रक्तरंजित दौर के बाद नॉर्थईस्ट में थमी पत्रकार हत्याएँ

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी: कभी अशांत क्षेत्र के रूप में पहचाने जाने वाले भारत के नॉर्थईस्ट में, जहाँ पिछले तीन दशकों में हमलावरों के हाथों 30 से अधिक संपादकों, रिपोर्टरों और संवाददाताओं की जान गई थी, वहाँ पिछले आठ वर्षों से पत्रकार हत्या का कोई मामला सामने नहीं आया है। वर्ष 2017 में मीडिया पेशेवरों की आखिरी सनसनीखेज हत्याओं के बाद, वर्ष 2025 को समाप्त हुए चार महीने से अधिक समय बीत चुके हैं और इस दौरान ऐसी कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना दर्ज नहीं हुई।

जहाँ देशभर में औसतन हर वर्ष पाँच से दस पत्रकार अपनी जान गंवाते हैं, वहीं नेपाल, भूटान, तिब्बत/चीन, म्यांमार और बांग्लादेश की सीमाओं से घिरा यह क्षेत्र इस सकारात्मक स्थिति को बनाए हुए है। एक अरब से अधिक आबादी वाले भारत में पिछले वर्ष छह पत्रकारों की हत्या दर्ज की गई। इनमें बस्तर (छत्तीसगढ़) से NDTV के स्ट्रिंगर मुकेश चंद्रकार, इमालिया सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) से दैनिक जागरण के राघवेंद्र वाजपेयी, डिगलीपुर (अंडमान द्वीप समूह) से Republic Andaman के सहदेव डे, गुरुग्राम (हरियाणा) से Fast News India के धर्मेंद्र सिंह चौहान, भुवनेश्वर (ओडिशा) से Times Odia के नरेश कुमार तथा जोशियारा (उत्तराखंड) से Delhi Uttarakhand Live के राजीव प्रताप सिंह शामिल हैं। इसके अतिरिक्त देहरादून के फ्रीलांस पत्रकार पंकज मिश्रा की संदिग्ध हत्या का मामला भी सामने आया था।

इस वर्ष अब तक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने हमलावरों के हाथों एक पत्रकार को खोया है। 28 अप्रैल 2026 को तेलुगू पत्रकार वी. जगनमोहन रेड्डी की हत्या कर दी गई। आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के वेंकटगिरि कोटाइन इलाके में सुबह की सैर पर निकले जगनमोहन पर घातक हथियारों से लैस बदमाशों के एक समूह ने हमला किया, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। ‘आंध्र ज्योति’ अखबार से जुड़े 40 वर्षीय जगनमोहन की हत्या के बाद विभिन्न पत्रकार संगठनों ने तिरुपति प्रेस क्लब में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए।

‘इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन’ (IJU) ने दावा किया कि यह हमला उस रिपोर्ट के कुछ दिनों बाद हुआ, जिसमें उन्होंने क्षेत्र में सक्रिय चंदन तस्करों पर खबर प्रकाशित की थी। संगठन ने कार्यरत पत्रकारों की सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए कठोर नीति बनाने की मांग भी की। जिनेवा स्थित वैश्विक मीडिया सुरक्षा एवं अधिकार संगठन ‘प्रेस एम्बलम कैंपेन’ (PEC) ने भी जगनमोहन के लिए न्याय की मांग उठाई। PEC के अध्यक्ष ब्लेज़ लेम्पेन ने संबंधित अधिकारियों से अपराधियों को शीघ्र गिरफ्तार कर कानून के तहत कठोर सज़ा सुनिश्चित करने की अपील की। 1 जनवरी 2026 से दुनिया भर में मारे गए मीडिया कर्मियों में जगनमोहन 28वें पीड़ित बने। वह अपने पीछे पत्नी, दो बच्चों और अनेक शुभचिंतकों को छोड़ गए हैं।

इस निराशाजनक राष्ट्रीय परिदृश्य के विपरीत, नॉर्थईस्ट क्षेत्र अपेक्षाकृत बेहतर तस्वीर प्रस्तुत करता है। लगभग छह करोड़ आबादी वाले इस क्षेत्र में आखिरी बार वर्ष 2017 में त्रिपुरा में दो पत्रकारों—शांतनु भौमिक और सुदीप दत्ता भौमिक—की हत्या हुई थी। इससे पहले वर्ष 2013 में भी बांग्लादेश सीमा से लगे इसी राज्य में तीन मीडियाकर्मियों—सुजीत भट्टाचार्य, रंजीत चौधरी और बलराम घोष—की हत्या की गई थी। इन तीनों की हत्या अगरतला स्थित एक बंगाली समाचार पत्र के कार्यालय के भीतर हुई थी।

असम और मणिपुर में इससे पहले पत्रकार हत्याओं के मामले तब सामने आए थे, जब रायहानुल नयुम और द्विजमणि नानाओ सिंह अपराधियों के निशाने पर आए। अकेले असम में वर्ष 1987 से अब तक 25 से अधिक मीडियाकर्मियों की हत्या हो चुकी है।

हालाँकि, Covid-19 महामारी ने इस क्षेत्र के मीडिया जगत को गहरी क्षति पहुँचाई। नॉर्थईस्ट में 20 से अधिक पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की मौत कोरोना संक्रमण से हुई, जबकि पूरे देश में यह आँकड़ा लगभग 300 तक पहुँचा। पूर्वोत्तर में सबसे अधिक मौतें असम में दर्ज की गईं, जबकि अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और सिक्किम में किसी पत्रकार की कोरोना संक्रमण से मृत्यु नहीं हुई।

पहला मामला गुवाहाटी से सामने आया, जब 3 जुलाई 2020 को ‘असोमिया खोबोर’ के प्रिंटर एवं प्रकाशक रंटू दास को कोरोना संबंधी जटिलताओं के कारण मृत घोषित किया गया। इसके बाद उदलगुरी के ग्रामीण पत्रकार धनेश्वर राभा, सिलचर के पत्रकार असीम दत्ता तथा रेडियो समाचार एंकर गुलाब सैकिया की भी गुवाहाटी में इलाज के दौरान कोरोना से संबंधित जटिलताओं के कारण मृत्यु हो गई।

असम ने कोरोना महामारी के दौरान दो प्रतिष्ठित मीडिया हस्तियों—डॉ. लक्ष्मी नंदन बोरा और होमेन बोरगोहेन—को भी खो दिया। युवा पत्रकार आयुष्मान दत्ता, मोरान के जादू चुटिया, चायगांव के शिवचरण कलिता, बोकाजान के रुबुल दिहिंगिया तथा नगांव के हुमेश्वर हीरा भी कोरोना पीड़ितों की सूची में शामिल रहे। नई दिल्ली में रह रहीं असमिया पत्रकार नीलाक्षी भट्टाचार्य (55) और उनके पति कल्याण बरुआ की 24 घंटे के भीतर कोरोना संक्रमण से मृत्यु हो गई। दिल्ली में ही पत्रकार अनिर्बान बोरा ने भी वायरस से संघर्ष करते हुए दम तोड़ दिया।

त्रिपुरा में जितेंद्र देबबर्मा, तन्मय चक्रवर्ती, गौतम दास और माणिक लाल दास की मृत्यु के साथ कोरोना से मीडियाकर्मियों की मौत के मामले सामने आए। वहीं मणिपुर ने सगोलसेम हेमंत, साइखोम शांति कुमार, थोतशांग शैजा और लैरेनजम बिजेन सिंह को खो दिया, जबकि मेघालय में सिंडोर सिंह सिएम की मृत्यु कोरोना के बाद उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई।

हालाँकि नई दिल्ली स्थित केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारों ने कोरोना पीड़ित पत्रकारों के परिवारों को मुआवज़ा देने की घोषणा की थी, लेकिन नॉर्थईस्ट के किसी भी राज्य ने ऐसी कोई प्रभावी योजना लागू करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया। ओडिशा सरकार ने कोरोना संक्रमण से जान गंवाने वाले प्रत्येक कार्यरत पत्रकार के परिवार को 15 लाख रुपये की सहायता राशि प्रदान की। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और पंजाब सरकारों ने 10-10 लाख रुपये प्रति परिवार मुआवज़ा दिया। आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने पाँच-पाँच लाख रुपये की सहायता दी, जबकि बिहार ने चार लाख और तेलंगाना ने दो लाख रुपये का मुआवज़ा घोषित किया।

असम सरकार ने शुरुआत में यह घोषणा की थी कि कोरोना के कारण जान गंवाने वाले मीडियाकर्मियों को अन्य फ्रंटलाइन वॉरियर्स की तरह 50 लाख रुपये की जीवन बीमा योजना में शामिल किया जाएगा। लेकिन बाद में प्रभावित पत्रकार परिवारों को सहायता प्रदान करने के मुद्दे पर सरकार पूरी तरह खामोश हो गई। नॉर्थईस्ट के अन्य राज्यों ने भी लगभग यही रुख अपनाया, जैसा कि इस क्षेत्र में अक्सर देखने को मिलता है।

(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

Filipino scribe shot dead, PEC demands authentic probe and justice

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Geneva: Press Emblem Campaign (PEC), the global media safety and rights body, expressed shock over the murder of Filipino radio scribe Nestor Micator and demanded justice following an authentic probe into the incident. The news anchor and commentator of D’Empire Radio in the southern Philippines was shot dead by two unknown assailants in Malidegao locality of Cotabato on 21 May. Nestor (56) along with his wife was riding on a motorcycle when the gunmen attacked them. He was rushed to a nearby hospital where he was declared dead. His wife is recovering from injuries.

“PEC, while condemning the murder of Nestor Micator, reminds that the Philippines becomes a nation with impunity to journo-murderers. Nestor is the third journo-victim in his country and 32nd across the world since 1 January 2026. We hope the authorities will go for an all-out action to nab the culprits and punish under the law,” said Blaise Lempen, president of PEC (pressemblem.ch/pec-news). PEC’s south and southeast Asian representative Nava Thakuria informed that Nestor was also serving as a member of the village council in Fort Pikit, which usually takes initiatives to resolve various local conflicts and issues among the villagers.

The Catholic-majority nation earlier reported a suspected murder of another radio scribe (Nichole Ledesma, 30), who worked as the chief editor of online media outlet Paghimutad-Negros and a regional coordinator of Alternative Media Network that focuses on land, labour, displacement over renewable energy mission in the island nation. Nichole, also known as a poet and human rights activist, was among a group of people who were killed during an anti-insurgency operation in Toboso locality on 19 April by the security personnel.

25 मई : जब लोकतंत्र को बारूद से लहूलुहान करने की शुरुआत हुई थी

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प्रणय विक्रम सिंह

दिल्ली । मई, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह रक्तरंजित दिन, जब पहली बार संगठित रूप से बंदूक को संविधान से ऊपर रखने की कोशिश की गई थी।

वह दिन, जब मतपत्र को ‘बुर्जुआ ढकोसला’ कहकर बारूद को परिवर्तन का माध्यम घोषित किया गया। वह दिन, जब भारत की लोकतांत्रिक आत्मा पर हिंसक वर्ग-संघर्ष के नाम पर पहली वैचारिक गोली दागी गई।

जिसे आज भी कुछ वामपंथी संगठन ‘महान नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह’ कहकर महिमामंडित करते हैं, वह वस्तुतः लोकतांत्रिक भारत के विरुद्ध सशस्त्र हिंसा की संगठित प्रस्तावना थी। यह केवल एक किसान आंदोलन नहीं था, बल्कि भारतीय राज्य, भारतीय संविधान और भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिंसा के माध्यम से चुनौती देने का उद्घोष था।

विडंबना यह है कि जो लोग आज ‘फासीवाद’ के विरुद्ध सबसे ऊंची आवाज़ में नारे लगाते हैं, उनकी वैचारिक जड़ें स्वयं उस विचार में धंसी हुई हैं, जो लोकतंत्र को छल, चुनाव को भ्रम और संविधान को वर्गीय औजार मानता रहा है।

नक्सलबाड़ी कोई रोमानी कविता नहीं थी। वह रक्त, भय और बंदूक से लिखी गई वैचारिक हिंसा की शुरुआत थी। उस दिन जो चिंगारी जली, उसने आने वाले दशकों में भारत के अनेक हिस्सों को बारूद, बंदूक और रक्त से भर दिया। जंगलों में समानांतर सत्ता खड़ी करने की कोशिश हुई।

जन-अदालतों के नाम पर हत्याएं हुईं। गरीब आदिवासियों को ‘क्रांति’ के नाम पर बंदूक थमा दी गई। विकास को ‘राज्य का षड्यंत्र’ बताकर स्कूल उड़ाए गए, सड़कें तोड़ी गईं, रेलवे लाइनें बिछने नहीं दी गईं और अस्पतालों तक को संदेह की दृष्टि से देखा गया।

यह कैसी क्रांति थी, जिसने सबसे पहले शिक्षा पर हमला किया? यह कैसी मुक्ति थी, जिसमें आदिवासी बच्चों के हाथों में किताबों की जगह कारतूस थमा दिए गए? यह कैसी समानता थी, जिसमें गांवों के गरीब युवक मरते रहे और वैचारिक नेतृत्व महानगरों के परिसरों में ‘क्रांति’ पर सेमिनार करता रहा?

भारत के इतिहास में यह शायद पहली ऐसी विचारधारा थी, जिसने लोकतंत्र के भीतर रहते हुए लोकतंत्र को ही नष्ट करने का स्वप्न देखा। संसद को खारिज किया गया। चुनाव को मज़ाक कहा गया। न्यायपालिका को वर्गीय संस्था बताया गया। और अंततः बंदूक को ही अंतिम सत्य घोषित कर दिया गया।

लेकिन भारत की आत्मा बारूद से नहीं चलती। भारत की आत्मा बहस से चलती है। विविधता से चलती है। मतभेद से चलती है। मतपत्र से चलती है।

यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में दशकों तक नक्सली प्रभाव रहा, वहां अंततः जनता ने विकास, सड़क, शिक्षा और लोकतांत्रिक भागीदारी की मांग की। आदिवासी समाज ने भी यह समझ लिया कि बंदूक केवल मृत्यु देती है, भविष्य नहीं।

आज भी नक्सलवाद के समर्थक ‘जल-जंगल-जमीन’ की भाषा बोलते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि जिन क्षेत्रों को उन्होंने दशकों तक अपनी हिंसक प्रयोगशाला बनाए रखा, वहां सबसे अधिक गरीबी, अशिक्षा और भय क्यों पनपा?

क्यों हजारों गरीब आदिवासी युवक ‘क्रांति’ के नाम पर मारे गए? क्यों सुरक्षा बलों के जवानों की लाशों पर वैचारिक उत्सव मनाए गए? क्यों गांवों को लोकतंत्र और विकास से काटकर ‘रेड कॉरिडोर’ में बदल दिया गया?

सच्चाई यह है कि भारत के वंचित समाज को जितना प्रतिनिधित्व लोकतंत्र ने दिया, उतना किसी माओवादी बंदूक ने नहीं दिया। पंचायत से संसद तक, संविधान ने दलित, आदिवासी, पिछड़े और गरीब समाज को आवाज़ दी। आज भारत का आदिवासी राष्ट्रपति भवन तक पहुंचता है, संसद तक पहुंचता है, प्रशासन और न्यायपालिका तक पहुंचता है। यह परिवर्तन हिंसा से नहीं, लोकतंत्र से आया है।

नक्सलबाड़ी की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उसने असंतोष को सुधार की दिशा में नहीं, विनाश की दिशा में मोड़ दिया। उसने युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि परिवर्तन बहस, संगठन और जनमत से नहीं, हत्या और हिंसा से आएगा। यही वह वैचारिक विष था, जिसने हजारों परिवारों को उजाड़ा। और सबसे बड़ा विरोधाभास देखिए, जो विचारधारा स्वयं स्टालिन, माओ और पोल पॉट जैसे रक्तरंजित इतिहासों से प्रेरणा लेती रही, वही आज मानवाधिकार की सबसे बड़ी व्याख्याता बनने का अभिनय करती है।

भारत का किसान आज बंदूक नहीं, बाजार चाहता है। भारत का आदिवासी आज बारूद नहीं, बेहतर स्कूल चाहता है। भारत का युवा आज क्रांति नहीं, अवसर चाहता है।

25 मई किसी ‘हिंसक रोमांच’ की नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक भूल को याद करने की है, जिसने लोकतंत्र के विरुद्ध हिंसक अधैर्य को वैचारिक सम्मान देने की कोशिश की थी।

यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब विचारधारा मनुष्य से बड़ी हो जाती है, तब शवों पर घोषणापत्र लिखे जाते हैं। और जब लोकतंत्र को ‘कमजोरी’ कहा जाने लगता है, तब समाज अंततः रक्त और भय की सुरंग में धकेल दिया जाता है।

बंदूकें कुछ समय के लिए भय पैदा कर सकती हैं, लेकिन वे सभ्यताएं नहीं बनातीं। बारूद रास्ते जला सकता है, भविष्य नहीं गढ़ सकता। जिन विचारों की शुरुआत हत्या से होती है, उनका अंत भी प्रायः राख, वीरानी और पछतावे में ही होता है।

भारत ने अंततः उस रास्ते को अस्वीकार किया, जहां मतभेद का उत्तर गोली हो और परिवर्तन का माध्यम रक्त। भारत ने मतपत्र का मार्ग चुना। संविधान का मार्ग चुना। और यही कारण है कि नक्सलबाड़ी आज इतिहास की एक हिंसक प्रतिध्वनि भर रह गया है, जबकि भारतीय लोकतंत्र आज भी जीवित, गतिशील और निरंतर विकसित हो रहा है।

आज जब कुछ लोग 25 मई को ‘क्रांति’ का प्रतीक बताने का प्रयास करते हैं, तब आवश्यक है कि राष्ट्र उस मौन पीड़ा को भी याद करे, जो दशकों तक नक्सली हिंसा से जले गांवों, उजड़े परिवारों, अनाथ बच्चों और शहीद जवानों के घरों में पसरी रही।

भारत का भविष्य किसी लाल आतंक में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना, विकास, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता में निहित है। क्योंकि अंततः राष्ट्र बंदूक से नहीं चलते… विश्वास से चलते हैं। सभ्यताएं बारूद से नहीं बचतीं… संवाद, संवेदना और लोकतंत्र से बचती हैं।

शुभेंदु सरकार के त्वरित निर्णयों से उभरता नया बंगाल

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कोलकाता । बंगाल में 69 वर्षों के अथक संघर्ष के बाद बनी शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपने चुनावी संकल्प पत्र के अनुरूप काम पर लग गई है। सत्ता परिवर्तन होते ही सभी धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर बंद करवाए गए। अवैध बूचड़खानों पर बुलडोजर एक्शन के आदेश जारी हुए। सभी विद्यालयों में अब सम्पूर्ण वंदेमातरम का गायन अनिवार्य कर दिया गया है । सड़कों पर नमाज व अन्य धार्मिक गतिविघियों पर पाबंदी लगा दी गई है। सीमा पर फेंसिंग के लिए सीमा सुरक्षा बल को जगह दे दी गई है और सम्पूर्ण भूमिहस्तांतरण निर्णय के 45 दिन में पूरा हो जाएगा। चिकन नेक क्षेत्र केंद्र को सौंप दिया गया है। धार्मिक आधार पर चलने वाली योजनाएं जैसे इमामों को वेतन बंद कर दिया गया है। आर.जी.कर केस की फाइल दोबारा खुलने के आदेश हो गए हैं। आयुष्मान भारत जैसी केंद्रीय जन कल्याण योजनाएं अब बंगाल पहुँच रही हैं।

शुभेंदु सरकार की गति और संकल्प सिद्धि के प्रयासों से जुड़े निर्णयों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगा है। हालत यह हो गई है पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का डायमंड हार्बर मॉडल का पुष्पा ”जहागीर खान” बहाना बनाकर फलटा विधानसभा उपचुनाव में ठीक उसी समय पलटा मारकर कर भाग गया जब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार को विजयी बनने के लिए रोड शो निकाल रहे थे। यह वही क्षेत्र है जहां विधानसभा चुनावों के दौरान ईवीएम मशीन पर भाजपा के चुनाव चिन्ह के आगे काला टेप लगा दिया गया था। यूपी के एक तेजतर्रार पुलिस अफसर अजय पाल शर्मा की आब्जर्वर के रूप में नियुक्ति हुई थी जिसके बाद जहांगीर खान ने पोस्टर जारी करके अपने आप को पुष्पा बताने की जुर्रत की थी। आज वही तथाकथित पुष्पा चुनावी मैदान बीच में छोड़कर भाग खड़ा हुआ । यह भय बनाम भरोसे में भरोसे की एक और बड़ी जीत है। यह सब कुछ हिंदुओं की एकजुटता और उनके जागरण से ही संभव हो सका है अगर हिंदू समाज आगे भी इसी प्रकार एकजुट रहता है तो सनातन का अपमान करने व उन्हें भयभीत करने वाले लोग इसी प्रकार से स्वतः प्रेरणा से भागते रहेंगे।

बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने प्रचार के दौरान उत्तर प्रदेश के भगवावस्त्र धारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चरण स्पर्श किए थे और उनके शपथ ग्रहण में योगी जी ने अपना भगवा पटका उनके गले में डाला था तभी यह बात तय हो गई थी कि बंगाल भी उत्तर प्रदेश की तरह सांस्कृतिक पुनर्जागरण के मार्ग पर चलने वाला है। बंगाल में भी दंगाइयों व उत्पातियों का इलाज यूपी की ही तरह होगा । कोलकाता के जिस थाने पर दगांइयों ने हमला करने का प्रयास किया था वहां मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी खुद पहुंचे और पुलिस बलों का मनोबल बढ़ाते हुए दंगाइयों व उपद्रवियों के प्रति जीरो टालरेंस की नीति अपनाने को कहा। मुख्यमंत्री अधिकारी ने कहा कि पुलिस पहले ममता दीदी के गुंडों से डरती थी किंतु अब समय बदल चुका है।

शुभेंदु सरकार के बड़े निर्णयों में वर्ष 2021 के चुनावों के बाद राज्य में हुई राजनतिक हत्याओं व हिंसक घटनाओं की सभी फाइलें खोलना भी है जिसके कारण ममता दीदी इतनी अधिक भयभीत हो गयीं कि वह काला कोट पहनकर हाईकार्ट पहुंच गयीं और 2021 की हिंसा से ध्यान भटकाने के लिए 2026 के चुनावों के बाद घटी कुछ छुटपुट घटनाओं को सनसनीखेज बताने का असफल प्रयास किया। जब वह कोर्ट परिसर से बाहर निकलने लगीं तब वकीलों के एक बड़े समूह ने उन्हें घेर लिया ओैर चोर -चोर के नारे लगाए।

बंगाल में अब सीबीआई तथा ईडी जैसे केंद्रीय जांच एजेंसियों का प्रवेश संभव हो गया है, जिससे वहां 69 वर्षों में हुए घोटालों की जांच में गति आएगी। ईडी ने टीएमसी के बड़े नेताओं को हिरासत में ले भी लिया है। शुभेंदु अधिकारी के 145 एकड़ जमीन बीएसफ को देने के ऐतिहासिक निर्णय से बांग्लादेशी घुसपैठ की रोकथाम में महत्वपूर्ण सफलता मिलने की आशा है क्योंकि बांग्लादेश से लगी हुई बंगाल की लंबी खुली सीमा से बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठिए आसानी प्रवेश कर लेते थे । अब सीमा पर तीव्रता के साथ फेंसिंग का कार्य होगा ।

बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए धर्म के आधार पर चलने वाली सभी योजनाएं बंद कर दी गई हैं। नई सरकार ने वोटबैंक के पुराने ढर्रे को ध्वस्त करने के एजेंडे पर आगे बढ़ चुकी है। बंगाल कैबिनेट ने धर्म के आधार पर चलाई जा रही सभी वित्तीय सहायता योजनाओ को पूरी तरह से बंद करने का निर्णय लिया है। यह मात्र एक प्रशासनिक निर्णय नहीं अपितु बंगाल की राजनीतिक दिशा को बदलने वाला वैचारिक परिवर्तन है। चुनावी बिसात पर इमामों, मुअज्जिनों और पुरोहितों के लिए शुरू की गई मासिक भत्ता पूरी तरह से बंद कर दिया गया है।

बंगाल के खेल मंत्री नीशिथ प्रामाणिक ने कोलकाता के युवा भारती क्रीडांगन परिसर में लगी व लोगो वाली फुटबालर की आधी प्रतिमा को तोड़े जाने का आदेश दिया है, बंगाल सरकार की विभिन्न वेबसाइाटो से भी इसे हटाया जा रहा है। दिसंबर 22 में अर्जेंटीना के फुटबॉलर मेसी के कार्यक्रम में मची भगदड़ और कुप्रबंधन की जांच की जाएगी। उस घटना की फाइलें खोलने के आदेश जारी हो चुके हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी व अन्य सभी सहयोगी मंत्री यह बात लगातार कह रहे हैं कि जिन लोगों ने बंगाल को लूटा और जनता के मन मे भय पैदा किया उन सभी पर कार्यवाही जरूर की जाएगी।

बंगाल में अब आयुष्मान भारत योजना सहित केंद्र सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाओं के लागू होने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। भाजपा ने बंगाल की महिलाओं से किए गए वादों को भी लागू करना भी आरंभ कर दिया है। आगामी एक जून 2026 से महिलाओं को 3000 रुपये की मासिक सहायता वाली अन्नपूर्णा योजना को भी मंजूरी दे दी गई है। बंगाल की महिलाओ को बस में फ्री यात्रा की सुविधा भी मिलने जा रही है। सरकारी कर्मचारियों के साथ किया गया 7वें वेतन आयोग का वादा भी पूरा होने जा रहा है। बंगाल मे पड़ोसी राज्यों से ट्रकों की आवाजाही के दौरान 100 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक की जो कटमनी टीएमसी के गुंडे वसूल रहे थे उनके अनधिकृत टोल नाके बंद किए जाने के आदेश आ चुके हैं। बंगाल का आलू अब पूरे भारत में जाएगा।

बंगभूमि पर वंदेमातरम की गूंज व जयश्रीराम का नारा सुनाई दे रहा है। बंगाल परिवर्तन की डगर पर चल पड़ा है । भय पर भरोसे की विजय हो रही है।

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