पहले सत्र में डॉक्टरों ने एचपीवी वैक्सीन और शुरुआती स्क्रीनिंग को जरूरी बताया। डॉ. सुदर्शन डे, ग्रुप डायरेक्टर, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, यथार्थ सुपर-स्पेशलिटी हॉस्पिटल ने कहा कि सर्वाइकल कैंसर को वैक्सीन से रोका जा सकता है। वहीं, डॉ. अनिल कुमार धर, क्लिनिकल डायरेक्टर और हेड , मेडिकल ऑन्कोलॉजी, मारेंगो एशिया हॉस्पिटल्स, ने CAR T-Cell Therapy में भारत की प्रगति पर प्रकाश डाला। डॉ. राकेश कुमार, प्रोफेसर और हेड , कैंसर सर्जरी, वीएमएमसी और सफदरजंग हॉस्पिटल ने कहा कि सही जीवनशैली और रोकथाम से कैंसर पर काबू पाया जा सकता है। डॉ. चंद्रिका कंबम, मेडिकल डायरेक्टर , ईवन हेल्थकेयर ने जांच को अफोर्डेबल बनाने के लिए ओपीडी इंश्योरेंस की आवश्यकता को बताया। वहीं डॉ. रश्मि श्रिया, एचओडी, लेप्रोस्कोपिक गायनोकोलॉजी मैश (MASSH) हॉस्पिटल ने महिलाओं से एचपीवी टेस्ट और टीकाकरण कराने की अपील की।

दूसरे सत्र में वर्कप्लेस पर मेन्टल हेल्थ , अफोर्डेबल इन्शुरन्स प्लान और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को हैल्थकेयर के लिए जरूरी बताया । उपस्थित एक्सपर्ट्स का मानना है कि अस्पताल और डॉक्टरों के साथ मानव संसाधन , सीएसआर और पालिसी रिफॉर्म्स भी प्रमुख रोल निभा सकते हैं। इस सत्र में डॉ. रोहित गर्ग, चीफ मेडिकल डायरेक्टर , माइंड वृक्ष; वंदना कामरा – डीजीएम, द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड; जय प्रकाश – चीफ एडवाइजर , एवेनिर हेल्थ (ट्रैक20 प्रोजेक्ट); जयमालिनी रामरत्नम, डायरेक्टर (साउथ एशिया) आईडीपी एजुकेशन लिमिटेड; समारा महिंद्रा – फाउंडर और डायरेक्टर , करियर और अमित लखोटिया – डायरेक्टर (मानव संसाधन ),आर1 आरसीएम ने अपने विचार साझा किये.

सम्मेलन में “बनेगी रील, बचेगी जान” कैंपेन को लांच किया गया, जिसके जरिए युवाओं को सोशल मीडिया पर कैंसर जागरूकता फैलाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

कार्यक्रम के अंत में तीन मुख्य सुझाव सामने आए जिसमें शुरुआती पहचान और वैक्सीनेशन को बढ़ावा देना, कार्यस्थलों पर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना और सीएसआर और बीमा योजनाओं के जरिए इलाज को सस्ता और सुलभ बनाना शामिल था। विशेषज्ञों ने कहा कि विकसित भारत का सपना तभी पूरा हो सकता है जब रोकथाम और वर्कप्लेस वेलनेस को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए।

*पूर्वोत्तर के इस शताब्दी के सबसे बड़े शोक से पूरी तरह बेख़बर है मीडिया*

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दावे के साथ कह सकता हूँ कि मैंने अपने जीवन में किसी कलाकार के लिए यह पागलपन यह प्रेम नहीं देखा जैसा ज़ुबीन को लेकर आसाम और पूर्वोत्तर में है। दो दिन से एक पूरा प्रदेश ग़म में जैसे ठहर सा गया है, गलियाँ-सड़क-चौराहे भरे पड़े हैं उसके रोते-बिलखते चाहने वालों से।

मुख्यमंत्री से लेकर गोद में शिशु लेकर रास्तों पर खड़ी माँएँ उसके गाने गा-गाकर रो रहीं हैं। लेकिन नेशनल मीडिया में किसी ने इस महान कलाकार के अपने लोगों से इस कदर जुड़ाव पर कोई विशेष कार्यकम नहीं किया। खैर ज़ुबीन का काम और नाम इन लोगों की आत्ममुग्धता से बहुत बड़ा है 💔🙏

“तुम्हारी बज़्म से बाहर भी एक दुनिया है,
मेरे हुज़ूर बड़ा जुर्म है ये बेख़बरी…।”

कुमार विश्वास

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