Half-Truths Are More Dangerous Than Falsehood: Prakhar Shrivastava

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Nava Thakuria

Guwahati : Devarshi Narada Jayanti Award Bestowed upon Nava Thakuria; Lakshyajit Gohain, Ranjita Rabha, and Mridul Haloi Felicitated

GUWAHATI: In journalism, the propagation and judgment of half-truths pose a greater danger than outright falsehoods. This significant observation was made by Prakhar Shrivastava, Senior Consulting Editor and Anchor at Delhi Doordarshan Kendra, while delivering the keynote address on the occasion of Narada Jayanti.

Organized under the auspices of the Vishwa Samvad Kendra, Assam on 7 June, the event featured the presentation of the Devarshi Narada Award and a felicitation ceremony. This year, the prestigious Devarshi Narada Award was conferred upon veteran journalist and editor of Ishan Darpan, Nava Thakuria. Additionally, three promising journalists namely Lakshyajyoti Gohain (Senior Journalist, NK TV), Ranjita Rabha (Chief Reporter, Pratham Khabar), and Mridul Haloi (Sub-Editor, Dainik Asam) were accorded special felicitations.

Speaking at the event held at Sudarshanalaya in Barbari locality of Guwahati, Prakhar Shrivastava delivered a factual and profound speech addressing the contemporary socio-political landscape and past historical errors. Shrivastava made significant remarks regarding the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS), which is currently celebrating its centenary year.

“While the media maintains a positive outlook toward the Sangh in today’s altered political landscape, such an attitude was rare in the past. When the media paid scant attention to the Sangh, founded in 1925, the nation was on the brink of partition. At that time, senior Congress leaders from Pakistan’s Sindh province migrated to India with their belongings. During that tumultuous period, RSS swayamsevaks (volunteers) risked their lives to rescue Hindus, Sikhs, and others targeted by fundamentalist attacks in Sindh,” Shrivastava stated.

He further highlighted a historical letter written by the then Defence Minister Baldev Singh to Home Minister Vallabhbhai Patel shortly after independence. Sardar Patel had suggested placing the letter before the Cabinet, which urged the government to cooperate with the Sangh’s efforts to rescue people stranded in peril in Pakistan following the partition.

“Regrettably, these developments fueled resentment in Prime Minister Nehru’s mind. Nehru imposed a ban on the RSS not primarily due to the allegations surrounding Gandhi’s assassination, but rather out of displeasure over the rescue operations conducted by the Sangh in Pakistan during partition,” Shrivastava remarked significantly. He added, “The first incident of mass lynching in independent India occurred in the wake of Gandhi’s assassination. This mass violence was perpetrated by a section of self-proclaimed Gandhians, and its first casualties were Dr Narayan Savarkar including the family of Veer Savarkar, who became the first in the country to pay the price of mass lynching.”
Shrivastava also commented on the influx of immigrants since the era of Sir Syed Muhammad Sadullah, demographic changes in Assam, and the roles played by Moinul Hoque Choudhury and Fakhruddin Ali Ahmed. The solemn ceremony witnessed the presentation of the ‘Devarshi Narada Award’ to Nava Thakuria, which carried a cash prize of ₹50,000, a seleng sador (traditional stole), a citation, a portrait of Bharat Mata, and a bundle of valuable books.

In his speech, Thakuria remarked that Narada, who created engagement through incisive questioning and well-meaning counsel, remains a guiding light for journalism today. He emphasized that the credibility of the mythological character Narada is immensely relevant to contemporary journalism. Thakuria also pointed out that the western model of institutionalized, individual-centric journalism has adversely affected India’s culturally rooted and nature-centric news values.

At the commencement of the program, Kishore Shivam, Secretary of Vishwa Samvad Kendra, presented a brief overview of Devarshi Narada, depicting him as the seeker of knowledge and the eradicator of flaws. Shivam noted that a deeper research into Narada’s 84 Bhakti Sutras could enrich the aims and objectives of modern journalism.

The event also featured the unveiling of a souvenir, alongside a captivating rendition of Saraswati Vandana by Tribeni Bujarbaruah. Dr Gouranga Sarma, President of Vishwa Samvad Kendra, also addressed the gathering. The meeting, anchored by Naba Bujarbaruah, concluded with a vote of thanks delivered by Guru Prasad Medhi. The event was attended by over three hundred people representing various sections of society.

भारतीय क्रिकेट का नया युग – श्रेयस और वैभव बनेंगे पहचान

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दिल्ली । वर्ष- 2026 भारतीय क्रिकेट में बड़े बदलाव के लिये याद किया जाएगा । आईपीएल -2026 की समाप्ति के बाद भारतीय क्रिकेट टीम में कप्तान से लेकर खिलाड़ियों के चयन तक में व्यापक बदलाव हो गया है। मात्र 15 वर्ष की आयु में ही अपनी बल्लेबाजी से सभी को रोमांचित कर देने वाले आक्रामक युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी को को टीम में जगह मिल गई है। वैभव को एशियन गैम्स के साथ आयरलैंड व इंग्लैंड के विरुद्ध होने वाली टी -20 श्रृंखला के लिए चुना गया है। वैभव ने मात्र 15 वर्ष ओर 71 दिन की आयु में राष्ट्रीय टीम में अपना स्थान बनाया है। यदि वैभव को आगामी श्रृंखलाओं में खेलने का अवार मिलता है तो वह सचिन तेंदुलकर का 37 वर्ष पुराना रिकार्ड तोड़ देंगे । सचिन ने 16 वर्ष 205 दिन में पाकिस्तान के विरुद्ध 1989 में टीम में पदार्पण किया था। वैभव ने आईपीएल में कई शानदार व यादगार पारियां खेली जिस कारण टीम प्रबंधन उन्हें भविष्य के खिलाड़ी के रूप में देख रहा है। वैभव ने 12 वर्ष की उम्र से ही रणजी ट्राफी में अपना करिश्मा दिखाना आरम्भ कर दिया था । 27 मार्च 2011 को बिहार के समस्तीपुर के ताजपुर में जन्मे वैभव का बल्ला बचपन से ही आग उगलता था। पटना एअरपोर्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आशीर्वाद लेने के बाद तो वैभव सोशल मीडिया की भी चर्चा का विषय बन गए थे।

पार्थिव पटेल, हरभजन सिंह, मनिंदर सिंह और विजय मेहरा जैसे युवा खिलाड़ी भी कम आयु में ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण कर नाम और यश कमा चुके हैं । एक समय वैभव की तरह खेलने वाले सलामी बल्लेबाज पृथ्वी शॉ का भी नाम हुआ करता था, उन्हें भी टीम प्रबंधन ने कई अवसर दिए थे किंतु आज वह खेल परिदृश्य से ही बाहर हो चुके हैं। अब वैभव का सामना वास्तविक क्रिकेट से होने जा रहा है, साथ ही विदेशी धरती के मैदान भी अलग होते हैं। अब वैभव को वैश्विक क्रिकेट में अपने आपको साबित करना है।

अपने पहले ही आईपीएल- 2026 में राजस्थान रॉयल्स के लिए खेलते हुए वैभव ने 16 मैचों में 775 रन बनाकर आरेंज कप जीता था और पूरे सीजन में 72 छक्के जड़कर वेस्टइंडीज के क्रिस गेल के एक सीजन में सबसे अधिक छक्कों का रिकार्ड भी तोड़ दिया था । अब देखना है क्या वो ऐसे ही करिश्मे विदेश की धरती पर भी करेंगे ? कुछ लोग वैभव की तुलना अभी से ही सचिन और सहवाग से करने लगे हैं जो अनुचित है और एक उभरती प्रतिभा के ऊपर मानसिक दबाव डालने जैसा है। अभी तो वैभव के कैरियर की शुरुआत भर हो रही है अतःअभी केवल सकारात्मक भाव व सोच के साथ वैभव के खेल का आनंद लेना चाहिए और उसे पूरा अवसर देना चाहिए।

वर्ष- 2026 की आगामी श्रृखलाओं के लिए टीम को श्रेयस अय्यर के रूप में नया कप्तान भी मिल गया है जबकि युवा बल्लेबाज तिलक वर्मा को उपकप्तान बनाया गया है। ऐसा करके भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने सभी खिलाड़ियों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भारतीय टीम मे अब केवल उन्हीं खिलाड़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा जिनका प्रदर्शन लगातार उत्कृष्ट रहेगा।

श्रेयस की दमदार वापसी – दिसंबर -2023 से विभिन्न कारणों से बाहर चल रहे श्रेयस की कप्तान के रूप में वापसी किसी आश्चर्य से कम नहीं है।आईपीएल में उनकी नेतृत्व क्षमता व लगातार अच्छे प्रदर्शन के चलते टीम प्रबंधन उनसे प्रभवित हुए बिना नहीं रह सका और अनेक दावेदारों को पछाड़ते हुए श्रेयस कप्तान के रूप में पहली पसंद बनकर उभरे। श्रेयस ने 2024 में कोलकाता नाइट राइडर्स को आईपीएल का चैपिंयन बनाया और उसके बाद पंजाब किंग्स को फाइनल की राह दिखाई थी। श्रेयस ने लगातार दो बार आईपीएल के सफल सत्र खेले और अपने बल्ले से दमदार प्रदर्शन किया।
धैर्य व नेतृत्व का नया चेहरा बकर उभरे श्रेयस ने 914 दिन बाद टीम में वापसी की वह भी कप्तान के रूप में। सरपंच जी नाम से लोकप्रिय श्रेयस की टीम में वापसी प्रेरणादायक है क्योंकि आमतौर पर क्रिकेट अब एक ऐसा खेल बन गया है जहां प्रतिभाओं की कोई कमी नही रह गई है । ऐसे में अगर किसी भारतीय क्रिकेटर के जीवन में इतना उतार -चढ़ाव, संघर्ष के बाद सकारात्मक बदलाव देखने को मिलता है तो वह श्रेयस अय्यर ही हैं। जब कभी उन्हें किसी कारणवश टीम से अंदर -बाहर किया गया तब वह सोशल मीडिया से दूर रहे और किसी भी प्रकार की बयानबाजी नहीं की वरन अपने खेल को निखारने में ही लगे रहे जिसका उन्हें सुखद पुरस्कार मिला।

क्रिकेट के मैदान के ये बदलाव उम्मीद दिलाते हैं भारतीय क्रिकेट टीम विजय पथ पर अग्रसर रहेगी। एक समय रणजी जैसी घरेलू प्रतियोगिताओं मे बेहतर प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को टीम चयन में प्राथमिकता दी जाती थी किंतु अब टीम में चयन का एक और आधार आईपीएल भी बन गया है।

सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वयंसेवकों का योगदान

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— कैलाश चन्द्र

दिल्ली । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। इसमें अनेक संगठन, विचारधाराएँ, क्रांतिकारी, समाजसुधारक और लाखों सामान्य नागरिक सम्मिलित रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के इस महान यज्ञ में अनेक ऐसे व्यक्तित्व और संगठन भी थे जिन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया, किंतु अपने कार्य का प्रचार या श्रेय लेने का आग्रह नहीं किया। “सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया” यह वाक्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति और उसके स्वयंसेवकों की कार्यसंस्कृति को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की। डॉ. हेडगेवार स्वयं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सेनानी थे। उन्हें अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आंदोलनों में भाग लेने के कारण दो बार एक-एक वर्ष का सश्रम कारावास भुगतना पड़ा। पहली बार असहयोग आंदोलन के दौरान और दूसरी बार सविनय अवज्ञा आंदोलन के अंतर्गत जंगल सत्याग्रह में सहभागिता के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। जंगल सत्याग्रह में संघ के लगभग 150 स्वयंसेवकों ने भी सक्रिय भागीदारी की थी। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि संघ का स्वतंत्रता संघर्ष से संबंध केवल वैचारिक नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष सहभागिता का भी था।

स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों में संघ के अनेक स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से सक्रिय रहे। विशेष रूप से 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ के अनेक प्रचारक और कार्यकर्ता विभिन्न क्षेत्रों में भूमिगत गतिविधियों, जनसंपर्क, संगठन तथा आंदोलन के संचालन में जुड़े। उस समय संघ एक नवोदित संगठन था, फिर भी उसके स्वयंसेवकों ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए अपना योगदान दिया।

स्वाधीनता संघर्ष के दौरान जिन स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई, उनमें राजस्थान के जयदेवजी पाठक का नाम उल्लेखनीय है, जो आगे चलकर विद्या भारती के कार्य में सक्रिय रहे। विदर्भ के आर्वी क्षेत्र में डॉ. अण्णासाहब देशपांडे ने राष्ट्रजागरण का महत्वपूर्ण कार्य किया। छत्तीसगढ़ के जशपुर क्षेत्र में रमाकांत केशव (बालासाहब) देशपांडे ने समाज जागरण और संगठन निर्माण का कार्य किया तथा आगे चलकर वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की, जिसने वनवासी समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दिल्ली में वसंतराव ओक ने स्वतंत्रता आंदोलन के कालखंड में महत्वपूर्ण कार्य किया। बाद में वे दिल्ली के प्रांत प्रचारक बने और संगठन विस्तार में उनका बड़ा योगदान रहा। बिहार में प्रसिद्ध अधिवक्ता कृष्ण वल्लभ प्रसाद नारायण सिंह, जिन्हें स्नेहपूर्वक “बबुआजी” कहा जाता था, स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और बाद में बिहार के संघचालक बने। इसी प्रकार दिल्ली के चंद्रकांत भारद्वाज स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गोली लगने से घायल हुए। उनके पैर में धँसी गोली जीवनभर नहीं निकाली जा सकी। बाद में वे एक प्रसिद्ध कवि बने और अनेक प्रेरणादायी संघ गीतों की रचना की।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में माधवराव देवड़े ने राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आगे चलकर वे प्रांत प्रचारक बने। मध्य प्रदेश के उज्जैन क्षेत्र में दत्तात्रेय गंगाधर (भैयाजी) कस्तूरे का भी स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय योगदान रहा। इन सभी कार्यकर्ताओं की विशेषता यह थी कि उन्होंने राष्ट्रकार्य को व्यक्तिगत यश और प्रसिद्धि से ऊपर रखा।
स्वतंत्रता संग्राम में संघ परंपरा से जुड़े अनेक अन्य व्यक्तित्व भी उल्लेखनीय हैं। दैवी पंथ चौधरी, जगतपति कुमार, अण्णासाहब देशपांडे, रमाकांत केशव देशपांडे, वसंतराव ओक, नारायण सिंह, मुकुन्द हूद्दार, चंद्रकांत भारद्वाज, दादानाईक चिमूर, बाबूराव बेगड़े, लाला हंसराज तथा बालाजी रायपुरकर जैसे अनेक नाम स्वतंत्रता संघर्ष के विविध अध्यायों से जुड़े रहे। इनमें से कई व्यक्तित्वों ने जेल यात्राएँ कीं, अनेक ने संगठनात्मक कार्य संभाला और कुछ ने प्रत्यक्ष संघर्षों में भाग लेकर राष्ट्रीय चेतना को सशक्त बनाया।

विशेष रूप से हेमू कालाणी का बलिदान भारतीय युवाशक्ति के साहस का अनुपम उदाहरण है। सिंध के इस युवा क्रांतिकारी ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। इसी प्रकार राजाभाऊ महाकाल का बलिदान भी राष्ट्रभक्ति और त्याग का प्रेरक प्रसंग है। इनका स्मरण हमें यह बताता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि अनगिनत बलिदानों की परिणति थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी राष्ट्रीय एकीकरण का कार्य समाप्त नहीं हुआ था। गोवा, दमन और दीव अभी भी पुर्तगाली शासन के अधीन थे। इन क्षेत्रों की मुक्ति के लिए चले आंदोलनों में भी अनेक स्वयंसेवकों ने भाग लिया। मास्टर गोविंद तथा मोहन रानाडे जैसे कार्यकर्ताओं ने गोवा मुक्ति आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। यह संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता की अवधारणा केवल 1947 तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत की पूर्ण राष्ट्रीय एकता और अखंडता तक विस्तारित थी।

संघ की कार्यपद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की बजाय राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण का संस्कार दिया। संघ के स्वयंसेवकों ने अनेक क्षेत्रों में कार्य किया, परंतु अधिकांश ने अपने योगदान का प्रचार नहीं किया। उनका विश्वास था कि यदि समाज जागृत और संगठित होगा तो राष्ट्र स्वतः सशक्त बनेगा। इसीलिए संघ की परंपरा में श्रेय प्राप्ति की अपेक्षा कर्तव्यपालन को अधिक महत्व दिया गया।

आज जब सार्वजनिक जीवन में छवि-निर्माण, प्रचार और त्वरित प्रसिद्धि को अत्यधिक महत्व दिया जाता है, तब “सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया” का आदर्श विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह दृष्टिकोण बताता है कि राष्ट्रनिर्माण का कार्य किसी एक व्यक्ति या संगठन का नहीं, बल्कि पूरे समाज का सामूहिक दायित्व है। जो व्यक्ति या संगठन समाज को संगठित कर, प्रेरित कर और आगे बढ़ाकर स्वयं पीछे रहने की क्षमता रखता है, वही दीर्घकालीन परिवर्तन का आधार बनता है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अध्ययन करते समय आवश्यक है कि हम उसके सभी आयामों को समझें। यह इतिहास केवल प्रसिद्ध नेताओं का इतिहास नहीं है; यह उन हजारों ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं का भी इतिहास है जिन्होंने राष्ट्रहित में अपना सर्वस्व समर्पित किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके स्वयंसेवकों का योगदान भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। उनके कार्यों का मूल संदेश यही था कि राष्ट्र सर्वोपरि है, समाज ही शक्ति का स्रोत है, और सेवा का सर्वोच्च रूप वह है जिसमें सहभागिता तो हो, परंतु श्रेय की अपेक्षा न हो।
“सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि राष्ट्रजीवन में विनम्रता, समर्पण, संगठन और कर्तव्यनिष्ठा का एक स्थायी आदर्श है। यही आदर्श स्वतंत्रता संग्राम के अनेक स्वयंसेवकों के जीवन में दिखाई देता है और यही आदर्श आज भी राष्ट्रनिर्माण की दिशा में प्रेरणा प्रदान करता है।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

निकोला टेस्ला पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव

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(आगामी एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की बैठक की रिपोर्ट)


दिल्ली । आज सायंकाल चार बजे कंस्टीट्यूशनल क्लब ऑफ इंडिया में 
भारत-क्रोएशिया के मैत्री, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक आदान प्रदान हेतु बैठक का आयोजन किया गया । इस बैठक में क्रोएशिया वैज्ञानिक निकोला टेस्ला पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव विषय पर आयोजित होने वाले एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की गतिविधियों पर विचार विमर्श किया गया । यह सम्मेलन भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय मंत्री माननीय संजय पासवान जी के संरक्षण में सम्पन्न होगा । इस सम्मेलन में भारत सरकार के महत्वपूर्ण पदाधिकारी व क्रोएशिया के प्रतिनिधि मंडल भाग ले सकते हैं ।

स्वामी विवेकानंद की वैश्विक आध्यात्मिक विचारधारा और निकोला टेस्ला की वैज्ञानिक प्रतिभा दोनों देशों के बीच पुल का काम करती हैं।1890 के दशक में न्यूयॉर्क में स्वामी विवेकानंद और निकोला टेस्ला की भेंट हुई थी । विवेकानंद जी ने टेस्ला को वेदांत दर्शन, प्राण (ऊर्जा) और आकाश (मूल पदार्थ) की अवधारणाओं से परिचित कराया। टेस्ला ने बाद में अपनी रचनाओं में इन संस्कृत शब्दों का उपयोग किया और ब्रह्मांड को गतिशील ऊर्जा प्रणाली के रूप में देखा। टेस्ला की वैकल्पिक धारा (AC), वायरलेस ऊर्जा संचरण और मुक्त ऊर्जा की अवधारणाओं पर वेदांतिक विचारों का प्रभाव पड़ा ।

इस सम्मेलन के कारण संभवतः स्वामी विवेकानंद के दर्शन और टेस्ला की वैज्ञानिक उपलब्धियों का संयोजन भारत-क्रोएशिया संबंधों को नई ऊंचाई दे सकता है। साथ ही दोनों देशों के बीच विज्ञान, प्रौद्योगिकी, संस्कृति और शिक्षा क्षेत्र में नियमित आदान-प्रदान बढ़ाया जा सकता है।
इस बैठक में कार्यकम संयोजन समिति के अध्यक्ष श्री अनूप पांडेय जी, स्वागत समिति के अध्यक्ष प्रो. पीयूष जैन जी, सचिव डॉ. सुशील द्विवेदी जी तथा आयोजन समिति के सदस्य- श्री हरदेव सिंह जी, श्री अरुण उपाध्याय जी, श्री मंजीत चौधरी जी , डॉ. विभा नायक जी , श्री शुभनीत चौधरी जी आदि उपस्थित थे।

यह कार्यक्रम 10 जुलाई 2026 को कंस्टीट्यूशनल क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित किया जाएगा ।

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