अब खून से सना नेपाल का सिंहासन

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अनूप

काठमांडू: अदृश्य सत्य और वास्तविकता, कौन ज़्यादा दोषी है? अगर कोई व्यक्ति बहुत नीच, भ्रष्ट था, तो ठीक है। लेकिन सबसे बड़ा दोषी, भ्रष्ट व्यक्ति से भी ज़्यादा, सबसे ख़तरनाक है जो किसी को दिखाई नहीं देता। कम ज्ञान वाले लोग इसे नहीं देख सकते, लेकिन सभी बुद्धिमान और विशेषज्ञ लोग इस तथ्य को पहले से ही समझ लेते हैं। वे ज़्यादा दोषी हैं!

जिन लोगों ने, जनरेशन ज़ेड के विरोध प्रदर्शनों की आड़ में, सिर्फ़ सत्ता के लिए, सरकार को उखाड़ फेंकने की राजनीतिक योजना को गुप्त रूप से अंजाम दिया। अब सिंहासन खून से सना है। जो भी इस पर बैठेगा, उसका विनाश निश्चित है। जिन लोगों ने जनरेशन ज़ेड की आड़ में, जनरेशन ज़ेड को अपनी सत्ता का खेल खेलने के लिए एक मुखौटा के रूप में इस्तेमाल करके घुसपैठ की, उन्हें केवल बुद्धिमान लोग ही देख सकते हैं। काल्पनिक मास्टरमाइंड के हाथ खून से सने हैं। जिसने भी सत्ता के लिए चुपचाप घुसपैठ की, उसे जल्द ही लोग समझ जाएँगे। जो भी रक्तरंजित सिंहासन पर बैठेगा, उसका विनाश निश्चित है।

जिन लोगों ने इस कहानी को अंजाम दिया, उन्हें राजनीति से दूर लोग ही देखेंगे। सच्चाई जल्द ही सामने आएगी, और दोषियों को अपने किए की सज़ा भुगतनी पड़ेगी। आम लोग इसे नहीं देख सकते, लेकिन ईश्वर सब कुछ देखता है। अगर छात्रों की हत्या न होती, तो लोग सड़कों पर न उतरते। लोग भड़के हुए थे। जेनरेशन ज़ेड के विरोध प्रदर्शन शुरू में शांतिपूर्ण और संतुलित थे, लेकिन मास्टरमाइंड को किसी भी कीमत पर अपना राजनीतिक खेल खेलना था।

अब नेपाल 25 साल पीछे चला गया है। लंबे समय तक पर्यटक नहीं आएंगे। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, होटल और विकास प्रभावित होंगे। आर्थिक नुकसान अभी पूरी तरह से नहीं हुआ है। नए नुकसान से उबरने में सालों लगेंगे। तो, हमें सोचना चाहिए कि मुख्य दोषी कौन हैं? वे जिन्होंने गुप्त रूप से योजना को अंजाम दिया? या वे जो पहले से ही भ्रष्ट थे? या मानवीय अज्ञानता, जहाँ ज्ञान और बुद्धि असंतुलित हैं? कौन ज़्यादा दोषी है?

खैर, सिंहासन अब खून से सना हुआ है। ईश्वर सत्य देख सकता है। जिसने भी खूनी खेल खेला और सत्ता के लिए योजना को अंजाम दिया, उसका विनाश निश्चित है। ईश्वर सब कुछ देखता है। कभी-कभी जो हो रहा होता है वो दिखाई नहीं देता, और जो दिखाई देता है वो सच नहीं होता। राजनीति को समझना आसान नहीं है। कहानी अलग है, और आम लोगों को पता ही नहीं चलता कि क्या हुआ। लेकिन ईश्वर पापों का हिसाब लेगा, और ईश्वर सच्चाई जानता है। ईश्वर जानता है कि किसका कितना गुनाह है।

नेपाल का विद्रोह और भारत-नेपाल संबंधों में गोरक्षपीठ की भूमिका

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काठमांडू: भगवान पशुपतिनाथ की कृपा-भूमि नेपाल इस समय विद्रोह की उफनती लहरों में डगमगा रहा है। Gen Z आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वहां की जनता भ्रष्टाचार, असमानता और अवसरहीनता से ऊबकर निर्णायक प्रतिकार के मार्ग पर अग्रसर हो चुकी है। सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध ने इस असंतोष की चिंगारी को प्रचंड अग्निज्वाला में बदल दिया है। परंतु यह संकट केवल राजनीति या सत्ता तक सीमित नहीं है। यह नेपाल की सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक आस्था और सामाजिक धड़कनों को भी झकझोर रहा है।

हिमालय की गोद और गंगा-यमुना की सांस्कृतिक गाथाओं से जुड़ा यह देश सदियों से भारत के साथ साझा परंपराओं का सेतु रहा है। भगवान पशुपतिनाथ के आशीष से पवित्र यह भूमि और जनक-राम की विवाह-स्थली जनकपुर से लेकर बुद्ध के जन्मस्थल लुंबिनी तक की सांस्कृतिक यात्रा भारत-नेपाल की एकात्मता का अश्वर प्रमाण है। हर वर्ष आयोजित राम-जानकी विवाह महोत्सव, मकर संक्रांति मेले और कुम्भ-लुंबिनी संवाद जैसे पर्व इस एकात्मता को प्रत्यक्ष रूप से जीवित रखते हैं। ऐसे अस्थिर समय में भारत-नेपाल संबंधों का भविष्य केवल औपचारिक कूटनीति से तय नहीं होगा, बल्कि उन सांस्कृतिक स्तंभों की दृढ़ता पर टिका है, जिन्होंने सदियों से दोनों देशों की आत्माओं को एक सूत्र में पिरोया है। इन्हीं में सबसे प्रमुख है पावन गोरक्षपीठ (गोरखनाथ मठ, गोरखपुर), जो भगवान पशुपतिनाथ की पावन परंपरा के साथ मिलकर भारत और नेपाल की एकात्म सांस्कृतिक धारा का अमिट प्रतीक और विश्वास का जीवंत आधार है।

*गोरक्षपीठ और नेपाल : संस्कृति का संबल, आस्था का सेतु*

नेपाल के इतिहास में गोरक्षपीठ की भूमिका केवल एक मठ की मर्यादा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सांस्कृतिक संबल और आध्यात्मिक सेतु के रूप में युगों-युगों तक गूंजती रही। हिमालय की गोद में जब 18वीं शताब्दी में गोरखनाथ की साधना का आलोक फैला, तब गोरखा राज्य को केवल नाम ही नहीं, बल्कि आत्मा भी मिली। पृथ्वी नारायण शाह ने जब नेपाल को एकसूत्र में पिरोया, तो उन्होंने गोरखनाथ को राष्ट्र-रक्षक माना। इस प्रकार गोरक्षनाथ परंपरा नेपाल की राजनीतिक चेतना की धड़कन बन गई।

20वीं शताब्दी में महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज और महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने इस परंपरा को नया प्राण और नया पथ दिया। पावन गोरक्षपीठ ने संतों को संगठित कर यह स्पष्ट किया कि भारत–नेपाल का संबंध न तो केवल सीमा का संबंध है और न ही केवल व्यापार का बंधन। यह तो आस्था की अटूट डोर और संस्कृति की सनातन संगीतमाला है।

1980–90 के दशक में जब नेपाल वामपंथी विचारधारा और राजनीतिक अस्थिरता की आंधी से जूझ रहा था, तब गोरक्षपीठ ने दीपक की तरह मार्ग दिखाया। महंत अवेद्यनाथ जी ने यह संदेश दिया कि भारत–नेपाल का संबंध केवल सत्ता की संधियों पर नहीं, बल्कि सदियों की साधना और साझी संस्कृति पर टिका है।

आधुनिक युग में गोरक्षपीठ का ध्वज योगी आदित्यनाथ ने संभाला है। उनकी जनकपुरधाम यात्रा वैदिक वाणी का उद्घोष बनी, पशुपतिनाथ मंदिर की पूजा आस्था का आलोक बनी, और लुंबिनी की बुद्ध जयंती सहभागिता हिन्दू-बौद्ध संवाद का संगम बनी। आज गोरक्षपीठ केवल एक धार्मिक पीठ नहीं, बल्कि आधुनिक सांस्कृतिक कूटनीति का उज्ज्वल प्रतीक है।

गोरक्षपीठ ने नेपाल में कभी प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं किया, किंतु हर संकटकाल में यह दीपशिखा बनकर दिशा दिखाता रहा। यह वही शक्ति है जो सीमाओं से परे, सत्ता से ऊपर और संधियों से आगे जाकर भारत–नेपाल संबंधों को स्थायित्व और आत्मीयता देती है। यही कारण है कि नेपाल का जनमानस गोरक्षपीठ को केवल मठ नहीं मानता, बल्कि विश्वास का आधार, संस्कृति का संरक्षक और सनातन सेतु मानता है। एक ऐसा सेतु, जो हिमालय की चोटियों से लेकर गंगा-यमुना की धाराओं तक दोनों देशों की आत्माओं को एक सूत्र में बांधे रखता है।

*मौजूदा विद्रोही परिस्थिति में गोरक्षपीठ की भूमिका*

नेपाल की मौजूदा विद्रोही परिस्थितियां केवल सत्ता के संकट का परिणाम नहीं हैं, बल्कि समाज की गहरी बेचैनी, असमानता और अवसरहीनता का विस्फोट हैं। ऐसे समय में गोरक्षपीठ की भूमिका साधारण धार्मिक केंद्र तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह सांस्कृतिक मार्गदर्शक और सामाजिक सहारा बन सकती है।

सबसे पहले, सांस्कृतिक स्मृति जगाना आवश्यक है। जनता को यह स्मरण कराना होगा कि राजनीतिक अस्थिरता अस्थायी है, लेकिन भारत-नेपाल की साझा परंपराएं शाश्वत हैं। हिमालय की गोद से लेकर गंगा की धारा तक बहती हुई यह सांस्कृतिक चेतना दोनों देशों की आत्माओं को जोड़े रखती है। जब युवाओं का आक्रोश व्यवस्था पर टूट पड़ता है, तब गोरक्षपीठ यह संदेश दे सकता है कि परिवर्तन केवल संघर्ष से नहीं, बल्कि परंपरा की जड़ों से जुड़कर ही स्थायी हो सकता है।

दूसरे, गोरक्षपीठ एक विश्वास का सेतु बन सकता है। आज जब राजनीतिक दल आपसी अविश्वास और आरोप-प्रत्यारोप में उलझे हैं, तब जनता को किसी ऐसे मंच की आवश्यकता है, जो न तो सत्ता की लालसा से प्रेरित हो और न ही दलगत स्वार्थ से। गोरक्षपीठ अपने संतत्व और निष्पक्षता के कारण ऐसा मंच बन सकता है, जो संवाद, सहयोग और भरोसे का प्रतीक बने। यह संस्था नेपाल की जनता को यह विश्वास दिला सकती है कि भारत केवल एक राजनीतिक ताकत नहीं, बल्कि एक आत्मीय पड़ोसी, सहयात्री और सांस्कृतिक सहोदर है।

तीसरे, धार्मिक पर्यटन और अर्थव्यवस्था की दृष्टि से गोरक्षपीठ का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि गोरखनाथ-पशुपतिनाथ- जनकपुर – लुंबिनी जैसी ध्रुवीय स्थलों को एक साझा सांस्कृतिक–धार्मिक यात्रा मार्ग के रूप में विकसित किया जाए, तो इससे न केवल नेपाल की डगमगाती अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा, बल्कि भारत–नेपाल के बीच जन-से-जन संपर्क और भी गहरा होगा। साल 2023 में ही नेपाल में 319,000 से अधिक भारतीय पर्यटक पहुंचे और 2024 की पहली छमाही में यह संख्या 1.8 लाख से अधिक रही। यह आंकड़े बताते हैं कि धार्मिक पर्यटन नेपाल की अर्थव्यवस्था की धड़कन है। पर्यटन से जुड़ी आय, रोजगार और सांस्कृतिक आयोजनों से जनता का मनोबल बढ़ेगा और अस्थिरता के बीच स्थिरता का अहसास होगा।

और सबसे महत्वपूर्ण यह कि गोरक्षपीठ की पहुंच केवल राजाओं, राजनेताओं या संतों तक ही सीमित नहीं रही है, बल्कि आमजन के मन में भी उसकी गहरी जड़ें हैं। नेपाल के गांव-गांव और तराई के कस्बों तक में गोरखनाथ का नाम श्रद्धा और विश्वास के साथ लिया जाता है। किसान इसे अपने परिश्रम का संरक्षक मानते हैं, व्यापारी इसे अपने सौदे की सफलता का आशीर्वाद समझते हैं, और युवा इसे संघर्ष और संकल्प का प्रतीक मानते हैं। यही कारण है कि गोरक्षपीठ की पुकार जनता के हृदय तक सीधे पहुंचती है और कठिन समय में आश्वस्ति का आधार बन जाती है।

अंतरराष्ट्रीय कथा वाचक आचार्य शांतनु जी महाराज पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि नेपाल की आत्मा केवल सत्ता या संविधान से नहीं, बल्कि गुरु परंपरा से जुड़ी है। गोरखनाथ की साधना और पशुपतिनाथ की कृपा ही वह धारा है, जो हर संकट में नेपाल समाज को संभालती रही है। जब राजनीति डगमगाती है, तब जनता गोरक्षपीठ की ओर आश्वस्ति से देखती है। क्योंकि वहां से संदेश सत्ता का नहीं, बल्कि संस्कृति का आता है।

*भारत की कूटनीति में गोरक्षपीठ का महत्व*

भारत–नेपाल संबंध अतीत में कई बार वामपंथी राजनीति, क्षेत्रीय राष्ट्रवाद और बाहरी दबावों से प्रभावित हुए हैं। कभी तेल और दाल-चावल की आपूर्ति रोकने का आरोप लगा, तो कभी चीन ने निवेश और कूटनीति के जरिए नेपाल की राजनीति में हस्तक्षेप बढ़ाया। ऐसे समय में गोरक्षपीठ एक ऐसा संदेश देता है, जो इन सब राजनीतिक उलझनों से ऊपर है। यह रिश्ता केवल सत्ता या आर्थिक गणित का नहीं, बल्कि संस्कृति, धर्म और आस्था का है।

भारत की औपचारिक कूटनीति जब संधियों, समझौतों और वार्ताओं तक सीमित रहती है, तब गोरक्षपीठ सांस्कृतिक कूटनीति का जीवंत उदाहरण बनता है। यह वह शक्ति है, जो नेपाल की जनता के दिल तक पहुंचती है। पशुपतिनाथ की कृपा-भूमि में गोरक्षपीठ यह विश्वास जगाता है कि भारत–नेपाल का संबंध केवल पड़ोसी देशों का नहीं, बल्कि भाईचारे और साझी परंपराओं का है।

यदि भारत अपनी राजनीतिक कूटनीति को गोरक्षपीठ की सांस्कृतिक शक्ति के साथ जोड़ता है, तो उसे वह गहराई और आत्मीयता प्राप्त होगी, जो चीन जैसे बाहरी शक्तियों के आर्थिक निवेश से संभव नहीं। हाल ही में भारत–नेपाल के बीच हुआ 10,000 मेगावॉट विद्युत व्यापार समझौता इस कूटनीतिक और आर्थिक साझेदारी की मिसाल है, किंतु गोरक्षपीठ इसे सांस्कृतिक आधार देकर स्थायी बना सकता है। गोरक्षपीठ नेपाल की जनता को यह अहसास दिला सकता है कि भारत केवल एक राजनीतिक शक्ति नहीं, बल्कि वह पड़ोसी है, जो संकट की घड़ी में सांस्कृतिक आत्मीयता और आध्यात्मिक विश्वास के साथ खड़ा है।

संक्षेप में, मौजूदा विद्रोह और अस्थिरता के बीच गोरक्षपीठ की भूमिका संवाद, स्मृति और स्थिरता की है। यही भूमिका भारत–नेपाल संबंधों को राजनीतिक उतार-चढ़ाव से ऊपर उठाकर एक स्थायी, आत्मीय और सांस्कृतिक साझेदारी में बदल सकती है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ डॉ. रहीस सिंह कहते हैं कि भारत–नेपाल संबंधों का आधार केवल व्यापार नहीं, बल्कि उन साझा संवृत्तियों की जीवंतता है, जिनकी जड़ें संस्कृति, सनातन आस्था और मानवीय संवेदनाओं में निहित हैं। गोरक्षपीठ इन भावनाओं का संस्थागत रूप है, जो दोनों देशों को स्थायी और आत्मीय बंधन में जोड़ती है। चीन अरबों डॉलर का निवेश कर सकता है, किंतु वह भावनात्मक मानवीय कनेक्ट नहीं दे सकता, जो भारत सदियों से नहीं बल्कि सहस्राब्दियों से देता आ रहा है।

*नेपाल का संत समाज और गोरक्षपीठ : शाश्वत संवाद*

गोरक्षपीठ और नेपाल के संत समाज का रिश्ता शताब्दियों पुराना है। पशुपतिनाथ की शिव-परंपरा और गोरखनाथ की तपस्या का संगम, त्रिपुरसुंदरी की शक्ति और हठयोग का मिलन, तथा नथ संन्यासियों की साधना, इन सबने नेपाल के लोकजीवन और पर्व-त्यौहारों पर अमिट छाप छोड़ी। यह शाश्वत संवाद प्रमाण है कि भारत–नेपाल का संबंध केवल राजनीति का परिणाम नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और साझा आस्था की शाश्वत धारा है, जिसने दोनों देशों को युगों-युगों से एक सूत्र में बांध रखा है।

*चीन की बढ़ती भूमिका और गोरक्षपीठ का सांस्कृतिक संतुलन*

आज नेपाल में चीन अपनी पकड़ मजबूत करने के प्रयास में सक्रिय है। उसने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के अंतर्गत सड़क, ऊर्जा और अवसंरचना से जुड़ी कई परियोजनाओं में बड़ा निवेश किया है। आर्थिक पैमाने पर यह प्रभावशाली अवश्य प्रतीत होता है, किंतु इसमें स्थायित्व और आत्मीयता का अभाव है।

नेपाल की वामपंथी राजनीति कई बार चीन की ओर झुकाव दिखाती रही है, जिससे भारत–नेपाल संबंधों में अविश्वास की खाई और गहरी हुई है। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि चीन का प्रभाव केवल धन और परियोजनाओं तक सीमित है। नेपाली जनमानस में चीन के प्रति वह भावनात्मक निकटता नहीं है, जो भारत के साथ सहज रूप से विद्यमान है।

यहीं पर गोरक्षपीठ भारत के लिए सांस्कृतिक संतुलनकारी शक्ति के रूप में सामने आता है। चीन अपनी सॉफ्ट पावर गढ़ने की कितनी भी कोशिश करे, किंतु गुरु गोरखनाथ की परंपरा और योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता उसकी किसी भी सांस्कृतिक रणनीति पर भारी पड़ती है।

इस प्रकार गोरक्षपीठ भारत के लिए केवल धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि कूटनीति से परे एक आत्मीय शक्ति है। यह शक्ति नेपाल में भारत की स्थायी मित्रता को सुनिश्चित करती है और दिखाती है कि भारत और नेपाल का रिश्ता राजनीतिक गणित से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आत्मीयता से पोषित है। यही संतुलन चीन की आर्थिक रणनीति को सीमित कर, भारत–नेपाल संबंधों को स्थायित्व और गहराई प्रदान करता है।

*भविष्य का सेतु*

गुरु गोरखनाथ की साधना, गोरखा राज्य की उत्पत्ति, पशुपतिनाथ और त्रिपुरसुंदरी की परंपरा, योगी आदित्यनाथ के प्रवास और आज के विद्रोही परिदृश्य ये सब मिलकर गोरक्षपीठ को भारत-नेपाल संबंधों का आध्यात्मिक स्तंभ बनाते हैं।

आज जब नेपाल अस्थिरता से गुजर रहा है, गोरक्षपीठ की भूमिका और निर्णायक हो गई है। यह न केवल नेपाल की जनता को स्थिरता और विश्वास का संदेश दे सकता है, बल्कि भारत की कूटनीति को सांस्कृतिक गहराई भी प्रदान कर सकता है। चीन के आर्थिक प्रभाव के बीच गोरक्षपीठ यह स्मरण कराता है कि नेपाल की आत्मा भारत से जुड़ी है और यही भविष्य का सबसे सशक्त सेतु है।

और यही कारण है कि गोरक्षपीठ की छवि केवल एक मठ या परंपरा तक सीमित नहीं, बल्कि आमजन के विश्वास और भावनाओं में भी उतनी ही जीवंत है। गांव के किसान से लेकर शहर के छात्र तक, सबके मन में यह आश्वस्ति है कि गोरक्षपीठ संकट की घड़ी में दिशा दिखाने वाली दीपशिखा है। यही उसकी स्थायी शक्ति है और यही उसे भविष्य का सेतु बनाती है।

म्यांमार में बैठ कर राहुल की वोट चोरी का प्रेजेंटेशन कौन बना/बनवा रहा था?

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सुरेंद्र बांसल

राहुल गाँधी जब अमेरिका के कॉलेजों में, कैम्ब्रिज कॉलेज की कैंटीन में या अन्य विदेशी सभागारों में यह पूछते हैं कि ‘भारत में लोकतंत्र की हत्या हो रही है और यूरोप-अमेरिका देख रहा है, कुछ करता क्यों नहीं’, तो उनकी आशा होती है कि वो उनके स्वप्न को पूरा करने में सहायता करें।

वह स्वप्न क्या है? वह स्वप्न है सत्ता में ऐसे नहीं आ सकते, तो वैसे आ जाएँ। चुनाव जीत नहीं पा रहे, हारने को मोरल विक्ट्री बताते हैं, और सुप्रिया हाथ हवा में लहराती है, कभी सोशल मीडिया की खरीदी गई रीच के कारण उन्हें लोकप्रिय मान लिया जाता है।

ऐसे में कई उपद्रवों को इनका समर्थन मिलता रहा: शाहीन बाग, किसान आंदोलन, पहलवान आंदोलन, किसान आंदोलन २.०, ईवीएम हैकिंग नैरेटिव आदि। इसी में अगला और लेटेस्ट है: वोट चोरी।

हालाँकि, राहुल गाँधी की मानसिक क्षमता इतनी है नहीं कि वो नित नए नैरेटिव गढ़ सके, तो उन्हें विदेश से हेल्प की आवश्यकता पड़ती है। ‘वोट चोरी’ में भी @khurpenchh ने एक खुलासा किया है जिसमें दिखता है कि उन्हें जो पढ़ना था, वो कोई और लिख रहा था।

उनका प्रेजेंटेशन म्यांमार में बैठे किसी व्यक्ति ने, भारत में बैठे किसी व्यक्ति के साथ बैठ कर बनाया, यह उस फाइल के मेटाडेटा को पढ़ने पर दिख रहा है। यही कारण है कि दूसरों का लिखा पढ़ने वाले राहुल, प्रोजेक्टर की लाइट जाने के बाद स्क्रीन न चलने पर, एक शब्द नहीं बोल पा रहे थे।

म्यांमार में कौन है? मलेशिया में कौन है? थाइलैंड में कौन है? थाइलैंड में भारतीय पासपोर्ट से घुस कर, क्या ब्रिटिश पासपोर्ट के प्रयोग से कोई बाहर जा सकता है? यदि हाँ तो कहाँ, और क्यों?

क्या भारत के LoP सरकार को वापस आ कर यह जानकारी देते हैं कि वो विदेश यात्राओं पर क्यों निकलते हैं, किस से मिलते है? क्या यह छुट्टी मात्र है? क्या वर्ष भर में साठ विदेश यात्राएँ छुट्टी मात्र होती हैं?

नेपाल में जो हो रहा है, बांग्लादेश में जो हुआ, उसी की आशा में कॉन्ग्रेस समर्थकों के ट्वीट देख लीजिए। वो चाहते हैं कि हमारी संसद में आग लगा दी जाए। आग लगाने के लिए चिंगारी चाहिए।

राहुल गाँधी वह मशाल स्वयं नहीं लेना चाहते। इसी कारण से ऐसे नैरेटिव बनाए जाते हैं जहाँ युवा वर्ग उग्र हो जाए क्योंकि उसे आधी सूचना दी जाती है। युवाओं को भड़काना सबसे आसान है, विद्यार्थियों को सड़कों पर लाना सबसे आसान है।

‘भारत के भविष्य’ के नाम पर सोशल मीडिया के धुरंधर पटकथा लिखते हैं, उन्हें उकसाते हैं कि उनका रक्त उबल क्यों नहीं रहा है। वो जानते हैं कि छात्र यदि जूते में स्मोक बम ले कर संसद में भी उतर जाता है, तो भी पुलिस कुछ नहीं करेगी। उसे वो भगत सिंह बना देंगे।

यह एक प्रोजेक्ट है जो विदेश से संचालित है। आज के खुलासे में केवल एक सूत्र पकड़ा गया है जो संभवतः इन्होंने सोचा नहीं होगा। पर आप सोचिए, कि विदेशी धरती से कैरोसीन छिड़कने की बातें करने वाले, क्या सत्ता से इतने लम्बे समय दूर रह सकेंगे जबकि उनके आस-पास लाख-पचास हजार की संख्या में ‘छात्र’ प्रधानमंत्री की ब्रा ले कर भाग रहे हैं, संसद को आग लगा रहे हैं?

(खुरपेंच की रिपोर्ट संलग्न)
https://x.com/khurpenchh/status/1965767560378617895?t=3r_OvzK184k4y4YOl25CmA&s=08

जीएसटी 2.0: भारतीय कृषि को नई ऊंचाइयों तक ले जाने वाला सुधार

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भारत की मिट्टी में खेती सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आर्थिक और सामाजिक धड़कन है। वर्षों से जटिल कर संरचना ने किसानों की राह में बाधाएं खड़ी कीं, लेकिन जीएसटी 2.0 के साथ एक नया युग शुरू होने जा रहा है। 56वीं जीएसटी काउंसिल की बैठक में मंजूर ये क्रांतिकारी सुधार 22 सितंबर 2025 से लागू होंगे, जो टैक्स स्लैब को सरल कर 5% और 18% की दो प्रमुख दरों तक लाएंगे, जबकि सिन गुड्स पर 40% की विशेष दर बरकरार रहेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘आर्थिक परिवर्तन की आधारशिला’ करार दिया, जो किसानों, छोटे उद्यमियों और महिलाओं को सशक्त बनाएगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जोर देकर कहा कि ये बदलाव कृषि, स्वास्थ्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति देंगे।

किसानों को सबसे बड़ा लाभ कृषि इनपुट्स पर टैक्स घटने से होगा। खाद, बीज, बायो-पेस्टीसाइड्स और जैविक खाद पर टैक्स 12-18% से घटकर 5% होगा, जिससे जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा। इससे मिट्टी की सेहत और पर्यावरण सुरक्षित होगा। ट्रैक्टर और कृषि मशीनरी पर भी 5% टैक्स लागू होगा, जिससे 9 लाख रुपये के ट्रैक्टर पर 65 हजार रुपये की बचत होगी। कटाई और पराली प्रबंधन उपकरण जैसे सुपर सीडर, हैप्पी सीडर और मल्चर सस्ते होंगे, जिससे छोटे किसान आधुनिक खेती अपना सकेंगे।

फसल बिक्री और स्टोरेज में भी राहत मिलेगी। कोल्ड स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट पर कम टैक्स से फल-सब्जियों की बर्बादी 30-40% से घटकर 10-15% होगी। डेयरी क्षेत्र में क्रांति आएगी, क्योंकि यूएचटी दूध, पनीर, छेना और रोटी जैसे उत्पादों पर 0% टैक्स होगा। मक्खन, घी और दूध के डिब्बों पर भी राहत मिलेगी, जिससे दूध उत्पादकों की आय बढ़ेगी। पशुपालन, मछली पालन और मधुमक्खी पालन को भी लाभ होगा।

ये सुधार किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को साकार करेंगे। 15-20% लागत बचत, आधुनिक मशीनों से बढ़ी पैदावार और आसान बाजार पहुंच से मुनाफा बढ़ेगा। सहकारी समितियां और एफपीओ मजबूत होंगे, जबकि महिला स्वयं सहायता समूहों को हस्तशिल्प और दूध उत्पादों से लाभ मिलेगा। जीएसटी 2.0 ग्रामीण भारत में रोजगार और आत्मनिर्भरता लाएगा, जो अर्थव्यवस्था को नई गति देगा। यह सुधार किसानों के लिए दीवाली का सबसे बड़ा उपहार है।

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