कचरा उत्सर्जन में न्यूनता से पर्यावरण संरक्षण

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संजय स्वामी

दिल्ली । जून 1973 में प्रथम बार विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। वर्ष 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम सम्मेलन में इस दिवस को मनाने की घोषणा की थी। उद्देश्य स्पष्ट था कि दुनिया के सभी देश अपनी भौगोलिक सीमाओं के दायरे से निकल इस पृथ्वी के लिए विचार करें। लोग अपने संकुचित मानसिक घरोंदो से बाहर आएं, हम सभी की केवल एक पृथ्वी (ओनली वन अर्थ) इस तत्व को समझें।

पृथ्वी तो एक ही है। पंछियों के लिए पूरा आकाश एक है। अपनी आदतें, व्यवहार तथा क्षमता से वे अपना आवास तथा परिमंडल निश्चित करते हैं। गौरैया, मोर आदि भोजन की तलाश में बहुत लंबी दूरी तय नहीं करते। ग्रामीण क्षेत्रों में मनुष्य के आसपास ही अपना वास रखते हैं। दूसरी ओर साइबेरिया के सारस हजारों मील की यात्रा करते हैं। विशिष्ट मौसम में जब साइबेरिया में बहुत अधिक सर्दी बढ़ जाती है। तापमान माइनस – 50 डिग्री पहुंच जाता है तब वे भारत जैसे क्षेत्रों की ओर उड़ान भरते हैं। हजारों मील लंबी यात्रा करके भारत के दलदलीय क्षेत्रों, झीलों में सर्दी प्रारंभ होने से पूर्व अक्टूबर नंबर माह में आते हैं तथा कुछ महीने वास कर मौसम बदलने पर जब यहां फरवरी मार्च में ग्रीष्म ऋतु का आगमन प्रारंभ होता है, वापस लौट जाते हैं। सदियों से यह क्रम चल रहा है। उनके लिए पूरा आकाश सम्पूर्ण पृथ्वी एक घर जैसा है। इसलिए प्रकृति से ही प्रेरणा लें।
प्रकृति अपना नियोजन करने में समर्थ है। मनुष्य को स्वार्थी कहा गया है। कोई बात नहीं, स्वार्थ के वशीभूत ही सही, वह अपने भविष्य के लिए सजग हो। भावी पीढ़ी के प्रति दायित्व को समझे। उनके भविष्य का चिंतन करते हुए पर्यावरण के लिए अपनी आवश्यकताओं को मर्यादित करे।

पुरातन राजतंत्रिक व्यवस्था में राजाओं ने अपनी ताकत से भूमंडल को सीमाओं में बांट लिया। आधुनिक कालखंड की लोकप्रिय लोकतांत्रिक प्रणाली में भी यह निश्चित सीमाओं में बंधी हुई है। दुनिया में लगभग 200 देश हैं। सभी की एक निश्चित सीमा है। साम्राज्यवादी प्रवृति में कोई सीमा नहीं थी। राजतंत्र था प्राकृतिक संसाधनों से देश संपन्न थे। एक दूसरे की धन सम्पदा को लूटने के उद्देश्य से आक्रमण करते थे। बलात प्राकृतिक संसाधनों पर आधिपत्य स्थापित करते थे। वर्तमान यूक्रेन-रूस या इजरायल-इराक संघर्ष भी प्राकृतिक संसाधनों के बलात आधिपत्य के लिए ही है।
प्रतिवर्ष विश्व पर्यावरण दिवस आता है और चला जाता है। धीरे-धीरे विश्व के लगभग सभी देश इस अवसर पर पर्यावरण के प्रति कुछ नए संकल्प लेते हैं, कुछ नई योजनाएँ बनाते हैं। कहीं पौधारोपण होता है, तो कहीं संगोष्ठी-सेमिनारों का आयोजन। किंतु संकल्प की स्याही सूखते ही सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। वही धुआँ, वही कचरा, वही कटते वृक्ष, मानो विश्व पर्यावरण दिवस मनाना एक औपचारिकता मात्र है, कोई दायित्व बोध नहीं। इस वर्ष एक बार, कुछ क्षण के लिए, दैनिक कार्य-व्यवहार और व्यापार को एक ओर रख कर शांत चित्त से बैठिए, प्रकृति की ओर निहारिए। अपने आसपास के वृक्षों, पौधों, झाड़ियों से मौन संवाद करिए। कुछ पल नदियों के कल-कल निनाद की व्यथा सुनिए। पहाड़ों के मौन आर्तनाद को अनुभव करने का प्रयास करें। जिस धरती ने हमें अन्न दिया, जल दिया, वायु दी, उसके प्रति हमारी कृतज्ञता केवल किसी एक दिन विशेष की नहीं होनी चाहिए। पर्यावरण-चेतना हमारी जीवनशैली बने, केवल नारा नहीं। प्रकृति मनुष्य की सेवक नहीं, वह मानव की जीवनदात्री माँ है।

विश्व पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष हमें हमारे भविष्य के प्रति सचेत होने का संकेत देता है। प्रतिवर्ष ग्रीष्म ऋतु की तपिश बढ़ती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप एसी-कूलर आदि वातानुकूलन यंत्रों की माँग निरंतर बढ़ रही है। मानवीय उपयोग हेतु जल की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। भवन-निर्माण और उद्योगों में पानी की खपत अपरिमित है। भूजल स्तर प्रतिवर्ष नीचे जा रहा है। वर्षाकाल को छोड़ दें तो बारहमासी नदियों का जल प्रवाह भी क्षीण होता जा रहा है। कभी विशाल कही जाने वाली झीलें आज न जल-मात्रा में विशाल हैं और न ही क्षेत्रफल की दृष्टि से विस्तृत। तालाबों का स्थान स्विमिंग पूल ने ले लिया और कुएँ अब बोरवेल-समर्सिबल में रूपांतरित हो गए। गाँव की बावड़ियाँ, जो सैकड़ों प्राणियों की प्यास बुझाती थीं वह आज मलबे और कचरे से भर चुकी हैं। तालाब, बावड़ी, पोखर, झील और नदियाँ, जो लाखों जीव-जंतुओं के लिए थे, मनुष्य ने उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार रूपांतरित कर लिया। वन-क्षेत्र के सिकुड़ने लगे। वन-वृक्षों के कटने से जंगली जीव भटककर आवासीय क्षेत्रों में प्रवेश करने लगे हैं। विशाल वृक्षों की घटती संख्या से पक्षी विलुप्त हो रहे हैं। झीलों में जलस्तर घटने से जलीय जीवों की संख्या न्यून होती जा रही है। मिट्टी की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। अंधाधुंध रासायनिक खादों और कीटनाशकों के उपयोग से भूमि की जीवंतता नष्ट हो रही है। वह मिट्टी, जिसमें करोड़ों सूक्ष्मजीव प्रति वर्ग इंच निवास करते थे और फ़सल को जीवन देते थे, अब बंजर होती जा रही है। खेत अधिक उपज दे रहे हैं, पर वह उपज पोषण से रहित है। मनुष्य अन्न खा तो रहा है, पर भूखा ही रह रहा है।

आज के युग में आविष्कारक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि उद्योगपति और विज्ञापन कंपनियाँ हैं। बाज़ारवाद ने सर्वत्र कचरे का अंबार लगा दिया है। इसका एक कारण कि प्रत्येक वस्तु पैकिंग में बिकती है, जन्म से लेकर मृत्यु तक। अस्पताल से घर आने वाले शिशु का पालना प्लास्टिक की पैकिंग में है, और अंतिम विदाई के समय शमशान भूमि तक सामग्री पॉलिथीन की थैलियों में जाती है। त्योहारों और उत्सवों का भी यही हाल है। आज पर्यावरण के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, अत्यधिक उपभोग और उससे उत्पन्न कचरा। बाजारवाद ने सुविधा तो दी है, परंतु पैकेजिंग संस्कृति ने कचरे का पहाड़ खड़ा कर दिया है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन का लगभग प्रत्येक उत्पाद प्लास्टिक, थर्मोकोल या अन्य अजैविक सामग्री में पैक होकर आता है। प्रकृति का निर्माण केवल मनुष्य के लिए नहीं हुआ है। नदियाँ, झीलें, वन और पर्वत असंख्य जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों के जीवन का आधार हैं। किंतु आधुनिक विकास मॉडल में अक्सर केवल मानवीय आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जाती है। प्रकृति, पर्यावरण और समस्त जीव-जंतु अब मनुष्य से यही अपेक्षा करते हैं कि वह केवल अपने को ही संभाल ले। वन और जंगलों पर अतिक्रमण करना कम करे। अपनी भोगवादी प्रवृत्ति को नियंत्रित करे। जनसंख्या के अनियंत्रित विस्तार पर विचार करे। व्यक्तिगत स्तर पर छोटे-छोटे निर्णय बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। कपड़े का थैला लेकर बाज़ार जाइए। बोतलबंद पानी की जगह अपनी पुनः उपयोगी बोतल साथ रखिए। घर की रसोई से निकला जैविक कचरा गमले की खाद बने। त्योहारों पर मिट्टी की मूर्तियाँ खरीदिए, प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की नहीं। ये निर्णय क्रांति नहीं, किंतु इन्हीं से क्रांति का आरंभ होता है।

विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि पृथ्वी को बचाने का अर्थ केवल भाषण देना या पौधे लगाना नहीं है। वास्तविक परिवर्तन हमारी जीवनशैली, उपभोग की आदतों और विकास की अवधारणाओं में निहित है। सत्य को ग्रहण करें, अविवेक का त्याग करें और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन की ओर बढ़ें। यही विश्व पर्यावरण दिवस का सबसे बड़ा संकल्प हो सकता है। सत्य यही है कि पर्यावरण दिवस पर भाषण देने से नहीं, बल्कि प्रतिदिन की छोटी-छोटी आदतों को बदलने से हमारी पृथ्वी बचेगी। धरती माँ के आंचल को मैला होने से बचाने के लिए अपना थैला व पानी बोतल साथ रखें। एक वृक्ष का रोपण-पोषण स्वयं करें। एक जागरूक नागरिक बन पर्यावरण संरक्षण का संदेश परिवारों, विद्यालयों और जनमानस के साथ साझा करें, समाज को प्रेरित करें। इस पर्यावरण दिवस पर अपनी दैनिक गतिविधियों में कचरा उत्सर्जन न्यून करने का संकल्पित विचार करें।

आंदोलनों का गिरता स्तर: सौरव दास, आशुतोष रंका, विजेता दहिया और अभिजीत दीपके की सच्चाई और सच्चे आंदोलन का अर्थ

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दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र में आंदोलन हमेशा से परिवर्तन का माध्यम रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर किसान आंदोलनों तक, जमीनी संघर्ष ने समाज को दिशा दी। लेकिन आजकल सोशल मीडिया के युग में आंदोलन वायरल ट्रेंड बन गए हैं। नाम है “कॉकरोच जनता पार्टी” (CJP)। 6 जून को दिल्ली में प्रदर्शन का ऐलान किया गया है। इसके चेहरे बने हैं सौरव दास, आशुतोष रंका, विजेता दहिया और अभिजीत दीपके। ये चारों कौन हैं? इनका बैकग्राउंड क्या है? और सबसे महत्वपूर्ण – क्या ये सच्चे आंदोलनकार हैं या डिजिटल हाइप पर सवार होकर युवाओं को नई राह दिखाने का दावा कर रहे हैं?

सबसे पहले इन चारों को समझते हैं। सौरव दास खुद को इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट बताते हैं। RTI फाइलिंग और ज्यूडिशरी, गवर्नेंस पर लेखन उनका मुख्य काम रहा है। उन्होंने कारवां में चीफ जस्टिस पर स्टोरी की है। हाल में उन्हें Young India Foundation का पुरस्कार मिला – “2024 के चुनाव को रूपांतरित करने वाले 30 युवा”। यह संस्था मारवाड़ी यूनिवर्सिटी से जुड़ी है, जो गुजरात में वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन जैसी पहलों से जुड़ी रही है। कुछ रिपोर्ट्स में बोस्टन की Walter Shufain फर्म से फंडिंग की चर्चा भी है, हालांकि इसे “नागरिक स्वतंत्रता” के नाम पर बताया जाता है।

आशुतोष रंका IIT कानपुर और LSE के पूर्व छात्र हैं। उन्होंने McKinsey & Company में काम किया है – वो ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म जो सरकारों की नीतियों, यहां तक कि राजनीतिक परिवर्तनों में भूमिका के लिए चर्चित (और विवादित) रही है। दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, फ्रांस और चीन से जुड़े विवाद McKinsey के नाम से जुड़े रहे हैं। अब ये “युवा आंदोलन” के प्रवक्ता बन गए हैं।

विजेता दहिया पॉलिटिकल रिसर्चर, राइटर और फिल्ममेकर हैं। ये ध्रुव राठी के स्क्रिप्ट और रिसर्च से जुड़े बताए जाते हैं। उनके काम में सोशल-राजनीतिक कमेंट्री प्रमुख है।

अभिजीत दीपके (Abhijeet Dipke) CJP के फाउंडर हैं। बोस्टन में पढ़ाई, AAP से पुराना कनेक्शन (2020-2023 तक सोशल मीडिया और कैंपेन स्ट्रैटजी), और अब US से लौटकर “आंदोलन” लीड करने का दावा। CJI सुर्यकांत के “कॉकरोच” वाले बयान को लेकर यह सैटायरिकल मूवमेंट शुरू हुआ, जो अब NEET पेपर लीक, एग्जाम घोटालों और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर दिल्ली में उतर रहा है।

ये चारों 6 जून को संसद मार्ग/जंतर मंतर पर प्रदर्शन की बात कर रहे हैं। लेकिन बुनियादी सवाल उठता है — क्या इन्होंने कभी UPSC, NEET या कोई बड़ी प्रतियोगी परीक्षा खुद फेस की? जमीनी स्तर पर किसान, मजदूर या बेरोजगार युवाओं के साथ कितना समय बिताया? RTI और McKinsey का अनुभव आंदोलनकारिता के लिए पर्याप्त है क्या?

आंदोलनों का गिरता स्तर

2011 का अन्ना आंदोलन याद कीजिए। लोकपाल बिल की मांग, भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्सा। लेकिन परिणाम? राजनीतिक दल बने, कुछ नेता उभरे, लेकिन सिस्टम में गहरी बदलाव नहीं आया। कई लोग इसे “मिडिल क्लास का उफान” कहते हैं जो बाद में राजनीतिक महत्वाकांक्षा में बदल गया।

फिर किसान आंदोलन (2020-21)। लाखों किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे। कुछ मांगें मानी गईं, लेकिन समाज दो हिस्सों में बंट गया। एक तरफ जमीनी संघर्ष, दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर नरेटिव वॉर। शाहीन बाग – CAA-NRC के खिलाफ महिलाओं का शांतिपूर्ण धरना। लेकिन इसे भी “वोट बैंक पॉलिटिक्स” का आरोप लगा। परिणाम? पोलराइजेशन बढ़ा, विश्वसनीयता घटी।

अब “कॉकरोच आंदोलन”। एक CJI के बयान से शुरू, वायरल हुआ, लेकिन जमीनी जुड़ाव की कमी साफ दिखती है। राजद सांसद मनोज झा से कांस्टीट्यूशनल क्लब के लिए पत्र बनवाने का मामला धोखे का आरोप लगा। सभी प्रमुख दल दूरी बना रहे हैं। बिना अनुमति (या देरी से) संसद मार्ग पर भीड़ जुटाने की बात हो रही है – जबकि प्रदर्शन की अनुमति 2-3 दिन पहले ली जाती ह- इससे अराजकता का खतरा बढ़ता है।

सच्चा आंदोलन क्या होता है?

जमीनी जुड़ाव: गांव-कस्बों में काम करने वाले कार्यकर्ता, जो सालों से बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य पर संघर्ष कर रहे हैं।
त्याग और निरंतरता: एक दिन का वायरल प्रोटेस्ट नहीं, बल्कि लंबा संघर्ष।
स्पष्ट मांगें और रणनीति: बिना प्लानिंग के भीड़ जुटाना युवाओं का करियर बर्बाद कर सकता है — गिरफ्तारी, केस, शिक्षा प्रभावित।
स्वतंत्रता: विदेशी फंडिंग, कॉर्पोरेट बैकग्राउंड या राजनीतिक कनेक्शन के आरोपों से मुक्त।
आज की समस्या यह है कि समाज जमीनी आंदोलनकारियों की सुध नहीं लेता, लेकिन वायरल चेहरों को हीरो बना देता है। RTI एक्टिविस्ट अच्छा काम है, लेकिन क्या वो किसान के खेत या बेरोजगार युवा के दर्द को समझता है? McKinsey का कंसल्टेंट सिस्टम को बदलने का दावा कैसे कर सकता है, जबकि उसी सिस्टम का हिस्सा रहा है? ध्रुव राठी जैसे यूट्यूबर्स के स्क्रिप्ट राइटर का ‘आंदोलन’ कितना ऑथेंटिक होगा?

युवाओं को सावधान रहना चाहिए। 2011 में अन्ना आंदोलन में शामिल कई युवा बाद में निराश हुए। नेपाल का हालिया उदाहरण भी याद रखें – लोकप्रिय उफान अक्सर राजनीतिक ट्रैप बन जाता है। आजमगढ़ जैसे इलाकों में पुलिसिया उत्पीड़न के खिलाफ असली संघर्ष चल रहा है, वहां जमीनी कार्यकर्ता जोखिम उठा रहे हैं। वायरल “कॉकरोच” पोस्टर लेकर सड़क पर उतरना आसान है, लेकिन लंबा साथ देना मुश्किल।

सच्चे आंदोलन का अर्थ

सच्चा आंदोलन संविधान की भावना पर चलता है – शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक, कानून का सम्मान करते हुए। Article 19(1)(b) प्रदर्शन का अधिकार देता है, लेकिन यह निरपेक्ष नहीं। अनुमति, शांति बनाए रखना जरूरी है। बिना प्लानिंग भीड़ जुटाना अराजकता पैदा करता है, जो आंदोलन की विश्वसनीयता खत्म कर देता है।आंदोलन तब सार्थक होते हैं जब:

मांगें स्पष्ट और व्यावहारिक हों (NEET सुधार अच्छी मांग है, लेकिन सिर्फ इस्तीफा काफी नहीं)।
नेतृत्व क्रेडिबल हो, न कि संदिग्ध बैकग्राउंड वाला।
युवाओं को सशक्त बनाए, न कि फंसाए।
मीडिया ट्रायल या वायरल हाइप से ऊपर उठकर संवाद करे।
आज शिक्षा व्यवस्था में गंभीर समस्याएं हैं – पेपर लीक, कोचिंग माफिया, बेरोजगारी। इनका समाधान जमीनी स्तर पर नीति परिवर्तन, पारदर्शिता और जवाबदेही से आएगा। वायरल सैटायर से नहीं।

ये चारों अगर सच्चे हैं तो पहले अपने बैकग्राउंड खोलें – परीक्षाएं दीं या नहीं, फंडिंग का स्रोत क्या, राजनीतिक कनेक्शन क्या। युवाओं को धोखे में रखकर करियर बर्बाद न करें। समाज को भी सोचना होगा – असली संघर्ष करने वालों को सपोर्ट करो, वायरल हीरो बनाकर मत फंसाओ।

आंदोलन गिरते स्तर को रोकना है तो वापस जड़ों पर लौटना होगा। सोशल मीडिया से सड़क तक, लेकिन बिना तैयारी और समझ के नहीं। 6 जून को जो होगा, वो युवा पीढ़ी के भविष्य को प्रभावित करेगा। सावधानी बरतें, संविधान और लोकतंत्र दोनों की रक्षा करें।

अन्नामलाई को दिल्ली में झटका: मोदी से मुलाकात नहीं, शाह ने दिया धैर्य का संदेश

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दिल्ली। तमिलनाडु भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई की दिल्ली यात्रा राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। सूत्रों के अनुसार, चेन्नई से दिल्ली की उड़ान पकड़ने से पहले अन्नामलाई ने भाजपा के एक वरिष्ठ संगठनात्मक नेता को फोन कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात सुनिश्चित करने का अनुरोध किया। उस नेता ने उन्हें पूरा भरोसा दिलाया और प्रधानमंत्री मोदी को सीधा संदेश भेजा। राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह तक भी यह आग्रह पहुंचाया गया। हालांकि, तमाम कोशिशों के बावजूद अन्नामलाई की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात नहीं हो सकी। यह अनुपस्थिति कई संकेतों से भरी मानी जा रही है।

दिल्ली पहुंचकर अन्नामलाई अमित शाह से मिले। उन्होंने अपनी तैयार की लंबी सूची शाह के सामने रखी। अमित शाह ने सूची को ध्यान से सुना, लेकिन उसे काफी छोटा कर दिया। बैठक में शाह ने अन्नामलाई को तमिलनाडु में भाजपा की रणनीति पर विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि राज्य में पार्टी जो दीर्घकालिक योजना चला रही है, उसके लिए धैर्य रखना बेहद जरूरी है। अन्नामलाई को स्पष्ट संदेश दिया गया कि वे भाजपा के साथ रहकर ही अपना भविष्य बना सकते हैं, बशर्ते पार्टी की लाइन का पालन करें।

बैठक में अन्नामलाई को तीन नेताओं के उदाहरण दिए गए- असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, पश्चिम बंगाल के विपक्षी नेता शुभेंदु अधिकारी और बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी। इन तीनों नेताओं ने भाजपा की मूल विचारधारा से जुड़े बिना भी पार्टी में अपनी स्वीकार्यता बनाई, अनुशासन बनाए रखा और पार्टी लाइन का सख्ती से पालन किया। नतीजतन वे अपने राज्यों में सर्वोच्च पदों तक पहुंचे। शाह ने जोर देकर कहा कि तमिलनाडु भाजपा की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर है, लेकिन सफलता के लिए प्रदेश के अन्य नेताओं से बेहतर तालमेल, धैर्य और सामूहिक कार्यशैली अपनानी होगी।

साफ़ शब्दों में यह भी कहा गया कि पार्टी में उनकी भूमिका और जिम्मेदारी क्या होगी, यह शीर्ष नेतृत्व ही तय करेगा। खुद अन्नामलाई इसे तय नहीं कर सकते। यह बैठक भाजपा की संगठनात्मक अनुशासन की याद दिलाती है, जहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को सामूहिक लक्ष्य के अधीन रखना पड़ता है।

प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात न हो पाने को भी अन्नामलाई के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। यह दर्शाता है कि पार्टी बड़े फैसले सामूहिक रूप से और अपनी रणनीति के अनुरूप लेती है। दिल्ली से लौटकर अन्नामलाई चेन्नई पहुंच गए। अब उनकी ओर से दिए गए इस्तीफे को भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने स्वीकार कर लिया है।

यह घटनाक्रम तमिलनाडु में भाजपा के भविष्य की दिशा को लेकर पार्टी की स्पष्ट सोच को उजागर करता है। अन्नामलाई जैसे प्रभावशाली और आक्रामक छवि वाले नेता को भी पार्टी ने अनुशासन और धैर्य का पाठ पढ़ाया है। तमिलनाडु में भाजपा की जड़ें मजबूत करने की चुनौती बनी हुई है, जहां क्षेत्रीय दल द्रमुक और एआईएडीएमके की पकड़ अभी भी मजबूत है। पार्टी अब नए सिरे से रणनीति बनाने में जुटी है, जिसमें सामूहिक नेतृत्व और दीर्घकालिक धैर्य को सर्वोपरि माना जा रहा है।

यूं ही कोई व्यक्ति योगी आदित्यनाथ नहीं हो जाता

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डॉ. अतुल मोहन सिंह

लखनऊ। यूं ही कोई व्यक्ति योगी आदित्यनाथ नहीं हो जाता है। त्याग, तपस्या और बलिदान को मन, बचन और कर्म से आत्मसात करने वाले उत्तरप्रदेश के यशश्वी मुख्यमंत्री सच्ची मायनों में ‘हठयोगी’ हैं। वह अपने तरह के इकलौते ऐसे सन्यासी राजनेता हैं जो कहते हैं वह खुलेआम करते हैं। कोरोना प्रबंधन में समाज के प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य, सुरक्षा की चिंता करना कोई उनसे सीखे। अपने स्वास्थ्य की चिंता किए बगैर जिस प्रतिबद्घता और समर्पण के साथ उन्होंने कोरोना से दो-दो हाथ किए वह कोई योगी ही कर सकता है। 15 दिन में 45 जनपद का धुंआधार दौरा कर जमीनी हक़ीक़त से दो चार होना। आप स्वयं ‘आदित्य’ हैं सो ज्येष्ठ माह का ताप तो रहेगा ही। इसलिए आसपास फटकने वाले को विशेष एहतियात बरतना आवश्यक है, वरना तपिश झेलनी पड़ सकती है।

सबसे बड़े प्रदेश के बावजूद ट्रैस, टेस्ट और ट्रीट के माध्यम से कोरोना प्रबंधन का सर्वश्रेष्ठ मॉडल देश के सामने प्रस्तुत किया। ऐसी धारणा थी कि एक सन्यासी मुख्यमंत्री कैसे तकनीक को सहजता से आत्मसात कर पाएगा, पर महाराजजी ने ऐसी सभी धारणाएं निर्मूल साबित कर दीं। जिस तरह उन्होंने सभी महत्वपूर्ण कार्यों के लिए डैशबोर्ड से लेकर ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्ट्म बनाया, विरोधी भी उनके मुरीद हो गए। असंभव को संभव बनाने की अद्भुत अलौकिक क्षमता के स्वामी महाराजजी को समझना इतना आसान भी नहीं है। उनको समझने के लिए उनके जैसे हृदय की आवश्यकता पड़ती है, और वह सबके पास नहीं होता। यह उत्तर प्रदेश का सौभाग्य है कि महाराज जी हमारे मुख्यमंत्री हैं।

इससे पहले सीएए प्रकरण के दौरान उन्होंने लखनऊ हिंसा के उपद्रवियों की फ़ोटो लगी होर्डिंग शहर भर में टंगवा दी थीं। उपद्रवियों में कई एक्टिविस्ट और मुस्लिम मौलानाओं के नाम भी शामिल थे। हाईकोर्ट ने तत्काल होर्डिंग हटवाने का आदेश दिया था। उधर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सुप्रीम कोर्ट गए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने होर्डिंग न उतारने के फैसला लेकर दिल जीत लिया। कोरोना काल में उन्होंने देश में सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर सबसे सराहनीय कार्य किया है। अप्रवासी मजदूरों का मामला हो या कोटा से बच्चों को घर भिजवाना हो, योगी हर मोर्चे पर खड़े नज़र आए। नवरात्र महोत्सव के दौरान व्रत का पालन करते हुए उन्होंने दिन-रात एक कर दिए। इसी दौरान उनके पूर्वाश्रम के पिता गोलोकवासी हो गए। प्रदेशवासियों की सेवा में रत योगी ने अंत्येष्टि में शामिल होने से इनकार करते हुए मां के नाम एक पत्र लिखकर अपनी असमर्थता जताई। प्रजापालक राजा की भांति वह पूरी सजगता के साथ आज भी डटे हैं। यह सब चर्चा इसलिए कर रहा हूं कि आज उनका 53वां अवतरण दिवस है।

इससे पूर्व जब सम्पूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश जेहाद, धर्मान्तरण, नक्सली एवं माओवादी हिंसा, भ्रष्टाचार तथा अपराध की अराजकता में जकड़ा था उसी समय नाथपंथ के विश्व प्रसिद्ध मठ श्री गोरक्षनाथ मंदिर गोरखपुर के पावन परिसर में शिव गोरक्ष महायोगी गोरखनाथ जी के अनुग्रह स्वरूप माघ शुक्ल 5 संवत् 2050 तदनुसार 15 फरवरी सन् 1994 की शुभ तिथि पर गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने अपने उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ जी का दीक्षाभिषेक सम्पन्न किया।

योगीजी का जन्म देवाधिदेव भगवान् महादेव की उपत्यका में स्थित देव-भूमि उत्तराखण्ड में 5 जून सन् 1972 को हुआ। शिव अंश की उपस्थिति ने छात्ररूपी योगी जी को शिक्षा के साथ-साथ सनातन हिन्दू धर्म की विकृतियों एवं उस पर हो रहे प्रहार से व्यथित कर दिया। प्रारब्ध की प्राप्ति से प्रेरित होकर आपने 22 वर्ष की अवस्था में सांसारिक जीवन त्यागकर संन्यास ग्रहण कर लिया। आपने विज्ञान वर्ग से स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की तथा छात्र जीवन में विभिन्न राष्ट्रवादी आन्दोलनों से जुड़े रहे।

आपने संन्यासियों के प्रचलित मिथक को तोड़ा। धर्मस्थल में बैठकर आराध्य की उपासना करने के स्थान पर आराध्य के द्वारा प्रतिस्थापित सत्य एवं उनकी सन्तानों के उत्थान हेतु एक योगी की भाँति गाँव-गाँव और गली-गली निकल पड़े। सत्य के आग्रह पर देखते ही देखते राष्ट्र भक्तों की सेना चलती रही और उनकी एक लम्बी कतार आपके साथ जुड़ती चली गयी। इस अभियान ने एक आन्दोलन का स्वरूप ग्रहण किया और हिन्दू पुनर्जागरण का इतिहास सृजित हुआ।

अपनी पीठ की परम्परा के अनुसार आपने पूर्वी उत्तर प्रदेश में व्यापक जनजागरण का अभियान चलाया। सहभोज के माध्यम से छुआछूत और अस्पृश्यता की भेदभावकारी रूढ़ियों पर जमकर प्रहार किया। वृहद् हिन्दू समाज को संगठित कर राष्ट्रवादी शक्ति के माध्यम से हजारों मतान्तरित हिन्दुओं की ससम्मान घर वापसी का कार्य किया। गोसेवा के लिए आम जनमानस को जागरूक करके गोवंशों का संरक्षण एवं सम्वर्धन करवाया। पूर्वी उत्तर प्रदेश में सक्रिय समाज विरोधी एवं राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर भी प्रभावी अंकुश लगाने में आपने सफलता प्राप्त की। आपके हिन्दू पुनर्जागरण अभियान से प्रभावित होकर गाँव, देहात, शहर एवं अट्टालिकाओं में बैठे युवाओं ने इस अभियान में स्वयं को पूर्णतया समर्पित कर दिया। बहुआयामी प्रतिभा के धनी योगी जी, धर्म के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्र की सेवा में रत हो गये।

अपने पूज्य गुरुदेव के आदेश एवं गोरखपुर संसदीय क्षेत्र की जनता की मांग पर आपने वर्ष 1998 में लोकसभा चुनाव लड़ा और मात्र 26 वर्ष की आयु में भारतीय संसद के सबसे युवा सांसद बने। जनता के बीच दैनिक उपस्थिति, संसदीय क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले लगभग 1500 ग्रामसभाओं में प्रतिवर्ष भ्रमण तथा हिन्दुत्व और विकास के कार्यक्रमों के कारण गोरखपुर संसदीय क्षेत्र की जनता ने आपको वर्ष 1999, 2004 और 2009, 2014 के चुनाव में निरन्तर बढ़ते हुए मतों के अन्तर से विजयी बनाकर पाँच बार लोकसभा का सदस्य बनाया। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी बहुमत मिलने के बाद 19 मार्च 2017 को महन्त योगी आदित्यनाथ जी महाराज उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री बनें।

संसद में सक्रिय उपस्थिति एवं संसदीय कार्य में रुचि लेने के कारण आपको केन्द्र सरकार ने खाद्य एवं प्रसंस्करण उद्योग और वितरण मंत्रालय, चीनी और खाद्य तेल वितरण, ग्रामीण विकास मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी, सड़क परिवहन, पोत, नागरिक विमानन, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालयों के स्थायी समिति के सदस्य तथा गृह मंत्रालय की सलाहकार समिति, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ विश्वविद्यालय की समितियों में सदस्य के रूप में समय-समय पर नामित किया। व्यवहार कुशलता, दृढ़ता और कर्मठता से उपजी आपकी प्रबन्धन शैली शोध का विषय है। इसी अलौकिक प्रबन्धकीय शैली के कारण आप लगभग चार दर्जन शैक्षणिक एवं चिकित्सकीय संस्थाओं के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्री, प्रबन्धक या संयुक्त सचिव हैं।

हिन्दुत्व के प्रति अगाध प्रेम तथा मन, वचन और कर्म से हिन्दुत्व के प्रहरी योगीजी को विश्व हिन्दु महासंघ जैसी हिन्दुओं की अन्तर्राष्ट्रीय संस्था ने अन्तर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा भारत इकाई के अध्यक्ष का महत्त्वपूर्ण दायित्व दिया, जिसका सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए आपने वर्ष 1997, 2003, 2006 में गोरखपुर में और 2008 में तुलसीपुर (बलरामपुर) में विश्व हिन्दु महासंघ के अन्तर्राष्ट्रीय अधिवेशन को सम्पन्न कराया। सम्प्रति आपके प्रभामण्डल से सम्पूर्ण विश्व परिचित हुआ।

आपकी बहुमुखी प्रतिभा का एक आयाम लेखक का है। अपने दैनिक वृत्त पर विज्ञप्ति लिखने जैसे श्रमसाध्य कार्य के साथ-साथ आप समय-समय पर अपने विचार को स्तम्भ के रूप में समाचार-पत्रों में भेजते रहते हैं। अत्यल्प अवधि में ही ‘यौगिक षटकर्म’, ‘हठयोग: स्वरूप एवं साधना’, ‘राजयोग: स्वरूप एवं साधना’ तथा ‘हिन्दू राष्ट्र नेपाल’ नामक पुस्तकें लिखीं। श्री गोरखनाथ मन्दिर से प्रकाशित होने वाली कई पुस्तकों के सम्पादक, मासिक योग पत्रिका ‘योगवाणी’ के आप प्रधान सम्पादक हैं तथा ‘हिन्दवी’ साप्ताहिक समाचार पत्र के प्रधान सम्पादक रहे। आपका कुशल नेतृत्व युगान्तकारी है और एक नया इतिहास रच रहा है।

भगवामय बेदाग जीवन : योगी आदित्यनाथ जी महाराज एक खुली किताब हैं जिन्हे कोई भी कभी भी पढ़ सकता है। उनका जीवन एक योगी का जीवन है, सन्त का जीवन है। पीड़ित, गरीब, असहाय के प्रति करुणा, किसी के भी प्रति अन्याय एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध तनकर खड़ा हो जाने का निर्भीक मन, विचारधारा एवं सिद्धान्त के प्रति अटल, लाभ-हानि, मान-सम्मान की चिन्ता किये बगैर साहस के साथ किसी भी सीमा तक जाकर धर्म एवं संस्कृति की रक्षा का प्रयास उनकी पहचान है।

पीड़ित मानवता को समर्पित जीवन : वैभवपूर्ण ऐश्वर्य का त्यागकर कंटकाकीर्ण पगडंडियों का मार्ग उन्होंने स्वीकार किया है। उनके जीवन का उद्देश्य है-‘न त्वं कामये राज्यं, न स्वर्ग ना पुनर्भवम्। कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामर्तिनाशनम्।। अर्थात् ‘‘हे प्रभो! मैं लोक जीवन में राजपाट पाने की कामना नहीं करता हूँ। मैं लोकोत्तर जीवन में स्वर्ग और मोक्ष पाने की भी कामना नहीं करता। मैं अपने लिये इन तमाम सुखों के बदले केवल प्राणिमात्र के कष्टों का निवारण ही चाहता हूँ।’’ पूज्य योगी आदित्यनाथ जी महाराज को निकट से जानने वाला हर कोई यह जानता है कि वे उपर्युक्त अवधारणा को साक्षात् जीते हैं। वरना जहाँ सुबह से शाम तक हजारों सिर उनके चरणों में झुकते हों, जहाँ भौतिक सुख और वैभव के सभी साधन एक इशारे पर उपलब्ध हो जायं, जहाँ मोक्ष प्राप्त करने के सभी साधन एवं साधना उपलब्ध हों, ऐसे जीवन का प्रशस्त मार्ग तजकर मान-सम्मान की चिंता किये बगैर, यदा-कदा अपमान का हलाहल पीते हुए इस कंटकाकीर्ण मार्ग का वे अनुसरण क्यों करते?

सामाजिक समरसता के अग्रदूत : ‘जाति-पाँति पूछे नहिं कोई-हरि को भजै सो हरि का होई’ गोरक्षपीठ का मंत्र रहा है। महायोगी गोरक्षनाथ ने भारत की जातिवादी-रूढ़िवादिता के विरुद्ध जो उद्घोष किया, उसे इस पीठ ने अनवरत जारी रखा। गोरक्षपीठाधीश्वर परमपूज्य महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज के पद-चिह्नों पर चलते हुए पूज्य योगी आदित्यनाथ जी महाराज ने भी हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों, जातिवाद, क्षेत्रवाद, नारी-पुरुष, अमीर-गरीब आदि विषमताओं, भेदभाव एवं छुआछूत पर कठोर प्रहार करते हुए, इसके विरुद्ध अनवरत अभियान जारी रखा है। गाँव-गाँव में सहभोज के माध्यम से ‘एक साथ बैठें-एक साथ खाएँ ‘ मंत्र का उन्होंने उद्घोष किया।

भ्रष्टाचार-आतंकवाद-अपराधविरोधी संघर्ष के नायक : योगी जी के भ्रष्टाचार-विरोधी तेवर के हम सभी साक्षी हैं। अस्सी के दशक में गुटीय संघर्ष एवं अपराधियों की शरणगाह होने की गोरखपुर की छवि योगी जी के कारण बदली। अपराधियों के विरुद्ध आम जनता एवं व्यापारियों के साथ खड़ा होने के कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपराधियों के मनोबल टूटे। पूर्वी उत्तर प्रदेश में योगी जी के संघर्षों का ही प्रभाव था कि माओवादी-जेहादी आतंकवादी इस क्षेत्र में अपने पॉव नही पसार पाए। नेपाल सीमा पर राष्ट्र विरोधी शक्तियों की प्रतिरोधक शक्ति के रुप में हिन्दु युवा वाहिनी सफल रही है। आज उनका यही स्वरूप माननीय मुख्यमंत्री के रूप में सबके सामने है। प्रदेश भ्रष्टाचार-आतंक एव अपराध मुक्त होने की राह पर तेजी से बढ़ चला है।

शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा के पुजारी : सेवा के क्षेत्र में शिक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता दिये जाने के गोरक्षपीठ द्वारा जारी अभियान को पूज्य योगी आदित्यनाथ जी महाराज ने भी और सशक्त ढंग से आगे बढ़ाया। योगी जी के नेतृत्व में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् द्वारा अनवरत आज चार दर्जन से अधिक शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थाएँ गोरखपुर एवं महाराजगंज जनपद में कुष्ठरोगियों एवं वनटांगियों के बच्चों की निःशुल्क शिक्षा से लेकर बीएड एवं पालिटेक्निक जैसे रोजगारपरक सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का भगीरथ प्रयास जारी है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में गुरु श्री गोरक्षनाथ चिकित्सालय ने अमीर-गरीब सभी के लिये एक समान उच्च कोटि की स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करायी है। निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों ने जनता के घर तक स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुचायी जाती हैं।

विकास के पथ पर अनवरत गतिशील : योगी आदित्यनाथ जी महाराज के व्यक्तित्व में सन्त और जननेता के गुणों का अद्भुत समन्वय है। ऐसा व्यक्तित्व विरला ही होता है। यही कारण है कि एक तरफ जहॉ वे धर्म-संस्कृति के रक्षक के रूप में दिखते हैं तो दूसरी तरफ वे जनसमस्याओं के समाधान हेतु संवेदनशील रहते हैं। सड़क, बिजली, पानी, खेती आवास, दवाई और पढ़ाई आदि की समस्याओं से प्रतिदिन जुझती जनता के दर्द को समझने वाले जन-नेता के रूप में उनकी ख्याति के आज सभी साक्षी बन रहे हैं।

आपको 54वें जन्मदिन की स्वस्ति कामनाएं। आप निरंतर यशस्वी, ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी हों, ऐसी प्रभु श्रीराम से प्रार्थना है।

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