1973 के विमान अपहरण की अनसुनी कहानी: लोकतंत्र के लिए हाईजैक, जो नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की से जुड़ी हुई है

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काठमांडू : नेपाल के राजनीतिक संकट के बीच पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की का नाम अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में चर्चा में है। जनरेशन जेड के प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार और अस्थिरता के खिलाफ अपनी मांगों को मजबूत करने के लिए कार्की को चुना है। लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में एक चौंकाने वाली ऐतिहासिक घटना छिपी है—1973 का वह विमान अपहरण, जिसमें कार्की के पति दुर्गा प्रसाद सुबेदी मुख्य भूमिका में थे। यह घटना न केवल नेपाल के लोकतांत्रिक संघर्ष का प्रतीक बनी, बल्कि बॉलीवुड अभिनेत्री माला सिन्हा को भी उसके चपेट में ले लिया।

10 जून 1973 को रॉयल नेपाल एयरलाइंस की 19-सीटर ट्विन ऑटर विमान (रजिस्ट्रेशन 9N-ABB) विराटनगर से काठमांडू के लिए उड़ी। विमान में 19 यात्री और तीन क्रू मेंबर सवार थे, जिनमें प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेत्री माला सिन्हा और उनके पति, नेपाली अभिनेता सीपी लोहानी भी शामिल थे। विमान नेपाल राष्ट्र बैंक के 30 लाख भारतीय रुपये ले जा रहा था, जो अररिया (भारत) से काठमांडू पहुंचाने के लिए था। टेकऑफ के मात्र पांच मिनट बाद ही तीन हाईजैकर्स—दुर्गा प्रसाद सुबेदी, बसंत भट्टराई और नागेंद्र प्रसाद धुंगेल—ने हथियारों से विमान पर कब्जा कर लिया।

उनका मकसद था पैसे लूटकर नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में राजशाही के खिलाफ सशस्त्र क्रांति को फंड करना। तत्कालीन राजा महेंद्र के पंचायत व्यवस्था के खिलाफ लोकतंत्र की लड़ाई लड़ रहे नेपाली कांग्रेस के युवा नेता सुबेदी ने यह योजना बनाई थी। मास्टरमाइंड पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला थे, जबकि सुशील कोइराला और अन्य सहयोगी फोर्ब्सगंज (बिहार) में इंतजार कर रहे थे। हाईजैकर्स ने पायलट को मजबूरन विमान को भारत के फोर्ब्सगंज के एक घास के मैदान पर उतार दिया। वहां से तीन बॉक्स में पैक नकदी को लूट लिया गया। पैसा दार्जिलिंग ले जाकर क्रांति के लिए इस्तेमाल किया गया। विमान बिना किसी हताहत के वापस उड़ान भरकर काठमांडू पहुंचा। माला सिन्हा ने बाद में बताया कि वे डर गईं थीं, लेकिन हाईजैकर्स ने यात्रियों को नुकसान नहीं पहुंचाया।

अपहरण के एक साल के अंदर सुबेदी और अन्य को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें दो साल की सजा हुई। लेकिन 1975 में भारत में इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी के दौरान जेल से रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद सुबेदी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) पहुंचे, जहां वे छात्र बने। यहीं उनकी मुलाकात सुशीला कार्की से हुई, जो पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स कर रही थीं। दोनों ने प्रेम विवाह किया। कार्की ने बाद में त्रिभुवन विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री ली और नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनीं। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ साहसी फैसले दिए, जैसे महिलाओं को नागरिकता अधिकार और न्यायिक सुधार।

यह घटना नेपाल के इतिहास में ‘लोकतंत्र के लिए अपहरण’ के रूप में जानी जाती है। 2017 में इस पर डॉक्यूमेंट्री ‘हाईजैकिंग फॉर डेमोक्रेसी’ बनी। सुबेदी ने अपनी किताब ‘बिमान विद्रोह’ में पूरी कहानी बयां की। आज जब कार्की नेपाल के अंतरिम नेतृत्व की दौड़ में हैं, तो यह पुरानी घटना फिर सुर्खियों में है। क्या यह इतिहास कार्की के भविष्य को प्रभावित करेगा? नेपाल के युवा प्रदर्शनकारियों का मानना है कि कार्की की निष्पक्षता ही देश को बचा सकती है।

अंडरवियरमैन की त्रासदी: अभिसार का हीलता मानस

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ओहो, देखिए ना, पत्रकारिता का सुपरहीरो अब अंडरवियरमैन बन गया! स्पाइडरमैन उछलता था इमारतों पर, बेटमैन रातों को अपराधियों का पीछा करता था, आयरनमैन अपनी आर्मर में चमकता था। लेकिन हमारी भ्रष्टाचारी पार्टी ने कुछ ऐसा इंट्रोड्यूस किया कि दुनिया हंस-हंसकर लोटपोट हो गई। अभिसार शर्मा, जी हां, वही बेबाक पत्रकार, जो कभी NDTV की स्टूडियो में गरजते थे, अब X (पूर्व ट्विटर) पर अंडरवियर की कल्पना कर रहे हैं। “अंडरवियरमैन देखा?” – ये सवाल तो ठीक है, लेकिन भाई, अगर इतना प्रेम है तो खुद पहनकर दिखा ना! संदेह तो होता ही है कि कहीं ये ‘अंडरवियर प्रेम’ किसी गहरी भावना का इजहार तो नहीं। भारत में समलैंगिकता अब शर्म की बात नहीं, लेकिन पत्रकारिता में तो साफगोई चाहिए, न कि ऐसे छिपे संकेतों वाली अभिव्यक्ति!

कुछ दिनों पहले एक वरिष्ठ नेता ने अभिसार की आमदनी का राज खोल दिया। करोड़ों की कमाई, यूट्यूब चैनल से लाखों views, किताबें बिकतीं – सब कुछ सार्वजनिक हो गया। पहले तो अभिसार ने इसे साजिश बताया, लेकिन उसके बाद? मानसिक संतुलन का ग्राफ नीचे लुढ़क गया। पहले असम सरकार पर वीडियो बनाया, हिमंता बिस्वा सरमा को कम्युनल कहा, तो FIR हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत दी, लेकिन अभिसार का दिमाग तो ‘हील’ हो चुका था। अब अंडरवियरमैन! क्या बात है, भाई? आमदनी का खुलासा इतना झकझोर गया कि अब तो सुपरहीरोज की दुनिया में उतर आए। शायद सोच रहे होंगे, “मेरा हीरो कौन बनेगा? जो मेरी आमदनी छुपा सके!”

कल्पना कीजिए, अभिसार स्टूडियो में बैठे हैं, माइक थामे, लेकिन स्क्रिप्ट की जगह अंडरवियर की फोटो! “देखिए, भ्रष्टाचारी पार्टी का नया अवतार! ये अंडरवियरमैन है, जो जनता को लूटता है और ऊपर से चमकदार दिखता है।” दर्शक हंसेंगे, लेकिन अभिसार गंभीर। “नहीं, ये मेरा संदेश है – सच्चाई इतनी पारदर्शी होनी चाहिए कि अंडरवियर तक दिखे!” व्यंग्य है या पागलपन? आमदनी का बोझ इतना भारी कि अब तो सुपरहीरोज भी अंडरवियर से प्रेरित हो गए। पुराने दिनों में अभिसार मोदी सरकार पर हमला बोलते थे, अब खुद पर ही हमला हो गया लगता है।

फिर भी, हंसते हैं हम। क्योंकि पत्रकारिता में अगर मानसिक संतुलन हील जाए, तो अंडरवियरमैन ही बचेगा। अभिसार भाई, अगली बार स्पष्ट बोलो – अंडरवियर प्रेम है या राजनीतिक व्यंग्य? वरना ये ‘हील’ वाला दौर और लंबा चलेगा।

नेपाल विलय: संस्कृति की पुकार, सत्ता की नकार

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इतिहास कभी-कभी ऐसे मोड़ पर ठिठक कर खड़ा हो जाता है, जहां से दो दिशाएं निकलती हैं। एक दिशा संभावनाओं की उजली धूप में जाती है, दूसरी अधूरे स्वप्नों की छाया में खो जाती है। नेपाल का भारत में विलय वही संभावना थी, जिसे हिमालय की चोटियों ने जन्म दिया, किंतु राजनीति ने उसे अधूरा छोड़ दिया।

राजा वीर विक्रम त्रिभुवन शाह ने जब पंडित नेहरू के सामने नेपाल को भारत में सम्मिलित करने का प्रस्ताव रखा, तो वह केवल राजनीतिक गणित नहीं था। वह उस सांस्कृतिक धारा की पुकार थी, जिसमें मिथिला के जनक से लेकर अयोध्या के राम तक, लुंबिनी के बुद्ध से लेकर पशुपतिनाथ के शिव तक, सदियों से भारत और नेपाल एक ही आस्था की दो धाराओं की भांति बहते रहे हैं। किंतु नेहरू ने उस पुकार को अनसुना कर दिया। इतिहास वहीं से बदल गया।

यह प्रसंग केवल स्मृति में नहीं, बल्कि अनेक आत्मकथाओं में भी दर्ज है। चौधरी चरण सिंह ने जब इसे नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बी.पी. कोइराला के सामने रखा, तो वातावरण बोझिल हो गया। कोइराला मौन हो गए, चंद्रशेखर ने प्रसंग बदलना चाहा। परंतु दशकों बाद पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा ‘द प्रेसिडेंशियल इयर्स’ में इस तथ्य को प्रमाणित किया। उन्होंने तो यहां तक लिखा कि यदि यह प्रस्ताव इंदिरा गांधी के सम्मुख आया होता, तो नेपाल भी सिक्किम की भांति भारत का प्रांत बन गया होता।

यहां प्रश्न केवल विलय का नहीं है, बल्कि उस सांस्कृतिक एकात्मता का है, जो इतिहास की धारा में बार-बार झलकती रही है। रामायण में गंगा के तट पर निषादराज गुह का राम से मिलना केवल मित्रता का प्रसंग नहीं, बल्कि यह प्रमाण है कि सीमाएं और राज्य- सीमाएं बदल सकती हैं, परंतु सांस्कृतिक आत्मीयता शाश्वत रहती है। महाभारत का एकलव्य यह दिखाता है कि जातीय विभाजन से ऊपर उठकर समाज की वास्तविक शक्ति कहां होती है। इसी तरह नेपाल का भारत से जुड़ना केवल भूमि का जुड़ना नहीं होता, बल्कि आत्माओं का संगम होता।

वेदों में कहा गया है कि “संगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्” अर्थात साथ चलो, साथ बोलो और साथ सोचो। यह मंत्र केवल आर्यावर्त तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हिमालय की गोद तक फैल गया। नेपाल और भारत का रिश्ता इसी वैदिक मंत्र की जीवित अभिव्यक्ति है।

इतिहास ने जब त्रिभुवन शाह की उस पुकार को अस्वीकार किया, तब उसने केवल एक राजनीतिक संभावना नहीं खोई, बल्कि उस वैदिक उद्घोष की गूंज को भी अधूरा छोड़ दिया। आज भी जब हम भारत-नेपाल संबंधों को देखते हैं, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या नेहरू ने एक ऐसा अवसर खो दिया, जहां राजनीति संस्कृति का सेतु बन सकती थी?

यदि नेपाल भारत का अंग बन गया होता, तो वह केवल भूगोल का विस्तार नहीं होता। वह उस एकात्मता का पुनर्जागरण होता, जो राम और सीता की जनकपुरी से जुड़ती है, जो बुद्ध के जन्मस्थल लुंबिनी को भारत की चेतना में पिरोती है, और जो पशुपतिनाथ की आरती को काशी के गंगाघाटों से जोड़ देती है।

इतिहास का यह अधूरा अध्याय आज भी हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र केवल संधियों से नहीं बनते, वे स्मृतियों और संस्कारों से बनते हैं। राजनीति की दृष्टि क्षणभंगुर है, किंतु संस्कृति की दृष्टि शाश्वत है। और जब शाश्वत को क्षणभंगुर पर छोड़ दिया जाता है, तो इतिहास केवल एक लंबी टीस बनकर रह जाता है।

आज प्रश्न यह है कि इतिहास के उस खोए अवसर से हम क्या सीख लेते हैं। क्या हम उस सांस्कृतिक एकात्मता को पुनः अपने भविष्य का आधार बना पाएंगे? हिमालय की चोटियां अब भी यही कहती हैं कि राष्ट्र की आत्मा सीमाओं से नहीं, आत्मीयताओं से बसती है।

शिकागो में पूरे संसार के धर्म गुरुओं ने खड़े होकर स्वामी विवेकानंद का सम्मान किया था. .

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भोपाल । संसार में ऐसे उदाहरण बहुत कम है जब किसी अपरिचित वक्ता के केवल एक शब्द पर पूरा सभागार खड़े होकर तालियों से स्वागत करे। यह दृश्य था शिकागो के उस धर्म सम्मेलन का जब स्वामी विवेकानंद अपनी बारी पर बोलने खड़े हुये। उनके वक्तव्य से संपूर्ण सभागार इतना प्रभावित हुआ कि उन्हे तीन बार अपनी बात रखने का अवसर दिया गया।
यह संसार का पहला विश्व धर्म सम्मेलन था जो 11 सितंबर से अमेरिका के शिकागो नगर में आयोजित हुआ था। आरंभ में यह 16 सितंबर तक केलिये निर्धारित था। लेकिन संसार भर के उपस्थित धर्मगुरुओं की पूरी बात सुनने केलिये यह दस दिन और बढ़ाया गया यह 26 सितंबर तक चला और अतिथियों की औपचारिक विदाई 27 सितंबर को हुई। इस धर्म सम्मेलन को “धर्म संसद” नाम दिया गया था। इसका उद्देश्य विभिन्न धर्मों के बीच वैश्विक समन्वय और संवाद स्थापित करना था। इस धर्म संसद का आयोजन चर्च की ओर से किया गया था। संसार की यह पहली धर्म संसद अपने आप में अनूठी थी। धर्म आधारित मुख्य सत्र के अतिरिक्त शासन की मानवीय शैली, न्यायशास्त्र, वित्त, साहित्य, विज्ञान आदि विषयों पर अलग अलग समूह सत्र भी हुये। जिनमें उन्नीस महिलाओं सहित तीन सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे। मुख्य विषय धर्म और धर्म आधारित सूत्रों से संसार के विभिन्न देशों के बीच समन्वय सद्भाव और मैत्री स्थापित करना था। ताकि प्रबुद्ध और संत पुरुषों के ज्ञान का लाभ पूरे संसार को मिल सके। इसमें अमेरिकी, यूरोपीय, ऐशियाई और अफ्रीकी देशों से रोमन, कैथोलिक, यहूदी, बौद्ध, जैन और इस्लामिक सहित सभी धर्मों से संबंधित धर्मगुरु एवं प्रबुद्ध जन उपस्थित थे ।उन्हे लगता था कि मानवता और सहिष्णुता में उनका मत ही संसार में सबसे आगे है। औपचारिक शुरुआत के बाद दोपहर बाद स्वामी विवेकानंद को संबोधन केलिये आमंत्रित किया गया। उन्होंने सबसे पहले मन ही मन माता सरस्वती को प्रणाम किया और जैसे ही कहा “अमेरिका के निवासी मेरे सभी प्यारे भाइयो और बहनो” पूरा सभागार ताली बजाते हुये उठ खड़ा हुआ। जिस सहिष्णुता केलिये यह धर्म सम्मेलन आयोजित किया गया था उसकी झलक तो स्वामी विवेकानंद के भाइयो और बहनों संबोधन में थी। यदि संसार के सभी निवासियों भाई बहन होने का भाव जाग्रत हो जाय तो सभी तनाव और विवाद समाप्त हो जायेंगे इसीलिये पूरा सभागार तालियाँ बजाते हुये उठकर खड़ा हो गया। संसार की पहली इस विश्व संसद में प्रतिनिधि के रूप में सहभागी होने के लिये स्वामी विवेकानंद जी के पास अधिकृत आमंत्रण नहीं था। लेकिन यह उनके आत्मविश्वास की प्रबलता थी कि वे वहाँ पहुँचे और सर्वाधिक लोकप्रिय वक्ता बने।

शिकागो यात्रा की कठिनाइयाँ

यह पहला विश्व धर्म सम्मेलन था। इसकी चर्चा पूरे संसार में थी। स्वामी विवेकानंद के पास न तो औपचारिक आमंत्रण था और न शिकागो जाने केलिये साधन। उनकी इच्छा भी प्रबल थी और उनके सभी शिष्य भी चाहते थे कि स्वामी विवेकानंद शिकागो जायें। अंत में मद्रास, मैसूर के कुछ शिष्यों और खेतड़ी के राजा ने आर्थिक प्रबंध किया और 31 मई 1893 को वे मुंबई से शिकागो के लिए रवाना हो गये। अमेरिका केलिये उनकी यह यात्रा चीन, जापान और कनाडा होकर थी। हर स्थान पर थोड़ा थोड़ा रुकना भी था। उन्होंने हर देश के नगरों में भ्रमण किया। इनमें कैंटन, नागासाकी, ओसाका , क्योटो, टोक्यो आदि नगरों में भ्रमण करते हुये योकोहामा पहुँचे। योकोहामा से उन्होंने जहाज बदला और कनाडा पहुँचे।वे 25 जुलाई 1893 को वैंकूवर , कनाडा पहुँचे और फिर ट्रेन द्वारा 30 जुलाई 1893 को शिकागो पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्हें पता चला कि विश्व धर्म संसद की दर्शक दीर्घा में तो कोई भी व्यक्ति जा सकता है लेकिन सम्मेलन में सहभागिता और मंच से अपनी बात रखने के लिये उचित आमंत्रण होना आवश्यक है। विवेकानंदजी के पास अधिकृत आमंत्रण नहीं था फिर वे निराश नहीं हुये। सम्मेलन आरंभ होने में अभी एक माह से अधिक का समय था, इसलिये वे बोस्टन चले गये। शिकागो की तुलना में बोस्टन अपेक्षाकृत सस्ता नगर था। यहाँ महाराज खेतड़ी और मैसूर के उनके एक शिष्य का संपर्क था। विवेकानंद जी के पास सीमित धन था। उन्हे धर्म संसद में सहभागिता केलिये विधिवत प्रतिनिधि बनने का मार्ग भी खोजना था। इसीलिये उन्होंने प्रतीक्षा की इस अवधि में रहने केलिये उन्होंने बोस्टन नगर चुना।इसी बीच उन्हें हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान के लिये आमंत्रित किया गया। यहाँ उनकी भेंट प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट से हुई। प्रोसेसर राइट विवेकानंद के ज्ञान और बुद्धिमत्ता से बहुत प्रभावित हुये। और यहीं से उन्हें इस धर्म संसद में अधिकृत प्रतिनिधि होने का मार्ग निकला।

स्वामी विवेकानंद जी का संबोधन और उनके मुख्य विन्दु

मुख्य और समूह सत्र मिलाकर स्वामी विवेकानंद जी को मंच से चार बार अपनी बात रखने का अवसर मिला। पहले दिन उनके प्रथम वाक्य में संसार की उन समस्याओं के समाधान का संदेश था जिसके लिये वह धर्म संसद आयोजित की गई थी। यदि संसार के मानवीय जीवन में सबके प्रति भाई और बहन का भाव जाग्रत हो जाय तो फिर किसी प्रकार का कोई तनाव और टकराव नहीं होगा। इसीलिए स्वामी विवेकानंद जी द्वारा भाई और बहन कहने पर पूरे सभागार में उपस्थित समूह ने खड़े होकर तालियाँ बजाकर उनका सम्मान किया।

अपने विभिन्न संबोधनों में उन्होंने भारतीय चिंतन की व्यापकता और वर्तमान समय की प्राथमिकता का स्पष्ट चित्रण किया। उनका कहना था कि मनुष्य को धर्म से पहले उसके जीवन की सुरक्षा और न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति होनी चाहिए। यदि तनाव और वैर उत्पन्न होता है तो धर्मों को आत्म चिंतन भी करना चाहिए। अपने इस कथन के माध्यम से स्वामी विवेकानंद जी ने एक प्रकार से उन दोनों धाराओं पर प्रहार किया था जो बलपूर्वक और प्राणों भय दिखाकर अथवा अभाव और संकटग्रस्त मानवता की सेवा के बहाने मतान्तरण अभियान चला रहे हैं। उन्होंने विशेषकर भारतवासियों की आत्मा बचाने की प्राथमिकता रेखांकित की। और कहा कि मानवता का सही सम्मान भारतीय चिंतन में है।स्वामी विवेकानंद ने वेदान्त सहित अन्य हिन्दु धर्म ग्रंथों का उदाहरण देकर जैन और बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म की पूर्णता प्रमाणित किया और कहा कि दोनों का अस्तित्व एक दूसरे का पूरक है। “हिंदू धर्म बौद्ध धर्म के बिना नहीं रह सकता, और न बौद्ध धर्म का अस्तित्व हिंदू धर्म के बिना पूर्ण रह सकेगा”।

उन्होंने भारत के सहिष्णु और सार्वभौमिक मूल्यों को दर्शाया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार संसार की सभी नदियों के स्त्रोत अलग हैं, उनके मार्ग भी अलग हैं लेकिन सबका लक्ष्य समुद्र तक पहुंचना है। उसी प्रकार संसार के सभी धर्म दिखने में भले अलग दिखते हों लेकिन सबका ध्येय ईश्वर तक पहुंचना है। स्वामी विवेकानंद ने भारतीय दर्शन की इसी व्यापकता से संसार को परिचित कराया और कहा कि उन्हें इस बात का गर्व है कि वे ऐसे धर्म से हैं जिसने दुनियाँ को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया जो पूरे संसार को एक कुटुम्ब मानता है और ईश्वर तक पहुँचने के सभी मार्गों का समान आदर करता है। स्वामी विवेकानंद जी ने भारतीय चिंतन की व्यापकता का उदाहरण देकर कहा कि भारत ने संसार के सभी सताए हुए लोगों को शरण दी है और आक्रमणकारियों को भी क्षमा किया। ऐसा उदाहरण संसार में कहीं नहीं। उन्होंने सांप्रदायिकता और धर्म के नाम पर कट्टरता को मानवता का शत्रु बताया और कहा कि सांप्रदायिकता, कट्टरता के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खूबसूरत धरती को जकड़ रखा है। मानवता पीड़ित हो रही है। कितने निरपराध लोगों के प्राण गये। धर्म के नाम पर कट्टरपंथ की इस जकड़ ने धरती को हिंसा से भर दिया है, न जाने कितनी सभ्याताएं और कितने ही देश मिट गए हैं फिर भी इस साम्प्रदायिकता और कट्टरपंथ की भूख नहीं मिट रही। स्वामी विवेकानंद ने ऐसे हिसकों की तुलना खतरनाक राक्षस से की और कहा कि यदि नहीं होते तो मानव समाज कहीं अधिक उन्नत और प्रसन्न होता। स्वामी जी ने कहा कि उनका समय अब पूरा होने आ गया है। मुझे आशा है कि इस सम्मेलन का संदेश सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा। चाहे वह तलवार का हो अथवा लेखनी का।
समापन सत्र में स्वामी विवेकानंद ने कहा कि यह संसद एक सिद्ध तथ्य बन गई है। उन्होंने इस आयोजन को आयोजित करने वाले “महान आत्माओं” का आभार व्यक्त किया, और कहाकि “इसने दुनिया को यह सिद्ध कर दिया है कि पवित्रता, शुद्धता और दानशीलता दुनिया के किसी भी चर्च की विशिष्ट संपत्ति नहीं हैं, और हर धर्म-व्यवस्था ने सर्वोच्च चरित्र वाले पुरुषों और महिलाओं को जन्म दिया है”। उन्होंने अपनी बात का समापन में आव्हान किया कि”लड़ाई नहीं, सहायता करें”, “विनाश नहीं, एकीकरण करें”, “विरोध नहीं, सद्भाव और शांति बनाएं।”
विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद की इस प्रस्तुति और उनके सम्मान का प्रसंग का स्मरण प्रत्येक भारतवासी के शीश गर्व से उन्नत कर देता है। उन दिनों जिन परिस्थतियों में स्वामी विवेकानंद शिकागो गये थे, वे साधारण नहीं थीं। न आर्थिक, न सामाजिक और न ही राजनैतिक। एक हजार वर्ष के दासत्व का अंधकार प्रत्येक भारतवासी को जकड़े हुये था। उन विषम और विपरीत परिस्थियों में स्वामी जी शिकागो गये और भारतीय दर्शन की वैश्विकता का तार्किक चित्रण किया जिसे पूरे संसार ने स्वीकारा और माना कि मानवता की सच्ची सुरक्षा इसी मार्ग पर चलने से है। इस घटना को आज 232 वर्ष पूरे होने आ गये। भारतवासी इस तिथि को गर्व के साथ स्मरण करते हैं। लेकिन स्मरण के साथ भारतीय समाज जीवन में उस स्वाभिमान और स्वत्व का भाव जगाने की भी है जिसका संकल्प स्वामी विवेकानंद ने लिया था और जिसका प्रकटीकरण 11 सितंबर 1893 को शिकागो में हुआ था।

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