लोकतंत्र : संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक व्यवहार में बड़ा अंतर

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लखनऊ। लोकतंत्र को विश्व की सर्वाधिक जनोन्मुख और उत्तरदायी शासन व्यवस्था माना जाता है। इसकी मूल अवधारणा अत्यंत सरल और आकर्षक है—सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है, सरकार बनाती है और अंततः वही शासन की अंतिम स्वामिनी होती है। आधुनिक लोकतंत्र का पूरा ढाँचा इसी सिद्धांत पर आधारित है कि राज्य जनता के लिए है, जनता द्वारा संचालित है और जनता के प्रति जवाबदेह है। भारत का संविधान भी इसी भावना को स्वीकार करता है। संविधान की प्रस्तावना “हम भारत के लोग” शब्दों से प्रारंभ होती है, जो स्पष्ट रूप से यह घोषणा करती है कि देश की संप्रभुता और सत्ता का अंतिम स्रोत जनता ही है। सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता के सेवक होते हैं और सरकारी संस्थाएँ जनता की सुविधा तथा कल्याण के लिए कार्य करती हैं। किंतु जब हम लोकतंत्र के व्यवहारिक स्वरूप को देखते हैं तो अनेक बार यह आदर्श स्थिति वास्तविकता से काफी दूर दिखाई देती है।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि संविधान में जनता को सर्वोच्च स्थान प्राप्त होने के बावजूद व्यवहार में वही जनता अक्सर उपेक्षित, असहाय और याचक की भूमिका में दिखाई देती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस नागरिक को व्यवस्था का केंद्र होना चाहिए, वह अनेक बार व्यवस्था के किनारे खड़ा दिखाई देता है। सरकारी कार्यालयों में अपने अधिकारों और वैधानिक सुविधाओं के लिए नागरिकों को बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। एक सामान्य व्यक्ति को प्रमाण पत्र बनवाने, भूमि अभिलेख प्राप्त करने, पेंशन, राशन, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सुविधा या अन्य सरकारी सेवाओं के लिए लंबी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। कई बार उसे यह अनुभव होता है कि वह किसी अधिकार का उपयोग नहीं कर रहा, बल्कि किसी कृपा की याचना कर रहा है।

लोकतंत्र की आत्मा यह कहती है कि जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हों, किंतु व्यवहार में अनेक बार स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। चुनाव के समय जनता का महत्व अचानक बढ़ जाता है। नेता घर-घर पहुँचते हैं, हाथ जोड़ते हैं, वादे करते हैं और स्वयं को जनता का सेवक बताते हैं। किंतु चुनाव संपन्न होने के बाद जनता और प्रतिनिधियों के बीच दूरी बढ़ने लगती है। अनेक नागरिकों का अनुभव है कि जिन प्रतिनिधियों तक चुनाव से पहले पहुँचना आसान होता है, वे चुनाव के बाद सामान्य नागरिकों की पहुँच से दूर हो जाते हैं। इससे लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास कमजोर पड़ता है और यह भावना विकसित होती है कि सत्ता जनता की नहीं, बल्कि सत्ता प्राप्त समूहों की संपत्ति बनकर रह गई है।

लोकतंत्र में जनसेवा को सर्वोच्च मूल्य माना गया है, किंतु वास्तविकता में कई बार जनसेवा की अवधारणा सत्ता और विशेषाधिकार प्राप्त करने का माध्यम बन जाती है। सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने वाले अनेक लोग ईमानदारी और समर्पण के साथ कार्य करते हैं, किंतु यह भी सत्य है कि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, संसाधनों के दुरुपयोग और सत्ता के केंद्रीकरण जैसी समस्याएँ लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करती हैं। जब सार्वजनिक पदों का उपयोग निजी लाभ के लिए होने लगता है, तब लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। जनता के करों से संचालित संसाधन यदि कुछ प्रभावशाली समूहों के हित में अधिक उपयोग होने लगें और आम नागरिक को उसका उचित लाभ न मिले, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है।

वास्तव में लोकतंत्र और राजतंत्र के बीच सबसे बड़ा अंतर यही माना जाता है कि लोकतंत्र में शासक और शासित का संबंध मालिक और प्रजा का नहीं, बल्कि सेवक और स्वामी का होता है। किंतु व्यवहारिक स्तर पर अनेक बार प्रशासनिक संस्कृति में औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेष दिखाई देते हैं। नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने के बजाय कई संस्थाएँ आदेशात्मक और नियंत्रणकारी दृष्टिकोण अपनाती हैं। लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए, किंतु कई बार नागरिकों को अपनी वैध माँगों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। यह स्थिति लोकतंत्र की मूल भावना के अनुकूल नहीं कही जा सकती।

लोकतंत्र का उद्देश्य केवल चुनाव कराना नहीं है। चुनाव लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक सफलता इस बात से निर्धारित होती है कि शासन व्यवस्था कितनी पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित है। यदि नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करना पड़े, यदि सरकारी सेवाएँ समय पर न मिलें, यदि निर्णय प्रक्रिया में जनता की भागीदारी सीमित हो और यदि सत्ता का उपयोग जनहित के बजाय विशेष हितों के लिए होने लगे, तो लोकतंत्र का स्वरूप कमजोर पड़ने लगता है।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि लोकतंत्र की चुनौतियों के लिए केवल राजनेताओं या प्रशासन को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र एक साझी व्यवस्था है जिसमें नागरिकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जागरूक मतदाता, सक्रिय नागरिक समाज, स्वतंत्र मीडिया, उत्तरदायी संस्थाएँ और मजबूत संवैधानिक व्यवस्थाएँ लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखती हैं। जब नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग रहते हैं, तब लोकतंत्र अधिक उत्तरदायी बनता है। इसलिए लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए नागरिक चेतना का विकास भी उतना ही आवश्यक है जितना कि प्रशासनिक सुधार।

आज आवश्यकता इस बात की है कि लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित न माना जाए। शासन व्यवस्था का प्रत्येक अंग इस भावना के साथ कार्य करे कि वह जनता का सेवक है और जनता ही उसकी वास्तविक स्वामी है। सरकारी कार्यालयों को नागरिक-अनुकूल बनाना होगा। प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना होगा। जनप्रतिनिधियों को चुनावी वादों और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के प्रति अधिक गंभीर होना होगा। सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही नागरिकों को भी लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक अधिकारों और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के प्रति अधिक सजग होना होगा।

भारतीय लोकतंत्र ने अनेक उपलब्धियाँ हासिल की हैं और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में उसकी पहचान स्थापित हुई है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र के आदर्श और उसके व्यवहारिक स्वरूप के बीच अभी भी एक उल्लेखनीय दूरी मौजूद है। संविधान ने जनता को सर्वोच्च स्थान दिया है, किंतु उस संवैधानिक भावना को प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवहार में पूरी तरह उतारना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब नागरिक स्वयं को व्यवस्था का याचक नहीं, बल्कि सम्मानित अधिकार-संपन्न स्वामी अनुभव करे; जब जनप्रतिनिधि सत्ता के अधिकारी नहीं, बल्कि जनता के उत्तरदायी सेवक के रूप में कार्य करें; और जब शासन का प्रत्येक निर्णय नागरिक हित को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करे। लोकतंत्र की आत्मा भी यही है और उसका अंतिम लक्ष्य भी यही होना चाहिए।

बंगाल से लेकर कश्मीर तक राष्ट्र रक्षा आदोलनों की लंबी श्रृंखला

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भोपाल : सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्राँतिकारी विचारक डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 23 जुलाई 1901 को बंगाल के अति प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था । उनके पिता आशुतोष मुखर्जी सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । उन्हे अंग्रेजों ने “सर” की उपाधि से सम्मानित किया था । श्यामाप्रसाद जी की अधिकांश शिक्षा कलकत्ता में ही हुई । उन्होंने 1917 में मैट्रिक एवं 1921 में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की । 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित करके वे विदेश चले गये और 1926 में लंदन से बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अल्पायु में ही विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएँ अर्जित कीं। वे मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इतनी कम आयु में कुलपति बनने वाले वे भारत के पहले व्यक्ति बने । एक प्रखर वक्ता, उच्च कोटि के विचारक और शिक्षाविद् के रूप में उनकी ख्याति भारत भर में हो गई।

उन दिनों बंगाल में दो प्रकार का वातावरण बन रहा था । एक तो विभाजनकारी साम्प्रदायिक शक्तियाँ जोर पकड़ रहीं थीं जिनके सिर पर अंग्रेजों का हाथ था । दूसरे भारतीय को अंग्रेजों से मुक्ति का आंदोलन तेज हो रहा था । डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शाँत न रह सके । उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली और स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने लगे । वे चार वर्ष के लिये विधायक भी बने । किन्तु वे चाहते थे कि संघर्ष अंग्रेजों के साथ साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ भी संघर्ष किया जाना चाहिए। इस बात पर कांग्रेस से मतभेद हुये और उन्होंने त्यागपत्र दे दिया । डॉ॰ मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक थे। उन्होने एक नया राजनैतिक समूह प्रगतिशील गठबन्धन तैयार किया और विधायक बने । इस गठबंधन सरकार में वे वित्तमन्त्री बने। तभी सावरकर जी के राष्ट्रवाद दर्शन से प्रभावित हुये उन्हे लगा कि मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिक राजनीति से मुकाबला करने के लिये बुद्धिजीवी समाज को जाग्रत और संगठित करना होगा । इस विचार से वे हिन्दू महासभा में सम्मिलित हो गये ।

मुस्लिम लीग ने बंगाल का वातावरण पूरी तरह दूषित कर दिया था। बंगाल के हिन्दुओं में एक भय का वातावरण बन रहा रहा था । उन्होंने मुस्लिम लीग के बंगाल को विभाजित करने के प्रयासों को नाकाम करने का संकल्प लिया और जन जागरण में जुट गये । 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ हुआ । यह आव्हान गाँधीजी का था । यद्यपि डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी कांग्रेस में नहीं थे फिर भी उन्होंने आंदोलन में भाग लिया उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया । रिहाई के बाद वे पुनः जन जागरण और, बंगाल का विभाजन रोकने के अभियान में जुट गये । डॉ॰ मुखर्जी अपनी सभाओं में यह बात समझाने का प्रयास कर रहे थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं। धर्म व्यक्ति का निजीत्व है इसके आधार पर भारत का विभाजन कैसे हो सकता है । वे मानते थे कि विभाजन की मानसिकता कुछ लोगों के स्वार्थी मस्तिष्क की उपज है जिसे अंग्रेज प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे मानते थे कि आधारभूत सत्य यह है कि हम सब एक हैं। हममें कोई अन्तर नहीं है। हम सब एक ही रक्त के हैं। कितु बात न बनी। अंग्रेज जाते जाते भारत को विभाजित करने गये ।

अंततः भारत स्वतंत्र हुआ। पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में सरकार बनीं। नेहरू जी ने डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को मंत्रीमंडल में स्थान दिया । 1951 में नया राजनैतिक दल भारतीय जनसंघ अस्तित्व में आया । डाक्टर मुखर्जी भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने । पर डाक्टर मुखर्जी साम्प्रदायिक आधार पर कश्मीर में अलगाववादियों को विशेषाधिकार देने के विरुद्ध थे । उन्होंने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और कश्मीर जाकर आंदोलन की घोषणा कर दी । डॉ. मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का एकात्म अंग मानते थे । वे कहते थे कि धारा 370 से अलगाव बढ़ेगा । संसद में अपने भाषण में उन्होंनें धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। उन्होंने संसद के बाहर देश व्यापी आंदोलन की घोषणा की और अगस्त 1952 में जम्मू कश्मीर की विशाल रैली में अपना यह संकल्प दोहराया कि ”या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा”। डॉ. मुखर्जी अपने संकल्प को पूरा करने के लिये 1953 में जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े । उन्होंने नारा दिया था “एक देश में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान- नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे” । सरकार ने उन्हे कश्मीर जाने से रोकना चाहा । उन्हें कश्मीर की सीमा पर गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में 23 जून 1953 को उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी। जेल में उनकी मृत्यु के समाचार ने देश को हिलाकर रख दिया । यद्यपि तत्कालीन सरकार ने उनकी इस रहस्यमय मृत्यु की जाँच कराने से इंकार कर दिया किन्तु देश में जो व्यापक प्रतिक्रिया हुये उससे झलक कर और कश्मीर में प्रवेश के लिये परमिट सिस्टम समाप्त कर दिया । इस प्रकार राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिये उनका बलिदान हुआ ।

माता रामबेटी वृद्धाश्रम में वरिष्ठ नागरिकों के साथ विशेष योग कार्यक्रम का आयोजन

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भास्कर बिक्रम चेतिया

दिल्ली । अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर युग संस्कृति न्यास एवं वृद्धकेयर फाउंडेशन द्वारा वरिष्ठ नागरिकों के साथ एक विशेष योग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस वर्ष की अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम “Yoga for Healthy Ageing” को केंद्र में रखते हुए आयोजित कार्यक्रम का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों के शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने हेतु योग के महत्व को जन-जन तक पहुँचाना था।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं वैदिक मंगलाचरण के साथ हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. पवन गर्ग (पूर्व वाइस प्रेसिडेंट एवं सेक्रेटरी, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन), विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री राहुल (फाउंडर एवं सीईओ, होमलेस केयर फाउंडेशन), श्रीमती शिखा टंडन (प्रिंसिपल, दृष्टि पब्लिक स्कूल) तथा श्रीमती शगुन चड्ढा (संयोजिका, संस्कार डीएलएफ शाखा, भारत विकास परिषद) उपस्थित रहीं। युग संस्कृति न्यास के संस्थापक आचार्य धर्मवीर जी और वृद्धकेयर फाउंडेशन की डायरेक्टर श्रीमती गार्गी लखनपाल जी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और इस कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े अनेक गणमान्य अतिथियों, अधिकारियों एवं प्रबुद्ध वर्ग के लोगों की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।

कार्यक्रम का संचालन श्री भास्कर चेतिया जी द्वारा किया गया। योग एवं प्राणायाम सत्र का नेतृत्व श्रीमती ममता गोयल जी ने किया। देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार से पधारी योग विशेषज्ञ टीम के सदस्य श्री आदित्य, श्री सयोन एवं अन्य प्रशिक्षकों ने वरिष्ठ नागरिकों को योग, प्राणायाम एवं ध्यान की विभिन्न विधियों का अभ्यास कराया तथा उनके स्वास्थ्य संबंधी लाभों की जानकारी दी। प्रतिभागियों ने पूरे उत्साह, अनुशासन एवं सकारात्मक ऊर्जा के साथ योगाभ्यास में सहभागिता करते हुए योग के शारीरिक एवं मानसिक लाभों का अनुभव किया तथा अपने प्रेरणादायक अनुभव भी साझा किए।

इस अवसर पर वक्ताओं ने योग को स्वस्थ एवं संतुलित जीवन की आधारशिला बताते हुए कहा कि नियमित योगाभ्यास न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, बल्कि मानसिक शांति, आत्मविश्वास एवं सकारात्मक दृष्टिकोण के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेष रूप से बढ़ती आयु में योग व्यक्ति को सक्रिय, आत्मनिर्भर एवं ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक सिद्ध होता है।

आश्रम की संचालक महंत महानंद गिरी जी ने अपने संबोधन में कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। योग व्यक्ति को स्वस्थ, अनुशासित एवं शांतचित्त बनाता है तथा जीवन में सकारात्मकता एवं आत्मबल का संचार करता है। उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य एवं कल्याण हेतु युग संस्कृति न्यास और वृद्धकेयर फाउंडेशन के द्वारा किए जा रहे सतत प्रयासों तथा योग दिवस पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम के लिए दोनों संस्थाओं के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर अपने भावनात्मक विचार व्यक्त करते हुए युग संस्कृति न्यास के संस्थापक आचार्य धर्मवीर जी ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत की प्राचीन योग परंपरा को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिली है तथा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के माध्यम से विश्वभर में योग के प्रति व्यापक जागरूकता का प्रसार हुआ है।

उन्होंने कहा कि यदि हमें भारत को पुनः विश्वगुरु के रूप में स्थापित करना है तो समाज के प्रत्येक वर्ग को साथ लेकर चलना होगा। इसके लिए शांत मन, अनुशासित जीवनशैली एवं स्वस्थ शरीर का होना आवश्यक है, जिसमें योग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ नागरिक हमारे समाज की अमूल्य धरोहर, अनुभव के स्रोत एवं युवा पीढ़ी के प्रेरणास्तंभ हैं। उनका स्वस्थ एवं सक्रिय रहना आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करता है। योग इस दिशा में एक प्रभावी एवं सरल माध्यम है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।

वृद्धकेयर फाउंडेशन के संचालक सुश्री गार्गी जी ने वृद्धाश्रमों में रहने वाले वृद्ध व्यक्तियों के जीवन में योग के महत्व को अपने लंबे अनुभव के आधार पर उजागर किया। उन्होंने माता रामबेटी वृद्धाश्रम में रहने वाले सभी बुजुर्गों को नियमित रूप से योग करने के लिए आह्वान किया जिससे उनके शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक सोच-विचार पर अच्छी और गहरी प्रभाव और विकास हो पाए।

कार्यक्रम के दौरान उपस्थित अतिथियों ने युग संस्कृति न्यास एवं वृद्धकेयर फाउंडेशन द्वारा किए जा रहे सामाजिक एवं स्वास्थ्य जागरूकता संबंधी प्रयासों की सराहना की। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के कार्यक्रम समाज में स्वास्थ्य, जागरूकता एवं पीढ़ियों के बीच सकारात्मक संवाद को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। साथ ही भविष्य में भी युवाओं एवं वरिष्ठ नागरिकों के लिए ऐसे प्रेरणादायी, ज्ञानवर्धक एवं मनोरंजक कार्यक्रमों के आयोजन की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।

कार्यक्रम का समापन सामूहिक ध्यान, स्वस्थ जीवनशैली के संकल्प एवं सभी प्रतिभागियों के साथ सामूहिक आहार के साथ हुआ।

षड्यंत्रों के साये में राष्ट्रीयता का मानक गढ़ने वाले वीतरागी श्यामा प्रसाद मुखर्जी

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

कोलकाता । राष्ट्र की एकता-अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध अपना सर्वस्व आहुत करने वाले डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे महान व्यक्तित्व हैं जिनका जीवनवृत्त भारतीय राजनीति में सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला रहा है।6 जुलाई सन् 1901 को कलकत्ता के प्रतिष्ठित परिवार आशुतोष मुखर्जी के घर जन्मे डॉ. मुखर्जी अपने प्रारंभिक जीवन से ही राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित हो गए थे। घर-परिवार के संस्कारों से समृद्ध डॉ मुखर्जी शैक्षणिक और सामाजिक कार्यों के प्रति तत्परता से संलग्न रहने लगे थे। मैट्रिक, स्नातक और कानून की पढ़ाई के बाद वे सन् 1926 में इंग्लैंड से बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे। तत्पश्चात वे सन् 1934 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बन गए। उनका मात्र 32/33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति होने का गौरव प्राप्त करना अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी। यदि हम सामान्य दृष्टि से देखें तो क्या एक सम्पन्न एवं प्रतिष्ठित परिवार से होने के कारण श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को स्वयं को संघर्ष में झोंकने की कोई आवश्यकता थी? लेकिन उनसे राष्ट्र और समाज की दुर्दशा नहीं देखी गईं । अतएव उन्होंने स्वेच्छा से राष्ट्र के लिए आहुति बनना स्वीकार किया।

उनके जीवन से संबंधित एक चीज कौतूहल का विषय बनती है। वह यह कि डॉ मुखर्जी स्वातंत्र्य संघर्ष और स्वातंत्र्योत्तर काल के ऐसे शिखर पुरुष थे। जो सरदार पटेल, महात्मा गांधी आदि के बराबर का क़द रखते थे। राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित डॉ मुखर्जी का योगदान सर्वज्ञात ही था। इसके बावजूद भी नेहरू-गांधी परिवार ने अपने सत्ता के कालखण्ड में उन्हें उपेक्षित क्यों किया ? क्या उनका योगदान एक क्रांतिकारी एवं संगठक के रूप में राष्ट्र के लिए अपने आप में अद्वितीय नहीं है? वे मुखर्जी जी जिन्होंने अपने जीवन को निजी स्वार्थ एवं पद-प्रतिष्ठा के मोह से खुद को विरक्त कर दिया।एक भी प्रसंग नहीं है जब राष्ट्र के जमीनी मुद्दों पर लड़ने से वे पीछे हटे हों। बल्कि उन्होंने स्वयं को राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। राष्ट्र की नस-नस में घुल-मिल गए। राष्ट्रीयता और भारत की अखंडता के संकल्प को अपने कार्यों से साकार किया।

जब सत्ता के गलियारों में कोई सांसद अपनी आवाज भी प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के मत खिलाफ नहीं उठा सकते थे। उस समय भी मुखर्जी जी संसद में बेबाकी से धारा-370 के लिए आवाज बुलंद कर रहे थे। एक ऐसे प्रकाण्ड विद्वान शिक्षाविद् और राजनेता थे जिन्होंने देश के पहले उद्योग मंत्री रहते हुए भी सरकार को घेरा। वे सत्य के लिए-राष्ट्र के लिए किंचित मात्र नहीं डिगे। क्या उनमें हम किसी भी प्रकार के साहस की कमी की कल्पना कर सकते हैं?
लेकिन ऐसे व्यक्तित्व को हमेशा मुख्यधारा से काटना क्या भारतीय जनमानस में व्याप्त राष्ट्र-प्रेम का गला काटना नहीं था? नेहरू खानदान की पैरवी करने वाले जरा बताएँ कि मुखर्जी जी तत्कालीन समय में शीर्ष पर बैठने वाले राजनेताओं से किस पैमाने पर पीछे थे? चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र रहा हो याकि राष्ट्रसेवा सेवा में तत्परता का भाव रहा हो। याकि स्वतंत्र भारत के लिए नीतियों के स्पष्ट एवं दूरदर्शी रोडमैप के स्वरूप को प्रस्तुत करने की उनकी दृष्टि रही हो। यदि उनका आँकलन किया जाए तो वे किसी भी पैमाने पर कमतर नहीं दिखे। किन्तु-परन्तु उन्हें क्यों पीछे धकेला जाता रहा ?

श्यामा प्रसाद मुखर्जी को नेपथ्य में कोसों ढकेलने का कार्य हुआ। इसकी केवल एक ही वजह दिखती है कि -नीतियों को लेकर पंडित नेहरू से राष्ट्रीय एकता एवं राष्ट्रीय हितों के विषय पर मतांतर रखना।इसके अलावा अन्य कोई कारण स्पष्ट दृष्टव्य नहीं होता है। लेकिन इतिहास आज नहीं तो कल परत दर परत खुलता ही है।चाहे कुछ भी हो इतिहास और समय सभी के चाल-चरित्र एवं कार्यों का निर्धारण स्वमेव करता है।

वे मुखर्जी जी ही थे,जिन्होंने राष्ट्र पर आए संकट को पहले भांपकर उसका हल खोज निकाला था। उन्होंने 1946 में मुस्लिम लीग के धार्मिक उन्माद से प्रेरित बंगाल विभाजन के हिन्दू-सिख नरसंहार की त्रासदी के नापाक इरादों को कामयाब नहीं होने दिया। उस समय उन्होंने हिन्दुओं को सशक्त करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ।यह बात उस समय की थी जब तत्कालीन समय में राजनीतिक हस्तक्षेप करने में सक्षम देश के किसी भी बड़े नेता की इस ओर नजर नहीं जा रही थी कि – “पाकिस्तान के लिए लड़ने वाले लोगों की कुत्सित दृष्टि सम्पूर्ण पंजाब व बंगाल को पाकिस्तान के हिस्से में मिलाने की है, जिसके लिए वे किसी भी सीमा तक गिर सकते हैं तथा मुस्लिम लीग एवं सोहराबर्दी ने बर्बरता की सारी सीमा लाँघ दी थी।”

उस समय मुखर्जी जी ने अपनी कुशल दूरदृष्टि एवं रणनीतिक कौशल का का परिचय दिया। भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय पंजाब एवं बंगाल के आधे-आधे भाग को विभाजित कर शेष भारत के हिस्से में करने का अतुलनीय कार्य किया था।यह एक प्रखर राष्ट्रवादी देशभक्त का संकल्प था जिसके हृदय में अखण्ड भारत का संकल्प आलोड़ित हो रहा था।अपने इसी ध्येय को उन्होंने जीवन पर्यन्त निभाया।

राष्ट्र की एकता-अखण्डता एवं सर्वांगीण विकास के लिए आजीवन संघर्षरत रहने वाले मुखर्जी जी ही थे। उन्होंने देश की सभ्यता, संस्कृति के साथ किसी कदम पर कोई समझौता नहीं किया। बल्कि राष्ट्रीय चेतना के प्रखर उद्घोष के साथ संसद व देश भर में अपनी आवाज बुलंद करते रहे। मुखर्जी जी एक बार जिस निर्णय पर डट गए तो फिर कभी पीछे नहीं हटे। भले ही इसके लिए उन्हें अपने प्राणों की बाजी ही क्यों न लगानी पड़ गई हो।राष्ट्र हित के लिए उनकी अनन्य निष्ठा ही उन्हें विरला बनाती है।जब देश स्वतंत्र हुआ और कैबिनेट का गठन हो रहा था। उस समय डॉ मुखर्जी , सरदार पटेल और महात्मा गांधी के अनुरोध पर ही मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे। आगे जब उन्हें नेहरू सरकार में राजनीतिक स्वार्थपरता, पदलिप्सा का जोर दिखा। नेहरू सरदार राष्ट्र की समस्याओं एवं मुख्य उद्देश्यों से भटकती हुई दिखी। ऐसे में उन्होंने मंत्री पद से सहर्ष त्यागपत्र दे दिया।विपक्ष में बैठकर राष्ट्र की आवाज बनना न्यायोचित समझा।

वे भारत में जम्मू-कश्मीर कै सम्पूर्ण विलय एवं धारा-370 की समाप्ति के लिए सम्पूर्ण निष्ठा एवं समर्पण के साथ प्रतिबद्ध थे।वे इस पर नेहरू सरकार के विरुद्ध मुखरता के साथ प्रतिरोध दर्ज करवा रहे थे। राष्ट्र जागरण में जुटे थे।जब पंडित नेहरू के खासमखास शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर के अलावा शेष भारत के लोगों को जम्मू-कश्मीर में बगैर परमिट प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए – “एक देश, दो विधान, दो प्रधान , नहीं चलेंगे” ; ये उद्घघोष कर काश्मीर की ओर 8 मई सन् 1953 को कूच कर दिया।जहाँ उन्हें 10 मई 1953 को जम्मूकश्मीर की सीमा में ही शेख अब्दुल्ला सरकार ने गिरफ्तार करवा लिया।उनकी इस गिरफ्तारी में साजिशों की दुर्गंध आती है। उनकी इस गिरफ्तारी में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की भूमिका का पर्दे के पीछे होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि नेहरू व शेख अब्दुल्ला अजीज मित्र की तरह ही थे। इसीलिए पंडित नेहरू ने महाराजा हरिसिंह से सत्ता का स्थानांतरण शेख अब्दुल्ला के हाथों करवा दिया था।यानी कश्मीर में पृथकता और अलगाववाद की पूरी व्यवस्था प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने कर दी थी।‌

शेख अब्दुल्ला सत्ता में आए और फिर शुरू हुआ कश्मीरी हिन्दुओं के उत्पीड़न का अंतहीन सिलसिला। अब्दुल्ला सरकार ने 1952 से ही डोगरा समुदाय का उत्पीड़न प्रारंभ कर दिया गया था। इसके विरोध में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुखरता के साथ आवाज़ बुलंद की। उन्होंने बलराज माधोक और डोगरा समुदाय के प्रतिष्ठित पंडित प्रेमनाथ डोगरा के द्वारा गठित ‘प्रजा परिषद पार्टी’ का सदैव समर्थन किया। जम्मू-कश्मीर की मूल भावना और राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए सदैव प्रतिबद्धता व्यक्त की। अगस्त 1952 में ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने जम्मू की विशाल रैली में अपना संकल्प व्यक्त करते हुए कहा था कि – “या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा”

फिर अपने इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए उन्हें अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ गई।उनकी गिरफ्तारी के बाद जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी श्रीनगर के कारावास में उनके लिए सभी प्रकार के प्रतिबंध थे। उनके साथ ऐसा ट्रीटमेंट किया जाता था जैसे कि उन्होंने देशद्रोह किया हो। यह सब प्रधानमंत्री नेहरू और शेख अब्दुल्ला के गठजोड़ के चलते ही संभव हो रहा था। प्रतिबंधों की कड़ाई इतनी कि – मुखर्जी जी लिए आने वाली चिठ्ठियों का अनुवाद करवाकर जाँचा जाता था कि चिठ्ठियों में लिखा क्या है? उसके बाद उनका आदान-प्रदान होता था। इतना ही नहीं उन्हें जेल में किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं थी। क्या यह सब पंडित नेहरु के संरक्षण व इच्छा के बिना ही हो रहा था? भारत के किसी हिस्से में एकता की बात करने के लिए जेल में डालना क्या कभी सही ठहराया जा सकता है? क्या इसके पीछे पंडित नेहरू की मौन‌ सहमति नहीं थी?

अगर पंडित नेहरू चाहते तो क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को शेख अब्दुल्ला सरकार से रिहा नहीं करवा सकते थे ? क्या जम्मू-कश्मीर सरकार नेहरू के वर्चस्व से बड़ी थी? किन्तु उस समय राष्ट्र के दैदीप्यमान ज्योतिपुंज को जिस तरह से बुझाने का संयुक्त प्रयास किया जा रहा था।उसके पीछे के सभी षड्यंत्र स्पष्ट दिखलाई दे रहे थे।लेकिन उस समय मुखर्जी जी की प्रताड़ना पर किसी ने कभी भी उफ! तक की आवाज नहीं उठाई। सवाल कई आते हैं कोई कहता है कि हर चीज के लिए नेहरू को ही जिम्मेदार क्यों ठहराया जाता है?सवाल यह भी कि उनकी भूमिका की संलिप्तता को हर चीज में दिखाने का प्रयास किया जाता है। इस पर हम आप तो दूर अब इतिहास की ही तारीखों की ओर ही चलते हैं —

तारीख थी 24 मई 1952.. इस दिन प्रधानमंत्री नेहरू और डॉ.कैलाशनाथ काटजू श्रीनगर में थे। लेकिन उन्होंने शेख अब्दुल्ला सरकार के कारावास में बंद श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का हाल-चाल तक पूछना भी उचित नहीं समझा। क्या यह उनकी भूमिका पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता है? क्या ये तथ्य मुखर्जी जी की गिरफ्तारी के प्रति पंडित नेहरू की कूटरचित संलिप्तता को नहीं दर्शाता है? क्या पंडित नेहरू को श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा धारा-370 का विरोध करना स्वीकार नहीं था? क्या पंडित नेहरू कश्मीर को शेख अब्दुल्ला के हाथों सौंपकर अलगावद को खाद-पानी दे रहे थे?

सत्ता का मोह त्यागने वाले वीतरागी श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिन्होंने राष्ट्र हित के लिए मंत्री पद त्याग दिया।विपक्ष में बैठे मुखर और आक्रामक प्रतिकार किया। लेकिन राष्ट्रीय अस्मिता से रत्तीभर भी समझौता नहीं किया।
ऐसे प्रकाण्ड विद्वान,राजनीतिज्ञ व्यक्तित्व को पंडित नेहरू द्वारा उपेक्षित करना-क्या कभी सही ठहराया जा सकता है? मुखर्जी जी के जम्मू-कश्मीर जाने पर उनकी गिरफ्तारी एवं स्थान की जम्मू-काश्मीर की शेख अब्दुल्ला सरकार को पल-पल की ख़ुफ़िया जानकारी देने वाले कौन लोग थे? फिर ‘परमिट सिस्टम’ के षड्यंत्र के अन्तर्गत उन्हें गिरफ्तार करने के साथ-साथ, उनकी गिरफ्तारी का स्थान और कानूनी दाव-पेंचों का चयन करने वाले लोग कौन थे?

जेल में अचानक से मुखर्जी जी का स्वास्थ्य खराब होना तत्पश्चात रहस्यमयी ढंग से उनकी 23 जून 1953 को मृत्यु होना।इसके बाद उनकी संदिग्ध मृत्यु की जाँच को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु के रहस्य की तरह ही ठण्डे बस्ते में डालना आखिर क्या दर्शाता है? क्या यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की षड्यंत्र पूर्वक हत्या नहीं थी? क्या उनका अपराध धारा-370 के खत्म करने की दृढ़ प्रतिज्ञा थी? क्या उनका अपराध राष्ट्रवादी चिंतन और जनसंघ की स्थापना कर नेहरू के लिए चुनौती देने वाला होना था? क्या पंडित नेहरू को श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का भय सता रहा था? इसके चलते उन्होंने षड्यंत्रों को समर्थन दिया? क्या इन‌ सवालों का ज़वाब मिलेगा?‌

वर्तमान में कितने भी सवाल उठाएँ जाए लेकिन सच्चाई यह है कि-इस राष्ट्र ने राजनीतिक षड्यंत्रों में एक ऐसे राष्ट्रीय नेतृत्व के महापुरुष को खोया जिसकी उपस्थिति से राष्ट्र को अप्रत्याशित लाभ होता।अगर उनकी षड्यंत्रों के साये में मृत्यु न होती तो सम्भवतः राष्ट्रीय मुद्दों की दशा और दिशा बहुत पहले ही कुछ और होती। किन्तु यह सब संभव न हो सका। धारा-370 की समाप्ति के लिए जनसंघ और भाजपा ने उनके बलिदान को याद रखा। ‘जहां हुए बलिदान मुखर्जी-वह कश्मीर हमारा है’ — इस नारे के साथ वर्षों तक उनके बलिदान की ज्वाला को वैचारिक चेतना में जगाए रखा। असंख्य आंदोलन और प्रदर्शन किए। अंततोगत्वा नरेंद्र मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को धारा-370 को समाप्त करने का ऐतिहासिक कार्य किया।श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को सच्चे अर्थों में श्रृद्धांजलि दी।श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, चिंतक-विचारक ही भारत के मूल को उद्घाटित करते हैं।‌ राष्ट्रीयता के संस्कारों और व्यवहारों से समृद्ध उनकी वैचारिकी जन-जन के लिए प्रेरणा है। उनका समूचा जीवन त्याग, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है। उन्होंने जिस ‘अखण्ड भारत’ का चित्र अपने हृदय में बसाया-संघर्ष किया और राष्ट्र यज्ञ की आहुति बन गए। उन्हीं भावों और विचारों पर आधारित राजनीति ही भारत को नई दिशा दे सकती है।‌यही भारत का आत्म स्वर है। यही स्व और राष्ट्रीयता का शाश्वत उद्घोष है।‌आवश्यकता है कि उनके इस संदेश को आत्मसात किया जाए— “राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है।”

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