सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठित स्वरूप ही भारत की एकता, एकात्मता, विकास व सुरक्षा की गारंटी है – डॉ. मोहन भागवत जी

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नागपुर : सम्पूर्ण हिन्दू समाज का बल सम्पन्न, शील सम्पन्न संगठित स्वरूप ही इस देश के एकता, एकात्मता, विकास व सुरक्षा की गारंटी है। क्योंकि हिन्दू समाज अलगाव की मानसिकता से मुक्त और सर्वसमावेशक है। हिन्दू समाज ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की उदार विचारधारा का पुरस्कर्ता व संरक्षक है। इसलिए संघ सम्पूर्ण हिन्दू समाज के संगठन का कार्य कर रहा है। क्योंकि संगठित समाज अपने सब कर्तव्य स्वयं के बलबूते पूरे कर लेता है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत ने रेशिमबाग मैदान में आयोजित संघ के विजयादशमी उत्सव में कही। उल्लेखनीय है कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का शताब्दी वर्ष है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बल देकर कहा कि भारतवर्ष को वैभवशाली व सम्पूर्ण विश्व के लिए अपेक्षित व उचित योगदान देनेवाला देश बनाना, यह हिन्दू समाज का कर्तव्य है। इस अवसर पर मंच पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति मा. रामनाथ कोविंद जी, संघ के विदर्भ प्रान्त संघचालक मा. दीपक जी तामशेट्टीवार, विदर्भ प्रान्त सह संघचालक मा. श्रीधर जी गाडगे और नागपुर महानगर संघचालक मा. राजेश जी लोया उपस्थित थे।

स्वदेशी तथा स्वावलम्बन का कोई विकल्प नहीं

सरसंघचालकजी ने आगे कहा कि अमेरिका ने अपने स्वयं के हित को आधार बनाकर जो आयात शुल्क नीति चलायी है, जिसके कारण हमें भी कुछ बातों का पुनर्विचार करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि विश्व परस्पर निर्भरता पर जीता है, किन्तु यह परस्पर निर्भरता हमारी मजबूरी न बने, इसके लिए हमें आत्मनिर्भर बनना होगा। क्योंकि स्वदेशी तथा स्वावलम्बन का कोई पर्याय नहीं है।
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने विश्व के जड़वादी व उपभोगवादी नीति के परिणामस्वरूप हो रहे पर्यावरणीय असंतुलन पर चिन्ता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भारत में भी उसी नीति के चलते वर्षा का अनियमित व अप्रत्याशित होना, भूस्खलन, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं गत तीन-चार वर्षों में तेजी से बढ़ गई हैं। दक्षिण एशिया का सारा जलस्रोत हिमालय से आता है। उस हिमालय में इन दुर्घटनाओं का होना भारतवर्ष और दक्षिण एशिया के अन्य देशों के लिए खतरे की घंटी माननी चाहिए।

उपद्रवी शक्तियों से सावधान

डॉ. भागवत जी ने भारत के पड़ोसी देशों की अराजक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि गत वर्षों से हमारे पड़ोसी देशों में बहुत उथल-पुथल मची है। श्रीलंका, बांग्लादेश और हाल ही में नेपाल में प्रकार जन-आक्रोश का हिंसक उद्रेक होकर सत्ता का परिवर्तन हुआ । अपने देश में तथा दुनिया में भी भारतवर्ष में इस प्रकार के उपद्रवों को चाहनेवाली शक्तियां सक्रिय हैं, , वह हमारे लिए चिन्ताजनक है। शासन, प्रशासन का समाज से टूटा हुआ सम्बन्ध, चुस्त व लोकाभिमुख प्रशासकीय क्रिया-कलापों का अभाव यह असंतोष के स्वाभाविक व तात्कालिक कारण होते हैं। परन्तु हिंसक उद्रेक में वांच्छित परिवर्तन लाने की शक्ति नहीं होती। प्रजातांत्रिक मार्गों से ही समाज में ऐसे आमूलाग्र परिवर्तन लाया जा सकता है। अन्यथा ऐसे हिंसक प्रसंगों में विश्व की वर्चस्ववादी ताकतें अपना खेल खेलने के अवसर ढूंढ़ लेती हैं। सरसंघचालक जी ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि हमारे पड़ोसी देश सांस्कृतिक दृष्टि से तथा आपसी नित्य सम्बन्धों के कारण भी भारत से जुड़े हैं। एक तरह से यह हमारा परिवार ही है। वहाँ पर शान्ति रहे, स्थिरता रहे, उन्नति हो, सुख और सुविधा हो, इसकी हमारे लिए भी आवश्यकता है।

हमारी वर्तमान आशाएं और चुनौतियाँ

सरसंघचालक डॉ. भागवतजी ने कहा कि वर्तमान कालावधि एक ओर हमारे विश्वास तथा आशा को अधिक बलवान बनानेवाली है तथा दूसरी ओर हमारे सम्मुख उपस्थित पुरानी व नयी चुनौतियों को अधिक स्पष्ट रूप में उजागर कर रही है, साथ ही हमारे लिए नियत कर्तव्य पथ को भी निर्देशित करनेवाली है। सरसंघचालकजी ने आगे कहा कि गत वर्ष प्रयागराज में सम्पन्न महाकुम्भ ने श्रद्धालुओं की संख्या के साथ ही उत्तम व्यवस्थापन के भी सारे कीर्तिमान तोड़कर एक जागतिक विक्रम प्रस्थापित किया। इसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण भारत में श्रद्धा व एकता की प्रचण्ड लहर को अनुभव किया जा सकता है। वहीं 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में सीमापार से आये आतंकियों ने 26 भारतीय यात्री नागरिकों की उनका हिन्दू धर्म पूछकर हत्या की। सम्पूर्ण भारतवर्ष में नागरिकों में दुःख और क्रोध की ज्वाला भड़की। भारत सरकार ने योजना बनाकर मई मास में इसका पुरजोर उत्तर दिया। इस सब कालावधि में देश के नेतृत्व की दृढ़ता तथा हमारी सेना के पराक्रम तथा युद्ध कौशल के साथ-साथ ही समाज की दृढ़ता व एकता का सुखद दृश्य हमने देखा।
सरसंघचालक डॉ. भागवतजी ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर देते हुए कहा कि अन्य देशों से मित्रता की नीति व भाव रखते हुए भी हमें अपने सुरक्षा के विषय में अधिकाधिक सजग रहने और अपना सामर्थ्य बढ़ाते रहने की आवश्यकता है। नीतिगत क्रियाकलापों से विश्व के अनेक देशों में से हमारे मित्र कौन-कौन और कहाँ तक है, इसकी परीक्षा भी हो गई।
सरसंघचालकजी ने कहा कि देश के अन्दर उग्रवादी नक्सली आन्दोलन पर शासन तथा प्रशासन की दृढ़ कार्रवाई से बड़ी मात्रा में नियंत्रण आया है। उन क्षेत्रों में नक्सलियों के पनपने का मूल कारण वहाँ चल रहा शोषण व अन्याय, विकास का अभाव तथा शासन-प्रशासन में इन सब बातों के प्रति संवेदना का अभाव रहा। डॉ. भागवतजी ने इस बात पर जोर दिया कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न्याय, विकास, सद्भावना, संवेदना तथा सामंजस्य स्थापन करने के लिए कोई व्यापक योजना शासन-प्रशासन के द्वारा बनाने की आवश्यकता है।
संचार माध्यमों व अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण दुनिया के देशों में निकटता जैसी परिस्थिति का सुखदायक रूप दिखता है। परन्तु विज्ञान एवं तकनीकी की प्रगति की गति व मनुष्यों की इनसे तालमेल बनाने की गति में बड़ा अंतर है। इसलिए सामान्य मनुष्यों के जीवन में बहुत सारी समस्याएँ उत्पन्न होती दिखाई दे रही हैं। जैसे सर्वत्र चल रहे युद्धों सहित अन्य छोटे-बड़े कलह, पर्यावरण के क्षरण के कारण प्रकृति का प्रकोप, सभी समाजों तथा परिवारों में आयी हुई टूटन, नागरिक जीवन में बढ़ता हुआ अनाचार व अत्याचार ऐसी समस्याएँ भी साथ में चलती हुई दिखाई देती हैं। इन सबके उबरने के प्रयास हुए हैं, परन्तु वे इन समस्याओं की बढ़त को रोकने में अथवा उनका पूर्ण निदान देने में असफल रहे हैं। इसलिए अब सारा विश्व इन समस्याओं के समाधान के लिए भारत की दृष्टि से निकले चिन्तन में से उपाय की अपेक्षा कर रहा है।

हमारी सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने सामाजिक एकता के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी भी देश के उत्थान में सबसे महत्त्वपूर्ण कारक उस देश के समाज की एकता है। हमारा देश विविधताओं का देश है। अनेक भाषाएँ अनेक पंथ, भौगोलिक विविधता के कारण रहन-सहन, खान-पान के अनेक प्रकार, जाति-उपजाति आदि विविधताएं पहले से ही हैं।
डॉ. भागवतजी स्पष्ट रूपसे कहा कि हमारी विविधताओं को हम अपनी अपनी विशिष्टताएं मानते हैं और अपनी-अपनी विशिष्टता पर गौरव करने का स्वभाव भी समझते हैं। परन्तु यह विशिष्टताएं भेद का कारण नहीं बननी चाहिए। अपनी सब विशिष्टताओं के बावजूद हम सब एक बड़े समाज के अंग हैं। समाज, देश, संस्कृति तथा राष्ट्र के नाते हम एक हैं। यह हमारी बड़ी पहचान हमारे लिए सर्वोपरि है, यह हमको सदैव ध्यान में रखना चाहिए। उसके चलते समाज में सबका आपस का व्यवहार सद्भावनापूर्ण व संयमपूर्ण रहना चाहिए। सब की अपनी-अपनी श्रद्धाएँ, महापुरुष तथा पूजा के स्थान होते हैं। मन, वचन, कर्म से आपस में इनकी अवमानना न हो, इसका ध्यान रखना चाहिए।

अराजकता का व्याकरण रोकना जरूरी
डॉ. भागवत ने सामाजिक सद्भाव के लिए व्यापक समाज प्रबोधन करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि नियम पालन, व्यवस्था पालन करना व सद्भावपूर्वक व्यवहार करने का स्वभाव बनना चाहिए। छोटी-बड़ी बातों पर या केवल मन में सन्देह है इसलिए, कानून हाथ में लेकर रास्तों पर निकल आना, गुंडागर्दी, हिंसा करने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। मन में प्रतिक्रिया रखकर अथवा किसी समुदाय विशेष को उकसाने के लिए अपना शक्ति प्रदर्शन करना, ऐसी घटनाओं को योजनापूर्वक कराया जाता है। उनके चंगुल में फंसने का परिणाम, तात्कालिक और दीर्घकालिक, दोनों दृष्टि से ठीक नहीं है। इन प्रवृत्तियों की रोकथाम आवश्यक है। शासन-प्रशासन अपना काम बिना पक्षपात के तथा बिना किसी दबाव में आये, नियम के अनुसार करें। परन्तु समाज की सज्जन शक्ति व तरुण पीढ़ी को भी सजग व संगठित होना पड़ेगा, आवश्यकतानुसार हस्तक्षेप भी करना पड़ेगा।

पंचपरिवर्तन का आग्रह महत्त्वपूर्ण
सरसंघचालक डॉ. भागवतजी ने कहा कि हमारी एकता के आधार को डॉक्टर आम्बेडकर साहब ने Inherent cultural unity (अन्तर्निहित सांस्कृतिक एकता) कहा है। भारतीय संस्कृति प्राचीन समय से चलती आई हुई भारत की विशेषता है। वह सर्व समावेशक है। व्यक्तियों, समूहों में व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय चारित्र्य, दोनों के सुदृढ़ होने की आवश्यकता है। सरसंघचालकजी ने कहा कि अपने राष्ट्र स्वरूप की स्पष्ट कल्पना व गौरव, संघ की शाखा में प्राप्त होता है। नित्य शाखा में चलनेवाले कार्यक्रमों से स्वयंसेवकों में व्यक्तित्व, कर्तृत्व, नेतृत्व, भक्ति व समझदारी का विकास होता है। इसलिए शताब्दी वर्ष में व्यक्ति निर्माण का कार्य देश में भौगोलिक दृष्टि से सर्वव्यापी हो तथा सामाजिक आचरण में सहज परिवर्तन लानेवाला पंच परिवर्तन कार्यक्रम – सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध तथा स्वदेशी, नागरिक अनुशासन व संविधान का पालन – स्वयंसेवकों के आचरण के उदाहरण से समाजव्यापी बने, यह संघ का प्रयास रहेगा। संघ के स्वयंसेवकों के अतिरिक्त समाज में अनेक अन्य संगठन व व्यक्ति भी इसी तरह के कार्यक्रम चला रहे हैं। उन सब के साथ संघ के स्वयंसेवकों का सहयोग व समन्वय साधा जा रहा है।
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समारोह के अध्यक्ष एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविन्द जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि श्रीविजयादशमी उत्सव का ये दिन संघ का शतकपूर्ति दिवस है। आज विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति का संवाहक करनेवाली आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था का शताब्दी समारोह सम्पन्न हो रहा है। उन्होंने कहा कि नागपुर की यह पावन धरती आधुनिक भारत के विलक्षण निर्माताओं की पावन स्मृति से जुड़ी हुई है। उन राष्ट्र निर्माताओं में दो डॉक्टर ऐसे भी हैं – जिनका मेरे जीवन निर्माण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रहा। वे दोनों महापुरुष हैं – डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर। बाबासाहब आम्बेडकर के संविधान में निहित सामाजिक न्याय की व्यवस्था के बल पर ही मेरी तरह का आर्थिक व सामाजिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति, देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुँच सका। डॉ. हेडगेवार के गहन विचारों से समाज और राष्ट्र को समझने का मेरा दृष्टिकोण स्पष्ट हुआ। दोनों विभूतियों द्वारा निरूपित किए गए राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता के आदर्शों से मेरी जनसेवा की भावना अनुप्राणित रही है।
श्री. रामनाथ कोविन्द जी ने कहा कि संघ की अविरत राष्ट्रसेवा, राष्ट्रभक्ति और समर्पण के ये उदात्त आदर्श हम सबके लिए अनुकरणीय हैं। उन्होंने कहा कि सच्चे अर्थों में मनुष्य कैसे बनें, जीवन कैसे जिएँ, इसका मार्गदर्शन हमें महापुरुषों से प्राप्त होता है। आज भारतीयों के लिए व्यक्तिगत व राष्ट्रीय चारित्र्य से समृद्ध जीवनमार्ग की आवश्यकता है। हमारा सनातन, आध्यात्मिक और समग्र दृष्टिकोण ही मानवता के मन, बुद्धि और अध्यात्म का विकास करता है।
श्री. कोविन्द जी ने कहा कि सामाजिक व्यवहार में बदलाव केवल भाषणों से नहीं आता; इसके लिए व्यापक प्रबोधन आवश्यक है। विविधता होते हुए भी, हम सब एक बड़े समाज का अंग हैं। यह बड़ी पहचान हमारे लिए सर्वोपरि है। विचार, शब्द और कृति से किसी भी समुदाय के श्रद्धा या आस्था का अनादर न हो। जो लोग विकास यात्रा में पीछे छूट गए, उनका हाथ पकड़कर उन्हें अपने साथ ले चलना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।

दलाई लामा का संदेश

इस अवसर पर पूजनीय बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा के संदेश का पठन किया गया । जिसमें उनके द्वारा प्रेषित भावनाएँ व्यक्त की गयी कि, पुनर्जागरण की इस व्यापक धारा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया है। संगठन की स्थापना निःस्वार्थ भाव से हुई थी, जहाँ कर्तव्यबोध की निर्मल और स्पष्ट भावना थी, जिसमें किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं थी। संघ से जुड़ने वाला प्रत्येक स्वयंसेवक मन की पवित्रता और साधनों की पावनता पर आधारित जीवन जीना सीखता है। संघ की सौ वर्षीय यात्रा स्वयं में समर्पण और सेवा का एक दुर्लभ तथा अनुपम उदाहरण है। संघ ने निरंतर लोगों को एकजुट करने का कार्य किया है और भारत को भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से सशक्त बनाया है। भारत के दुर्गम और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी संघ ने शैक्षिक एवं सामाजिक विकास में योगदान दिया है तथा आपदा-ग्रस्त क्षेत्रों में आवश्यक सहयोग प्रदान किया है।

कार्यक्रम में देश-विदेश के गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही। इसमें मुख्य रूप से लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता (सेवानिवृत्त), कोयम्बटूर की डेक्कन इंडस्ट्रीज के प्रबंध निदेशक के. वी. कार्तिक, बजाज फिनसर्व के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक संजीव बजाज समेत घाना, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, थाईलैंड, यूके, यूएसए से भी अतिथि और बड़ी संख्या में नागपुर के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

लेफ्टिनेंट जनरल कलिता ने भारतीय सेना के पूर्व कमांड का नेतृत्व किया है। जून 1984 में उन्होंने कुमाऊ रेजिमेंट के माध्यम से अपनी सेवा शुरू की। उन्होंने सेना के विभिन्न अभियानों का नेतृत्व और मार्गदर्शन किया है। वैश्विक स्तर पर उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के सीरा लियोन मिशन में निरीक्षक के रूप में जिम्मेदारी निभाई है।

कोयम्बटूर की डेक्कन इंडस्ट्रीज के प्रबंध निदेशक के. वी. कार्तिक देश में मोटर पंप निर्माण क्षेत्र के अग्रणी व्यवसायियों में शामिल हैं। वर्तमान में वे इंडियन पंप मैन्यूफैक्चर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में भी कार्यरत हैं। भारत में निर्मित मोटर पंपों के निर्यात में वे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

बजाज फिनसर्व के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक श्री संजीव बजाज, बजाज समूह के वित्तीय सेवा व्यवसाय के प्रमुख हैं। उनके नेतृत्व में बजाज फिनसर्व देश की अत्यंत प्रतिष्ठित कंपनियों में शामिल हुई है। कॉर्पोरेट क्षेत्र में अपनी भूमिका के साथ उन्होंने भारतीय उद्योग परिसंघ के अध्यक्ष के रूप में भारतीय उद्योग क्षेत्र का दूरदर्शी नेतृत्व भी किया है। इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में भी सक्रिय योगदान दिया है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में प. पू. सरसंघचालक जी और प्रमुख अतिथी मा. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी ने शस्त्रपूजन किया । उसके पश्चात स्वागत प्रणाम, ध्वजारोहण और प्रार्थना हुई । तत्पश्चात प्रत्युत प्रचलनम् व प्रदक्षिणा संचलन हुआ । उसके बाद नियुद्ध एवम् घोष का प्रात्यक्षिक, सांघिक गीत, सांघिक योगासन हुए । मा. महानगर संघचालक राजेश जी लोया ने प्रास्ताविक, परिचय, स्वागत तथा सभी के प्रति आभार व्यक्त किया । ध्वजावतरण के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ.

भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी : अयाचित से लोक नेता तक

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पृथक

शास्त्री जी को हम सब ने बचपन में अपनी पुस्तकों में एक ऐसे युवा के तौर पर पढ़ा था जो तैर करके गंगा जी पार करके अपने स्कूल पढ़ने जाता था। स्कूल पहुंचने की यह जद्दोजहद लगभग हर जगह है थोड़ी कम या ज्यादा मुझे याद है हमारे कृष्णा नगर, यमुनापार में बरसात के दिनों में पानी भर जाया करता था स्कूल बसे बंद हो जाती थी साइकिल स्कूटर इत्यादि भी ठीक से नहीं चल पाते थे मगर स्कूल पहुंचना था तो पहुंचा जाता था। अपने छोटे दुखों से हमने शास्त्री जी की विकट परिस्थितियों का अंदाजा अच्छे से लगाया।

शास्त्री जी, प्रधानमंत्री बनने के कोई नेचुरल विकल्प नहीं थे वह कांग्रेस में या कहे पूरे देश में ही सबसे कमजोर समझे जाने व्यक्ति आगे बढ़ाए जाने की नीति के अयाचित लाभार्थी थे। कमजोर समझे जाने वाले व्यक्ति को इसलिए आगे बढ़ाया जाता है ताकि वह पहले से ही ऊपर बैठे किसी मजबूत व्यक्ति को चुनौती न दे सके। शास्त्री जी का चयन इसी नीति के तहत हुआ बाद में हमने देखा कि पहले अस्वस्थ शंकर दयाल शर्मा को और उनके मना करने पर बाद में अस्वस्थ पीवी नरसिम्हा राव को भी इसी मकसद से चुना गया। फिर आज कल पप्पू यादव के साथ जो कुछ भी हो रहा है वह तेजस्वी यादव के सामने भविष्य में मजबूत यादव नेतृत्व के संकट को खत्म करने के लिए हो रहा हैं, अमिताभ बच्चन, माधवराव सिंधिया आदि भी वैसे ही विकटिमहुड उदाहरण हैं।

खैर इस अयाचित प्रधानमंत्री से शुरुवात में तो कांग्रेस के सिंडिकेट ( सात नेता जिनके ग्रुप लीडर के. कामराज थे ) ने अपने दबाव में काम करवा लिया पर 1965 के युद्ध में शारीरिक और सामाजिक राजनीतिक लोकेशन के आधार पर कमजोर समझे जाने वाले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिखा दिया की उनमें कितना दम हैं। ऐसा दमखम एक व्यक्ति में तब भी आ पाता है जब वह सारे समाज को, अपने राजनैतिक विरोधियों को एक साथ लेकर के चलता है। युद्ध के समय प्रधानमंत्री रहते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने पार्टी लाइन से ऊपर उठकर आरएसएस के सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिव गोलवलकर को सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किया। डॉ. हरीश चंद्र बर्थवाल ने अपनी पुस्तक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघः एक परिचय में कहा है कि इस आमंत्रण का उद्देश्य दिल्ली पुलिस को अधिक रणनीतिक गतिविधियों का कार्यभार सौंपना और उन्हें उनके नियमित कर्तव्यों से मुक्त करना था, जिन्हें बाद में आरएसएस कार्यकर्ताओं द्वारा संभाला गया। बर्थवाल ने यहां तक दावा किया कि शास्त्री के अनुरोध पर, आरएसएस कार्यकर्ताओं ने युद्ध के मोर्चे पर तैनात सैनिकों को भोजन और अन्य आवश्यक आपूर्ति भी प्रदान की।

अपनी आत्मकथा में भारतीय जनता पार्टी के शिखर पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी लाल बहादुर शास्त्री का वर्णन करते हुए कहते हैं, “नेहरू के विपरीत, शास्त्री जी ने जनसंघ और आरएसएस के प्रति कोई वैचारिक शत्रुता नहीं रखी। वह अक्सर राष्ट्रीय मुद्दों पर परामर्श के लिए श्री गुरुजी को आमंत्रित करते थे।” आर्गनाइज़र’ में अपने संपादकीय लेख में आडवाणी जी ने कहा ‘नेहरू से उलट, शास्त्री ने जनसंघ और आरएसएस को लेकर किसी तरह का वैमनस्य नहीं रखा. वह श्री गुरुजी को राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए बुलाया करते थे.’

इसी प्रकार शास्त्री जी का किस्सा संघ के चतुर्थ सरसंघचालक श्री रज्जू भैय्या के संस्मरण से भी मिलता है। दोनों लोग रज्जू भैय्या और प्रधानमंत्री शास्त्री उत्तर प्रदेश प्रयागराज से थे, स्थानिक होने की वजह से दोनों के घनिष्ठ सम्बन्ध थे। जब शास्त्री जी क्षेत्रीय यानी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय थे, तब एक बार सरसंघचालक श्री गुरूजी की उपस्थिति में कुछ गणमान्य लोगों के लिए चायपान का कार्यक्रम आयोजित हुआ था। श्री रज्जू भैय्या ने शास्त्री जी को इस का निमंत्रण दिया, तब शास्त्री जी ने कहा कि मैं आना चाहता हूँ, पर नहीं आऊंगा कारण मेरे वहां आने से कांग्रेस में मेरे बारे में तरह-तरह की बातें शुरू हो जाएंगी।

इस पर श्री रज्जू भैय्या ने पूछा कि – “शास्त्री जी! आप जैसे व्यक्ति के बारे में भी लोग ऐसी बातें करेंगे?” तब उन्होंने कहा – “अरे! आप नहीं जानते राजनीति क्या होती है।” इस पर श्री रज्जू भैय्या ने कहा कि हमारे यहां संघ में ऐसा नहीं है। यदि कोई स्वयंसेवक मुझे आपके साथ देखता है तो वह सोचेगा कि – “रज्जू भैय्या शास्त्री जी को संघ समझा रहे होंगे।” शत्रुता नहीं रखने की वजह से ही शास्त्री जी अजात शत्रु भी कहलाये जाते थे

शास्त्री जी राजनीति में रहते हुए भी प्रधानमंत्री रहते हुए भी सादा बने रहे, उनकी लोन द्वारा ली गई कार यदा कदा सोशल मीडिया पर चर्चा में आ जाती है। यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके ठीक सामने पाकिस्तान के अयूब खान थे जिनकी लाइफस्टाइल और रंगोलिया के किस्से इतिहास में बखूबी दर्ज हैं। 65 युद्ध में शास्त्री जी कठोर निर्णय कर चुके थे इसलिए शायद वह किसी षड्यंत्र का शिकार हुए।

2017 में प्रयागराज में शास्त्री जी एवं उनकी पत्नी ललिता जी की मूर्ति की अनावरण करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने उन्हें लोक नेता कहकर सम्बोधित किया तो 2019 में एक कदम आगे बढ़कर प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी के एयरपोर्ट पर लालबहादुर शास्त्री जी की आदम कद मूर्ति लगवा कर उन्हें श्रद्धांजलि दी, इस प्रकार लार्जर देन लाइफ गांधियन प्रधानमंत्रियों की इमेज बिल्डिंग से इतर भारत के इस महान सपूत को विपक्ष ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की, आज उनकी जयंती पर उनको नमन श्रद्धांजलि ।

बेकार, बेकाम नहीं हैं हमारे वृद्धजन

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प्रो. मनोज कुमार

भोपाल । सक्सेना जी पीएचई विभाग में चीफ इंजीनियर के पद से रिटायर हुए हैं. किसी समय उनकी तूती बोला करती थी लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव में ना केवल वे अकेले हैं बल्कि वृद्धाश्रम का एक कोना उनका बसेरा बन गया है. कभी करोड़ों का मामला सुलटाने वाले अग्रवाल दंपति की कहानी भी यही है. गणित और अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे द्विवेदी दंपति भी उम्र के आखिरी पड़ाव पर वृद्धाश्रम में रह रहे हैं. ये वे लोग हैं जिनकी काबिलियत और अनुभवों से समाज रोशन होता था. उनके अपने बच्चे आज किसी मुकम्मल मुकाम पर हैं तो उनका ही सहारा था. जिन्हें आप माता-पिता कहते हैं, आज वृद्धाश्रम में बिसूर रहे हैं. निराश और हताश भी हैं. ये दो चार लोग नहीं बल्कि वृद्धजनों की पूरी टोली है. आपस में बतिया लेते हैं और वृद्धाश्रम के दरवाजे पर टकटकी लगाये देखते हैं कि कहीं बहू-बेटा तो लेने नहीं आए? पोता-पोती की सूरत याद कर हौले से मुस्करा देते हैं लेकिन गोद में उठाकर लाड़ ना कर पाने की हसरत उनके चेहरे पर मायूसी बनकर उभर आती है. यह कहानी घर-घर की होती जा रही है. थोड़ा पैसा, थोड़ा रसूख कमाने के साथ ही वृद्धजन बोझ बनने लगते हैं. और जल्द ही तलाश कर लेते हैं उनके लिए वृद्धाश्रम का कोई कोना. पहले पहल आना-जाना भी होता है लेकिन धीरे-धीरे वह भी भुला दिया जाता है. संस्कारों में रची-बसी भारतीय संस्कृति का यह दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है. इन पर लिखते हुए मैं भी एक गलती कर रहा हूँ क्यों एक दिन वृद्धजन दिवस पर लिख रहा हूँ. क्यों साल में बार-बार इस बात का स्मरण नहीं कराता हूँ. सच है लेकिन यह दिन इसलिए चुना कि आज अंतरराष्ट्रीय दिवस वृद्धजन के बहाने लोग पढ़ तो लेेंगे. खास बात यह है कि हमारे वृद्धजन लिए नहीं बल्कि बाजार का दिन है. उम्र भर लतियाते वृद्धजनों का ऐसा सम्मान किया जाएगा कि लगेगा कि कुछ हुआ ही नहीं. इसी दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय की चर्चा कर रहा हूँ.

क्या ही हैरानी की बात है कि जिनसे हम रौशन हैं, जिनसे हमारा घर रौशन है, उनके लिए हमने एक दिन तय कर दिया है और नाम दे दिया है वृद्धजन दिवस. और इसका फलक बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय कर दिया है. यूरोप की मानसिकता में वृद्धजन के लिए यह सौफीसदी मुफीद हो सकता है लेकिन भारतीय सनातनी संस्कृति में वृद्धजन बेकार और बेकाम नहीं हैं लेकिन दुर्र्भाग्य से हमने भी यूरोपियन संस्कृति का अंधानुकरण कर उन्हें बेकार और बेकाम मान लिया है. उम्र के आखिरी पड़ाव में ठहरे वृद्धजनों के पास अनुभव है, कौशल है और है दुनियादारी की वह समझ लेकिन वे निहायत अकेले होकर वृद्धाश्रम में अपना समय गुजार रहे हैं. कितनी विडम्बना है कि एक तरफ हम सनातनी होने और संस्कार की दुहाई देते नहीं थकते और दूसरी ओर वृद्धजन की उपेक्षा और तिरस्कृत करने में पीछे नहीं हटते. आखिर क्या मजबूरी हो गई कि जिनकी छाँह में पलकर हम बढ़े हुए, वही हमारे लिए बोझ बन गए? क्यों हम उनके अनुभवों का लाभ लेकर जीवन को संवार नहीं पा रहे हैं? क्या कारण है कि उन्हें साथ रखते हुए कथित प्रायवेसी में बाधा आ रही है? सवाल अनेक हैं लेकिन सवालों के बीच अपने दुख और अहसास के बीच घुटते-घबराते वृद्धजनों की सुध कौन लेगा? क्या वृद्धाश्रम ही अंतिम विकल्प है.

वृद्धजनों को घर से बाहर निकाल देना, उनके साथ शारीरिक हिंसा करना और उन्हें अपमानित करने की खबरें अब रोजमर्रा की हो गई हैं. संवेदहीन होते समाज में वृद्धजन दिवस बाजार के लिए एक दिन है. वृद्धजनों को उत्पाद बना दिया जाएगा. दरअसल बाजार से बाहर आकर इन वृद्धजनों के टैलेंट का उपयोग करना होगा. परिवार के नालायक बच्चों ने वृद्धजनों को वृद्धाश्रम में भेज दिया है तो समाज का, सरकार का दायित्व है कि उन्हें मुख्यधारा में लाकर उनकी ना केवल प्रतिभा का सम्मान करे बल्कि उन्हें सम्मानपूर्वक जीने का हौसला दे. देशभर के शासकीय स्कूलों की हालत एक जैसी है. शिक्षकों की कमी है तो इस कमी को इन वृद्धजनों से पूरा क्यों नहीं किया जा सकता है? इन्हें स्कूलों में अध्यापन का अवसर दिया जाए और बदलेे में सम्मानजनक मानदेय. ऐसा करने से उनके भीतर का खोया आत्मविश्वास लौटेगा. वे स्वयं को सुरक्षित और उपयोगी समझेंगे तो डॉक्टर और दवा से उनकी दूरी बन जाएगी. एक बेटे, पोते-पोती की कमी को दूर कर सकेंगे. स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता आएगी. आखिरकार अनुभव अनमोल होता है.

कुछ वृद्धजन गणित, विज्ञान, हिन्दी, अंग्रेजी और अन्य विषयों के जानकार होंं लेकिन कुछ वृद्धजन ऐसे होंगे जो विषयों के सिद्धहस्त ना होंं लेकिन दूसरी विधा के जानकार हों, उन्हें कौशल विकास के कार्यों में नई पीढ़ी को दक्ष करने के कार्य में उपयोग किया जाना चाहिए. वृद्धाश्रम के भीतर ही कौशल उन्नयन की कक्षा आयोजित कर उत्सुक युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे सीख सकें. अध्यापन का कार्य हो या कौशल उन्नयन का. ज्यादा कुछ नहीं तो वृद्धाश्रम के भीतर ही हम विविध विषयों की साप्ताहिक कोचिंग कक्षा के संचालन की शुरूआत कर सकते हैं. जिसमें विषय की शिक्षा तो होगी ही, विविध कलाओं की कक्षाएं भी होंगी. जो जिस विधा में पारंगत है, वे उसमें सक्रिय हो जाएंगे. इन गतिविधियों में वृद्धजनों का जुड़ाव होगा तो वे वापस स्वस्थ्य और प्रसन्न हो जाएंगे. जिंदगी के प्रति उनका अनुराग बढ़ जाएगा. हौसला बढ़ेगा तो वे दवा से दूर हो जाएंगे.

बस, थोड़ा सा हमें उनके प्रति मेहनत करना है. थोड़ा सा साहस देना है. परिवार से टूटे लोग शरीर से ज्यादा मन से टूट जाते हैं और मन से टूटे को जोडऩा आसान नहीं होता लेकिन मुश्किल कुछ भी नहीं है. दो को खड़ा कीजिए, दस अन्य स्वयं सामने आ जाएंगे. इसमें जेंडर का कोई भेद नहीं हैं. वृद्धजनों का अर्थ माता और पिता दोनों ही हैं और दोनों ही अपने बच्चों से सताये हुए हैं. इस बार वृद्धजन दिवस पर हमें, हम सबको संकल्प लेना होगा कि अबकी बार वे वृद्धाश्रम में नहीं, कौशल की पाठशाला में रह रहे होंगे. वृद्धाश्रम को कौशल की पाठशाला में परिवर्तन ही भारतीय संस्कृति की ओर वापसी का पहला कदम होगा. नालायक बच्चों के लिए यह एक पाठ होगा कि उन्होंने कौन सा अनमोल हीरा गंवा दिया है. बाजार को अपना काम करने दीजिए, हम सब अपना काम करेंगे. एक बार कोशिश तो करके देखिए. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

समाज सहयोग से संघ शताब्दी यात्रा सुगम बनी

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दिल्ली ।

दत्तात्रेय होसबाले

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को अभी सौ वर्ष पूर्ण हो रहेहै। इस सौ वर्ष की यात्रा में कई लोग सहयोगी और सहभागीरहे हैं। यह यात्रा परिश्रम पूर्ण और कुछ संकटों से अवश्यघिरी रही, परंतु सामान्य जनों का समर्थन उसका सुखद पक्षरहा। आज जब शताब्दी वर्ष में सोचते हैं तो ऐसे कई प्रसंगऔर लोगों का स्मरण आता है, जिन्होंने इस यात्रा कीसफलता के लिए स्वयं सब कुछ समर्पित कर दिया।

प्रारंभिक काल के वे युवा कार्यकर्ता एक योद्धा की तरह देशप्रेम से ओत-प्रोत होकर संघ कार्य हेतु देशभर में निकल पड़े।अप्पाजी जोशी जैसे गृहस्थ कार्यकर्ता हों या प्रचारक स्वरूपमें दादाराव परमार्थ, बालासाहब व भाऊराव देवरस बंधु, यादवराव जोशी, एकनाथ रानडे आदि लोग डॉक्टर हेडगेवारजी के सान्निध्य में आकर संघ कार्य को राष्ट्र सेवा काजीवनव्रत मानकर जीवन पर्यन्त चलते रहे।

संघ का कार्य लगातार समाज के समर्थन से ही आगे बढ़तागया। संघ कार्य सामान्य जन की भावनाओं के अनुरूप होनेके कारण शनैः शनैः इस कार्य की स्वीकार्यता समाज मेंबढ़ती चली गई। स्वामी विवेकानंद से एक बार उनके विदेशप्रवास में यह पूछा गया कि आपके देश में तो अधिकतम लोगअनपढ़ हैं, अंग्रेज़ी तो जानते ही नहीं हैं, तो आपकी बड़ी-बड़ीबातें भारत के लोगों तक कैसे पहुँचेगी? उन्होंने कहा कि जैसेचीटियों को शक्कर का पता लगाने के लिए अंग्रेज़ी सीखनेकी ज़रूरत नहीं है, वैसे ही मेरे भारत के लोग अपनेआध्यात्मिक ज्ञान के चलते किसी भी कोने में चल रहेसात्विक कार्य को तुरंत समझ जाते हैं व वहीं वो चुपचापपहुँच जाते हैं। इसलिए वे मेरी बात समझ जायेंगे। यह बातसत्य सिद्ध हुई। वैसे ही संघ के इस सात्विक कार्य को धीरेक्यों न हो, सामान्य जन से स्वीकार्यता व समर्थन लगातारमिल रहा है।

संघ कार्य के प्रारंभ से ही संपर्कित व नये-नये सामान्यपरिवारों द्वारा संघ कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद व आश्रय प्राप्तहोता रहा। स्वयंसेवकों के परिवार ही संघ कार्य संचालन केकेंद्र रहे। सभी माता-भगिनियों के सहयोग से ही संघ कार्य कोपूर्णता प्राप्त हुई। दत्तोपंत ठेंगड़ी या यशवंतराव केलकर, बालासाहेब देशपांडे तथा एकनाथ रानडे, दीनदयाल उपाध्यायया दादासाहेब आपटे जैसे लोगों ने संघ प्रेरणा से समाजजीवन के विविध क्षेत्रों में संगठनों को खड़ा करने में अहमभूमिका निभाई। ये सभी संगठन वर्तमान समय में व्यापकविस्तार के साथ-साथ उन क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव लानेमें सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। समाज की बहनों के मध्य इसीराष्ट्र कार्य हेतु राष्ट्र सेविका समिति के माध्यम से मौसी जी केलकर से लेकर प्रमिलाताई मेढ़े जैसी मातृसमान हस्तियोंकी भूमिका इस यात्रा में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

संघ द्वारा समय-समय पर राष्ट्रीय हित के कई विषयों कोउठाया गया। उन सभी को समाज के विभिन्न लोगों कासमर्थन प्राप्त हुआ, जिनमें कई बार सार्वजनिक रूप सेविरोधी दिखने वाले लोग भी शामिल रहे। संघ का यह भीप्रयास रहा कि व्यापक हिंदू हित के मुद्दों पर सभी का सहयोगप्राप्त किया जाए। राष्ट्र की एकात्मता, सुरक्षा, सामाजिकसौहार्द तथा लोकतंत्र एवं धर्म-संस्कृति की रक्षा के कार्य मेंअसंख्य स्वयंसेवकों ने अवर्णनीय कष्ट का सामना किया औरसैकड़ों का बलिदान भी हुआ। इन सबमें समाज के संबल काहाथ हमेशा रहा है।

1981 में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में भ्रमित करते हुए कुछहिंदुओं का मतांतरण करवाया गया। इस महत्वपूर्ण विषय परहिंदू जागरण के क्रम में आयोजित लगभग पाँच लाख कीउपस्थिति वाले सम्मेलन की अध्यक्षता करने हेतु तत्कालीनकांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. कर्णसिंह उपस्थित रहे। 1964 मेंविश्व हिन्दू परिषद की स्थापना में प्रसिद्ध संन्यासी स्वामीचिन्मयानंद, मास्टर तारा सिंह व जैन मुनी सुशील कुमार जी, बौद्ध भिक्षु कुशोक बकुला व नामधारी सिख सद्गुरु जगजीतसिंह इनकी प्रमुख सहभागिता रही। हिन्दू शास्त्रों मेंअस्पृश्यता का कोई स्थान नहीं है यह पुनर्स्थापित करने केउद्देश्य से श्री गुरूजी गोलवलकर की पहल पर उडुपी मेंआयोजित विश्व हिंदू सम्मेलन में पूज्य धर्माचार्यों सहित सभीसंतों-महंतों का आशीर्वाद व उपस्थिति रही। जैसे प्रयागसम्मेलन में न हिंदुः पतितो भवेत् ( कोई हिन्दू पतित नहीं होसकता) का प्रस्ताव स्वीकार हुआ था वैसे ही इस सम्मेलन काउद्घोष था – हिंदवः सोदराः सर्वे अर्थात सभी हिन्दू भारत माताके पुत्र हैं। इन सभी में तथा गौहत्या बंदी का विषय हो या रामजन्मभूमि अभियान, संतों का आशीर्वाद संघ स्वयंसेवकों कोहमेशा प्राप्त होता रहा है।

स्वाधीनता के तुरंत पश्चात राजनीतिक कारणों से संघ कार्यपर तत्कालीन सरकार द्वारा जब प्रतिबंध लगाया गया, तबसमाज के सामान्य जनों के साथ अत्यंत प्रतिष्ठित व्यक्तियोंने विपरीत परिस्थितियों में भी संघ के पक्ष में खड़े होकर इसकार्य को संबल प्रदान किया। यही बात आपातकाल केसंकट समय में भी अनुभव में आई। यही कारण है कि इतनीबाधाओं के पश्चात भी संघ कार्य अक्षुण्ण रूप से निरंतर आगेबढ़ रहा है। इन सभी परिस्थितियों में संघ कार्य एवंस्वयंसेवकों को सँभालने का दायित्व हमारी माता-भगिनीयों नेबड़ी कुशलता से निभाया। यह सभी बातें संघ कार्य हेतु सर्वदाप्रेरणास्रोत बन गयी हैं।

भविष्य में राष्ट्र की सेवा में समाज के सभी लोगों के सहयोगएवं सहभागिता के लिए संघ स्वयंसेवक शताब्दी वर्ष मेंघर-घर संपर्क के द्वारा विशेष प्रयास करेंगे। देशभर में बड़ेशहरों से लेकर सुदूर गाँवों के सभी जगहों तक तथा समाज केसभी वर्गों तक पहुँचने का प्रमुख लक्ष्य रहेगा। समूचे सज्जनशक्ति के समन्वित प्रयासों द्वारा राष्ट्र के सर्वांगीण विकासकी आगामी यात्रा सुगम एवं सफल होगी।

(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह हैं)

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