आधी आबादी बनाम आधी सोच: सदन में ठहरा न्याय

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प्रणय विक्रम सिंह

भोपाल । लोकतंत्र केवल बहुमत का खेल नहीं, वह मूल्य और मर्यादा का विधान भी है। और जब वही लोकतंत्र उस प्रस्ताव के सामने ठहर जाए, जो आधी आबादी को निर्णय के केंद्र में स्थापित करने का साहस रखता हो, तब प्रश्न केवल एक विधेयक का नहीं, उस सोच का होता है, जो परिवर्तन से कतराती है।

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के लिए आवश्यक संविधान संशोधन बिल का सदन में पारित न हो पाना एक राजनीतिक घटना भर नहीं है, यह उस मानसिकता का अनावरण है, जो नारी के सम्मान की बातें तो करती है, पर उसे सत्ता-संरचना में वास्तविक स्थान देने से हिचकती है।

भारतीय संस्कृति में नारी केवल शक्ति नहीं, बल्कि ‘मेधा’ और ‘लोक-मंगल’ की अधिष्ठात्री रही है। यह वही भूमि है जहां गार्गी प्रश्न करती हैं, मैत्रेयी ज्ञान को सर्वोपरि मानती हैं और द्रौपदी सत्ता से धर्म का उत्तर मांगती है। ऐसे देश में नारी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सीमित रखना केवल विरोधाभास नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विस्मरण है। ‘नारी वंदन अधिनियम’ उसी सनातन संस्कार का आधुनिक संसदीय रूप था, जहां परंपरा नीति में रूपांतरित होती और श्रद्धा व्यवस्था में प्रतिष्ठित होती।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह केवल एक राजनीतिक पहल नहीं थी, बल्कि एक व्यापक दृष्टि का विस्तार थी, ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का स्वाभाविक उत्कर्ष, जिसमें नारी केवल सहभागी नहीं, बल्कि सह-निर्माता बनती है। जनधन, उज्ज्वला, शौचालय, मातृत्व सुरक्षा और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जो आधार निर्मित हुआ, वही इस अधिनियम में अपनी तार्किक परिणति पाता।

परंतु संसद में जो हुआ, वह केवल एक विधेयक का रुकना नहीं है, यह भारत की वैचारिक परंपरा के साथ एक विचलन का क्षण है।

ज्ञातव्य है कि महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत, अर्थात 352 मतों की आवश्यकता थी। किंतु इसके पक्ष में मात्र 298 मत ही प्राप्त हो सके, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया और इसी के साथ यह ऐतिहासिक अवसर अधूरा रह गया।

इसी संदर्भ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे ‘भारत माता के सम्मान पर आघात’ बताया, वहीं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तीखा प्रश्न उठाया कि देश की आधी आबादी लगभग 70 करोड़ महिलाओं को अधिकार से वंचित कर कोई कैसे विजय का उत्सव मना सकता है? किंतु विडंबना यह है कि ऐसा हो भी रहा है।

यही वह विडंबना है, जहां राजनीति का चरित्र स्पष्ट होता है। अधिकारों के प्रश्न पर भी तर्क नहीं, तरकीबें हावी हो जाती हैं।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के तर्क न केवल विरोधाभासी थे, बल्कि वे इस मूल प्रश्न से भी विमुख दिखाई दिए कि क्या नारी को समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए या नहीं। वैसे भी मातृशक्ति को अधिकार देने के मामलों में कांग्रेस हमेशा पीछे हटी है। शाहबानो मामले में पीछे हटी, ट्रिपल तलाक में पीछे हटी और अब महिला आरक्षण में भी पीछे हट गई।

वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने तुष्टीकरण की एक नई रेखा खींचते हुए महिला आरक्षण के भीतर अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए पृथक कोटा की मांग कर दी। यह मांग न केवल व्यावहारिक दृष्टि से असंगत है, बल्कि सिद्धांततः भी संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल है। भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता है।

वैसे महिला आरक्षण बिल का विरोध सपा के लिए कोई नया नहीं है। मुलायम सिंह यादव ने भी हमेशा इसका विरोध किया था। सपा प्रमुख अखिलेश ने भी अपनी उसी विरासत को आगे बढ़ाया है। दास्तान सिर्फ इतनी नहीं है, अखिलेश यादव के विरोध के पीछे एक बड़ा कारण परिसीमन भी माना जा रहा है।

प्रस्ताव के लागू होने के बाद यदि परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और उत्तर प्रदेश की संसदीय संरचना में परिवर्तन होता है, तो शक्ति-संतुलन का पूरा समीकरण बदल सकता है।
स्वाभाविक है कि ऐसे परिवर्तन उन दलों के लिए असहजता का कारण बनते हैं, जिनकी राजनीति स्थापित समीकरणों पर टिकी रही है।

यहीं एक बात और साफ हो जाती है कि समाजवादी पार्टी के ‘सामाजिक न्याय’ की परिकल्पना में ‘महिला प्रतिनिधित्व’ अभी भी हाशिए पर ही है।

संसद में केवल एक प्रस्ताव नहीं ठहरा… ठहर गया डॉ. भीमराव आंबेडकर का वह संवैधानिक स्वप्न, जिसमें समानता केवल शब्द नहीं, अधिकार थी।

डॉ. राम मनोहर लोहिया का वह सामाजिक संघर्ष ठहर गया, जो स्त्री-पुरुष समानता को लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त मानता था।

जयप्रकाश नारायण का वह लोकनैतिक आग्रह ठहर गया, जिसमें सत्ता को समाज के प्रति उत्तरदायी होना था।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की वह कल्पना भी ठहर गई, जिसमें नारी को नैतिक नेतृत्व का केंद्र माना गया था। और यह केवल उत्तर भारत की चेतना नहीं थी, दक्षिण की धरती पर सावित्रीबाई फुले के संघर्ष से लेकर पेरियार के सामाजिक विद्रोह तक, नारायण गुरु के समता संदेश से लेकर किट्टूर रानी चेनम्मा के साहस तक, हर धारा ने नारी को केवल सहायक नहीं, बल्कि परिवर्तन का अग्रदूत माना। वे सब हार गए क्योंकि उनका मूल विश्वास यही था कि लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक उसमें नारी की पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित न हो।

दुर्भाग्य यह रहा कि विपक्ष ने इस ऐतिहासिक अवसर को अपनी संकीर्ण राजनीति की भेंट चढ़ा दिया। जिस विषय पर राष्ट्र एकमत हो सकता था, वहां विरोध केवल असहमति नहीं, बल्कि उस परिवर्तन के प्रति भय का संकेत है, जो स्थापित समीकरणों को तोड़ देता है। यह विरोध तर्क का नहीं, सत्ता के संरक्षण का था।

यह दृश्य अनायास ही महाभारत की उस सभा की स्मृति जगा देता है जहां द्रौपदी प्रश्न कर रही थी और सत्ता मौन थी। उस दिन केवल दुशासन दोषी नहीं था, वह मौन भी दोषी था, जिसने अन्याय को होने दिया। आज भी प्रश्न वही है… क्या हम फिर उसी मौन के सहभागी बन रहे हैं?

यह केवल विधेयक का गिरना नहीं था, यह उस अवसर का चूकना था, जहां भारतीय लोकतंत्र स्वयं को और अधिक समावेशी और संतुलित बना सकता था। यह उस विश्वास पर आघात था, जो करोड़ों महिलाओं ने इस आशा के साथ जोड़ा था कि अब उनकी आवाज निर्णयों में दिखाई देगी।

परंतु इतिहास साक्षी है कि भारत में नारी कभी पराजित नहीं होती। प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने इस विषय को जिस स्पष्टता और दृढ़ता से उठाया है, वह यह सिद्ध करता है कि यह संघर्ष रुकने वाला नहीं है। क्योंकि यह किसी दल का नहीं, भारत की आत्मा का प्रश्न है।

अब प्रश्न है कि इस संशोधन अधिनियम की सियासी बिसात पर कौन जीता? विपक्ष भले ही अपनी जीत का जश्न मना रहा हो किंतु इस बिसात पर चित और पट दोनों ही पक्ष भाजपा के साथ दिखाई देते हैं।

ध्यातव्य है कि यदि विधेयक लोकसभा में पारित हो जाता, तो यह नारी सशक्तीकरण की ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में भाजपा के खाते में जाता और अब जब यह ठहर गया है, तब विपक्ष का नारी विरोधी चरित्र उजागर हो गया है।

पार्टी ने इस मुद्दे को तुरंत जनआंदोलन का रूप देते हुए अपनी महिला सांसदों को आगे किया है, धरना-प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं और विपक्ष पर सीधे हमले तेज़ हो गए हैं। यह मुद्दा भावनात्मक हो गया है। आधी आबादी की संसद से सड़क तक पीड़ा दिखने लगी है। स्थिति यह है कि विपक्ष, विधेयक को रोककर भी सहज नहीं है। उसके नेता भले ही अपनी ‘रणनीतिक जीत’ पर संतोष व्यक्त कर रहे हों, लेकिन जनमानस में उठ रहे प्रश्न और भाजपा की आक्रामक रणनीति ने उन्हें रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है।

आश्चर्य होता है कि लोकसभा चुनाव के समय जो दल ‘संविधान बचाने’ की दुहाई दे रहे थे, उन्होंने ही डॉ. आंबेडकर के संवैधानिक स्वप्न (समानता) का गला घोंटा है। विपक्ष का असाधारण दोहरापन एक बार फिर बेनकाब हो गया।

विदित हो कि जब-जब इतिहास ने कठिन प्रश्न खड़े किए हैं, तब-तब इसी परंपरा ने उत्तर दिया है। धारा 370 का अंत हो, 35A का निष्कासन, अयोध्या में श्रीराम मंदिर का स्वप्न साकार होना या CAA जैसा साहसिक निर्णय… हर बार असंभव को संभव करने का संकल्प इसी विचारधारा ने निभाया है।

अब पुनः वही क्षण है।
आधी आबादी को नेतृत्व में भागीदारी अब केवल एक विधेयक का प्रश्न नहीं रहा, यह राष्ट्रव्यापी जनचेतना का विषय बन चुका है।
सदन भले ठहर गया हो…
पर समाज चल पड़ा है।

असम में रिकॉर्ड 85.96% मतदान, सत्ता बनाम विपक्ष—किसके पक्ष में जाएगा जनादेश?

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नव ठाकुरीया

असम में 9 अप्रैल 2026 को संपन्न हुए विधानसभा चुनाव ने राज्य की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस चुनाव में 85.96 प्रतिशत का ऐतिहासिक मतदान दर्ज किया गया, जो अब तक का सर्वाधिक है और जिसने सत्ता पक्ष तथा विपक्ष—दोनों के भीतर राजनीतिक समीकरणों को लेकर नई अटकलों को जन्म दे दिया है।

एक ही चरण में हुए इस चुनाव के लिए लगभग 2.50 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। इनमें 1.25 करोड़ महिलाएं और लगभग 6.4 लाख पहली बार मतदान करने वाले युवा मतदाता शामिल थे। राज्य की 126 विधानसभा सीटों पर कुल 722 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनके भाग्य का फैसला 4 मई को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) खुलने के साथ होगा। भारत का चुनाव आयोग इसी दिन असम के साथ केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम भी घोषित करेगा।

मतदान का यह अभूतपूर्व प्रतिशत केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संकेतों से भरा हुआ है। राज्य के कई विधानसभा क्षेत्रों—परबतझोरा, गोलकगंज, गौरीपुर, धुबरी, बीरसिंह जरुआ, बिलासपुर, मनकाचर, जलेश्वर, गोलपारा पश्चिम और पूर्व, अभयपुरी, श्रीजंग्राम, बोंगाईगांव, मांडिया, चेंगा, पाकाबेटबारी, चमरिया, बरखेत्री, नलबाड़ी, दलगांव, लहरीघाट, ढिंग, रूपाहीहाट और समगुरी—में 90 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया। इसके विपरीत, कामरूप और कामरूप (महानगर) के शहरी क्षेत्रों—डिमोरिया, दिसपुर, गुवाहाटी मध्य, जालुकबारी और नया गुवाहाटी—में मतदान लगभग 80 प्रतिशत के आसपास रहा।

इतिहास पर नजर डालें तो असम में उच्च मतदान अक्सर सत्ता परिवर्तन का संकेत देता रहा है। 2016 में 84.72 प्रतिशत मतदान के बाद तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को हटाकर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में आया था। वहीं 1985 में 78.37 प्रतिशत मतदान के बाद असम गण परिषद ने सत्ता संभाली थी। ऐसे में इस बार का रिकॉर्ड मतदान राजनीतिक विश्लेषकों के लिए कई संभावनाओं को जन्म दे रहा है।

राजनीतिक विश्लेषण इस समय दो स्पष्ट खेमों में बंटा हुआ है। एक वर्ग का मानना है कि यह मतदान सत्ता समर्थक लहर (pro-incumbency wave) का संकेत है। उनके अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था में सुधार, घुसपैठ-रोधी कदम, शांति समझौतों का क्रियान्वयन और विकास परियोजनाओं के साथ-साथ जनकल्याणकारी योजनाओं ने मतदाताओं का विश्वास जीता है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के आक्रामक प्रचार अभियान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेताओं की रैलियों से अतिरिक्त बल मिला, जिसने मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि मुख्यधारा के असमिया मतदाता, जो सामान्यतः मतदान में अपेक्षाकृत कम सक्रिय माने जाते हैं, इस बार बड़ी संख्या में बाहर निकले। इसे वे भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी और राज्य के विकास को लेकर बढ़ती जागरूकता का संकेत मानते हैं।

इसके विपरीत, दूसरा वर्ग इस उच्च मतदान को सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency) के रूप में देख रहा है। विपक्षी दलों का तर्क है कि एक दशक के शासन के बाद जनता में असंतोष पनपा है, जो मतदान में बड़ी भागीदारी के रूप में सामने आया है। उन्होंने बेरोजगारी, अल्पसंख्यक समुदायों के मुद्दे और कथित भ्रष्टाचार को प्रमुख कारणों के रूप में प्रस्तुत किया है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गौरव गोगोई ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर तीखे आरोप लगाए। यह विवाद तब और बढ़ गया जब कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सरमा और उनकी पत्नी रिंकी भुइयां पर गंभीर आरोप लगाते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। खेड़ा के दावों के बाद राजनीतिक माहौल और अधिक गरमा गया, हालांकि इन आरोपों को सत्ता पक्ष ने सिरे से खारिज किया।

इस चुनाव में एक और संवेदनशील मुद्दा उभरा—लोकप्रिय गायक ज़ुबीन गर्ग की रहस्यमयी मृत्यु। कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की और अपने घोषणापत्र में वादा किया कि सत्ता में आने पर 100 दिनों के भीतर न्याय सुनिश्चित किया जाएगा। हालांकि ज़ुबीन गर्ग के परिवार ने इस मुद्दे के राजनीतिकरण से बचने की अपील की और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा जताया। विश्लेषकों के अनुसार, यह मुद्दा भावनात्मक असर जरूर डालता है, लेकिन इसका चुनावी लाभ किसे मिलेगा, यह स्पष्ट नहीं है।

महिला मतदाताओं की भागीदारी इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरी है। पिछले चुनावों की तुलना में इस बार महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया, जो सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के प्रभाव को दर्शाता है। 2011 में जहां महिलाएं पीछे थीं, वहीं 2016 में उन्होंने बराबरी हासिल की और 2021 तथा 2026 में उन्होंने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया।

इसके साथ ही मतदाता सूची की विशेष समीक्षा, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना और मतदाताओं में बढ़ी जागरूकता ने भी मतदान प्रतिशत बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

इस बीच, ऊपरी असम की जोरहाट विधानसभा सीट ने विशेष ध्यान आकर्षित किया। यहाँ भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी और कांग्रेस के गौरव गोगोई के बीच मुकाबला हुआ, लेकिन दोनों नेताओं ने संयमित और शिष्ट चुनाव प्रचार का उदाहरण पेश किया। सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर, जिसमें दोनों पक्षों के समर्थक साथ बैठकर चाय पीते नजर आए, ने इस सीट को राजनीतिक शालीनता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया।

अन्य प्रमुख सीटों—जैसे सिबसागर, दिसपुर, गुवाहाटी सेंट्रल, तिहू और हाफलोंग—में भी कड़े मुकाबले देखने को मिले, जहाँ कई दिग्गज और युवा उम्मीदवार आमने-सामने हैं।

भाजपा के राज्य अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने विश्वास जताया है कि पार्टी अपने सहयोगियों—असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट—के साथ मिलकर 2021 के 75 सीटों के आंकड़े को पार करेगी। वहीं कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भी मजबूत प्रदर्शन का दावा कर रहे हैं।
कुल मिलाकर, असम का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या निरंतरता का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह दो परस्पर विरोधी राजनीतिक धारणाओं—विकास और स्थिरता बनाम असंतोष और बदलाव—के बीच सीधी टक्कर बन चुका है। अब 4 मई को मतगणना के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि रिकॉर्ड मतदान ने किस राजनीतिक पक्ष को जनादेश दिया है।
(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

संसद में महिला अधिकार छीनकर खुश होले कांग्रेस !

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल । महिला आरक्षण विधेयक पर लोकसभा में हुई हालिया वोटिंग ने भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण विरोधाभास को उजागर किया है। ये दर्शाता है कि कांग्रेस, सपा एवं अन्‍य विपक्षी दल भले ही संसद एवं जनता के बीच महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, किंतु जब वास्तविक निर्णय का समय आता है, तब उनके ऊपर राजनीतिक स्‍वार्थ, संकीर्ण दृष्टिकोण इस बड़े उद्देश्य पर भी हावी हो जाता है। भारतीय राजनीतिक परिदृष्‍य में यह दुभाग्‍यपूर्ण है कि उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता देने के बजाय राजनीतिक गणित को तरजीह दी।

सबसे पहले, इस पूरे घटनाक्रम को समझना जरूरी है। महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत, यानी 352 वोटों की आवश्यकता थी, किंतु इसके पक्ष में केवल 298 वोट ही पड़ सके। 230 सांसदों ने इसका विरोध किया, जिसके चलते यह विधेयक पास नहीं हो सका। अब भले ही इसे लेकर कांग्रेस एवं विपक्षी दल अपने कितने ही तर्क गढ़ें, हकीकत यह है कि यह परिणाम किसी राजनीतिक पार्टी के स्‍तर पर भाजपा के लिए विधायी असफलता नहीं है, यह तो देश की लगभग 50 प्रतिशत महिला आबादी की उम्मीदों को लगा एक गहरा झटका है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस विधेयक का विरोध सीधे तौर पर नहीं, बल्कि ‘अगर-मगर’ और ‘किंतु-परंतु’ के माध्यम से किया। उन्होंने विधेयक के क्रियान्वयन के तरीके, विशेषकर परिसीमन से जोड़ने पर आपत्ति जताई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे ‘छलावा’ करार दिया, किंतु आज जिस तरह से सदन में यह विधेयक गिरा, उससे साफ हो गया कि कांग्रेस सच में महिलाओं की कितनी बड़ी हिमायती है! कहना होगा कि राहुल के सभी तर्क अपने आप में विरोधाभासी प्रतीत हुए हैं। यदि कांग्रेस वास्तव में महिला आरक्षण के पक्ष में थी, तो उसे इस विधेयक का समर्थन करते हुए बाद में संशोधन की मांग करनी चाहिए थी। लेकिन समर्थन के बजाय विरोध का रास्ता चुनना इस बात का संकेत है कि पार्टी की प्राथमिकता महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ-हानि का आकलन था। यही कारण है कि सत्ता पक्ष ने इसे “दिखावटी समर्थन” और “वास्तविक विरोध” की संज्ञा दी।

समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं रही। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे पर सीधे समर्थन देने के बजाय सामाजिक समीकरणों और जातिगत प्रतिनिधित्व की बात उठाई। उनका तर्क था कि महिला आरक्षण के भीतर अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग कोटा सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यह मांग व्‍यवहारिक रूप से छोड़ें, सिद्धांततः भी उचित नहीं है, क्‍योंकि भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की कोई व्‍यवस्‍था नहीं देता है। जिस समय यह विधेयक पारित होने के कगार पर था, उस समय इस प्रकार की शर्तें जोड़ना वस्तुतः प्रक्रिया को जटिल बनाने और विधेयक को टालने का माध्यम ही दिखा।

यहां एक बड़ा प्रश्न उठता है, क्या विपक्ष वास्तव में महिलाओं के अधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध है, या वह केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति में उलझा हुआ है? यदि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने का अवसर सामने था, तो उसे पहले स्वीकार कर लेना और बाद में उसमें सुधार की मांग करना अधिक व्यावहारिक और प्रभावी रणनीति होती, किंतु उसने ये रास्‍ता नहीं चुना और देश की उन तमाम महिलाओं का हक एक झटके में मार दिया, जोकि भविष्‍य में इस देश की कर्णधार बन सकती थीं।
काश, कांग्रेस मध्‍य प्रदेश जैसे राज्‍यों से ही कुछ सीख ले लेती! इस संदर्भ में यदि हम जमीनी स्तर पर देखें, तो कुछ राज्यों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। मध्य प्रदेश में पंचायत स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत से अधिक हो चुका है। ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायत तीनों स्तरों पर महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 52-53 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह दर्शाता है कि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति होती है, तो महिलाओं को नेतृत्व में आगे लाया जा सकता है। निश्‍चित ही इसके लिए मप्र की भाजपानीत डॉ. मोहन यादव की सरकार बधाई की पात्र है।

मध्य प्रदेश का यह उदाहरण विपक्षी दलों के लिए एक सीख हो सकता है। यहां न सिर्फ आरक्षण लागू किया गया, बल्कि उसे प्रभावी तरीके से क्रियान्वित भी किया गया। परिणामस्वरूप महिलाएं यहां पर नाममात्र की प्रतिनिधि न होकर पूर्णत: निर्णायक भूमिका में हैं, वे हर प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बन गई हैं। जल, स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर उनकी प्राथमिकताओं ने ग्रामीण विकास को नई दिशा दी है।

इसके विपरीत, राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की राजनीति अक्सर सैद्धांतिक बहसों और आशंकाओं में उलझी रहती है। परिसीमन को लेकर उठाई गई चिंताएं; जैसे उत्तर-दक्षिण असंतुलन या सीटों का पुनर्वितरण महत्वपूर्ण हो सकती हैं, किंतु इन्हें महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे के रास्ते में बाधा बनाना उचित नहीं कहा जा सकता।

सत्ता पक्ष का यह आरोप कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने ऐतिहासिक रूप से भी सामाजिक न्याय के मुद्दों पर विलंब किया है, पूरी तरह निराधार नहीं है। ओबीसी आरक्षण के संदर्भ में काका कालेलकर आयोग और मंडल आयोग की सिफारिशों को लंबे समय तक लागू न करना, इस दिशा में कांग्रेस की धीमी गति को दर्शाता है। आज जब वही दल ओबीसी और महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं, तो उनके इरादों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इसके साथ कहना तो यह भी पड़ेगा कि वर्ष 2014 एवं 2019 में भारी बहुमत भारतीय जनता पार्टी के पास था, तब क्‍यों नहीं उसने इस दिशा में प्रभावी पहल की, यदि की तो उसे परिणाम में बदलने के लिए इतना लम्‍बा इंतजार क्‍यों किया ? पर जो सामने से स्‍पष्‍ट दिखाई देता है वह यही है कि कांग्रेस समेत संपूर्ण विपक्ष पहले से ही ये मन बना चुका था कि सदन में इस “महिला आरक्षण विधेयक” को पास होने ही नहीं देना है और वही हुआ! राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल चलता रहेगा, किंतु इससे उस महिला शक्‍ति की आकांक्षाएं पूरी नहीं होंगी, जोकि संसद या विधानसभा में अपनी आवाज उठाकर जनता के दर्द को दूर करने की मंशा रखती हैं।

इस पूरे प्रकरण से एक स्पष्ट संदेश तो अवश्‍य ही निकला है और वह यही है कि भारतीय राजनीति में अभी भी महिला सशक्तिकरण एक वास्तविक प्राथमिकता नहीं बन सकी है। यह सिर्फ एक चुनावी मुद्दा अवश्‍य है, जिसका उपयोग समय-समय पर राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता रहा है और आगे भी किया जाता रहेगा! वास्‍तव में अच्‍छा तो तब होता, जब कांग्रेस, सपा और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे पर सत्‍तारूढ़ भाजपा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले। निश्‍चित ही उन्होंने एक ऐतिहासिक अवसर को गंवा दिया। उन्होंने अपनी वैचारिक और राजनीतिक आपत्तियों को प्राथमिकता दी, जबकि देश की आधी आबादी उनसे ठोस कदम की अपेक्षा कर रही थी। यदि वे वास्तव में महिलाओं के अधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध होते, तो इस विधेयक को पास कराने में सहयोग करते और बाद में आवश्यक सुधारों के लिए संघर्ष करते।

इन दलों ने जो संदेश भारत के लोकतंत्र के सामने दिया है, वह यही है कि महिलाओं का अधिकार भी राजनीतिक सौदेबाजी का विषय बन गया है, जबकि यह हर दल के लिए एक संवैधानिक और नैतिक दायित्व होना चाहिए। जब तक राजनीति इस स्तर की परिपक्वता नहीं दिखाती, तब तक कहना यही होगा कि “नारी सशक्तिकरण” सिर्फ भाषणों और घोषणाओं तक ही सीमित है। आज विपक्ष ने निश्चित ही देश को निराश किया है! बहुत दुखद है, उसका ये निर्णय और विश्‍व के सबसे बड़े लोकतंत्र में स्‍त्री शक्ति का यह अपमान!

यह पहल अन्नक्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध होगी

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बनारस । आज दिनांक 17 अप्रैल 2026 को श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा संचालित टेढ़ीनीम स्थित अन्नक्षेत्र में स्वच्छ एवं सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। इस क्रम में Gas Authority of India Limited (GAIL) के माध्यम से पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) कनेक्शन की आपूर्ति सुनिश्चित की गई तथा इस परियोजना का विधिवत शिलान्यास संपन्न हुआ।

यह पहल अन्नक्षेत्र में भोजन निर्माण की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित, पर्यावरण-अनुकूल एवं प्रभावी बनाने की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होगी। PNG के उपयोग से न केवल ईंधन की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित होगी, बल्कि प्रदूषण में कमी तथा कार्यकुशलता में भी वृद्धि होगी।

इस अवसर पर डिप्टी कलेक्टर एवं नायब तहसीलदार सहित GAIL के वरिष्ठ अधिकारीगण उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से श्री सुशील कुमार (महाप्रबंधक, वाराणसी), श्री गौरी शंकर मिश्रा (महाप्रबंधक), श्री सुरेश तिवारी (महाप्रबंधक), श्री उदित सिन्हा (महाप्रबंधक), श्री कलाधर नारायण (महाप्रबंधक), श्री नवाजिश (उपमहाप्रबंधक), श्री प्रवीण सिंह एवं श्री चंदन (मुख्य प्रबंधक) उपस्थित रहे।

उक्त कार्यक्रम में अन्य गणमान्य व्यक्तियों की भी गरिमामयी उपस्थिति रही, जिनके सान्निध्य में इस महत्वपूर्ण परियोजना का शिलान्यास संपन्न हुआ।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा एवं सेवा में निरंतर नवीन पहलें की जा रही हैं, जिससे धाम की व्यवस्थाएं और अधिक सुदृढ़ एवं आधुनिक बन सकें।

॥ श्री काशी विश्वनाथो विजयतेतराम ॥

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